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UK Board 9 Class Hindi (मौखिक अभिव्यक्ति) – बोलना

UK Board 9 Class Hindi (मौखिक अभिव्यक्ति) – बोलना

UK Board Solutions for Class 9th Hindi (मौखिक अभिव्यक्ति) – बोलना

बोलना भी एक कला है। बोलने की कला व्यक्ति को समाज में लोकप्रिय बना देती है। अच्छा वक्ता या बोलनेवाला सभी को प्रभावित कर लेता है। स्वामी विवेकानन्द के भाषण ने पूरे अमेरिका को प्रभावित कर दिया था। इसी प्रकार श्री अटलबिहारी वाजपेयी तथा ( स्व ० ) श्री हेमवतीनन्दन बहुगुणा अपनी वक्तृत्व कला के लिए पहचाने जाते हैं। |
(i) भाषण, वाद-विवाद
भाषण एवं वाद-विवाद का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-
भाषण
भाषण का मुख्य उद्देश्य, किसी विषय को श्रोता के मन में गहराई से उतारना होता है। विषय को श्रोताओं के सामने इस प्रकार प्रस्तुत करना होता है कि वे उसे भली-भाँति समझ लें और उनमें जोश उत्पन्न हो सके।
अच्छे भाषण की विशेषताएँ
  • अच्छे भाषण में रोचकता होती है।
  • अच्छा भाषण सुस्पष्ट होना चाहिए। भाषण देनेवाले को पता होना चाहिए कि उसे क्या बात कहनी है।
  • भाषण में प्रामाणिकता होनी चाहिए, वक्ता को वास्तविक तथ्य ही प्रस्तुत करने चाहिए ।
  • भाषण में जोश होना चाहिए, जिससे श्रोताओं में उत्साह जाग उठे।
  • भाषण में बीच-बीच में सम्बोधन का भी प्रयोग करते रहना चाहिए; जैसे—‘अध्यक्ष महोदय !’, ‘मुख्य अतिथि महोदय !’, ‘मेरे मित्रो, देवियो और सज्जनो!’ आदि-आदि।
  • भाषण को वास्तविक बनाने के लिए प्रतिदिन के जीवन के अनुभवों को भी उसमें रखना चाहिए।
  • भाषण के बीच-बीच में श्रोताओं से भी कुछ पूछा जा सकता है; यथा—‘मैं पूछना चाहता हूँ कि अच्छा आप क्या सोचते हैं?’
● भाषणों के उदाहरण :
उदाहरण-1 : नैतिक पतन
आदरणीय अध्यक्ष महोदय एवं मेरे मित्रो !
राष्ट्र और व्यक्ति के जीवन में चरित्र – बल का बड़ा महत्त्व है। चरित्र से भ्रष्ट व्यक्ति का समाज में कोई स्थान नहीं होता । चरित्र से गिरे हुए व्यक्ति को सभी हेय दृष्टि से देखते हैं, जबकि सच्चरित्र व्यक्ति समाज में मान-सम्मान और यश पाता है।
आचरण की पवित्रता के महत्त्व एवं प्रभाव को प्रदर्शित करनेवाले बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे, जिनमें एक या बहुत थोड़े-से सदाचारी व्यक्तियों के कारण उनके परिवार की ही नहीं, बल्कि देश और जाति की भी उन्नति हुई और वे समाज के शिखर तक पहुँच गए।
अध्यक्षजी! सदाचारी व्यक्ति के चरित्र का प्रभाव उनके सम्पर्क में आनेवाले लोगों पर ही नहीं, बल्कि समाज के बहुत बड़े भाग पर भी पड़ता है और उससे नैतिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय उत्थान होता है। ऐसे सदाचारी व्यक्ति पर कोई भी जाति या राष्ट्र गर्व से अपना मस्तक ऊँचा कर सकता है।
मित्रो! सच्चरित्रता वह धन है जिसके समक्ष, धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य सब बेकार है। विद्या, धन और शक्ति का सदुपयोग भी सदाचारी व्यक्ति ही कर सकता है। यदि ये चीजें किसी विवेकहीन दुष्ट व्यक्ति को प्राप्त हो जाएँ तो वह उनका दुरुपयोग ही करेगा।
देश व्यक्तियों से मिलकर बनता है। जब व्यक्ति का नैतिक पतन हो जाता है, तब देश का भी नैतिक पतन होना अवश्यम्भावी है। वर्तमान में कतिपय नेताओं और अफसरशाहों का नैतिक पतन अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया है। इससे हमारे देश को विश्व में कितना अपमान झेलना पड़ा है, इसे ये लोग नहीं समझते हैं। आज कोई भी नेता जनता के विश्वास के योग्य नहीं रह गया है। यह स्थिति हमारे देश के लिए अत्यन्त चिन्ताजनक है। पहले नेता देश को ही सर्वोपरि समझा करते थे, जबकि आज ये स्वार्थसिद्धि में लगे हुए हैं। देश की सम्मान की रक्षा के लिए हमें नैतिकता को पुनः स्थापित करना होगा। इसे समाज में मान्यता देनी होगी। आज अनेक राजनेताओं का कितना नैतिक पतन हो गया है, यह उनके द्वारा किए जा रहे घोटालों से पता चल रहा है। इन शर्मनाक घटनाओं से देश की छवि बिगड़ रही है, देश के नागरिकों का मनोबल गिर रहा है।
अध्यक्षजी ! अन्त में मैं केवल यही कहना चाहूँगा कि किसी भी हालत में हमें देश के इस नैतिक पतन को रोकना ही होगा।
उदाहरण – 2 : नारी की वर्तमान दशा
अध्यक्ष महोदय एवं उपस्थित सभामण्डल के सम्मान्य सदस्यो !
मुझे नारी की वर्तमान दशा पर बोलने का आदेश हुआ है। स्वतन्त्रता के पश्चात् नारी की स्थिति में बड़े भारी परिवर्तन हुए हैं। उसमें अपने अधिकारों, अपनी स्वतन्त्रता, अपने अस्तित्व एवं विकास के प्रति चेतना जाग उठी है। वे उच्चशिक्षित होकर पुरुषों के साथ धनोपार्जन करने में भी सहयोग कर रही हैं। शिक्षा, खेल, फिल्म, साहित्य, विज्ञान, सेना, पर्वतारोहण, प्रशासन, उद्योग, व्यापार आदि कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहाँ नारी ने अपनी योग्यता व क्षमता को पुरुषों के बराबर न सिद्ध कर दिया हो।
अध्यक्षजी ! आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता का परिचय देने, सैद्धान्तिक रूप से समानता के अधिकार को प्राप्त करने तथा धन कमाने की दृष्टि से पुरुषों के साथ समान रूप से सहयोग करने के उपरान्त भी भारतीय नारी के दुर्भाग्य का अन्त नहीं होता दिखाई दे रहा है। पुरुषों का अधिकांश समाज आज भी उसे अपनी सेविका से अधिक नहीं मानता है और उस पर अनेक प्रकार के अत्याचार करता है। जिस नारी को त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति समझा जाता रहा है, जो पुरुष की जन्मदात्री है, वही नारी आज भी पुरुष द्वारा ही शोषण का शिकार हो रही है।
यद्यपि सरकार ने नारी को पुरुषों के समान ही अधिकार प्रदान किए हैं, फिर भी व्यावहारिक रूप से वह उन अधिकारों से बहुत दूर है और उसे आज भी अधिकांशत: पुरुषों की कृपा पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त दहेज की कलंकपूर्ण प्रथा समाज के : लिए आज पूर्ण रूप से एक गम्भीर अभिशाप बन चुकी है। हमारा सभ्य समाज इस दृष्टि से नारी जाति के प्रति जंगलियों जैसा व्यवहार कर रहा है। कितनी ही युवतियाँ प्रतिदिन दहेज की वेदी पर बलि चढ़ाई जा रही हैं, फिर भी हमारी आँखें बन्द हैं। क्यों? दहेज का यह दानव हमारी बुद्धि पर ताला डाले बैठा है। क्यों? – क्योंकि हमारी सोचने और विचारने की शक्ति पूरी तरह कुण्ठित हो चुकी है। दहेज के इस अभिशाप के कारण सुयोग्य कन्याएँ अयोग्य युवकों के साथ बँधकर निरीह पशुओं की भाँति जीवन भर उनका बोझ ढोने को विवश रहती हैं।
अध्यक्षजी! इसमें सन्देह नहीं कि अनेक त्रासदियों, तनावों, कुण्ठाओं और अत्याचारों को सहने के बाद अब आकर नारी की स्थिति में कुछ परिवर्तन हुआ है। उसे अनेक प्रकार की स्वतन्त्रताएँ, अधिकार और नए अवसर प्राप्त हुए हैं। वह प्रत्येक क्षेत्र में अपनी योग्यता, प्रतिभा, कर्मठता एवं कुशलता का परिचय दे रही है। परिवार, समाज एवं राष्ट्र के उत्थान में वह प्रत्येक दृष्टि अपना योगदान भी रही है। फिर भी, अभी नारी के उत्थान की दिशा में और अधिक प्रयत्न किए जाने की जरूरत है, विशेष रूप से नारी की शिक्षा, सुरक्षा और दहेज-प्रथा के उन्मूलन की दिशा में। इसके साथ ही पुरुषों को अपनी मानसिकता में कुछ और परिवर्तन करने तथा नारियों को उनके अपने महत्त्व एवं गौरव के अनुकूल आचरण करने की भी अत्यधिक आवश्यकता है।
वाद-विवाद
वाद-विवाद भी भाषण की ही एक कला है। इसमें किसी एक विषय पर दो लोगों को अपने विचार श्रोताओं के समक्ष रखने होते हैं। एक पक्ष विषय के पक्ष में अपने तर्क प्रस्तुत करता है, दूसरा पक्ष उसके विरोध में तर्क प्रस्तुत करता है। इन दोनों के तर्कों को सुनकर निर्णायक अपना निर्णय देकर किसी एक पक्ष को विजेता घोषित करते हैं।
अच्छे वाद-विवाद की विशेषताएँ
  1. वाद-विवाद में रोचकता और जोश होना चाहिए।
  2. वाद-विवाद का विषय स्पष्ट और तर्क रखने योग्य होना चाहिए।
  3. वाद-विवाद का विषय जीवन के अनुभवों से चुना जाना चाहिए।
  4. निर्णायक यदि निर्णय देने के बाद इस विषय पर कुछ बोलें तो श्रोताओं को अधिक प्रामाणिकता प्रतीत होती है।
(ii) गति, लय, आरोह-अवरोहसहित सस्वर कविता वाचन
कविता का सस्वर वाचन/ पाठ सभी को आकर्षित करनेवाला और मनमोहक होता है। काव्य पाठ से पूर्व भाव, व्यंग्य, हास्य आदि. गुणों को समझना अत्यन्त आवश्यक है। भावानुकूल वाणी और स्वर में लय, उच्चारण, बलाघात, हाथ-पाँव आदि का संचालन, चेहरे की भाव-भंगिमा आदि बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। कविता के ‘रस’ को समझकर सस्वर वाचन करना उत्तम है।
उदाहरण-1
● निम्नलिखित काव्य पंक्तियों का सस्वर वाचन कीजिए—
हारा हूँ सौ बार
गुनाहों से लड़-लड़ कर
लेकिन बारम्बार लड़ा हूँ
मैं उठ उठ कर,
इससे मेरा हर गुनाह भी मुझसे हारा
मैंने अपने जीवन को इस तरह उबारा।
डूबा हूँ हर रोज
किनारे तक आ आ कर
लेकिन मैं हर रोज
उगा हूँ जैसे दिनकर,
इससे मेरी असफलता भी मुझसे हारी
मैंने अपनी सुन्दरता इस तरह सँवारी ।
(iii) वार्त्तालाप और उसकी औपचारिकताएँ
वार्तालाप और अन्य औपचारिकताओं के लिए कोमल, मधुर, विनम्र वाणी में सहयोग की भावना और मुसकराहट के गुण का अपने में समावेश करना आवश्यक है। वार्त्तालाप में अहंकार नहीं होना चाहिए । एक- दूसरे की भावनाओं को समझना आवश्यक है; अतः शिष्ट आचरण करना चाहिए। आयु, पद आदि की गरिमा का भी ध्यान रखना चाहिए । कबीर ने भी कहा है—
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय ॥
● वार्त्तालाप के उदाहरण :
उदाहरण-1 : शालिनी और सब्जी विक्रेता का वार्त्तालाप
शालिनी — भैया, आलू क्या भाव है?
सब्जी विक्रेता – छह रुपये किलो ।
शालिनी – भैया, पाँच रुपये किलो लगा दो ।
सब्जी विक्रेता – बिटिया, मैं भाव तो कम नहीं करूँगा।
शालिनी – भैया, मैं पाँच किलो ले लूँगी।
सब्जी विक्रेता – तो तुमने ऐसा क्यों नहीं बताया। मैं तुम्हें चौबीस रु० के पाँच किलो दे दूँगा ।
शालिनी – तो तोल दो पाँच किलो ।
उदाहरण-2 : छात्र और आचार्य के बीच वार्त्तालाप
छात्र- आचार्यजी को प्रणाम !
आचार्य – दीर्घायु होओ, यशस्वी बनो।
छात्र- हम आभारी हैं।
राघव – आचार्य ! धर्म में वृद्ध कौन होता है?
आचार्य – आप क्या मानते हैं?
राघव – (सोचकर) हुँ……. जो धर्म में बड़ा – बूढ़ा हो ।
आचार्य- – सच है । परन्तु वह धर्म क्या है?
माघव- मैं बताऊँ गुरुवर ! जो धारण किया जाता है वह धर्म है, इसलिए कर्त्तव्य ही धर्म है।
आचार्य – बहुत अच्छा। जो कर्त्तव्य का पालन करनेवाला और गुणवान् होता है उसकी आयु नहीं गिनी जाती ।
राघव — वह कैसे ?
आचार्य – महाभारत में एक कथा दी गई है, जिसमें बारह वर्ष के एक बालक अष्टावक्र ने अपने ज्ञान से राजा जनक की सभा के सदस्यों को जीत लिया था।
छात्र — भारत देश धन्य है, जहाँ बच्चे भी इस प्रकार के ज्ञानी हैं।
(iv) कार्यक्रम प्रस्तुति
इसमें मंच का संचालन एवं श्रोताओं के सम्मुख अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करने की विधा आती है। मंच पर शालीनता, मधुरता, बड़ों के लिए सम्मान्य शब्दों का उद्बोधन – प्रस्तुति को आकर्षक बना देता है; अतः गरिमापूर्ण सम्बोधनों का यथावश्यक प्रयोग करना चाहिए। उदाहरण – आदरणीय सभापति/अध्यक्ष महोदय आदि ।
यदि अपना ही कार्यक्रम देना हो तो ‘स्व’ परिचय के साथ भी कार्यक्रम आरम्भ किया जा सकता है।
कार्यक्रम प्रस्तुति में आवश्यकतानुसार पूर्व प्रस्तुति की प्रशंसा, भावी प्रस्तुति का परिचय देने से दर्शक अथवा श्रोता कार्यक्रम को सुरुचिपूर्ण ढंग से देखते हैं। मंच-संचालक वातावरण को रुचिपूर्ण बनाता हुआ श्रोताओं को कार्यक्रम के अन्त तक बाँधे रखता है; अतः कार्यक्रम की पूर्ण रूपरेखा एवं उसकी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है।
मंच-संचालक की भूमिका को तीन भागों में बाँटा जा सकता है—
  1. कार्यक्रम आरम्भ होने से पूर्व संगीत एवं सूचनाएँ देनी चाहिए।
  2. कार्यक्रम के मध्य— सधे शब्दों में क्रम से कार्यक्रमों को उनकी भूमिका के साथ प्रस्तुत करना ।
  3. कार्यक्रम के अन्त में— कार्यक्रम की प्रशंसा एवं उत्साहवर्द्धक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
उदाहरण 1: कार्यक्रम की प्रारम्भिक उद्घोषणा
विद्यालय विद्या का मन्दिर है, जहाँ विद्या की देवी सरस्वती की पूजा होती है। हम भी इसी परम्परा को निबाहते हुए प्रस्तुत कर रहे हैं माँ सरस्वती के चरणों में ये भाव सुमन – ‘वीणा वादिनी………|’
अथवा
गणेश विघ्न विनाशक देवता हैं। सभी देवों में सर्वप्रथम पूजे जानेवाले ऐसे देव को हम भी इसी भाव से स्मरण कर रहे हैं कि हे गणेश! हमारे भी सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हों— ‘वक्रतुण्ड महाकाय………| ‘
उदाहरण 2 : कार्यक्रम के मध्य में पंजाब का गिद्दा प्रस्तुत करने के लिए उद्घोषणा
उत्तर— अभी आपने नन्हें बच्चों का समूह-गान “नन्हे-मुन्ने बच्चे….. सुना। वास्तव में ये बच्चे अपना भविष्य स्वयं लिखने को तैयार हैं। इन्हीं के हाथों हमारे देश का भविष्य सुरक्षित है। ये नन्हें बच्चे युवा होने पर ऐसे ही मेहनती और परिश्रमी बनेंगे, जैसे पंजाब के किसान |
पंजाब का नाम आते ही याद आते हैं वहाँ के लहलहाते खेत, झूमते-गाते किसान, जो परिश्रमी भी हैं और साहसी भी। परिश्रम का फल तो मीठा ही होता है, इसीलिए लहलहाती फसल को देख किसान झूमकर सफलता के नशे में डूब जाते हैं और अपने पर ही इतराते हुए उनके पाँव थिरक उठते हैं। प्रस्तुत है ऐसा ही जोशीला, झूमता-मदमाता यह गिद्दा ………|
विशेष—मंच-संचालक के अपनी भाषा में भाव के अनुरूप उतार-चढ़ाव के साथ मुहावरों, कविताओं आदि का प्रयोग करते हुए कलात्मक ढंग से उद्घोषणा करने से समाँ बँध जाता है। विनम्रता और कोमलता केवल शब्दों से ही नहीं, वरन् भाव से भी महसूस होनी चाहिए।
(v) कथा-कहानी अथवा घटना सुनाना
अच्छे कथाकार सरलता से नहीं मिलते; अतः एक अच्छे कथाकार को अच्छा प्रभावशाली वक्ता होना चाहिए। कहानी सुनाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए-
(i) घटना/कहानी काल्पनिक होने पर भी ऐसे सुनाई जाए कि वह सजीव प्रतीत हो ।
(ii) रोचक ढंग से कथा सुनानी आवश्यक है। भाषा सरल, किन्तु आकर्षक होनी चाहिए।
(iii) कहानी में आवश्यकता के अनुसार वाणी और हाव-भाव के द्वारा भाव अभिव्यक्ति, श्रोता को बाँधे रखती है।
(iv) कहानी में अन्त तकं गोपनीयता और जिज्ञासा बनाए रखनी चाहिए, जिससे श्रोता कहानी का अन्त जानने को उत्सुक रहें।
(v) सहजता और स्वाभाविकता बनाए रखनी चाहिए।
(vi) कहानी में घटनाक्रम को बहुत देर तक खींचना ठीक नहीं, इससे श्रोता ऊब जाते हैं; अतः घटनाएँ तेजगति से चलनी चाहिए। बीच में रुकना या समझाने की क्रिया भाषण के लिए उचित है, कहानी के लिए नहीं ।
(vii) सफल कहानी अन्त में स्वयं सन्देश प्रेषित करती है, न कि वक्ता को सन्देश बताने की आवश्यकता होती है।
उदाहरण-1 : खूबियाँ हैं हम सबमें (कथा-कहानी)
जंगल का राजा शेर युद्ध की तैयारी कर रहा था। उसने जंगल के सभी जानवरों की एक सभा बुलाई। हाथी, हिरन, खरगोश, घोड़ा, गधा, भालू, बन्दर सभी आए।
राजा शेर ने सबको उनके काम सौंप दिए। केवल खरगोश और गधे को काम देना बाकी था। शेष जानवर बोले, ‘महाराज ! आप अपनी सेना में गधे और खरगोश को शामिल मत कीजिए। ‘
‘लेकिन क्यों?’ शेर ने पूछा।
तब सभी जानवरों की ओर से हाथी खड़ा हुआ और बोला, ‘महाराज! गधा इतना मूर्ख है कि वह हमारे किसी काम का नहीं है, युद्ध के समय बुद्धिमान् व्यक्ति की जरूरत होती है।’
फिर भालू बोला, ‘और महाराज ! यह खरगोश तो इतना डरपोक है कि मेरी परछाईं से ही डरकर भाग जाता है। डरपोक व्यक्ति का युद्ध में क्या काम ?’
अब शेर बोला, ‘भाइयो! आपने गधे और खरगोश की कमजोरियाँ तो देख लीं, लेकिन क्या आपने उनकी खूबियों पर ध्यान दिया ?’
‘हाँ खूबियाँ, देखिए गधा इतनी तेज आवाज में चिल्ला सकता है। कि मेरी दहाड़ भी उसके सामने हल्की लगेगी और खरगोश के जितना और खरगोश को सन्देशवाहक। हर किसी के अन्दर कोई-न-कोई खूबी फुर्तीला क्या कोई और है? इसलिए मैं गधे को उद्घोषक बनाता हूँ जरूर होती है। बस जरूरत होती है तो उसे ढूँढने की । ‘
● चित्र देखकर कहानी सुनाना
चित्र देखकर कहानी सुनाना भी एक कला है। इसके अभ्यास के लिए निम्नलिखित उदाहरण देखिए-
उदाहरण-2
निर्देश – निम्नांकित चित्र देखकर एक कहानी सुनाओ- 
उत्तर— एक बन्दर सड़क किनारे एक पेड़ पर बैठा हुआ था । वह बहुत भूखा था। तभी केलों का एक गुच्छा लिए हुए, एक व्यक्ति उस पेड़ के नीचे आकर बैठ गया। बन्दर ने ऊपर से केले देखे तो उन्हें खाने को उसका मन करने लगा। उसने मौका देखकर चुपके से एक केला अपने लिए ले लिया।
उस व्यक्ति को अभी तक पता ही नहीं चल पाया था कि बन्दर उसका केला. ले गया है। उसने अपने लिए एक केला उठाया और छीला। तभी उसने बन्दर को देखा। उसके हाथ में केला देखकर वह समझ गया कि बन्दर ने उसका एक केला ले लिया है। उसे बहुत गुस्सा आया।
बन्दरों की आदत होती है नकल उतारना । जब उस बन्दर ने देखा कि वह व्यक्ति केला छील रहा है तो उसने भी केला छील लिया। व्यक्ति ने केला खाना शुरू किया। बन्दर ने भी केला खाया। उस व्यक्ति ने बन्दर को देखकर तरह-तरह का मुँह बनाया। बन्दर ने भी वैसे-वैसे ही मुँह बनाया। केला खत्म होने पर व्यक्ति ने छिलका जमीन पर फेंक दिया। नकलची बन्दर हर बात की नकल कर रहा था। लेकिन इस बार उसने उस व्यक्ति की नकल नहीं की, बल्कि वह पेड़ से उतरकर आया और छिलका पास में रखे एक कूड़ेदान में डाल दिया। फिर उस व्यक्ति की ओर गुस्से से देखा और पेड़ पर चढ़ गया।
जरा सोचो, कितनी शर्म आई होगी उस व्यक्ति को !
(vi) परिचय देना, परिचय प्राप्त करना
परिचय देना और प्राप्त करना भी एक कला है; अतः दोनों ही दशाओं में सामनेवाले व्यक्ति को ऐसा महसूस होना चाहिए कि हम सम्पर्क बढ़ाने के इच्छुक हैं। इसमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए-
  1. चेहरे पर प्रसन्नता का भाव और ध्यान बात करनेवाले पर ही केन्द्रित होना चाहिए।
  2. आरम्भ में मात्र नाम, कक्षा अथवा व्यवसाय ही बताना चाहिए।
  3. अपनी रुचि, निवास आदि की जानकारी यदि कोई पूछे, तभी देनी चाहिए।
  4. परिचय देते समय जैसे-जैसे सामनेवाला खुलता है, वैसे-वैसे ही अपना परिचय देना उचित है।
  5. अपने साथ यदि कोई और भी सम्बन्धी अथवा मित्र है और दूसरे से उसका परिचय करवाना है, तब भी परिचय सावधानी से आवश्यकतानुसार ही देना चाहिए।
  6. किसी विशेष एवं महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व का परिचय कराना भी एक कला है, जिसमें संक्षेप में सम्बन्धित व्यक्ति की विशेषता को उजागर करना चाहिए। सार्वजनिक रूप अतिथि/कलाकार का परिचय कराने के लिए भाषा पर विशेष ध्यान देते हुए सन्तुलित ढंग से प्रशंसा करते हुए परिचय करवाना चाहिए।
● परिचय देना / करवाना
उदाहरण – (क) अपना परिचय विस्तृत रूप से दीजिए ।
उत्तर- मैं महेन्द्र कुमार, केन्द्रीय विद्यालय लखनऊ, ए० एम० सी० में नवीं कक्षा में पढ़ता हूँ। मैं पहली कक्षा से ही इस विद्यालय में पढ़ रहा हूँ। मेरी अंग्रेजी साहित्य की पुस्तकें पढ़ने के साथ-साथ तैराकी और शतरंज खेलने में भी बहुत रुचि हैं। तैराकी प्रतियोगिता में मैंने गत सप्ताह ही अपने विद्यालय का प्रतिनिधित्व किया है।
(ख) आप संगीत कार्यक्रम में श्रोता के रूप में अपनी बहन के साथ गए हैं। मुख्य कलाकार से आप परिचित हैं। कलाकार से अपनी बहन का परिचय करवाएँ।
उत्तर – नमस्कार, बहुत समय के पश्चात् आज आपका गाना सुना । यह मेरी बहन सुमन आपकी बहुत प्रशंसक है। इसे भी गायन से लगाव है, परन्तु केवल सुनती है, गाती नहीं ।
(ग) आपके शहर में जादू-सम्राट् अरविन्द आए हैं। उनका परिचय कराइए ।
उत्तर — उपस्थित अतिथिगण एवं बन्धुओ ! अब मैं उस जादुई व्यक्तित्व का परिचय आपसे कराना चाहती हूँ, जिसे देश-विदेश में बहुत ख्याति प्राप्त हो चुकी है। यूँ तो जादू सम्राट् अरविन्द और उनकी कला का परिचय कराना सूर्य को दीपक दिखाना है, किन्तु आपकी जानकारी के लिए मैं आपको बताना चाहती हूँ कि जादू-सम्राट् मूलरूप से मध्य प्रदेश छिंदवाड़ा के निवासी हैं। देश-विदेश में आयोजित उनके अनेक शो में उन्हें अत्यन्त प्रशंसा और प्रसिद्धि प्राप्त हुई है।
बन्धुओ ! इससे पहले कि जादू-सम्राट् अपने जादू से मुझे गायब कर दें, मैं उन्हें मंच पर आने के लिए सादर आमन्त्रित करती हूँ। तालियों से जादू-सम्राट् अरविन्द का स्वागत कीजिए…………..|
● परिचय लेना
परिचय लेते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए—
  1. अपरिचित से एकदम खुलना उचित नहीं; अतः आरम्भ में अभिवादन के बाद मात्र नाम इत्यादि ही पूछना चाहिए।
  2. शिष्टता और शीलनता का परिचय दें।
  3. ‘आप’ सम्बोधन आवश्यक है।
  4. स्वभाव जाने बिना मजाक और हँसी करना उचित नहीं ।
  5. व्यंग्य नहीं, सीधी बात करें।
  6. आवश्यकतानुसार ‘धन्यवाद’ अवश्य दें।
  7. परिचय प्राप्त कर प्रसन्नता व्यक्त करें।
  8. अपने कष्ट सुनाना उचित नहीं है। न ही किसी भी प्रकार की स्वार्थपूर्ण बातचीत करनी चाहिए ।
  9. आत्मीयता का भाव दिखाने के लिए भाई साहब, बहनजी आदि आवश्यक सम्बोधनों का प्रयोग करें।
  10. अन्त में ‘धन्यवाद’ अवश्य ज्ञापित करें और पुनः मिलने के लिए भी इच्छा व्यक्त करें ।
(vii) भावानुकूल संवाद – वाचन
संवाद / वार्त्तालाप का अर्थ है- बातचीत। बातचीत में भाषा, भाव और विचार प्रमुख होते हैं। इसमें निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखें—
  1. बोलते हुए सहज और स्वाभाविक बने रहना चाहिए।
  2. उचित एवं शिष्ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
  3. अभिनय अथवा बनावटीपन उचित नहीं।
  4. बढ़ा-चढ़ाकर बातें करना, अशोभनीय प्रतीत होता है; अतः इस दोष का ध्यान रखें और ऐसा न करें।
  5. संवाद करते समय जिससे बात कर रहे हों, उसके भाव, दशा, मूड और तेवर आदि का विशेष ध्यान रखते हुए बात करें।
  6. संवादवाचक को, जिससे संवाद स्थापित किया हो, उसके अवसर का भी ध्यान रखना आवश्यक है। उदाहरणार्थ – मृत्यु के अवसर पर शोक और संवेदना प्रकट करना ही ठीक है, ऐसे अवसर . पर हँसी-मजाक करना अशोभनीय होता है।

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