UK 9th Hindi

UK Board 9 Class Hindi (मौखिक अभिव्यक्ति) – सुनना

UK Board 9 Class Hindi (मौखिक अभिव्यक्ति) – सुनना

UK Board Solutions for Class 9th Hindi (मौखिक अभिव्यक्ति) – सुनना

‘सुनने’ से आशय
सुनने आशय केवल ध्वनियों को सुनने भर से नहीं है, बल्कि वक्ता के आशय को समझने से भी है। आज बोलने की प्रक्रिया का इतना अधिक विकास हो चुका है कि वक्ता कहता कुछ है और इसका आशय या अर्थ कुछ और ही होता है।
जैसे – यदि किसी मूर्ख व्यक्ति का परिचय इस प्रकार दिया जाए– ‘आप बहुत समझदार हैं’ – तो यह अर्थ प्रकट करता है कि “ये बड़े मूर्ख हैं।”
कोई भी बात सन्दर्भ बदलने पर नवीन अर्थ प्रकट करती है। यदि सुननेवाले की मनोदशा ठीक न हो तो सुनी हुई बात का अर्थ ही बदल जाता है। इसलिए ठीक से सुनने से आशय है-वक्ता द्वारा बोले गए शब्दों को ध्यानपूर्वक सुनना और उनका आशय समझना ।
सुनने की कला का परीक्षण
सुनने की कला का परीक्षण करने के लिए परीक्षक आपको कोई बात, विचार (भाषण या वाद-विवाद ) अथवा कविता सुनाएँगे। साथ ही उसके आधार पर आपसे प्रश्न भी पूछे जाएँगे। आपको इन प्रश्नों का . उत्तर देना होगा। परीक्षक प्रश्न पत्र पहले ही आपको दे देंगे।
उदाहरण-1
नीचे एक प्रश्न-तालिका प्रस्तुत की जा रही है। इसे ध्यान से पढ़िए। आपके सामने परीक्षक एक अनुच्छेद पढ़ेंगे। आपको इन प्रश्नों के उत्तर उस अनुच्छेद में खोजने होंगे। ध्यान रहे, अनुच्छेद पुनः नहीं पढ़ा जाएगा। आपको एक ही बार में अनुच्छेद को सुनकर उत्तर तलाशने हैं।
प्रश्न 1 – स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री कौन थे-
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) डॉ० राजेन्द्रप्रसाद
(ग) डॉ० जाकिर हुसैन
(घ) लालबहादुर शास्त्री ।
उत्तर : (क) जवाहरलाल नेहरू
प्रश्न 2 – ‘ भारत रत्न’ किसे दिया गया था-
(क) महात्मा गांधी
(ख) जवाहरलाल नेहरू
(ग) चन्द्रशेखर आजाद
(घ) महामना मदनमोहन मालवीय ।
उत्तर : (ख) जवाहरलाल नेहरू
प्रश्न 3 – नेहरूजी के व्यक्तित्व की दो विशेषताएँ लिखिए-
उत्तर : 1. अनूठे चिन्तक
2 संवेदनाओं से भरपूर
प्रश्न 4- 15 वर्ष की आयु में नेहरूजी शिक्षा के लिए किस देश में गए थे?
उत्तर : इंग्लैण्ड ।
प्रश्न 5- नेहरूजी के पिता का नाम क्या था ?
उत्तर : श्री मोतीलाल नेहरू ।
प्रश्न 6 – नेहरूजी की पुत्री का नाम क्या था ?
उत्तर : इन्दिरा प्रियदर्शनी ।
प्रश्न 7 – नेहरूजी भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री किस वर्ष चुने गए?
उत्तर : सन् 1947 ई० में।
प्रश्न 8 – नेहरूजी का निधन किस वर्ष हुआ था ?
उत्तर : सन् 1964 ई० में।
● निर्देश – अनुच्छेद सुनिए तथा साथ-साथ उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू केवल एक राजनीतिज्ञ ही नहीं थे, अपितु वे एक बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न महान् पुरुष थे। वे एक अनूठे चिन्तक भी थे। मानवीय संवेदनाओं से भरपूर यह व्यक्तित्व भारत के लोगों का ही नहीं, दुनिया के लोगों का भी अभूतपूर्व प्यार और सम्मान पा सका। भारत ने तो उन्हें राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया, विश्व ने उन्हें एक महान् राजनीतिज्ञ एवं मानवतावादी माना। भारतीय क्षितिज पर एक लम्बे समय तक अपनी आभा फैलाए हुए यह नक्षत्र स्वतन्त्र चिन्तन के क्षेत्र में भी अपनी अमिट छाप छोड़ गया। भारतीय राजनैतिक एवं सामाजिक चिन्तन के इतिहास में उन्होंने अपना अमर स्थान बना लिया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनके चिन्तन की विशिष्टता थी।
देशरत्न जवाहरलाल नेहरू ने 14 नवम्बर, 1889 ई० को पं० मोतीलाल नेहरू के पुत्र के रूप जन्म लिया। 13 वर्ष की आयु में ही वे ‘थियोसोफिकल सोसाइटी’ के सदस्य बन गए। 15 वर्ष की आयु में उन्हें इंग्लैण्ड भेजा गया, जहाँ पर उन्होंने ‘हैरो स्कूल’ एवं ‘ट्रिनिरी कॉलेज कैम्ब्रिज’ में अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी की। वे मेरेडिथ के राजनैतिक चिन्तन से बहुत प्रभावित हुए। भारत लौटकर उन्होंने इलाहाबाद में बैरिस्टर के रूप में अपनी प्रैक्टिस प्रारम्भ कर दी। इसी समय वे ऐनी बेसेण्ट के सम्पर्क में आए और उन्होंने ‘होमरूल लीग’ में भाग लिया। सन् 1916 ई० में लखनऊ काँग्रेस में उनकी मुलाकात गांधीजी से हुई। उसी वर्ष उनका विवाह हो गया और सन् 1917 ई० में उन्हें पुत्री की प्राप्ति हुई जो कि इन्दिरा प्रियदर्शनी के नाम से उनके परिवार को सुशोभित करती रहीं और बाद में लम्बे समय तक भारत की प्रधानमन्त्री रहीं ।
सन् 1918 ई० में उनको ‘होमरूल लीग’ का सेक्रेटरी चुन लिया गया। वह सन् 1921 ई० में असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण जेल गए। सन् 1923 ई० में ‘आल इण्डिया काँग्रेस’ के जनरल सेक्रेटरी चुने गए और बाद में ‘इण्डियन नेशनल काँग्रेस’ के अध्यक्ष भी। उन्हीं की अध्यक्षता में सन् 1929 ई० में काँग्रेस ने पूर्ण स्वतन्त्रता के लक्ष्य सम्बन्धी प्रस्ताव को पारित किया। उसके पश्चात् के अनेक आन्दोलनों में नेहरूजी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे। वह ‘भारतीय’ राष्ट्रीय काँग्रेस’ के कई बार अध्यक्ष चुने गए और जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो वह भारत के प्रधानमन्त्री चुने गए और 27 मई, 1964 ई० को मृत्यु के क्रूर हाथों द्वारा उन्हें भारत के लोगों से छीने जाने तक वे प्रधानमन्त्री के पद पर बने रहकर राष्ट्र की सेवा करते रहे।
उदाहरण-2
प्रश्न 1– गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की मुलाकात गांधीजी किस नगर में हुई—
(क) भोपाल
(ख) कलकत्ता
(ग) मद्रास
(घ) बम्बई ।
उत्तर : (ख) कलकत्ता
प्रश्न 2 – सर्वप्रथम किसने गांधीजी को महात्मा कहा-
(क) श्रीमती ऐनी बेसेण्ट
(ख) गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ग) बंकिमचन्द्र चटर्जी
(घ) लोकमान्य तिलक ।
उत्तर : (ख) गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर
प्रश्न 3 – गांधीजी कलकत्ता में रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिले थे। यह मुलाकात किसने कराई थी ?
उत्तर : चार्ल्स फ्रीअर एण्ड्रज ।
प्रश्न 4- गांधीजी किससे मिलने को आतुर थे?
उत्तर : स्वामी विवेकानन्द ।
प्रश्न 5 – गांधीजी ने किस जेल में आमरण उपवास किया था?
उत्तर : पूना की साबरमती जेल।
प्रश्न 6 – अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुत्व संघ के समक्ष किसने भाषण दिया था ?
उत्तर : गांधीजी ने।
प्रश्न 7– सन् 1920 से 1947 ई० तक का युग क्या कहलाता है? 
उत्तर : गांधी युग ।
प्रश्न 8 – गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन किस वर्ष प्रारम्भ किया? 
उत्तर : सन् 1921 ई० में।
● निर्देश – अनुच्छेद सुनिए तथा साथ-साथ उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
गांधीजी जब कलकत्ता में थे तो उनकी मुलाकात गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से कराई गई। आश्चर्य तो यह रहा कि इन दोनों के मिलन के सूत्रधार थे— अंग्रेज चार्ल्स फ्रीअर एण्डूज। इनमें एक था फकीर – संन्यासी तो दूसरा था चिन्तक – कवि, पर दोनों में आन्तरिक साम्य था। गुरुदेव ने ही गांधीजी में महात्मा के दर्शन किए और उन्हें सर्वप्रथम ‘महात्मा’ कहकर सम्बोधित किया। गांधीजी स्वामी विवेकानन्द से भी मिलने को आतुर थे, पर दुर्भाग्य से स्वामीजी अस्वस्थ थे। अतः भेंट सम्भव न हो सकी। उल्लेखनीय है कि पूना की साबरमती जेल में गांधीजी के आमरण उपवास को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ने फलों का रस पिलाकर तोड़ते हुए ‘गीतांजलि’ का प्रिय प्रार्थना – गीत सुनाया था-
‘जीवन जखन सुकाए जाए, करुणा धाराए एशो । ‘
जनवरी 1928 ई० में गांधीजी ने ‘अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुत्व संघ’ के सम्मुख भाषण देते हुए कहा था- ‘लम्बे अध्ययन और अनुभव के उपरान्त मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि-
सभी धर्म सच्चे हैं,
सबं धर्मों में कोई-न-कोई खराबी है और सभी धर्म मुझे उतने ही प्रिय हैं, जितना मेरा हिन्दू धर्म – ‘
सर्वप्रथम सन् 1919 ई० में भारत लौटकर गांधी ने भारतीय ” राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक दशाओं का अध्ययन करने के साथ चम्पारण व खेड़ा के कृषकों और अहमदाबाद के मिल मजदूरों के अधिकारों की प्राप्ति के लिए सत्याग्रह का प्रयोग किया। सन् 1920 से 1947 ई० तक का समय राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम का ‘गांधी युग’ कहा जाता है। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर भारत का घटनाक्रम इतनी तेजी से घूमा कि राष्ट्रीय संग्राम का नेतृत्व गांधीजी के हाथों में आकर से वास्तविक रूप से जन-आन्दोलन हो गया।
अंग्रेजों के विश्वासघात ने गांधीजी को सन् 1921 ई० में असहयोग आन्दोलन छेड़ने को विवश कर दिया। इस आन्दोलन से देश की समस्त जनता में अपूर्व जागृति उत्पन्न हुई। चौरी-चौरा आदि स्थानों पर हिंसात्मक घटनाओं को देखकर गांधीजी ने आन्दोलन स्थगित कर दिया। सन् 1930 ई० में गांधी ने पुन: सविनय अवज्ञा आन्दोलन का व्यापक प्रदर्शन कर दिखाया। अंग्रेजी हुकूमत ने सख्ती से इस आन्दोलन का दमन किया। स्वतन्त्रता की अग्नि और भड़क उठी। 26 जनवरी, 1930 ई० को हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों ने पूर्ण स्वराज की शपथ ली थी; अतः 26 जनवरी को ही स्वाधीन भारत का संविधान लागू कर इस दिन को गणतन्त्र दिवस की गरिमा प्रदान की गई है।
उदाहरण-3
प्रश्न 1 – जलियाँवाला बाग नरसंहार का नायक कौन था—
(क) जनरल डायर
(ख) हण्टर
(ग) सर माइकेल नेल्सन
(घ) उपर्युक्त कोई नहीं ।
उत्तर : (क) जनरल डायर
प्रश्न 2 – हण्टर कमीशन ने कितने राउण्ड गोली चलना बताया-
(क) 1,400 राउण्ड
(ख) 1,500 राउण्ड
(ग) 1,650 राउण्ड
(घ) 1,750 राउण्ड ।
उत्तर : (ग) 1,650 राउण्ड
प्रश्न 3 – हण्टर कमीशन के अनुसार जलियाँवाला बाग काण्ड में कितने लोग मारे गए ?
उत्तर : पन्द्रह – सौ सोलह व्यक्ति ।
प्रश्न 4- डायर कितने गोरखा जवानों को लेकर गया?
उत्तर : 25 गोरखा जवान।
प्रश्न 5 – जनरल डायर ने किसके सामने शेखी बघारी थी ?
उत्तर : पंजाब के गवर्नर जनरल के सामने।
प्रश्न 6 – क्रान्तिकारी गीत के बोल क्या थे?
उत्तर : ‘पगड़ी सँभाल जट्टा’ ।
● निर्देश – अनुच्छेद सुनिए तथा साथ-साथ उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
इस नर संहार का नायक जनरल डायर था। उसने हण्टर आयोग को बताया कि उसने यह फैसला तब लिया, जब वह अपनी मोटरकार से वहाँ पहुँचा। उसने यह इरादा किया कि वहाँ उपस्थित सभी लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाए। जाँच के बाद यह भी ज्ञात हुआ कि उसने वहाँ से लोगों को हट जाने की चेतावनी देना भी आवश्यक नहीं समझा। उसके पागलपन की सीमा यहाँ तक बढ़ गई थी कि उसने के डिप्टी कमिश्नर से सलाह न ली तथा न ही डिप्टी कमिश्नर मौके पर उपस्थित था। जनरल डायर ने गवाही के अन्त में कहा कि वह समझता था कि जलियाँवाला बाग की गोलीबारी उसका कर्त्तव्य था…. एक भीषण कर्त्तव्य। वह लोगों को एक सबक सिखाना चाहता था।
हण्टर कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार सोलह सौ पचास राउण्ड गोलियाँ चलाई गईं और पन्द्रह सौ सोलह व्यक्ति हताहत हुए। रिपोर्ट में कहा गया कि जलियाँवाला बाग जमीन का एक चौकोर है, टुकड़ा जिसमें मकान बनाने का सामान और मलबा पड़ा था। इसके चारों ओर दीवारें हैं और मकान हैं। इससे बाहर आने-जाने के रास्ते बहुत कम हैं। जिस तरफ से जनरल डायर घुसा वहाँ ऊँचाई थी। बाग के दूसरे किनारे पर भारी भीड़ जमा थी और जहाँ जनरल डायर ने अपने दस्ते खड़े किए थे, वहाँ से करीब डेढ़ सौ गज की दूरी पर बने एक मंच से एक व्यक्ति भाषण दे रहा था। डायर 25 गोरखा जवान, जो नेपाली थे और 25 बलूची जवानों को लेकर गया, जो राइफलों से लैस थे। 40 खुकरी लिए गोरखे और दो बख्तरबन्द गाड़ियाँ भी उसके साथ थीं।
जनरल डायर के इस जघन्य कृत्य को लैफ्टिनेण्ट गवर्नर सर माइकेल ओ डायर ने सही ठहराया। उसने कहा कि उसका कदम ठीक था, लैफ्टिनेण्ट गवर्नर इसकी पुष्टि करता है। लैफ्टिनेण्ट गवर्नर सर माइकेल ओ’ डायर का यह कथन था कि यह गोलीबारी सैनिक दृष्टि से हौसला बढ़ाने के लिए की गई थी। जनरल डायर ने पंजाब के गवर्नर के सामने यह शेखी बघारी थी कि उसने पंजाब को बचा लिया, किन्तु आगे चलकर यह सिद्ध हो गया कि वह अपने देशवासियों के लिए भारत को नहीं बचा पाया ।
दमन-चक्र बढ़ता गया और क्रान्तिकारियों ने उसका सामना करने सँभाल के लिए सिर पर कफन बाँध लिया। क्रान्तिकारी गीत ‘पगड़ी जट्टा’ गली-गली गूँजने लगा। इसके रचयिता बाँकेदयाल और मौलवी अब्दुल हक ने सबके दिलों पर अमिट छाप लगा दी। इस गीत को पंजाब सरकार ने प्रतिबन्धित करने का विचार किया। प्रत्येक बैसाखीवाले दिन जलियाँवाला बाग में सभाएँ होने लगीं। जहाँ शपथ ली जाती कि हम भारत को आजाद कराएँगे, न सिर्फ अंग्रेजों की दासता से, बल्कि प्रत्येक दासता से । ऊधम सिंह ने इसी दिन शपथ ली थी और प्रत्येक वर्ष वे इसको दोहराते थे।

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