UK Board 9 Class Hindi Chapter 5 – सूक्ति सुधा (संस्कृत विनोदिनी)
UK Board 9 Class Hindi Chapter 5 – सूक्ति सुधा (संस्कृत विनोदिनी)
UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 5 – सूक्ति सुधा (संस्कृत विनोदिनी)
सूक्ति सुधा (सूक्तिरूपी अमृत)
पाठ का सार
संसार में सज्जनों का साथ पुण्यों से मिलता है। भूमि हमारी माता और पिता है। गुणवान् संसार में अत्यन्त दुर्लभ और उँगली पर गिनने भर को हैं । सज्जन ग्रहणीय बातों को ही अपने जीवन में स्वीकार करते हैं। सुन्दर लोगों के लिए सभी वस्तुएँ आभूषण होती हैं । दुःख के बिना सुख का अनुभव नहीं होता है। अखाद्यों का सेवन करनेवालों का रोग वैद्यों के लिए भी असाध्य होता है। हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो । स्वच्छ और निर्मल मन में ही सरस्वती निवास करती है। सत्य पर सबकुछ टिका हुआ है। वृक्ष मनुष्य को पुत्र के समान परलोक में भी तार देते हैं। सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है।
सूक्तियों का भावानुवाद एवं भावार्थ
निर्देश – निम्नलिखित सूक्तियों की व्याख्या कीजिए-
(1) सतां संङ्गो लोके कथमपि हि पुण्येन भवति ।
– नीतिशतकम् |
शब्दार्थाः – सताम् = सज्जनों का; सङ्गः = साथ, संगति; लोके = संसार में; कथमपि = हर प्रकार से, सचमुच; हि = निश्चय ही; पुण्येन = पुण्य द्वारा।
भावार्थ : – संसारे सज्जनानां सङ्गतिः कथमपि सरलतया न मिलति, अपितु पूर्वजन्मनां पुण्येन मिलति । अतः अस्माभिः सदा सज्जनानां । सङ्गतिः एव करणीया ।
हिन्दी- भावानुवादः – संसार में सज्जनों की संगति सरलता से नहीं मिलती, बल्कि पहले के जन्मों के पुण्य से प्राप्त होती है। इसलिए हमें सदा सज्जनों की संगति ही करनी चाहिए।
व्याख्या–संसार में सज्जनों का अभाव है, इसलिए वे बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। ये लोग बड़े भाग्यशाली होते हैं, जिन्हें सज्जनों का साथ मिलता है और उनके जीवन को एक नई दिशा प्राप्त होती है। वास्तव में यह व्यक्ति के पुण्यों का ही प्रभाव होता है कि उसे सज्जनों का साथ मिलता है।
(2) भूमिर्मातादितिर्नो जनित्रम् ।
– अथर्ववेदः ( 6.120.2)
शब्दार्थाः – अदितिः = पृथ्वी; नः = हमारी; जनित्रम् = पिता ।
भावार्थः–इयम् अखण्डा भूमिः अस्माकं माता जनयित्री अस्ति । मातुः सेवा यथा अस्माकं कर्त्तव्यम् अस्ति तथैव पृथिव्याः सेवा अपि अस्माकं कर्त्तव्यम् अस्ति अर्थात् वयं भूमि- जल-वायूनां शुद्धतां रक्षेम। एतां भूमिं मातृवत् विचिन्त्य अस्माभिः एतस्याः उपयोगः करणीयः ।
हिन्दी – भावानुवादः – यह अखण्ड पृथ्वी हमारी माता और पिता है। हमें जिस प्रकार माता की सेवा करनी चाहिए, उसी प्रकार पृथ्वी की सेवा भी करनी चाहिए अर्थात् हमें भूमि, जल और वायु की शुद्धता की रक्षा करनी चाहिए। इस धरती को माता के समान मानते हुए इसका उपयोग करना चाहिए।
व्याख्या – यह पृथ्वी हमारी माता और पिता है; क्योंकि इस धरती से उत्पन्न होनेवाले अन्नों को खाकर ही हम बड़े होते हैं, फिर हम अपनी सन्तानों को जन्म देते हैं। इस प्रकार हम एक प्रकार से पृथ्वी से ही जन्म लेते हैं। पिता हमारे भरण-पोषण की व्यवस्था करके हमारी रक्षा करता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी सन्तानों के भरण-पोषण का ध्यान रखती हुई उनके लिए भरपूर अन्न-जल तथा प्राणवायु की व्यवस्था करती है । इसलिए हम सभी का कर्त्तव्य है कि हमें भी इस पृथ्वी के अन्न-जल – वायु आदि की सब प्रकार से रक्षा करनी चाहिए।
(3) गुणिनो दुर्लभा भूमौ गणनीया सुसंसदि ।
– सामवतम् अंक-1
शब्दार्थाः – गुणिनः = गुणवान्; दुर्लभाः = कठिनाई से मिलनेवाले; भूमौ = भूमि पर; गणनीया = गणना करने योग्य, गिनती के योग्य; सुसंसदि = अच्छी सभा में।
भावार्थ: – गुणिनः जनाः पृथिव्यां दुर्लभाः सन्ति, संसदि (सभाया) अङ्गुलिषु गणनीयाः च सन्ति । अतः गुणिनां जनानां समादरः करणीयः । अस्माभिः अपि सदा गुणार्जनस्य प्रयासः करणीयः ।
हिन्दी – भावानुवादः – गुणी लोग पृथ्वी पर दुर्लभ हैं और अच्छी सभा अंगुलि पर गिनने भर के लिए अर्थात् बहुत थोड़े हैं। इसलिए गुणी जनों का सदा आदर करना चाहिए और हमें भी सदा गुणार्जन का प्रयास करना चाहिए। में
व्याख्या – संसार में गुणवान् लोग बड़ी कठिनाई से मिलते हैं; क्योंकि संसार में उनकी संख्या गिननेभर के लिए अत्यल्प है। अच्छी सभाओं में भी गुणियों का अभाव देखने को मिलता है। इसलिए हम सभी को गुणवानों का आदर करना चाहिए, साथ ही गुणों को प्राप्त करके स्वयं भी गुणवान् बनने का प्रयत्न करना चाहिए, इसी से हमारा और संसार का कल्याण हो सकता है।
(4) अङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति ।
-रूपकपुष्पमाला
शब्दार्थाः – अङ्गीकृतम् = स्वीकार किए गए को; सुकृतिनः = सज्जन; परिपालयन्ति = भली-भाँति पालन करते हैं।
भावार्थ:- सज्जनाः यद् अङ्गीकृतं तदेव परिपालयन्ति । तेषां वचनं मृषा न भवति । सूक्ति: प्रसिद्धा अस्ति यद् रामो द्विर्नाऽभिभाषते अर्थात् रामः कदापि वचनद्वयं न वदति, सः यत् वदति तस्य पालनं प्राणपणेन करोति । तथैव अस्माभिः सदा सत्यम् एव वक्तव्यम् ।
हिन्दी – भावानुवादः – सज्जन जो स्वीकार करते हैं उसी का पालन करते हैं। उनका वचन कभी झूठा नहीं होता। यह सूक्ति प्रसिद्ध है कि राम कभी दो अर्थोवाली बात नहीं बोलते, जो बोलते हैं उसका प्राणपण से पालन करते हैं।
रघुपति रीति सदा चलि आई। प्राण जाहिं पर वचन न जाई ||
अतः हमें भी सदा सत्य वचन ही बोलने चाहिए।
व्याख्या – सज्जन जिस बात को स्वीकार करते हैं कि वह उचित है, वे उसका सब प्रकार से पालन करते हैं, भले ही उसके लिए उन्हें अपने प्राण ही क्यों न गँवाने पड़ें। राम के विषय में इसी प्रकार की सूक्ति प्रसिद्ध ‘है कि राम कभी दो प्रकार की बातें नहीं कहते, वह जो कुछ अपने मुख से कहते हैं, उसी के अनुरूप आचरण करते हैं। उनका वचन कभी झूठा नहीं होता । इस विषय में तुलसीदास ने भी कहा है-
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाहिं पर वचन न जाई ।।
इसलिए हमें जब भी बोलना चाहिए, सोच-समझकर बोलना चाहिए । हमारा कोई भी वचन व्यर्थ नहीं जाना चाहिए, यही सच्चे मनुष्य होने की निशानी है।
(5) किमिव ही मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।
– अभिज्ञानशाकुन्तलम्
शब्दार्था: – किमिव = (किम् + इव) कौन-सी; मधुराणाम् = सुन्दरों की; मण्डनम् = शोभा, आभूषण; आकृतीनाम् = आकृतिवालों का।
भावार्थ:- मधुराणाम् आकृतीनां सर्वं वस्त्रं सर्वम् आभूषणं च मण्डनम् अर्थात् शोभादायकं भवन्ति । शरीरं यदि सुन्दरम् अस्ति तर्हि सर्वं शोभते, किन्तु अशोभने शरीरे किमपि न शोभते । अर्थात् कृत्रिमसौन्दर्यस्य अपेक्षा प्राकृतिक सौन्दर्यम् एव अधिकं महत्त्वपूर्ण भवति; अतः अस्माकं दृष्टि कृत्रिमसौन्दर्यस्य अपेक्षा प्राकृतिक सौन्दर्यं प्रति अधिका भवेत् । तस्यैव रक्षणाय वर्धनाय च प्रयास: प्रमुखतया करणीयाः ।
हिन्दी-भावानुवादः—सुन्दर आकारवालों के लिए सभी वस्त्र और सभी आभूषण शोभा बढ़ानेवाले होते हैं। शरीर यदि सुन्दर है तो उस पर सभी शोभा देता है, किन्तु शरीर के असुन्दर होने पर कुछ भी शोभा नहीं देता अर्थात् कृत्रिम सौन्दर्य की अपेक्षा प्राकृतिक सौन्दर्य · ही अधिक महत्त्वपूर्ण होता है; इसलिए हमारी दृष्टि कृत्रिम सौन्दर्य की अपेक्षा प्राकृतिक सौन्दर्य की ओर अधिक होनी चाहिए। उसी के रक्षण और वर्धन के लिए हमें प्रमुख रूप से प्रयास करना चाहिए ।
व्याख्या–सुन्दर व्यक्तियों के लिए किसी बाह्य आभूषण की आवश्यकता नहीं होती; वे तो जिस किसी भी वस्त्र अथवा आभूषण को धारण कर लें, वही उनकी शोभा बढ़ाने लगते हैं। आशय यह है कि सौन्दर्य वस्त्राभूषणों में नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के शरीर में होता है। यही कारण है कि अरूप (कुरूप) व्यक्ति को कोई भी वस्त्राभूषण सुन्दर नहीं बना सकता है। इसलिए हमें प्रकृति प्रदत्त सौन्दर्य को ही महत्त्व देना चाहिए। बाहरी सौन्दर्य उपकरण तो सुन्दरता के दिखावामात्र हैं।
(6) दुःखं विना नैव सुखस्य बोधः ।
– जीवनमुक्तकम्
शब्दार्था: – नैव = ( न + एव) नहीं ही; सुखस्य = सुख का; बोध: = ज्ञान।
भावार्थ:- दुःखं विना सुखस्य अनुभूतिः न भवति । सुखस्य महत्त्वम् अपि जनाः तदैव जानन्ति यदा ते स्वयं दुःखम् अनुभूय सुखं प्राप्नुवन्ति । अतः भाग्येन प्रकृत्या मातापितृभ्यां वा प्राप्तसुखस्य महत्त्वं ज्ञात्वा एव तस्य उपयोगः उपभोगः करणीयः ।
हिन्दी – भावानुवादः – दुःख के बिना सुख का अनुभव नहीं होता है। सुख के महत्त्व को मनुष्य तभी जानते हैं, जब वे स्वयं दुःख का अनुभव करके सुख प्राप्त करते हैं। इसलिए भाग्य, प्रकृति या माता-पिता के द्वारा प्राप्त सुख के महत्त्व को जानकर ही हमें उसका उपयोग अथवा उपभोग करना चाहिए।
व्याख्या – दुःख के बिना सुख का अनुभव नहीं हो सकता; क्योंकि जब तक व्यक्ति दुःख का अनुभव नहीं कर लेता, उसे तब तक यह पता ही नहीं चलता है कि सुख क्या होता है। यह उसी प्रकार से है, जैसे सर्दी का अनुभव किए बिना व्यक्ति को गर्मी का महत्त्व ही पता नहीं चलेगा। वास्तव में वही लोग सुख के महत्त्व को भली-भाँति समझते हैं, जिन्होंने जीवन में दुःख उठाए हैं। इसलिए व्यक्ति को प्रकृति, भाग्य अथवा माता-पिता से प्राप्त सुखों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और न ही उनका किसी प्रकार से दुरुपयोग करना चाहिए। जो लोग इन सुखों की उपेक्षा करते हैं, उन्हें जीवन में पछताना पड़ता है।
(7) अपथ्यसेवी भिषजामसाध्यः ।
— जीवनमुक्तकम्
शब्दार्थः – अपथ्यसेवी = अखाद्य वस्तुओं को खानेवाला; भिषजाम् = वैद्य अथवा चिकित्सक को; असाध्यः = चिकित्सा (उपचार) करने योग्य।
भावार्थ:- यः जनः अखाद्यं खादति, अपेयं पिबति तस्य वैद्यः अपि चिकित्सां कर्तुं न शक्नोति । अतः आहारे विहारे सदैव अवधानं देयम् । केवलं जिह्वायाः सुखाय यत्किञ्चिदपि न खादनीयम्, अपितु शरीररक्षणाय आवश्यकं ज्ञात्वा एव खाद्यवस्तूनाम् उपभोगः करणीयः ।
हिन्दी – भावानुवादः – जो मनुष्य अखाद्य वस्तुओं को खाता है और अपेय को पीता है, उसकी चिकित्सा वैद्य भी नहीं कर सकता। इसलिए हमें खाने – घूमने (व्यवहार) में सदैव ध्यान रखना चाहिए। केवल जिह्वा के सुख . के लिए ही कुछ भी नहीं खाना चाहिए, अपितु शरीर की रक्षा के लिए आवश्यक भोजन का विचारकर ही खाद्य वस्तुओं का उपभोग करना चाहिए।
व्याख्या – संसार में जो व्यक्ति खाद्य और अखाद्य का ध्यान रखे बिना जीभ के स्वाद के लिए कुछ भी खाते रहते हैं अर्थात् जिनका अपनी जीभ पर कोई नियन्त्रण नहीं होता, ऐसे लोगों के बीमार पड़ जाने पर उनका उपचार कोई भी चिकित्सक नहीं कर पाता है; क्योंकि चिकित्सक जो औषधि उसे देते हैं, अखाद्य वस्तुएँ उसके प्रभाव को शरीर पर पड़ने ही नहीं देती हैं और व्यक्ति का रोग असाध्य (लाइलाज ) हो जाता है। इसीलिए तो कहा भी गया है कि इलाज से परहेज भला। अतः स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति न केवल खाने-पीने की वस्तुओं का ध्यान रखे, वरन् उन कार्यों को भी नहीं करना चाहिए, जो उसके शरीर के लिए ठीक नहीं हैं।
(8) तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।
—यजुर्वेदः (34.1)
शब्दार्थाः – तन्मे = (तत् + मे) वह मेरा; शिवसङ्कल्पम् = शुभ संकल्पोंवाला; अस्तु = हो ।
भावार्थ:- मम तत् मनः शुभसङ्कल्पयुक्तं भवतु । अस्माकं मनसि दुर्विचाराः न आगच्छेयुः । शुभविचार: दुर्विचार: या पूर्वं मनसि एव उत्पन्नः भवति, तदनन्तरं सः क्रियायां परिणतः भवति । अतः चिन्तनस्य शुद्धिः परमावश्यकी अस्ति।
हिन्दी – भावानुवादः – मेरा वह मन शुभ संकल्पोंवाला हो। हमारे ही उत्पन्न होता है, उसके बाद वह क्रियारूप में परिणत होता है। इसलिए मन में दुर्विचार नहीं आने चाहिए। अच्छा या बुरा विचार सर्वप्रथम मन में विचारों की शुद्धि अत्यन्त आवश्यक है।
व्याख्या – व्यक्ति और संसार के कल्याण के लिए यह आवश्यक है कि सभी व्यक्तियों के मन में शुभ संकल्प उत्पन्न हों। इसीलिए यहाँ कवि कामना करता है कि मेरा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो। इसका कारण यह है कि अच्छे अथवा बुरे विचार सबसे पहले व्यक्ति के मन में ही आते हैं, उसके बाद ही वह विचार क्रियारूप में परिणत होता है। इसलिए हमें अपने विचारों में सदैव शुद्धता रखनी चाहिए। कुत्सित विचार न केवल उस व्यक्ति का अहित करते हैं, वरन् उसके सम्पर्क में आनेवाले दूसरे व्यक्तियों का अहित भी उसके द्वारा किया जाना निश्चित होता है।
(9) प्रवर्तते हि विमले हृदि स्वच्छे सरस्वती ।
— रामचरितम् (28.8)
शब्दार्था: – प्रवर्तते = प्रवृत्त होती है, निवास करती है; विमले = पवित्र में; हृदि = हृदय में; स्वच्छे = स्वच्छ में।
भावार्थ:- पवित्रे दोषरहिते हृदये एव सरस्वत्याः वासः भवति । वयं सर्वे सरस्वत्याः समुपासकाः स्मः; अतः अस्माकं हृदयानि अपि दूषणरहितानि भवेयुः तदैव ज्ञानं प्राप्यते ।
हिन्दी – भावानुवादः – पवित्र और दोषरहित हृदय में ही सरस्वती का निवास होता है। हम सब सरस्वती के सच्चे सेवक हैं; अतः हमारे हृदय भी बुराइयों से रहित होने चाहिए, तभी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
व्याख्या – पवित्र और निर्मल हृदय में ही सरस्वती का निवास होता है । छल-कपट से पूर्ण हृदयों में सरस्वती निवास नहीं करती। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि हम ज्ञानवान् बनें तो इसके लिए हमें सबसे पहले अपने हृदयों को पवित्र करना होगा। इससे हम ज्ञानवान् होने के साथ ही बुराइयों दूर होकर • एक अच्छे नागरिक भी बन सकेंगे।.
(10) सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
– तैत्तिरीय आरण्यकम् (10.63)
शब्दार्थाः— सत्ये = सत्य में, सच्चाई में; प्रतिष्ठितम् = स्थित है, प्रतिष्ठित है।
भावार्थ:- संसारे सत्ये एव सर्वं स्थितम् अस्ति । सत्यं साक्षात् ईश्वरस्य एव रूपम् अस्ति । असत्यात् कश्चिद् किमपि प्राप्नोति चेत् तत् नैव स्थायि नैव आत्मिकं सन्तोषं जनयति । अतः सत्यस्य पालनम् अस्माकं परमो धर्मः अस्ति ।
हिन्दी – भावानुवादः – संसार में सत्य पर ही सबकुछ टिका है। सत्य साक्षात् ईश्वर का रूप है। असत्य के द्वारा यदि कोई कुछ भी पा लेता है तो वह न तो स्थायी होता है और न ही आत्मिक सन्तोष प्रदान करता है। इसलिए सत्य का पालन करना ही हमारा परम धर्म है।
व्याख्या – संसार में एकमात्र सत्य ही शाश्वत है। इसी पर सारा संसार टिका है। आशय यह है कि सत्य ईश्वर का रूप है और सारे संसार को ईश्वर ही संचालित करता है। यदि सर्वत्र सत्य विद्यमान होगा तो लोगों में ईश्वर के प्रति आस्था और श्रद्धा में वृद्धि होगी, जिसके परिणामस्वरूप सर्वत्र शान्ति और सन्तोष का साम्राज्य होगा। इसलिए शान्ति और सन्तोष की कामना रखनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सत्य का आचरण करते हुए संसार में उसकी प्रतिष्ठा करनी चाहिए।
(11) मानवं पुत्रवद् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च ।
– महाभारतम् (अनु० 58.30 )
शब्दार्थाः – पुत्रवद् = पुत्र के समान; तारयन्ति = तार देते हैं, उद्धार करते हैं; परत्र = परलोक और इहलोक ।
भावार्थ:- वृक्षा पुत्रवत् मानवम् इहलोके परलोके च तारयन्ति इति । कुपुत्राः कदाचित् पुत्रधर्मस्य पालनं न कुर्युः परन्तु मानवेन आरोपितः वृक्षः मानवाय इहलोके परलोके च सुखं ददाति । अतः मानवेन सदा वृक्षाणाम् आरोपणं तेषां पालनं, पोषणं रक्षणं च करणीयम् । अस्माकं जीवनस्य कृते एतेषां वृक्षाणाम् अनिवार्यता सर्वे जानन्ति एव । एते प्राणवायुं त्यजन्ति । आरेपितः वृक्षः प्राणवायुं, फलं, पुष्पं, काष्ठं छायां च प्रदाय मानवस्य पुण्याय भवति ।
हिन्दी – भावानुवादः – वृक्ष पुत्र के समान मनुष्य को इस लोक और परलोक में तार देते हैं। कभी-कभी कुपुत्र पुत्रधर्म का पालन नहीं करते हैं, किन्तु मनुष्य के द्वारा आरोपित वृक्ष मनुष्य के लिए इस लोक और परलोक दोनों में सुख देता है। इसलिए मनुष्य को वृक्षारोपण करके उनका पालन-पोषण और रक्षण करना चाहिए। हमारे जीवन के लिए इन वृक्षों की अनिवार्यता सभी जानते हैं, ये प्राणवायु छोड़ते हैं। आरोपित किया हुआ वृक्ष प्राणवायु, फल, फूल, काष्ठ और छाया प्रदान करके मनुष्य के लिए पुण्य प्रदान करता है।
व्याख्या – वृक्ष मनुष्य का इस लोक और परलोक दोनों ही स्थानों पर उद्धार करते हैं। इस लोक में तो मनुष्य द्वारा लगाया गया वृक्ष उसके लिए फल – फूल; छाया आदि प्रदान करके उसे सुख देता है। इसके अतिरिक्त इन वस्तुओं का उपभोग जब दूसरे व्यक्ति करते हैं तो उनके आशीर्वाद और सवचनों से उस व्यक्ति को पुण्य लाभ होता है, जिसने वह वृक्ष लगाया होता है। इस प्रकार से पुण्य मृत्युपरान्त परलोक में उसका उद्धार करने में सहायक होते हैं। इन वृक्षों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि व्यक्ति का पुत्र भले ही उसकी उपेक्षा कर ले, किन्तु ये वृक्ष सदैव उसकी सेवा और उपकार करते ही रहते हैं। इस रूप में वृक्ष पुत्र से भी बढ़कर होते हैं। इसलिए हमें अपने जीवन में न केवल वृक्ष लगाने चाहिए, वरन् उनका पालन-पोषण और रक्षा भी करनी चाहिए; क्योंकि जीवन में इनकी उपयोगिता और अनिवार्यता तो सर्वत्र प्रमाणित है ही। सभी लोग यह जानते ही हैं कि वृक्ष मनुष्य को फल-फूल, लकड़ी, छाया और प्राणवायु प्रदान करके उसका अमूल्य उपकार करते हैं। इसलिए सभी के द्वारा वृक्षारोपण अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।
(12) एकंलक्ष्याः समे धर्माः ।
– धर्मसागर : ( 17.30)
शब्दार्था:- एकलक्ष्याः = एक लक्ष्य (उद्देश्य) वाले का; समे = समान; धर्माः = (सभी) धर्म।
भावार्थ:- सर्वेषां धर्माणाम् एकम् एव लक्ष्यम् अस्ति । सर्वाणि एव मतानि एकम् एव ईश्वरं प्रति नयन्ति । यथा कयाचित् नौकया गत्वा जन: नदीपारं गन्तुं शक्नोति, तथैव केनापि मतेन ईश्वरप्राप्तिः सम्भवा । अतः मम धर्मः श्रेष्ठ अन्यस्य हीनः इति भावः कदापि न भवेत् अपितु सर्वाणि मतानि प्रति समादर भावः अस्माकं परमं कर्त्तव्यम् अस्ति ।
हिन्दी – भावानुवादः – सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है। सभी मत एक ही ईश्वर के पास ले जाते हैं। जैसे किसी भी नौका से व्यक्ति नदी पार जा सकता है, उसी प्रकार किसी भी मत से ईश्वर-प्राप्ति सम्भव है। इसलिए मेरा धर्म श्रेष्ठ है, दूसरे का धर्म हीन है, ऐसा भाव कभी भी नहीं होना चाहिए; अपितु सभी मतों के प्रति समान रूप से आदर का भाव हमारा परम कर्त्तव्य है।
व्याख्या – सभी धर्म एकसमान लक्ष्यवाले हैं। अर्थात् ईश्वर एक है और उसको किसी भी धर्म का आचरण करके प्राप्त किया जा सकता है। धर्म मनुष्य की ईश्वर-प्राप्ति का साधनमात्र है। जिस प्रकार व्यक्ति नदी पार करने के लिए किसी भी नौका का प्रयोग कर सकता है, उसी प्रकार किसी एक धर्म का अनुसरण करके ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। इसलिए यह कहना कि मेरा धर्म श्रेष्ठ है और दूसरे का धर्म तुच्छ है, किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। हमारे मन में किसी भी धर्म के प्रति असम्मान अथवा उपेक्षा की भावना नहीं होनी चाहिए; क्योंकि जब सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है और वे उस लक्ष्य की प्राप्ति मनुष्य को कराने में सक्षम भी हैं, इसलिए सभी एकसमान आदर के अधिकारी हैं; अतः हम सभी को प्रत्येक धर्म का सम्मान करना चाहिए । यही हमारा परम कर्त्तव्य भी होना चाहिए ।
सम्पूर्णपाठाधारिताः अभ्यासप्रश्नाः
(1) एकपदेन उत्तरत-
(क) सतां सङ्गः केन भवति ?
उत्तरम् – पुण्येन ।
(ख) के दुर्लभाः भूमौ?
उत्तरम् — गुणिनः ।
(ग) भिषजामसाध्यः कः ?
उत्तर — अपथ्यसेवी ।
(घ) कुत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ?
उत्तर— सत्ये ।
(2) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) पुण्येन किं भवति ?
उत्तरम् – पुण्येन लोके सतां सङ्गः भवति ।
(ख) सुकृतिनः किं परिपालयन्ति ?
उत्तरम् – सुकृतिनः अङ्गीकृतं परिपालयन्ति ।
(ग) सुखस्य बोधः कं विना न भवति ?
उत्तरम् – सुखस्य बोध: दुःखं विना न भवति ।
(घ) सरस्वती कुत्र प्रवर्तते?
उत्तरम् — सरस्वती विमले स्वच्छे च हृदि प्रवर्तते।
(ङ) मानवं के तारयन्ति?
उत्तरम् — मानवं वृक्षाः तारयन्ति ।
(3) निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘भूमिर्मातादितिर्नो’ अत्र सन्धिच्छेिदं कुरुत |
(ख) ‘पथ्य’ अस्य विलोमपदं किम् अत्र ?
(ग) ‘सुसंसदि’ अत्र प्रयुक्ता विभक्तिः का?
(घ) ‘आकृतीनाम्’ अस्य विशेषणं किम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(ङ) ‘प्रवर्तते’ अस्य कर्तृपदं किम् अत्र ?
(च) ‘दुर्लभाः’ अत्र प्रयुक्तः उपसर्गः कः ?
उत्तरम् —
(क) भूमिः + माता + अदितिः + नः
(ख) अपथ्य,
(ग) सप्तमी,
(घ) मधुराणाम्
(ङ) सरस्वती
(च) दुर्|
(4) अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत-
(क) केषां सङ्गः लोके पुण्येन भवति ?
उत्तरम्— सताम्।
(ख) भूमौ के दुर्लभाः ?
उत्तरम् — गुणिनः।
(ग) अङ्गुलिगणनीयाः के भवन्ति ?
उत्तरम्— गुणिनः।
(घ) सुकृतिनः किं परिपालयन्ति?
उत्तरम्— अङ्गीकृतम्।
(ङ) किं विना सुखस्य बोधः न भवति ?
उत्तरम् – दुःखम् ।
(च) कः भिषजाम् असाध्य : ?
उत्तरम्— अपथ्यसेवी ।
(छ) मम मनः कथम् अस्तु ?
उत्तरम्— शिवसङ्कल्पम्।
(ज) कस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ?
उत्तरम्— सत्ये।
(झ) समे धर्माः कीदृशा: ?
उत्तरम् — एकलक्ष्याः ।
(5) कोष्ठके प्रदत्तेषु शब्देषु शुद्धं शब्दं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(क) सतां सङ्गः लोके कथमपि ………… भवति । (पापेन/धर्मेण/पुण्येन)
(ख) गुणिनः भूमौ …………… । (सुलभाः/ दुर्लभाः/ अदर्शनीया)
(ग) अङ्गीकृतं …………… परिपालयन्ति । (सुकृतिनः/दृष्कृतिनः/खला:)
(घ) दुःखं विना नैव ………… बोध:। (सुखस्य/प्रेम्ण:/पापस्य)
(ङ) अपथ्यसेवी …………. असाध्यः । (शिक्षकाणां/छात्राणां/भिषजाम्)
(च) ……………… सर्वं प्रतिष्ठितम्। (मिध्यायां/सत्ये/पुण्ये)
(छ) एकलक्ष्याः समे …………… । (कर्माणि / धर्माः/ अधर्मा:)
(ज) मानवं पुत्रवत् …………. तारयन्ति। (वृक्षा:/पुत्रा: /पुत्र्यः)
उत्तरम् —
(क) सतां सङ्गः लोके कथमपि पुण्येन भवति ।
(ख) गुणिनः भूमौ दुर्लभाः ।
(ग) अङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति ।
(घ) दुःखं विना नैव सुखस्य बोधः ।
(ङ) अपथ्यसेवी भिषजाम् असाध्यः ।
(च) सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
(छ) एकलक्ष्याः समे धर्माः ।
(ज) मानवं पुत्रवत् वृक्षाः तारयन्ति ।
(6) अधोलिखितानि वाक्यानि पाठाधारेण सत्यम् (√) असत्यं (×) वा चिह्नीकुर्वन्तु –
(क) तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।
(ख) सतां सङ्गः लोके कथमपि पुण्येन न भवति ।
(ग) भूमौ गुणिनः सुलभाः।
(घ) सुखं विना दुःखस्य बोधः नैव ।
(ङ) अपथ्यसेवी भिषजां साध्यः ।
(च) विमले स्वच्छे हृदि सरस्वती न प्रवर्तते ।
(छ) सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्।
उत्तरम् — (क) (√), (ख) (×), (ग) (×), (घ) (×), (ङ) (×), (च) (×), (ङ) (√)|
(7) अघोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-
(क) के दुर्लभाः भूमौ ?
उत्तरम्— गुणिनः दुर्लभाः भूमौ ।
(ख) कुत्र सरस्वती प्रवर्तते?
उत्तरम् — विमले हृदि स्वच्छे सरस्वती प्रवर्तते ।
(ग) मानवं पुत्रवद् के तारयन्ति?
उत्तरम् — मानवं पुत्रवद् वृक्षाः तारयन्ति ।
(8) रेखाङ्कितानाम् उत्तराणाम् आधारेण प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(क) एकलक्ष्याः समे धर्माः ।
उत्तरम् — के समे धर्मा: ?
(ख) सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्।
उत्तरम्— कुत्रं सर्वं प्रतिष्ठितम् ?
(ग) दुःखं विना नैव सुखस्य बोधः ।
उत्तरम् – दुःखं विना नैव कस्य बोध: ?
(घ) गुणिनो दुर्लभाः भूमौ ।
उत्तरम् — के दुर्लभाः भूर्मो ?
