UK 9th Social Science

UK Board 9th Class Social Science – (इतिहास) – Chapter 4 वन्य-समाज और उपनिवेशवाद

UK Board 9th Class Social Science – (इतिहास) – Chapter 4 वन्य-समाज और उपनिवेशवाद

UK Board Solutions for Class 9th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (इतिहास) – Chapter 4 वन्य-समाज और उपनिवेशवाद

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1–औपनिवेशिक काल के वन-प्रबन्धन में आए परिवर्तनों ने इन समूहों को कैसे प्रभावित किया—
(i) झूम खेती करने वालों को।
(ii) घुमन्तू और चरवाहा समुदायों को ।
(iii) लकड़ी और वन- उत्पादों का व्यापार करने वाली कम्पनियों को।
(iv) बागान मालिकों को।
(v) शिकार खेलने वाले राजाओं और अंग्रेज अफसरों को।
उत्तर-
  1. झूम खेती करने वालों को — यूरोपीय उपनिवेशवाद का एक प्रमुख प्रभाव झूम खेती करने वालों पर पड़ा। इस कृषि व्यवस्था के अन्तर्गत वनों के कुछ भाग काट दिए जाते हैं तथा बारी-बारी से उन्हें जलाया जाता है। प्रथम मानसून की वर्षा के बाद राख के ढेरों वाली भूमि पर बीज बोए जाते हैं। अक्टूबर-नवम्बर में फसल काट ली जाती है। इन भू-भागों में कुछ वर्षों के लिए कृषि की जाती है। इन भू-भागों को बाद में 12 से 18 वर्षों तक के अन्तराल के लिए छोड़ दिया जाता है ताकि वहाँ पुनः जंगल उग सकें। इन भू-भागों पर मिश्रित फसलें उगाई जाती हैं।
    अंग्रेजी सरकार के लिए झूम खेती करने वालों के करों का हिसाब-किताब करना अत्यन्त कठिन हो गया। अंतः सरकार ने ऐसी खेती-बाड़ी पर प्रतिबन्ध लगाने का निर्णय लिया, जिससे झूम कृषिकर्त्ताओं को अपने पैतृक घरों को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। परिणामस्वरूप अनेक काश्तकारों को अपने व्यवसाय बदलने पड़े व अनेक स्थानों पर विद्रोह भी हुए ।
  2. घुमन्तू और चरवाहा समुदायों को – ब्रिटिश सरकार के नवीन अधिनियम से चरवाहों के समुदाय प्रभावित हुए थे। नए कानूनों के लागू होने से वे हिरण, खरगोश व अन्य छोटे-छोटे पशुओं का शिकार नहीं कर सकते थे। वनों के पास रहने वाले घुमन्तू व चरवाहा समुदायों के लिए जीविका का संकट उत्पन्न हो गया। यदि कोई खानाबदोश (घुमन्तू) शिकार करते हुए पकड़े जाते थे तो उन्हें सरकार द्वारा कारखानों, खानों एवं बागानों में श्रम करने के लिए बाध्य किया जाता था। उन्हें ‘अपराधी आदिवासी’ कहा जाने लगा।
  3. लकड़ी और वन-उत्पादों का व्यापार करने वाली कम्पनियों को – वन विभाग का वनों पर नियन्त्रण स्थापित हो जाने के पश्चात् वन-उत्पादों जैसे लकड़ी, रबड़ आदि के व्यापार को बल मिला। इस कार्य के लिए अनेक व्यापारिक कम्पनियाँ स्थापित हो गईं। ये स्थानीय लोगों से वन-उत्पाद खरीदकर उनका निर्यात करने लगीं। जहाजरानी व रेलवे के विस्तार के कारण टिम्बर की माँग बहुत बढ़ गई; अतः टिम्बर व्यापारियों का कुल लाभ बढ़ गया। उन्होंने स्थानीय लोगों को विभिन्न तरह के वन- उत्पादों को एकत्र करने के लिए नौकरियाँ प्रदान कीं व अत्यधिक धन भी कमाया।
  4. बागान मालिकों को — भारत में बड़े-बड़े बागानों के मालिक मुख्यतः अंग्रेज थे। वे चाय, कहवा कॉफी, नील इत्यादि की खेती करके अधिकतम लाभ कमाते थे। वे भूमिहीन श्रमिकों व स्थानीय लोगों का अत्यधिक शोषण करते थे।
  5. शिकार खेलने वाले राजाओं और अंग्रेज अफसरों कोअंग्रेज सरकार ने जहाँ एक ओर खानाबदोशों, आदिवासियों व घुमक्कड़ चरागाहों आदि के शिकार करने पर रोक लगा दी थी, वहीं दूसरी ओर अंग्रेज अधिकारियों, राजा-महाराजाओं आदि को शिकार करने की पूरी छूट प्रदान कर दी थी। उनके द्वारा शिकार के शौक के लिए यह तर्क दिया गया कि वे लोगों को शेर, चीता तथा अन्य भयंकर जानवरों का शिकार करके खतरों से बचा रहे हैं। उनके द्वारा यह भी तर्क रखा गया कि वे जंगली जानवरों से वनों को विहीन करके सरकार व व्यापारियों की सेवा कर रहे हैं। सन् 1957 तक महाराजा सरगुज्जा ने अकेल ही 1,157 टाइगर तथा 2000 चीते मारे थे। एक यूरोपियन प्रशासक जार्जयूले ने 400 चीते मारे थे। अतः कुछ समय पश्चात् पर्यावरणविदों व संरक्षणवादियों ने तर्क दिया कि इन सभी जानवरों प्रजातियों को मारने की अपेक्षा सुरक्षित रखने की आवश्यकता है।
प्रश्न 2 – बस्तर और जावा के औपनिवेशिक वन-प्रबन्धन क्या समानताएँ हैं?
उत्तर – भारत के छत्तीसगढ़ राज्य का बस्तर एक सुदूर दक्षिणी भाग (जिला) है, जबकि जावा इण्डोनेशिया में स्थित है। भारत अंग्रेजों व इण्डोनेशिया डचों का उपनिवेश रहा है। इन शासकों के अधीन बस्तर तथा जावा के वन-प्रबन्धन में निम्नलिखित समानताएँ थीं-
  1. बस्तर में अंग्रेजों ने वनों पर नियन्त्रण स्थापित किया और जावा में डचों ने।
  2. अंग्रेजों के समान डच भी शाही नौ सेना के लिए इमारती लकड़ी चाहते थे।
  3. अंग्रेजों व डच लोगों ने वैज्ञानिक वानिकी आरम्भ करके अपनी आवश्यकता के अनुरूप पेड़ लगाए ।
  4. अंग्रेज व डचों ने विभिन्न कानूनों के माध्यम से ग्रामवासियों की वनों तक पहुँच पर अनेक प्रतिबन्ध लगाए ।
  5. दोनों ही प्रदेशों में स्थानान्तरी कृषि पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
  6. दोनों प्रदेशों में, स्थानीय समुदायों की रोजी का साधन छिन जाने से असन्तोष फैल गया और उन्होंने शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। बस्तर विद्रोह का मुख्य नेता नेथानार गाँव का गुण्डाधुर था व डच में विद्रोह का नेतृत्व रेण्डबलातुंग गाँव के सुरोनटिको सामिन नामक व्यक्ति ने किया।
प्रश्न 3–सन् 1880 से 1920 के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के वनाच्छादित क्षेत्र में 97 लाख हेक्टेयर की गिरावट आई। पहले के 10.86 करोड़ हेक्टेयर से घटकर यह क्षेत्र 9.98 करोड़ हेक्टेयर रह गया था। इस गिरावट में निम्नलिखित कारकों की भूमिका बताएँ-
(i) रेलवे ।
(ii) जहाज – निर्माण ।
(iii) कृषि – विस्तार |
(iv) व्यावसायिक खेती।
(v) चाय-कॉफी के बागान ।
(vi) आदिवासी और किसान ।
उत्तर —
  1. रेलवे – औपनिवेशिक शासकों को रेलवे के विस्तार के लिए स्लीपरों की आवश्यकता थी जो कठोर लकड़ी के बनाए जाते थे। एक मील रेलवे लाइन बिछाने के लिए 1,760 से लेकर 2,000 स्लीपरों की आवश्यकता पड़ती थी। सन् 1946 तक लगभग 7,65,000 किलोमीटर रेलवे लाइनें भारत के विभिन्न भागों में बिछाई गईं जिससे लाखों की मात्रा में वृक्ष रेल की भेंट चढ़ गए। रेल इंजनों में भी लकड़ी का कोयला जलने से वनों को भारी क्षति पहुँची ।
  2. जहाज-निर्माण- ब्रिटेन का औपनिवेशिक साम्राज्य सर्वाधिक विस्तृत था तथा उसके पास ओक वनों की कमी के कारण जहाज बनाने के लिए लकड़ी की बड़ी भारी कमी महसूस की गई । अतः मजबूत लकड़ी प्राप्त करने के लिए टीक (सागौन) और साल के पेड़ लगाए जाने लगे। अन्य सभी प्रकार के वृक्षों को साफ कर दिया गया। भारत से बड़े पैमाने पर लकड़ी इंग्लैण्ड भेजी जाने लगी। अत. भारतीय उपमहाद्वीप के वनों से आच्छादित भू-भाग में तेजी से कमी आ गई।
  3. कृषि-विस्तार — सन् 1600 में भारत का लगभग 1/6 भू-भाग कृषि के अधीन था। परन्तु जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ खाद्यान्नों की माँग बढ़ने लगी। अतः किसान कृषि क्षेत्र का विस्तार करने लगे। इसके लिए वनों को साफ करके नए खेत बनाए जाने लगे। इसके अतिरिक्त खानाबदोशों और चरवाहों की कार्यविधियों पर प्रतिबन्धों ने भी इन लोगों को की कृषि अपनाने के लिए विवश किया। अत: 1880-1920 ई० के बीच में कृषि – क्षेत्र में 67 लाख हेक्टेयर का विस्तार हुआ। अतः वन तीव्रता से समाप्त होने लगे ।
  4. व्यावसायिक खेती-व्यावसायिक खेती भी वन क्षेत्रों की कमी के लिए उत्तरदायी थी । अतः किसानों ने कृषि के व्यावसायीकरण के बाद बाजार में बेचने के लिए फसलों का उत्पादन करना आरम्भ कर दिया जिससे उन्हें अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त हो सके। देश के विस्तृत वन क्षेत्रों से वनों को साफ किया गया और वहाँ चाय व कॉफी की खेती की गई।
  5. चाय-कॉफी के बागान – यूरोप में चाय-कॉफी की काफी माँग थी। औपनिवेशिक सरकार ने वनों पर नियन्त्रण करके बड़ी सस्ती दरों पर यूरोपीय खेतिहरों को बड़े क्षेत्र दे दिए। अतः इन क्षेत्रों से वनों को साफ किया गया और चाय व कॉफी के बागान स्थापित कर दिए।
  6. आदिवासी और किसान – आदिवासी व स्थानीय किसान भी वन क्षेत्रों में कमी के लिए उत्तरदायी हैं। उन्होंने व्यवसायी कृषि के लिए वनों को साफ किया। वे ईंधन के लिए पेड़ों को काटते थे जिससे वनों का अत्यधिक विनाश हुआ।
प्रश्न 4 – युद्धों से जंगल क्यों प्रभावित होते हैं?
उत्तर – युद्ध-काल में वनों पर अनेक कारणों से बुरा प्रभाव पड़ता है, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं—
  1. प्रथम विश्वयुद्ध ( 1914 1918) व द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945 ) ने वनों पर दुष्प्रभाव डाला था। ब्रिटिश वन उत्पादनों सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने के लिए वनों को खूब काटा गया।
  2. जावा स्थित साम्राज्यवादी डचों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, जापानियों के हाथों से वनों की सम्पदा बचाने के लिए स्वयं वनों में आग लगा दी थी, जिसके कारण युद्ध में विशाल वन क्षेत्र अग्नि की भेंट चढ़ गया।
  3. युद्ध के समय विभिन्न सरकारें लकड़ी के विशाल भण्डारों | तथा आरा मिलों को स्वयं भी जला डालती हैं, जिससे ये संसाधन शत्रु हाथ न लग पाएँ।
  4. भारत में युद्धों के दौरान जंगलों को काटा जाता था अथवा जला दिया जाता था। भारत की ब्रिटिश सेना को वनों से आवागमन में दिक्कत होती थी । अतः युद्धरत सेना को तुरन्त सहायता उपलब्ध कराने के लिए वनों को काटकर रास्ता सुगम बनाया जाता था।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
• विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – औपनिवेशिक काल के समय में कृषि कार्य व क्षेत्र विस्तार की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- औपनिवेशिक काल में कृषि कार्य के तीव्र विस्तारीकरण के मुख्य कारण निम्नलिखित थे—
  1. 19वीं शताब्दी में यूरोप में जूट, चीनी, गेहूँ एवं कपास की माँग बढ़ी। अतः अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष रूप से भारत में कृषि क्षेत्र का विस्तार किया।
  2. अंग्रेज शासकों का विचार था कि कृषि के विस्तार से कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी, जिससे राज्य को अधिक राजस्व प्राप्त होगा और राज्य की आय में वृद्धि होगी।
  3. 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अंग्रेज शासकों ने ऊसर व बीहड़ वन्य भूमि को उपजाऊ बनाने के प्रयास आरम्भ कर दिए थे।
  4. ब्रिटिश सरकार ने भारत में शाही नौ सेना की आवश्यकताओं के लिए कृषि – क्षेत्र को बढ़ाया। सन् 1820 के दशक से विशेषज्ञों की टीमें भारत भेजी गईं, जिन्होंने वैज्ञानिक ढंग से भारत में टिम्बर प्राप्ति के लिए अनेक जंगलों के पेड़ों को काटने की सिफारिशें कीं। अतः बड़ी मात्रा में वन की भूमि को खेती करने के लिए काश्तकारों को दे दिया गया।
प्रश्न 2 – इस कथन को सिद्ध कीजिए कि – ‘वन राष्ट्र निधि हैं।’ 
उत्तर – किसी भी देश की प्रगति में वन संसाधनों का विशेष महत्त्व होता है। वनों से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं, जो निम्नलिखित हैं—
  1. वनों का मृदा अपरदन रोकने में महत्त्वपूर्ण योग है। वृक्ष बहने वाले पानी के मार्ग में अवरोधक बनकर खड़े हो जाते हैं और पानी के वेग को कम कर देते हैं, जिससे मृदा- कणों को बहाकर ले जाने की पानी के वेग में उतनी शक्ति नहीं रहती ।
  2. वर्षा लाने में वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वृक्ष वातावरण को शीतल बना देते हैं, जिससे वाष्प – कणों से जब तृप्त वायु उनके ऊपर से गुजरती है, तो वह ठण्डी होकर वर्षा का रूप धारण कर लेती है। यह वर्षा कृषि के लिए अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होती है।
  3. वनों से मूल्यवान पदार्थ; जैसे लकड़ी, गोंद, रबड़ आदि प्राप्त होते हैं। वनों से प्राप्त कच्ची लकड़ी से कागज की लुगदी व कच्चे रबड़ से मोटरगाड़ियों के लिए टायर आदि निर्मित किए जाते हैं।
  4. वनों से प्राप्त जड़ी-बूटियों से अनेक प्रकार की दवाइयाँ बनती हैं।
  5. वन में उगने वाले घास-फूस पर अनेक पशुओं का जीवन निर्भर करता है।
  6. वन नदियों की बाढ़ रोकने तथा उनकी गति धीमी करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर स्पष्ट होता है कि वन ‘राष्ट्र की निधि’ हैं। वैज्ञानिक माँग के अनुसार भारत में वनों के अधीन क्षेत्र काफी कम है।
प्रश्न 3–अंग्रेज अफीम की खेती करने के लिए भारतीय किसानों पर क्यों दबाव डाल रहे थे?
उत्तर– सन् 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजी कम्पनी की सत्ता स्थापित हो चुकी थी । अतः उन्होंने भारतीय किसानों को अपनी भूमि पर अफीम की खेती करना सुनिश्चित कर दिया क्योंकि अफीम के बाजार का विस्तार चीन में हो गया था । बंगाल तथा बिहार में बड़ी संख्या में गरीब किसान थे। उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं था। उनके लिए लगान देना व अपनी आवश्यकता को पूरा करना बहुत कठिन था। किसान इच्छा न होते हुए भी अफीम पैदा करते थे।
1780 के दशक में अफीम पैदा करने के लिए गाँव का मुखिया, जो सरकारी एजेण्ट का कार्य करता था, किसानों को अग्रिम धन देता था। किसान अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लोभ में अग्रिम राशि लेकर अफीम की खेती करते थे। किसानों के पास अफीम की खेती करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था।
इस प्रकार भारत में अंग्रेज सरकार ने अपने व्यापार को सन्तुलित करने व अधिक लाभ कमाने के लिए भारतीय किसानों को अफीम उगाने के लिए विवश किया।
• लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – वनों से होने वाले मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर – मानव जीवन के लिए वन बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इनसे अनेक लाभ हैं, जैसे ये वन्य जीवन को सुरक्षित रखने में बहुत सहायक सिद्ध होते हैं। वन जल के वाष्पीकरण में तथा सूखे को रोकने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। वन नदियों के जल के बहाव को नियमित करते हैं। वन जल और मिट्टी की भी रक्षा करते हैं। वन मृदा अपरदन को रोकने में सहायक होते हैं। इसके अतिरिक्त वन नदियों में आने वाली बाढ़ की रोकथाम कर उसके विनाशकारी प्रभाव और प्रकोप से रक्षा भी करते हैं। वनों लाखों-करोड़ों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। वन उद्योग व जंगली जीव संरक्षण का गहरा सम्बन्ध है।
प्रश्न 2 – झूम कृषि क्या है ?
उत्तर – झूम कृषि के अन्तर्गत पेड़ों, झाड़ियों व घास को काटकर वन भूमि का छोटा-सा टुकड़ा साफ किया जाता है। फिर उन्हें जला दिया जाता है। जलाने के बाद प्राप्त राख को मिट्टी में मिला दिया जाता है ताकि उपजाऊपन को बढ़ाया जा सके। तब उस स्थान पर कुछ वर्षों के लिए कृषि की जाती है। जब उस स्थान पर उपजाऊपन कम हो जाता है तो अन्य स्थान पर कृषि आरम्भ की जाती है। अत: ‘झूम कृषि’ के अन्तर्गत किसान एक स्थान से दूसरे स्थान पर कृषि के लिए घूमते रहते हैं ।
प्रश्न 3 – किन कारणों से औपनिवेशिक काल में कृषि का विस्तार तेजी से हुआ? उल्लेख कीजिए।
उत्तर – अंग्रेजों ने जूट, कपास, चीनी तथा नील आदि व्यापारिक फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया क्योंकि ब्रिटिश उद्योग में इनका प्रयोग कच्चे पदार्थों के रूप होता था। उन्होंने बढ़ती शहरी जनसंख्या के भोजन के लिए खाद्यान्नों के उत्पादन को भी प्रोत्साहित किया। 19वीं शताब्दी के आरम्भ में औपनिवेशिक राज्य सोचता था कि वन उत्पादक क्षेत्र नहीं हैं। अतः राज्य की आय बढ़ाने के लिए 1880 से 1920 ई० के बीच वनों को काटा गया तथा कृषि क्षेत्र बढ़कर 607 करोड़ हेक्टेयर हो गया।
प्रश्न 4 – बस्तर के लोगों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया? 
उत्तर – जब अंग्रेजों ने वनों को आरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया तो बस्तर के वन-निवासियों के लिए जीवन निर्वाह करना कष्टदायक हो गया। वन निवासी वनों से लकड़ी नहीं काट सकते थे। इसके अतिरिक्त वे अनेक वन्य उत्पादों से भी वंचित हो गए जिन्हें बेचकर वे अपना निर्वाह कर लेते थे।
बस्तर वन निवासी अंग्रेजों द्वारा लगाए गए करों से तंग आ चुके थे। उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों को भेंट आदि भी देनी पड़ती थी। वह उनकी बेगार में नौकरी करते-करते तंग आ चुके थे। अतः उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
प्रश्न 5- वनों के संरक्षण के विभिन्न उपायों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर— वनों का संरक्षण विभिन्न उपायों द्वारा निम्नवत् किया जा सकता है-
  1. वन हमारी राष्ट्रीय निधि हैं। हमारा दायित्व वनों के अन्धाधुन्ध कटाव को रोकना है। यदि हम इस ओर अपनी उदासीनता दिखाते हैं तो आने वाले समय प्रकृति विकराल रूप ले लेगी।
  2. हमें वृक्षारोपण का कार्य करते रहना चाहिए। यह कार्य उपलब्ध खाली स्थान, नदियों व बाँधों के आस-पास के क्षेत्र में अच्छे ढंग से हो सकता है।
  3. हमें वनों पर दबाव कम करने के लिए प्लास्टिक, कागज बोर्ड आदि वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए।
  4. आज के वैज्ञानिक युग में हमें ऐसी फसलों की खोज कर लेनी चाहिए जो पहाड़ी, शुष्क व बंजर भूमि में आसानी से उगाई जा सकें।
प्रश्न 6 – स्थानान्तरी कृषि पर रोक क्यों लगाई गई? इसका स्थानीय समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर – स्थानान्तरी कृषि पर मुख्यतः निम्नलिखित कारणों से रोक लगाई गई—
  1. स्थानान्तरी कृषि से सरकार के लिए करों की गणना करना अत्यन्त कठिन हो रहा था ।
  2. यूरोप के वन – अधिकारियों का विचार था कि स्थानान्तरी कृषि वनों के लिए हानिकारक है। उनके कथनानुसार जिस भूमि पर छोड़-छोड़ कर कृषि होती रहती है, वहाँ पर इमारती लकड़ी देने वाले वन नहीं उग सकते।
  3. इसके अतिरिक्त वन – भूमि को साफ करने के लिए जब आस-पास के क्षेत्र को जलाया जाता था तो इस प्रक्रिया से अन्य मूल्यवान वृक्षों को आग लगने का भय रहता था ।
• अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – वनों के विनाश का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर – वनों के विनाश का प्रमुख कारण कृषि – क्षेत्र का विस्तार करना है।
प्रश्न 2 – दो नकदी फसलों के नाम बताइए ।
उत्तर- जूट व कपास दो नकदी फसलें हैं।
प्रश्न 3 – बागान (Plantation) किसे कहते हैं?
उत्तर—किसी विशेष प्रजाति के पौधों को सीधी कतारों में लगाने की प्रक्रिया को बागान (पौधारोपण) कहते हैं।
प्रश्न 4 – वन-उत्पाद मुख्यत: कौन-कौन से हैं?
उत्तर – बाँस, गोंद, मसाल, हाथी- दाँत, सींग व खाल आदि मुख्य वन-उत्पाद हैं।
प्रश्न 5 – वन – ग्रामों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर – वे ग्रामीण जिन्हें ‘आरक्षित वनों’ में इस शर्त पर रहने की अनुमति दी जाती थी कि वे पेड़ों को काटने, उन्हें एक स्थान से दूसरे • स्थान पर ले जाने तथा आग से वनों की रक्षा करने में वन विभाग के लिए नि:शुल्क ( मुफ्त ) कार्य करेंगे। ऐसे ग्रामीण लोगों के समुदाय को वन-ग्राम कहा गया।
प्रश्न 6 – ‘ वैज्ञानिक वानिकी’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर – वन विभाग के नियन्त्रण में वृक्ष (वन) काटने की वह प्रणाली जिसमें पुराने वृक्षों को काटा जाता है और नए वृक्ष लगाए जाते हैं।
प्रश्न 7 – घुमन्तू खेती अथवा झूम (Shifting Agriculture) किसे कहते हैं?
उत्तर – जब वन के एक भाग को साफ करके उसमें अल्पकाल के लिए खेती की जाती है और उसकी उर्वरता समाप्त होने पर उसे छोड़कर आगे बढ़ लिया जाता है तो ऐसी अल्पकालीन खेती को घुमन्तू (झूम खेती कहते हैं। ऐसी खेती प्रायः वन – निवासी करते हैं।
प्रश्न 8 – भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service) कब शुरू की गई ? पहला भारतीय वन्य कानून कब पारित किया गया?
उत्तर- भारतीय वन सेवा 1864 में शुरू की गई। पहला भारतीय वन्य कानून 1865 में पारित हुआ ।
प्रश्न 9 – औपनिवेशिक काल में वनों व गोदामों से भारी लकड़ी के टुकड़ों को उठाने के लिए किस पशु का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर – औपनिवेशिक काल में वनों व गोदामों से भारी लकड़ी के टुकड़ों को उठाने के लिए हाथी का प्रयोग किया जाता था।
प्रश्न 10- 1700 से 1995 तक विश्व भर में वनों का कितना क्षेत्र उद्योगों, कृषि, चरागाहों और जलाने की लकड़ी के लिए साफ किया गया ?
उत्तर- 1700 से 1995 तक विश्व भर में वनों का लगभग 139 लाख वर्ग किलोमीटर, जो संसार के समस्त भू-भाग का 9.3 प्रतिशत है, उसे उद्योगों, कृषि, चरागाहों व जलाने की लकड़ी के लिए साफ किया गया।
• बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 – बस्तर में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का नेता कौन था-
(a) मुण्डाधुर
(b) बिरसा मुण्डा
(c) कनु
(d) सिद्ध ।
उत्तर – (a) मुण्डाधुर
प्रश्न 2 – संथाल परगना में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने वाले वन समुदाय का नेता था-
(a) बिरसा मुण्डा
(b) सिद्ध
(c) अलूरी सीता राम राजू
(d) मुण्डाधुर ।
उत्तर – (b) सिद्ध
प्रश्न 3 – चाय के बागानों पर काम करने वाला समुदाय था-
(a) येरुकुला
(b) कोरवा
(c) संथाल
(d) ये सभी।
उत्तर – (c) संथाल
प्रश्न 4 – स्थानान्तरी कृषि का एक अन्य नाम है-
(a) झूम कृषि
(b) रोपण कृषि
(c) गहन कृषि
(d) मिश्रित कृषि |
उत्तर – (a) झूम कृषि
प्रश्न 5 – भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service) का गठन कब किया गया-
(a) 1850 में
(b) 1853 में
(c) 1860 में
(d) 1864 में।
उत्तर – (d) 1864 में।
प्रश्न 6 – भारत में वनों का पहला डायरेक्टर जनरल था –
(a) फ्रांस का केल्विन
(b) जर्मनी का डायट्रिच ब्रैण्डिस
(c) इंग्लैण्ड का क्रिसफोर्ड
(d) रूस का निकोलस ।
उत्तर – (b) जर्मनी का डायट्रिच ब्रैण्डिस

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