UK Board Class 9 Hindi – अपठित गद्यांश
UK Board Class 9 Hindi – अपठित गद्यांश
UK Board Solutions for Class 9 Hindi – अपठित गद्यांश
| पाठ्यपुस्तक ‘शिक्षार्थी व्याकरण और व्यावहारिक हिन्दी’ में उदाहरणार्थ दिए गए अपठित गद्यांश एवं उनके हल |
- निम्नलिखित गद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
उदाहरण 1
तुम अपने जीवन के आगे काल्पनिक प्रश्नचिह्न क्यों लगाते हो? जो उपस्थित नहीं, उससे भय क्या? अगर तुम्हारी कल्पना में शंकाओं एवं सन्देहों के आने का मार्ग है तो इसे बन्द कर दो और दूसरी ओर की खिड़की खोल लो, जिसमें से उत्साह, आशा व सफलता की बयार आती है। भिखमंगों के डर से क्या तुमने रोटी पकाना छोड़ दिया है? मृत्यु के डर से यदि तुम जीना नहीं छोड़ते तो कठिनाइयों के डर से कार्य न करना कौन-सी बुद्धिमत्ता है? उस नाविक को देखो जो समुद्र में, नाव खेने चला है। उसे मालूम है कि समुद्र की लहरों के थपेड़ों से उसकी नाव चकनाचूर हो सकती है, आँधी से पाल तार-तार हो सकता है, मस्तूल गिरकर टूट सकता है, पर इन सबसे घबराकर क्या वह समुद्र में जाना छोड़ दे ? समुद्र कितना ही विशाल क्यों न हो, पर उसकी विशाल साहसी भुजाओं का मुकाबला कर सकने की शक्ति उसमें नहीं है। इसलिए तुम भी संसार की कर्मस्थली में उतर आओ, अन्यथा चिन्ता एवं निराशा के सागर में डूब जाओगे ।
प्रश्न –
1. काल्पनिक प्रश्नचिह्न से क्या अभिप्राय है?
2. शंकाओं और सन्देहों से आप किस प्रकार छुटकारा पा सकते हैं?
3. किस बात में बुद्धिमत्ता है ?
4. लेखक ने नाविक के दृष्टान्त द्वारा क्या प्रेरणा दी है ?
5. लेखक ने मनुष्य को विपत्तियों में हतोत्साहित न होने के लिए कौन-कौन-से दृष्टान्त दिए हैं?
6. समुद्र मनुष्य की विशाल शक्ति का मुकाबला करने में क्यों अक्षम है?
7. व्यक्ति कब चिन्ता और निराशा के सागर में डूब जाता है?
8. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
1. काल्पनिक प्रश्नचिह्न से अभिप्राय है—ऐसी समस्या को लेकर चिन्तित होना, जो जीवन में कभी नहीं आई, जिसकी केवल कल्पना की जाए; काल्पनिक आशंका ।
2. हम स्वयं में उत्साह और आशा का संचार करके शंकाओं और सन्देहों से छुटकारा पा सकते हैं।
3. कठिनाइयों का साहसपूर्वक सामना करते हुए कार्य को निरन्तर करते रहने में, ही बुद्धिमत्ता है।
4. लेखक ने नाविक के दृष्टान्त द्वारा जीवन की चुनौतियों से साहसपूर्वक जूझने की प्रेरणा दी है।
5. लेखक ने मनुष्य को विपत्तियों में हतोत्साहित न होने के लिए तीन दृष्टान्त दिए हैं-
(क) भिखमंगों के डर से रोटी पकाना न छोड़ने का दृष्टान्त।
(ख) मृत्यु – भय से जीवन जीना न छोड़ने का दृष्टान्त ।
(ग) समुद्र की लहरों के भय से नाव खेना न छोड़ने का दृष्टान्त।
6. मनुष्य में अथाह कर्म – शक्ति, संघर्ष – क्षमता और अतुलित साहस होता है, जिस कारण समुद्र उसका मुकाबला करने में अक्षम हैं।
7. जब व्यक्ति कर्मों से दूर भागता है तो वह चिन्ता और निराशा के सागर में डूब जाता है।
8. शीर्षक – ‘साहस और सफलता’ ।
उदाहरण 2
जीवन की कला ठूंठ की तरह खड़े रहने में नहीं है; यह जो पेड़ अपनी जवानी में ही सूख गया, जानते हो क्यों? क्योंकि इसकी जड़ों ने रस लेना बन्द कर दिया था। जीवन में लहलहाने का एक ही तरीका है कि उसे विभिन्न रसों को लेने दो। एक विशेष विषय में निपुण होने का तात्पर्य यह नहीं है कि तुम फुटबाल के ग्राउण्ड में मत जाओ, व्यापार में इतने तल्लीन मत हो जाओ कि बच्चों को भूल जाओ, पुस्तकों के कीड़े मत बन जाओ कि यार-दोस्तों की हँसी बुरी लगने लगे। ज़ीवन में विविध रस लेना सीखो और इतना रस लो कि बुढ़ापे की झुर्रियों में उदासीनता और निराशा की एक झुर्री भी न पड़े। रहने का तरीका यही है कि गले में संगीत हो, होंठों पर मुसकराहट हो, आँखों में हँसी हो, हृदय में उमंग हो और इस प्रकार गाते हुए बढ़ो, हँसते हुए मिलो, मुसकराते हुए विदा लो।
प्रश्न-
1. लेखक के अनुसार जीने की वास्तविक कला क्या है?
2. किसी विषय – विशेष में निपुण होने का क्या तात्पर्य नहीं है?
3. ‘जीवन में विविध रस लेना सीखो से क्या तात्पर्य है?
4. व्यक्ति ठूंठ कब बन जाता है?
5. इस गद्यांश के लिए कोई उपयुक्त शीर्षक सुझाइए |
उत्तर-
1. लेखक के अनुसार जीवन जीने की वास्तविक कला संसार के सब रसों का आस्वादन करते हुए जीने में है।
2. किसी विषय – विशेष में निपुण होने का तात्पर्य यह नहीं है कि हम उस विषय के अतिरिक्त जीवन के अन्य किसी विषय अथवा क्षेत्र के विषय में जाने ही नहीं, केवल उसी विषय में डूबे रहें, जिसमें हम निपुण हैं।
3. इसका तात्पर्य है— अपने जीवन को एकाकी और एकरस न. बनाओ। जीवन में जितने भी पक्ष हैं, सबमें उत्साहपूर्वक रुचि लो और सबका आनन्द उठाओ।
4. व्यक्ति; जीवन – रस को नकारकर अर्थात् स्वयं को जीवन के विविध अनुभवों से वंचित करके ठूंठ बन जाता है।
5. शीर्षक – ‘जीवन की कला’, ‘जीने की कला’, ‘जीवन – रस’, ‘आनन्दमय जीवन का रहस्य’ ।
| पाठ्यपुस्तक ‘शिक्षार्थी व्याकरण और व्यावहारिक हिन्दी अभ्यासार्थ दिए गए अपठित गद्यांश एवं उनके हल |
- प्रश्न – नीचे दिए गए गद्यांशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(1)
सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य की आवश्यकताएँ बढ़ी और क्रमशः अधिकाधिक जीव जगत् उसके सम्पर्क में आए। जीव-जगत् के अधिक विस्तृत रूप से उसका साक्षात्कार हुआ।
इस सम्पर्क और साक्षात्कार के विस्तार के साथ मनुष्य के अनुभवों में भी वृद्धि हुई और उसकी चेतना अधिकाधिक विस्तृत तथा परिमार्जित होती गई। धीरे-धीरे उसमें स्मृति, इच्छा, कल्पना आदि शक्तियों का आविर्भाव हुआ और विवेक बुद्धि का विकास हुआ। आरम्भ में तो मनुष्य अपने आस-पास के दृश्यों से ही परिचित था और उसकी इच्छाशक्ति भी वहीं तक सीमित थी । क्रमशः वह अदृश्य और अश्रुत वस्तुओं की कल्पना करने लगा।
उसकी इच्छाओं और अभिलाषाओं का क्षेत्र भी बढ़ा और साथ ही उसमें सुन्दर – असुन्दरं, सत्-असत् तथा उचित – अनुचित की धारणा भी बद्धमूल हुई। समय के साथ चेतना के अधिक विकसित होने के कारण उसकी बोध-वृत्ति सुव्यवस्थित तथा परिपुष्ट होती गई। मनुष्य के संस्कारों और वृत्तियों का मनुष्य-समाज से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित होता गया। इन संस्कारों और वृत्तियों को ही मानव सभ्यता का मानदण्ड माना जाने लगा। जिस समाज की ये वृत्तियाँ जितनी अधिक व्यापक और समन्वयपूर्ण होती हैं, वह समाज उतना ही समुन्नत समझा जाता है।
प्रश्न-
1. मनुष्य की चेतना उत्तरोत्तर कैसे विकसित होती गई ?
2. ‘उसकी इच्छाओं और अभिलाषाओं का क्षेत्र भी बढ़ा।’ इच्छाओं और अभिलाषाओं में क्या अन्तर है?
सही विकल्प के सामने (√) का चिह्न लगाइए-
3. ‘आविर्भाव’ शब्द का अर्थ है-
(क) विकास
(ख) विस्तार
(ग) प्रकट होना
(घ) सम्पर्क।
4. ‘इन संस्कारों और वृत्तियों को ही मानव सभ्यता का मानदण्ड माना जाने लगा’ का अभिप्राय है कि यह माना जाने लगा कि ये संस्कार और वृत्तियाँ ही-
(क) मानव सभ्यता को जीवित रखे हुए हैं
(ख) मानव सभ्यता को प्रेरणा देती हैं।
(ग) मानव सभ्यता को गौरव प्रदान करती हैं
(घ) मानव सभ्यता की उन्नति की निर्धारक हैं।
5. किसी भी समाज को उन्नत समाज कब माना जाता है?
6. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
उत्तर –
1. मनुष्य की आवश्यकताएँ और सम्पर्क तथा अनुभव जैसे-जैसे बढ़े, वैसे-वैसे उसकी चेतना का विकास होता चला गया।
2. ‘इच्छा’ वास्तविक आवश्यकता है और ‘अभिलाषा’ मानसिक कामना ।’
3. (ग) प्रकट होना।
4. (घ) मानव सभ्यता की उन्नति की निर्धारक हैं।
5. किसी भी समाज को तब उन्नत माना जाता है, जब उसकी वृत्तियाँ व्यापक और समन्वयपूर्ण हों।
6. शीर्षक – ‘मानव सभ्यता का क्रमिक विकास’ ।
(2)
पशु को बाँधकर रखना पड़ता है; क्योंकि वह निरंकुश है, चाहे जहाँ-तहाँ चला जाता है, इधर-उधर मुँह मार देता है। क्या मनुष्य को M भी इसी प्रकार दूसरों का बन्धन स्वीकार करना चाहिए? क्या इससे उसमें मनुष्यत्व रह पाएगा? पशु के गले की रज्जु को एक हाथ में पकड़कर और दूसरे हाथ में एक लकड़ी लेकर उसे जहाँ चाहो हाँककर ले जाओ। जिन लोगों को इसी प्रकार हाँके जाने का स्वभाव पड़ गया है, जिन्हें कोई भी जिधर चाहे ले जा सकता है, लगा सकता है, उन्हें भी पशु ही कहा जाएगा। पशु को चाहे जितना मारो, चाहे जितना उसका अपमान करो, बाद में खाने को दे दो, वह पूँछ और कान हिलाने लगेगा। ऐसे नर पशु भी बहुत-से मिलेंगे, जो कुचल जाने और अपमानित होने पर भी जरा-सी वस्तु मिलने पर चट सन्तुष्ट और प्रसन्न हो जाते हैं। कुत्ते को कितना ही ताड़ना देने के बाद उसके सामने एक टुकड़ा डाल दो, वह झट से मार-पीट को भूलकर उसे खाने लगेगा। यदि हम भी ऐसे ही हैं तो हम कौन हैं, इसे स्पष्ट कहने की आवश्यकता नहीं। पशुओं में भी कई पशु मार-पीट और अपमान को नहीं सहते । वे कई दिन तक निराहार रहते हैं। कई पशुओं ने तो प्राण त्याग दिए, ऐसा सुना जाता है। पर इस प्रकार के पशु मनुष्य- कोटि के हैं, उनमें मनुष्यत्व का समावेश है, यदि ऐसा कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी ।
प्रश्न –
1. पशु को बाँधकर क्यों रखा जाता है?
2. किन स्थितियों में मनुष्य में ‘मनुष्यत्व’ नहीं रहता है ?
3. लेखक ने नर – पशुओं की क्या विशेषताएँ बताई हैं?
4. लेखक ने किस प्रकार के पशु को मनुष्य -कोटि में रखा है?
5. इस गद्यांश के लिए कोई उपयुक्त शीर्षक सुझाइए।
उत्तर –
1. पशु निरंकुश होता है, इसलिए मनमानी करते हुए कहीं भी मुँह मारने लगता है; अतः उसे बाँधकर रखा जाता है।
2. दूसरों की गुलामी अर्थात् बन्धन स्वीकार करके और अपमान सहकर पेट भरने में मनुष्य का मनुष्यत्व नहीं रहता है।
3. लेखक के अनुसार जो मनुष्य लोभ के कारण अपमान सहकर भी प्रसन्न रहता है और अपमान करनेवाले की जी-हजूरी करता रहता है, वही नर पशु है।
4. लेखक ने अपमान की रोटी को ठुकरा देनेवाले पशु को मनुष्य- कोटि में रखा है।
5. शीर्षक – ‘सच्ची मनुष्यता’ ।
| अन्य परीक्षोपयोगी अपठित गद्यांश एवं उनके हल |
साहित्यिक गद्यांश
(1)
आधुनिक संस्कृत मूलतः बुद्धिवादी और विश्लेषणप्रिय है, जिसमें ज्ञान की अपार महिमा है, परन्तु हृदय के स्रोत निरन्तर सूखते जा रहे हैं। जिसे शिक्षा कहकर चलाया जा रहा है, वह सूचनामात्र है, उसमें अनुभूति को जगह नहीं मिली है। फलतः आज का शिक्षित मनुष्य व्यर्थता से भर गया है। कविता का स्रोत है— आनन्द, जिज्ञासा एवं रहस्य । हमारे ज्ञान की परिधि इतनी विस्तृत हो गई है कि कुछ भी अप्रत्याशित नहीं रह गया है। काव्य- रूढ़ियाँ आज हास्यास्पद जान पड़ती हैं। अद्भुत का थोड़ा भी स्पन्दन जीवन में शेष नहीं रह गया है। वैसे ज्ञान और कविता में निरन्तर विरोध ही हो यह आवश्यक नहीं; क्योंकि विज्ञान रहस्योन्मुखी है, इसमें जिज्ञासा और समाधान के अनेक सूत्र हैं। परन्तु आज विज्ञान विशेषता के उस संसार में पहुँच गया है जहाँ तालिकाओं का राज्य है और मानव शिशु तथ्यों की मरुभूमि में खो गया है। फल यह हुआ कि हम अहं के स्तूप बन गए हैं। हम चमत्कृत होने में मानहानि समझते हैं। हमारी सहज अन्तर्वृत्तियाँ जड़ होती जा रही हैं।
प्रश्न-
1. आधुनिक संस्कृत कैसी है?
2. आज की शिक्षा में क्या कमी है?
3. आज का शिक्षित मनुष्य व्यर्थता से क्यों भर गया है?
4. कविता के स्त्रोत कौन-कौन से हैं?
5. विज्ञान में क्या-क्या है?
6. आज के विज्ञान की क्या विशेषता है?
7. हम अहं के स्तूप कैसे बन गए हैं?
8. इस गद्यांश के लिए कोई उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
1. आधुनिक संस्कृत मूलतः बुद्धिवादी और विश्लेषणप्रिय है, उसमें ज्ञान की अपार महिमा है।
2. आज की शिक्षा में यही कमी है कि वह सूचनामात्र है और उसमें अनुभूति की जगह नहीं है।
3. आज की शिक्षा केवल सूचनापरक हो गई है, उसमें अनुभूतिपक्ष का अभाव है; इसलिए आज का शिक्षित मनुष्य व्यर्थता से भर गया है।
4. कविता के तीन स्रोत हैं-
(i) आनन्द
(ii) जिज्ञासा
(iii) रहस्य।
5. विज्ञान रहस्योन्मुखी है, उसमें जिज्ञासा और समाधान के अनेक सूत्र हैं।
6. आज का विज्ञान आँकड़ों और तथ्यों से परिपूर्ण है। उसमें ‘रहस्यों को सुलझाने और मन को चमत्कृत करनेवाली प्रवृत्तियों का अभाव है।
7. हमने विज्ञान द्वारा प्रदान किए गए तथ्यों और आँकड़ों को आत्मसात् कर लिया है, जिस कारण हम स्वयं को महाज्ञानी समझते हैं। इस प्रकार हम अहं के स्तूप बन गए हैं।
8. शीर्षक ‘ज्ञान और कविता’, ‘अनुपयोगी शिक्षा’ ‘शिक्षा और अनुभूति’ ।
(2)
साहित्य का आधार जीवन है। इस नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है, उसकी अटारियाँ, मीनारें और गुम्बद बनते हैं। लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी है, उसको देखने को जी नहीं चाहेगा। जीवन परमात्मा की सृष्टि है, इसलिए अनन्त है, अबोध है, अगम्य है; साहित्य मनुष्य की सृष्टि है, इसलिए सुबोध है, सुगम है और मर्यादाओं से परिचित है। जीवन परमात्मा के प्रति अपने कार्यों के लिए जवाबदेह है या नहीं, हमें मालूम नहीं, लेकिन साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह है। इसके अपने कानून हैं, जिनसे वह इधर-उधर नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य ही आनन्द है। मनुष्य जीवनपर्यन्त आनन्द की ही खोज में लगा रहता है। किसी को वह रत्न द्रव्य में मिलता है, किसी को भरे-पूरे परिवार में, किसी को लम्बे-चौड़े भवन में तो किसी को ऐश्वर्य में; लेकिन साहित्य का आनन्द इससे ऊँचा है, इससे पवित्र उसका आधार सुन्दर और सत्य है। वास्तव में सच्चा आनन्द; सुन्दर और सत्य से मिलता है। उसी आनन्द को दर्शाना, वही आनन्द उत्पन्न करना – साहित्य का उद्देश्य है। ऐश्वर्य या भोग के आनन्द में ग्लानि छिपी होती है। उससे अरुचि भी हो सकती है, परन्नात्ताप भी हो सकता है, पर सुन्दर से जो आनन्द प्राप्त होता है वही अखण्ड एवं अमर है।
ऐसे आनन्द साहित्य में नीरस कहे गए हैं। प्रश्न होगा, बीभत्स में कोई आनन्द है? अगर ऐसा न होता तो वह रसों में ही क्यों गिना जाता? हाँ है; बीभत्स में सुन्दर और सत्य मौजूद हैं। भारतेन्दु ने श्मशान का वर्णन किया है, वह कितना बीभत्स है? प्रेतों और पिशाचों का अधजले मांस के लोथड़े, हड्डियों को चटर चटर चबाना, बीभत्स की पराकाष्ठा है। लेकिन वह बीभत्स होते हुए भी सुन्दर है, क्योंकि उसकी सृष्टि पीछे आनेवाले स्वर्गीय दृश्य के आनन्द को तीव्र करने के लिए हुई है। साहित्य तो हर एक रस में सुन्दर खोजता है— राजा के महल में, रंक की झोपड़ी में, पहाड़ के शिखर पर, गन्दे नालों के अन्दर, ऊषा की लाली में, सावन-भादों की अँधेरी रात में, और यह आश्चर्य की बात है कि रंक की झोपड़ी में जितनी आसानी से सुन्दर मूर्तिमान् दिखाई देता है, उतना महलों में तो यह खोजने से भी मुश्किल से मिलता है। जहाँ मनुष्य अपने मौलिक, यथार्थ अकृत्रिम रूप में है, वही आनन्द है। आनन्द कृत्रिमता और आडम्बर से कोसों दूर भागता है। सत्य का कृत्रिम से क्या सम्बन्ध ? अतएव हमारा विचार है कि साहित्य में केवल एक रस है, और वह शृंगार है। कोई रस साहित्यिक दृष्टि से रस नहीं रहता और न उस रचना की गणना ही साहित्य में की जा सकती है, जो शृंगार- विहीन और असुन्दर है। जो रचना केवल वासनाप्रधान हो, जिसका उद्देश्य कुत्सित भावों को जगाना हो, जो केवल बाह्य जगत् से सम्बन्ध रखे, वह साहित्य नहीं। जासूसी उपन्यास अद्भुत होता है, लेकिन हम उसे साहित्य उसी समय कहेंगे, जब उसमें सुन्दर का समावेश हो; जब उसमें खूनी का पता लगाने के लिए सतत उद्यम, नाना प्रकार के कष्टों को झेलना, न्याय, मर्यादा की रक्षा करना – ये भाव रहें, जो इस अद्भुत रस की रचना को सुन्दर बना देते हैं।
प्रश्न –
1. ‘लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी है’ यहाँ ‘बुनियाद’ किसका प्रतीक है?
2. साहित्य सुबोध और सुगम क्यों है?
3. जीवन किसकी रचना है?
4. मानव जीवन का उद्देश्य क्या है?
5. जीवन और साहित्य के आनन्द में कौन-सा आनन्द ऊँचा है और क्यों ?
6. बीभत्स में आनन्द कैसे है?
7. साहित्य कहाँ-कहाँ रस खोजता है ?
8. झोपड़ी जितना आनन्द महलों में खोजने से मुश्किल से मिलता है; क्यों?
9. साहित्य क्या नहीं है?
10. आनन्द क्या है?
11. निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए- अबोध, अगम, राजा, कृत्रिम
12. इन शब्दों में लगे उपसर्ग बताइए— नीरस, विहीन, अनन्त ।
13. अर्थ स्पष्ट कीजिए— द्रव्य, ऐश्वर्य, पश्चात्ताप ।
14. इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
1. यहाँ ‘बुनियाद’ आनन्द का प्रतीक है, जो कि साहित्य का मूलाधार है।
2. साहित्य सुबोध और सुगम है; क्योंकि इसकी रचना मनुष्य के द्वारा की गई है। मनुष्य जिन मर्यादाओं से परिचित होता है, उन्हीं का वर्णन अथवा उल्लेख वह साहित्य में करता है। इस प्रकार पूर्व परिचित विषयों से युक्त होने के कारण साहित्य सुबोध और सुगम होता है।
3. जीवन ईश्वर की रचना है, इसलिए अनन्त है, अबोध है, अगम्य है।
4. मानव जीवन का उद्देश्य है— आनन्द । मनुष्य जीवन भर आनन्द की ही खोज में लगा रहता है।
5. जीवन और साहित्य के आनन्द में साहित्य का आनन्द ऊँचा है; क्योंकि उसका आधार सुन्दर और सत्य होता है।
6. बीभत्स में आनन्द इसलिए है; क्योंकि उसमें सत्य और सुन्दर उपस्थित रहता है। बीभत्स इसलिए भी सुन्दर है; क्योंकि उसकी सृष्टि का उद्देश्य उसके पश्चात् आनेवाले अलौकिक आनन्द की अनुभूति को तीव्र बनाना होता है।
7. साहित्य तो प्रत्येक रस में सुन्दर खोजता है— राजा के महल में, रंक की झोपड़ी में, पहाड़ के शिखर पर, गन्दे नालों के अन्दर, ऊषा की लाली में और सावन-भादों की अँधेरी रात में भी।
8. जीवन की यथार्थता, मौलिकता और अकृत्रिमता में ही वास्तविक आनन्द छिपा है और ऐसा जीवन प्रायः झोपड़ी में दृष्टिगत होता है, महलों में नहीं; इसलिए झोपड़ी जितना आनन्द महलों में खोजने से मुश्किल से मिलता है।
9. जो रचना शृंगार- विहीन, असुन्दर, वासनाप्रधानं, कुत्सित भावों को जाग्रत करनेवाली हो, वह साहित्य नहीं है।
10. जहाँ मनुष्य अपने मौलिक, यथार्थ, अकृत्रिम रूप में है, वही आनन्द है।
11. अबोध – सुबोध, कृत्रिम — अकृत्रिम | अगम — सुगम, राजा-रंक,
12. नीरस — निर्, उपसर्ग, विहीन – वि उपसर्ग, अनन्त – अन् उपसर्ग।
13. द्रव्य – धन-दौलत | ऐश्वर्य – स्वामित्व, प्रभुत्व | पश्चात्ताप – किसी गलत कार्य के पश्चात् होनेवाली पीड़ा – दुःख अथवा ग्लानि ।
14. शीर्षक – ‘साहित्य का आधार’, ‘साहित्य और जीवन’, ‘साहित्य में आनन्द’ ।
(3)
जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाना चाहिए, वह आज भारतीय मानसिक क्षितिज में क्रियाशील नहीं है। आज एक प्रकार की अव्यवस्थित व्यावसायिक संस्कृति व्याप्त है, जिसकी जड़ शायद यूरोप में है। भारतीयों के सार्वजनिक व्यवहार में गुरु-शिष्य सम्बन्ध का भी तदनुरूप परिवर्तन हो गया है। यहाँ गुरु वेतनभोगी नहीं होते थे और न शिष्य को ही शुल्क देना पड़ता था। पैसे देकर विद्या खरीदने की यह क्रय-विक्रय पद्धति निःसन्देह इस भारतीय मिट्टी की उपज नहीं है । यहाँ शिक्षणालय एक प्रकार के आश्रम अथवा मन्दिर के समान थे। गुरु को साक्षात् परमेश्वर ही समझा जाता था। शिष्य पुत्र से अधिक प्रिय हो थे। यहाँ सम्मान मिलना ही शक्ति पाने का रहस्य रहा है। प्राचीनकाल में गुरु की शिक्षा-दान क्रिया उनका आध्यात्मिक अनुष्ठान थी, परमेश्वर – प्राप्ति का उनका वह एक माध्यम थी। वह आज पेट पालने का जरिया बन गई है।
प्रारम्भ में विवेकानन्द को भारत में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं हुआ, पर जब उन्होंने अमेरिका में नाम कमा लिया तो भारतवासी दौड़े मालाएँ लेकर स्वागत करने। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भी जब नोबल पुरस्कार मिला तो बंगाली दौड़े उनका स्वागत करने। भरतनाट्यम और कथकली को कोई नहीं पूछता था, पर जब विदेशों में मान मिलने लगा तो आश्चर्य से भारतवासी सोचने लगे- ‘अरे, हमारी संस्कृति में इतनी अपूर्व चीजें भी पड़ी थीं क्या ! ‘
प्रश्न-
1. जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाना चाहिए, वह आज भारतीय मानसिक क्षितिज में क्रियाशील क्यों नहीं है?
2. प्राचीन भारत में गुरु-शिष्य सम्बन्ध कैसे होते थे?
3. गुरु-शिष्य सम्बन्धों में क्या परिवर्तन आया है?
4. गुरु-शिष्य सम्बन्धों में यह परिवर्तन किसके प्रभावस्वरूप हुआ है?
5. स्वामी विवेकानन्द और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भारत में कब महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ?
6. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
1. जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाना चाहिए, वह आज भारतीय मानसिक क्षितिज में क्रियाशील नहीं है। इसका कारण यह है कि आज देश में सर्वत्र यूरोप के प्रभाव के कारण भोगवादी संस्कृति को महत्त्व दिया जा रहा है। सभी भारतवासी यूरोप की चमक-दमक के आगे अपने सांस्कृतिक मूल्यों को पुराना, घिसा-पिटा मान बैठे हैं, इसीलिए उनके मन में भारतीय संस्कृति की क्रियाशीलता भी दृष्टिगत नहीं होती।
2. प्राचीन भारत में गुरु-शिष्य सम्बन्ध अर्थ – आधारित नहीं थे। शिक्षा का आदान-प्रदान शुल्क देकर नहीं किया जाता था। शिष्य को गुरु निःशुल्क शिक्षा प्रदान करता था और उसे अपने पुत्र – सा प्रिय मानता था। शिष्य भी गुरु को साक्षात् परमेश्वर मानता था। शिक्षा क्रय-विक्रय की वस्तु तब नहीं थी।
3. वर्तमान गुरु-शिष्य सम्बन्धों में बड़ा परिवर्तन हो चुका है। अब गुरु अर्थात् शिक्षक के कार्य को व्यवसाय के रूप में चुना जाता है, जिससे गुरु को धनोपार्जन होता है। पहले शिष्य नगरों से दूर एकान्त में रहते थे, अब नगरों में शिक्षण कार्य किया जाता है; अतः शिष्यों को अपनी पढ़ाई के लिए शुल्क अदा करना पड़ता है। शिष्य क्योंकि मूल्य चुकाकर ज्ञान खरीदता है, इसलिए वह गुरु का सम्मान भी नहीं करता है। इसी कारण जो गुरु कभी समाज में श्रद्धा का पात्र था लोग जिसको साक्षात् परमेश्वर मानते थे, आज वही गुरु समाज में निरादृत है।
4. गुरु-शिष्य सम्बन्धों में यह परिवर्तन शिक्षा के व्यवसायीकरण और यूरोप की भोगवादी संस्कृति के प्रभावस्वरूप हुआ है। शिक्षा पेट पालने का साधन बन गई है। शिक्षक धन लेकर शिष्यों को शिक्षा देता है और शिष्य पैसे देकर डिग्रियाँ खरीद रहे हैं।
5. स्वामी विवेकानन्द और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भारत में महत्त्वपूर्ण स्थान तब प्राप्त हुआ, जब उन्हें विदेशों में सम्मान मिल गया। स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका में अपने भाषणों और विचारों से नाम कमाया तो रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने साहित्य में नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। पहले तो भारतवासियों ने उन पर ध्यान नहीं दिया, परन्तु विदेशों में सम्मानित हो जाने पर वे उनकी जय-जयकार करने लगे।
6. शीर्षक – ‘हमारी सांस्कृतिक महानता’, ‘भारतीय संस्कृति’।
(4)
जब लोग त्रस्त हों, पराजित हों या शोकग्रस्त हों, तभी उन्हें | हमारी सहानुभूति, सहायता या प्रोत्साहन की जरूरत होती है। उस समय उनका आत्मविश्वास लड़खड़ा जाता है। उस समय उनकी खिल्ली उड़ाने का था उनकी परेशानी का मजा लूटने का मोह हमें रोकना चाहिए और उन्हें सहारा देना चाहिए, उनकी हिम्मत बढ़ानी चाहिए। जो ऐसा करते हैं वे उनके हृदय में हमेशा के लिए स्थान प्राप्त कर लेते हैं, अपनी लोकप्रियता की परिधि विस्तृत करते हैं।
दूसरों के सुख-दुःखों में सच्चे अन्तःकरण से दिलचस्पी लेना अच्छे संस्कार का लक्षण तो है ही, साथ ही व्यवहारकुशलता भी है, जो लोगों को हमारी ओर आकर्षित करती है। हाँ, इसमें दिखावा, बनावटीपन और ऊपरी शिष्टाचार नहीं होना चाहिए। जो भावना सच्ची होती है, हृदय से निकलती है, वह हृदय को बाँध भी सकती है।
ऊपर से कोई बड़ा आदमी कितना भी आत्मविश्वासी और आत्मतुष्ट क्यों न दिखाई दे, भीतर से वह हमारी आपकी तरह प्रशंसा का, प्रोत्साहन का, स्नेह का भूखा होता है। यदि आप उसे प्रामाणिकतापूर्वक ले सकें तो आप फौरन उसके हृदय के निकट पहुँच जाएँगे। दूसरों की भावनाओं को ठीक-ठीक समझना, उनकी कद्र करना, उनके साथ सच्चाई और स्नेह का व्यवहार करना – यही व्यवहारकुशलता है। इसी से सामाजिक जीवन में लोकप्रियता के दरवाजे खोलने की कुंजी हाथ लगती है। इससे हमारी अपनी सुख शान्ति बढ़ती है, सो अलग।
प्रश्न –
1. लोगों को हमारी सहानुभूति या प्रोत्साहन की कब जरूरत होती है?
2. पराजित या शोकग्रस्त व्यक्ति के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
3. लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए हमें क्या करना चाहिए? सच्ची भावना का क्या प्रभाव पड़ता है?
4. ऊपर से आत्मविश्वासी और आत्मतुष्ट दिखाई देनेवाला व्यक्ति भी किस बात का भूखा होता है?
5. व्यवहारकुशलता के क्या लक्षण हैं?
6. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
1. जब लोग किसी दुःख से त्रस्त, डरे हुए, किसी शोक में डूबे हुए अथवा जीवन के किसी क्षेत्र में पराजित (असफल) हों, तब उन्हें हमारी सहानुभूति और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में जबकि लोगों का आत्मविश्वास क्षीण हो जाता है, तब उन्हें हमारी सहानुभूति या प्रोत्साहन की विशेष आवश्यकता होती है।
2. पराजित, निराश या शोकग्रस्त व्यक्ति के साथ हमारा व्यवहार अत्यन्त सहानुभूतिपूर्ण एवं उन्हें प्रोत्साहित करनेवाला होना चाहिए। उस समय हमें उसका मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, वरन् उसको संकट से जूझने की प्रेरणा देनी चाहिए।
3. लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए हमें उनके सुख – दुःख में तन्मयता से भाग लेना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का आडम्बर या दिखावा नहीं होना चाहिए। हमारे ‘हृदय से निकली हुई हर सच्ची प्रशंसा, प्रोत्साहन और स्नेह की भावना का प्रभाव निश्चय ही दूसरों पर पड़ता है। इससे दुःखी, शोकग्रस्त और पराजित लोगों को नया संबल और प्रोत्साहन मिलता है, जिससे वे स्वयं को विषम परिस्थिति – से निकालने में समर्थ होते हैं।
4. ऊपर से आत्मविश्वासी और सन्तुष्ट दिखाई देनेवाला व्यक्ति भी हमारी प्रशंसा, सहानुभूति और स्नेह का भूखा होता है।
5. दूसरों की भावनाओं को भली-भाँति समझना, उनका सम्मान करना, उनके साथ सच्चा और प्रेम भरा व्यवहार करना ही व्यवहारकुशलता है। दूसरों के सुख-दुःख में सच्चे मन से भाग लेना और संकट के समय उनकी जी भरकर मदद करना, उनकी असफलता में उनकी खिल्ली न उड़ाना आदि व्यवहारकुशलता के लक्षण हैं।
6. शीर्षक – ‘लोकप्रियता की कुंजी’, ‘सहानुभूति और प्रोत्साहन’ अथवा ‘व्यवहारकुशलता और लोकप्रियता’ ।
(5)
हमने मातृभाषा का अनादर किया है। इस पाप का कड़वा फल हमें जरूर भोगना पड़ेगा। हममें और हमारे घर के लोगों के बीच कितना ज्यादा व्यवधान पैदा हो गया है, इसके साक्षी इस सम्मेलन में आनेवाले हम सभी हैं। हम जो कुछ सीखते हैं वह अपनी माताओं को नहीं समझाते और न समझा सकते हैं। जो शिक्षा हमें मिलती है, उसका प्रचार हम अपने घर में नहीं करते और न कर सकते हैं। ऐसा दुःखद परिणाम अंग्रेज कुटुम्बों में कभी नहीं देखा जाता। इंग्लैण्ड में और दूसरे देशों में, जहाँ शिक्षा मातृभाषा में दी जाती है, विद्यार्थी जो कुछ पढ़ते हैं वह घर आकर अपने-अपने माता-पिता को सुनाते हैं और घर के नौकर-चाकरों तथा दूसरे लोगों को भी यह मालूम जाता है। इस तरह जो शिक्षा बच्चों को स्कूल में मिलती है उसका लाभ घर के लोगों को भी मिल जाता है। हम तो स्कूल-कॉलेज में जो कुछ पढ़ते हैं वह वहीं छोड़ आते हैं। विद्या हवा की तरह बहुत आसानी से फैल सकती है, किन्तु कंजूस जैसे अपना धन गाड़कर रखता है, वैसे ही हम अपनी विद्या को अपने मन में ही भरे रखते हैं और इसलिए उसका फायदा औरों को नहीं मिलता। मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर के समान है। जो मातृभाषा का अपमान करता है, वह स्वदेश-भक्त कहलाने लायक नहीं। बहुत-से लोग ऐसा कहते सुने जाते हैं कि हमारी भाषा में ऐसे शब्द नहीं, जिनमें हमारे ऊँचे विचार प्रकट किए जा सकें, किन्तु यह कोई भाषा का दोष नहीं। भाषा का बनाना और बढ़ाना हमारा ही कर्त्तव्य है। एक समय ऐसा था कि जब अंग्रेजी भाषा की भी यही हालत थी। अंग्रेजी का विकास इसलिए हुआ कि अंग्रेज आगे बढ़े और उन्होंने भाषा की उन्नति की। यदि हम मातृभाषा की उन्नति नहीं कर सकें और हमारा यह सिद्धान्त रहा कि अंग्रेजी के जरिए ही हम अपने ऊँचे विचार प्रकट कर सकते हैं और उनका विकास कर सकते हैं तो इसमें जरा भी शक नहीं कि हम सदा के लिए उनके गुलाम बने रहेंगे। जब तक हमारी मातृभाषा हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाए जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं मिल सकेगा।
प्रश्न –
1. इस गद्यांश में किस पाप की बात कही गई है ?
2. हमारे देश में हमारी विद्या का लाभ औरों को क्यों नहीं मिलता ?
3. मातृभाषा के अनादर की तुलना किससे की गई है?
4. राष्ट्र को नया ज्ञान कब तक नहीं मिल सकता ?
5. इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
1. इस गद्यांश में मातृभाषा के अनादर को पाप की बात कहा गया है।
2. हमारे देश में विद्यार्थी स्कूल-कॉलेजों में जो कुछ पढ़ते हैं, उसे वहीं छोड़ आते हैं अथवा जैसे कंजूस धन को गाड़कर 1 रखता है, हम विद्या को अपने मनों में भरकर रखते हैं, उसे दूसरों के साथ नहीं बाँटते; घर आकर उसकी चर्चा नहीं करते। इससे हमारी विद्या का लाभ औरों को नहीं मिल पाता है।
3. मातृभाषा के अनादर की तुलना माँ के अनादर से की गई है।
4. जब तक हमारी राष्ट्रभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाए जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं मिल सकता।
5. शीर्षक – ‘मातृभाषा का महत्त्व’ ।
(6)
साहित्यकार प्रायः अपने देश काल से प्रभावित होता है। जब कोई लहर देश में उठती है तो साहित्यकार के लिए उससे अविचलित रहना असम्भव हो जाता है। उसकी विशाल आत्मा अपने देश बन्धुओं के कष्टों से पीड़ित हो उठती है और इस तीव्र विफलता में वह रो उठता है, पर उसके रुदन में भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होकर भी सार्वभौमिक रहता है। ‘टाम काका की कुटिया’ गुलामी की प्रथा से व्यथित हृदय की रचना है, पर आज उस प्रथा के उठ जाने पर भी उसमें वह व्यापकता है कि हम लोग भी उसे पढ़कर मन्त्रमुग्ध हो -जाते हैं। सच्चा साहित्य कभी पुराना नहीं होता, वह सदा नया बना रहता है। दर्शन और विज्ञान समय की गति के अनुसार बदलते रहते हैं, पर साहित्य तो हृदय की वस्तु है, और मानव हृदय में तबदीलियाँ नहीं होतीं। हर्ष और विस्मय, क्रोध और द्वेष, आशा और भय, आज भी हमारे मन पर उसी तरह अधिकृत हैं, जैसे आदिकवि वाल्मीकि के समय में, और कदाचित् अनन्त तक रहेंगे। रामायण का समय अब नहीं है, महाभारत का समय भी अब अतीत हो गया, पर ये ग्रन्थ अभी तक नए हैं। साहित्य ही सच्चा इतिहास है; क्योंकि उसमें अपने देश और काल का जैसा चित्र होता है वैसा कोरे इतिहास में नहीं हो सकता । घटनाओं की तालिका इतिहास नहीं है और न राजाओं की लड़ाइयाँ हीइतिहास हैं । इतिहास जीवन के विभिन्न अंगों की प्रगति का नाम है और जीवन पर साहित्य से अधिक प्रकाश और कौन वस्तु डाल सकती है; क्योंकि साहित्य अपने देश काल का प्रतिबिम्ब होता है। – प्रेमचन्द
प्रश्न –
1. साहित्यकार पर क्या चीज प्रभाव डालती है?
2. सच्चे साहित्य की क्या पहचान है ?
3. साहित्य सच्चा इतिहास क्यों है?
4. प्रेमचन्द ने ‘इतिहास’ किसे कहा है?
5. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
उत्तर—
1. साहित्यकार हमेशा अपने देश काल से प्रभावित रहता है। जब कोई विचारधारा अथवा समस्या देश में उत्पन्न होती है। तो साहित्यकार के लिए उससे दूर रहना कठिन हो जाता है।
2. सच्चा साहित्य कभी पुराना नहीं होता, वह हमेशा नया बना रहता है। दर्शन और विज्ञान तो समय की गति के अनुसार बदलते रहते हैं, परन्तु साहित्य हृदय की वस्तु है, और मानव हृदय में बदलाव नहीं आते।
3. साहित्य ही सच्चा इतिहास है; क्योंकि उसमें अपने देश और काल का जैसा चित्र होता है वैसा कोरे इतिहास में नहीं हो सकता। वास्तव में इतिहास जीवन के विभिन्न अंगों की प्रगति का नाम है और उस पर साहित्य से अधिक प्रकाश कोई नहीं डाल सकता; इसीलिए साहित्य ही सच्चा इतिहास होता है।
4. प्रेमचन्द ने जीवन के विभिन्न अंगों की प्रगति (के व्याख्यान) को इतिहास कहा है।
5. शीर्षक ‘साहित्य का स्वरूप’, ‘देश-काल और साहित्य’ ।
(7)
सामाजिक समानता से अभिप्राय है कि सामाजिक क्षेत्र में जाति, धर्म, व्यवसाय, रंग आदि के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न किया जाए। सबको समान समझा जाए और सबको समान सुविधाएँ दी जाएँ। हमारे देश में सामाजिक समानता का अभाव है। जाति प्रथा के कारण करोड़ों व्यक्ति समाज में अछूत के रूप में रहते हैं। उन्हें समाज से बहिष्कृत समझा जाता है और सामाजिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। हमारे समाज में लड़कियों के साथ भी भेदभाव बरता जाता है। माता-पिता भी उन्हें वे सुविधाएँ नहीं देते, जो वे अपने लड़कों को देते हैं। इस प्रकार की असमानता से बहुत-सी लड़कियों का शारीरिक और मानसिक विकास सुचारु रूप से नहीं हो पाता। इससे समाज की उन्नति में बाधा पड़ती है। इस प्रकार की असमानता का दूर होना आवश्यक है। नागरिक समता का अर्थ है कि राज्य में नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हों। कानून और न्यायालयों में गरीब-अमीर और ऊँच-नीच का कोई भेद न किया जाए। दण्ड से कोई अपराधी बच न सके। इसी प्रकार राज्य के प्रत्येक नागरिक को राज्य कार्य में समान रूप से भाग लेने का, मत देने का, सरकारी नौकरी प्राप्त करने का तथा राज्य के ऊँचे-से-ऊँचे पद को अपनी योग्यता के बल पर प्राप्त करने का अधिकार राजनैतिक समानता का द्योतक है।
प्रश्न – 1. सामाजिक समानता से क्या अभिप्राय है?
2. हमारे देश में सामाजिक असमानता किस रूप में है?
3. नागरिक समानता से क्या अभिप्राय है?
4. लड़कियों का शारीरिक और मानसिक विकास सुचारु रूप से क्यों नहीं हो पाता ?
5. राजनैतिक समानता किसे कहते हैं?
6. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए ।
उत्तर-
1. समाज में जाति, धर्म, क्षेत्र, व्यवसाय, रंग आदि के आधार पर भेदभाव न बरतना तथा सभी को समान सुविधाएँ एवं अधिकार प्रदान कराना सामाजिक समानता कहलाता है।
2. हमारे देश में सामाजिक असमानता अनेक रूपों में है। जाति प्रथा सामाजिक असमानता का एक बड़ा कारण है। इसके चलते करोड़ों लोगों को अछूत समझा जाता है। उन्हें सामाजिक तथा धार्मिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है। लड़कियों के साथ भी भेदभाव किया जाता है। उन्हें प्रायः उन सुविधाओं से भी वंचित रखा जाता है, जो लड़कों को दी जाती हैं।
3. नागरिक समानता से अभिप्राय है कि राज्य में सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हों। जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव न किया जाए। अमीर-गरीब, ऊँच-नीच सभी को न्यायालयों से समान न्याय मिलें। अपराधी किसी भी जाति या वर्ग का हो, उसे दण्डित किया जाए।
4. लड़कियों का शारीरिक और मानसिक विकास सुचारु रूप से इसलिए नहीं हो पाता कि माता-पिता लड़के और लड़की में भेदभाव बरतते हैं। प्रायः वे उन्हें वे सुविधाएँ नहीं देते, जो अपने लड़कों को देते हैं।
5. राजनैतिक समानता से अभिप्राय है कि राष्ट्र के सभी नागरिकों को राज्य की ओर से समान अधिकार प्राप्त हों। सभी को मतदान का अधिकार हो, सभी अपनी योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकें और राज्य का ऊँचे-से-ऊँचा पद प्राप्त कर सकें। राज्य की ओर से यदि ये सारे अधिकार बिना किसी भेदभाव के सबको प्राप्त हों तो इसे हम राजनैतिक समानता कहेंगे ।
6. शीर्षक – ‘समानता : समय की माँग ।
(8)
गतिशील व्यक्ति और संस्था को चाहिए कि वे निरन्तर दो तरह की तुलना करते रहें। अपनी वर्तमान स्थिति की तुलना अपने पिछले दिनों और पिछली स्थिति से तथा अपनी तुलना अपने ही समान स्तर के लोगों. संस्थाओं और संघों से। हम कल कैंसे थे? क्या हमने कल की अपेक्षा अपने को ज्यादा शक्तिशाली, प्राणवान्, गतिशील, उपयोगी और आकर्षक बनाया है? क्या हम अपेक्षाकृत मैले और बासी तो नहीं पड़ गए हैं? कहीं हम दूसरों की अपेक्षा पिछड़ तो नहीं रहे हैं? इस बीच दूसरों ने जो आकर्षण, योग्यता और शक्ति अपने में विकसित कर ली है, क्या हम वैसा नहीं कर सके ? हमें कल के लिए अपने में क्या कुछ ऐसा नया और उपयोगी कदम जोड़ देना होगा, जिसेसे हमारी वर्तमान स्थिति में नया प्राण-प्रवेम आ जाए ?
प्रश्न-
1. गतिशील व्यक्ति और संस्था के लिए क्या आवश्यक है ?
2. हम अपनी पिछली स्थिति के साथ अपनी वर्तमान स्थिति की तुलना किस-किस प्रकार कर सकते हैं?
3. इस तुलना के पश्चात् हमें क्या कदम उठाने चाहिए?
4. इस तुलना से व्यक्ति और संस्थाओं को क्या लाभ होगा?
5. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए ।
उत्तर-
1. गतिशील व्यक्ति और संस्था के लिए आवश्यक है कि वे अपने पिछले समय से तथा अपने जैसे ही लोगों और संस्थाओं से अपनी तुलना करते रहें।
2. हम यह तुलना इस प्रकार कर सकते हैं कि हम पहले की तुलना में बासी और मैले तो नहीं हो गए हैं अथवा क्या हम पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली, प्राणवान्, गतिशील, उपयोगी और आकर्षक बन रहे हैं।
3. इस तुलना के बाद हमें स्वयं को आकर्षक, योग्य तथा शक्तिशाली बनाने के लिए अपने अतीत में कुछ नवीनतम और उपयोगी कदम उठाने चाहिए।
4. इस तुलना से व्यक्ति और संस्था दोनों को लाभ प्राप्त होगा। दोनों ही उन्नत तथा शक्तिशाली बनेंगे।
5. शीर्षक – ‘विकास और आत्मावलोकन’ ।
(9)
यह निर्विवाद सत्य है कि व्यक्तित्व का समुचित विकास अपनी ही भाषा के पठन-पाठन से होता है। आज देश में जिस प्रकार अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की बाढ़ आई हुई है तथा जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम द्वारा पढ़ाने को अनिवार्य मानने लगा है, उसे देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि हिन्दी हमारे संविधान द्वारा स्वीकृत हमारे देश की राष्ट्रभाषा है। विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ने के कारण बालक अपने विचारों को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता। वह यथेच्छं ज्ञान भी प्राप्त नहीं कर पाता; क्योंकि अंग्रेजी में पढ़ी हुई सामग्री को वह ठीक से समझता नहीं, रट लेता है। इसीलिए शिक्षाशास्त्री मानते हैं कि प्रारम्भिक कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए।
प्रश्न-
1. व्यक्तित्व का सही विकास कैसे होता है?
2. बच्चे स्वयं को ठीक से अभिव्यक्त क्यों नहीं कर पाते ?
3. क्यों नहीं लगता कि हिन्दी संविधान द्वारा स्वीकृत भाषा है?
4. मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण का क्या लाभ है?
5. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए ।
उत्तर-
1. व्यक्तित्व का सही विकास अपनी ही भाषा (मातृभाषा) के पठन-पाठन से होता है।
2. विदेशी भाषा का माध्यम होने के कारण बच्चे अपने विचारों को पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं।
3. आजकल सर्वत्र अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों का बोलबाला है। प्रत्येक व्यक्ति अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम द्वारा पढ़ाना अनिवार्य मानने लगा है। यह देखकर ऐसा नहीं लगता कि हिन्दी इस देश में संविधान द्वारा स्वीकृत राष्ट्रभाषा है।
4. मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण का लाभ यह है कि इससे बालक यथेच्छ ज्ञान को ठीक से प्राप्त करने और उसी क्षमता से व्यक्त करने में निपुणता प्राप्त कर लेता है।
5. शीर्षक – ‘शिक्षा – माध्यम और मातृभाषा’ ।
(10)
मुंशी प्रेमचन्द का सम्पूर्ण चिन्तन समाजोन्मुख रहा है। अपने साहित्य के द्वारा उन्होंने समाज को दिशा प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण दायित्व निभाया है। प्रगतिशील लेखक संघ से जीवनभर जुड़े रहनेवाले प्रेमचन्दजी का साहित्य दलितों और शोषितों की मर्म-व्यथा का बखान करता है। उन्होंने महाजनी सभ्यता का डटकर विरोध किया। उनके साहित्य में ऐसी व्यवस्था के प्रति अनेक बार तीव्र आक्रोश व्यक्त किया गया है- “महाजनी सभ्यता के पास ईर्ष्या, जोर-जबरदस्ती, बेईमानी, झूठ, मिथ्या अभियोग, आरोप, वेश्यावृत्ति, व्यभिचार, चोरी, डाके आदि का कोई इलाज नहीं है। ये सारी बुराइयाँ दौलत की देन हैं, पैसे के प्रसाद हैं, महाजनी सभ्यता ने इनकी सृष्टि की है।” प्रेमचन्दजी ने समाज की बुराइयों को दूरकर नव-निर्माण की प्रेरणा प्रदान की है। • समाज की जर्जर व्यवस्था के परिवर्तन के लिए उन्होंने बहुमूल्य साहित्य की सृष्टि की है। सामाजिक परिवर्तन के विषय में प्रेमचन्दजी के विचारों को व्यक्त करते हुए लेखक ने लिखा है – ” जो व्यवस्था समाज के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाती, उसका मिट जाना निश्चित है। कोई उसको बचा नहीं सकता।”
प्रश्न –
1. प्रेमचन्दजी का चिन्तन किस प्रकार का है?
2. प्रेमचन्द के साहित्य में किनकी पीड़ा है?
3. प्रेमचन्द ने किसका विरोध किया?
4. प्रेमचन्द ने साहित्य की रचना क्यों की?
5. प्रेमचन्द किस व्यवस्था का मिट जाना निश्चित मानते हैं?
6. इस गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए ।
उत्तर-
1. प्रेमचन्दजी का सम्पूर्ण चिन्तन समाजोन्मुख ही रहा है। अपने साहित्य के माध्यम से उन्होंने समाज को नई दिशा दी है।
2. प्रेमचन्द के साहित्य में दलितों एवं शोषितों की पीड़ा है।
3. प्रेमचन्द ने दौलत पर पनपनेवाली महाजनी सभ्यता का विरोध किया है।
4. प्रेमचन्द ने साहित्य की रचना समाज की जर्जर व्यवस्था को परिवर्तित करने के लिए की है।
5. प्रेमचन्द उस जर्जर सामाजिक व्यवस्था का मिट जाना निश्चित मानते थे, जो समाज के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाती।
6. शीर्षक – ‘प्रेमचन्द का साहित्य’ ।
