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UP Board Class 10 Hindi Chapter 2 – ममता (गद्य खंड)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 2 – ममता (गद्य खंड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 2 ममता (गद्य खंड)

जीवन-परिचय

जयशंकर प्रसाद बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। उनका जन्म 1889 ई. में काशी के ‘सुँघनी साहू’ नामक प्रसिद्ध वैश्य परिवार में हुआ था। उनके यहाँ तम्बाकू का व्यापार होता था। उनके पिता देवीप्रसाद और पितामह शिवरत्न साहू थे। इनके पितामह परम शिवभक्त और दयालु थे। उनके पिता भी अत्यधिक उदार और साहित्य प्रेमी थे। प्रसाद जी का बचपन सुखमय था। बाल्यकाल में ही उन्होंने अपनी माता के साथ धारा क्षेत्र, ओंकारेश्वर, पुष्कर, उज्जैन और ब्रज आदि तीर्थों की यात्राएँ कीं । यात्रा से लौटने के बाद पहले उनके पिता का और फिर चार वर्ष पश्चात् ही उनकी माता का निधन हो गया। प्रसाद जी की शिक्षा-दीक्षा और पालन-पोषण का प्रबन्ध उनके बड़े भाई शम्भूरत्न ने किया और क्वीन्स कॉलेज में उनका प्रवेश ( दाखिला ) कराया, किन्तु उनका मन वहाँ न लगा। उन्होंने अंग्रेजी और संस्कृत का अध्ययन घर पर ही किया। वे साहित्यिक पुस्तकें पढ़ते और काव्य रचना करते रहे। पहले तो उनके भाई उनकी काव्य-रचना में बाधा डालते रहे, परन्तु जब उन्होंने देखा कि प्रसाद जी का मन काव्य-रचना में अधिक लगता है, तब उन्होंने इसकी पूरी स्वतन्त्रता उन्हें दे दी। प्रसाद जी स्वतन्त्र रूप से काव्य-रचना के मार्ग पर बढ़ने लगे। इसी बीच उनके बड़े भाई शम्भूरत्न जी का निधन हो जाने से घर की स्थिति खराब हो गई। व्यापार भी नष्ट हो गया। पैतृक सम्पत्ति बेचने से कर्ज से मुक्ति तो मिली, पर वे क्षय रोग का शिकार होकर मात्र 47 वर्ष की आयु में 15 नवम्बर, 1937 को इस संसार से विदा हो गए।
रचनाएँ
जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ हस्ताक्षर हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं
  • काव्य आँसू, कामायनी, चित्राधार, लहर और झरना ।
  • कहानी आँधी, इन्द्रजाल, छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप आदि ।
  • उपन्यास तितली, कंकाल और इरावती (अपूर्ण) ।
  • नाटक सज्जन, कल्याणी- परिणय, चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, प्रायश्चित्त, जनमेजय का नागयज्ञ, विशाखा, ध्रुवस्वामिनी आदि ।
  • निबन्ध काव्य- कला एवं अन्य निबन्ध ।
भाषा-शैली
प्रसाद जी की भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता है। भावमयता उनकी भाषा की प्रमुख विशेषता है। इनकी भाषा में मुहावरों, लोकोक्तियों तथा विदेशी शब्दों का प्रयोग न के बराबर हुआ है। प्रसाद जी ने विचारात्मक, चित्रात्मक, भावात्मक, अनुसन्धानात्मक तथा इतिवृत्तात्मक शैली का प्रयोग किया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
युग प्रवर्तक साहित्यकार जयशंकर प्रसाद ने गद्य और काव्य दोनों ही विधाओं रचना करके हिन्दी साहित्य को अत्यन्त समृद्ध किया। ‘कामायनी’ महाकाव्य उनकी कालजयी कृति है, जो आधुनिक काल की सर्वश्रेष्ठ रचना कही जा सकती है। अपनी अनुभूति और गहन चिन्तन को उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है। हिन्दी साहित्य में जयशंकर प्रसाद का स्थान सर्वोपरि है।
पाठ का सार
परीक्षा में ‘पाठ के सारांश’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाएगा। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।
ममता के मन की वेदना
ममता रोहतास दुर्ग के मन्त्री चूड़ामणि की इकलौती पुत्री थी, जो बाल्यावस्था में ही विधवा हो गई थी। वह अपने दुर्ग के मुख्य द्वार के पास कमरे में बैठी हुई सोन नदी के उफान व प्रवाह को देख रही थी। वह हर पल व्याकुल रहती थी, मानो उसके हृदय के भीतर भी विचारों की आँधी चल रही हो तथा उसकी आँखों से निरन्तर आँसू बहतें रहते थे। इसी बीच उसके पिता चूड़ामणि ने उसके कमरे में प्रवेश किया, किन्तु ममता अपने पिता के आगमन को न जान सकी। उसके पिता उसके लिए चिन्तित होते हुए वापिस लौट गए।
चूड़ामणि का लालची स्वभाव
एक पहर बाद चूड़ामणि पुनः वापस आए। उनके पीछे दस सैनिक चाँदी के थाल में सोना लिए खड़े थे। वे कमरे में थाल रखकर चले गए। पिता चूड़ामणि ने ममता के पूछने पर बताया कि यह उसके लिए उपहार है। ममता बड़े-बड़े थालों में सोने के ढेर देखकर अपने पिता से नाराज हो गई और उसे लौटाने के लिए कहा।
रोहतास दुर्ग के तोरण द्वार पर डोलियों का आगमन और ममता का गायब होना
दूसरे दिन रोहतास दुर्ग के तोरण द्वार पर डोलियों की कतारें आ रही थीं, तब ब्राह्मण चूड़ामणि से रहा नहीं गया और उसने डोलियों के आवरण खुलवाने चाहे, किन्तु पठानों ने इसे महिलाओं का अपमान समझा। इसी बात पर तलवारें निकल आईं, चूड़ामणि वहीं मारा गया। रोहतास के राजा-रानी और खजाना सब शेरशाह के हाथ आ गए, किन्तु ममता उनके हाथ न लगी ।
ममता की झोंपड़ी में शरणार्थी का आगमन
इस घटना के काफी समय बाद बनारस के उत्तर में धर्मचक्र विहार में बने मौर्य और गुप्त सम्राटों के कीर्ति स्तम्भ, जो अब लगभग खण्डहर बन चुके थे, वहाँ वृक्षों की छाया में बैठी ममता पाठ कर रही थी। तभी हताश-सा एक व्यक्ति जोकि मुगल शासक हुमायूँ था, ममता के सामने आया और ‘माता मुझे आश्रय चाहिए’ कहकर शरण माँगने लगा। पहले तो ममता ने उसे आश्रय न देने के बारे में सोचा, परन्तु बाद में अपने अतिथि की सेवा करने के कर्त्तव्य के बारे में सोचकर उसे अपनी झोंपड़ी में पानी व आश्रय देकर स्वयं पास के खण्डहर में चली गई।
सैनिकों द्वारा ममता की खोज
अगले दिन प्रातःकाल ही बहुत-से सैनिक ममता को ढूँढ़ते हुए वहाँ आ गए। ममता खण्डहर की ओट से सब देख रही थी, तभी उस मुगल ने उन्हें आवाज देकर बुलाया और अपने अधीन सैनिकों से कहा कि मैं उस स्त्री को कुछ दे न सका, यहाँ उसकी झोंपड़ी के स्थान पर उसके लिए एक महल बनवा देना।
ममता की वृद्धावस्था तथा मुगल सैनिकों द्वारा झोंपड़ी की खोज
चौसा के मैदान में पठान और मुगलों के बीच हुए इस युद्ध को बहुत समय बीत गया। ममता का शरीर बहुत दुर्बल हो चुका था, वह मरण अवस्था में थी। उसी समय एक अश्वारोही वहाँ आया और नक्शा देखकर वह स्थान ढूंढने लगा। बात सैंतालीस वर्ष पुरानी थी। तब ममता ने उसे बुलाकर बताया कि मुझे नहीं पता कि वह कौन था, किन्तु एक मुगल ने यहाँ रात बिताई थी । मैं जीवनभर अपनी झोंपड़ी टूटने से डरती रही, परन्तु अब मैं मृत्यु की गोद में जा रही हूँ। इसलिए अब तुम यहाँ जो चाहे बनवाओ।
अकबर के द्वारा बनवाया गया अष्टकोण मन्दिर
उसके पश्चात् वहाँ पर एक सुन्दर अष्टकोण मन्दिर बनवाया गया और उस पर लिखवाया गया ” सातों देश के राजा हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था। उसके पुत्र अकबर ने उनकी याद में यह गगनचुम्बी मन्दिर बनवाया”, किन्तु खेद की बात यह थी कि उसमें ममता का कहीं नाम न था।
गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. रोहतास दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता, सोन नदी के तीक्ष्ण गम्भीर प्रवाह को देख रही है। ममता विधवा थी । उसका यौवन सोन नदी के समान ही उमड़ रहा था। मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिए, वह सुख के कंटक शयन में विकल थी। वह रोहतास-दुर्गपति के मन्त्री चूड़ामणि की अकेली दुहिता थी, फिर उसके लिए कुछ अभाव होना असम्भव था, परन्तु वह विधवा थी – हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है तब उसकी विडम्बना का कहाँ अन्त था? M. Imp. [2024, 22, 14, 12, 10]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ग) उपरोक्त गद्यांश में हिन्दू-विधवा की स्थिति कैसी बताई गई है?
(घ) गद्यांश के आधार पर संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी कौन है?
(ङ) ममता कौन थी और उसकी क्या स्थिति थी?
उत्तर
(क) सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘गद्य खण्ड’ में संकलित ‘ममता’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक ‘जयशंकर प्रसाद’ हैं।
(ख) जयशंकर प्रसाद जी ममता के यौवन की सोन नदी के प्रबल वेग से तुलना करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार सोन नदी अपने तेज बहाव से उफनती हुई बह रही है, उसी प्रकार ममता का यौवन भी पूर्ण रूप से अपने उफान पर है। ममता रोहतास दुर्गपति के मन्त्री की इकलौती पुत्री है, जोकि बाल-विधवा है। रोहतास दुर्गपति के मन्त्री की पुत्री होने के कारण ममता सभी प्रकार के भौतिक सुख-साधनों से सम्पन्न है, परन्तु वह विधवा जीवन के कटु सत्य को अभिशप्त रूप में झेलने के लिए विवश है। उसके मन-मस्तिष्क में दुःख रूपी आँधी तथा आँखों से आँसू बह रहे हैं। उसका मन भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों और भावों की आँधी से भरा हुआ है। उसकी स्थिति काँटों की शय्या पर सोने वाले व्याकुल व्यक्ति के समान है अर्थात् जिस प्रकार काँटों की शय्या पर सोने वाला व्यक्ति हर समय व्याकुल रहता है, उसी प्रकार सभी प्रकार के भौतिक सुख-साधनों से परिपूर्ण होते हुए भी ममता का जीवन कष्टों से परिपूर्ण है । हिन्दू समाज में विधवा स्त्रियों को संसार का सबसे तुच्छ प्राणी माना जाता है । प्रत्येक विधवा स्त्री को विभिन्न प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं तथा समाज में अनेक प्रतिबन्धों का सामना करना पड़ता है।
(ग) उपरोक्त गद्यांश में हिन्दू-विधवा की स्थिति को दयनीय, शोचनीय, तुच्छ और उस प्राणी के समान बताया गया है, जिसे कोई आश्रय नहीं देना चाहता है। वह तरह-तरह के दुःख सहने के लिए विवश होती है।
(घ) गद्यांश के आधार पर संसार में सबसे तुच्छ तथा निराश्रय प्राणी हिन्दू-विधवा है, क्योंकि हिन्दू समाज में विधवा को सही दृष्टि से नहीं देखा जाता, उसका जीवन दुखी, उपेक्षित और निराश्रित (अनाथ) प्राणी के समान होता है। इस कारण वह अपने जीवन को भार समान समझने लगती है।
(ङ) ममता रोहताश – दुर्गपति के मन्त्री चूड़ामणि की विधवा पुत्री थी। वह अपने यौवन के समान उमड़ते सोन नदी के तेज बहाव को निहार रही थी। उसके लिए भौतिक सुख-साधनों का अभाव नहीं था, किन्तु विधवा . होने के कारण वह अन्तस्थल में व्याकुल रहती थी ।
2. “हे भगवान! तब के लिए! विपद के लिए! इतना आयोजन ! परमपिता की इच्छा के विरुद्ध इतना साहस ! पिताजी, क्या भीख न मिलेगी? क्या कोई हिन्दू भू-पृष्ठ पर न बचा रह जाएगा, जो ब्राह्मण को दो मुट्ठी अन्न सके? यह असम्भव है। फेर दीजिए पिताजी, मैं काँप रही हूँ इसकी चमक आँखों को अन्धा बना रही है।’ ” V.Imp. [2020, 19, 13]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) इस गद्यांश में ममता की किस मनोवृत्ति को स्पष्ट किया गया है?
(घ) अपने पिता का कौन-सा कृत्य ममता को परमपिता की इच्छा के विरुद्ध लगा?
अथवा उपर्युक्त गद्यांश में किस कार्य को ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया गया है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत्।
(ख) जयशंकर प्रसाद जी कहते हैं कि चाँदी के दस थालों में लाए गए ढेर सारे सोने को देखकर ममता चकित होकर अपने पिता से कहती है कि. हे भगवान! उस समय के लिए जब आपका मन्त्रित्व न रहेगा, उन विपदा भरे दिनों के लिए इतना सारा आयोजन अभी से ही, यह अच्छा नहीं है। रिश्वत में लिया गया इतना सारा सोना लेकर आपने ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कार्य किया है। यदि ईश्वर की इच्छा से हमें दुःख मिलने वाला है, तो हमें उसे सहने के लिए सहर्ष तैयार रहना चाहिए। पिताजी! मन्त्रित्व न रहने पर भी हमें पेट भरने के लिए कम-से-कम भीख तो मिल ही जाएगी। इस पृथ्वी पर उस समय भी बहुत से हिन्दू ऐसे होंगे, जो हम ब्राह्मणों को दो मुट्ठी अनाज भीख में दे देंगे। पिताजी, इस रिश्वत के सोने को वापस कर दीजिए। इनकी चमक मुझे परेशान कर रही है और मेरी आँखों को कष्ट दे रही है।
(ग) इस गद्यांश में ममता की भाग्यवादी, करुणामयी, निर्लोभी तथा ईश्वरवादी मनोवृत्ति को स्पष्ट किया गया है।
(घ) ममता को अपने पिता द्वारा उत्कोच ( रिश्वत ) के रूप में लिया गया धन (सोना) परमपिता की इच्छा के विरुद्ध लगा ।
3. काशी के उत्तर में धर्मचक्र विहार मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खण्डहर था। भग्न चूड़ा, तृण गुल्मों से ढके हुए प्राचीन, ईंटों के ढेर में बिखरी हुई भारतीय शिल्प की विभूति, ग्रीष्म की चन्द्रिका में अपने को शीतल कर रही थी। जहाँ पंचवर्गीय भिक्षु गौतम का उपदेश ग्रहण करने के लिए पहले मिले थे, उसी स्तूप, के भग्नावशेष की मलिन छाया में एक झोंपड़ी के दीपालोक में एक स्त्री पाठ कर रही थी
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मा ये जनाः पर्युपासते -” Imp [2023, 11]
प्रश्न 
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) धर्मचक्र कहाँ स्थित था?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) प्रसाद जी कहते हैं कि काशी के उत्तर में अनेक बौद्ध स्मारक हैं। इन स्मारकों को मौर्य वंश एवं गुप्त वंश की शान बढ़ाने के लिए बनवाया गया था। ये स्मारक अब टूट-फूट चुके हैं। इनकी टूटी-फूटी चोटियाँ, दीवारें, कंगूरे खण्डहर बन गए हैं। इन पर झाड़ियाँ उग आई हैं, पत्ते बिखरे हैं। इन खण्डहरों को देखकर ऐसा लगता है मानो ईंट के ढेर में बिखरी हुई भारतीय शिल्पकला की आत्मा ग्रीष्म ऋतु की चाँदनी से स्वयं को शीतलता प्रदान कर रही थी ।
(ग) धर्मचक्र काशी नगर के उत्तर में स्थित है, जिसे भगवान गौतम बुद्ध ने सारनाथ नामक स्थान पर स्थापित किया था।
4. “मैं ब्राह्मणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म-अतिथि देव की उपासना का पालन करना चाहिए, परन्तु यहाँ ….नहीं नहीं, सब विधर्मी दया के पात्र नहीं। परन्तु यह दया तो नहीं…..कर्त्तव्य करना है। तब?” मुगल अपनी तलवार टेककर उठ खड़ा हुआ ममता ने कहा-
“क्या आश्चर्य है कि तुम भी छल करो, ठहरो ।”
“छल! नहीं तब नहीं स्त्री ! जाता हूँ, तैमूर का वंशधर स्त्री से छल करेगा? जाता हूँ।
भाग्य का खेल है। ” [2023]
प्रश्न
(क) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) “छल! नहीं तब नहीं स्त्री! जाता हूँ, तैमूर का वंशधर स्त्री से छल करेगा? जाता हूँ” वाक्य किसने कहा और क्यों ?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहता है कि जब हुमायूँ ममता की झोपड़ी में शरण लेता है, तब ममता के मन में अन्तर्द्वन्द्व चलता है कि वह हुमायूँ की मदद करे अथवा नहीं । ममता मन-ही-मन विचार करती है कि मैं तो ब्राह्मणी हूँ और सच्चे ब्राह्मण कभी अपने धर्म से विमुख नहीं होते, इसलिए मुझे तो अपने अतिथि-धर्म पालन करना ही चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए, परन्तु दूसरी ओर उसके मन में विचार आया कि यह तो अत्याचारी, पापी है। इन मुगलवंशियों ने तो मेरे पिताजी की हत्या की थी। यदि कोई और पापी होता, तो उसके प्रति दया दिखाकर उसे सहारा दिया जा सकता था, परन्तु पिता की हत्या करने वाले को कभी नहीं । एक बार पुनः उसका मन विचलित होना आरम्भ हो जाता है और वह कहती है कि मैं इसके ऊपर दया – भाव नहीं दिखा रही हूँ, परन्तु अपना कर्त्तव्य निर्वाह कर रही हूँ।
(ग) प्रस्तुत वाक्य हुमायूँ द्वारा ममता कहा गया है। हुमायूँ ने यह वाक्य इसलिए कहा, क्योंकि वह ममता के साथ छल या उसे भयभीत करके उसकी झोंपड़ी में आश्रय नहीं पाना चाहता था, बल्कि वह सम्मान के साथ आश्रय पाना चाहता था।
5. अश्वारोही पास आया। ममता ने रुक-रुककर कहा- “मैं नहीं जानती कि वह शहंशाह था या साधारण मुगल; पर एक दिन इसी झोंपड़ी के नीचे वह रहा। मैंने सुना था कि वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चुका था। मैं आजीवन अपनी झोंपड़ी खो जाने के डर से भयभीत रही। भगवान ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ। अब तुम इसका मकान बनाओ या महल मैं अपने चिर- विश्राम गृह में जाती हूँ।” M. Imp [2023, 19, 12, 10]
प्रश्न
(क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) वह आजीवन क्यों भयभीत रही?
अथवा ममता के आजीवन भयभीत रहने का क्या कारण था?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत्।
(ख) प्रसाद जी कहते हैं कि मरणासन्न पड़ी ममता ने अश्वारोही सैनिक को अपने पास बुलाया और कहा कि किसी समय इस झोंपड़ी में रात बिताने वाले व्यक्ति ने एक सैनिक को यहाँ घर बनवाने के लिए कहा था। मैं इस झोंपड़ी को खोने के भय से पूरी जिन्दगी डरती रही, क्योंकि इस झोंपड़ी के साथ उसके जीवन की बहुत-सी यादें जुड़ी हुई थीं। मैं जब तक जिन्दा रही, तक ईश्वर ने इसे बचाए रखने की मेरी प्रार्थना सुन ली। अब मैं यह दुनिया छोड़कर जा रही हूँ। अब तुम चाहे मकान बनवाओ या महल। मैं तो मृत्यु की गोद में चिर-विश्राम करने जा रही हूँ, जहाँ मुझे अनन्त काल तक विश्राम मिलेगा। तब
(ग) ममता आजीवन इसलिए भयभीत रही, क्योंकि पता नहीं कब उसकी झोंपड़ी को गिराकर महल बनाने का आदेश दे दिया जाए और उसके सामने रहने की संमस्या आ जाए। वह जीवनभर अपनी झोंपड़ी छोड़ना नहीं चाहती थी ।

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