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UP Board Class 10 Hindi Chapter 3 – सवैये, कवित्त (काव्य-खण्ड)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 3 – सवैये, कवित्त (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 3 सवैये, कवित्त (काव्य-खण्ड)

जीवन-परिचय
हिन्दी साहित्य और ब्रज भाषा प्रेमी कृष्णभक्त मुसलमान कवियों में रसखान अग्रगण्य हैं। इनका मूल नाम सैयद इब्राहिम माना जाता है। इनका जन्म 1533 ई. में दिल्ली में हुआ था। इनका जीवन वृत्त अभी भी अन्धकार में है अर्थात् विद्वानों के बीच इनके जन्म के सम्बन्ध में अभी भी मतभेद है।
इनके द्वारा रचित ग्रन्थ ‘प्रेमवाटिका’ से प्राप्त संकेत के आधार पर इनका सम्बन्ध दिल्ली राजवंश से माना जाता है। रसखान रात-दिन श्रीकृष्ण भक्ति में तल्लीन रहते थे।
इन्होंने गोवर्धन धाम अर्थात् गोकुल में जाकर अपना जीवन श्रीकृष्ण के भजन-कीर्तन में लगा दिया। ऐसा कहा जाता है कि इनकी कृष्णभक्ति से प्रभावित होकर गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। . वैष्णव धर्म में दीक्षा लेने पर इनका लौकिक प्रेम अलौकिक प्रेम में बदल गया और रसखान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त बन गए। इनकी मृत्यु 1618 ई. में हो गई।
साहित्यिक परिचय
रसखान ने श्रीकृष्ण की भक्ति में पूर्ण रूप से अनुरक्त होकर अपने काव्य का सृजन किया। अरबी और फारसी भाषा पर इनकी बहुत अच्छी पकड़ थी। इन्होंने काव्य और पिंगलशास्त्र का भी गहन अध्ययन किया। संयोग और वियोग दोनों पक्षों की अभिव्यक्ति इनके काव्य में देखने को मिलती है। सरसता, सरलता एवं माधुर्य इनके काव्य की विशेषताएँ हैं।
कृतियाँ (रचनाएँ)
1. सुजान रसखान इसमें कवित्त, दोहा, सोरठा और सवैये हैं, यह 139 छन्दों का संग्रह है। यह भक्ति और प्रेम विषय पर मुक्त काव्य है।
2. प्रेमवाटिका इसमें केवल 25 दोहे हैं। इस रचना में प्रेम रस का पूर्ण परिपाक हुआ है। रसखान की समग्र रचनाएँ कृष्णभक्ति एवं ब्रज प्रेम में लिप्त हैं।
भाषा-शैली
इनकी कविता में जनसाधारण योग्य ब्रजभाषा का ही प्रयोग हुआ है। इनके काव्य में भाषा का स्वरूप अत्यन्त सरल व सहज है। अनेक स्थानों पर प्रचलित मुहावरों का प्रयोग इनकी रचनाओं में मिलता है। दोहा, कवित्त और सर्वैया तीनों छन्दों पर इनका पूर्ण अधिकार था। रसखान ने अपने काव्य में सरल और परिमार्जित शैली का प्रयोग किया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
कृष्णभक्त कवियों में रसखान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे अपने प्रेम की तन्मयता, भाव-विह्वलता और आसक्ति के उल्लास के लिए जितने प्रसिद्ध हैं, उतने ही अपनी भाषा की मार्मिकता, शब्दों के चयन और व्यंजक शैली के लिए प्रसिद्ध हैं, इनका श्रृंगार वर्णन भावुक हृदय की उन्मुक्त अभिव्यक्ति है। इनके काव्य इनके स्वच्छन्द मन के सहज उद्गार हैं।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
सवैये
1. मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन।।
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यौ कर छत्र पुरंदर-धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन ।। [2018]
शब्दार्थ ग्वारन – ग्वाले; मँझारन-बीच में; ध – उठाना, पुरंदर – इन्द्र; खग – पक्षी; बसेरो-बसेरा, निवास स्थान; कालिंदी-यमुना ; कूल – किनारा डारन-डाल पर ।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) कवि रसखान की श्री कृष्ण के प्रति भक्ति का वर्णन कीजिए।
(v) निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए
(क) पाहन
(ख) मँझारन
(ग) डारन
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित ‘सवैये’ शीर्षक से उद्धृत है। यह रसखान द्वारा रचित ‘सुजान रसखान’ से लिया गया है।
प्रसंग प्रस्तुत सवैये में रसखान कवि अगले जन्म में श्रीकृष्ण का सान्निध्य पाना चाहते हैं। वे कृष्ण की निकटता प्राप्त करने की तीव्र कामना व्यक्त करते हैं।
(ii) व्याख्या कृष्ण की लीलाभूमि ब्रज के प्रति अपना लगाव प्रकट करते हुए कवि रसखान कहते हैं कि हे भगवान! मृत्यु के पश्चात् यदि मैं अगला जन्म मनुष्य के रूप में लूँ, तो मेरी यह इच्छा है कि मैं ब्रजभूमि में ग्वालों के बीच में निवास करूँ । यदि मैं पशु बनूँ तो इसमें मेरा कोई वश नहीं है, फिर भी मैं नन्द बाबा की गायों के बीच चरना चाहता हूँ, यदि मैं पत्थर बनूँ, तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनना चाहता हूँ, जिसे श्री कृष्ण ने अपनी अँगुली पर उठाकर इन्द्र का घमण्ड चूर किया था, यदि मैं पक्षी बनूँ, तो उसी कदम्ब के वृक्ष पर मेरा बसेरा हो, जो यमुना के किनारे है, जिसके नीचे श्रीकृष्ण रास रचाया करते थे अर्थात् वे हर रूप में अपने आराध्य श्रीकृष्ण के ही समीप रहना चाहते हैं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
इन पंक्तियों में कवि रसखान का कृष्ण और उनसे जुड़ी वस्तुओं के प्रति असीम प्रेम प्रकट हुआ है।
भाषा ब्रज

शैली मुक्तक
गुण प्रसाद
रस भक्ति एवं शान्त
छन्द सवैया
शब्द-शक्ति अभिधा, लक्षणा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘बसौं ब्रज’, ‘गोकुल गाँव’, ‘नित नन्द’ और ‘कालिंदी – कूल कदम्ब’ में क्रमशः ‘ब’, ‘ग’, ‘न’ और ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
(iv) कवि रसखान ने श्रीकृष्ण को अपना प्रियतम् सखा, स्वामी, पुत्र, माता-पिता सब कुछ माना है। उनकी भक्ति में कोई भेदभाव, कोई प्रतिकूलता या कोई संकोच नहीं है। वे श्री कृष्ण के प्रति अतुलनीय प्रेम और समर्पण का भाव रखते हैं।
(v)
(क) पाहन – पाषाण
(ख) मँझारन – मध्य
(ग) डारन – डाल पर
2. आजु गई हुती भोर ही हौं, रसखानि रई वहि नन्द के भौनहिं ।
वाको जियो जुग लाख करोर, जसोमति को सुख जात कह्यौ नहिं । ।
तेल लगाइ लगाइ क़ै अंजन, भौंहें बनाइ बनाइ डिठौनहिं ।
डारि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यौं पुचकारत छौनहिं ।।
शब्दार्थ आजु-आज; हुती – गई थी; भोर- प्रातः काल; हौं – मैं; रई -प्रेम में डूब गई; भौनहिं—भवन; अंजन-काजल; डिठौनहिंहैं- नजर का काला टीका; डारि – डालकर; छौनहिं- पुत्र को |
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्यगत सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत सवैया में कवि रसखान ने श्रीकृष्ण के प्रति माता यशोदा के वात्सल्य का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि रसखान कहते हैं कि एक सखी (गोपी) दूसरी सखी से कहती है कि आज मैं श्रीकृष्ण के प्रेम में मग्न होकर प्रातः काल नन्दजी के भवन में गई थी। मेरी कामना है कि उनका पुत्र ( श्रीकृष्ण) लाखों-करोड़ों युगों तक जिए । श्रीकृष्ण जैसा पुत्र पाकर यशोदाजी को जो सुख मिल रहा है, उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। वे अपने पुत्र के शरीर पर तेल, आँखों में काजल, भौंहें सँवारकर, माथे पर नजर का टीका लगाकर तथा उनके गले में आभूषण पहनाकर उन्हें निहार रही थीं और उन पर बलिहारी जा रही थीं तथा उन्हें पुचकार रही थीं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा ब्रज
शैली चित्रात्मक और मुक्तक
गुण प्रसाद
रस वात्सल्य
छन्द सवैया
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘जियौ जुग’, ‘तेल लगाई’ और ‘हमेलनि हार’ में क्रमशः ‘ज’, ‘त’ और ‘ह’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
यमक अलंकार ‘लगाइ लगाइ’ और ‘बनाइ बनाइ’ यहाँ एक ही शब्द की बार-बार पुनरावृत्ति हुई है, परन्तु उतनी ही बार उसका अर्थ अलग-अलग है। इसलिए यहाँ यमक अलंकार है ।
3. धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी ।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी । ।
वा छबि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी ।
काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सों लै गयौ माखन रोटी ।। V. Imp [2023, 20, 12]
शब्दार्थ धूर-धूल; सोभित – सुन्दर लगना, सुशोभित होना; स्यामजू’श्रीकृष्ण; पग-पैर; पैंजनि-पायल; पीरी-पीली; कछोटी-कच्छा; बिलोकत-देखते हैं; वारत – न्योछावर; काम-कामदेव ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए । ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में किसे भाग्यशाली बताया गया है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत सवैये में श्रीकृष्ण के बालरूप पर मोहित होकर एक गोपी दूसरी गोपी से उनकी सुन्दरता का बखान करती है।
(ii) व्याख्या कवि रसखान कहते हैं कि एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी! श्यामवर्ण के कृष्ण धूल से भरे हुए अत्यन्त सुशोभित व आकर्षक लग रहे हैं। ऐसे ही उनके सिर पर सुन्दर चोटी सुशोभित हो रही है। वे अपने आँगन में खाते और खेलते हुए घूम रहे हैं। उनके पैरों में पायल बज रही है और वे पीले रंग की छोटी-सी धोती पहने हुए हैं। कवि रसखान कहते हैं कि उनके उस सौन्दर्य को देखकर कामदेव भी उन पर अपनी कोटि-कोटि कलाओं को न्योछावर करते हैं। उस कौए का भाग्य भी कितना अच्छा है, जिसे श्रीकृष्ण जी के हाथ से मक्खन और रोटी छीनकर खाने का अवसर प्राप्त हुआ है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
इन पंक्तियों में श्रीकृष्ण के बाल सौन्दर्य का मनोहारी सजीव वर्णन है।
भाषा ब्रज
शैली चित्रात्मक और मुक्तक
गुण माधुर्य
रस वात्सल्य और भक्ति
छन्द सवैया
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘सोभित स्यामजू’, ‘खेलत खात’, ‘पग पैंजनी’ और ‘काम कला’ में क्रमश: ‘स’, ‘ख’, ‘प’ और ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कौए को भाग्यशाली बताया गया है, क्योंकि कौए को संसार के सर्वशक्तिमान और प्रभु श्रीकृष्ण के हाथ से मक्खन और रोटी छीनकर खाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
4. जा दिन तें वह नन्द को छोहरा, या बन धेनु चराइ गयौ है।
मोहिनी ताननि गोधन गावत, बेनु बजाइ रिझाइ गयौ है ।।
वा दिन सो कछु टोना सो कै, रसखानि हियै मै समाइ गयौ है ।
ऊन काहू की कानि करै, सिगरो ब्रज बीर, बिकाइ गयौ है ।।
शब्दार्थ छोहरा-पुत्र; ताननि-बजाकर ; गोधन – ब्रज प्रदेश में गाया जाने वाला गीत, गावत -गीत गाना; बेनु- बाँसुरी बजाई – बजाना; कानि-शर्म; सिगरो – सभी, सम्पूर्ण; बीर – हे सखी |
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत सवैया में ब्रज की गोपियों पर श्रीकृष्ण के मनमोहक प्रभाव का सुन्दर चित्रण किया है।
(ii) व्याख्या एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि जिस दिन से वह नन्द का पुत्र इस वन में अपनी गाय चराने के लिए आया है और अपनी बाँसुरी की मधुर तान सुनाकर हमें अपने प्रति रिझा गया है।
हे सखी! उसी दिन से ऐसा जान पड़ता है कि वह कोई जादू-सा कर हमारे हृदय में बस गया है अर्थात् श्रीकृष्ण के प्रति हमारे हृदय में प्रेम समा गया है। हे सखी! तब से कोई भी किसी की शर्म नहीं कर रहा, कोई भी गोपी किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करती। सभी ब्रज की गोपियाँ, श्रीकृष्ण के लिए व्याकुल हो रही हैं अर्थात् श्रीकृष्ण की बाँसुरी के वशीभूत हो गई हैं और सभी ने अपनी लाज शर्म को त्याग दिया है अर्थात् सम्पूर्ण ब्रज ही उनके हाथों बिक गया है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा ब्रज
शैली मुक्तक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द सवैया
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘बन धेनु’, ‘बजाइ रिझाइ’ और ‘काहू की कानि करै’ में क्रमशः ‘न’, ‘इ’ और ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार है । उत्प्रेक्षा अलंकार ‘कछु टोना सो’ यहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना व्यक्त की गई है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है ।
अतिशयोक्ति अलंकार पूरे पद्य में श्रीकृष्ण की बाँसुरी का वर्णन बहुत बढ़ा-चढ़ाकर किया गया है, जिस कारण यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है ।
5. कान्ह भये बस बाँसुरी के, अब कौन सखी, हमकौं चहिहै।
निसद्यौस रहे संग-साथ लगी, यह सौतिन तापन क्यौं सहिहै । ।
जिन मोहि लियौ मनमोहन कौं, रसखानि सदा हमकौं दहिहै।
मिलि आओ सबै सखि, भागि चलैं अब तो ब्रज में बाँसुरी रहि है । ।
शब्दार्थ चहिहै – चाहेगा; निसद्यौस-रात और दिन; सौतिन-पति की दूसरी पत्नी; तापन- दुःखों को; सहिहै – सहेगा; दहिहै – जलाएगी; रहिहै-रहेगा।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) कवि रसखान द्वारा गोपियों के श्री कृष्ण की बाँसुरी के प्रति सौतन रूपी भाव का वर्णन कीजिए |
(v) ‘मिली आओ सबै सखि, भागि चलै अब तो ब्रज में बाँसुरी रहिहै’ पक्ति का . आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत्।
प्रसंग प्रस्तुत सवैया में कवि ने गोपियों के श्रीकृष्ण की बाँसुरी के प्रति सौतनरूपी भाव का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी! श्रीकृष्ण को तो उनकी बाँसुरी ने पूर्ण रूप से अपने वश में कर लिया है। अब हमें कौन चाहेगा और हमसे कौन प्रेम करेगा? उनकी बाँसुरी तो रात-दिन उनके साथ ही रहती है, यह तो हमें सौतन की भाँति दुःख दे रही है, इसे हम कैसे सहन करेंगे? इस बाँसुरी ने मन मोहन श्रीकृष्ण को अपने मोह में फँसा लिया है और हमें ईर्ष्या से हमेशा जलाती रहती है।
सखी! बाँसुरी ने श्रीकृष्ण को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है। यह बाँसुरी हमें सदा जलाती रहेगी। आओ हम सब मिलकर इस ब्रज से भाग चलें, क्योंकि अब तो ब्रज में श्रीकृष्ण के साथ केवल यह बाँसुरी ही रहेगी। हमारा यहाँ अब कोई नहीं अर्थात् श्रीकृष्ण के प्रेम से वंचित होकर हमारा ब्रज में निर्वाह नहीं हो सकता।
(iii) काव्य सौन्दर्य
कवि ने श्रीकृष्ण की बाँसुरी के प्रति ईर्ष्या भाव को व्यक्त किया है।
भाषा ब्रज
शैली मुक्तक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द सवैया
अलंकार
अनुप्रास अलंकार’ ‘बस बाँसुरी’, ‘संग साथ’ और ‘सबै सखि’ में क्रमश: ‘ब’, ‘स’ और ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
रूपक अलंकार यहाँ गोपियों की सौतन रूपी बाँसुरी का वर्णन किया गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में गोपियाँ कहती हैं कि श्री कृष्ण को तो उनकी बाँसुरी ने पूर्ण रूप से अपने वश में कर लिया, अब हमें कौन प्रेम करेगा ? उनकी बाँसुरी तो रात-दिन उनके साथ ही रहती है, यह तो हमें सौतन की भाँति दुःख दे रही है।
(v) प्रस्तुत पंक्ति में गोपी कहती है कि हे सखी! आओ हम सब सखी मिलकर इस ब्रज से भाग चलें, क्योंकि अब तो ब्रज में श्रीकृष्ण के साथ केवल यह बाँसुरी ही रहेगी अर्थात् इस बाँसुरी के मोह ने श्रीकृष्ण को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण के प्रेम से वंचित होकर हमारा ब्रज में निर्वाह नहीं हो सकता ।
6. मोर – पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
ओदि पितम्बर लै लकुटी बन गोधन ग्वारन संग फिरौंगी । ।
भावतो वोहि मेरी रसखानि, सो तेरे कहैं सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी ।।
M. Imp [2020, 16, 08, 03] 
शब्दार्थ मोर-पखा-मोर के पंखों से बना मुकुट; राखिहौं- रखूँगी; पहिरौंगी – पहन लूँगी; पितम्बर – पीला वस्त्र; लकुटी-छोटी लकड़ी; भावतो – अच्छा लगता है।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए । .
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में गोपी बाँसुरी को अपने होंठों से लगाने के लिए क्यों मना करती है?
(v) निम्नलिखित शब्दों के अर्थ बताइए
(क) स्वाँग (ख) अधरान (ग) अधरा
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत सवैया में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम से व्याकुल गोपियों का वर्णन किया गया है।
(ii) व्याख्या एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि मैं तुम्हारे कहने पर मोर के पंखों से बने मुकुट को अपने सिर पर धारण कर लूँगी, गुंजाओं की माला अपने गले में पहन लूँगी, पीला वस्त्र ओढ़कर, लकड़ी अपने हाथ में लेकर जंगल में गायों और ग्वालों के साथ भी घूमूँगी।
तुम जो लीलाएँ करने को कहोगी, वही सब करूँगी अर्थात् जो लीलाएँ श्रीकृष्ण को पसन्द हैं, वही लीलाएँ मैं करने के लिए तत्पर हूँ, परन्तु मैं उस बाँसुरी को अपने होंठों पर नहीं रखूँगी, जो श्रीकृष्ण के अधरों पर अत्यन्त सुशोभित लगती है, क्योंकि बाँसुरी गोपियों को अपनी सौतन जैसी प्रतीत होती है। उन्हें बाँसुरी से ईर्ष्या है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के ज्यादा ही मुँह लगी हुई है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा ब्रज
शैली मुक्तक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द सवैया
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘गोधन ग्वारन’, ‘सब स्वाँग’ और ‘मेरी रसखानि’ में क्रमशः ‘ग’, ‘स’ और ‘र’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
यमक अलंकार मुरली मुरलीधर में मुरली (बाँसुरी) और मुरलीधर (श्रीकृष्ण) के लिए तथा अधरान धरी अधरा न धरौंगी में अधरान ( होंठों पर), अधरा (बाँसुरी) अर्थात् एक ही पंक्ति में समान शब्दों का दो बार प्रयोग किया गया है, परन्तु उनके अर्थ अलग-अलग हैं, इसलिए यहाँ यमक अलंकार है।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में गोपी बाँसुरी को अपने होंठों से लगाने के लिए मना करती है, क्योंकि बाँसुरी गोपियों को अपनी सौतन जैसी प्रतीत होती है। उन्हें बाँसुरी से ईर्ष्या है।
(v)
(क) स्वाँग – श्रृंगार
(ख) अधरान – होंठों पर
(ग) अधरा – बाँसुरी
कवित्त
7. गोरज बिराजै भाल लहलही बनमाल
आगे गैयाँ पाछें ग्वाल गावै मृदु बानि री ।
तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर मधुर जैसी
बंक चितवनि मन्द मन्द मुसकानि री । ।
कदम बिटप के निकट तटिनी के तट,
अटा चढ़ि चाहि पीत पट फहरानि री।
रस बरसावै तन-तपनि बुझावै नैन,
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री।। [2024]
शब्दार्थ बिराजै-सुशोभित है; लहलही – शोभायमान हो रही है, लगी हुई है; बानि – वाणी; बंक – सुन्दर; चितवनि – दृष्टि; बिटप – वृक्ष; तटिनी-यमुना; अटाअट्टालिका; पट- वस्त्र; तन-तपनि-तन का ताप|
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) गोरज के बीच कृष्ण के सुन्दर रूप का सजीव चित्रण कवि ने किस प्रकार किया है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी के काव्य खण्ड के ‘कवित्त’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि रसखान द्वारा रचित ‘सुजान रसखान’ से लिया गया है।
प्रसंग प्रस्तुत सवैया में कवि ने सायंकाल में श्रीकृष्ण के वन से लौटते हुए उनके सौन्दर्य के अत्यन्त मनोहर रूप को चित्रित किया है।
(ii) व्याख्या एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखी! वन से गायों के साथ लौटते हुए श्रीकृष्ण के माथे पर जो गायों के खुरों से उड़ी हुई धूल लगी हुई है, वह अत्यन्त मनमोहक लग रही है और उनके वक्षस्थल पर वन के फूलों की माला लहरा रही है। उनके आगे-आगे गायें चल रही हैं और पीछे-पीछे ग्वाल-बाल चल रहे हैं; जो मधुर स्वर में गीत गा रहे हैं। जितनी मधुर उनकी बाँसुरी की धुन है, उतनी ही मधुर उनकी मन्द मन्द मुस्कान और चितवन है अर्थात् उनका रूप, बाँसुरी की ध्वनि और चितवन सभी अत्यन्त मधुर लग रहे हैं।
हे सखी! तू अट्टालिका पर चढ़कर कदम्ब वृक्ष के समीप, यमुना नदी के किनारे पर श्रीकृष्ण के पीले वस्त्रों को फहराते हुए देख, उससे जिस रस की वर्षा हो रही है, उसे आँखों द्वारा देखने से तन का ताप शान्त हो रहा है और वह प्राणों को अपनी ओर खींचता हुआ इस ओर ही आ रहा है अर्थात् रस की खान श्रीकृष्ण रस को बरसाते हुए गोपियों की ओर ही चले आ रहे हैं, जिससे उनके तन का ताप शान्त हो रहा है। उनका सौन्दर्य नेत्रों की प्यास बुझा रहा है और हमें अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
भाषा ब्रज
शैली मुक्तक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द कवित्त
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘गोरज बिराजै’, ‘लहलही बनमाल’, ‘निकट तटनी’ और ‘तन – तपनि’ में क्रमशः ‘र’, ‘ल’, ‘ट’ और ‘न’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘मधुर-मधुर’ और मन्द मन्द में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
(iv) गोरज अर्थात् गायों के खुरों से उड़ी हुई धूल के बीच कृष्ण के सुन्दर रूप का वर्णन कवि ने इस प्रकार किया है कि वन से लौटते समय श्रीकृष्ण के माथे पर गोरज लगी हुई है। वह बहुत मनमोहक लग रही है और उनके वक्षस्थल पर वन के फूलों की माला लहरा रही है।

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