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UP Board Class 10 Hindi Chapter 9 – पुष्प की अभिलाषा एवं एवं जवानी (काव्य-खण्ड)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 9 – पुष्प की अभिलाषा एवं एवं जवानी (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 9 पुष्प की अभिलाषा एवं एवं जवानी (काव्य-खण्ड)

जीवन-परिचय
राष्ट्रहित को ही अपना परम लक्ष्य मान लेने वाले तथा क्रान्ति के अमर गायक पं. माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 1889 ई. में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबवई नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम नन्दलाल चतुर्वेदी था, जो पेशे से अध्यापक थे। प्राथमिक शिक्षा प्राप्ति के बाद माखनलाल चतुर्वेदी ने घर पर ही संस्कृत, बांग्ला, गुजराती और अंग्रेजी भाषा का अध्ययन किया और कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया। इसके बाद इन्होंने खण्डवा से ‘कर्मवीर’ नामक साप्ताहिक पत्र निकाला।
वर्ष 1913 में ये प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ के सम्पादक नियुक्त हुए। चतुर्वेदी जी ने कई बार राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लिया। इससे इन्हें अनेक बार जेल की यात्राएँ करनी पड़ीं। वर्ष 1943 में ये हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष बने। भारत सरकार द्वारा इन्हें ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि प्रदान की गई। 80 वर्ष की आयु इस महान साहित्यकार का निधन 30 जनवरी, 1968 को हो गया। में
साहित्यिक परिचय
पत्रकारिता से अपना साहित्यिक जीवन शुरू करने वाले माखनलाल चतुर्वेदी जी की रचनाओं में देश-प्रेम की भावना सशक्त रूप में विद्यमान थी। चतुर्वेदी जी आजीवन देश-प्रेम और राष्ट्रकल्याण के गीत गाते रहे। राष्ट्रवादी विचारधारा वाले इनके काव्यों में त्याग, बलिदान, कर्तव्य – भावना और समर्पण के भाव समाए हुए हैं।
कृतियाँ (रचनाएँ)
चतुर्वेदी जी की कृतियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है
काव्य-संग्रह युगचरण, समर्पण, हिमकिरीटनी, माता, वेणु लो गूँजे धरा ।
कहानी संग्रह अमीर इरादे – गरीब इरादे
निबन्ध संग्रह साहित्य देवता
नाट्य रचना कृष्णार्जुन युद्ध
इनकी ‘हिमतरंगिनी’ रचना ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत है।
भाषा-शैली
चतुर्वेदी जी की भाषा सरल खड़ी बोली है। इन्होंने अपनी काव्य रचनाओं में ओजपूर्ण भावात्मक शैली का प्रयोग किया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत माखनलाल चतुर्वेदी जी की रचनाएँ हिन्दी साहित्य की अक्षय-निधि हैं, जिन पर हिन्दी साहित्य प्रेमियों की गौरव की अनुभूति होती है।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
पुष्प की अभिलाषा
1. चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ में देना तुम फेंक ।
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने, 
जिस पथ जावें वीर अनेक।
शब्दार्थ सुरबाला- देवकन्या; बिंध – गुँथकर सम्राट – साम्राज्य का स्वामी; इठलाऊँ अभिमान करूँ; बनमाली-उद्यान अथवा वाटिका में पुष्प एवं पेड़-पौधों का संरक्षक; शीश मस्तक; पथ-राह ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए |
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश के अनुसार कवि की क्या अभिलाषा है?
अथवा पुष्प वनमाली के समक्ष अपनी कौन-सी इच्छा (चाह) प्रकट करता है?
(v) उपर्युक्त अवतरण में पुष्प किसका प्रतीक है? पुष्प को किन चीजों की चाह नहीं है और क्यों?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिन्दी के ‘काव्य खण्ड’ के ‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि ‘माखनलाल चतुर्वेदी ‘ द्वारा रचित ‘युगचरण’ से लिया गया है।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने पुष्प के माध्यम से मातृभूमि पर बलिदान होने की प्रेरणा दी है।
(ii) व्याख्या कवि स्वयं को पुष्प मानकर अपनी अभिलाषा प्रकट करते हुए कहते हैं कि हे ईश्वर ! मेरी यह अभिलाषा नहीं है कि मैं देवकन्या के आभूषणों में जड़कर उसके शृंगार की वस्तु बनूँ और न ही मेरी इच्छा पुष्पों की सुन्दर माला में गुँथकर प्रेमिका को रिझाने की है। मेरी यह भी अभिलाषा नहीं है कि मैं सम्राटों के पार्थिव शरीर पर चढ़ाया जाऊँ और न ही मेरी इच्छा देवों के मस्तक पर सुशोभित होकर गर्व से इठलाने की है। मेरी तो केवल यही इच्छा है कि हे वनमाली! तुम मुझे उस पथ पर बिखेर देना, जिससे हमारी मातृभूमि के रक्षक, वीर सैनिक गुजरें। मैं उनके चरणों के स्पर्श से ही स्वयं को सौभाग्यशाली व गौरवान्वित अनुभव करूँगा, क्योंकि उनके चरणों का स्पर्श ही देश के बलिदानी वीरों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत काव्यांश में पुष्प की अभिलाषा मुखरित हुई है। वह भी अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान होने का भाव प्रकट कर रहा है।
भाषा सरल खड़ी बोली
शैली प्रतीकात्मक, आत्मपरक तथा भावात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति अभिधा एवं लक्षणा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘प्रेमी – माला’ में ‘म’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश के अनुसार अपनी अभिलाषा प्रकट करता हुआ कवि कहता है कि हे वनमाली! तुम मुझे उस पथ पर बिखेर देना, जिससे हमारी मातृभूमि के रक्षक, वीर सैनिक गुजरे। मैं उनके चरणों के स्पर्श से ही स्वयं . को सौभाग्यशाली व गौरवान्वित अनुभव करूंगा, क्योंकि उनके चरणों का स्पर्श ही देश के बलिदानी वीरों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है।
(v) उपर्युक्त अवतरण में पुष्प ‘कवि’ का या ‘वीर व देशभक्त व्यक्ति’ का प्रतीक है। पुष्प को किसी देवकन्या का आभूषण बनने, प्रेमिका को रिझाने वाली माला बनने, सम्राटों के शव पर चढ़ने या देवताओं के मस्तक पर सुशोभित होने की चाह नहीं है । उसको मातृभूमि के रक्षकों अर्थात् सैनिकों के चरणों को स्पर्श करने की इच्छा है। वह इस तरह बलिदानी वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पण करना चाहता है।
जवानी
2. प्राण अन्तर में लिए, पागल जवानी!
कौन कहता है कि तू विधवा हुई,
खो आज पानी ? 
चल रहीं घड़ियाँ,
चले नभ के सितारे, चल रहीं नदियाँ,
चले हिम-खण्ड प्यारे; चल रही है साँस,
फिर तू ठहर जाए ? दो सदी पीछे कि तेरी लहर जाए?
तू पहन ले नर-मुंड – माला, उठ स्वमुंड सुमेरु कर ले,
भूमि-सा तू पहन बाना आज धानी
प्राण तेरे साथ हैं, उठ री जवानी !
द्वार बलि का खोल चल, भूडोल कर दें,
एक हिम-गिरि एक सिर का मोल कर दें, मसल कर,
अपने इरादों-सी, उठा कर,
दो हथेली हैं कि पृथ्वी गोल कर दें ? रक्त है?
या है नसों में क्षुद्र पानी!
जाँच कर, तू सीस दे-देकर जवानी?
शब्दार्थ नर-मुंड- माला-मनुष्यों के सिर की माला; सुमेरु – माला का वह दाना जिसके पूर्व माला पूरी होती है; हिम-गिरि – हिमालय पहाड़; क्षुद्र – तुच्छ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि युवाओं को सम्बोधित करते हुए क्या कहते हैं?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिन्दी के ‘काव्य खण्ड’ के ‘जवानी’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि ‘माखनलाल चतुर्वेदी’ द्वारा रचित ‘हिमकिरीटनी’ से लिया गया है।
प्रसंग माखनलाल चतुर्वेदी जी ‘जवानी’ कविता से देश के युवाओं को उद्बोधित करते हुए उत्साहित कर रहे हैं कि वे देश की वर्तमान परिस्थिति को बदल दें।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि हे युवा वर्ग! तुम अपने अन्दर असीम उत्साह शक्ति और सजीव सकारात्मक प्राण तत्त्व को समेटे हुए हों। तुम शक्ति स्त्रोत हो। अपनी शक्ति को पहचानों । पुनः वे स्वयं युवा वर्ग से प्रश्न करते हैं कि तुमसे किसने कहा कि तुम निस्तेज हो गए हो या तुमने अपने पानी (तेज) रूपी पति को खो दिया है। और आज जिधर भी देखता हूँ, गति ही गति पाता हूँ। काल निरन्तर गतिमान है आकाश के सितारे निरन्तर गतिशील हैं। नदियाँ, पर्वतों से निकलने के बाद रुकती नहीं अर्थात् चलायमान रहती हैं। पहाड़ों पर बर्फ के टुकड़े सरक-सरककर अपनी गतिशीलता दिखा रहे हैं। प्राणीमात्र की साँस निरन्तर चल रही है। फिर ऐसा कैसे सम्भव है कि तू ठहर जाए, जब आवश्यकता हो, तुझमें जोश न जाए दो सौ वर्ष बाद तुझमे जोश उत्पन्न हो, यह कैसे सम्भव हो सकता है ?
यदि समर्पण की स्थिति आ जाए, तो तुम देश के लिए स्वयं को समर्पित भी कर दो, पीछे मत हटो; जैसे— पृथ्वी हरे धानों की हरियाली से जीवन्त हो उठती है, वैसे ही युवा भी उत्साह से भरकर अपने नियत कार्य को करें । जीवन का उद्गम उनका प्राण साथ में है। अतः उस प्राणशक्ति के साथ आलस्य का त्याग करके अपने कर्त्तव्यों का पालन युवा वर्ग करें तथा आगे बढ़ें।
कवि युवाओं को सम्बोधित करते हुए कह रहे हैं कि हे युवा वर्ग ! तुम अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान का द्वार खोल दो। तुम चलो, आगे बढ़ो। तुम्हारे आगे बढ़ते उत्साहित कदमों में इतनी शक्ति हो कि उस पैर से पृथ्वी कम्पित हो उठे। हिमालय की रक्षा के लिए तुम सब अपने एक-एक सिर को समर्पित कर दो, अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दो। तुम्हारे इरादे (संकल्प) अत्यन्त मजबूत हों और तुम अपने इरादे रूपी हथेलियों को ऊँचे संकल्पों के समान उठाकर पृथ्वी को मसलकर गोल कर दो अर्थात् तुम अपने संकल्पों को दृढ़ करके कठिन से कठिन काम करने में सामर्थ्यवान बनो। हे वीरों! तुम अपनी युवावस्था की परख अपने शीश देकर कर सकते हो। इस बलिदानी परीक्षण से तुम्हें यह भी ज्ञात हो जाएगा कि तुम्हारी धमनियों में शक्तिशाली रक्त दौड़ रहा है अथवा उनमें केवल शक्तिहीन पानी ही भरा हुआ है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा शुद्ध परिमार्जित खड़ी-बोली
शैली भावात्मक, उद्बोधन
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘ स्वमुण्ड सुमेरु’, ‘पहन बाना’, ‘बलि का खोल चल’ आदि में अनुप्रास अलंकार है ।
रूपक अलंकार अपने इरादों सी, उठाकर’ में रूपक अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि युवाओं को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे युवा वर्ग ! तुम अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान का द्वार खोल दो। तुम आगे बढ़ो तुम्हारे आगे बढ़ते उत्साहित कदमों में इतनी शक्ति हो कि उस पैर से पृथ्वी कम्पित हो उठे। हिमालय की रक्षा के लिए तुम सब अपने एक-एक सिर को समर्पित कर दो अपने प्राणों को उत्सर्ग कर दो। तुम्हारे इरादे अत्यन्त मजबूत हों और तुम अपने इरादे रूपी हथेलियों को ऊँचे संकल्पों के समान उठाकर पृथ्वी को मसलकर गोल कर दो, तुम अपनी युवावस्था की परख अपने शीश देकर कर सकते हो।
3. वह कली के गर्भ से फल-रूप में, अरमान आया !
देख तो मीठा इरादा, किस तरह, सिर तान आया!
डालियों ने भूमि रुख लटका दिए फल, देख आली!
मस्तकों को दे रही संकेत कैसे, वृक्ष-डाली!
फल दिए? या सिर दिए? तरु की कहानी-
गूँथकर युग में, बताती चल जवानी !
शब्दार्थ कली के गर्भ से कली के अन्दर से; अरमान -अभिलाषा, इरादा – संकल्प, आली – सखी, तरु-वृक्ष ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग इन पंक्तियों में कवि ने अपनी ओजस्वी वाणी में वृक्ष और उसके फलों के माध्यम से युवकों को देश के लिए बलिदान होने की प्रेरणा दी है।
(ii) व्याख्या कवि युवाओं को प्रकृति के माध्यम से देशहित के लिए स्वयं को समर्पित करने का आग्रह करते हुए कहते हैं कि हे युवाओं ! फल से लदे हुए वृक्षों की ओर देखो, जोकि पृथ्वी की ओर अपना सिर झुकाए हुए हैं। जिस प्रकार कली के भीतर से झाँकते फल कली के संकल्पों ( अरमानों) को बता रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारे हृदय से भी बलिदान हो जाने का संकल्प प्रकट हो जाना चाहिए अर्थात् देश के युवाओं! तुम्हें भी अपने भीतर देश की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प लेना होगा और दूसरों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने के लिए तत्पर रहना होगा। वृक्षों ने अपने मस्तकरूपी फलों को बलिदान के लिए दे दिया है, अब तुम भी उनके इस आत्म बलिदान की परम्परा को अपने आचरण में आत्मसात् कर लो और युग की आवश्यकतानुसार स्वयं को उसकी प्रगतिरूपी माला में गूँथते हुए आगे बढ़ते रहो ।
(iii)काव्य सौन्दर्य
भाषा ओजपूर्ण खड़ी बोली
शैली उद्बोधन
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘फल दिए ? या सिर दिए?’ में ‘दिए’ शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
रूपक अलंकार ‘गर्भ से फल रूप में अरमान आया’ में अरमान रूपी फल का वर्णन किया गया, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है ।
4. श्वान के सिर हो – चरण तो चाटता है !
भौंक ले- क्या सिंह को वह डाँटता है ?
रोटियाँ खाईं कि साहस खा चुका है,
प्राणि हो, पर प्राण से वह जा चुका है।
तुम न खेलो ग्राम सिंहों में भवानी !
विश्व की अभिमान मस्तानी जवानी !
शब्दार्थ श्वान – कुत्ता; चरण-पैर; ग्राम सिंहों कुत्ता भवानी दुर्गारूपी जवानी; अभिमान – गर्व, घमण्ड ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने स्वाभिमान के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए युवकों से उसकी रक्षा का आह्वान किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि कहने को सिर तो कुत्ते का भी होता है, पर उसमें स्वाभिमान तो नहीं होता। वह अपनी क्षुधा की तृप्ति के लिए दूसरों की चाटुकारी करता फिरता है और उसके पैरों को चाटता रहता है। इसलिए स्वाभिमान की कमी के कारण उसे कोई नहीं पूछता।
उसकी आवाज कितनी भी तेज क्यों न हो, परन्तु उसमें इतना साहस नहीं होता कि उसके भौंकने से सिंह डर जाए, क्योंकि दूसरे की रोटियाँ खाते ही उसका स्वाभिमान तथा साहस नष्ट हो जाता है अर्थात् वह जीवित होते हुए भी मरा हुआ-सा प्रतीत होता है।
अतः हे देश के शक्तिस्वरूप नवयुवकों! तुम्हें भी अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी है और पराधीन नहीं रहना है। कुत्तों की तरह रोटी के टुकड़ों के लिए अपने स्वाभिमान को नहीं खोना है। तुम्हें अपनी प्रचण्ड दुर्गा जैसी असीम शक्ति को आपसी झगड़ों में नष्ट नहीं करना है, अपितु उसे देश के दुश्मनों के संहार में लगाना है। तुम्हारी ऐसी मस्तानी जवानी का सारी दुनिया लोहा मानती है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा परिमार्जित खड़ी बोली ओज
शैली उद्बोधन
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
रूपक अलंकार ‘रोटियाँ खाईं कि साहस’ में रोटी रूपी साहस का वर्णन किया गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है।
भाव साम्य स्वाभिमान को जीवन का प्रतीक बताते हुए राष्ट्रकवि गुप्त जी भी कहते हैं- ” जिसमें न निज गौरव तथा निज जाति का अभिमान है। वह नर नहीं है, पशु निरा और मृतक समान है।”
5. ये न मग हैं, तव चरण की रेखियाँ हैं,
बलि दिशा की अमर देखा-देखियाँ हैं।
विश्व पर, पद से लिखे कृति लेख हैं ये,
धरा तीर्थों की दिशा की मेख हैं ये !
प्राण-रेखा खींच दे, उठ बोल रानी,
मरण के मोल की चढ़ती जवानी !
शब्दार्थ मग मार्ग; तव तुम्हारे ; रेखियाँ – रेखाएँ; बलि दिशा-बलिदान की दिशा; कृति; लेख – कार्यरूपी लेख; मेख स्तम्भ |
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग इस काव्यांश में कवि युवावर्ग से स्वयं को बलिदान करने का आग्रह कर रहे हैं।
(ii) व्याख्या कवि कह रहे हैं कि ये मार्ग जो तुम्हारे समक्ष हैं, तुम्हें दिखाई दे रहे हैं, ये पूर्वजों के आदर्शों के चिह्न हैं । इन मार्गों का निर्माण तो युवाओं ने ही किया है। युवा उन मार्गों का निर्माण करते हैं, जो उन्हें बलिवेदी की दिशा की ओर ले जाते हैं। युवाओं के लिए यह आवश्यक भी है कि वे अपने पूर्वजों का अनुसरण करते हुए बलिदान के मार्ग पर चलने के लिए तत्पर रहें। बलिदान का मार्ग एक साधारण मार्ग नहीं है अपितु यह तो संसार – पथ पर पैरों से लिखे कार्य रूपी लेख हैं। इन लेखों में बलिदान रूपी सत्कर्मों की सुगन्ध है। उन लेखों में सत्कर्म करने का शिव-संकल्प भी निहित है। ये पवित्र मार्ग पृथ्वी के तीर्थों की दिशा निर्धारित करने वाले स्तम्भ के समान हैं। हे युवाओं ! तुम अपनी प्राणों की रेखा खींच दो अर्थात् अपने प्राणों को स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर उत्सर्ग करो और एक अमिट छाप छोड़ जाओ, जिससे तुम्हें युगों-युगों तक याद किया जा सके। हे युवाशक्ति! तुम अपने मौन को भंग करो और उठ कर बोलो कि जवानी का महत्त्व ही राष्ट्र के लिए ‘जीवन का बलिदान करने में है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी बोली
शैली प्रतीकात्मक और उद्बोधनात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘देखा देखियाँ’ में ‘द’ और ‘ख’ वर्ग की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
रूपक अलंकार पद्यांश में आत्मबलिदान को कृति लेख मानने के कारण यहाँ रूपक अलंकार है।
भाव साम्य महाकवि ‘निराला’ ‘भी मातृभूमि पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने की बात करते हुए कहते हैं- “नर जीवन के स्वार्थ सकल, बलि हो तेरे चरणों पर, माँ, मेरे श्रम संचित सब फल।”
6. टूटता जुड़ता समय-‘भूगोल’ आया,
गोद में मणियाँ समेट ‘खगोल’ आया,
क्या जले बारूद ? -हिम के प्राण पाए!
क्या मिला? जो प्रलय के सपने न आए
धरा? यह तरबूज है, दो फाँक कर दे,
चढ़ा दे स्वातन्त्र्य प्रभु पर अमर पानी ।
विश्व माने – तू जवानी है, जवानी !
शब्दार्थ भूगोल – भूमण्डल; मणियाँ ग्रह नक्षत्र; खगोल-आकाशमण्डल; हिम के प्राण पाए ठण्डी होकर, स्वातन्त्र्य-प्रभु – स्वतन्त्रता रूपी ईश्वर ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
अथवा ‘धरा ? यह तरबूज है’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने युवकों को देश के गौरव की रक्षा के लिए देश में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहते हैं कि हे युवकों! समय का भूगोल हमेशा एक सा नहीं रहा। जब-जब क्रान्ति हुई है, तब-तब यह टूटा और जुड़ा है अर्थात् नए – नए राष्ट्र बने हैं। क्रान्ति का सत्कार करने के लिए ब्रह्माण्ड जिन तारक मणियों को अपनी गोद में लेकर प्रकट हुआ है, वे खगोलीय विस्फोट की अमूल्य ‘भेंट हैं। अत: तुम्हारा स्वभाव इतना ओजस्वी होना चाहिए, जिससे कि विश्व का मानचित्र और इतिहास बदला जा सके। हे युवकों! तुम्हें चाहिए कि तुम अपने जीवन की जगमगाहट से देश के ‘गौरव को प्रकाशित करो, किन्तु जिनके हृदय बर्फ की तरह ठण्डे पड़ गए हैं, वे उस प्रकार क्रान्ति नहीं कर सकते, जिस प्रकार ठण्डा बारूद नहीं जल सकता है।
हे युवकों! तुम यदि प्रलय की भाँति पराधीनता और अन्याय के प्रति क्रान्ति नहीं कर सकते, तो तुम्हारी जवानी व्यर्थ है। यदि तुम चाहों, तो पृथ्वी को भी तरबूज की तरह चीर सकते हो। हे देश के युवकों की जवानी! तू यदि देश की आजादी के लिए स्वतन्त्रता रूपी ईश्वर पर अपना रक्तरूपी अमर पानी चढ़ा दे, तो तू अमर हो जाएगी और संसार में तेरा उदाहरण देकर तुझे सराहा जाएगा।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा साहित्यिक खड़ी बोली
शैली प्रवाहमयी तथा ओजपूर्ण
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति लक्षणा एवं व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘टूटता जुड़ता’ और ‘प्राण पाए’ में क्रमशः ‘त’ और ‘प’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
रूपक अलंकार ‘धरा? यह तरबूज है’ में पृथ्वी की तुलना तरबूज के रूप में की गई है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है ।
7. “लाल चेहरा है नहीं, फिर लाल किसके ? 
लाल खून नहीं, अरे, कंकाल किसके ?
प्रेरणा सोयी कि, आटा-दाल किसके ?
सिर न चढ़ पाया, कि छापा माल किसके ?”
वेद की वाणी कि हो आकाश-वाणी
धुल है जो जग नहीं पाई जवानी
शब्दार्थ लाल-लाल रंग, पुत्र कंकाल – हड्डी का ढाँचा छापा – तिलक; माल-माला।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(iv) कवि के अनुसार किसे भारत माता की सन्तान कहलाने का अधिकार नहीं है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में माखनलाल जी युवाओं को वीरों के लक्षण समझा रहे हैं।
(ii) व्याख्या कवि युवाओं में उत्साह का संचार करते हुए कहते हैं कि यदि तुम्हारे चेहरे पर उत्साह एवं जोश की लालिमा नहीं है और तुम्हारे मस्तक का तेज समाप्त हो गया है तो तुम भारत माता की सन्तान कहलाने का अधिकार खो चुके हो। यदि तुम्हारे रक्त में ओजस्विता व उष्णता का गुण नहीं है, तो तुम्हारा शरीर मात्र अस्थि पंजर है, उसकी कोई उपयोगिता नहीं है।
यदि तुम्हारे भीतर देश-रक्षा की प्रेरणा एवं उसकी इच्छा सो गई है या समाप्त हो गई है, तो तुम्हारा जीवन देश के लिए व्यर्थ है और तुम शत्रुओं के लिए केवल भोजन मात्र हो ।
धार्मिक क्रियाकलापों अर्थात् माला जपने या तिलक लगाने का औचित्य भी तब ही है, जब तुम्हारे अन्दर देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को बलिदान करने का सामर्थ्य हो। वे कहते हैं कि वेदों की उक्तियाँ हों या आकाश से उत्पन्न वेदवाणी, यदि उनमें युवाओं को जोश, उत्साह एवं अदम्य साहस उत्पन्न करने का गुण विद्यमान नहीं है, तो वेदों की वाणी और देववाणी भी व्यर्थ है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली प्रवाहमयी तथा ओजपूर्ण
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
यमक अलंकार ‘लाल चेहरा है नहीं, फिर लाल किसके ?’ में ‘लाल’ शब्द के दो अर्थ हैं— लाल रंग व पुत्र, इसलिए यहाँ यमक अलंकार है ।
अनुप्रास अलंकार ‘कंकाल किसके’ और ‘वेद की वाणी’ में ‘क’ और ‘व’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) कवि के अनुसार, जिन युवाओं का मस्तक का तेज समाप्त हो गया हो, जिनके चेहरे पर उत्साह और जोश की लालिमा नहीं है, जिनके रक्त में ओजस्विता व उष्णता का गुण नहीं है, जिनका शरीर मात्र अस्थि पंजर है, उनकी कोई उपयोगिता नहीं है, ऐसे युवा भारत माता की सन्तान कहलाने का अधिकार खो चुके हैं।
8. विश्व है असि का? नहीं संकल्प का है!
हर प्रलय का कोण काया कल्प का है;
फूल गिरते, शूल शिर ऊँचा लिए हैं;
रसों के अभिमान को नीरस किए हैं।
खून हो जाए न तेरा देख, पानी,
मरण का त्योहार, जीवन की जवानी ।
शब्दार्थ असि-तलवार; संकल्प – दृढ़ निश्चय; प्रलय – क्रान्ति; काया कल्प – पूर्ण परिवर्तन, क्रान्ति; शूल – काँटे; रसों-सौन्दर्य, शृंगार; नीरस – रस – विहीन ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।.
(iv) कवि के अनुसार यह संसार किन व्यक्तियों का है ?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग कवि युवाओं को क्रान्ति का दूत मानते हुए उन्हें मातृभूमि के लिए आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दे रहा है।
(ii) व्याख्या कवि युवाओं को क्रान्ति के लिए उत्साहित करते हुए उनसे पूछता है कि क्या यह संसार तलवार का है? क्या यह संसार तलवार और अन्य हिंसक हथियारों से ही जीता जा सकता है? कवि उनको स्वयं ही उत्तर देते हुए कह रहा है कि नहीं! ऐसी बात नहीं है। संसार दृढ़ संकल्प वाले व्यक्तियों का है। इसे दृढ़ संकल्प से जीता जा सकता है। संसार की प्रत्येक प्रलय का उद्देश्य संसार में क्रान्ति और बदलाव लाना होता है । इसी प्रकार युवा वर्ग यदि किसी बात के लिए संकल्प कर लेता है, तो क्रान्ति आ सकती है और परिवर्तन प्रारम्भ सकता है। अतः युवाओं को अपने संकल्प से क्रान्ति के लिए आगे आना चाहिए।
व्यक्ति के अन्दर जब दृढ़ संकल्पों की कमी होती है, उसका पतन आरम्भ हो जाता है। हवा के हल्के से झोंके से कोमल होने के कारण पुष्प जमीन पर गिर जाते हैं और अपना सौन्दर्य खो बैठते हैं, परन्तु काँटे आँधी और तूफान में भी अपना सीना गर्व से ताने खड़े रहते हैं। हे नवयुवकों! दृढ़ संकल्प से उत्पन्न आत्मोत्सर्ग की भावना कभी विचलित नहीं होती है। काँटे फूलों की कोमलता और उनके सौन्दर्य के अभिमान को अपनी दृढ़ संकल्प शक्ति से नष्ट कर देते हैं। हे युवाओं ! तुम्हारी नसों के रक्त में जो उत्साह है, जो उष्णता है, वह जोश शीतल होकर नष्ट न हो जाए। जवानी उसी का नाम है, जो मृत्यु को त्योहार अर्थात् उल्लास का क्षण माने। मरण का त्योहार अर्थात् बलिदान का दिन ही जवानी का सबसे आनन्दमय दिन होता है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि कहता है कि समाज में क्रान्ति लाने के लिए दृढ़ · संकल्प अति आवश्यक है। युवाओं के संकल्प फूलों के समान कोमल नहीं, बल्कि काँटों के समान कठोर होने चाहिए।
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली उद्बोधनात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति लक्षणा एवं व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘शूल शिर’ और ‘जीवन की जवानी’ में ‘श’, ‘ज’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) कवि के अनुसार, यह संसार दृढ़ संकल्प वाले व्यक्तियों का है। इस संसार को दृढ़ संकल्प से जीता जा सकता है, हथियारों से नहीं ।

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