ग्रामीण क्षेत्रों में क्षेत्रीय विषमता

ग्रामीण क्षेत्रों में क्षेत्रीय विषमता

 

ग्रामीण क्षेत्रों में क्षेत्रीय विषमता

बिहार में क्षेत्रीय असमानता एक समस्या बन कर सामने खड़ी है। इस प्रदेश में क्षेत्रीय असमानता का आकलन इसी तथ्य से किया जा सकता है कि प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति 3828 रुपये की संपत्ति आंकी गयी है, जबकि दक्षिण क्षेत्र जो कि अब वर्तमान में झारखंड राज्य है, में 6145 रुपये का आकलन रहा है। प्रति व्यक्ति संपत्ति और प्रति व्यक्ति वार्षिक खर्च के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि राज्य का कृषि क्षेत्र अर्द्ध-विकसित होने के साथ-साथ अर्द्ध-सामंती भी है।

प्रदेश में कृषि के अविकसित तथा तकनीकी और संस्थागत रूप से पिछड़ेपन के दो प्रमुख कारण हैं। यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति के विश्लेषण के लिए इसके विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक पहलुओं का विश्लेषण आवश्यक है।
अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संघ, जेनेवा एवं अनुग्रह नारायण सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान, पटना के शोधकर्ताओं ने कुछ गांवों के सर्वेक्षण के दौरान अनेक पहलुओं का अध्ययन किया और इन पर आंकड़ों का संकलन किया गया। 1980-81 में यह
सर्वेक्षण किया गया था। यह सर्वेक्षण उत्तर एवं दक्षिण बिहार (झारखंड) के 6 गांवों में किया गया था। इस आलेख के लिए छ: विभिन्न पहलुओं को लिया गया है- प्रथम, प्रति एकड़ कृषि उत्पादन। शेष पांच पहलुओं में से तीन तकनीकी कारकों एवं दो कृषि व्यवस्था से संबंधित हैं। इस सर्वेक्षण में पाया गया है कि ज्यों-ज्यों सिंचित भूमि का अनुपात एवं प्रति एकड़ रासायनिक खाद में खर्च की जाती है, त्यों त्यों प्रति एकड़ उत्तम बीज की भी कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है। जितना अधिक उत्तम बीज खेती के लिए प्रयोग लाया जाता है, फसल उतनी ही अधिक होती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि बिहार कृषि क्षेत्र में अच्छी पैदावार तकनीकी कारकों से बहुत ही प्रभावित होती है। इन तकनीकी कारकों का आपस में भी बहुत गहरा संबंध है। इन तकनीकी कारकों में सिंचाई अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
अगर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, तभी किसान उत्तम बीज एवं रासायनिक खाद पर खर्च करते हैं। सर्वेक्षण में यह पाया गया कि सिंचाई एवं बीज में कोई खास संबंध नहीं है। यदि पानी अधिक हो गया और बाढ़ की स्थिति आ गयी तो खाद बह जायेगा। सूखे की स्थिति में भी फसल नष्ट हो जायेगी। इसलिए जहां सिंचाई अधिक होती है वहां रासायनिक खाद का खर्च अधिक पाया जाता है। कृषि के संस्थागत कारकों में आसामियों को दी गयी भूमि का प्रतिशत एवं आसामियों को दी गयी भूमि में अध-बटाई का प्रतिशत का प्रति एकड़ कृषि उत्पादन से ऋणात्मक सह-संबंध है। सांख्यिकी रूप असामियों को दी गयी भूमि के अनुपात का भूमि उत्पादकता से विपरीत संबंध है। जहां भी आसामियों को दी जाने वाली भूमि का अनुपात बढ़ता है, वहां कृषि उत्पादकता कम हो जाती है। विश्लेषण से यह भी ज्ञात होता है कि सिर्फ 26 प्रतिशत सिंचाई ही भूमि उत्पादकता पर प्रभाव
डालती है। यदि सिंचाई के साधनों को बढ़ाया जाय एवं बटाई की जमीन बटाईदारों को दी जाय तब इनका सम्मिलित रूप से भूमि उत्पादकता पर 60 प्रतिशत प्रभाव पड़ेगा।
एक-दूसरे तकनीकी कारक, प्रति एकड़ उत्तम बीज पर खर्च और संस्थागत कारक, आसामियों को दी गयी जमीन में अर्द्धबटाई के प्रतिशत को लेकर करें तो पाते हैं कि दोनों कारकों का प्रभाव प्रति एकड़ उत्पादन पर पड़ता है जो कि सांख्यिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उत्तम बीज का प्रयोग सिंचाई के नहीं होने के बावजूद होता है। इसलिए उत्तम बीज का प्रयोग किसानों के व्यक्तिगत प्रयास पर निर्भर करता है, जबकि सिंचाई एक ऐसी तकनीक है जिसे गरीब किसान अपने प्रयास से नहीं कर सकता है, जब तक सरकार एवं समाज इसकी व्यवस्था न करे, क्योंकि इसके लिए बिजली एवं ऊर्जा आपूर्ति की भी आवश्यकता है। परंतु उत्तम बीज का उपयोग किसानों के व्यक्तिगत प्रयास एवं प्रगतिशीलता को अत्यधिक परिलक्षित करता है। रासायानिक किसानों के व्यक्तिगत प्रयास एवं प्रगतिशीलता को अत्यधिक परिलक्षित करता है। सम्मिलित विश्लेषण से यह पता चलता है कि जहां उत्तम बीज के प्रयोग रूपी तकनीकी कारक का प्रति एकड़ उत्पादन पर धनात्मक प्रभाव 40 प्रतिशत पड़ता है। वहां अर्द्धबटाई का ऋणात्मक प्रभाव 14 प्रतिशत पड़ता है। अत: इस सम्मिलित विश्लेषणों से स्पष्ट है कि सिंचाई, रासायनिक खाद एवं बीज का उपयोग बढ़ाने से जमीन की उत्पादकता बढ़ती है। वहीं अर्द्धबटाई एवं अन्य प्रकार के आसामियों को दी गयी जमीन का अनुपात बढ़ने से जमीन की उत्पादकता कम होती है। इससे यह भी पता चलता है कि भूमि उत्पादकता बढ़ाने से केवल संस्थागत परिवर्तन का ही हल नहीं है। उसी तरह केवल सिंचाई से कुछ हद तक उत्पादकता बढ़ जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि भूमि उत्पादकता को बढ़ाया जाये और यह लक्ष्य सिंचाई में वृद्धि, उत्कृष्ट बीज की सुविधा एवं संस्थागत कारकों के परिवर्तन में सम्मिलित प्रयास से ही संभव है। अत: हम यह कह सकते हैं कि उत्तर बिहार में कृषि विकास में बाधक प्राचीन अर्द्ध-सामंती व्यवस्था अधिक प्रबल है। यह ठीक है कि उत्तर बिहार में तकनीकी कारक
में उत्तम बीज का उपयोग दक्षिण बिहार की अपेक्षा अधिक हुई है। फिर भी, यहां भूमि उत्पादकता में गिरावट आयी है क्योंकि संस्थागत कारक, अर्द्धबटाई पर दी गयी भूमि का अनुपात दक्षिण बिहार (झारखंड) की तुलना में दुगुने से अधिक है। अर्थात
यह कारक कृषि उत्पादकता के लिए तकनीकी कारकों के उत्प्रेरक प्रभाव से कहीं ज्यादा विपरीत प्रभाव उत्पन्न कर रहा है। जबकि अन्य संस्थागत कारक व असामियों को दी गयी भूमि का अनुपात दोनों मैदानी क्षेत्रों में लगभग समान है।

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