झारखंड राज्य बनने से बिहार में होने वाले परिवर्तन

झारखंड राज्य बनने से बिहार में होने वाले परिवर्तन

बिहार की राजनीतिक सीमाओं में विगत शताब्दी से ही काफी परिवर्तन आये हैं। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में बिहार एवं उड़ीसा बंगाल प्रांत के अंग थे। 1912 ई. में बिहार एवं उड़ीसा, बंगाल प्रांत से पृथक् हुये। 1935 ई. में उड़ीसा को बिहार से अलग किया गया। 1947-48 में बिहार एवं उड़ीसा की सीमाओं का पुनर्निर्धारण हुआ, जबकि 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के क्रम में पुरूलिया जिला एवं पूर्णियां जिले के कुछ क्षेत्र पश्चिम बंगाल राज्य में मिला लिये गये। इसके 44 वर्षोपरान्त 15 नवंबर, 2000 को बिहार का पुनः विभाजन हुआ और भारतीय संघ के 28वें राज्य के रूप में झारखंड राज्य का उदय हुआ।
उल्लेखनीय है कि झारखंड राज्य की स्थापना के लिये जब आंदोलन आरंभ हुआ था, तो उसका उद्देश्य बिहार, बंगाल, उड़ीसा
एवं मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों को एक नये राज्य में संगठित करना था। अनेक कारणों से अंतत: यह संभव नहीं हुआ और नवोदित झारखंड राज्य केवल पूर्ववर्ती बिहार के 18 जिलों के क्षेत्र तक ही सीमित रहा। बिहार के विभाजन एवं झारखंड के निर्माण से इस क्षेत्र की भौगोलिक एवं सामाजिक संरचना तथा राजनीतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों
महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है।

राजनीतिक परिवर्तन

राजनैतिक स्तर पर बिहार की स्थिति में निर्णायक परिवर्तन आया है। राज्य के 54 संसदीय क्षेत्रों में अब मात्र 40 ही रह गये हैं। इसी प्रकार राज्य विधानसभा के 324 स्थानों में से 81 झारखंड को स्थानांतरित होने के कारण अब केवल 243 ही बिहार में रह गये हैं। विभिन्न दलों की राजनैतिक स्थिति भी इससे प्रभावित हुई है। राष्ट्रपति के चुनाव तथा राज्य सभा के सदस्यों के चुनाव में बिहार एक अहम् भूमिका निभाता था। लेकिन अब संख्या घटने से इसका महत्त्व थोड़ा कम हुआ है।
संसद में संख्या अधिक होने के कारण बिहार के सांसद कई संसदीय समितियों, निगमों के सदस्य एवं अध्यक्ष होते थे और वे बिहार के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, क्योंकि बिहार एक पिछड़ा राज्य था। लोकतंत्र में संख्या का बहुत बड़ा महत्व होता है

आर्थिक परिवर्तन

जिसमें बिहार कमजोर पड़ा है। बिहार के विभाजन के कारण राज्य का मौलिक स्वरूप कृषि-प्रधान हो गया है। खनिज रॉयल्टी, वाणिज्य कर सहित विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होने वाली आय में अत्यंत कमी आयी है। संयुक्त बिहार में कुल 26.03 लाख हैक्टेयर पर खेती की जाती थी। अब, शेष बिहार में 23.43 लाख हैक्टेयर रह गया है। यह कुल कृषि के उपयोग में भूमि का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा है। राज्य में अब कृषि उत्पाद, सकल घरेलू उत्पाद का सबसे बड़ा अंश बन चुका है और राज्य के विकास की नयी रूपरेखा तय करते समय यह आवश्यक है कि कृषि विकास को प्राथमिकता दी जाय।
अब बिहार में संयुक्त बिहार का 84 प्रतिशत खाद्यान्न उत्पादन, 82 प्रतिशत दलहन, 76 प्रतिशत तेलहन तथा 93 प्रतिशत अन्य फसलों का उत्पादन होता है। लेकिन विभाजन से अविभाजित बिहार का 96 प्रतिशत खनिज तथा 97 प्रतिशत वृहत् उद्योग
झारखंड में चले गये हैं। मुख्य औद्योगिक परियोजनायें, बड़ी सिंचाई परियोजनायें झारखंड में चली गयी हैं। अविभाजित
बिहार के कुल विद्युत उत्पादन का 70 प्रतिशत तथा वन क्षेत्र का 79 प्रतिशत झारखंड राज्य में चला गया है।
बंटवारे का सबसे बड़ा नुकसान राज्य की राजस्व संरचना को हुआ है। विभाजित बिहार के कुल राजस्व का 67 प्रतिशत झारखंड को मिला। संयुक्त बिहार के कुल राजस्व (1996-97) का 37.76 प्रतिशत दक्षिण बिहार से आता था। यदि इसमें केन्द्रीय करों के योगदान को जोड़ दिया जाय, तब यह बढ़कर 48.36 प्रतिशत हो जाता है।
अब शेष बिहार में राजस्व कुल राजस्व का मात्र 51.64 प्रतिशत रह गया है। शेष बिहार में सबसे अधिक कमी राज्य के व्यवसायिक कर (45.22 प्रतिशत), जल संसाधन (58 प्रतिशत) तथा परिवहन से राजस्व (63 प्रतिशत) आयी है। अविभाजित बिहार को टैक्स वसूली के तौर पर अकेले झारखंड क्षेत्र से 1200 करोड़ रुपये प्राप्त होते थे, जो कुल प्राप्त कर का 70 प्रतिशत था। शेष, बिहार में औद्योगिक क्षेत्र की लगभग समाप्ति हो ही गयी है। उत्तरी बिहार की चीनी एवं जूट मिले या तो बंद पड़ी हैं या इतनी जर्जर हो गयी है कि उनकी लाभदायकता संदिग्ध हो गयी है। केन्द्रीय बिहार में डालमियानगर स्थित सीमेंट एवं कागज की इकाईयां बंद हो चुकी हैं। छोटे उद्योग बदहाली के कगार पर हैं। शेष बिहार में जो केन्द्रीय प्रतिष्ठान भी हैं, जैसे बरौनी में तेलशोधन एवं उर्वरक संयंत्र, मुजफ्फरपुर में बैंगन निर्माण, अभियंत्रण तथा रसायन आदि रूग्णता के कगार
पर हैं।
झारखंड राज्य बनने से बिहार में होने वाले परिवर्तन

सामाजिक परिवर्तन

बिहार के विभाजन के उपरांत जमशेदपुर, रांची, बोकारो, धनबाद जैसे बड़े नगर अब झारखंड के अंग बन गये हैं। ऐसे औद्योगिक केन्द्रों में नगरीकरण की प्रवृत्तियां अधिक मजबूत होती हैं। इनके अलग होने के कारण शेष बिहार में अर्द्ध सामंती
दृष्टिकोण और भी मजबूत होगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी तीन विश्वविद्यालय रांची, सिद्ध-कान्हु और विनोबा भावे तथा बिरसा कृषि विश्वविद्यालय अब बिहार से अलग हो चुके हैं जबकि तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र, जैसे- इंडियन स्कूल ऑफ माईंस, जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर रिलेशंस आदि अब बिहार में नहीं रहे हैं। बिहार में अब आदिवासी जनसंख्या सिर्फ कुछ ही जिलों में ही सिमट कर रह गयी है। इस प्रकार अब यह आदिम संस्कृति का भी महत्वपूर्ण केन्द्र नहीं रहा हैं

बिहार में विकास की संभावनायें

कोई भी देश मात्र इसीलिये विकसित नहीं हो जाता कि वहां अपार प्राकृतिक संसाधन स्थित है। यदि ऐसा होता तो मध्य-पूर्व के तेल निर्यातक राष्ट्र विकास की अग्रिम पंक्ति में रहते। औद्योगिक संरचना, वितरण की रहा है। अवस्था एवं मानव विकास की परिस्थितियां ही विकास के मूल इंजन हैं। किसी भी देश की महत्वपूर्ण संसाधन में मानव शक्ति है। बिहार इस दृष्टि से संपन्न है। यदि मानव विकास में सही ढंग से निवेश किया जाये, तब सामाजिक क्षेत्र का विकास स्वतः ही राज्य में आर्थिक क्रियाओं को गति प्रदान करेगा। इससे आय एवं रोजगार की स्थिति सुधरेगी।
मानव संसाधन के साथ-साथ विकास योजनाओं में कृषि विकास को प्राथमिकता देनी होगी। व्यावसायिक स्तर पर कृषि हेतु उपयुक्त भू-सुधार, कृषि व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिये मंडी, संचार, प्रशोधन, संग्रहण आदि के लिये उपयुक्त अधिसंचरना, जल संसाधन का समुचित विदोहन तथा इस क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देना भी आवश्यक है ताकि सिंचाई की मितव्ययी परियोजनायें कुशलतापूर्वक चलायी जा सकें।
बेरोजगारी दूर करने तथा रोजगार को बढ़ावा देने के लिये आवश्यक है कि जनसंख्या के वास्तविक स्वरूप के आधार पर ही रोजगार योजनाओं का गठन किया जाये। ग्रामीण औद्योगीकरण तथा निर्माण उद्योग में बेरोजगारी का हल ढूढना चाहिये, ताकि अशिक्षित एवं अकुशल श्रमिकों के रोजगार की संभावनायें बढ़ायी जा सकें। विकासोन्मुखी नीति वे साथ-साथ सरकार को अपने व्यय में भारी कटौती करनी होगी, कटौती केवल पूंजीगत व्यय पर ही की जाती रही है, जो नकारात्मक प्रभाव डालती है।
इसके विपरीत नौकरशाही में भारी कटौती, अनावश्यक सेवाओं को समाप्त करना, आर्थिक क्रियाओं में अत्यधिक नियंत्रण को कम करना, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा का पूर्ण निजीकरण अथवा ऐसी संस्थाओं का पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करना, सूचना तकनीकी शिक्षा आदि प्रमुख उपाय हैं।

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