फल्गु बिहार की सांस्कृतिक नदी

फल्गु बिहार की सांस्कृतिक नदी

 

फल्गु बिहार की सांस्कृतिक नदी 

चिन्तन-मनन आचार, स्वधर्म सेवन, विविध कलाएं और विधाएं तथा ज्ञान-विज्ञान के समन्वय से जो अहर्निश आत्मा का कर्षण होता है तथा उससे जो श्वेत पुष्प खिलता है, उसी का नाम संस्कृति है। आचार और स्वधर्म-सेवन में ही करूणा, मैत्री, शान्ति, अहिंसा, अपरिग्रह, सम्यक् जीविका पर सेवा आदि धर्म सन्निहित हैं, जो आत्मा के सात्विक रूप हैं। ऐसी संस्कृति के निर्माण में जहां विविध शास्त्रों के ज्ञान, तप, कर्म, सामाजिक परिवेश, सत्पुरूषों के संग आदि कारण होते हैं, वहीं हमारे पास की भूमि, पर्वत, अरण्य एवं स्रोत-सरिताएं भी कारण बनते हैं। ये प्राकृतिक ऐश्वर्य मनुष्य के अभिन्न सामाजिक अंग हैं, अत: ये हमारे हृदय, स्वभाव, ऊर्जा एवं ज्ञान-चक्षु को सर्वदा प्रभावित करते रहते हैं, जिससे हमारी संस्कृति ढलती है।
बिहार राज्य के लोक-जीवन का भी मूलाधार ‘गंगा’ नदी है, जो ठीक सुषुम्णा की तरह, बिहार राज्य को दो भागों में विभक्त कर, जीवन, यौवन और स्पन्दन प्रदान करती रहती है। इसी गंगा के तट पर बक्सर, आरा, पाटलिपुत्र, मुंगेर और चम्पा जैसे
नगर बने-संवरे थे। इसी के तट में बठेद्वीप, आलवक चैत्य, द्रोणस्तूप, नृसिंह, सुदर्शन तीर्थ, सिक्खों का हरमन्दिर, हरिहर क्षेत्र, चम्पक तीर्थ, कष्ट हरणी, चण्डी स्थान, सोमतीर्थ (अजगैवीनाथ) दण्डार्पण तीर्थ, पुण्य भद्रचैत्य (चम्पा), जहुतीर्थ, बटेश्वर तीर्थ
(पत्थरघट्टा), विक्रमशिला, अदिति तीर्थ, शिलाचय तीर्थ आदि सांस्कृतिक पीठ स्थापित थे, जहां अनेक ऋषि मुनियों के संग एवं प्रवचन से भारतीय संस्कृति ने एक समय न केवल समस्त भारत को, बल्कि रूस, कजाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान तक, उत्तर में भूटान, तिब्बत, चीन, पूर्व में कम्बोडिया, जापान, वियतनाम, चम्पा तक को अपने सांस्कृतिक प्रकाश से देदीप्यमान कर दिया था। अत: बिहार राज्य में ।
गंगा नदी का सांस्कृतिक महत्व अतुलनीय है। गंगा नदी के अतिरिक्त भी जिन नदियों के पवित्र जल से बिहार राज्य की संस्कति ढली है, उनमें गण्डक, कमला, विशाला, कौशिकी, कर्मनाशा, पुनपुन, शोणभद्र, फल्गु (सुमागधा), शुक्तिमती (सकरी),
कृमिकाल (किडिल) ) ऋषिकुल्या और दामोदर नदियों का महत्व कुछ कम नहीं है। इन नदियों ने जहां बिहार-राज्य को प्राकृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण किया, वहीं सांस्कृतिक दृष्टि से भी भरपूर सम्पन्न किया है। ‘फल्गु’ कोई पृथक नदी नहीं है, बल्कि ‘निरंजना’ और ‘मोहना’ नदियों के संगम से बनती है। फल्गु का एक नाम ‘सुमागधा’ भी है। इसके ‘सुमागधा’ कहलाने का कारण यह था कि ब अति प्राचीन काल में इसे छिन्न-भिन्न करके इसके जल से सम्पूर्ण मगध क्षेत्र को शस्य-सम्पन्न और
हरा-भरा किया गया था। इसकी छिन्न-भिन्न धाराओं से जो कई नदियों बनती हैं, उनके नाम हैं- महाने, नोनई, बगही, करदुआ, मरही, लोकैन, धोबा, जलवार, डोंड, सूंड, बलदहा, महतमैन, भुतही, व कठौतिया।
फल्गु की छिन्न-भिन्न धाराओं से बनी इन सभी नदियों से पुराकाल में और आज भी मगध के खेत आबाद होते थे और होते हैं। इन छिन्न-भिन्न धारा-मार्गों के किनारे भी कई सांस्कृतिक आश्रम और मन्दिर बने थे। अत: फल्गु का नाम ‘सुमागधा’ विश्रुत था, जिसने इस पृथ्वी पर मगधों को विख्यात किया था ‘सुमागधा नदी रम्या मागधान विश्रुता भुविा’ जैसा कि लीलाजन (निरंजना) और ‘महानदी’ (मोहना) के संगम के बाद संयुक्त धारा का नाम फल्गु होता है। अत: ‘लीलापन’ और ‘मोहना’ के बारे में झारखंड राज्य के कुछ संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है- लीलाजन नदी हजारीबाग जिले के पश्चिमी भाग में स्थित ‘सिमरिया’ की आधिपत्या भूमि के कई स्रोत समूह से प्रकट होती है। सिमरिया हजारीबाग नगर से किंचित पश्चिमोत्तर कोण में 28 मील दूर है और ‘चतरा’ नामक अनुमंडल नगर से 13 मील दूर सीधे दक्षिण दिशा में स्थित है।
लीलाजन (निरंजना) नदी, सिमरिया के पूर्व में ही नदी का रूप स्थिर करके पहले पश्चिम में चलकर है और सिमरिया चतरा मार्ग को पार करके फिर उत्तर में मुड़ती है। इसी उत्तर वाही प्रवाह के द्वारा यह ‘बन्दारू’ पहुंचती है, जहां लीलाजन का बन्दारू’ एक गहरा खात है। यह ‘खात’ संसार के अद्भुत खातों में से एक है। यहां लीलाजन नदी शुद्ध पहाड़ को काटती है। और एक गहरा दर्रा द्वार पहाड़ को चीरकर बनाती है। इस जगह नदी पहले एक मनमोहक प्रपात बनाती है और यह प्रपात तथा कटाव चतरा से पांच मील दूर नैत्रहत्य कोण में बालूमाथा जाने वाली सड़क से एक मील दूर पश्चिमोत्तर कोण वाले घने अरण्य में है।
लीलाजन झारखंड प्रदेश के हजारीबाग जिले की भूमि पार कर जब गया जिले की भूमि में आती है, तब सबसे पहले प्रसिद्ध सांस्कृतिक स्थल ‘बोधगया’ पहुंचती है। बोधगया ठीक इसके बाएं तट पर स्थित है और यहीं इसके दाहिने तट पर ‘धर्मारण्य’ क्षेत्र है। धर्मारण्य का सांस्कृतिक महत्व ‘बोधगया’ से भी प्राचीन है। बोधगया का पुराना नाम ‘उरूविल्व’ अथवा ‘उरूबेला’ था, जो आज ध्वंसावशेष रूप में उरेल’ कहलाता है। यही निरंजना के एक घाट का नाम ‘सुपतिष्ठत’ तीर्थ, था, जहाँ भगवान बुद्ध से पहले एक सौ सहस्व बोधिसत्वों ने निरंजना में स्नान कर मोक्ष प्राप्त किया था। यहीं निरंजना की तटभूमि में वह वजभूमि है, जहां पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति के लिए तथागत ने अपना वजासन लगाया था।
इस स्थान के बारे में चीनी यात्री हेनसांग कहता है- निरंजना तट की यह वजभूमि विश्व के मध्य भाग में स्थित है। इसकी नाभि सोने के एक चक्के से ढंकी हुई है। सृष्टि के आरंभ के भद्रकल्प में इसकी रचना हुई है। यह ध्रुव है, नाश रहित है और संपूर्ण
पृथ्वी का बोझ थामे हुए है। निरंजना नदी के ही तट भूमि में वह वट वृक्ष भी था, जहां सुजाता ने तथागत को खीर खिलाई थी। खीर के थाल को लेकर बुद्ध ने निरंजना में जाकर और पूर्वाभिमुख हो खीर खायी तथा थाल को धारा के ऊपर फेंककर निरंजना के जल का पान किया था। उसी रात को तथागत ने पीपल वृक्ष के नीचे आसन जमाया और रात्रि के तीन प्रहरों में सारा तत्वज्ञान प्राप्त कर बुद्धत्व प्राप्त कर लिया। निरंजना तट की भूमि की ऐसी महिमा थी कि बुद्धत्व लाभ के बाद भी तथागत सात सप्ताहों तक अपने ज्ञान का निदिध्यासन-मनन निरंजना के किनारे जगह-जगह पर खड़े होकर करते रहे थे। इन सारे स्थानों पर चैत्य,
कायम हैं। जिन्हें अनिमेष चैत्य, चंक्रमण चैत्य, आजपाल चैत्य, रलगृह चैत्य, मूचलिन्द चैत्य तथा राजायतन चैत्य कहा जाता है। प्रथम सप्ताह तो उन्होंने वज्रासन पर ही बिताया था, बाकी छह सप्ताह उन्होंने उपर्युक्त छह चैत्य स्थानों पर व्यतीत किये थे।
वर्तमान में यह बोधिमंडप हजारों वर्षों से बौद्ध-संस्कृति का प्रकाश सारे संसार में विकीर्ण कर रहा है। इस बोधिमंडप में अनेक स्तूप विभिन्न देश के धर्मार्थियों के स्मारक स्वरूप बने हैं। यहां का बोधि-मन्दिर पांचवी शती में बना और प्रतिमा शिल्प का केन्द्रभूमि निरंजना का तट रहा। यहां जो बुद्ध और बोधिसत्वों तथा बौद्ध देवी-देवताओं की मूर्तियां गढ़ी गई, वे तमाम देश-देशान्तर में गई। आज यहां कितने ‘बिहार’ (विद्यापीठ) बने और बिगड़े, इसकी गणना असंभव है।
संसार का कौन ऐसा बौद्ध ज्ञानी तथा पंडित हुआ, जिसने यहां आकर अपने को पवित्र नहीं किया। मौर्य, शुंग, गुप्त एवं पाल तक बोधगया तपस्या, विविध विद्याओं एवं प्रतिमा विज्ञान का केन्द्र बना रहा। प्राचीन काल से लेकर आज तक के बौद्ध विद्वान
और बुद्ध भक्तों ने इस भूमि के धूलिकणों पर अपना माथा झुकाया है। आज भी यहां बर्मा, तिब्बत, जापान, चीन, लंका, कम्बोडिया, स्याम एवं वियतनाम आदि देशों के बौद्ध मंदिर विद्यमान हैं और इन देशों के बौद्ध साधु प्रतिदिन मंदिर में आकर
अपना सिर झुकाते और ज्ञान  लाभ करते हैं। यहां हिन्दु धर्म वाले भी आकर आने पित्तरों को पिण्डदान का सुफल प्राप्त करते हैं। यहां का हिन्दु संन्यासी मठ भी सैकड़ों वर्षों से शिव की पूजा अर्चना में संलग्न हैं और उसका विशाल मठ निरंजना के बाएं तट पर स्थित है। ‘माझिमनिकाय’ के ‘अरियपरिवेसन सुत्तक्त से स्पष्ट ज्ञात होता है कि तथागत प्रागबोधि पहाड़ी से अपनी तपस्या छोड़कर निरंजना की अतिशय रमणीयता के कारण ही ‘उरुवेला’ में आये जहां उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
निरंजना नदी बोधगया से कवल एक मील उत्तर में आकर अपनी सखी ‘मोहना’ से संगम करती है और अपना नाम लुप्त कर ‘फल्गु’ कहलाती है। मोहना झारखंड राज्य के हजारीबाग जिले में ‘मोहनी’ नाम से जानी जाती है। इसका उद्गम स्थल हजारीबाग से पश्चिम दिशा में ‘सिला’ नामक गांव की ऊंची पर्वतीय भूमि में है, जो ‘व्यतकमसंडी’ अंचल में है। कई स्रोत समूहों से मोहनी एक नदी का रूप लेती है, जिसके बनने में ‘चकोरा’ और ‘बल-वल’ निर्झरिणियों के स्रोत मुख्य हैं। फिर यह मरांगी गड़ही, निरी, बसनी, बरबाइ आदि नदियों का जल समेटती हुई हजारीबाग में 36 मील तक बहती है। यहां 4900 वर्ग मील भूमि का बरसाती जल उदरस्थ करती है। तब ‘मोहना’ नाम से गया जिले में दौड़ने लगती है मोहना-निरंजना का संगम बोधगया
अंचल में ही होता है और संगम स्थान से ऊपर (दक्षिण) दोनों नदियों की दो मील की दोआब भूमि ‘धारण्य’ क्षेत्र कहलाता है। यहां मोहना नदी का नाम ‘महानदी’ तथा ‘सरस्वती’ नदी भी कहा गया है। ‘धर्मारण्य क्षेत्र’ सम्पूर्ण भारत के अति प्राचीन सांस्कृतिक केन्द्रों में से अन्यतम है। पुराकाल में यहां समस्त पूर्वी भारत की संस्कृति ढली है और प्राचीन वैदिक धर्म व्यवस्थित किया गया सच पूछा जाए तो सम्राट अशोक के धर्म प्रचार के पहले यही भूमि वैदिक धर्म की गढ़ी थी, जहां अशोक ने भी बौद्ध संस्कृति का गढ़ स्थापित किया। उपर्युक्त दोनों नदियों की दोआब भूमि का नाम धर्मारण्य क्यों पड़ा? इसका उल्लेख युधिष्ठिर ने
यहां बड़ा भारी चातुर्मास्य यज्ञ किया था। अत: इसी कारण इसका नाम ‘धर्मारण्य’ पड़ा।
किन्तु ‘स्कन्दपुराण’ के धर्मारण्य खण्ड के अनुसार साक्षात धर्म (यमराज) ने यहां तपस्या की थी, जिससे यह स्थान ‘धर्मारण्य के नाम से विख्यात हुआ। इसके अतिरिक्त महाभारत (वन पर्व) में कहा गया है कि सांस्कृतिक क्षेत्र को अपने यज्ञ के लिए चुना। उन्हें एक ‘शमठ’ नामक ब्राह्मण ने इस क्षेत्र की महिमा बतलाई और कहा कि इस क्षेत्र में ‘अमूर्तरय गय’ ने ऐसा यज्ञ किया था, जिसमें अत्रों के कई पर्वत लग गये थे। हवनाज्य के लिए धृत के सैकड़ों कुण्ड बनाये गये थे। दूध-दही की नदियां बह गयी थीं और विविध प्रकार के व्यंजनों के बने पहाड़ों की तो गिनती ही नहीं थी। उस यज्ञ में ब्राह्मणों को दक्षिणा देते समय जो मंत्रोच्चार हो रहे थे, उनकी तुमुल ध्वनि से स्वर्गलोक तक गुंजित हो उठा था। पृथ्वी के सारे स्वर उसमें विलीन हो गये थे और दिशाएं तथा आकाश उन स्वरों से भर गये थे
अतः गया के यज्ञ की प्रशंसा सुनकर ही युधिष्ठिर ने अपना चातुर्मास्य यज्ञ यहां आराम किया थाा गया नगरी को स्थापित करने वाले ‘अमूर्तस्य गय’ने अकेले यहां एक सौ अश्वमेध, एक सौ नरमेश तथा एक हजार राजसूय यज्ञ किये तथा साक्षात गंगा नदी ने हिमालय से आकर महानदी (मोहना) के रूप में अपने जल के आचमन से तथा स्नान जल से संसार का कलुष धो दिया था (वामन पुराण)। अमुर्तरय गय चंद्रवंशी था एवं सुधुन का पुत्र था। गया नगरी इसी ने बसायी थी। यह धर्मारण्य क्षेत्र 16 मील में विस्तृत था, जिसके भीतर 55 ग्राम स्थित थे। यहां की प्रसिद्ध शिवमूर्ति धर्मेश्वर और विश्वेश्वर की थी। यहां की अट्टारिका शान्ता
और सुमंगला देवियों की मूर्तियां प्रतिष्ठित थी तथा मूलार्क मंदिर भी प्रसिद्ध था, जहां धर्म ने बैठकर तपस्या की थी। आज जहां मातंग वापी है, वहीं हाथी के रूप में बोधिसत्व ने अवतार लिया था। इसी जगह अष्टभुजी मातंगी देवी की मूर्ति भी पहले
स्थापित थी, जिसकी आंखों मद से घूर्णित थी और जो सूर्य एवं यात्र धारण किये हुए थी। स्कन्दपुराण धर्मारण्य क्षेत्र के वर्द्धमान, वापी और धर्मवापी की भी चर्चा करता है, जिसमें एक करोड़ तीर्थों का जल डाला गया था। इसी क्षेत्र में सुजाता का ‘सेना निगम’ गांव था, जहां वह प्रस्तर स्तंभ था। याँ तो कोश ग्रंथों में फल्गु का अर्थ रिक्त या शून्य मिलता है, किन्तु यहां फल्गु’ का अर्थ है
‘फलं ददाति च फल्गु’ अर्थात् जो फल दे, वह फल्ग है। अत: गया की फल्गु नदी में पिण्डदान का अर्थ होता है सुफल प्राप्त करना। संगम के बाद जहां इसका नाम ‘फल्गु’ पड़ता है, इसके दाहिने तट पर ‘गंजास’ की पहाड़ी है, जिस पहाड़ी पर लगभग पांच वर्षों तक सिद्धार्थ गौतम ने तपस्या की थी। इसी गंजास पहाड़ी को ‘प्राग्षोधि’ पर्वत भी कहा जाताहै। इसी का तीसरा नाम मुरा पहाड़ी भी है। किन्तु पहाड़ी के मध्य भाग का नाम ‘डोंगरा पहाड़’ है।
इसी डोंगरा पर ‘डुगेश्वरी’ देवी की वह अष्ठादशगुनी मूर्ति थी, जो बाद में बोधगया के संन्यासी मठ में उठा लायी गयी थी। इसी पवित्र स्थान पर सिद्धार्थ ने अपनी कठिन तपस्या की थी, जहां षड्वर्गीय भिक्षु इनके शिष्य बन गये थे और बाद में इन्हें त्यागकर
सारनाथ चले गये थे। इस स्थान को देखने चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था। हवेनसांग ने जिस स्थान की चर्चा की है, वहां
एक बड़ा-सा कृत्रिम चबूतरा है। यहां एक गोलाकृति प्रस्तर-भवन की नींव भी वर्तमान है। यहां गुफा से और ऊपर पर्वत के शिखर भाग पर सात छोटे-बड़े स्तूपों के अवशेष आज भी प्राप्त हैं। हवेनसांग ने यह भी लिखा है कि इस पहाड़ी को तीर्थ
मानकर सम्राट अशोक यहां आये थे और उन्होंने ही यहां कई स्मारकों का निर्माण कराया था। फल्गु के दाहिने तट की यह प्राग्बोधि पहाड़ी एक महान सांस्कृतिक स्थल है।
यहीं फल्गु के वाम पार्श्व में ‘ब्रह्मयोनि’ नामक पर्वत है। ब्रह्मयोनि दो पर्वत शिलाओं की एक दरार है, जिसमें अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए पेट पीठ के बल से लोग प्रवेश करके बाहर निकलते हैं। इसी का नाम गयाशीर्ष है। फल्गु तट के इस गया-तीर्थ की महिमा महाभारत के वन पर्व में बतायी गयी है। इससे पता चलता है कि ब्रह्मयोनि का नाम ‘पवित्रकूटा था। महाभारत में भी गया · पिण्डदान और तर्पण का महत्व प्रतिपादित है। वायुपुराण के अनुसार फल्गु नदी तट के गया नगर में ऐसा कोई स्थान नहीं, जहां तीर्थ नहीं हो। उसके अनुसार किसी की सन्तान गया तीर्थ में जाए तो उसके लिए ब्रह्मज्ञान, गोशाला में मृत्यु तथा कुरूक्षेत्र तीर्थ का वास व्यर्थ है। इस पुराण के अनुसार गया नगर के मध्य त्रैलोक्य के सभी तीर्थ बरसेते हैं। गया में जिनकी भी प्रस्तर-प्रतिमाएं भिन्न-भिन्न देवताओं के नाम से विख्यात हैं, जो साक्षात् देवस्वरूप उसके शरीर पर बैठे हैं।
गया कहलाने वाला नगर पर्वत खण्ड पर बसा है, जिसके दक्षिणी भाग में विष्णुपद का मंदिर है, जो बिल्कुल फल्गु नदी के कगार पर स्थित है। विष्णुपद का सम्पूर्ण मंदिर काले ग्रेनाइट पत्थरों को तराशकर बनाया गया है, जिसे 1757 ई. लगभग
अहिल्याबाई ने बनवाया था और इसके शिल्पी जयपुर नगर से लाये गये थे। मण्डप की छत आठ कतारों में खड़े प्रस्तर-स्तंभों पर टिकी हुई है। इसकी गुम्बज एक पहाड़ी गुफा की आकृति में आठ पहल वाली है। मंदिर की वास्तुकला दक्षिण के कांजीवरम् मंदिर की बनावट की तरह है।
गया का धेनुक तीर्थ तो अब प्रायः जनमानस से मिट गया है, जो महाभारत के रचनाकाल में अत्यंत प्रसिद्ध था। महाभारत के अनुसार सवत्सा कपिला गया के खुरों का जहां चिन्ह है, वहीं धनुक तीर्थ है। इन पद-चिन्हों को स्पर्श करने वाला पापी भी
अपना सारा कलुप धो लेता है। यह तीर्थ वहीं था, जहां आजकल छावनी है तथा जहां “सिंगरा’ नामक एक मठ है। इस मठ का निर्माण 1560 ई. में हुआ था। यहां प्रतिवर्ष पहले श्रावण मास में मेला लगता था। इसी के दक्षिण पर्वत में गाय-बछड़े की एक प्रस्तर मूर्ति है, जहां तीर्थयात्री जाते हैं। आज से पचास वर्ष पूर्व इस स्थान पर भग्न भवनों के अवशेष विद्यमान थे। यह तीर्थ बड़ा ही पवित्र क्षेत्र था। उत्तरमानस और दक्षिणमानस के सूर्य मंदिर और मूर्तियों की ख्याति बहुत है और तीर्थयात्रियों की भीड़ लगी रहती है। गौर देश के राजा धर्मपाल ने गया के शीतला मंदिर तथा सूर्य मंदिर का संस्कार करवाकर सरोवर खुदवाया था तथा
एक अभिलेख भी लिखवाया था। जिह्वालोल तीर्थ फल्गु नदी का ही एक घाट है, जहां पित्तरों को पिंडदान दिया जाता है। नदी के ब्राह्मणी घाट के उत्तर में गया का प्रसिद्ध ‘पिता-महेश्वर’ शिव मंदिर है, जहां शिवरात्रि को भक्तगण रातभर जागकर पूजा-अर्चना करते हैं।
उत्तरमानस के सामने फल्गु नदी के दाहिने तट- भाग में ‘रामगया तीर्थ’ है, जहां राम ने अपने पिता दशरथ की आत्मा की तृप्ति के लिए पिण्डदान किया था। इसी जगह फल्गु नदी में सीताकुंड नामक स्थान है, जहां दूध-मिश्रित जल फल्गु नदी में बहता है। किन्तु अब यह तीर्थ लुप्त हो गया है। उत्तरमानस और दक्षिण मानस की सूर्य मूर्तियां सात घोड़ों पर सवार हैं। प्रतिमाओं की बनावट तत्कालीन शिल्प का नमूना है। गया चौक के घड़ी-घर के सामने दु:खहरणी देवी का प्रसिद्ध मंदिर फल्गु के तट पर ही खड़ा है। यह मंदिर भी गया का प्रसिद्ध तीर्थ है। रामशिला पर्वत को ही ‘प्रभासाद्रि’ कहा जाता है, जो फल्गु नदी के वाम पार्श्व में
स्थित है। वायु पुराण के अनुसार इसी स्थान पर राम-लक्ष्मण ने पित्तरों की तृप्ति के लिए तर्पण फल्गु में किया था। इस प्रकार फल्गु नदी ने गया नगरी में युगों से जो हमारी संस्कृति गढ़ी है, वह वर्णनातीत है।
रामशिला पहाड़ी के पूर्वी भाग में छह मील उत्तर में बाएं भाग में बराबर पर्वत है। सुदामा गुफा के द्वार पर उत्कीर्ण लेख में ‘बराबर’ का नाम ‘प्रवरगिरि’ आया है और इसी का बिगड़ा रूप ‘बराबर’ है। इसका शिलालेखों में खलतिक’ आया है। पंतजलि ने भी खलतिकस्य पर्वतस्यादूर भवानि खलतिंक बनानि नाम से खलतिक का उल्लेख किया है। गोरथगिरि राजगृह के दक्षिणी भाग का पर्वत है, जिसके स्कन्द देश में आज भी बैलगाड़ियों के पहिये की रगड़ के चिन्ह पाए जाते हैं। फल्गु नदी के बाएं भाग में ही एक पहाड़ी बराबर पर्वत से हटकर कौआ डोल’ है। यह पहाड़ी एक स्तूप की तरह खड़ी है। पूरी पहाड़ी काले और कड़ी ग्रेनाइट चट्टान की है, जिसका एक शिखर भाग ध्वज दंड की तरह खड़ा है। यहीं पादभूमि में नालंदा के प्रसिद्ध आचार्य शीलभद्र का आश्रम था। उसी विद्यापीठ में स्वेनसांग ने कुछ दिन अध्ययन किया था। आश्रम के भग्नावशेषों से पता चलता है कि
तेरह मोटे मोटे प्रस्तर-स्तम्भों पर आश्रम का बरामदा खड़ा था और आश्रम की दीवारें प्राचीन ईटों से बनी थीं। यहां महिषासुर मर्दिनी दुर्गा की एक मूर्ति थी, जो चतुर्भुजी थी। बौद्ध-प्रतिमाओं में बुद्ध, बजसत्व और प्रज्ञा पारमिता की एक-एक मूर्ति विद्यमान थी। यह आश्रम मौखरियों के शासनकाल में बना था, जो शीलभद्र आचार्य की देख-रेख में चलता था।
बराबर पर्वत के मुख्य शिखर भाग का नाम मुरली, खण्डागिरी और सिद्धेश्वर है। सिद्धेश्वर भाग उसका नाम है, जहां सिद्धेश्वरनाथ महादेव का मंदिर है। सिद्धेश्वरनाथ महादेव मंदिर में पूरे श्रावण एंव भादो मास में मेला लगता है। सिद्धेश्वरलिंग
की स्थापना सातवीं शती में ही किसी ‘योगानन्द’ नामक ब्राह्मण ने कराई थी, जिसका अभिलेख यहां वापिका गुहा में उत्कीर्ण
है। मंदिर के समीप ही एक प्राकृतिक कुण्ड है, जिसे ‘पातालगंगा’ कहा जाता है। यह बराबर पर्वत सम्पूर्ण भारत का सांस्कृतिक पीठ रहा है, जहां प्राचीन काल में अनेक सम्प्रदाय के ऋषि-मुनि वास करते थे। इन्हीं ऋषि-मुनियों के निवास के लिए सम्राट अशोक ने कई गुफाएं बनवायी थी। अशोक के पौत्र दशरथ ने भी गुफाएं बनवायी तथा मौखरि राजाओं ने भी
गुफाएं बनवाकर मुनियों के निवास के लिए दान में दी थी।
बराबर पहाड़ के दक्षिणी भाग में और फल्गु के वामपार्श्व में काले पत्थरों की कई गुफाएं हैं, जिनमें ‘कर्ण चउमर’ नामक गुफा सबसे बड़ी है। इसे आजकल ‘कर्ण झोपड़ी’ कहा जाता है। इसमें उत्कीर्ण अभिलेख से पता चलता है कि इसे अपने राज्यारोहण के बारहवें वर्ष में अशोक ने बनवाकर आजीवक संप्रदाय के साधुओं के लिए दान कर दिया था। इसी तरह यहां सुदामा गुफा है, जिसका नाम ‘सुप्रिया’ गुफा था। इसी प्रकार लोमश, विश्वामित्र झोंपड़ी आदि सात गुफाएं अशोक द्वारा निर्मित हैं और प्रत्येक में अभिलेख खुदे हैं। इसके बाद मुस्लिम शासन काल में हाजी हुरमैन नामक फकीर ने यहां अपना आश्रय बनाया और उसके शिष्यों ने यहां 260 चेले स्थापित किये थे। हाजी हुरमैन के पौत्र कुतुबन की यादगार में यहां  ‘कुतुबन चक’ नामक गांव बसा है। इनके वंशधर ‘बलियारी’ और ‘सोहो’ ग्राम आज भी हैं, जो मुसलमानों के गुरू घराने माने जाते हैं।
नागार्जुनी ‘ पहाड़ी की घाटी में ‘गुनमती’ नामक आश्रम था, जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है। इसी स्थान से साढ़े तीन मील दूर नैऋत्य कोण में शीलभद्र का कौआडोल पर्वत वाला आश्रम स्थित है। बराबार पर्वत के समीप फल्गु की एक शाखा के तट पर चन्द्रडीहा ग्राम है,जहां मौखरि वंश के राजा चन्द्रसेन का गढ़ था। इसकी भुतही शाखा के किनारे मुरगवां ग्राम में जगदम्बा की एक विशाल मूर्ति है, जो बहुत ही प्रसिद्ध है। फल्गु के मोहाने शाखा के तट पर ही ‘लाट’ और ‘दक्धु’ नामक ग्राम हैं। दक्यु नामक ग्राम के बारे में बुकानन नामक अंग्रेज ने इसे देखकर 175 वर्ष पूर्व कहा यहां एक साथ पांच मंदिर हैं। उत्तर वाले मंदिर के पास मिट्टी के किले का ध्वंसावशेष भी हैं। एक मंदिर का नाम पार्श्वनाथ था, जो वस्तुतः बौद्ध मंदिर है। पार्श्वनाथ मंदिर और
बगीचे के मध्य में अनेक प्रस्तर प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं। एक खंडित मूर्ति थी, जो नृत्य की मुद्रा में थी और जिसका एक पैर बैल की पीठ पर तथा दूसरा पाद पीठ पर आसीन था। इस मूर्ति की कई भुजाएं थीं। लोग इसे पशुपतिनाथ महादेव कहते थे। यह मूर्ति कवच पहली एक स्त्री-मूर्ति से संयुक्त भी थी। स्त्री के हाथ शस्त्रों से रहित थे, एक हाथ में ‘कठताल’ लिये हुए थी। निश्चय ही पार्वती से युक्त नटराज शिव की यह मूर्ति है, जिसका मस्तक टूट गया है। एक शिवलिंग के चारों तरफ चार सिर हैं,
जो नेपाल के पशुपतिनाथ महादेव की मूर्ति से मिलती-जुलती है। पार्श्वनाथ मंदिर के पश्चिम में दक्षिण से उत्तर की ओर पंक्ति में चार मंदिर खड़े हैं। इनमें दो मंदिर कन्हैया के थे, जिनमें लक्ष्मीनारायण ओर वासुदेव की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं’। इस मंदिर
के दक्षिण में सूर्य का मंदिर हैं यह मंदिर बहुत हीं प्राचीन है।
इस प्रकार फल्गु की शाखा नदी मोहाने का तट भी मगध संस्कृति का मुख्य जनक रहा है। ये सभी मंदिर मौखरियों के शासन-काल के माने जाते हैं तथा ये सभी देवायतन उसी काल के थे। इसी मोहाने के तट में औंगारी ग्राम भी हैं, जो पटना जिले के
सकंगरसराय थाने में हैं। यहां छठ व्रत का बड़ा भारी मेला लगता है। सूर्य सरोवर के चारों और कई देव-मंदिर हैं। मुख्य
मंदिर की सूर्य प्रतिमा भी सात अश्वां वाले रथ पर आरूढ़ है। यहां विष्णु नामक सूर्य मूर्ति भी है, जो वासुदेव कहलाती है। सरोवर
के पश्चिमी किनारे एक ‘नागनाथ’ नामक स्थान है, जहां अनेक मूर्तियां रखी हुई थीं। इनमें हरगौरी, गणेश तथा बोधिसत्वों की प्रतिमाएं उल्लेखित थी। गांव के भीतर जगदम्बा की प्रतिमा भी दर्शनीय है। यहां मकरासीन गंगा, सरस्वती एवं गौरी शेर की मूर्तियां तो आज भी विद्यमान है। यहां चतुर्भुजी पार्वती की मूर्ति गणेश को गोद में लिये बैठी हुई है। इस प्रकार औंगारी’ स्थान भी एक सांस्कृतिक पीठ है, जिसको स्थापना में फल्गु की उपधारा नदी मोहाने की ही देन कहा जा सकता है।

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