विभाजित बिहार का आर्थिक विकास : चुनौतियां और संभावनाएं

विभाजित बिहार का आर्थिक विकास : चुनौतियां और संभावनाएं

बीसवीं शताब्दी का अंतिम वर्ष, 14-15 नवंबर की मध्य रात्रि, जब बिहार विभाजित हो गया। विभाजन के फलस्वरूप करीब 67 प्रतिशत राजस्व स्रोत झारखंड में चले गए, 33 प्रतिशत बिहार में रह गए जबकि आबादी का 65 प्रतिशत बिहार में और मात्र 35 प्रतिशत झारखंड में गया। अर्थात आय के स्रोत उधर और उपभोक्ताओं का विशाल समूह इधर। कल-कारखाने, खनिज संपदा और बहुमूल्य लकड़ियों का जंगल उधर चला गया तो इधर रह गई कृषि आधारित अर्थव्यवस्था जो कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे तो तबाह रहती है। लेकिन इतनी हताशा की भी जरूरत नहीं है।
आवश्यकता है विकास की संभावनाओं एवं संभाव्यताओं को ढूंढ निकालने की, आत्म-मंथन की और प्रगति के पथ पर अग्रसर होने की। शेष बिहार में भी विकास की संभावनाएं हैं। अगर रत्न-गर्भा वसुंधरा झारखंड में चली गई, तो शस्यश्यामला भूमि
बिहार में हैं, जो विश्व की सर्वाधिक उपजाऊ भूमि में से एक है। अगर खनिज और वन-संपदा उधर गई तो जल-संपदा इधर है और समुचित जल प्रबंध न की नीति अपनाने पर न केवल बाढ़ का नियंत्रण होगा, बल्कि सिंचाई के स्रोत भी विकसित होंगे,
जल-विद्युत का उत्पादन बढ़ेगा और मत्स्य पालन तथा मखाना की खेती जैसे अति लाभदायक धंध भी विकसित होंगे। पुन: अगर राजस्व स्रोत झारखंड में गए हैं तो व्यय में मद भी अधिकतर उधर ही गए हैं क्योंकि प्रति व्यक्ति योजना-व्यय ज्यादा ही होता रहा है। आठवीं पंचवर्षीय योजना में प्रति व्यक्ति विनियोग झारखंड में 2297 रुपये था और शेष बिहार में 1506 रुपये। नि:संदेह शेष बिहार में राजस्व स्रोत सीमित हैं, लेकिन जब साधन सीमित हों तो आवश्यकता केवल उनके उपयोग की नहीं बल्कि सदुपयोग की होती है और उसके लिए जरूरी है दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति, सुदृढ़, स्वच्छ एवं कृतसंकल्प प्रशासनिक तंत्र, विकास की सही व्यूह-रचना और दिशा-निर्देशन, केंद्र-राज्य सहयोग, जनता में जागरूकता और उनकी
सहभागिता, विकास की मानसिकता, कठोर परिश्रम, त्याग एवं सामाजिक समरसता। कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था भी विकास पथ पर अग्रसर हो सकती है। पंजाब और हरियाणा की अर्थव्यवस्था तो कृषि आधारित अर्थव्यवस्था रही है, लेकिन उनके
विकास में कृषि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1997-98 में पंजाब का प्रति व्यक्ति शुद्ध घरेलू उत्पाद 19,500 रुपये था, हरियाणा का 17,626 रुपये जबकि बिहार का मात्र 4,654 रुपये। राष्ट्रीय औसत भी 14,682.3 रुपये के बराबर था। (आर्थिक
सर्वेक्षण, 1999-2000)। बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन का इतिहास लंबा है। आजादी के बाद समृद्धि की दृष्टि से प्रति व्यक्ति
आय के आधार पर विभिन्न राज्यों के श्रृंखला में बिहार पांचवें स्थान पर था, लेकिन सत्तर के दशक तक सबसे नीचे चला गया और आज विभाजन के बाद भी उसी जगह पर कायम है।
विभाजन के पूर्व देश के कुल क्षेत्रफल के केवल 5 प्रतिशत बिहार के पास था, जबकि आबादी का 10 प्रतिशत। विभाजन के बाद क्षेत्रफल का करीब 3 प्रतिशत और आबादी का करीब 7-8 प्रतिशत भाग। वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार राज्य
की आबादी का करीब 86 प्रतिशत भाग गांवों में रहता है। उत्तरी बिहार में यह अनुपात 93 प्रतिशत है और मध्य बिहार में 83
प्रतिशत। कार्यकारी श्रमशक्ति का करीब 87 प्रतिशत उत्तरी बिहार में और 80 प्रतिशत मध्य बिहार में कृषि पर आश्रित है। वर्ष 1998 में देश के अत्यधिक पिछडे 100 जिलों में से 38 जिले केवल बिहार में थे, जिनमें से 19 उत्तरी बिहार में, 8 मध्य बिहार में और शेष दक्षिण बिहार या आज के झारखंड में वर्ष 1995-96 में देश के कारखाना क्षेत्र के कुल रोजगार में बिहार का हिस्सा केवल 3.3 प्रतिशत था, कुल निवेशित पूंजी में 4.4 प्रतिशत और कुल कारखाना उत्पादन 3.3 प्रतिशत जबकि महाराष्ट्र का इन तीनों में क्रमश: 15.1 प्रतिशत, 18.3 प्रतिशत एवं 22. 2 प्रतिशत हिस्सा था। गुजरात के लिए यह हिस्सा क्रमश: 9.5, 14.6 और 12.6 प्रतिशत था। वर्ष 1997 98 में साख जमा अनुपात का राष्ट्रीय औसत 57.3 प्रतिशत था, तमिलनाडु में 100.4 प्रतिशत,
आंध्र प्रदेश में 77.6 प्रतिशत, महाराष्ट्र में (68.7 प्रतिशत और अविभाजित विहार में 18.6 प्रतिशत विभाजन के बाद तो स्थिति भयावह है। जो थोडे से उद्योग-धंधे हैं, अधिकांशत: बंद पडे हैं। रोहताश इंडस्ट्रीज का सबसे बड़ा औद्योगिक समूह, अशोक
पेपर मिल आदि के साथ साथ सार्वजनिक क्षेत्र की 18 चीनी मिलें वर्षों से बंद हैं। कुछेक उपक्रमों को छोड़ राज्य से सभी सार्वजनिक उपक्रप रुग्णता के शिकार हैं। निजी क्षेत्र में भी उद्यमशीलता का अभाव है। विद्युत क्षमता का करीब 80
प्रतिशत भाग झारखंड में चला गया। कृषि की स्थिति भी दयनीय है। भूमि सुधार दूर का सपना है, ‘जमीन जो जोते उसकी’
राजनीति के भंवर लाल में फंस गई है, सिंचाई की सुविधाएं सीमित हैं और विपणन की व्यवस्था अत्यधिक त्रुटिपूर्ण। किसानों के लागत व्यय में वृद्धि होती जा रही है क्योंकि उत्पादन के साधन उन्हें संगठित बाजार से मिलते हैं, जहां मूल्य पर इनका कोई
नियंत्रण नहीं। दूसरी ओर कृषि उपादों को असंगठित बाजार में बेचना पड़ता है जहां उनकी विवशता उन्हें उचित मूल्य नहीं लेने देती है। सिंचाई सुविधाओं का स्तर राज्य में (करीब 51 प्रतिशत) राष्ट्रीय स्तर से ऊपर है लेकिन कुल उपजाए गए क्षेत्र के ऊपर सिंचाई कवरेज के रूप में देखा जाए तो पंजाब में यह स्तर 95 प्रतिशत, हरियाणा में 78 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 58 प्रतिशत और बिहार में मात्र 43 प्रतिशत है। जोती गई भूमि का क्षेत्रफल सिमटता जा रहा है। वर्ष 1990 में 9,437.7 हजार हेक्टेयर भूमि पर खेती की गई जबकि 1997-98 में केवल 8,8346 हजार हेक्टेयर भूमि पर।
आज हम पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। केंद्र और राज्य सरकारें एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही हैं, लेकिन भविष्य की योजनाओं का निर्माण और संचालन अत्यंत मंधर गति से हो रहा है। केंद्र सम्पोषित परियोजनाओं के लिए जमीन भी उपलब्ध नहीं कराई
जा रही है। न तो कार्य संस्कृति का विकास हो रहा है और न हीन भावना का निवारण। विकास की मनोवृत्ति के बिना विकास की कल्पना निरर्थक है, लेकिन उस मनोवृत्ति के लिए भी आवश्यक है विकास का माहौल, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिवेश, जिसका राज्य के अंतर्गत घनघोर अभाव है। राज्य में एक ओर आर्थिक एवं सामाजिक अधोसंरचनात्मक सुविधाओं का अभाव है तो दूसरी और व्याप्त तनाव, अपहरण, रंगदारी, कमीशनखोरी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार,जो उद्यमशीलता को कुंठित कर रहे हैं। निम्न साख-जमा अनुपात के लिए हम वित्तीय संस्थाओं को कोसते हैं लेकिन हमारे उद्यमियों की मानसिकता ने इन संस्थाओं के समक्ष ऋण वापसी की विकट समस्या उत्पन्न कर दी है।
बाहरी उद्यमी बिहार में निवेश को बर्बादी मानते हैं और जब तक उन्हें समुचित सुरक्षा और निवेश की गारंटी नहीं मिलती,
वे बिहार की धरती पर ज्यादा निवेश नहीं कर सकते। अगर श्रम शक्ति को देखा जाए तो लाखों की तादाद में हमारी श्रमशक्ति पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात या कई अन्य राज्यों की अर्थव्यवस्था को सुधारने में लगी है, लेकिन बिहार में हम उनके परिश्रम का समुचित लाभ नहीं ले पाते। न तो उन्हें रोजगार का समुचित अवसर दे पा रहे हैं और न आय के समुचित और सुनिश्चित स्रोत। भूमि सुधार कार्यक्रम सफल नहीं हो पाए, बड़े ।
किसानों में सामंती मनोवृत्ति अभी भी मौजूद है और मजदूरों को मिल रहा है जातिवाद और उग्रवाद का प्रशिक्षण, खोखले नारे और झूठे वायदे। विभाजन के पूर्व राज्य के केवल 0.45 प्रतिशत बड़े किसानों के हाथों में 7.70 प्रतिशत भूमि का स्वामित्व सिमटा है, जबकि 76.65 प्रतिशत सीमांत किसानों के पास मात्र 30.30 प्रतिशत भू-भाग का स्वामित्व है। वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल श्रमशक्ति 256.19 लाख थी। जिसमें ।। 1.64 लाख किसान और 95.11 लाख कृषि मजदूर थे।
अधिकांश कृषि मजदूरों का अब दूसरे राज्यों की ओर पलायन हो रहा है। विकास के लिए हमें जो वित्तीय साधन मिल रहे हैं, उनका उपयोग करने में भी हम काफी पीछे हैं। राज्य की नौवीं पंचवर्षीय योजना में 16,680.01 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई, लेकिन प्रथम तीन वर्षों में कुल खर्च केवल 6,118.18 करोड़ रुपये के बराबर है जोकि कुल स्वीकृत राशि की केवल
37 प्रतिशत राशि के बराबर है। योजना आयोग के एक अध्ययन के अनुसार बिहार में 1992-96 के दौरान बाह्य वित्त सम्पोषित 12,151.59 करोड़ रुपये की विमुक्त राशि में से केवल 162.92 करोड़ रुपये का उपयोग हुआ जो कि कुल विमुक्त राशि का बहुत छोटा भाग है, जबकि इसी अवधि में पांच विकसित राज्यों ने 70 प्रतिशत राशि का उपयोग किया। ऐसी अक्षमता की पुनरावृत्ति शेष बिहार के लिए आत्मघाती होगी। उसी तरह पंचायत चुनावों के अभाव में ग्रामीण विकास के लिए अधिकृत करीब 175 करोड़ रुपये वार्षिक का उपयोग नहीं हो पा रहा है। ग्यारहवें वित्त आयोग ने भी संसाधनों के आबंटन में राज्य के प्रति उदारता दिखलाई है किंतु आवश्यकता साधनों के सदुपयोग की है।
राज्य की आय के आंतरिक स्रोत सीमित हैं। कर राजस्व ही आय का सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन एक ओर इसके आधार सीमित हैं तो दूसरी ओर कर-वंचना की प्रबल प्रवृत्तिा बिक्री कर और खनिज संपदा से मिलने वाली रायल्टी राज्य के राजस्व में
मुख्य स्रोत थे, लेकिन उनका बहुत बड़ा भाग झारखंड में चला गया। फिर भी शेष बिहार में बिक्री कर, राज्य उत्पाद शुल्क, रजिस्ट्रेशन शुल्क, परिवहन शुल्क, व्यवसाय कर, भू राजस्व, सिंचाई शुल्क आदि जो राजस्व स्रोत हैं, उनकी अगर सही वसूली
की जाए तो एक बड़े राजस्व की प्राप्ति हो सकती है। लेकिन कर वसूली के क्षेत्र में भयंकर प्रशासनिक भ्रष्टाचार और कर वंचना की समस्या है। सरकार को इस दिशा में तत्पर होना होगा अन्यथा राजस्व के स्रोत सूखे रहेंगे, विकास अवरुद्ध रहेगा और
स्थापना-व्यय के लिए भी साधन नहीं जुट पाएंगे। ग्यारहवें वित्त आयोग ने राज्य सरकारों को कृषि आय पर भी करारोपण की सलाह दी है। साधन जुटाने के प्रयासों के साथ-साथ साधनों के अपव्यय को रोकने का भी यथासंभव प्रयास होना चाहिए।
बिहार कृषि-प्रधान राज्य होते हुए भी कृषि के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। उत्तरी बिहार अगर बाढ़ और जल-जमाव
से ग्रस्त है तो मध्य बिहार का निचला भाग भी इससे अछूता नहीं है। कुछ इलाके उग्रवाद और आतंकवाद से प्रभावित
हैं। जमीन परती है, खेती प्रतिबंधित है। फिर भी किसानों को अगर यथासमय समुचित साख, प्रमाणित बीज, खाद, सिंचाई, कृषि-उत्पादों के समुचित भंडारण और उचित मूल्य तथा विक्रय की व्यवस्था निश्चित की जाए तो नि:संदेह कृषि का तीव्र विकास होगा। बिहार के किसान प्रगतिशील हैं लेकिन सिंचाई सुविधाओं के अभाव में पंगु हैं। सिंचाई की जो संभाव्यताएं हैं, उनका उपयोग करने में हम काफी पीछे हैं। ये सिंचाई संभाव्यताएं वृहद एवं मध्यम परियोजनाओं के माध्यम से 66 लाख हेक्टेयर, जमीन-तल पर उपलब्ध लघु सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से 19 लाख हेक्टेयर और जमीन तल के नीचे उपलब्ध जल-भंडार से 72 लाख हेक्टेयर ।
तक हैं, लेकिन वर्तमान उपयोग केवल क्रमश: 27. 66 लाख हेक्टेयर, 13.77 लाख हेक्टेयर और 39.17 लाख हेक्टेयर है।
बिहार में कृषि में निम्र उत्पादकता के साथ दो: अन्य मुख्य विशेषाएं हैं: (क) खाद्य फसलों की अत्यधिक प्रधानता, और (ख) लघु एवं सीमांत  किसानों की अत्यधिक संख्या, जिनके पास पूंजीगत साधनों का अभाव है। खाद्य फसलों की प्रधानता कृषि का पूर्ण वाणिज्यीकरण नहीं होने दे रही है।
कृषि मात्र निर्वाह क्षेत्र बनी हुई है और दूसरी ओर इनकी मांग की सीमित लोचशीलता किसानों को निम्न आय स्वीकार करने पर विवश बनाए हुए है। अत: आवश्कता है कृषि उत्पादों के विविधीकरण की, जो निर्यात संवर्द्धन का भी स्रोत बन सकते हैं। सब्जी, फलों, फूलों, मशरूम, मखाना, औषधि और रासायनिक उत्पादों से संबंधित कृषि वस्तुओं द्वारा किसानों के बीच आसानी से संपन्नता लाई जा सकती है और बिहार भी आसानी से समृद्धि की ओर अग्रसर हो सकता है, लेकिन इस सब के
लिए सरकारी प्रोत्साहन और संरक्षण की भी जरुरत है। इन उत्पादों के लिए न केवल देश में बल्कि विदेश में भी व्यापक बाजार उपलब्ध हैं।
सब्जी उत्पादन में बिहार देश में दूसरे स्थान पर और फलोत्पादन में चौथे स्थान पर है। विदेशों में भी इसकी काफी खपत है, लेकिन जरुरत है इनकी गुणवत्ता नियंत्रण, उचित प्रसंस्करण, समुचित पैकिंग और यथोचित ट्रांसपोर्टेशन और विपणन सुविधाओं की। सरकार के लिए जरूरी है कि इस दिशा में सही प्रशिक्षण, साख सुविधा और विपणन में सहायता करे। अनेक कृषि उत्पाद कृषि-आधारित उद्योगों जैसी चीनी उद्योग, जूट उद्योग, वनस्पति उद्योग, चावल उद्योग तथा इनके सह-उद्योगों के विकास में भी काफी सहायक हो सकते हैं। लेकिन वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक युग में लागत नियंत्रण और गुणवत्ता सुधार के लिए सतत प्रयत्नशील रहना पड़ेगा।
जहां तक शेष बिहार के औद्योगीकरण का प्रश्न है, दो तरीके अनिवार्य हैं-(क) पुराने एवं बंद पड़े उद्योगों में अगर संभावना हो तो उन्हें पुनर्जीवित करना, और (ख) बिहार की धरती के लिए उपयुक्त उद्योगों को स्थापित करना। जहां तक पुराने उद्योगों के पुनर्जीवन का प्रश्न है, सरकार अधोसंरचनात्मक सुविधाएं अवश्य उपलब्ध कराए लेकिन स्वामित्व का भार न उठाए। सरकारी क्षेत्र के भी जो बंद या मृतप्राय उपक्रम हैं, उन्हें निजी क्षेत्र को सौंप देने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र के
कुछ खास उपक्रम जिनकी उपयुक्ता संदिग्ध है और प्राण फूंकने की संभावना नहीं है, उन्हें पूर्णत: बंद कर देने की ही आवश्यकता है। सार्वजनिक क्षेत्र की बंद पड़ी चीनी मिलों के निजीकरण की प्रक्रिया शुरु हो गई है। शेष बिहार में केंद्र सरकार के भी कुछ उपक्रम जैसे एशिया प्रसिद्ध अमझोर का सुपर फास्फेट प्लांट, बंद होने के कगार पर है और इनके पुनर्जीवन के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की आवश्यकता है। राज्य के सबसे बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान डालमिया नगर के रोहतास
उद्योग समूह को फिर से खुलवाने में सरकार को पूर्ण बाह्य सहयोग और दबाव की नीति अपनानी चाहिए। लेकिन निजी क्षेत्र को भी आगे बढ़ाने के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण होना चाहिए।
प्रशासनिक सहयोग और तत्परता के साथ-साथ एक शांत, प्रेरक और तनावमुक्त माहौल में ही निजी उद्यमी आगे बढ़
सकते हैं। नए उद्योगों की स्थापना में कृषि-आधारित उपक्रमों को प्रधानता दी जानी चाहिए। इनके विकास के लिए आवश्यक साधन शेष बिहार में आसानी से उपलब्ध हैं और देश-विदेश में इनका बाजार भी व्यापक है। भूमंडलीकरण की वर्तमान प्रक्रिया में विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी यें सहायक होंगे। बिहार चीनी का एक बहुत बड़ा उत्पादक राज्य आसानी से बन सकता है। चावल चीनी उद्योगों के अवशिष्टों से वनस्पति उद्योग, स्पीट और अल्कोहल उद्योग, कागज उद्योग आदि आसानी से विकसित हो सकते हैं। फलों पर आधारित उद्योगों के विकास की यहां व्यापक संभावनाएं हैं। अन्य कृषि उत्पादों से भी औद्योगिक विकास की संभावनाएं हैं। निजी क्षेत्र के उद्यमी अगर उचित माहौल मिलें तो इन क्षेत्रों में आसानी से आगे बढ़ने के लिए तत्पर है। औद्योगिक विकास बैंक, औद्योगिक वित्त निगम, औद्योगिक साख और विनियोग निगम आदि संस्थाओं के लिए
बिहार आकर्षण का केंद्र नहीं रहा है, लेकिन इन्हें आकर्षित करने के लिए समुचित माहौल का निर्माण करना राज्य सरकार का दायित्व है। विद्युत आपूर्ति के क्षेत्र में यद्यपि अधिकांश स्रोत झारखंड में चले गए हैं, फिर भी बरौनी और कांटी थर्मल प्रोजेक्ट के रख-रखाव में सुधार लाकर, कोशी जल विद्युत परियोजना का विस्तार कर, मिनी पावर प्लांटों (विशेषकर जल विद्युत
के क्षेत्र में) की स्थापना कर एवं राष्ट्रीय थर्मल पावर कारपोरेशन तथा चूखा विद्युत आपूर्ति केंद्र के साथ सहयोग बढ़ाकर आसानी से बढ़ाई जा सकती है। दीर्घकालीन योजना के रुप में जल विद्युत पर विशेष जोर की जरुरत है। बिहार सरकार और बिहार के सभी सांसद राजनैतिक भेदभाव भूलकर केंद्र सरकार से आग्रह और दबाव की नीति अपनाएं तो नेपाल के साथ मिलकर उधर से आने वाली नदियों के ऊपर बांध बनाकर बाढ़ की विभीषिका को नियंत्रित किया जा सकता है और विद्युत उत्पादन तथा सिंचाई सुविधाओं का विस्तार संभव है।
सिंचाई और बिजली के अलावा विकास के लिए अन्य महत्वपूर्ण अधोसंरचनात्मक सुविधाएं हैं। सड़क और शिक्षा। बिहार की सड़कों की स्थिति जर्जर है, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में। बिहार के सभी सांसद और विधायक अपने कोटे की राशि, जो उन्हें अपने विवेक से खर्च करने के लिए दी जाती है, अगर अगले दी-तीन वर्षों तक केवल इसी पद पर ईमानदारी के साथ और अपनी समुचित देख रेख में खर्च करें तो ग्रामीण इलाकों में सड़कों का जाल फैलाया जा सकता है। कृषकों को भी आधारभूत
सुविधा मिलेगी और बाजार का भी विस्तार होगा।
मानव संसाधन विकास का सबसे बड़ा स्रोत हैं और शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं। बिहार की शिक्षा प्रणाली गुणवत्ताहीन होती जा रही है। तकनीकी शिक्षा की अपेक्षा सामान्य शिक्षा पर विशेष जोर है और सामान्य शिक्षा भी बदहाली के दौर से गुजर रही है। स्वास्थ्य सुविधाएं अधिकत्तर (करीब 80 प्रतिशत) शहरी इलाकों में केंद्रित हैं और वहां भी आम नागरिकों के लिए सही ढंग से उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों के गरीब नागरिक तो प्राय: इन सुविधाओं से पूर्णतः वंचित हैं। सरकारी डाक्टरों को निजी प्रैक्टिस, अस्पतालों की दुर्दशा एवं व्यवस्था का अभाव और गरीबों के प्रति उदासीनता सामान्य जन-जीवन को स्वस्थ और सुखद बनाने से कोसों दूर हैं। अतः इन सामाजिक सेवाओं का सामाजिक-नियंत्रण जरुरी है। एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों में इनका विस्तार जरुरी है तो दूसरी ओर सशक्त ग्राम सभाओं या जन समितियों तथा ग्राम-पंचायतों के द्वारा इनका नियंत्रण। लेकिन साथ ही इन समितियों या पंचायतों का चुनाव भी निष्पक्ष होना चाहिए।
अंतत: भावी विकास के लिए यह भी जरूरी है कि विकास से संबंधित संस्थाओं एवं प्रशासनिक तंत्र का विकेंद्रीकरण हो, दायित्व का निर्धारण हो और कठोरता के साथ उसका निर्वहन हो। योजनाएं निचले स्तर से भी तैयार हों, उनमें समुचित समन्वय हो और उनके क्रियान्वयन में आम जनता या उनके प्रतिनिधियों की सहभागिता हो। सरकार फिजूलखर्ची रोकने की हर संभव कोशिश करे। जिससे सीमित साधनों का सदुपयोग हो और बिहार विकास की ओर अग्रसर हो।

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