वोल्शेविक क्रांति का महत्त्व एवं परिणाम

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वोल्शेविक क्रांति का महत्त्व एवं परिणाम

वोल्शेविक क्रांति का महत्त्व एवं परिणाम

क्रांति का सोवियत संघ पर प्रभाव
⊕ स्वेच्छाचारी जारशाही का अंत
⊕ सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना
⊕ नई प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना
⊕ नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था
⊕ धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना
⊕ रूसीकरण की नीति का परित्याग
क्रांति का विश्व पर प्रभाव
⊕ पूँजीवादी राष्ट्रों में आर्थिक सुधार के प्रयास
⊕ सर्वहारा वर्ग के सम्मान में वृद्धि
⊕ साम्यवादी सरकारों की स्थापना
⊕ अंतरराष्ट्रवाद को प्रोत्साहन
⊕ साम्राज्यवाद के पतन की प्रक्रिया तीव्र
⊕ नया शक्ति-संतुलन
1917 की रूस की क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति मूल रूप से एक राजनीतिक क्रांति थी, परंतु 1917 की रूस की क्रांति एक ही साथ राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्रांति थी। फ्रांस की क्रांति वुर्जुआ वर्ग की क्रांति थी, परंतु रूस की क्रांति सर्वहारा वर्ग की क्रांति थी। इस क्रांति ने सर्वहारा वर्ग को सशक्त किया।
बोल्शेविकों ने सत्ता सँभालते ही व्यक्तिगत संपत्ति को समाप्त कर दिया। उद्योगों एवं बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। जमीन
सामाजिक संपत्ति घोषित की गई। किसानों को छूट दी गई कि वे कुलकों की जमीन पर कब्जा कर लें। नगरों में बड़े मकानों का विभाजन कर दिया गया। परंपरागत कुलीन उपाधियाँ समाप्त कर दी गई। सेना की नई वर्दी बनाई गई। इस प्रकार, रूस में नई व्यवस्था स्थापित हुई।
1917 की क्रांति के दूरगामी और व्यापक प्रभाव पड़े। इसका प्रभाव न सिर्फ सोवियत संघ पर, बल्कि विश्व के अन्य देशों पर भी
पड़ा। इस क्रांति के अग्रलिखित प्रभाव (परिणाम) हुए-

बोल्शेविक क्रांति का सोवियत संघ पर प्रभाव

स्वेच्छाचारी जारशाही का अंत-1917 की फरवरी क्रांति के परिणामस्वरूप अत्याचारी एवं निरंकुश राजतंत्र की समाप्ति हो गई। सदियों पुराना रोमोनोव वंश का शासन समाप्त हो गया। क्रांति के बाद रूस में जनतंत्र की स्थापना की गई। रूसी साम्राज्य के स्थान पर सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (Union of Soviet Socialist Republics-USSR) का गठन हुआ।
सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना-बोल्शेविक क्रांति ने पहली बार शोषित सर्वहारा वर्ग को सत्ता और अधिकार प्रदान किया। नई व्यवस्था के अनुसार, भूमि पर कुलकों के अधिकार समाप्त कर दिए गए एवं भूमि का स्वामित्व किसानों को दिया गया। कल-कारखानों का राष्ट्रीयकरण किया गया। देश की सारी संपत्ति राष्ट्रीय संपत्ति घोषित की गई। उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया। उद्योगों का प्रबंधन मजदूरों के नियंत्रण में दे दिया गया। मजदूरों को मतदान का अधिकार दिया गया एवं उनकी सुरक्षा के लिए नियम बनाए गए। इस प्रकार, सोवियत संघ में सर्वहारा वर्ग को सबसे प्रमुख स्थान दिया गया।
नई प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना-क्रांति के बाद सोवियत संघ में एक नई प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की गई। यह व्यवस्था साम्यवादी विचारधारा के अनुकूल थी। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य कृषकों एवं मजदूरों के हितों की सुरक्षा करना एवं उनकी प्रगति के लिए कार्य करना था। सोवियत संघ में पहली बार साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई। इससे साम्यवाद का तेजी से प्रचार हुआ।
नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था-क्रांति के बाद सोवियत संघ में नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हुई। सामाजिक असमानता समाप्त कर दी गई। वर्गविहीन समाज का निर्माण कर समाज का परंपरागत स्वरूप बदल दिया गया। पूंजीपति और जमीदार वर्ग का उन्मूलन कर दिया गया। समाज में एक ही वर्ग रहा जो साम्यवादी नागरिकों का था। काम के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बना दिया गया। व्यक्तिगत संपत्ति समाप्त कर पूँजीपतियों का वर्चस्व समाप्त कर दिया गया। देश की सारी संपत्ति का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इस प्रकार, एक वर्गविहीन और शोषणमुक्त सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हुई।
धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना-क्रांति के पूर्व रूसियों को धार्मिक स्वतंत्रता नहीं थी। चर्च का इसपर नियंत्रण था। बोल्शेविक क्रांति ने इस व्यवस्था को भी बदल दिया। धार्मिक जीवन पर से चर्च का नियंत्रण समाप्त कर दिया गया। चर्च की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई। राज्य ने किसी धर्म को प्रश्रय नहीं दिया, बल्कि सबों को अपनी व्यक्तिगत मान्यता के अनुरूप किसी भी धर्म को अपनाने की छूट दी। फलस्वरूप, सोवियत संघ में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना हुई।
रूसीकरण की नीति का परित्याग-क्रांति के पूर्व जार द्वारा अपनाई गई रूसीकरण की नीति से गैर-रूसियों में गहरा असंतोष व्याप्त था। अतः, नई सरकार ने पुराने रूसी साम्राज्य के अंतर्गत आनेवाले सभी राष्ट्रों को सोवियत गणराज्य का अभिन्न अंग बना लिया। इसके साथ ही सभी प्रजाति के लोगों को समानता का अधिकार दिया गया। फलतः, देश के भीतर असंतोष की भावना कमजोर पड़ गई।

वोल्शेविक क्रांति का विश्व पर प्रभाव

बोल्शेविक क्रांति का विश्व के दूसरे देशों पर भी प्रभाव पड़ा। ये प्रभाव निम्नलिखित थे-
पूँजीवादी राष्ट्रों में आर्थिक सुधार के प्रयास-विश्व के जिन देशों में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था थी वे भी यह महसूस करने लगे कि
बिना सामाजिक-आर्थिक समानता के राजनीतिक समानता अपर्याप्त है। अतः, इस दिशा में कुछ प्रयास किए गए। पूँजीवादी देशों ने भी परिवर्तित रूप में सोवियत संघ के आर्थिक मॉडल को अपना लिया। इससे पूँजीवाद का चरित्र भी परिवर्तित हो गया।
सर्वहारा वर्ग के सम्मान में वृद्धि-बोल्शेविक क्रांति के परिणामस्वरूप विश्व के अन्य देशों में भी किसानों-मजूदरों का सम्मान बढ़ा। पूँजीपतियों और मजदूरों में वर्गसंघर्ष बढ़ गया। प्रत्येक राष्ट्र की सरकार अपने लोगों को रोटी, कपड़ा, मकान, भूमि और शांति उपलब्ध कराना अपना मुख्य दायित्व समझने लगी।
साम्यवादी सरकारों की स्थापना-सोवियत संघ के समान ही विश्व के अन्य देशों-चीन, वियतनाम इत्यादि में भी बाद में
साम्यवादी सरकारों की स्थापना हुई। साम्यवादी विचारधारा के प्रसार और प्रभाव को देखते हुए राष्ट्रसंघ ने भी मजदूरों की दशा में सुधार लाने के प्रयास किए। इस उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना की गई। इसने मजदूरों को शोषण से मुक्ति दिलाने एवं उनके जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया।
अंतरराष्ट्रवाद को प्रोत्साहन-समाजवादी विचारों के प्रसार से अंतरराष्ट्रवाद को प्रोत्साहन मिला। सिद्धांतरूप में ही सही, सभी राष्ट्रों ने ऐसा महसूस किया कि दूसरे राष्ट्रों के साथ उनके संबंध का आधार मात्र अपना-अपना स्वार्थ ही नहीं होना चाहिए। परिणामस्वरूप, अब अनेक राष्ट्रीय समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय समस्या का रूप देकर उनका शांतिपूर्ण समाधान निकालने का प्रयास किया जाने लगा।
साम्राज्यवाद के पतन की प्रक्रिया तीव्र-बोल्शेविक क्रांति ने साम्राज्यवाद के पतन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। समाजवादियों ने संपूर्ण विश्व में साम्राज्यवाद के विनाश के लिए अभियान तेज कर दिया। सोवियत संघ ने सभी राष्ट्रों में विदेशी शासन के विरुद्ध चलाए जा रहे स्वतंत्रता आंदोलन को अपना समर्थन दिया। एशिया और अफ्रीका के उपनिवेशों में स्वतंत्रता के लिए प्रयास तेज कर दिए गए। सोवियत संघ की साम्यवादी सरकार ने स्वतंत्रता आंदोलनों एवं उपनिवेश-मुक्ति को नैतिक समर्थन प्रदान किया।
नया शक्ति-संतुलन-नवनिर्माण के बाद सोवियत संघ साम्यवादी राष्ट्रों का अगुआ बन गया। दूसरी ओर, अमेरिका पूँजीवादी राष्ट्रों का नेता बन गया। इससे विश्व दो शक्ति-खंडों साम्यवादी एवं  पूँजीवादी में विभक्त हो गया। दोनों अपनी-अपनी विचारधारा का प्रसार करने लगे। यूरोप भी वैचारिक आधार पर दो भागों में विभक्त हो गया—पूर्वी -पूर्वी एवं पश्चिमी यूरोप। धर्मसुधार आंदोलन के पश्चात और साम्यवादी क्रांति से पहले यूरोप में वैचारिक आधार पर इस तरह का वैचारिक विभाजन नहीं देखा गया था। इसने आगे चलकर द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात दोनों खेमों में सशस्त्रीकरण की होड़ एवं शीत युद्ध (Cold War) को जन्म दिया।

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