अठारहवीं सदी में भारत में राज्य और समाज | State and Society in India in the Eighteenth Century

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अठारहवीं सदी में भारत में राज्य और समाज | State and Society in India in the Eighteenth Century

अठारहवीं सदी में भारत में
राज्य और समाज

मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के साथ-साथ स्थानीय राजनीतिक और आर्थिक शक्तियाँ सिर उठाने लगीं और अपना दबाव बढ़ाने लगीं। 17वीं सदी के अंत और उसके बाद की राजनीति में व्यापक परिवर्तन हुआ। 18वीं सदी के दौरान बिखरते मुगल साम्राज्य और उसकी खंडित राजनीतिक व्यवस्था पर बड़ी संख्या में स्वतंत्र और अर्ध-स्वतंत्र शक्तियाँ उठ खड़ी हुईं, जैसे बंगाल, अवध, हैदराबाद, मैसूर और मराठा राजशाही। अंग्रेजों को भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए
इन्हीं ताकतों पर विजय प्राप्त करनी पड़ी।
इनमें से कुछ राज्यों जैसे अवध तथा हैदराबाद को “उत्तराधिकार वाले राज्य” कहा जा सकता है। मुगल साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति में कमज़ोरी तथा मुगल प्रांतों के गवर्नरों के स्वतंत्रता के दावे से इन राज्यों का जन्म हुआ। दूसरे, मराठा, अफगान, जाट तथा पंजाब जैसे राज्यों का जन्म मुगल शासन के ख़िलाफ़ स्थानीय सरदारों, ज़मींदारों तथा किसानों के विद्रोह के कारण हुआ था। न केवल दो तरह के राज्यों की राजनीति कुछ हद तक भिन्न होती थी, बल्कि इन सब में आपस में स्थानीय परिस्थितियों के कारण भी अंतर था। फिर भी इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि मोटे तौर पर इन सभी का राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचा
तकरीबन एक-सा ही था। लेकिन एक तीसरा क्षेत्र भी था इनमें दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिण-पूर्व के समुद्री किनारों के इलाके तथा उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्र शामिल थे जहाँ पर किसी भी रूप में मुगल प्रभाव नहीं पहुँच सका था। मुगल सम्राट की नाममात्र की सर्वोच्चता स्वीकार कर और उसके प्रतिनिधि के रूप में स्वीकृति प्राप्त कर 18वीं शताब्दी के सभी राज्यों के शासकों ने अपने पद को वैधता प्रदान करने की कोशिश की थी। बहरहाल, इनमें से लगभग सभी ने मुगल प्रशासन के तौर-तरीके और उसकी पद्धति को अपनाया। पहले समूह में आनेे की राजस्व व्यवस्था भी शामिल थी। सत्ता वाले राज्यों ने उत्तराधिकार के रूप में कार्य विधि, मुगल प्रशासनिक ढाँचा और संस्थाओं को प्राप्त किया था। दूसरों ने, इनमें अलग-अलग मात्रा में थोड़ा बहुत परिवर्तन करके इस ढाँचे तथा इन संस्थाओं को अपनाया था जिसमें मुगल शासकों इन राज्यों के शासकों ने शांति व्यवस्था बहाल की तथा व्यावहारिक, आर्थिक छोटे-छोटे सरदारों तथा ज़मींदारों की ताकतें कम की और इस काम में इन सबको और प्रशासनिक ढाँचा खड़ा किया। निचले स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों, अलग-अलग मात्रा में सफलता मिली। किसानों के अधिशेष उत्पादन पर नियंत्रण के लिए ये लोग ऊपर के अधिकारियों से झगड़ते रहते थे और कभी-कभी और संरक्षण के स्थानीय केंद्र कायम करने में ये लोग सफल भी हो जाते थे।
उन्होंने उन स्थानीय ज़मींदारों तथा सरदारों से भी समझौता किया तथा उनको अपने साथ लिया जो शांति और व्यवस्था चाहते थे। आमतौर पर, कहा जाए तो, अधिकांश राज्यों में राजनीतिक अधिकारों का विकेंद्रीकरण हो गया तथा सरदारों, जागीरदारों और ज़मींदारों को इसके कारण राजनीतिक और आर्थिक शक्ति की दृष्टि से लाभ मिला। इन राज्यों की राजनीति लगातार गैर-सांप्रदायिक या धर्मनिरपेक्ष बनी रही क्योंकि इन राज्यों के शासकों की आर्थिक तथा राजनीतिक प्रेरक शक्ति समान थी। सार्वजनिक स्थानों की नियुक्तियों, सेना में भर्ती या नागरिक सेवाओं में ये शासक धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं बरतते थे और जब लोग किसी सत्ता अथवा शासन के विरुद्ध विद्रोह करते थे तो इस बात पर विचार नहीं करते
थे कि उनके शासक का धर्म क्या है। इसलिए इस बात पर विश्वास करने के लिए कोई आधार नहीं मिलता है कि मुगल साम्राज्य के पतन और विघटन के बाद भारत के विभिन्न भागों में कानून और व्यवस्था की समस्या उठ खड़ी हुई और चारों ओर अराजकता फैल गई। वास्तविकता तो यह है कि 18वीं शताब्दी में प्रशासन तथा अर्थव्यवस्था में जो भी अव्यवस्था विद्यमान थी, वह भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश हस्तक्षेप और ब्रिटेन द्वारा चलाए गए विजय अभियानों का परिणाम थी।
हाँ, यह बात सही है कि 17वीं सदी में जो आर्थिक संकट शुरू हुए थे, उनकी रोकथाम इनमें से कोई भी राज्य सफलता से नहीं कर पाया। इनमें से सभी राज्य मूल रूप से कर उगाहने वाले राज्य बने रहे। ज़मींदारों और जागीरदारों की संख्या तथा राजनीतिक ताकत में लगातार वृद्धि होती गई और कृषि से होने वाली आमदनी के लिए वे लगातार आपस में झगड़ते रहे। इसके साथ-साथ किसानों की हालत दिनोंदिन बिगड़ती चली गई। जहाँ इन राज्यों ने आंतरिक व्यापार को    ठप्प नहीं होने दिया वहीं इन्होंने विदेशों से व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिश भी की। लेकिन अपने राज्यों के आधारभूत औद्योगिक और वाणिज्यिक ढाँचे को आधुनिक रूप देने के लिए इन लोगों ने कुछ नहीं किया। इससे यह बात साफ हो जाती है कि वे आपस में संगठित क्यों नहीं हो सके और विदेशी आक्रमणों को विफल करने में उनको क्यों सफलता हासिल नहीं हो सकी।

हैदराबाद और कर्नाटक 
: निजाम-उल-मुल्क आसफजाह ने 1724 में हैदराबाद राज्य की स्थापना की। औरंगजेब के बाद के समय के नवाबों में उसका
महत्त्वपूर्ण स्थान था। सैयद बंधुओं को गद्दी से हटाने में उसकी अहम भूमिका थी। उसको दक्कन के वायसरॉय का खिताब प्राप्त हुआ था। 1720 से 1722 के बीच दक्कन में उसने अपनी स्थिति सुदृढ़ की। वह 1722 से 1724 तक साम्राज्य का वज़ीर रहा। मगर वह जल्द ही वजीर के काम से तंग आ गया क्योंकि बादशाह मुहम्मद शाह ने प्रशासन में सुधार लाने की उसकी सब कोशिशों को नाकाम कर दिया। इसलिए उसने दक्कन वापस जाने का फैसला किया जहाँ वह सही-सलामत अपना अधिपत्य बनाए रख सकता था। यहाँ उसने हैदराबाद राज्य की नींव रखी जिस पर उसने कठोरतापूर्वक शासन किया। उसने केंद्रीय सरकार से अपनी स्वतंत्रता की खुलेआम घोषणा कभी नहीं की, मगर उसने व्यवहार में स्वतंत्र शासक के रूप में काम किया। उसने दिल्ली की केंद्रीय सरकार से बिना पूछे लड़ाइयाँ लड़ी, सुलहनामे किए, खिताब बाँटे और जागीरें तथा ओहदे दिए। उसने हिंदुओं के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई। उदाहरण के लिए, एक हिंदू, पूरनचंद, उसका दीवान था। उसने दक्कन के मुगलों के नमूने पर जागीरदारी प्रथा चलाकर सुव्यवस्थित प्रशासन स्थापित कर अपनी सत्ता को मजबूत बनाया।
उसने बड़े, उपद्रवी ज़मींदारों को अपनी सत्ता स्वीकार करने के लिए मजबूर किया और शक्तिशाली मराठों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा। उसने राजस्व व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की भी कोशिश की। मगर 1748 में उसके मरने के बाद हैदराबाद उन्हीं विघटनकारी शक्तियों का शिकार हो गया जो दिल्ली में सक्रिय थीं।
कर्नाटक, दक्कन मुगल का एक सूबा था और इस तरह वह हैदराबाद के निजाम के अधिकार के अंतर्गत आता था। मगर व्यवहार में जिस प्रकार निज़ाम दिल्ली की सरकार से स्वतंत्र हो गया था उसी प्रकार कर्नाटक का नायब सूबेदार, जिसे कर्नाटक का नवाब कहा जाता था, अपने को दक्कन के नवाब के नियंत्रण से मुवत कर अपने ओहदे को वशंगत बना चुका था। अत: कर्नाटक के नवाब सआदतउल्ला खां ने अपने भतीजे, दोस्त अली को निजाम की मंजूरी के बिना ही अपना उत्तराधिकारी बना दिया था। आगे चलकर 1740 के बाद कर्नाटक की स्थिति नवाबी के लिए बारम्बार संघर्षों के कारण बिगड़ी और इससे यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों को भारतीय राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया।

बंगाल : केंद्रीय सत्ता की बढ़ती कमज़ोरी का फायदा उठाकर असाधारण योग्यता वाले दो व्यक्तियों, मुर्शिद कुली खां और अली वर्दी खां, ने बंगाल को वस्तुतः स्वतंत्र बना दिया। मुर्शिद कुली खां को 1717 में जाकर बंगाल का सूबेदार बनाया गया, मगर वह उसका वास्तविक शासक 1700 से ही था, जब उसे दीवान बनाया गया था। उसने खुद को तुरंत केंद्रीय नियंत्रण से मुक्त कर लिया यद्यपि वह बादशाह को नियमित रूप से नज़राने की काफ़ी बड़ी रकम भेजता रहा। उसने अंदरूनी और बाहरी खतरे से बंगाल को मुक्त कर वहाँ शांति कायम की। अब बंगाल ज़मींदारों की प्रमुख बगावतों से भी कमोबेश मुक्त हो गया। उसके शासन के दौरान केवल तीन विद्रोह हुए। पहला विद्रोह सीताराम राय, उदय नारायण और गुलाम मुहम्मद ने किया। उसके बाद शुजात खां ने बगावत की। अंतिम विद्रोह नजात खां का था। उनको हराने के बाद मुर्शिद कुली खां ने उनकी ज़मींदारियां अपने कृपापात्र रामजीवन को दे दीं। मुर्शिद कुली खां 1727 में मर गया। उसके बाद उसके दामाद शुजाउद्दीन ने बंगाल पर 1739 तक शासन किया। उसकी जगह पर उसका बेटा सरफराज़ खां आया जिसे उसी साल गद्दी से हटाकर अली वर्दी खा नवाब बन गया।
इन तीनों नवाबों ने बंगाल को शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित प्रशासन दिया। उन्होंने व्यापार और उद्योग को बढ़ावा दिया। मुर्शिद कुली खां ने प्रशासन में मितव्ययिता बरती। उसने बंगाल के वित्तीय मामलों का प्रबंध नए सिरे से किया। उसने नए भू-राजस्व बंदोबस्त के ज़रिए जागीर भूमि के एक बड़े भाग को खालसा भूमि बना दिया और इजारा व्यवस्था (ठेके पर भू-राजस्व वसूल करने की व्यवस्था) आरंभ की। स्थानीय ज़मींदारों और सौदागर साहूकारों के बीच से उसने राजस्व वसूलने वाले किसान और सौदागर साहूकार भर्ती किए। उसने गरीब खेतिहारों का कष्ट दूर करने तथा उन्हें समय पर भू-राजस्व देने में समर्थ बनाने के लिए तकावी ऋण भी दिए। इस प्रकार वह बंगाल सरकार के संसाधनों को बढ़ा सका। मगर इजारा व्यवस्था ने किसानों और जमींदारों पर आर्थिक बोझ बढ़ा दिया। इसके अलावा, यद्यपि उसने केवल असल जमा की माँग की और गैरकानूनी टैक्स हटा दिए, तथापि उसने जमींदार और किसानों से लगान की वसूली बड़ी निर्दयता के साथ की। उसके सुधारों का एक परिणाम यह हुआ कि अनेक पुराने ज़मींदारों को निकाल बाहर किया गया और उनकी जगह पर अभी-अभी पनपे इजारेदार आ गए।
मुर्शिद कुली खां और उसके बाद के नवाबों ने हिंदुओं और मुसलमानों को रोज़गार के समान अवसर दिए। उन्होंने सबसे ऊँचे नागरिक ओहदों और कई फौजी ओहदों पर बंगालियों को रखा जिनमें अधिकतर हिंदू थे। इजारेदारों को चुनते समय मुर्शिद कुली खां ने स्थानीय ज़मींदार और महाजनों को प्राथमिकता दी जिनमें अनेक हिंदू थे। इस प्रकार उसने बंगाल में एक नए भू-अभिजात वर्ग को जन्म दिया।
तीनों नवाबों ने माना कि व्यापार का प्रसार जनता और सरकार के लिए फायदेमंद है इसलिए उन्होंने भारतीय और विदेशी सभी व्यापारियों को बढ़ावा दिया। नियमित थानों और चौकियों की व्यवस्था कर सड़कों और नदियों की सुरक्षा का इंतजाम
किया। उन्होंने अफसरों के निजी व्यापार को रोक दिया। साथ ही उन्होंने इस बात का भी ख्याल रखा कि विदेशी व्यापारिक कंपनियों तथा उनके नौकरों पर कड़ा नियंत्रण रखा जाए और उन्हें अपने विशेषाधिकारों का दुरुपयोग नहीं करने दिया जाए। उन्होंने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के नौकरों को देश के कानूनों का पालन करने तथा अन्य व्यापारियों के बराबर सीमा/शुल्क देने के लिए मजबूर किया।
अली वर्दी खां ने अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों को कलकत्ता और चंद्रनगर के अपने कारखानों की किलेबंदी करने की इजाजत नहीं दी। इन सबके बावजूद बंगाल के नवाब एक दृष्टि से बड़े नामसमझ और लापरवाह साबित हुए। अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रवृत्ति 1707 के बाद अपनी मांगों को मनवाने के लिए सैनिक शक्ति का उपयोग करने या उसके इस्तेमाल की धमकी देने की होने लगी थी। नवाबों ने इस प्रवृत्ति को मजबूती से नहीं दबाया। वे कंपनी की धमकियों का जवाब देने की ताकत रखते थे, मगर उनका निरंतर यह विश्वास रहा कि कोई भी मात्र व्यापारिक कंपनी उनकी सत्ता के लिए कोई खतरा पैदा नहीं कर सकती।
वे इस बात को महसूस नहीं कर सके कि अंग्रेज़ी कंपनी व्यापारियों की कंपनी मात्र नहीं थी बल्कि उस समय के अत्यंत आक्रामक और विस्तारवादी उपनिवेश की प्रतिनिधि थी। शेष दुनिया के बारे में उनका अज्ञान और उससे संपर्क का अभाव उनके लिए बड़ा महँगा पड़ा, नहीं तो अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, लैटिन अमरीका में पश्चिमी व्यापारिक कंपनियों के विध्वंसकारी कामों के संबंध में उनको जानकारी अवश्य हो जाती। बंगाल के नवाबों ने शक्तिशाली फौज बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया और इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। उदाहरण के लिए, मुर्शिद कुली खां. की फौज में केवल 2,000 घुड़सवार और 4,000 पैदल सैनिक थे। अली वर्दी और अंततोगत्वा उसे ऐलान किया तब शक्तिशाली फौज के अभाव ने भी विदेशी कंपनी की जीत में काफ़ी कंपनी ने अली वर्दी खां के उत्तराधिकारी सिराजउद्दौला के खिलाफ लड़ाई का का एक बड़ा हिस्सा उन्हें दे देना पड़ा। जब 1756-67 में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया योगदान दिया। अफसरों के बीच बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने में बंगाल के नवाब असफल रहे। यहाँ तक कि न्यायिक अधिकारी काजी और मुफ़्ती घूस लेने में नहीं हिचकिचाते थे। विदेशी कंपनियों ने इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाया और सरकारी कानून-कायदों और नीतियों की भी जड़ें खोदीं।

अवध : अवध के स्वायत्त राज्य का सस्थापक सआदत खा बुरहान-उल-मुल्क ने प्रांत में हर जगह सिर उठाया। उन्होंने माल-
दृढ़ प्रतिज्ञ, और तेज़ आदमी था। उसकी नियुक्ति के समय कई बगावती ज़मींदारों गुज़ारी देने से इनकार कर दिया, अपनी निजी सेनाएँ गठित की, किले बनाए और शाही सरकार की अवज्ञा की। वर्षों तक सआदत खां को उनसे लड़ना पड़ा। उसने अंधेरगर्दी को खत्म किया और बड़े ज़मींदारों को अनुशासित किया। इस प्रकार उसने अपनी सरकार के वित्तीय संसाधनों को बढ़ाया। विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ देकर उसने दूसरे सरदारों और ज़मींदारों को अपनी तरफ कर लिया। किंतु उसने अधिकतर पराजित जमींदारों को नहीं हटाया। अधीनता स्वीकार करने और देय रकम (भू-राजस्व) नियमित रूप से अदा करने पर सहमत होने के बाद उन्हें भी अपनी जगह पर पक्का कर दिया गया। सआदत खां ने भी 1723 में नया राजस्व बंदोबस्त (रेवेन्यू सेटलमेंट) किया। कहा जाता है कि उचित भू-लगान लगाकर तथा बड़े जमींदारों के जुल्मों से बचाकर उसने किसानों की हालत को बेहतर बनाया।
बंगाल के नवाबों की तरह ही उसने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया। उसके अनेक सेनापति और उच्च अधिकारी हिंदू थे। उसने हठीले जमींदारों, सरदारों ओर सामंतों को उनके धर्म का कोई ख्याल किए बिना दबा दिया। उसके सैनिकों को अच्छे वेतन मिलते थे। वे हथियारों से सुसज्जित और सुप्रशिक्षित थे। उसका प्रशासन कार्यकुशल था। उसने भी जागीरदारी प्रथा को जारी रखा। 1739 में अपने मरने के पहले वह वस्तुतः स्वतंत्र बन गया था और उसने प्रांत को अपनी वंशगत जायदाद बना लिया था। उसकी जगह उसके  भतीजे सफदर जंग ने ली। साथ ही, 1748 में उसे साम्राज्य का वजीर
दिया गया। इसके अलावा उसे इलाहाबाद का प्रांत भी दिया गया।
किसी अशांति का सामना नहीं करने दिया। उसने बगावत करने वाल जमीदाग को दबा दिया और दूसरों को अपने पक्ष में कर लिया। उसने मराठा सरदारों में मित्रता कर ली जिससे उसके अधिकार क्षेत्र में उनकी घुसपैठ न हो सके। सरदारों और शेखज़ादाओं की स्वामीभक्ति हासिल करने में भी वह कामयाब रहा। उसने रूहेलों और बंगश पठानों के ख़िलाफ़ लड़ाइयाँ छेड़ीं। बंगश नवाबों के ख़िलाफ़ 1750-51 की लड़ाई में उसने मराठों की सैनिक सहायता तथा जाटों व समर्थन प्राप्त किया। इसके लिए उसे मराठों को प्रतिदिन 25,000 रुपए आर जाटों को रोज़ 15,000 रुपए देने पड़े। बाद में उसने पेशवा के साथ एक करार किया जिसके अनुसार पेशवा ने मुगल साम्राज्य को अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ मदद देने और उसे भारतीय पठानों तथा राजपूत राजाओं जैसे अंदरूनी विद्रोहियों से बचाने का वचन दिया। बदले में पेशवा को 50 लाख रुपए तथा पंजाब, सिंध और उत्तर भारत के कई जिलों का चौथ दिया जाने वाला था। इसके अलावा पेशवा को अजमेर और आगरा का सूबेदार बनाया जाना था। मगर पेशवा दिल्ली में सफ़दर जंग के दुश्मनों से जा मिला जिन्होंने उसे अवध और इलाहाबाद का
सूबेदार बनाने का वचन दिया, इसलिए करार टूट गया। सफ़दर जंग ने न्याय की उचित व्यवस्था की। उसने भी नौकरियाँ देने में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच निष्पक्षता की नीति अपनाई। उसकी सरकार के सबसे बड़े ओहदे पर एक हिंदू, महाराजा नवाब राय आसीन था।
नवाबों की सरकार के तहत लंबे समय तक लगातार शांति और सामंतों की आर्थिक समृद्धि के परिणामस्वरूप अवध दरबार के इर्द-गिर्द एक विशिष्ट लखनवी संस्कृति कालक्रम से विकसित हुई। लखनऊ बहुत ज़माने से अवध का एक महत्त्वपूर्ण शहर था। 1775 के बाद वह अवध के नवाबों का निवास स्थान बन गया। वह तुरंत ही कला और साहित्य को संरक्षण प्रदान करने की दृष्टि से दिल्ली का प्रतिद्वंद्वी हो गया। वह हस्तशिल्प के एक महत्त्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी विकसित हुआ। स्थानीय सरदारों और ज़मींदारों के संरक्षण में दस्तकारी और संस्कृति दोनों का असर कस्बों तक पहुँच गया। सफ़दर जंग ने बहुत ऊँची वैयक्तिक नैतिकता बनाए रखी। वह जिंदगी भर अपनी एकमात्र पत्नी के प्रति वफ़ादार रहा। असल में हैदराबाद, बंगाल और अवध के तीनों स्वायत्त रजवाड़ों के संस्थापक क्रमशः निजाम-उल-मुल्क  मुर्शिद कुली खां और अली वर्दी खां ऊँची वैयक्तिक नैतिकता वाले लोग थे।
उनमें से लगभग सभी ने संयमपूर्ण और सादा जीवन बिताया। यह इस धारणा को झूठा साबित करती है कि अठारहवीं सदी के प्रमुख सांमतों ने फिजूलखर्ची और विलासिता की जिंदगी बिताई। केवल अपने सार्वजनिक और राजनीतिक व्यवहार में ही उन्होंने धोखाधड़ी, षड्यंत्र और विश्वासघात का सहारा लिया।

मैसूर : दक्षिण भारत में हैदराबाद के पास हैदर अली के अधीन जिस सबसे महत्वपूर्ण सत्ता का उदय हुआ, वह मैसूर था। विजयनगर साम्राज्य के अंत होने के समय से ही मैसूर राज्य ने अपनी कमज़ोर स्वाधीनता को बनाए रखा और नाममात्र को ही यह मुगल साम्राज्य का अंग था। 18वीं सदी के शुरू में नजराज (सर्वाधिकारी) और देवराज (दुलवई) नाम के दो मंत्रियों ने मैसूर की शक्ति अपने हाथ में ले रखी थी, इस प्रकार वहाँ के राजा चिक्का कृष्णराज को उन्होंने कठपुतली में बदल दिया था। हैदर अली का जन्म 1721 में एक अत्यंत सामान्य परिवार में हुआ था। उसने अपना जीवन मैसूर की सेना में एकदम साधारण अधिकारी के रूप में शुरू किया था। वह शिक्षित तो नहीं था, बुद्धि और प्रतिभा का धनी था। वह अत्यंत परिश्रमी और लगनशील, साहसी और दृढनिश्चयी था। वह एक प्रतिभाशाली सेनानायक तथा चालाक राजनीतिज्ञ था।
मैसूर राज्य 20 साल तक युद्ध में उलझा रहा। इस दौरान हैदर अली को जो भी मौका मिला, उसने उसका लाभ उठाया और मैसूर की सेना में ऊँचे पद पर पहुँच गया। जल्दी ही उसने पश्चिमी सैनिक प्रशिक्षण के महत्त्व को पहचाना तथा जो सैनिक उसके अधीन थे उनको आधुनिक प्रशिक्षण दिलवाया। 1755 में डिडिगुल में उसने एक आधुनिक शस्त्रागार स्थापित किया। इसमें उसने फ्रांसीसी विशेषज्ञों की मदद ली। 1761 में उसने नंजराज को सत्ता से अलग कर दिया तथा मैसूर राज्य पर अपना अधिकार कायम कर लिया। योद्धा सरदारों और ज़मींदारों के विद्रोहों को उसने नियंत्रित कर लिया तथा बिदनूर, सुदा, सेदा, कन्नड़ और मालाबार के इलाकों को जीत लिया। मालाबार को अपने अधीन करने का मुख्य कारण यह था कि वह भारतीय समुद्र तट तक अपनी पहुँच बनाए रखना चाहता था। पढ़ा-लिखा न होने के बावजूद वह कुशल प्रशासक था। अपने राज्य
में मुगल शासन प्रणाली तथा राजस्व व्यवस्था उसी ने लागू की थी। मैसूर जब कमज़ोर तथा विभाजित राज्य था, तब उसने उस पर कब्जा किया और शीघ्र ही उसके कारण इस राज्य की गिनती प्रमुख भारतीय शक्तियों में की जाने लगी।
वह धार्मिक सहिष्णुता की नीति पर चला। उसका पहला दीवान और अन्य अनेक अधिकारी हिंदू थे। अपनी सत्ता के लगभग आरंभ से ही वह मराठा सरदारों, निज़ाम और अंग्रेजों के साथ लड़ाई में लगा रहा। उसने 1769 में अंग्रेजी फौजों को बार-बार हराया और मद्रास के पास तक पहुँच गया। वह 1782 में द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान मर गया। उसके स्थान पर उसका बेटा टीपू गद्दी पर बैठा।
अंग्रेज़ों के हाथों 1799 में मारे जाने तक टीपू सुलतान ने मैसूर पर शासन किया। वह जटिल चरित्र वाला और नए विचारों को ढूंढ़ निकालने वाला व्यक्ति था। एक नए केलेंडर को लागू करना, सिक्का-ढलाई की नई प्रणाली काम में लाना तथा माप-तोल के नए पैमानों को अपनाना उसकी समय के साथ अपने को बदलने की इच्छा के प्रतीक थे। उसके निजी पुस्तकालय में धर्म, इतिहास, सैन्य, विज्ञान, औषधि विज्ञान और गणित जैसे विविध विषयों की पुस्तकें थीं। उसने फ्रांसीसी क्रांति में गहरी दिलचस्पी ली। उसने श्रीरंगपट्टम में स्वतंत्रता-वृक्ष’ लगाया और एक जैकोबिन क्लब का सदस्य बन गया। उसकी सांगठनिक क्षमता का प्रमाण यह है कि जिन दिनों में भारतीय फौजों के बीच अनुशासनहीनता आम थी, उसके सैनिक अंत तक अनुशासित और उसके प्रति वफ़ादार रहे। उसने जागीर देने की प्रथा को खत्म करके राजकीय आय बढ़ाने की कोशिश की। उसने पोलिगारो की पैतृक संपत्ति को कम करने और राज्य तथा किसानों के बीच के मध्यस्थों को समाप्त करने की भी कोशिश की। मगर उसका भू-राजस्व उतना ही ऊँचा था जितना अन्य समसामयिक शासकों का। वह पैदावार का एक-तिहाई हिस्सा तक भू-राजस्व के रूप में लेता था। मगर उसने अब्वाबों की वसूली पर रोक लगा दी। वह भू-राजस्व में छूट देने में भी उदार था।
उसकी पैदल सेना यूरोप की शैली में बंदूकों और संगीनों से लैस थी, लेकिन इन हथियारों को मैसूर में ही बनाया गया था। 1796 के बाद उसने एक आधुनिक नौ सेना खड़ी करने की भी कोशिश की थी। इसके लिए उसने दो नौका घाट बनवाए
थे तथा जहाजों के नमूने उसने स्वयं तैयार कराए थे। अपने व्यक्तिगत जीवन में वह एकदम सादा था। उसे किसी प्रकार का व्यसन नहीं था और विलासिता से वह कोसों दूर था। वह एक दुस्साहसी योद्धा था और अत्यंत प्रतिभाशाली सेनानायक
था। उसकी यह अत्यंत प्रिय उक्ति एक “शेर की तरह एक दिन जीना बेहतर है लेकिन भेड़ की तरह लंबी जिंदगी जीना अच्छा नहीं।” इसी विश्वास का पालन करते हुए वह श्रीरंगपट्टनम के द्वार पर लड़ता हुआ मरा था। लेकिन हर काम में
वह जल्दबाजी करता था और उसका स्वभाव स्थिर नहीं था। एक राजनीतिज्ञ के रूप में 18वीं सदी के किसी भी शासक की तुलना में वह दक्षिण भारत के लिए या दूसरे भारतीय शासकों के लिए अंग्रेजी राज के.खतरे को अधिक ठीक तरह से समझता था। उदीयमान अंग्रेजी सत्ता के समक्ष वह दृढनिश्चयी शत्रु के रूप में खड़ा हुआ था और अंग्रेज़ भी भारत में उसको अपना सबसे खतरनाक दुश्मन समझते थे।
हालाँकि मैसूर उस जमाने के आर्थिक पिछड़ेपन के दोष से मुक्त नहीं था लेकिन हैदर अली और टीपू के राज्यकाल में वह आर्थिक रूप से खूब फला-फूला। यह इस तथ्य से अधिक स्पष्ट हो जाता है, खासतौर पर जब हम उसकी आर्थिक स्थिति की तुलना निकट अतीत से या उस समय में देश के ने अन्य भागों से करते हैं। 1799 में ब्रिटिश लोगों ने जब टीपू को पराजित कर उसे मार डाला और मैसूर पर कब्जा कर लिया तो यह देखकर उनको आश्चर्य हुआ कि मैसूर का किसान ब्रिटिश शासित राज्य मद्रास के किसान की तुलना में कहीं अधिक संपन्न और खुशहाल था। सर जॉन शोर 1793-98 के दौरान गवर्नर-जनरल
था। उसने बाद में लिखा था, “टीपू के राज्य के किसानों को संरक्षण मिलता था तथा उनको श्रम के लिए प्रोत्साहित और पुरस्कृत किया जाता था।” टीपू सुलतान के ज़माने के मैसूर के बारे में एक अन्य ब्रिटिश पर्यवेक्षक ने लिखा था, “यह राज्य खेतीबाड़ी में बढ़ा-चढ़ा, परिश्रमी लोगों की घनी आबादी वाला, नए-नए नगरों वाला और वाणिज्य व्यापार में बढ़ोतरी वाला था।” लगता है कि
आधुनिक व्यापार और उद्योग के महत्त्व को भी टीपू अच्छी तरह समझता था। वास्तव में भारतीय शासकों में यही एकमात्र शासक था जो आर्थिक शक्ति के महत्त्व को सैनिक शक्ति की नींव मानता था। भारत में आधुनिक उद्योगों की शुरूआत के लिए उसने थोड़े-बहुत प्रयास किए। इसके लिए उसने विदेशों से कारीगर बुलाए और कई उद्योगों को उसने राज्य की ओर से सहायता दी।
विदेश व्यापार के विकास के लिए उसने फ्रांस, तुर्की, ईरान और पेगू में दूत भेजे। चीन के साथ भी उसने व्यापार किया। यूरोपीय कंपनियों के ढाँचे पर उसने व्यापारिक कंपनी स्थापित करने का प्रयास भी किया और उनकी वाणिज्य संबंधी गतिविधियों की नकल करने की कोशिश की। बंदरगाह वाले नगरों में व्यापारिक संस्थाएँ स्थापित करके उसने रूस तथा अरब के साथ व्यापार बढ़ाने का प्रयत्न किया।
कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों ने टीपू को धार्मिक उन्मादी के रूप में चित्रित किया है। यद्यपि अपने धार्मिक दृष्टिकोण में वह काफ़ी रूढ़िवादी था लेकिन दूसरे धर्मों के प्रति उसका दृष्टिकोण सहिष्णु और उदार था। 1791 में मराठा घुड़सवारों ने शृंगेरी के शारदा मंदिर को लूटा तो उसने माँ शारदा की प्रतिमा बनवाने के लिए पैसे दिए। वह नियमित रूप से इस मंदिर और इसके साथ कुछ  और मंदिरों को भेंट दिया करता था। रंगनाथ का प्रसिद्ध मंदिर उसके महल में और ईसाइयों के प्रति काफ़ी कठोर था

केरल :  अठारहवीं सदी के शुरू में केरल बहुत बड़ी संख्या में सरदारों और राजाओं में बँटा हुआ था। इनमें से चार प्रमुख राज्य इस प्रकार थे कालीकट, चिरक्कल, कोचीन और त्रावणकोर। त्रावणकोर राज्य को अठारहवीं सदी के एक अग्रणी राजनेता राजा मार्तंड वर्मा के नेतृत्व में प्रमुखता मिली। उसमें विलक्षण दूरदर्शिता तथा दृढ़ संकल्प और साहस तथा निर्भीकता
का सामंजस्य था। उसने सामंतों को शांत कर दिया, क्विलोन और इलायादाम का जीत लिया और डच लोगों को हराकर केरल में उनकी राजनीतिक सत्ता खत्म कर दी। उसने यूरोपीय अफसरों की मदद से पश्चिमी मॉडल के आधार पर एक शक्तिशाली फौज का संगठन किया और उसे आधुनिक हथियारों से सुसज्जित किया। उसने एक आधुनिक शस्त्रागार भी बनाया। मार्तंड वर्मा ने अपनी नई फौज का इस्तेमाल अपना राज्य उत्तर की ओर बढ़ाने के लिए किया। त्रावणकोर की सीमाएँ जल्द ही कन्याकुमारी से कोचीन तक फैल गई। उसने सिंचाई की अनेक व्यवस्थाएँ की, संचार के लिए सड़कें और सिंचाई के लिए नहरें बनाई तथा विदेश व्यापार को सक्रिय प्रोत्साहन दिया।
केरल के तीन बड़े राज्यों कोचीन, त्रावणकोर और कालीकट ने 1763 तक सभी छोटे राजवाड़ों को विलीन या अधीन कर लिया। हैदर अली ने केरल पर अपना आक्रमण 1766 में शुरू किया और अंत में कालीकट के ज़मोरिन के इलाकों सहित कोचीन तक उत्तरी केरल को हड़प लिया। अठारहवीं सदी में मलयाली साहित्य में एक असाधारण पुनर्जीवन देखा गया।
यह अंशत: केरल के राजाओं और सरदारों के कारण हुआ जो साहित्य के महान संरक्षक थे। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में त्रावणकोर की राजधानी त्रिवेंद्रम, संस्कृत विद्वता का एक प्रसिद्ध केंद्र बन गया। मार्तंड वर्मा का उत्तराधिकारी राम वर्मा स्वयं कवि, विद्वान, संगीतज्ञ, प्रसिद्ध अभिनेता और सुसंस्कृत व्यक्ति था। वह अंग्रेजी में धाराप्रवाह बातचीत करता था। उसने यूरोप के मामलों में गहरी दिलचस्पी ली। वह लंदन, कलकत्ता और मद्रास से निकलने वाले अखबारों और पत्रिकाओं को नियमित रूप से पढ़ता था।

दिल्ली के आस-पास के क्षेत्र

राजपूत राज्य : मुगल सत्ता की बढ़ती हुई कमज़ोरी का फायदा उठाकर प्रमुख राजपूत राज्यों ने अपने को केंद्रीय नियंत्रण से वस्तुत: स्वतंत्र कर लिया। साथ ही उन्होंने साम्राज्य के शेष भागों में अपना प्रभाव बढ़ाया। फर्रुखसियर और मुहम्मद
शाह के शासन काल में आमेर और मारवाड़ के शासकों को आगरा, गुजरात और मालवा जैसे महत्त्वपूर्ण मुगल प्रांतों का सूबेदार बनाया गया। राजपूताना के राज्य पहले की तरह विभाजित रहे। उनमें जो बड़े थे उन्होंने अपने कमज़ोर पड़ोसियों-राजपूत और गैर-राजपूत दोनों के इलाकों को हथियाकर अपना विस्तार किया। अधिकतर बड़े राजपूत राज्य निरंतर छोटे झगड़ों और गृह-युद्धों में फंसे रहे। इन राज्यों की अंदरूनी राजनीति में उसी प्रकार के भ्रष्टाचार, षड्यंत्र और विश्वासघात का बोलबाला था जैसा मुगल दरबार में था, मारवाड़ के अजीतसिंह को उसके बेटे ने ही मार डाला।
अठारहवीं सदी का सबसे श्रेष्ठ राजपूत शासक आमेर का सवाई जयसिंह (1681-1743) था। वह एक विख्यात राजनेता, कानून-निर्माता और सुधारक था। परंतु सबसे अधिक, वह विज्ञान-प्रेमी के रूप में प्रसिद्ध हुआ। उल्लेखनीय है कि जिस युग में वह था, उसमें अधिकांश भारतीयों को वैज्ञानिक प्रगति के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। उसने जाटों से लिए गए इलाके में जयपुर शहर की स्थापना की और उसे विज्ञान और कला का महान केंद्र बना दिया।
जयपुर का निर्माण बिलकुल वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर और एक नियमित योजना के तहत हुआ। उसकी चौड़ी सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं।
जयसिंह की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह एक महान खगोलशास्त्री भी था। उसने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन और मथुरा में बिलकुल सही और आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित पर्यवेक्षणशालाएँ बनाईं। कुछ उपकरण खुद जयसिंह के बनाए हुए थे। उसके खगोलशास्त्र संबंधी पर्यवेक्षण आश्चर्यजनक रूप से सही होते थे। उसने सारणियों का एक सेट तैयार किया जिससे लोगों को खगोलशास्त्र संबंधी पर्यवेक्षण करने में सहायता मिले। इसका नाम “जिज मुहम्मदशाही’ था। उसने युक्लिड की “रेखागणित के तत्त्व” का अनुवाद संस्कृत में कराया। उसने त्रिकोणमिति की बहुत सारी कृतियों और लघुगणकों को बनाने और उनके
इस्तेमाल संबंधी नेपियर की रचना का अनुवाद संस्कृत में कराया। जयसिंह समाज-सुधारक भी था। उसने एक कानून लागू करने की कोशिश की जिससे लड़की की शादी में किसी राजपूत को अत्यधिक खर्च करने के लिए  मजबूर न होना पड़े। लड़की की शादी में भारी खर्च के कारण ही लड़कियों को जन्म लेते ही मार दिया जाता था। इस असाधारण राजा ने जयपुर पर 1699 से 1743 तक, लगभग 44 वर्षों तक शासन किया।

बंगश पठान और रूहेले : एक अफ़गान दुस्साहसी, मुहम्मद खां बंगश ने फर्रुखाबाद के इर्द-गिर्द के इलाके (अलीगढ़ और कानपुर के इलाके) पर फर्रुखसियर और मुहम्मद शाह के शासन काल में अपना अधिकार कायम कर लिया। इसी प्रकार नादिर शाह के आक्रमण के बाद प्रशासन के ठप्प हो जाने पर अली मुहम्मद खां ने रूहेलखंड नामक एक राज्य कायम किया। यह राज्य हिमालय की तराई में दक्षिण में गंगा और उत्तर में कुमायूँ की पहाड़ियों तक फैला हुआ था। इसकी राजधानी पहले बरेली में आँवला में थी और बाद में रामपुर चली गई। रूहेलों का अवध, दिल्ली और जाटों से लगातार टकराव होता रहा।

सिख : सिख धर्म की शुरुआत गुरु नानक ने पंद्रहवीं शताब्दी में की। यह पंजाब के जाट किसानों तथा अन्य जातियों के बीच फैल गया। एक लड़ाकू समुदाय के रूप में सिखों को बदलने का काम गुरु हर गोविंद (1606-1645) ने आरंभ किया। मगर अपने दसवें और आखिरी गुरु गोविंद सिंह (1666-1708) के नेतृत्व में सिख राजनीतिक और फौजी ताकत बने। औरंगज़ेब के फौजी
और पहाड़ी राजाओं के ख़िलाफ़ 1699 से लेकर 1708 तक गुरु गोविंद सिंह ने लगातार लड़ाइयाँ कीं। औरंगजेब के मरने के बाद गुरु गोविंद सिंह ने बहादुर शाह का साथ दिया। उनका ओहदा 5,000 जात और 5,000 सवार वाले सामंत का था। वे बहादुर शाह के साथ दक्कन गए जहाँ उन्हें एक पठान नौकर ने विश्वासघात कर मार डाला।
गुरु गोविंद सिंह की मृत्यु के बाद गुरु की परंपरा खत्म हो गई। सिखों का नेतृत्व उनके विश्वासपात्र शिष्य, बंदा सिंह के हाथों में चला गया, जो बंदा बहादुर के नाम से चारों ओर विख्यात है। बंदा ने पंजाब के किसानों और निम्न जातियों के लोगों को एकजुट किया और मुगल फौज के ख़िलाफ़ आठ साल तक जोश-खरोश के साथ गैर-बराबरी की लड़ाई चलाई। उसे 1715 में पकड़
लिया गया और कत्ल कर दिया गया। उसकी असफलता के अनेक कारण थे: मुगल शासन अभी भी काफ़ी शक्तिशाली था। पंजाब के संपन्न वर्ग और ऊँची जातियों के लोगों ने उसके विरोधियों का साथ दिया क्योंकि वह निम्न जातियों और गाँव की गरीब जनता का हिमायती था। अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण वह मुगल विरोधी समस्त ताकतों को एकजुट नहीं कर सका।
सिखों को फिर से उठ खड़ा होने का मौका नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों और उनके कारण पंजाब के प्रशासन में हुई गड़बड़ी ने दिया। आक्रमणकारियों की फौजों के आगे बढ़ने पर सिखों ने बिना कोई भेदभाव
किए सबको लूटा और धन तथा सैनिक शक्ति इकट्ठी की । अब्दाली के पंजाब से वापस जाने के बाद उन्होंने राजनीतिक रिक्तता को भरना आरंभ किया। उन्होंने 1765 और 1800 के बीच पंजाब और जम्मू को अपने अधिकार में कर लिया।
सिख 12 मिसलों या संघों में संगठित थे जो सूबे के विभिन्न भागों में काम करते थे। ये मिसल एक-दूसरे के साथ पूरी तरह सहयोग करते थे। मूलतः वे समानता के सिद्धांत पर आधारित थे। किसी मिसल के मामलों पर विचार करने और  उसके प्रधान तथा अन्य अधिकारियों को चुनने में सभी सदस्य समान रूप से हिस्सा लेते थे। धीरे-धीरे मिसलों का जनतांत्रिक और अकुलीन चरित्र लुप्त हो गया और शक्तिशाली प्रधानों, सामंतों और सरदारों तथा ज़मींदारों ने उन पर अपना दबदबा कायम कर लिया। भाईचारे की भावना और खालसा की एकता भी हो गई क्योंकि प्रधान निरंतर आपस में झगड़ते रहते थे, उन्होंने अपने को
लुप्त स्वतंत्र सरदार घोषित कर दिया था।
रणजीत सिंह के अधीन पंजाब : अठारहवीं सदी के अंत में सुकेरचकिया मिसल के प्रधान रणजीत सिंह ने प्रमुखता प्राप्त कर ली। वह एक ताकतवर और साहसी सैनिक, कुशल प्रशासक तथा चतुर कूटनीतिज्ञ था। वह जन्मजात नेता था
को भी अपना राज्य कायम किया। बाद में उसने कश्मीर, पेशावर और उसने 1799 में लाहौर और 1802 में अमृतसर पर कब्जा कर लिया। उसने सतलज के पश्चिम के सभी सिख प्रधानों को अपने अधीन कर लिया और पंजाब में
मुलतान जीत लिया। पुराने सिख प्रधान बड़े ज़मींदार और जागीरदार बना दिए गए। उसने मुगलों द्वारा लागू की गई भू-राजस्व की व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किए। भू-राजस्व का हिसाब 50 प्रतिशत सकल उत्पादन के आधार पर लगाया गया।
रणजीत सिंह ने यूरोपीय प्रशिक्षकों की सहायता से यूरोपीय ढर्रे पर शक्तिशाली, अनुशासित और सुसज्जित फौज तैयार की। उसकी नई फौज केवल सिखों तक ही सीमित नहीं थी। उसने गोरखा, बिहारी, उड़िया, पठान, डोगरा तथा पंजाबी मुसलमानों को भी अपनी फौज में भर्ती किया। उसने लाहौर में तोप बनाने के आधुनिक कारखाने खोले तथा उनमें मुसलमान तोपचियों को काम पर लगाया। कहा जाता है कि उसकी फौज एशिया की दूसरी सबसे अच्छी फौज थी। पहला स्थान अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज का था।
रणजीत सिंह बखूबी अपने मंत्रियों और अफसरों का चुनाव करता था। उसका दरबार श्रेष्ठ व्यक्तियों से भरा हुआ था। धर्म के मामले में वह सहनशील तथा उदारवादी था। न केवल सिख बल्कि मुसलमान तथा हिंदू संतों को भी वह सम्मान, आदर और संरक्षण देता था। धर्मपरायण सिख होते हुए भी यह कहा जाता है कि ‘अपने सिंहासन से उतरकर मुसलमान फकीरों के पैरों की धूल अपनी लंबी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था।’ उसके अनेक महत्त्वपूर्ण मंत्री और सेनापति मुसलमान और हिंदू थे। उसका सबसे प्रमुख और विश्वासपात्र मंत्री फकीर अजीज़उद्दीन था। उसका वित्त मंत्री दीवान दीनानाथ था। वस्तुतः किसी भी दृष्टि से रणजीत सिंह द्वारा शासित पंजाब एक सिख राज्य नहीं था। राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल केवल सिखों के फायदे के लिए नहीं होता था। सिख किसान उतना ही उत्पीड़ित था जितना हिंदू या मुसलमान किसान था। वस्तुतः रणजीत सिंह के अधीन एक राज्य के रूप में पंजाब का ढाँचा अठारहवीं सदी के अन्य भारतीय राज्यों की तरह ही था।
जब 1809 में अंग्रेजों ने रणजीत सिंह को सतलज पार करने से मना कर दिया और नदी के पूरब के सिख राज्यों को अपने संरक्षण में ले लिया तब उसने चुप्पी साध ली, क्योंकि उसने महसूस किया कि उनके पास अंग्रेजों का मुकाबला करने की शक्ति नहीं है। इस प्रकार उसने अपने राजनयिक यथार्थवाद और सैनिक शक्ति के जरिए अपने राज्य को अंग्रेजों के अतिक्रमण बचा
लिया। मगर वह विदेशी खतरे को हटा नहीं सका उसने उस खतरे को अपने उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ दिया। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसका राज्य जब सत्ता के तीव्र आंतरिक संघर्ष का शिकार हो गया तब अंग्रेज़ आए और उन्होंने उसे जीत लिया।

मराठा शक्ति का उत्थान और पतन

पतनोन्मुख मुगल सत्ता को सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौती मराठा राज्य से मिली जो उत्तराधिकारी राज्यों में सबसे शक्तिशाली था। असल में, मुगल साम्राज्य के विघटन से उत्पन्न राजनीतिक रिक्तता को भरने की शक्ति केवल उसी में थी। यही नहीं उसने इस कार्य के लिए ज़रूरी कई प्रतिभाशाली सेनापतियों और राजनेताओं को पैदा किया था। मगर मराठा सरदारों में एकता नहीं थी। उनके पास एक अखिल भारतीय साम्राज्य बनाने के लिए आवश्यक दृष्टिकोण और कार्यक्रम नहीं था। इसलिए वे मुगलों की जगह लेने में असफल रहे। मगर जब तक उन्होंने मुगल साम्राज्य को खत्म नहीं किया तब तक वे उसके ख़िलाफ़
लगातार लड़ाई करते रहे। शिवाजी के पोते साहू को औरंगज़ेब ने 1689 से कैद कर रखा था। औरंगजेब उसके तथा उसकी माँ के साथ उनके धर्म, जाति तथा अन्य चीजों का पूरी तरह ख्याल कर बड़ी शिष्टता, इज़्ज़त तथा लिहाज़ के साथ पेश आया। उसकी उम्मीद थी कि शायद साहू के साथ कोई राजनीतिक समझौता हो जाए। साहू को 1707 में औरंगजेब की मौत के बाद रिहा कर दिया गया। फिर जल्द ही साहू और कोल्हापुर में रहने वाली उसकी चाची ताराबाई के बीच गृह-युद्ध छिड़ गया।
ताराबाई ने अपने पति राजाराम के मरने के बाद अपने बेटे शिवाजी द्वितीय के मुगल विरोधी संघर्ष 1700 में चला रखा था। मराठा सरदारों ने सत्ता के लिए संघर्ष करने वालों में से किसी न किसी का पक्ष लेना आरंभ कर दिया। हर मराठा सरदार के पीछे सिपाही थे जो केवल उसी के प्रति निष्ठा रखते थे।
उन्होंने इस अवसर का इस्तेमाल सत्ता के लिए संघर्ष करने वाले दोनों पक्षों से गोलभाव करके अपनी शक्ति और प्रभाव को बढ़ाने के लिए किया। उनमें से अनेक ने दक्कन के मुगल नवाबों के साथ मिलकर साजिशें भी की। साहू और कोल्हापुर स्थित उसके प्रतिद्वंद्वी के बीच झगड़े के फलस्वरूप मराठा सरकार की एक नई व्यवस्था ने जन्म लिया जिसका नेता राजा साहू का पेशवा बालाजी विश्वनाथ था। इस परिवर्तन के साथ मराठा इतिहास में पेशवा आधिपत्य का दूसरा काल आरंभ हुआ जिसमें मराठा राज्य एक साम्राज्य के रूप में बदल गया। बालाजी विश्वनाथ ब्राह्मण था। उसने अपना जीवन एक छोटे राजस्व अधिकारी के रूप में प्रारंभ किया था और धीरे-धीरे बढ़कर एक बड़ा अधिकारी हो गया था। साहू को अपने दुश्मनों को कुचलने के काम में उसने अपनी निष्ठापूर्ण और जरूरी सेवा दी। वह कूटनीति में बेजोड़ था और उसने अनेक बड़े मराठा सरदारों को साहू की ओर कर लिया। साहू ने 1713 में उसे पेशवा या मुख्य-प्रधान बनाया।

बालाजी विश्वनाथ ने धीरे धीरे साहू और अपना आधिपत्य मराठा सरदारों और अधिकांश महाराष्ट्र पर कायम किया। केवल कोल्हापुर के दक्षिण के इलाके पर राजाराम के वंशजों का शासन रहा। पेशवा ने अपने हाथों में शक्ति का संकेंद्रण
कर लिया और अन्य मंत्री तथा सरदार उसके सामने प्रभावहीन हो गए। वस्तुतः वह और उसका बेटा बाजीराव प्रथम ने पेशवा को मराठा साम्राज्य का कार्यकारी प्रधान बना दिया। बालाजी विश्वनाथ ने मराठा शक्ति को बढ़ाने के लिए मुगल अधिकारियों के आपसी झगड़ों का पूरा फायदा उठाया। उसने दक्कन का चौथ और सरदेशमुखी देने के लिए जुल्फ़िकार खां को राजी कर लिया। अंत में उसने सैयद बंधुओं के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए। वे सारे इलाके जो पहले शिवाजी के राज्य
के हिस्से थे, साहू को वापस कर दिए गए। उसे दक्कन के छ: सूबों का चौथ और सरदेशमुखी भी दे दिया गया। बदले में साहू बादशाह की सेवा में 15,000 घुड़सवार सैनिकों को देने, दक्कन में बगावत और लूटमार रोकने तथा 10 लाख रुपयों का सालाना नजराना पेश करने पर राजी हो गया। नाममात्र के लिए ही सही मगर वह पहले ही मुगल आधिपत्य स्वीकार कर चुका था। वह 1714 में औरंगजेब के मकबरे तक पैदल चलकर खुलदाबाद गया तथा उसके प्रति सम्मान व्यक्त किया। अपने नेतृत्व में एक मराठा फौज लेकर बालाजी विश्वनाथ 1719 में सैयद अली खां के साथ दिल्ली गया और फर्रुखसियर का तख्ता पलटने में सैयद बंधुओं की मदद की। दिल्ली में उसने और अन्य मराठा सरदारों ने साम्राज्य की कमजोरी को स्वयं देखा और उनमें अपना प्रभाव क्षेत्र उत्तर की ओर बढ़ाने की महत्वाकांक्षा ने घर कर लिया।
बालाजी विश्वनाथ ने मराठा सरदारों को दक्कन में चौथ और सरदेशमुखी की कुशल वसूली के लिए अलग-अलग इलाके सौंपे। मराठा सरदार वसूल की गई रकम का अधिकांश हिस्सा अपने खर्च के लिए रख लेते थे। चौथ और सरदेशमुखी सौंपने की प्रथा ने भी पेशवा को संरक्षण के ज़रिए अपनी व्यक्तिगत शक्ति बढ़ाने में सहायता दी। बड़ी संख्या में महत्त्वाकांक्षी सरदारों ने
उसके इर्द-गिर्द जमा होना आरंभ कर दिया। आगे चलकर यही मराठा साम्राज्य की कमजोरी का मुख्य स्रोत सिद्ध हुआ। उस समय तक वतनों और सरजामों (जागीरों) की प्रणाली ने मराठा सरदारों को शक्तिशाली स्वायत्त और केंद्रीय सत्ता के प्रति ईर्ष्यालु बना दिया था। उन्होंने अब मुगल साम्राज्य के सुदूर इलाकों में अपना अधिकार जमाना प्रारंभ कर दिया। वहाँ वे धीरे-धीरे कमोबेश स्वायत्त सरदारों के रूप में बस गए। इस तरह अपने मूल राज्य के बाहर मराठों की जीत में मराठा राजा या पेशवा के सीधे अधीन केंद्रीय फौज का नहीं बल्कि उनके सरदारों की अपनी निजी सेनाओं का हाथ था। जीत के दौरान सरदार बहुधा आपस में टकराते थे। अगर केंद्रीय सरकार उन्हें सख्ती से नियंत्रित करने की कोशिश करती तो वे दुश्मनों से मिल जाने में नहीं हिचकते थे। दुश्मनों में निज़ाम, मुगल या अंग्रेज़ कोई भी हो सकते थे।
बालाजी विश्वनाथ 1720 में मर गया। उसकी जगह पर उसका 20 वर्ष का बेटा बाजीराव प्रथम पेशवा बना। युवा होने के बावजूद बाजीराव एक निर्भीक और प्रतिभावान सेनापति तथा महत्त्वाकांक्षी और चालाक राजनेता था। उसे “शिवाजी के बाद गुरिल्ला युद्ध का सबसे बड़ा प्रतिपादक” कहा गया है। बाजीराव के नेतृत्व में मराठों ने मुगलों के ख़िलाफ़ अनगिनत अभियान चलाए। पहले उन्होंने मुगल अधिकारियों को विशाल इलाकों से चौथ वसूल करने का अधिकार देने और फिर वे इलाके मराठा राज्य को सौंप देने के लिए मजबूर किया। जब 1740 में बाजीराव मरा तब तक मराठों ने मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड के हिस्सों पर अधिकार कर लिया था। इसी काल में मराठों के गायकवाड़, होल्कर, सिंधिया और भोंसले परिवारों ने प्रमुखता प्राप्त की। जीवन भर बाजीराव ने दक्कन में निज़ाम उल-मुल्क की शक्ति को नियंत्रित करने की कोशिश की। निज़ाम-उल-मुल्क ने भी पेशवा की सत्ता को कमज़ोर करने के लिए कोल्हापुर के राजा, मराठा सरदारों और मुगल अधिकारियों से मिलकर लगातार साज़िशें कीं। दो बार दोनों लड़ाई के मैदान में मिले और दोनों  बार निजाम को मुंह की खानी पड़ी और उसे दक्कन प्रांतों का चौथ और सरदेशमुख अभियान आरंभ किया और अंततोगत्वा उन्हें मुख्य भूमि से निकाल बाहर कर बाजीराव ने 1733 में जंजीरा के सिदियों के खिलाफ़ एक लंबा शक्तिशाली दिया गया। साथ ही पुर्तगालियों के खिलाफ़ भी एक अभियान आरंभ किया गया।
अंत में सिलसिट और बसई (बस्सीन) पर कब्जा कर लिया गया मगर पश्चिमी बाजीराव की मौत अप्रैल 1740 में हो गई। बीस सालों की छोटी अवधि में ही उसने मराठा राज्य का चरित्र बदल दिया। महाराष्ट्र राज्य का एक साम्राज्य के रूप
तट पर पुर्तगालियों का अपने इलाकों पर कब्जा बना रहा। में बदला उसने जिसका प्रसार उत्तर में भी हुआ था। मगर वह साम्राज्य के आधार नहीं बना सका। नए इलाकों को जीतकर उन पर कब्जा जमाया गया मगर उनके प्रशासन की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। सफल सरदारों की मुख्य दिलचस्पी राजस्व वसूल करने में ही थी। बाजीराव का अट्ठारह साल का बेटा बालाजी बाजीराव (जो नाना साहब के नाम से जाना जाता था) पेशवा बना। वह 1740 से 1761 तक पेशवा रहा। वह अपने
पिता की तरह ही योग्य था, यद्यपि वह कम उद्यमी था। राजा साहू 1749 में मर गया। उसने अपनी वसीयत के ज़रिए सारा राजकाज पेशवा के हाथों में छोड़ दिया। पेशवा का ओहदा तब तक वंशगत बन गया था और पेशवा ही राज्य का असली
शासक हो गया था। अब वह प्रशासन का अधिकृत प्रधान हो गया। इस तथ्य के प्रतीक के रूप में वह अपनी सरकार को अपने मुख्यालय पुणे (पूना) ले गया।
बालाजी बाजीराव ने अपने पिता का अनुसरण किया और साम्राज्य को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाया। उसने मराठा शक्ति को उसके उत्कर्ष पर पहुँचा दिया। मराठों ने सारे भारत को रौंद दिया। मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड पर मराठों का
अधिकार मजबूत हो गया। बंगाल पर बार-बार हमला हुआ और 1751 में बंगाल के नवाब को मजबूर होकर उड़ीसा मराठों को देना पड़ा। दक्षिण में मैसूर राज्य और अन्य छोटे रजवाड़ों को नज़राना देने के लिए विवश होना पड़ा। निज़ाम
हैदराबाद को 1760 में उदगिर में हरा दिया गया और उसे 62 लाख रुपयों के वार्षिक राजस्व वाले विशाल क्षेत्र को मराठों को सौंप देना पड़ा। उत्तर में जल्द ही मराठे मुगल सत्ता की असली ताकत बन गए। गंगा के दोआब और राजपूताने से होकर वे दिल्ली पहुंचे जहाँ 1752 में उन्होंने इमाद-उल-मुल्क को वज़ीर बनने में मदद दी। नया वज़ीर जल्द ही उनके हाथों की कठपुतली बन गया। दिल्ली से वे पंजाब की ओर मुड़े और अहमद शाह अब्दाली के प्रतिनिधि को बाहर निकाल कर उस पर अधिकार कर लिया। इससे उनका टकराव अफ़गानिस्तान के बहादुर योद्धा राजा के साथ हुआ जो फिर एक बार, मराठों से बदला लेने के लिए, भारत पर चढ़ आया। अब उत्तर भारत पर अधिकार के लिए एक बड़ा टकराव शुरू हुआ। अहमद
शाह अब्दाली ने रुहेलखंड के नजीबउद्दौला और अवध के शुजाउद्दौला से तुरंत गठजोड़ कर लिया। वे दोनों मराठा सरदारों के हाथों हार गए थे। आगामी संघर्ष की बड़ी अहमियत को देखकर पेशवा ने अपने नाबालिग बेटे के नेतृत्व में एक शक्तिशाली फौज उत्तर की ओर भेजी। उसका बेटा तो केवल नाम का ही सेनापति था, वास्तविक सेनापति उसका चचेरा भाई सदाशिव राव भाऊ था। इस फौज का एक महत्त्वपूर्ण भाग था यूरोपीय ढंग से संगठित पैदल और तोपखाने की टुकड़ी जिसका नेतृत्व इब्राहीम खां गार्दी कर रहा था। मराठों ने अब उत्तरी शक्तियों में सहायक ढूँढ़ने की कोशिश की। मगर उनके पहले के व्यवहार और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं ने उन सब शक्तियों को नाराज़ कर दिया था। उन्होंने राजपूताना के राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया था और उन पर भारी जुर्माने तथा नज़राने लगाए थे। उन्होंने अवध पर बड़े क्षेत्रीय और मौद्रिक
दावे किए थे। पंजाब में उनकी कार्रवाइयों ने सिख प्रधानों को नाराज़ कर दिया था। जिन जाट सरदारों पर भारी जुर्माने लगाए गए थे, वे उन पर विश्वास नहीं करते थे। इसलिए उन्हें अपने दुश्मनों से ईमाद-उल-मुल्क के कमजोर समर्थन के अलावा अकेले लड़ना पड़ा। यहीं नहीं, बड़े मराठा सेनापति लगातार आपस में झगड़ते रहते थे।
दोनों फौजों का पानीपत में 14 जनवरी 1761 को एक-दूसरे से आमना-सामना हुआ। मराठा फौज के पैर पूरी तरह उखड़ गए। पेशवा का बेटा विश्वास राव, सदाशिव राव भाऊ और अन्य अनगिनत मराठा सेनापति करीब 28,000 सैनिकों के
साथ मारे गए। अफ़गान घुड़सवारों ने भागने वालों का पीछा किया। उन्हें पानीपत क्षेत्र के जाटों, अहीरों और गूजरों ने भी लूटा-खसोटा। पेशवा जो अपने चचेरे भाई की मदद के लिए उत्तर की ओर बढ़ रहा था, इस दु:खद खबर को सुनकर हक्का-बक्का हो गया। वह पहले से ही गंभीर रूप से बीमार था। उसका अंत समय जल्द ही आ गया। जून 1761 में उसकी मृत्यु हो गई।
पानीपत की हार मराठों के लिए बहुत बड़ा आघात थी। उन्हें अपनी फौज के बेहतरीन सैनिकों से हाथ धोना पड़ा और उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। सबसे बढ़कर, उनकी हार ने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल और दक्षिण भारत में अपनी सत्ता मजबूत करने का मौका दिया। अफ़गानों को  भी अपनी जीत से कोई फायदा नहीं हुआ। वे पंजाब को अपने अधिकार में नहीं रख सके। वस्तुत: पानीपत की तीसरी लड़ाई ने यह फैसला नहीं किया कि पर कौन राज करेगा बल्कि यह तय कर दिया कि भारत पर कान शासन नहीं करेगा। इससे भारत में ब्रिटिश सत्ता के उदय का रास्ता साफ हो गया। और राजनेता था। ग्यारह सालों की छोटी अवधि में ही उसने मराठा साम्राज्य की सत्रह वर्षीय माधव राव 1761 में पेशवा बना। वह एक प्रतिभाशाली सैनिक खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस लौटा लिया। उसने निजाम को हराया, मैसूर के हैदा अली को नज़राना देने के लिए मजबूर किया तथा रुहेलों को हराकर और राजपूत फिर से दावा किया। मराठा 1771 में बादशाह आलम को दिल्ली वापस ले आए।
राज्यों और जाट सरदारों को अधीन लाकर उत्तर भारत पर अपने अधिकार अब बादशाह उनका पेंशनभोगी बन गया। इस प्रकार लगा कि उत्तर भारत पर किंतु मराठों को एक धक्का फिर लगा। माधव राव 1772 में क्षय रोग से गया। अब मराठा साम्राज्य अस्तव्यस्तता की स्थिति में पहुँच गया। पुणे में बालाजी बाजीराव के छोटे भाई रघुनाथ राव और माधव राव के छोटे भाई नारायण राव के बीच सत्ता के लिए संघर्ष हुआ। नारायण राव 1773 में मारा गया। उसकी जगह पर मरणोपरांत जन्मा उसका पुत्र सवाई माधव राव आया। निराश होकर रघुनाथ राव अंग्रेजों के पास चला गया और उनकी मदद से उसने सत्ता हथियाने की कोशिश की फलस्वरूप पहला आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ। पेशवा की सत्ता अब कमज़ोर होने लगी। पुणे में सवाई माधव राव के समर्थकों और रघुनाथ राव के पक्षधरों के बीच लगातार षड्यंत्र चल रहे थे। सवाई माधव राव के समर्थकों का नेता नाना फड़नवीस था। इस बीच बड़े मराठा सरदार अपने लिए उत्तर में अर्धस्वतंत्र राज्य कायम करने में लगे थे। वे शायद ही कभी पेशवा के साथ सहयोग करते थे। उनमें सबसे प्रमुख थे, बड़ौदा के गायकवाड़, इंदौर के होल्कर, नागपुर के भोंसले और ग्वालियर के सिंधिया। उन्होंने मुगल प्रशासन के ढर्रे पर नियमित प्रशासन कायम किए थे और उनके पास अपनी अलग फौजें थीं। पेशवा के प्रति उनकी निष्ठा अधिक से अधिक नाम के लिए होती गई। उन्होंने पुणे में विरोधी गुटों का साथ दिया और मराठा साम्राज्य के दुश्मनों के साथ मिलकर साज़िशें की।
उत्तर के मराठा शासकों में सबसे महत्त्वपूर्ण महादजी सिंधिया था। उसने फ्रांसीसी और पुर्तगाली अफसरों और बंदूकधारियों की सहायता से एक शक्तिशाली फौज खड़ी की तथा आगरा के पास शस्त्र निर्माण के कारखाने स्थापित किए। और 1784 उसने में बादशाह आलम को अपने वश में कर लिया। उसके कहने पर बादशाह ने पेशवा को अपना नायब-ए-गुनायब बनवाया। शर्त यह थी कि महादजी पेशवा की ओर से काम करेगा। मगर उसने अपनी शक्ति नाना फड़नवीस के ख़िलाफ़ साज़िशें करने में लगाई। वह इंदौर के होल्कर का भी बड़ा कटु शत्रु था। उसकी मृत्यु 1794 में हुई। नाना फड़नवीस की मृत्यु 1800 में हुई। वह और नाना फड़नवीस उन महान सैनिकों और राजनेताओं की परंपरा की आखिरी कड़ी थे जिन्होंने मराठा शक्ति को अठारहवीं सदी में उसके उत्कर्ष पर पहुँचाया था।
सवाई माधव राव की मृत्यु 1795 में हुई। उसकी जगह रघुनाथ राव के बेटे बाजीराव द्वितीय ने ली। तब तक अंग्रेजों ने भारत में अपने आधिपत्य के प्रति मराठों की चुनौती खत्म करने का फैसला कर लिया था। अंग्रेजों ने अपनी चतुर कूटनीति के द्वारा आपस में लड़ने वाले मराठा सरदारों को विभाजित कर दिया और दूसरे और तीसरे मराठा युद्ध (क्रमशः 1803-1805 और 1816-1819) में उन्हें हरा दिया। अन्य मराठा राज्यों को बरकरार रहने दिया गया मगर पेशवा वंश को समाप्त कर दिया गया।
इस प्रकार मुगल साम्राज्य को विभाजित करने और देश के बड़े हिस्सों में अपना साम्राज्य स्थापित करने का मराठों का सपना साकार नहीं हो सका। इसका मूल कारण यह था कि मराठा साम्राज्य उसी पतनोन्मुख समाज-व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता था जिसका मुगल साम्राज्य प्रतिनिधि था। दोनों एक ही प्रकार की अंतर्भूत कमजोरियों के शिकार थे। मराठा सरदार बहुत कुछ बाद के मुगल सामंतों की तरह थे और सरंजामी व्यवस्था जागीर की मुगल प्रणाली के समान थी। जब तक एक केंद्रीय सत्ता और एक सामूहिक शत्रु मुगलों के विरुद्ध पारस्परिक सहयोग की आवश्यकता थी तब तक वे किसी न किसी तरह एक
साथ सूत्रबद्ध रहे। किंतु कोई भी अवसर मिलते ही उन्होंने अपनी स्वायत्तता का दावा करने की कोशिश की।
चाहे और जो भी हो वे मुगल सामंतों की अपेक्षा कम अनुशासित थे। मराठा सरदारों ने एक नई अर्थव्यवस्था विकसित करने का कोई प्रयत्न नहीं किया। वे विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने में असफल रहे। उन्होंने व्यापार और उद्योग में कोई दिलचस्पी नहीं ली। उनकी राजस्व प्रणाली और प्रशासन मुगलों जैसे थे। मुगलों की तरह ही मराठा शासक भी लाचार किसानों से राजस्व वसूल करने में ही मुख्य रूप से दिलचस्पी रखते थे। उदाहरण के लिए उन्होंने भी आधा कृषि-उत्पादन कर के रूप में लिया। मुगलों के विपरीत वे महाराष्ट्र से बाहर की जनता को सही प्रशासन देने में भी विफल रहे। मुगलों की तुलना में वे भारतीय  जनता में निष्ठा की भावना को कोई बहुत अधिक नहीं जगा सके। उनका आधका क्षेत्र भी केवल बल पर आधारित था। उदीयमान ब्रिटिश सत्ता का मुकाबला मराठा वे ऐसा करने में असफल रहे।

जनता की सामाजिक-आर्थिक अवस्था

अठारहवीं सदी का भारत पर्याप्त गति से आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक प्रगति सामंतों, लगान के ठेकेदारों और ज़मींदारों की धन लिप्सा और प्रतिद्वंद्वी सेनाओं के आक्रमण और प्रत्याक्रमण तथा देश में फिरने वाले अनगिनत दुस्साहसिकों की लूटपाट से जन-जीवन बिल्कुल दयनीय हो गया था।

उन दिनों का भारत विषमताओं का भी देश हो गया था। अत्यंत दरिद्रता, अत्यंत समृद्धि और धन-संपदा साथ-साथ पाई जाती थी। एक तरफ भोगविलास में डूबे धनी और शक्तिशाली सामंत थे तो दूसरी ओर पिछड़े, उत्पीड़ित और दरिद्र किसान थे जो किसी तरह अपना जीवन-निर्वाह कर पाते थे और उन्हें सब प्रकार के अत्याचारों और अन्यायों को सहना पड़ता था। इतना होने पर भी भारतीय जनता का जीवन -जुलाकर उतना खराब नहीं था जितना उन्नीसवीं सदी के में सौ वर्षों से अधिक के ब्रिटिश शासन के बाद हुआ।

अठारहवीं सदी के दौरान भारतीय कृषि तकनीकी रूप से पिछड़ी हुई और
जड़वत थी। सदियों से उत्पादन की तकनीक ज्यों की त्यों बनी हुई थी। किसान
तकनीकी पिछड़ेपन से उत्पादन में होने वाली कमी को पूरा करने के लिए कठिन
परिश्रम करता था। वस्तुतः उसने उत्पादन के क्षेत्र में करिश्मे दिखाए। उसे आमतौर
से ज़मीन की कमी का सामना नहीं करना पड़ा। मगर दुर्भाग्यवश, उसे अपने परिश्रम
के अनुरूप फल नहीं मिल पाते थे। यद्यपि उसके उत्पादन पर ही शेष समाज
निर्भर था, तथापि उसका अपना पारितोषिक अत्यंत अपर्याप्त था। राज्य, ज़मींदारों,
जागीरदारों और लगान के ठेकेदारों ने उससे अधिकतम रकम उगाहने की कोशिश
की। यह बात जिस हद तक मुगल राज्य के लिए सही थी उतनी ही हद तक मराठा
का जीवन मिला-
अत
या सिख सरदारों या मुगल राज्यों के अन्य उत्तराधिकारियों के लिए भी सच थी।

यद्यपि भारतीय गाँव बहुत हद तक स्वावलंबी थे और बाहर से थोड़ा-सा ही आयात करते थे तथा संचार के साधन पिछड़े हुए थे, इसके बावजूद देश के अंदर और एशिया और यूरोप के देशों के साथ मुगलों के शासनकाल में बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। भारत फारस की खाड़ी के इलाके से मोती, कच्चा

रेशम, ऊन, खजूर, मेवे और गुलाब जल; अरब से कहवा, सोना, दवाएँ और शहद; चीन से चाय, चीनी, चीनी मिट्टी और रेशम; तिब्बत से सोना, कस्तूरी और ऊनी कपड़ा; सिंगापुर से टिन; इंडोनेशियाई द्वीपों से मसाले, इत्र, शराब और चीनी; अफ्रीका से हाथी दाँत और दवाएँ; और यूरोप से ऊनी कपड़ा, ताँबा, लोहा और सीसा जैसी वस्तुएँ और कागज़ का आयात करता था। भारत के निर्यात की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु थी सूती वस्त्र। भारतीय सूती कपड़े अपनी उत्कृष्टता के लिए सारी दुनिया में मशहूर थे और उनकी हर जगह माँग थी। भारत कच्चा रेशम और रेशमी कपड़े, लोहे का सामान, नील, शोरा, अफ़ीम, चावल, गेहूँ, चीनी, काली मिर्च और अन्य मसाले, रत्न और औषधियाँ भी निर्यात करता था।

चूँकि भारत हस्तशिल्प और कृषि के उत्पादनों में कुल मिलाकर स्वावलंबी था, इसलिए वह बड़े पैमाने पर विदेशी वस्तुओं का आयात नहीं करता था। दूसरी ओर उसके औद्योगिक और कृषि उत्पादनों के लिए विदेशों में नियमित बाज़ार था, फलस्वरूप उसका निर्यात उसके आयात से अधिक होता था। विदेश व्यापार को चाँदी और सोने के आयात द्वारा संतुलित किया जाता था। असल में, भारत बहुमूल्य धातुओं के कुंड के नाम से जाना जाता था।

अठारहवीं सदी में गैर-उपनिवेशवादी दौर में, भारत में आंतरिक और विदेशी व्यापार की स्थिति के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है। इस विषय पर मुख्य दृष्टिकोण इस प्रकार है : अठारहवीं सदी के दौरान लगातार लड़ाई और अनेक इलाकों में
कानून और व्यवस्था भंग हो जाने के कारण देश के आंतरिक व्यापार को हानि पहुँची। अनेक व्यापारिक केंद्रों को सत्ता के दावेदारों और विदेशी आक्रमणकारियों ने लूट लिया। अनेक व्यापारिक मार्ग डाकुओं के संगठित दलों से भरे हुए थे। व्यापारी और उनके काफिले लगातार लूटे जाते रहे। यहाँ तक कि दो शाही शहरों, दिल्ली और आगरा के बीच की सड़क भी लुटेरों से सुरक्षित नहीं थी। यही नहीं, स्वायत्त प्रांतीय सरकारों और असंख्य स्थानीय सरदारों के उदय के साथ सीमा शुल्क की चौकियाँ भी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ गईं। हर छोटे-बड़े शासक ने अपने इलाकों में आने वाली या उनसे गुजरने वाली वस्तुओं पर भारी
सीमा शुल्क लगाकर अपनी आमदनी बढ़ाने की कोशिश की। इन सब कारणों का लंबी दूरी वाले व्यापारियों पर नुकसानदेह असर पड़ा। सामंत ही विलास की वस्तुओं के सबसे बड़े उपभोक्ता थे। विलास की वस्तुओं का ही व्यापार होता था। सामंतों के गरीब होने से आंतरिक व्यापार को भी धक्का लगा। दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि राजनीतिक परिवर्तनों तथा आंतरिक व्यापार संबंधी झगड़ों को प्राय: बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया है। विदेशी व्यापार पर इसका असर भी जटिल और अलग-अलग तरह का था। जहाँ समुद्री व्यापार का विस्तार हुआ वहीं फारस और अफगानिस्तान के रास्ते होने वाला व्यापार अस्त-व्यस्त हो।
उद्योग पर भी बुरा प्रभाव डाला। अनेक समृद्ध शहरों, उन्नत उद्योग के केंद्रों को लिया गया और उन्हें नष्ट कर दिया गया। दिल्ली को नादिर शाह ने लूटा और लाहौर, दिल्ली और मथुरा को अहमद शाह अब्दाली ने। आगरा को जाटों ने सूरत और गुजरात के अन्य शहरों तथा दक्कन को मराठों ने और सरहिंद को सिखों ने की जरूरतों को पूरा करने वाले दस्तकारों को अपने संरक्षकों की धन दौलत में कमी आने के कारण क्षति पहुँची। इससे आगरा और दिल्ली जैसे नगरों का पतन हुआ। आंतरिक और विदेशी व्यापार में गिरावट ने भी उन्हें देश के कुछ हिस्सों में धक्का पहुँचाया। इसके बावजूद देश के अन्य भागों में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के क्रियाकलापों के कारण यूरोप के साथ व्यापार बढ़ने के फलस्वरूप कुछ उद्योगों ने उन्नति की। बहरहाल नए दरबारों और नए सरदारों के आविर्भाव के कारण फैजाबाद, लखनऊ, वाराणसी और पटना जैसे नगरों का उदय हुआ। इससे दस्तकारी की हालत में थोड़ा सुधार हुआ।

फिर भी भारत व्यापक विनिर्माण का देश बना रहा। उस समय भी अपनी दक्षता के कारण भारतीय दस्तकार सारे विश्व में प्रसिद्ध थे। तब भी भारत सूती और रेशमी कपड़े, चीनी, जूट, रंग सामग्रियों, खनिज तथा हथियारों, धातु के बर्तनों जैसे धातु के उत्पादनों और शोरा और तेलों का बड़े पैमाने पर उत्पादक था। कपड़ा उद्योग के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे : बंगाल में ढाका और मुर्शिदाबाद; बिहार में पटना, गुजरात में सूरत, अहमदाबाद में भडौच, मध्यप्रदेश में चंदेरी; महाराष्ट्र में बुरहानपुर; उत्तरप्रदेश में जौनपुर, बनारस, लखनऊ और आगरा; पंजाब में मुलतान और लाहौर; आंध्रप्रदेश में मछलीपत्तनम, औरंगाबाद, चिकाकोल और विशाखापट्टनम; कर्नाटक में बंगलौर तथा तमिलनाडु में कोयंबतूर और मदुरै। कश्मीर ऊनी वस्त्रों का केंद्र था। महाराष्ट्र, आंध्र और बंगाल में जहाज़-निर्माण उद्योग विकसित हुआ था। इस संबंध में भारतीयों की महान दक्षता के बारे में एक अंग्रेज़ पर्यवेक्षक ने लिखा, ‘जहाज़ निर्माण में उन्होंने अंग्रेजों से जितना सीखा उससे अधिक उन्हें पढ़ाया।’ यूरोपीय कंपनियों ने अपने इस्तेमाल के लिए भारत में बने कई जहाज़ खरीदे।

असल में, अठारहवीं सदी के प्रारंभ में भारत विश्व व्यापार और उद्योग के प्रमुख केंद्रों में था। रूस के पीटर महान ने कहा था याद रखो कि भारत का वाणिज्य विश्व का वाणिज्य है और जो उस पर पूरा अधिकार कर सकेगा वही यूरोप का अधिनायक होगा।

एक बार फिर इस मुद्दे पर इतिहासकार एक मत नहीं हैं कि मुगल साम्राज्य के पतन के कारण और छोटे-छोटे स्वायत्त राज्यों के उठ खड़े होने से पूरे देश में आर्थिक स्थिति में गिरावट आई। या भारत के कुछ हिस्सों में व्यापार, कृषि तथा दस्तकारी का उत्पादन फलता-फूलता रहा और दूसरे हिस्से में यह अस्त-व्यस्त हो गया तथा आमतौर पर इसमें गिरावट आई। लेकिन कुल मिलाकर विचार किया जाए तो कोई बहुत अधिक हानि नहीं हुई। मगर सवाल यह नहीं है कि कहीं थोड़ी प्रगति हुई और कहीं थोड़ी अवनति, बल्कि प्रश्न मूलभूत आर्थिक ठहराव का है। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास की गुंजाइश थी तथा आर्थिक जीवन में एक प्रकार की निरंतरता थी, परन्तु अठारहवीं सदी के दौरान सत्रहवीं सदी के मुकाबले, आर्थिक गतिविधियों में कोई बहुत अधिक सुगबुगाहट अथवा उल्लास नज़र नहीं आता है। इसके विपरीत निश्चित रूप से हास की प्रवृत्ति दिखाई देती है। साथ ही, यह भी सच है कि दस्तकारी और कृषि उत्पादन के क्षेत्र में 18वीं सदी के भारतीय राज्यों में कम आर्थिक विपन्नता थी, जबकि अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में भारत के ब्रिटिश उपनिवेश की हालत ज्यादा खराब थी।

शिक्षा

अठारहवीं सदी के भारत में शिक्षा की पूरी तरह उपेक्षा नहीं की गई। मगर कुल मिलाकर वह त्रुटिपुर्ण थी। वह परंपरागत थी और पश्चिमी दुनिया में हुए द्रुत परिवर्तनों से उसका कोई संपर्क नहीं था। वह जो ज्ञान देती थी वह साहित्य, कानून, धर्म, दर्शनशास्त्र और तर्कशास्त्र तक ही सीमित था। उसने भौतिक और प्राकृतिक प्रौद्योगिकी और भूगोल के अध्ययन पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने समाज के तथ्यगत और विवेकपूर्ण अध्ययन से कोई वास्ता नहीं रखा। सभी क्षेत्रों में मौलिक चिंतन को नापसंद किया गया और प्राचीन विद्या पर ही भरोसा किया गया। उच्च शिक्षा के केंद्र पूरे देश में फैले हुए थे और आमतौर से उनको चलाने के लिए धन नवाब, राजा और धनी ज़मींदार देते थे। हिंदुओं में उच्च शिक्षा संस्कृत के माध्यम से दी जाती थी और मुख्यतः ब्राह्मणों तक सीमित थी। तत्कालीन राजकीय भाषा होने के कारण फारसी शिक्षा हिंदुओं और मुसलमानों में समान
रूप से लोकप्रिय थी।

प्राथमिक शिक्षा काफ़ी व्यापक थी। हिंदुओं में प्राथमिक शिक्षा शहर और स्थित मकतबों में मौलवी करते थे। युवा छात्रों को पढ़ने, लिखने और अंकगणित की शिक्षा दी जाती थी। यद्यपि प्राथमिक शिक्षा मुख्यतः ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य जैसी उच्च जातियों तक ही सीमित थी तथापि अन्य जातियों के भी कई लोग बहुधा उसे प्राप्त कर लेते थे। दिलचस्प बात यह है कि उस समय औसत साक्षरता ब्रिटिश शासन काल की अपेक्षा कम नहीं थी। इतना ही नहीं, में वारेन हेस्टिंग्ज़ ने भी लिखा था कि आमतौर पर यूरोप के किसी भी देश के लोगों के मुकाबले भारत के लोग पढ़ने, लिखने और अंकगणित में अधिक प्रतिभाशाली थे। यद्यपि प्राथमिक शिक्षा का स्तर आधुनिक मानदंडों से अपर्याप्त था, तथापि वह उन दिनों के सीमित उद्देश्यों की दृष्टि से पर्याप्त था। तब शिक्षा का एक अत्यंत आनंददायक पहलू यह था कि समाज में शिक्षकों की काफ़ी प्रतिष्ठा थी। एक खराब बात यह थी कि लड़कियों को विरले ही शिक्षा मिलती थी यद्यपि उच्च जातियों की कुछ औरतें पढ़ी-लिखी थीं जिसे एक अपवाद ही
कहा जा सकता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन

अठारहवीं सदी में सामाजिक जीवन और संस्कृति की विशेषता जड़ता और भूतकाल पर निर्भरता थी। कई शताब्दियों के दौरान विकसित थोड़ी बहुत सांस्कृतिक एकता के अलावा सारे देश में सांस्कृतिक और सामाजिक ढाँचे समरूप नहीं थे। हिंदू
और मुसलमान दो भिन्न समाजों में बँटे हुए थे। लोग धर्म, क्षेत्र, कबीले, भाषा और जाति के आधार पर विभाजित थे। इतना ही नहीं, उच्च वर्गों (जो कुल जनसंख्या के अनुपात में बहुत ही कम संख्या में थे) की सामाजिक जिंदगी और संस्कृति अनेक दृष्टियों से निम्न वर्गों की जिंदगी और संस्कृति से भिन्न थी। जाति हिंदुओं के सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषता थी। हिंदू चार वर्षों के
अतिरिक्त अनगिनत जातियों में बँटे हुए थे। जातियों का स्वरूप अलग-अलग जगह में अलग-अलग था। जातिप्रथा ने लोगों का कठोर विभाजन कर रखा था और सामाजिक क्रम में उनके स्थान स्थायी रूप से निश्चित कर दिए थे। ब्राह्मणों के नेतृत्व में उच्च जातियों ने हर तरह की सामाजिक प्रतिष्ठा और विशेषाधिकारों पर अपना एकाधिकार कायम कर रखा था। जाति नियम अत्यंत कठोर थे। अंतर्जातीय विवाहों की मनाही थी। विभिन्न जातियों के लोगों के साथ खाना खाने पर प्रतिबंध थे। कतिपय स्थितियों में उच्च जाति के लोग अन्य जातियों के लोगो का छुआ खाना नहीं खाते थे। बहुधा जातियाँ ही पेशे को निर्धारित करती थीं, यद्यपि काफ़ी बड़े पैमाने पर अपवाद भी घटित होते थे। मसलन, ब्राह्मण व्यापार में भी संलग्न थे तथा सरकारी सेवाओं में भी थे, कुछ के पास ज़मींदारी भी थी। इस तरह बहुत से शूद्र कहे जाने वाले लोग काफ़ी सफल और आर्थिक रूप से संपन्न थे तथा धन का उपयोग वे उच्च जातियों के लिए निर्धारित कर्मकांड में तथा सामाजिक प्रतिष्ठा पाने के लिए किया करते थे। इसी तरह देश के कई हिस्सों में जातिगत हैसियत काफ़ी अस्थिर बन गई थी। जाति परिषदें, पंचायतें और जाति के प्रधान जुर्मानों, प्रायश्चित और जाति-निष्कासन के द्वारा जाति के नियमों को सख्ती से लागू करते थे। अठारहवीं सदी के भारत में जाति एक बड़ी विभाजक शक्ति और विघटन का एक बड़ा तत्त्व थी। उसने बहुधा एक ही गाँव या इलाके में रहने वाले हिंदुओं को अनेक अत्यंत छोटे समूहों में बाँट रखा था। बेशक, उच्च ओहदे या सत्ता प्राप्त कर किसी भी व्यक्ति के लिए ऊँचा सामाजिक दर्जा हासिल करना संभव था। उदाहरण के लिए अठारहवीं सदी में होल्कर परिवार ने ऐसा ही किया। ऐसा बहुत अधिक तो नहीं होता था लेकिन
कभी-कभी कोई पूरी की पूरी जाति अपने को जाति-क्रम में ऊँचा उठाने में सफल हो जाती थी।

मुसलमान भी जाति, नस्ल, कबीले और दर्जे की दृष्टि से कम विभाजित नहीं थे। हालाँकि उनके धर्म ने सामाजिक समानता का निर्देश दिया था। धार्मिक मतभेदों के कारण शिया और सुन्नी सामंत यदा-कदा झगड़ते थे। ईरानी, अफगानी, तूरानी और हिंदुस्तानी मुसलमान सामंत और अधिकारी बहुधा एक दूसरे से अलग रहते थे। इस्लाम स्वीकार करने वाले अनेक हिंदू अपनी जाति को नए धर्म में भी ले आए। वे उसकी विशिष्टताओं को व्यवहार में रखते थे, यद्यपि वे ऐसा पहले की अपेक्षा कम सख्ती से करते थे। इसके अलावा, शरीफ़ मुसलमान जिनमें सामंत, विद्वान, मुल्ले और फौजी अफसर शामिल थे, अज्लाफ या निम्न वर्ग के मुसलमानों को उसी तरह से नीची निगाह से देखते थे जैसे उच्च जाति के हिंदू नीची जाति के हिंदुओं को देखते थे।

अठारहवीं सदी के भारत में परिवार की व्यवस्था पितृसत्तात्मक थी यानी परिवार में वरिष्ठ पुरुष सदस्य का बोलबाला होता था और संपत्ति में दाय भाग सिर्फ पुरुषों को ही मिलता था। परंतु केरल में परिवार मातृप्रधान था। केरल के बाहर औरतों पर पुरुषों का लगभग पूरा नियंत्रण होता था। उनसे आशा की जाती थी कि वे माताओं और पत्नियों की ही भूमिका निभाएँ। इन रूपों में उनको काफ़ी आदर-सम्मान दिया जाता था। यहाँ तक कि युद्ध और अराजकता के समय  भी औरतों को विरले तंग किया जाता था। उनके साथ आदरपूर्वक व्यवहार किया टिप्पणी की, ‘एक हिंदू औरत कहीं भी, यहाँ तक कि अत्यंत भीड़-भाड़ वाली
जगहों में भी, अकेले जा सकती है, और उसे अकर्मण्य आवारा लोगों की ढीठ निगाहों और दिल्लगियों का डर नहीं होता….ऐसा मकान जिसमें केवल औरतें रहती हैं एक ऐसा पवित्र स्थान है जिसकी मर्यादा भंग करने का ख्याल काई अत्यंत निर्लज्ज, लंपट स्वप्न में भी नहीं ला सकता।’ मगर तत्कालीन औरतों का अपना कोई अलग व्यक्तित्व नहीं था। इसका यह मतलब नहीं है कि इसके अपवाद नहीं हुए। अहिल्या बाई ने इंदौर पर 1766 से 1796 तक बड़ी सफलता के साथ शासस नहीं करना होता था, मगर कृषक औरतें आमतौर से खेतों में काम करती थीं और किया। अठारहवीं सदी की राजनीति में कई अन्य हिंदू और मुसलमान महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ अदा की। उच्च वर्गों की महिलाओं को घर से बाहर काम गरीब वर्गों की औरतें परिवार की आमदनी को पूरा करने के लिए बहुधा अपने घरों से बाहर जाकर काम करती थीं। पर्दा अधिकतर उत्तर भारत के उच्च वर्गा में ही प्रचलित था। दक्षिण भारत में उसका प्रचलन नहीं था।

लड़के-लड़कियों को एक दूसरे के साथ मिलने-जुलने नहीं दिया जाता था। सभी शादियाँ परिवार के प्रधान तय करते थे। पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की इजाज़त थी, मगर समृद्ध लोगों को छोड़कर पुरुष सामान्यतया एक पत्नी ही रखते थे। दूसरी ओर, एक औरत से आशा रखी जाती थी कि वह अपनी जिंदगी में सिर्फ एक बार ही शादी करेगी। बाल-विवाह प्रथा सारे देश में प्रचलित थी। कभी-कभी बच्चों की शादी केवल तीन या चार वर्ष की उम्र में कर दी जाती थी।

उच्च वर्गों में शादियों पर भारी रकम खर्च करने और दुल्हन को दहेज देने की कुप्रथा प्रचलित थी। दहेज की कुप्रथा खासकर बंगाल और राजपूताना में व्यापक रूप से प्रचलित थी। महाराष्ट्र में उसे कुछ हद तक पेशवा ने प्रभावशाली ढंग से दबा दिया था।

जाति प्रथा के अतिरिक्त अठारहवीं सदी के भारत की दो बड़ी सामाजिक कुरीतियाँ थीं सती प्रथा और विधवाओं की खराब अवस्था। सती प्रथा के अंतर्गत एक विधवा अपने मृत पति के शव के साथ जल मरती थी। यह कुप्रथा अधिकतर राजपूताना, बंगाल और उत्तरी भारत के अन्य हिस्सों में प्रचलित थी। सती प्रथा दक्षिण भारत में प्रचलित नहीं थी। मराठों ने उसे बढ़ावा नहीं दिया। राजपूताना और बंगाल में भी सती प्रथा का प्रचलन केवल राजाओं, सरदारों, बड़े जमींदारों और उच्च वर्गों में प्रचलित था। उच्च जातियों की विधवाएँ फिर से शादी नहीं कर सकती थीं। यद्यपि कुछ क्षेत्रों और कुछ जातियों, उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के गैर-ब्राह्मणों, जाट और उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों में विधवा पुनर्विवाह काफ़ी प्रचलित था। हिंदू विधवा की अवस्था आमतौर पर दयनीय होती थी। उसके कपड़े, भोजन, आने-जाने आदि पर सब प्रकार के प्रतिबंध होते थे। आमतौर से आशा की जाती थी कि वह सांसारिक सुखों को त्याग देगी और अपने पति या भाई के परिवार के सदस्यों की नि:स्वार्थ सेवा करेगी। वह अपने ससुराल या मायके में ही रह सकती थी। भारतीय विधवाओं के कठिन और कठोर जीवन को देखकर संवेदनशील बहुधा द्रवित हो जाते थे। आमेर के राजा सवाई जयसिंह और मराठा सेनापति परशुराम भाऊ ने विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देने की कोशिश की मगर वे असफल रहे।

अठारहवीं सदी के दौरान सांस्कृतिक दृष्टि से भारत में दुर्बलता के लक्षण दिखाई पड़े। बेशक, पिछली सदियों से सांस्कृतिक निरंतरता कायम रखी गई मगर साथ ही भारतीय संस्कृति पूरी तरह परंपरावादी बनी रही। तत्कालीन सांस्कृतिक क्रियाकलापों का खर्च अधिकतर शाही दरबार, शासक और सामंत तथा सरदार वहन करते थे, मगर उनकी आर्थिक हालत खराब होने के साथ सांस्कृतिक कार्यों की धीरे-धीरे अवहेलना होने लगी। उन सांस्कृतिक शाखाओं में तेजी से गिरावट आई जो राजाओं, राजकुमारों और सामंतों के संरक्षण पर निर्भर थी। यह बात सबसे अधिक मुगल वास्तुकला और चित्रकारी के लिए सही थी। मुगल शैली के अनेक चित्रकार प्रांतीय दरबारों में चले गए और हैदराबाद, लखनऊ, कश्मीर और पटना में चमके। साथ ही चित्रकारी की नई शैलियों का जन्म हुआ और उन्होंने उपलब्धियाँ प्राप्त की। कांगड़ा और राजपूत शैलियों के चित्रों ने नई तेजस्विता और रुचि प्रदर्शित की। वास्तुकला के क्षेत्र में लखनऊ का इमाम बाड़ा तकनीक की निपुणता, नगर वास्तु कलात्मक रुचि में अपकर्ष, को प्रदर्शित करता है। दूसरी ओर जयपुर शहर और उसकी इमारतें ओजस्विता की निरंतरता के उदाहरण हैं।अठारहवीं सदी में संगीत विकसित होता और फलता-फूलता रहा। इस क्षेत्र में मुहम्मद शाह के शासन काल में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई।

लगभग सभी भाषाओं में कविता का जीवन से संबंध टूट गया और वह आलंकारिक, कृत्रिम, यंत्रवत और परंपरागत हो गई। उसकी निराशावादिता ने हताशा और दोषान्वेषण की व्याप्त भावना को प्रदर्शित किया जबकि उसकी विषयवस्तु ने उसके संरक्षकों, सामंती अमीरों और राजाओं के आध्यात्मिक जीवन में गिरावट को व्यक्त किया।

अठारहवीं सदी के साहित्यिक जीवन का एक उल्लेखनीय पहलू था उर्दू भाषा का प्रसार और उर्दू कविता का जोरदार विकास। उर्दू धीरे-धीरे उत्तर भारत के उच्च वर्गों के परस्पर सामाजिक संपर्क का माध्यम बन गई। यद्यपि उर्दू कविता की भी वही कमजोरियाँ थीं जो अन्य भारतीय भाषाओं के समसामयिक साहित्य की थीं। पर उसने मीर, सौदा नजीर और उन्नीसवीं सदी की महान प्रतिभा मिर्जा गालिब जैसे प्रखर कवियों को पैदा किया।

इसी प्रकार मलयालम साहित्य में भी पुनर्जीवन देखा गया। यह विशेषकर त्रावणकोर शासकों, मार्तंड वर्मा और राम वर्मा के संरक्षण में हुआ। केरल का एक महान कवि, कुंचन नंबियार इसी समय हुआ जिसने आम बोलचाल की भाषा में जनप्रिय
कविता लिखी। अठारहवीं सदी के केरल में कथाकली साहित्य, नाटक और नृत्य का भी पूर्ण विकास हुआ। अनोखी वास्तुकला और भित्ति चित्रों वाला पद्मनाभन राज-प्रसाद भी अठारहवीं सदी में बनाया गया।

तायुमानवर (1706-44) तमिल में सित्तर काव्य का एक उत्कृष्ट प्रवर्तक था। अन्य सित्तर कवियों की तरह उसने मंदिर शासन तथा जाति प्रथा की कुरीतियों का विरोध किया। असम में साहित्य अहम (अहोम) राजाओं के संरक्षण में विकसित हुआ। गुजरात के एक महान गीतकार, दयाराम ने अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध के दौरान अपनी रचनाएँ लिखीं। पंजाबी के मशहूर प्रेम महाकाव्य, हीर-रांझा की रचना वारिस शाह ने इसी काल में की। सिंधी साहित्य के लिए अठारहवीं सदी विशाल उपलब्धियों की अवधि थी। इसी दौरान शाह अब्दुल लतीफ ने अपना प्रसिद्ध कविता संग्रह “रिसालो” रचा। सचल और सामी इस शताब्दी के अन्य महान सिंधी कवि थे।

भारतीय संस्कृति की मुख्य कमज़ोरी विज्ञान के क्षेत्र में थी। पूरी अठारहवीं शताब्दी के दौरान भारत पश्चिम देशों से विज्ञान और प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) के मामले में काफ़ी पिछड़ा रहा। पिछले दो सौ वर्षों से पश्चिमी यूरोप में एक वैज्ञानिक और आर्थिक क्रांति चल रही थी जिससे आविष्कारों और अनुसंधानों की बाढ़-सी आ गई थी। वैज्ञानिक दृष्टिकोण धीरे-धीरे पाश्चात्य मस्तिष्क पर हावी होता जा रहा था और यूरोपीय दार्शनिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण तथा यूरोपीय संस्थानों में क्रांति लाता जा रहा था। दूसरी तरफ भारतीय, जिन्होंने पुराने जमाने में गणित और प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिए थे, कई शताब्दियों से विज्ञान की उपेक्षा करते आ रहे थे। भारतीय मस्तिष्क अब भी परंपरा से बँधा था; सामंत और आम जनता, दोनों, काफ़ी अंधविश्वासी थे। भारतीय करीब-करीब पूरी तरह पश्चिम में प्राप्त वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक उपलब्धियों से अनभिज्ञ थे। यूरोप की चुनौती का जवाब देने में वे असफल रहे।

अठारहवीं सदी के भारतीय शासकों ने लड़ाई के हथियारों और सैनिक प्रशिक्षण की तकनीकों को छोड़कर किसी भी पश्चिमी चीज़ में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। टीपू सुलतान को छोड़कर, वे सभी मुगलों और सोलहवीं सत्रहवीं सदी के दूसरे शासकों से विरासत में प्राप्त विचारधारात्मक उपकरणों से संतुष्ट थे। इसमें कोई शक नहीं कि थोड़ी-बहुत बौद्धिक हलचल भी थी क्योंकि किसी भी ज़माने में सारी जनता और उसकी संस्कृति पूरी तरह स्थिर और जड़ नहीं रहती। प्रौद्योगिकी में थोड़ा-बहुत परिवर्तन और विकास तो हो रहा था लेकिन इसकी गति बहुत मंद और क्षेत्र काफ़ी सीमित थे, इसलिए पश्चिमी यूरोप में होने वाले विकास की तुलना में कुल मिलाकर ये नगण्य थे। विज्ञान के क्षेत्र में यह कमजोरी उस समय के अत्यंत विकसित देश द्वारा भारत को पूरी तरह गुलाम बनाए जाने के लिए बहुत दूर तक ज़िम्मेदार थी।

सत्ता और संपदा के लिए संघर्ष, आर्थिक पतन, सामाजिक पिछड़ापन और सांस्कृतिक जड़ता ने भारतीय जनता के एक बड़े भाग के चरित्र बल पर गहरा और नुकसानदेह असर डाला। खासकर सामंत अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में बहुत पतित हो गए। निष्ठा, कृतज्ञता और वचनबद्धता के सद्गुण स्वार्थपरता की प्रमुखता होने के कारण खत्म हो गए। अनेक सामंत अमानवोचित दुर्गुणों और अत्यधिक विलास के शिकार हो गए। उनमें से अनेक ने अपने ओहदों का फायदा उठाकर घूस ली। आश्चर्य की बात है कि आम जनता बहुत हद तक भ्रष्ट नहीं हुई थी, जनता में ऊँचे दर्जे की व्यक्तिगत ईमानदारी और नैतिकता थी। उदाहरण के लिए, विख्यात ब्रिटिश अधिकारी जान मैल्काम ने 1821 में टिप्पणी की थी:

मैं किसी अन्य महान जनसंख्या का उदाहरण नहीं जानता, जिसने समान परिस्थितियों में, उथल-पुथल और निरंकुश शासन के इस तरह के काल में इतने सद्गुणों और खूबियों को सँजोए रखा हो, जो यहां के अधिकांश देशवासियों में पाई जाती है।

खासकर उसने “चोरी, मदासक्ति और हिंसा जैसे आम दुर्गुणों के अभाव” की प्रशंसा  की। इसी प्रकार क्रानफर्ड नामक एक अन्य यूरोपीय लेखक ने लिखा- नैतिकता के उनके नियम उदार हैं : सत्कार और परोपकार उनमें न केवल जोरदार रूप से भरा पड़ा है बल्कि, मेरा विश्वास है कि उन्हें कहीं भी उतने व्यापक रूप से व्यवहार में नहीं देखा जाता, जितना हिंदुओं में।

हिंदुओं और मुसलमानों में मित्रतापूर्ण संबंध अठारहवीं सदी के जीवन की एक बड़ी विशेषता थी। यद्यपि तत्कालीन सामंत और सरदार आपस में अनवरत लड़ते  रहे, उनकी लड़ाइयाँ और उनके गठजोड़ विरले ही धर्म के भेदभाव पर आधारित थे। दूसरे शब्दों में उनकी राजनीति मूलतः धर्म-निरपेक्ष थी। असल में देश के अंदर शायद ही सांप्रदायिक कटुता या धार्मिक असहिष्णुता थी। छोटे-बड़े सभी लोग एक दूसरे के धर्म की इज्जत करते थे और देश में सहिष्णुता, यहाँ तक कि मेल-जोल की भावना, व्याप्त थी। ‘हिंदुओं और मुसलमानों के पारस्परिक संब भाईचारे के थे।’ यह कथन विशेषकर गाँवों और शहरों की आम जनता के लिए सही था, जो धर्म के भेदभाव का ख्याल किए बिना एक-दूसरे के सुख-दुःख में पूरी तरह हिस्सा लेती थी।

हिन्दू और  मुसलमान गैर-धार्मिक क्षेत्रों जैसे सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक कार्यों में परस्पर सहयोग करते थे। एक मिश्रित हिंदू-मुस्लिम संस्कृति या समान तौर-तरीकों तथा दृष्टिकोणों का विकास बेरोकटोक जारी रहा। हिंदू लेखकों ने बहुधा फारसी में लिखा और मुसलमान लेखकों ने हिंदी, बांग्ला और अन्य देशी भाषाओं में लिखा। मुसलमान लेखकों की विषयवस्तु बहुधा हिंदू सामाजिक जीवन और धर्म, जैसे राधा-कृष्ण, सीता-राम और नल-दमयंती होती थी। उर्दू भाषा और साहित्य के विकास ने हिंदुओं और मुसलमानों के संपर्क का नया क्षेत्र प्रस्तुत किया।

धार्मिक क्षेत्र में भी, हिंदुओं के बीच भक्ति आंदोलन तथा मुसलमानों में सूफी मत के प्रसार के फलस्वरूप पिछली कुछ शताब्दियों से जो पारस्परिक प्रभाव और सम्मान की भावना विकसित हो रही थी, वह बढ़ती रही। बड़ी संख्या में हिंदू मुसलमान सिद्धों की पूजा करते थे और अनेक मुसलमान भी हिंदू देवताओं और संतों के प्रति समान श्रद्धा रखते थे। मुसलमान शासक सामंत और जनसाधारण ने खुशी से हिंदू त्योहारों जैसे- होली, दीवाली और दुर्गा पूजा में भाग लिया। इसी तरह हिंदुओं ने मुहर्रम के जुलूसों में हिस्सा लिया। हिंदू अधिकारी तथा ज़मींदार दूसरे मुस्लिम त्योहारों में आगे रहते थे। अजमेर में शेख मुईनुद्दीन चिश्ती के पवित्र स्थान की वित्तीय मदद मराठा लोग भी किया करते थे। नागौर के शेख शाहुल हामिद के पवित्र स्थान की मदद तंजौर के राजा किया करते थे। हम पहले देख चुके हैं कि टीपू शृंगेरी के मंदिर तथा अन्य मंदिरों को भी आर्थिक मदद दिया करता था। यह उल्लेखनीय बात है कि उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध के सबसे महान भारतीय राजा राजमोहन राय हिंदू और इस्लामी दार्शनिक तथा धार्मिक सिद्धांतों से समान रूप में प्रभावित थे। इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि धार्मिक संबद्धता सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में अलगाव का मुख्य मुद्दा नहीं था। हिंदू और मुस्लिम उच्च वर्गों के जीवन के तौर-तरीके जितने समान थे, उतने हिंदू उच्च वर्ग और निम्न तथा मुस्लिम उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के नहीं थे। इसी तरह, क्षेत्र या इलाके अलगाव के मुद्दे बनते थे। एक क्षेत्र के लोगों के बीच धर्म भिन्न होने पर भी जितनी सांस्कृतिक एकता थी उतनी अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले एक धर्म के लोगों के बीच नहीं थी। गाँवों में रहने वाले लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का ढर्रा शहरी लोगों से अलग था।

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