UK Board 10 Class Hindi – (व्याकरण) – समास
UK Board 10 Class Hindi – (व्याकरण) – समास
UK Board Solutions for Class 10th Hindi – (संस्कृत व्याकरण और अनुवाद) – समास
1. तत्पुरुष समास
सूत्र – उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः ।
यह समास प्रथमा विभक्ति के अतिरिक्त अन्य सभी विभक्तियों में होता है और इसके उत्तरपद में प्रथमा विभक्ति अवश्य रहती है। समास करने पर पूर्वपद की जिस विभक्ति का लोप होता है, वह समस्त पद उसी विभक्ति का ‘तत्पुरुष समास’ माना जाता है।
तत्पुरुष समास के भेद
प्रथम पद की भिन्न-भिन्न विभक्तियों के लोप के आधार पर तत्पुरुष समास के निम्नलिखित छह भेद हैं-
(क) द्वितीया तत्पुरुष — जहाँ पर समस्त पद का प्रथम पद द्वितीया विभक्ति का होता है और समास के उपरान्त उसकी उस विभक्ति का लोप हो जाता है तो वहाँ द्वितीया तत्पुरुष होता है। ‘श्रित, अतीत, पतित, गतम् तथा आपन्न’ आदि शब्दों के साथ द्वितीया तत्पुरुष समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
रामाश्रितः
दुःखातीतः
कूपपतितः
शरणागतः
सुखप्राप्तः
सङ्कटापन्नः
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रामं श्रितः
दुःखम् अतीतः
कूपं पतित:
शरणं गतः
सुखं प्राप्तः
सङ्कटम् आपन्न:
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राम के आश्रित
बीता हुआ दुःख
कुएँ में गिरा हुआ
शरण को गया हुआ
सुख को प्राप्त
आपन्न संकटवाला
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(ख) तृतीया तत्पुरुष — तृतीया विभक्ति के पूर्वपदों के साथ, कृदन्त शब्दों के साथ तथा पूर्व, सदृश, सम, मिश्र, कलह तथा निपुण आदि पदों के साथ तृतीया तत्पुरुष होता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
हरित्रात:
मासपूर्वः
मातृसदृश:
एकोन:
शिवसमः
सर्पदंष्टः
बाणविद्धः
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हरिणा त्रातः
मासेन पूर्व:
मात्रा सदृश:
एकेन ऊन:
शिवेन समः
सर्पेण दंष्ट:
बाणेन विद्धः
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हरि द्वारा रक्षित
मास से पूर्व
माता के समान
एक-से-कम
शिव के समान
साँप द्वारा दंशित
बाण से बींधा हुआ
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(ग) चतुर्थी तत्पुरुष – चतुर्थी विभक्ति के पूर्वपदों तथा ‘तदर्थ, बलि, हित, सुख, रक्षित’ आदि शब्दों के साथ चतुर्थी तत्पुरुष होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
पठनपुस्तकम्
भूतबलिः
पुत्रहितम्
दानपात्रम्
भ्रातृसुखम्
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पठनाय पुस्तकम्
भूताय बलिः
पुत्राय हितम्
दानाय पात्रम्
भ्रात्रे सुखम्
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पढ़ने के लिए पुस्तक
भूतों (प्राणियों) के लिए बलि
पुत्र का हित
दान के लिए पात्र
भाई का सुख
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(घ) पंचमी तत्पुरुष — पंचमी विभक्ति के पूर्वपदों तथा भय देनेवाले शब्दों के साथ एवं ‘अपेत, मुक्त, पतित’ आदि शब्दों के साथ पंचमी तत्पुरुष होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
सिंहभयम्
अश्वपतितः
व्याघ्रभीतः
रोगमुक्तः
स्वर्गपतितः
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सिंहाद् भयम्
अश्वात् पतितः
व्याघ्राद् भीतः
रोगाद् मुक्तः
स्वर्गात् पतितः
|
सिंह से भय
अश्व से गिरा हुआ
व्याघ्र से डरा हुआ
रोग से मुक्त
स्वर्ग से गिरा हुआ
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(ङ) षष्ठी तत्पुरुष – षष्ठी विभक्ति के पूर्वपद के साथ षष्ठी तत्पुरुष समास होता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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राजपुरुषः
देवपति:
नरपति:
देवमन्दिरम्
वेदाध्यापकः
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राज्ञः पुरुषः
देवानां पतिः
नराणां पतिः
देवस्य मन्दिरम्
वेदस्य अध्यापकः
|
राजा का पुरुष
देवताओं का स्वामी
नरों का स्वामी
देवता का मन्दिर
वेद का अध्यापक
|
(च) सप्तमी तत्पुरुष – सप्तमी विभक्ति के पूर्वपदवाले तथा ‘शौण्ड (कुशल), धूर्त, प्रवीण, निपुण, पण्डित, चन्दन, सिद्ध, शुष्क, पक्व’ आदि शब्दों के साथ सप्तमी तत्पुरुष समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
अक्षशौण्डः
युद्धनिपुणः
कार्यकुशल:
वचनधूर्तः
आतपशुष्कः
क्रीडाकुशल:
शास्त्रप्रवीण
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अक्षेषु शौण्डः
युद्धे निपुणः
कार्ये कुशलः
वचने धूर्त:
आतपे शुष्कः
क्रीडायां कुशलः
शास्त्रे प्रवीणः
|
अक्ष ( चौसर) में मदमस्त
युद्ध में निपुण
कार्य में कुशल
वचनों में धूर्त
धूप में सूखा हुआ
क्रीड़ा में कुशल
शास्त्र में प्रवीण
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तत्पुरुष के अन्य भेद
उपर्युक्त भेदों के अतिरिक्त तत्पुरुष समास के तीन भेद और भी होते हैं –
(अ) उपपद, (आ) नञ्, (इ) अलुक् ।
(अ) उपपद तत्पुरुष – इसके उत्तरपद में कोई क्रियावाचक शब्द होता है, इसलिए इसे ‘उपपद समास’ कहते हैं; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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मर्मज्ञः
चर्मकार :
कम्बलदः
प्रभाकरः
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मर्म जानाति
चर्म करोति
कम्बलं ददाति
प्रभां करोति
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मर्म को जाननेवाला
चर्म का काम करनेवाला
कम्बल देनेवाला
सूर्य
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(आ) नञ् तत्पुरुष – इसके पूर्वपद में निषेधार्थक ‘अ’ या ‘अन्’ शब्द का प्रयोग होता है; अतः इस समास को ‘नञ् समास’ कहते हैं; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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अब्राह्मण:
अनश्वः
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न ब्राह्मण:
न अश्वः
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जो ब्राह्मण न हो
जो घोड़ा न हो
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विशेष नियम – जिस पद के साथ नञ् समास किया जाए, यदि उस पद का आदि अक्षर ‘अ’ हो तो नञ् समास में ‘अ’ के आगे ‘अन्’ जोड़ दिया जाता है; यथा— अनश्वः ।
(इ) अलुक् तत्पुरुष – इस समास में पूर्वपद की विभक्ति का लोप नहीं होता । विभक्ति का लोप न होने के कारण इसका नाम ‘अलुक् समास’ होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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परस्मैपदम्
आत्मनेपदम्
वाचस्पति:
युधिस्थिर:
|
परस्मै पदम्
आत्मने पदम्
वाचः पतिः
युधि स्थिर:
|
दूसरे के लिए पद
अपने लिए पद
बृहस्पति
युद्ध में स्थिर
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2. कर्मधारय समास
सूत्र – विशेषणं विशेष्येण बहुलम् ।
” विशेषण और विशेष्य का यदि परस्पर समास होता है तो उसे ‘कर्मधारय’ कहते हैं।” इसके दोनों पदों की विभक्तियाँ समान होती हैं। यदि लिङ्ग विषम हों तो उत्तरपद के आधार पर लिङ्ग का निर्णय किया जाता है। यह समास तत्पुरुष समास का ही एक भेद है। यदि दोनों पद विशेषण हों भी कर्मधारय समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
नीलोत्पलम्
वीरपुरुष:
कृष्णसर्पः
जीर्णतरि:
श्वेतपीतः
पीतप्रतिबद्धः
|
नीलं च तत् उत्पलम्
वीरः च असौ पुरुष:
कृष्णः च असौ सर्पः
जीर्णा च असौ तरिः
श्वेतः च असौ पीतः
पीतः च असौ प्रतिबद्ध:
|
नील कमल
वीर पुरुष
कला साँप
पुरानी नाव
सफेद-पीला
पीने के बाद बाँधा
|
उपमान कर्मधारय
सूत्र – उपमानानि सामान्यवचनैः ।
इस समास में पूर्वपद विशेष्य और उत्तरपद विशेषण के रूप में आता है। इसके विग्रह में ‘इव’ या ‘वत्’ का उपयोग होता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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घनश्यामः
चन्द्रसुन्दरम्
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घन इव श्याम:
चन्द्र इव सुन्दरम्
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बादल जैसा काला
चन्द्रमा जैसा सुन्दर
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3. द्विगु समास
सूत्र – संख्या पूर्वो द्विगुः ।
इस समास में पूर्वपद संख्यावाचक होता है और उत्तरपद उस संख्या का विशेष्य होता है। इसी का एक रूप ‘समाहार द्विगु’ है। ” समाहारे द्विगुर्द्वन्द्वश्च नपुंसकं स्यात्” समाहार ‘अर्थ में द्विगु और द्वन्द्व दोनों समासों से बने पद नपुंसक हो जाते हैं।
‘अकारान्तोत्तरपदो द्विगु: ” स्त्रियामिष्टः अकारान्त उत्तरपदवाले समाहार द्विगु में स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग होता है; अतः समस्त-पद के अन्त में दीर्घ ईकार हो जाता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
पञ्चगवम्
पञ्चपात्रम्
त्रिलोकी
पञ्चवटी
त्रिभुवनम्
चतुर्युगम्
पञ्चमूली
नवरात्रम
सप्तशती
शताब्दी
त्रिभुवनम्
अष्टाध्यायी
त्रिवेणी
|
पञ्चानां गवानां समाहारः
पञ्चानां पात्राणां समाहारः
त्रयाणां लोकानां समाहारः
पञ्चानां वटानां समाहारः
त्रयाणां भुवनानां समाहारः
चतुर्णां युगानां समाहारः
पञ्चानां मूलानां समाहारः
नवानां रात्रीणां समाहारः
सप्तानां शतानां समाहारः
शतानाम् अब्दानां समाहारः
त्रयाणां भुवनानां समाहारः
अष्टानाम् अध्यायानां समाहारः
तिसॄणाम् वेणीनां समाहारः
|
पाँच गायों का समूह
पाँच पात्रों का समूह
तीनों लोक
पाँचों बरगद
तीनों लोक
चार युगों का समूह
पाँच मूलों का समूह
नौ रात्रियों का समूह
सात सौ (श्लोकों) का समूह
सौ वर्षों का समूह
तीनों भुवनों का समूह
आठ अध्यायों का समूह
तीन वेणियों का समूह।
|
द्विगु समास के भेद
इस समास के तीन भेद हैं-
(क) समाहार द्विगु, (ख) तद्धितार्थ द्विगु, (ग) उत्तरपद द्विगु ।
(क) समाहार द्विगु — जिस समास में पहला पद संख्यावाची तथा समस्त पद समूहवाचक होकर एकवचन (स्त्रीलिङ्ग अथवा नपुंसकलिङ्ग) में प्रयुक्त रहता है, वह ‘समाहार द्विगु’ कहा जाता है; यथा— पञ्चानां गवानां समाहारः–पञ्चगवम्।
(ख) तद्धितार्थ द्विगु — जब द्विगु समास के अन्त में तद्धित प्रत्यय लगा रहता है, तब उसे ‘तद्धितार्थ द्विगु’ कहते हैं; यथा – पञ्चभिः गोभिः क्रीतः इति पञ्चगुः। यहाँ पञ्चगुः में तद्धित प्रत्यय है। इसी तरह षाण्मातुरः, पञ्चकपालः आदि होंगे।
(ग) उत्तरपद द्विगु – संख्यावाची विशेषण के विशेष्य के पश्चात् यदि कोई अन्य शब्द आता है और उसके साथ जो समास प्रयुक्त होता है, उसे ‘उत्तरपद द्विगु’ कहते हैं; यथा – पञ्चगावः धनं यस्य इति पञ्चगवधनः; द्वाभ्यां मासाभ्यां जातः – द्विमास जात: ( दो महीने में उत्पन्न हुआ )।
विशेष :
(क) द्विगु समास में संख्यावाची विशेषण तथा उसके विशेष्य के अलावा अन्य शब्द का होना आवश्यक है।
(ख) लोक, रथ, वट, पद, रात एवं मूल आदि शब्दों में ‘ईकारान्त’ हो जाता है; यथा – पञ्चवटी, पञ्चमूली, सप्तशती आदि ।
(ग) यदि समाहार द्विगु का उत्तरपद आकारान्त होता है तो समस्त पद विकल्प से स्त्रीलिङ्ग हो जाता है; यथा – पञ्चानां खट्वानां समाहारः — पञ्चखट्वम्, पञ्चखट्वी । चतुर्णां शालानां समाहारः – चतुश्शालम्, चतुश्शाली।
(घ) समाहार: (समूह) का सूचक द्विगु समास नपुंसकलिङ्ग एकवचन का होता है; यथा – त्रिभुवनम्, पञ्चपात्रम्, चतुर्युगम् आदि।
4. द्वन्द्व समास
सूत्र – चार्थे द्वन्द्वः ।
इस समास में आए हुए सभी पद समान विभक्तिवाले होते हैं और . इसमें प्रत्येक शब्द के बाद विग्रह की अवस्था में ‘च’ अक्षर आता है और अन्तिम पद की विभक्ति शब्दों की संख्या पर निर्भर करती है, अर्थात् दो शब्दों में द्विवचन, तीन या इससे अधिक शब्दों पर बहुवचन का प्रयोग होता है । ” परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः ” द्वन्द्व और तत्पुरुष में उत्तरपद के लिङ्ग के समान ही पूर्वपद का भी लिङ्ग होता है।
द्वन्द्व समास के भेद
इस समास के तीन भेद होते हैं-
(क) इतरेतर द्वन्द्व, (ख) समाहार द्वन्द्व, (ग) एकशेष द्वन्द्व ।
(क) इतरेतर द्वन्द्व – इसमें समान विभक्तिवाले दो या दो से अधिक तथा भिन्न-भिन्न अर्थवाले पदों का समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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अर्थधर्मौ
शिवकृष्णौ
पितरौ
राम-लक्ष्मणौ
फलमूलवृक्षाः
मयूरीकुक्कुटौ
कुक्कुटम यूरौ
|
अर्थः च धर्मः च
शिवः च कृष्णः च
माता च पिता च
रामः च लक्ष्मणः च
फलं च मूलं च वृक्ष: च
मयूरी च कुक्कुट : च
कुक्कुट : च मयूरी च
|
अर्थ और धर्म
शिव और कृष्ण
माता-पिता
राम-लक्ष्मण
फल-मूल-वृक्ष
मयूरी-कुक्कुट
कुक्कुट – मयूरी
|
(ख) समाहार द्वन्द्व – सूत्र “समाहारे द्विगुर्द्वन्द्वश्च नपुंसकं स्यात्” के अनुसार समाहार में द्विगु और द्वन्द्व दोनों नपुंसक हो जाते हैं। “प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्”, “येषां च विरोधः शाश्वतिकः ” के अनुसार यह समास प्राणि, वाद्य-विशेष, सेना के अंगवाची शब्दों के साथ होता है और जिनका आपस में स्वाभाविक विरोध होता है, उनके साथ भी यही समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
पाणिपादम्
रथिकाश्वारोहम्
मुखनासिकम्
भेरीपटहम्
अहिनकुलम्
|
पाणी च पादौ च
रथिकः च अश्वारोही च
मुखं च नासिका च
भेरी च पटहः च
अहि: च नकुलः च
|
हाथ और पैर
कोचवान् और घुड़सवार
मुख और नासिका
भेरी और पटह
साँप और नेवला
|
(ग) एकशेष द्वन्द्व – जब समास में आए हुए शब्दों में एक शब्द शेष रह जाए, किन्तु वचन के द्वारा वह दूसरे शब्द का भी बोध कराता रहे, तब उसको ‘एकशेष द्वन्द्व समास कहते हैं। इसमें उत्तरपद के अनुसार लिङ्ग होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
बालकौ
मातापितरौ
श्वशुरौ
शिवौ
|
बालकः च बालकः च
माता च पिता च
श्वश्रू च श्वशुरः च
शिवः च शिवः च
|
दो बालक
माता-पिता
सास-ससुर
दो शिव
|
5. बहुव्रीहि समास
सूत्र – अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः ।
अनेक पदों का अन्यपद ( अर्थात् समास में आए हुए पदों से भिन्न) विशेषण होता है। इसका लिङ्ग-निर्णय, सन्दर्भ के द्वारा ही किया जा अर्थ में जो समास होता है, उसे ‘बहुव्रीहि’ कहते हैं। यह समस्त – पद सकता है और कहीं-कहीं समास का निर्णय करने के लिए भी वाक्य-प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है, नहीं तो प्रायः कर्मधारय समास का भ्रम – सा बना ही रहता है।
बहुव्रीहि समास के भेद
इस समास के मुख्यतया चार भेद होते हैं—
(क) समानाधिकरण, (ख) व्यधिकरण, (ग) तुल्ययोग, (घ) व्यतिहार ।
(क) समानाधिकरण बहुव्रीहि- जिस समास में प्रधानपद ‘विशेषण’ तथा दूसरा पद ‘विशेष्य’ होता हैं एवं समस्त – पद में ‘अन्य ‘पदार्थ’, की प्रधानता हो, उसे ‘समानाधिकरण बहुव्रीहि ‘ कहते हैं; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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कण्ठकालः
प्राप्तोदकः
महाशयः
पीताम्बरः
वीरपुरुषक:
|
कण्ठे कालः यस्य सः
प्राप्तम् उदकं येन सः
महान् आशय: यस्य सः
पीतम् अम्बरं यस्य सः
वीराः पुरुषाः सन्ति यत्र सः
|
कालकण्ठ
जल जिसे प्राप्त है
सभ्य (व्यक्ति)
पीले वस्त्रवाला
वीर पुरुषवाला
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टिप्पणी — कर्मधारय तथा बहुव्रीहि समास में जब दोनों पद स्त्रीलिङ्ग हो और यदि पूर्वपद का स्त्रीलिङ्ग, पुंल्लिङ्ग शब्द से बना हुआ न हो तो पूर्वपद का स्त्रीलिङ्ग हटकर, पुंल्लिङ्ग के समान हो जाता है; जैसे-
वीरा च असौ स्त्री = वीरस्त्री (कर्मधारय)
चित्रा गौ यस्य सः = चित्रगुः (बहुव्रीहि)
(ख) व्यधिकरण बहुव्रीहि – इस समास में दोनों पद भिन्न-भिन्न विभक्तियों के होते हैं; अतः इसको ‘व्यधिकरण बहुव्रीहि’ कहते हैं; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
चक्रपाणिः
लम्बोदरः
नीलकण्ठः
चन्द्रशेखरः
गदापाणिः
लम्बकर्णः
धनुष्पाणिः
चन्द्रचूड:
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चक्रं पाणौ यस्य सः
लम्बम् उदरं यस्य सः
नीलः कण्ठः यस्य सः
चन्द्रः शेखरे यस्य सः
गदा पाणौ यस्य सः
लम्बौ कर्णौ यस्य सः
धनुः पाणौ यस्य सः
चन्द्रः चूडायां यस्य सः
|
भगवान् विष्णु
गणेश
शिव का नाम
शिवजी
भीम
लम्बे कानोंवाला
धनुष है हाथ में जिसके
चन्द्रमा है चूड़ा पर जिसके
|
(ग) तुल्ययोग बहुव्रीहि – इस समास में किसी अन्य शब्द का “सह, समं, साकं” शब्दों में से किसी एक शब्द के साथ समास होता है। समास करते समय उक्त शब्दों का प्रयोग बाद में होता है, किन्तु समास हो जाने के बाद उक्त शब्द केवल ‘स’ अथवा सह के रूप में समस्त शब्द के आगे आ जाता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
|
सपरिग्रहः
सार्जुन:
सकलम्
सभार्यः
सपुत्र:
सपत्नीकः
सकुटुम्बः
सानुजः
|
परिग्रहेण सहितः
अर्जुनेन सह
कलाभिः समम्
भार्यया सह
पुत्रेण सहित:
पल्या सह
सकुटुम्ब
अनुजेनसहितः
|
परिजनों के साथ
अर्जुन के साथ
कलाओं से युक्त
स्त्रीसहित
पुत्रसहित
पत्नी के साथ
कुटुम्ब के साथ
छोटे भाईसहित
|
(घ) व्यतिहार बहुव्रीहि — तृतीयान्त अथवा सप्तम्यन्त पदों से जहाँ परस्पर युद्ध आदि का वर्णन किया गया हो, वहाँ ‘व्यतिहार बहुव्रीहि ‘ समास का प्रयोग होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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केशाकेशि
दण्डादण्डि
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केशेषु केशेषु गृहीत्वा यद् युद्धं प्रवृत्तम्
दण्डैः दण्डैः प्रहृत्य यद् युद्धं प्रवृत्तम्
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बालों को पकड़कर आरम्भ होनेवाला युद्ध
डण्डों के प्रहार आरम्भ होनेवाला युद्ध
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बहुव्रीहि और कर्मधारय समास में अन्तर
कर्मधारय समास में विशेषण – विशेष्य का समास होता है और बहुव्रीहि में अन्य पद की प्रधानता होती है। एक ही समस्त पद विग्रह-भेद कर्मधारय भी हो सकता है तथा बहुव्रीहि समास भी; यथा – पीताम्बरम् — पीतम् च तत् अम्बरम् (कर्मधारय); अथवा पीताम्बरः- पीतम् अम्बरं यस्य सः (हरि: ) ( बहुव्रीहि ) । अर्थात् कर्मधारय समास में अर्थ होगा-पीला वस्त्र तथा बहुव्रीहि समास में अर्थ होगा – पीला वस्त्र है जिसका वह। इसी प्रकार नीलाम्बरः, नीलाम्बरम्, जितेन्द्रियः, श्वेताम्बरा आदि समास होंगे।
• विशेष :
(क) बहुव्रीहि शब्द अपने समास के लक्षण को स्वयं प्रकट करता . है; यथा – ‘बहुव्रीहिः यस्य अस्ति सः’ अर्थात् जिसके पास बहुत धान्य हो । यहाँ पर बहु शब्द, व्रीहि का विशेषण है और ये दोनों मिलकर किसी जमींदार का बोध कराते हैं।
(ख) कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में विशेषण के पहले होने पर महत् या महान् का ‘महा’ हो जाता है; यथा—
कर्मधारय — महापुरुषः – महान् चासौ पुरुष: ( महान् है जो पुरुष ) । बहुव्रीहि — महोदय: – महान् उदयः यस्य सः (महान् है उदय जिसका ) ।
(ग) नञ् बहुव्रीहि— नञ् शब्द के साथ जब बहुव्रीहि समास होता है, तब उसे ‘नञ् बहुव्रीहि’ कहते हैं; यथा – अपुत्रः – अविद्यमानः पुत्रः यस्य सः; अधनः- अविद्यमानम् धनं यस्य सः आदि ।
(घ) संज्ञा अर्थ में नाभि के बाद अप् प्रत्यय होकर उसे ‘नाभ’ बन जाता है तथा गज की भाँति उसके रूप चलते हैं; जैसे— पद्मनाभः – पद्मं नाभौ यस्य सः, ऊर्णनाभः आदि बहुव्रीहि समास बनेंगे।
(ङ) बहुव्रीहि समास में जाया शब्द का जानि बन जाता यथा— युवती जाया यस्य स: – युवजानिः, प्रिया ज़ाया यस्य सः – प्रियजानिः । इसी प्रकार स्थूलजानि:, सुन्दरजानिः, वृद्धजानिः आदि शब्द बनेंगे।
6. अव्ययीभाव समास
सूत्र – पूर्वपदार्थप्रधानः अव्ययीभावः ।
यदि समस्त पद के पूर्वपद में अव्यय हो और उसके साथ किसी अन्यपद का समास किया जाए तो उस समास का नाम ‘अव्ययीभाव’ होता है। यह समस्त पद क्रियाविशेषण होकर अव्यय के रूप में प्रयुक्त होता है; जैसे-
| प्रयुक्त अव्यय | समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
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यथा
प्रति
स
स/ सह
उप
अति
अधि
निर्
अनु
आ
|
यथायोग्य
यथाशक्ति
यथासमयम्
प्रतिदिनम्
प्रत्येकम्
प्रत्यक्षम्
सहरि
सचित्रम्
उपगङ्गम्
उपराजम्
उपगु
उपकूलम्
उपनदि
उपवधू
उपशरदम्
उपकृष्णम्
उपगिरि
अतिहिमम्
अधिहरि
निर्मक्षिकम्
निर्दोष:
अनुविष्णुः विष्णोः
अनुदिनम्
आहिमालयम्
आजीवनम्
|
योग्यम् अनतिक्रम्य
शक्तिम् अनतिक्रम्य
समयम् अनतिक्रम्य
दिनं दिनं
एकम् एकं प्रति
अक्षम् अक्षं प्रति
हरे: सादृश्यम्
चित्रेण सहितम्
गङ्गायाः समीपम्
राज्ञः समीपम्
गौः समीपम्
कूलस्य समीपम्
नद्याः समीपम्
वध्वाः समीपम्
शरदः समीपम्
कृष्णस्य समीपम्
गिरेः समीपम्
हिमस्य अत्ययः
हरौ इति
मक्षिकाणाम् अभावः
दोषाणाम् अभावः
पश्चात्
दिनस्य पश्चात्
हिमालयस्य पर्यन्तम्
जीवनस्य पर्यन्तम्
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योग्य के अनुसार
शक्ति के अनुसार
समय के अनुसार
प्रति प्रतिदिन
प्रति एक
आँख के सामने
हरि के सदृश
चित्र के साथ
गङ्गा के समीप
राजा के समीप
गाय के पास
किनारे के समीप
नदी के पास
वधू के पास
शरद् के पास
कृष्ण के समीप
गिरि के पास
हिम का नाश
हरि में
मक्खियों का अभाव
दोषों का अभाव
विष्णु के पीछे
दिन के बाद
हिमालय तक
जीवन रहने तक
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