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UK Board 10 Class Hindi Chapter 3 – अन्योक्ति-विलासः (संस्कृत विनोदिनी)

UK Board 10 Class Hindi Chapter 3 – अन्योक्ति-विलासः (संस्कृत विनोदिनी)

UK Board Solutions for Class 10th Hindi Chapter 3 – अन्योक्ति-विलासः (संस्कृत विनोदिनी)

अन्योक्ति-विलासः (अन्योक्तियों का सौन्दर्य)
पाठ का सार
(1) यदि हंस भी नीर-क्षीर – विवेक के अपने कर्त्तव्यपालन में आलस्य करेगा तो संसार का पालन कठिन हो जाएगा।
(2) दूसरों के गुणों को ग्रहण करनेवाला निम्नकुलवाला व्यक्ति भी महान् होता है; अतः व्यक्ति को अपने नीचकुल की चिन्ता छोड़कर गुणों के विषय में सोचना चाहिए।
(3) व्यक्ति को अपने बुरे दिन किसी प्रकार व्यतीत करने चाहिए, उपयुक्त समय आने पर सर्वत्र उसकी प्रशंसा होगी।.
(4) ईश्वर के आगे सभी विवश हैं; व्यक्ति सोचता कुछ है और हो कुछ और जाता है।
(5) जब किसी गुणवानू की तुलना निर्गुणी से की जाती है तो इससे गुणवान् को महान् कष्ट होता है। वह अपनी उस तुलना के बदले संसार का बड़े-से-बड़ा कष्ट भी सहर्ष स्वीकार कर लेता है।
पाठाधारित अवबोधन-कार्य एवं भावानुवाद
निर्देशः – अधोलिखितं पद्यांशं पठित्वा प्रश्नान् उत्तरत-
(1) नीरक्षीरविबेके ……….. पालयिष्यति कः ॥
शब्दार्थाः – नीरक्षीरविवेके = जल और दूध के विवेक में अर्थात् जल और दूध को अलग-अलग करने में; तनुषे = फैलाओगे, तानोगे; चेत् = तो, यदि; विश्वस्मिन् = इस विश्व में; अधुना = अब; अन्य: = दूसरा; पालयिष्यति: = पालन करेगा।
सन्दर्भः – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत विनोदिनी है। ( भाग – द्वितीयः ) ‘ में संकलित पाठ ‘ अन्योक्ति-विलासः’ से उद्घृत है।
प्रसंग : – इस अन्योक्ति में हंस के माध्यम से विवेकी और कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए उसे कर्त्तव्यपालन में आलस न करने के लिए प्रेरित किया गया है।
अन्वयः – हंस ! नीरक्षीरविवेके त्वम् एव आलस्यम् तनुषे चेत् विश्वस्मिन् अधुना अन्यः कः कुलवतं पालयिष्यति ?
संस्कृत – भावार्थ :- हे हंस ! नीरक्षीरयोः विवेक: अर्थात् सम्यक् ज्ञानं तव कर्त्तव्यम् अस्ति; अतः त्वं तत्र आलस्यं मा कुरु । यदि त्वमेव तत्र (स्वकर्त्तव्ये) आलस्यं करिष्यसि तर्हि संसारे अधुना अन्यः कः कुलव्रतं पालयिष्यति ? अनेन श्लोकेन सज्जनः स्वकर्त्तव्यं कदापि न विस्मरेत् इति शिक्षणं प्राप्यते ।
हिन्दी- भावानुवादः – हे हंस ! जल और दूध को अलग करने के विवेक में यदि तुम ही आलस्य फैलाते हो तो संसार में अब दूसरा कौन कुलव्रत (कर्त्तव्य) का पालन करेगा ?
अर्थात् हे हंस! जल और दूध को पृथक् करने का विवेक तुम्हारे ही कर्त्तव्य है। तुम अपने इस कर्त्तव्य में कोई आलस्य मत करो। यदि तुम ही भीतर है; अत: तुम्हें इसका भली-भाँति उपयोग करना चाहिए, यही तुम्हारा अपने इस कर्त्तव्यपालन में आलस्य करोगे तो संसार में तब कौन दूसरा अपने परम्परागत कर्त्तव्य का पालन करेगा? अर्थात् कोई भी अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करेगा। इस श्लोक में हंस के द्वारा सज्जनों और कर्त्तव्यनिष्ठ विचलित न होने के लिए प्रेरित किया गया है। व्यक्तियों को उनके कर्त्तव्यों का पालन स्मरण कराते हुए कभी भी उनसे
प्रश्नोत्तर
प्रश्ना: – 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) नीरक्षीरविवेकी कः भवति ?
(ख) अन्यः किं न पालयिष्यति ?
उत्तरम्-
(क) हंस:,
(ख) कुलव्रतम्।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) हंसः किं तनुते ?
(ख) यदि नीरक्षीरविवेके हंसालस्यं तनिष्यते, तर्हि किं भविष्यति ?
उत्तरम्-
(क) हंसः नीरक्षीरविवेके आलस्यं तनुते ।
(ख) यदि नीरक्षीरविवेके हंसालस्यं तनिष्यते, तर्हि विश्वस्मिन् कोऽपि कुलव्रतं न पालयिष्यति।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘तनुषे’ अस्य कर्तृपदं किम् अत्र ?
(ख) ‘विश्वस्मिन्नधुनान्यः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत ।
(ग) ‘तनुषे’ अस्य धातु – लकार – पुरुष – वचन – निर्देशं कुरुत ।
उत्तरम्-
(क) हंसः त्वम्,
(ख) विश्वस्मिन् + न + अधुना + अन्यः,
(ग) √तन् धातु:, लट्लकारः, मध्यमपुरुषः, एकवचनम्।
(2) नितरां ……….. गुणग्रहीतासि ॥
शब्दार्थाः – नितराम् = अत्यधिक; नीचः = नीच, गहरा; मा कृथाः = मत करो; यतः = क्योंकि; परेषाम् = दूसरों के; गुणग्रहीता = गुणों को ग्रहण करनेवाला, रस्सियों को ग्रहण करनेवाला; असि = हो ।
प्रसंग : – प्रस्तुत श्लोक में कुएँ के माध्यम से निम्नकुल के गुणी व्यक्ति को इस बात के लिए प्रेरित किया गया है कि उसे दूसरों से गुण ग्रहण करके अपने गुणों में वृद्धि करनी चाहिए, अपने निम्नकुल का ध्यान करके स्वयं को हीन नहीं मानना चाहिए।
* यह विकल्प गलत है। इसके स्थान पर ‘सतां न वाणी’ होना चाहिए। उत्तर में यही सही विकल्प दिया गया है।
अन्वयः – कूप ! ‘नितरां नीचः अस्मि इति’ त्वं खेदं मा कृथाः यतः अत्यन्तसरसहृदयः परेषां गुणग्रहीता असि ।
संस्कृत – भावार्थ:- कूपः अत्यन्तः नीचः (गभीरतायुक्तः ) भवति । अतः कविः कथयति कूप ! त्वम् आत्मानं नीचः इति मत्वा कदापि दुःखं मा कुरु; यतो॒हि त्वं सरसहृदयः परेषां गुणग्रहीता च असि । अत्र कविः कूपमाध्यमेन जनान् सम्बोधयति यत् प्रत्येकस्मिन् जने केचन गुणाः भवन्ति; अतः जनस्य कर्त्तव्यम् अस्ति यत् सः गुणानां वर्धनं कुर्वन् कदापि स्वमनसि हीनभावं न जनयेत्।
हिन्दी – भावानुवादः – हे कुएँ ! ‘मैं अत्यधिक नीच (गहरा ) हूँ’, इस प्रकार तुम खेद मत करो; क्योंकि (तुम) अत्यन्त – सरस – हृदय ( जल से पूर्ण) हो (तथा) दूसरों के गुणों को ग्रहण करनेवाले हो ।
अर्थात् कुआँ अत्यन्त नीचा (गहरा ) होता है; अतः कवि कहता है कि है कुएँ ! तुम स्वयं को नीच मानकर कभी भी दुःख मत करो; क्योंकि तुम सरस हृदय और दूसरों के गुण ग्रहण करनेवाले हो । यहाँ कवि कुएँ के माध्यम से लोगों को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति में कुछ गुण होते हैं; अत: व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह अपने उन गुणों की वृद्धि करता हुआ कभी भी अपने मन में हीन भावना न पैदा करे।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नाः- 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) अत्र नीचः कः ?
(ख) कूपः किं ग्रहीता अस्ति ?
(ग) कीदृशहृदयः अस्ति कूपः ?
उत्तरम्—
(क) कूप:,
(ख) गुण:,
(ग) सरसहृदयः ।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) कूपः किं खेदं करोति ?
(ख) कविः कूपं किं कर्तुं न कथयति ?
(ग) कूपः कीदृशः अस्ति ?
उत्तरम्-
(क) ‘अहं नितरां नीचः अस्मि’ इति कूपः खेदं करोति ।
(ख) कविः कूपं खेदं न कर्तुं कथयति ।
(ग) कूपः अत्यन्तसरसहृदयः परेषां गुणग्रहीता अस्ति ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘नीचोऽस्मीति ‘ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत ।
(ख) ‘खेदं कूपं मा कृथाः’ अत्र प्रयुक्तः अव्ययः कः ?
(ग) ‘गुणग्रहीतासि’ अत्र क्रियापदं किम् ?
(घ) ‘परेषाम्’ अत्र प्रयुक्ता विभक्तिः का? ‘
(ङ) ‘नीरस:’ अस्य विलोमपदं चिनुत ।
(च) अत्र सम्बोधनपदं किम् ?
उत्तरम् –
(क) नीचः + अस्मि + इति,
(ख) मा,
(ग) असि,
(घ) षष्ठी,
(ङ) सरस:,
(च) कूप ।
(3) कोकिल यापय …………. समुल्लसति ॥ 
शब्दार्थाः – यापय = बिताओ; दिवसान् = दिनों को; तावद् = तब तक; विरसान् = नीरसों को; करीलविटपेषु = करील (बबूल) के वृक्षों ‘पर; यावत् = जब तक; मिलदलिमालः = भौंरों से युक्त; रसालः = आम का वृक्ष; समुल्लसति = भली-भाँति विकसित होता है।
प्रसंग : – प्रस्तुत अन्योक्ति में कवि कोयल के माध्यम से लोगों को अपने बुरे दिनों को चुपचाप धैर्यपूर्वक व्यतीत करने की प्रेरणा देता है।
अन्वयः – कोकिल! तावद् करीलविटपेषु विरसान् दिवसान् यापय, यावत् मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति ।
संस्कृत – भावार्थ :- हे कोकिल ! तावत् कानिचित् विरसानि दिनानि करीलविटपेषु उपविश्य एव यापयत । यावत् कोऽपि भ्रमरयुक्तः आम्रवृक्षः सम्मुखं न आयाति । अर्थात् हे भद्रपुरुष ! कष्टमयानि दिनानि तावत् कथञ्चिद् यापय यावत् सुखमयानि दिनानि न आगच्छन्ति यतः सुखं दुःखं च क्षणिकं भवति ।
हिन्दी- भावानुवादः – हे कोयल! तब तक करील (बबूल) के वृक्षों पर (तुम अपने) नीरस दिनों को बिताओ, जब तक भौंरों से युक्त कोई आम्रवृक्ष भली-भाँति विकसित नहीं होता है।
अर्थात् हे कोयल! तुम तब तक किन्हीं करील के कँटीले वृक्षों पर रहकर अपने जीवन के नीरस दिनों को व्यतीत करो, जब तक कोई भी भौंरों से युक्त आम का वृक्ष तुम्हें न मिले। अर्थात् हे भद्रपुरुष ! तब तक तुम अपने कष्टपूर्ण दिनों को किसी प्रकार व्यतीत करो, जब तक तुम्हारे जीवन में सुखमय दिन नहीं आ जाते हैं; क्योंकि सुख और दुःख दोनों ही क्षणिक होते हैं। आज यदि तुम्हारे जीवन में दुःख आया है तो इसे धैर्यपूर्वक किसी प्रकार सहन करो, इसके शीघ्र बाद सुख आनेवाले हैं।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नाः- 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) अत्र कवि कं सम्बोधितम् ?
(ख) कोकिलः कुत्र विरसान् दिवसान् यापयतु?
(ग) ‘मिलदलिमाल : ‘ क: ?
उत्तरम् –
(क) कोकिलम्,
(ख) करीलविटपेषु,
(ग) रसालः ।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) अत्र कोकिलः किं कुरुतात् ?
(ख) यावत् कोऽपि रसालः समुल्लसति तावत् कोकिलः किं यापयतु ?
(ग) कोकिलः कीदृशे वृक्षे जीवनं यापयति ?
उत्तरम् –
(क) अत्र कोकिलः विरसान् दिवसान् यापयतु ।
(ख) यावत् कोऽपि रसालः समुल्लसति तावत् कोकिलः करीलविटपेषु दिवसान् यापयतु ।
(ग) कोकिलः आम्रविटपे जीवनं यापयति ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘कोकिल’ अस्य क्रियापदं किम् अत्र ?
(ख) ‘विरसान्’ इत्यस्य विशेष्यपदं किम् ?
(ग) समुल्लसति अस्य कर्तृपदं किम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(घ) ‘नीरसान्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् अत्र ?
(ङ) ‘भ्रमरः’ अस्य पर्यायवाचिपदं श्लोकात् चिनुत ।
(च) ‘कोऽपि ‘ इदं कस्य विशेषणपदम् अस्ति ?
उत्तरम् –
(क) यापय,
(ख) दिवसान्,
(ग) रसाल:,
(घ) विरसान्,
(ङ) अलि:,
(च) रसाल: ।
(4) रात्रिर्गमिष्यति ………….. गज उज्जहार ॥
शब्दार्थाः – गमिष्यति = बीतेगी, जाएगी; सुप्रभातम् = सुन्दर – सुखद प्रभात; भास्वान् = सूर्य; उदेष्यति = उदय होगा; हसिस्यति = हँसेगा; पङ्कजालिः = कमलों की पंक्ति:; इत्थम् = इस प्रकार ; विचिन्तयति = विचार करता है; कोशगते द्विरेफे = कली के भीतर बैठे भौरे के; हा हन्त ! हन्त ! = अत्यन्त दुःख का विषय है; उज्जहार = उखाड़ लिया।
प्रसंगः– प्रस्तुत अन्योक्ति में मनुष्य के जीवन की अनिश्चितता को कमल में बन्द भौरे के माध्यम से स्पष्ट किया गया है और इस बात पर बल दिया गया है कि सदैव मनुष्य द्वारा सोचा गया ही नहीं होता है, वरन् ईश्वर सोची गई बात के विपरीत भी कर देता है।
अन्वयः – ‘रात्रिः गमिष्यति, सुप्रभातं भविष्यति, भास्वान् उदेष्यति, पङ्कजालि: हसिष्यति’ इत्थं कोशगते द्विरेफे विचिन्तयति, हा! हन्त हन्त गज: नलिनीम् उज्जहार।
संस्कृत – भावार्थ : – रात्रिकाले कमलपुष्पस्य अन्तः स्थितः भ्रमरः एवं चिन्तनं कुर्वन् एव आसीत् यत् रात्रिः समाप्ता भविष्यति, सुप्रभातं भविष्यति, सूर्यः उदेष्यति, कमलं विकसिष्यति, किन्तु महत् कष्टस्य विषयः यत् तां कमलिनीम् एव कोऽपि गजः मूलतः उत्पाट्य पादैः मर्दितवान्। एवमेव जनाः अपि प्रायः चिन्तयन्ति यत् एवं भविष्यति, तदा अहम् एवं करिष्यामि, किन्तु सः स्वयोजनां कदाचित् पूरयितुं न पारयति, यावत् कश्चिदन्यः तस्य योजनां ज्ञात्वा तस्य विनाशं करोति ।
हिन्दी – भावानुवादः – ‘रात्रि बीत जाएगी, सुन्दर – सुखद प्रभात होगा, सूर्य उदय होगा, कमलों का समूह खिलेगा इस प्रकार कमल-पुष्प में बन्द भौंरा विचार करता है, सोचता है, हाय! अत्यन्त दुःख का विषय है कि हाथी ने (उस) कमलिनी को उखाड़ लिया।
अर्थात् रात्रि के समय कमल के पुष्प में बन्द भौंरा इस प्रकार विचार कर ही रहा था कि रात्रि समाप्त होगी, सुखद प्रभात होगा, सूर्य उगेगा, जिससे कमल-पुष्प खिल जाएगा और वह स्वतन्त्र हो जाएगा, किन्तु बड़े दुःख की बात है कि उस कमलिनी को ही किसी हाथी ने जड़ से उखाड़कर अपने पैरों से रौंद दिया, जिसके पुष्प में भौंरा बन्द था । इसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी अनिश्चितता से भरा है। प्रायः व्यक्ति सोचता है कि ऐसा होगा, तब मैं ऐसा करूँगा, किन्तु वह अपनी उस योजना को पूरा भी नहीं कर पाता कि तब तक कोई आकर उसकी योजना को नष्ट-भ्रष्ट कर डालता है।
प्रश्नोत्तर
1. एकपदेन उत्तरत-
प्रश्ना:- (क) का गमिष्यति ?
(ख) क: उदेष्यति ?
(ग) पङ्कजालिः किं करिष्यति ?
(घ) कः नलिनीम् उज्जहार ?
उत्तरम् —
(क) रात्रि:,
(ख) भास्वान्,
(ग) हसिष्यति,
(घ) गजः ।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) द्विरेफः किं विचिन्तयति ?
(ख) कुत्र स्थित द्विरेफः विचिन्तयति ?
(ग) कोशगते द्विरेफे विचिन्तयति किम् अभवत्?
(घ) सुप्रभाते किं भवति ?
उत्तरम् –
(क) द्विरेफः विचिन्तयति – रात्रिः गमिष्यति, सुप्रभातं ” भविष्यति, भास्वान् उदेष्यति, पङ्कजालि: हसिष्यति ।
(ख) कमलकोशगते स्थितः द्विरेफः विचिन्तयति ।
(ग) कोशगते द्विरेफे विचिन्तयति, गजः नलिनीम् उज्जहार ।
(घ) सुप्रभाते भास्वान् उदयति, पङ्कजालिः हसति ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘भविष्यति’ अस्य कर्तृपदं किम् ?
(ख) ‘एवम्’ इत्यर्थे किम् अव्ययपदम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(ग) ‘अस्तमेति’ अस्य विलोमपदं किम् अत्र ?
(घ) ‘कोशगते द्विरेफे’ अनयोः पदयोः विशेषणपदं किम् ?
उत्तरम् –
(क) सुप्रभातम्,
(ख) इत्थम्,
(ग) उदेष्यति,
(घ) कोशगते ।
(5) न वै ……….. तोलयन्ति ॥
शब्दार्थाः – ताडनाद् = पीटने से; तापनाद् = तपाने से; वह्निमध्ये = अग्नि के बीच में; विक्रयाद् = बेचने से; क्लिश्यमानः = दुःखी; मे मेरा; यतः = जो कि; माम् = मुझको; गुञ्जया = गुंजा (घुंघची) के साथ; तोलयन्ति = तौलते हैं, तुलना करते हैं।
प्रसंग : – प्रस्तुत अन्योक्ति में सोने (स्वर्ण) के माध्यम से इस तथ्य को प्रकट किया गया है कि विद्वान् अथवा मानी व्यक्ति जीवन के कष्टों से. दु:खी नहीं होता, बल्कि उसे इस बात से बहुत दुःख होता है, जब लोग उसकी तुलना तुच्छ व्यक्ति अथवा वस्तु से करते हैं।
अन्वयः – न वै ताडनाद्, वह्निमध्ये तापनाद्, न वै विक्रयाद् अहम् क्लिश्यमानः अस्मि । मे सुवर्णस्य तत् एकम् एव मुख्यदुःखम् यतः मां जनाः गुञ्जया तोलयन्ति।
संस्कृत – भावार्थ:- सुवर्णं कथयति यत् आभूषणस्य निर्माणप्रक्रियायां मम ताडनं जातं, पुन: अग्नौ तापनं जातम्, अनन्तरं निर्मिते सति आभूषणे जनाः मम विक्रयणं कुर्वन्ति । किन्तु एतस्मिन् सर्वस्मिन् अहं किमपि कष्टं न अनुभूतवान्। मम सुवर्णस्य एकम् एव मुख्यं कष्टम् अस्ति यत् विक्रयणसमये जना: मां गुञ्जया तोलयन्ति । अर्थात् तावत् कष्टं सहित्वा अपि मम दुःखं न जातं परं महत् दुःखं तदा भवति, यदा जनाः मम तोलनं सामान्यगुञ्जया कुर्वन्ति ।
मनुष्यस्य अपि एतादृशी एव गतिः भवति, यदा कश्चिद् परिश्रमपूर्वकम् अधीतविद्यस्य विदुषः जनस्य तुलनां सामान्यजनेन धनिकजनेन वा सह कुर्वन्ति ।
हिन्दी- भावानुवादः(:-न उन लोगों) के द्वारा पीटे जाने से; अग्नि के मध्य तपाए जाने से; न उनके द्वारा बेचे जाने से मैं (स्वर्ण) दुःखी होता हूँ। मुझ स्वर्ण का एक ही मुख्य दुःख है, जो कि मुझको लोग गुञ्जा के साथ तौलते हैं।
अर्थात् स्वर्ण कहता है कि आभूषण बनाने की प्रक्रिया में मुझे पीटा जाता है, तत्पश्चात् अग्नि में तपाया जाता है, इसके अनन्तर आभूषण बन जाने पर लोग मुझे बेच देते हैं। इस सब क्रिया- व्यापार से मैं कोई कष्ट अथवा दुःख का अनुभव नहीं करता हूँ। मुझको (स्वर्ण को) पिटने, तपने और बिकने में कोई कष्ट नहीं है । मेरा सबसे बड़ा (मुख्य) कष्ट अथवा दुःख यही है किं बेचते समय लोग मुझे गुञ्जा के साथ तौलते हैं। अर्थात् पिटने, तप और बिकने के कष्ट को सहकर भी मुझे दुःख नहीं होता, मगर मुझे तब बड़ा दुःख होता है कि लोग मुझे तुच्छ वस्तु गुञ्जा के साथ तौलते हैं।
मनुष्य की गति (दशा) भी ऐसी ही होती है, जब परिश्रमपूर्वक भली-भाँति अध्ययन करके विद्या प्राप्त किए विद्वान् की तुलना लोग सामान्य व्यक्ति अथवा किसी धनिक के साथ करते हैं।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नाः- 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) सुवर्णः कुत्र तापित: ?
(ख) कस्य एकं मुख्यं दुःखम् ?
(ग) जनाः सुवर्णं कया तोलयन्ति ?
उत्तरम् –
(क) वह्निमध्ये,
(ख) सुवर्णस्य,
(ग) गुञ्जया।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) सुवर्णः कस्मात् न क्लिश्यमानः अस्ति? ,
(ख) सुवर्णस्य मुख्यं दुःखं किम् ?
उत्तरम् –
(क) न ताडनात्, न वह्निमध्ये तापनात् न विक्रयात् सुवर्णः क्लिश्यमानः अस्ति ।
(ख) ‘जनाः तं गुञ्जया सह तोलयन्ति’ इति सुवर्णस्य मुख्यं दुःखम् अस्ति ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘अग्निः’ अस्य समानार्थकपदं श्लोकात् चित्वा लिखत ।
(ख) ‘गुञ्जया’ अत्र प्रयुक्ता विभक्ति: का?
(ग) ‘तदेकम्’ अस्य सन्धिच्छेदं कुरु ।
(घ) ‘विक्रयात्’ अत्र प्रयुक्तः उपसर्ग: क: ?
उत्तरम्—
(क) वह्निः,
(ख) तृतीया,
(ग) तत् + एकम्,
(घ) वि
सम्पूर्णपाठाधारिताः अभ्यासप्रश्नाः
(1) अधोलिखितप्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत-
(क) गजः काम् उज्जहार ?
उत्तरम् — नलिनीम्।
(ख) नितरां नीचः कः कथितः ?
उत्तरम् – कूपः ।
(ग) नीरक्षीरविवेकी कः भवति ?
उत्तरम् — हंसः ।
(घ) सुवर्णं जनाः कया तोलयन्ति ?
उत्तरम् — गुञ्जया ।
(2) कोष्ठकात् समुचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(क) नीरक्षीरविवेके ………………. आलस्यं त्वमेव तनुषे चेत् । ( हंस / बक)
(ख) नितरां …………….. अस्मि इति त्वं खेदं मा कृथाः । (उच्च/नीच: )
(ग) यावन्मिलदलिमालः कोऽपि ……………. समुल्लसति । (मराल:/रसाल:)
(घ) सुवर्णस्य मे मुख्यं …………… तदेकम्। (सुखं/दु:खम्)
(ङ) यतो मां ………….. गुञ्जया तोलयन्ति। (महिला: /जना:)
उत्तरम् —
(क) नीरक्षीरविवेके हंस आलस्यं त्वमेव तनुषे चेत् ।
(ख) नितरां नीचः अस्मि इति त्वं खेदं मा कृथाः ।
(ग) यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति ।
(घ) सुवर्णस्य मे मुख्यं दुःखं तदेकम् ।
(ङ) यतो मां जनाः गुञ्जया तोलयन्ति ।
(3) पाठाधारेण सत्यम् (√) असत्यं (×) च चिह्नीकुरुत—
(क) हंसः नीरक्षीरविवेकी नास्ति । (×)
(ख) कूप: अत्यन्तसरसहृदयः परेषां गुणग्रहीता अस्ति। (✓)
(ग) हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार । (×)
(घ) सज्जनः कुलव्रतं पालयति । (✓)
(ङ) रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम्। (✓)
(4) एतेषां शब्दानां पर्यायवाचिनः शब्दान् लिखत-
यथा— नीरम् — जलं, वारि, सलिलं, पयः, पानीयम् ।
(क) सूर्य: ………………………..
(ख) गजः ………………………..
(ग) सुवर्णम् …………………….
(घ) भ्रमरः ………………………
(ङ) कमलम् ……………………
उत्तरम् –
(क) सूर्यः – दिनेशः, भास्करः, दिनकरः, भानुः, रविः।
(ख) गजः करी, द्विप, हस्ति, कुञ्जरः ।
(ग) सुवर्णम् – हेमम्, कनकम् ।
(घ) भ्रमरः – अलिः, षट्पदः, श्यामल:, मधुकरः, मधुपः ।
(ङ) कमलम् – सरोजम्, नीरजम्, सरोरुह, पङ्कजम्।
(5) एतेषां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
(क) कूपः किमर्थं दुःखम् अनुभवति ?
उत्तरम् — कूप: नीचः अस्ति; अतः सः दुःखम् अनुभवति ।
(ख) अत्यन्तसरसहृदयः यतः केषां गुणग्रहीतासि ?
उत्तरम्—अत्यन्तसरसहृदयः यतः परेषां गुणग्रहीतासि ।
(ग) कविः कोकिलं किं कथयति ?
उत्तरम् — कविः कोकिलं कथयति — कोकिल! करीलविटपेषु विरसान् दिवसान् यापय, यावत् मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति ।
(घ) सुवर्णः कस्मात् कस्मात् दुःखं नानुभवति ?
उत्तरम् — सुवर्णः तापनाद्, वह्निमध्ये तापनाद् विक्रयाद् च दुःखं नानुभवति।
(ङ) कोशगतः भ्रमरः किम् अचिन्तयत् ?
उत्तरम्—कोशगतः भ्रमरः अचिन्तयत् – रात्रिः गमिष्यति, सुप्रभातं भविष्यति, भास्वान् उदेष्यति पङ्कजालि: हसिष्यति च।
(8) मंजूषायां प्रदत्तानां शुकः, पिकः, भ्रमरः, गजः, कोकिलः, कूपः, तडागः इत्येतेषां शब्दानां रूपाणि स्मरत।
उत्तरम्— स्वयमेव कुरुत ।

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