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UK Board 10 Class Hindi Chapter 2 – सूक्तिमौक्तिकानि (संस्कृत विनोदिनी)

UK Board 10 Class Hindi Chapter 2 – सूक्तिमौक्तिकानि (संस्कृत विनोदिनी)

UK Board Solutions for Class 10th Hindi Chapter 2 – सूक्तिमौक्तिकानि (संस्कृत विनोदिनी)

सूक्तिमौक्तिकानि (सूक्तिरूपी मोती)
पाठ का सार
(1) जगत् को रचनेवाला एक ही है।
(2) संसार में एकता ही सबसे बड़ी शक्ति है।
(3) गुणी ही गुणों को जानता है, गुणहीन व्यक्ति नहीं।
(4) देशभक्त अपने प्राणों को तिनके के समान समझता है।
(5) सज्जनों की वाणी किसके मन को नहीं हरती । सभी को मनोहारी लगती है।
(6) धर्मवृद्धों की आयु नहीं देखी जाती ।
(7) समाज में मनुष्य गुणों के कारण सम्मानित होता है न कि जन्म के कारण।
(8) जो ब्रह्मचर्य का पालन करता है वह अमर हो जाता है।
(9) यदि मनुष्य क्रोधी स्वभाव का है तो उसे शत्रुओं से क्या अर्थात् उसका शत्रु तो पहले से ही विद्यमान है।
(10) कल्याण कारी और मनोहारी वचन ( वाणी) दुर्लभ हैं।
(11) शरीर ही सभी धर्मों को क्रियान्वित करने का पहला साधन है।
(12) सत्यवादी लोग अपनी वाणी को अन्यथा नहीं जाने देते (प्राण जाँय पर वचन न जाई) ।
पाठाधारित अवबोधन-कार्य एवं भावानुवाद
निर्देश: – अधोलिखितान् सूक्ती पठित्वा प्रश्नान् उत्तरत—
(1) एक एव जगत्स्रष्टा । – (श्रीरामानन्द दिग्विजयम् 17.47)
(2) ऐक्यं महीयो बलमस्ति लोके । – ( जनविजयम् 4.26)
(3) गुणी विजानाति गुणान् न निर्गुणः । – (भीष्मचरितम् 5.26)
(4) देशभक्तो निजप्राणान् मन्यते यस्तृणोपमान्। – ( सत्याग्रहगीता 12.31)
(5) मनोहरति कस्य सतां न वाणी ।  – (हरविजयम् 24.10)
(6) न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्षते । – (कुमारसम्भवम् 5.16)
(7) गुणतः पूज्यते लोके मानवो न तु जन्मतः । – (गुरुशापम् 2/35)
(8) ब्रह्मचर्यं हि संसेवते सोऽमरः । – (देवप्रशस्तिकाव्यम् 38)
(9) किमरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद् देहिनाम् ।- (नीतिशतकम्)
(10) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः । – (किरातार्जुनीयम्)
(11) शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् । – (कालिदासः)
(12) न हि प्रतिज्ञां प्रकुर्वन्ति वितथां सत्यवादिनः । – ( रामायणम्)
शब्दार्था: – स्रष्टा = निर्माता; ऐक्यम् = एकता; महीय: = महान्; विजानाति = जानता है; निजप्राणान् = अपने प्राणों को; मन्यते = मानता है; तृणोपमान् = तिनके के समान; मनोहरति = मन को हरती है; सताम् = सज्जनों की; धर्मवृद्धेषु = धर्म से बूढ़ों में; वयः = आयु; समीक्षते = देखी जाती, गणना की जाती; गुणतः = गुणों से; जन्मतः = जन्म से; संसेवते = पालन करता है; अमरः = अमर है; किमरिभिः = (किम् + अरिभिः) शत्रुओं से क्या; चेद् = यदि; देहिनाम् = देहधारियों, मनुष्यों का; वचः = वचन, वाणी; शरीरमाद्यम् = (शरीरम् + आद्यम्) शरीर प्रथम; धर्मसाधनम् = धर्म का साधन; प्रकुर्वन्ति = आचरण करते हैं, पालन करते हैं; वितथाम् = अन्यथा; सत्यवादिनः = सत्य बोलनेवाले।
संस्कृत भावार्थाः
(1) जगत: (संसारस्य) स्रष्टा (निर्माता) एकः एव ईश्वरः अस्ति।
(2) एकतायाः बलम् एव सर्वोत्तमं बलम् अस्ति लोके ।
(3) गुणी पुरुषः एव गुणान् जानाति गुणरहितः न ।
(4) देशभक्तः निजप्राणान् तृणमिव तुच्छं मन्यते ।
(5) सज्जनानां वाणी कस्य मनः न हरति अर्थात् सर्वेषां मनांसि हरति एव ।
(6) धर्मवृद्धानां वयः आयुः न गण्यते।
(7) मानवः संसारे गुणैः पूज्यते न तु उच्चकुले जन्म ग्रहणात् ।
(8) यः पंचविंशतिं वर्षाणि यावत् ब्रह्मचर्यव्रतस्य पालनं करोति सः अमरः ।
(9) मनुष्याणां यदि अन्तः क्रोधः अस्ति तर्हि शत्रुभिः किं प्रयोजनम् ।
(10) कल्याणकारिणी मनोहारिणी च वाणी दुर्लभा ।
(11) सर्वेषां कार्याणां धर्माणां साधनरूपं शरीरमेव प्रथमम् इति ।
(12) सत्यवादिनः जनाः यां प्रतिज्ञां कुर्वन्ति तां अन्यथा न कुर्वन्ति तस्य आचरणं कुर्वन्ति एव ।
सन्दर्भः — प्रस्तुत सूक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत विनोदिनी (भाग-द्वितीयः)’ में संकलित ‘सूक्तिमौक्तिकानि’ नामक पाठ से उद्घृत हैं।
(1) प्रसंग : – श्रीरामानन्द के ‘दिग्विजयम्’ नामक काव्य से संकलित इस सूक्ति में ईश्वर की सर्वव्यापकता और सर्वोच्चता पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी- भावानुवादः / व्याख्या – संसार को बनानेवाला एक ही है। अर्थात् संसार में हमें जो असंख्य वस्तुएँ दिखती हैं, प्राणियों की जो असंख्य जातियाँ और उनके विविध रंग-रूप दिखते हैं, उन सबकी रचना एक ही ईश्वर ने की है। आशय यही है कि संसार में एक ही सर्वोच्च सत्ता है — ईश्वर । वही इसका स्रष्टा और विनाशक है। ईश्वर, अल्लाह, राम, रहीम आदि उसके विभिन्न नामकरण हमारे द्वारा किए गए हैं। ये सब अलग-अलग नहीं हैं, वरन् एक ही तत्त्व के विभिन्न नाम हैं।
(2) प्रसंग : – ‘ जनविजयम्’ नामक ग्रन्थ से संकलित इस सूक्ति में एकता के महत्त्व को समझाया गया है।
हिन्दी – भावानुवादः / व्याख्या – संसार में एकता में महान् बल है। अर्थात् कोई कार्य कितना ही बड़ा, कठिन अथवा असम्भव-सा लगता हो,’ उसको एकता के बल से अतिलघु, सरल अथवा सम्भव बनाया जा सकता है। एक अकेली चींटी भले ही कुछ न कर पाए, किन्तु हजारों चीटियाँ मिलकर पर्वत को खोखला कर सकती हैं। एक तिनका भले ही हवा के झोंके में स्वयं को न रोक पाए, किन्तु हजारों तिनके जब रस्सी के रूप में एक होते हैं तो मदमस्त हाथी को भी रोकने में समर्थ होते हैं। इस प्रकार एकता संसार का सबसे बड़ा बल है।
(3) प्रसंग : – ‘ भीष्मचरितम्’ नामक काव्य से संकलित इस सूक्ति में गुणवानों के चरित्र पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी- भावानुवादः / व्याख्या – गुणवान् गुणों को जानता है, गुणहीन नहीं। अर्थात् जो व्यक्ति गुणवान् होता है, वही दूसरों के गुणों के महत्त्व को समझता है और उनका सम्मान करता है। गुणहीन व्यक्ति के लिए गुण-दोष एक जैसे ही होते हैं। आशय यही है कि गुणहीन व्यक्ति से गुणों का सम्मान करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सत्याग्रहगीता’ से संकलित प्रस्तुत सूक्ति में
(4) प्रसंग:- ‘देश- भक्तों के चरित्र पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी- भावानुवादः / व्याख्या – जो अपने प्राणों को तिनके के समान मानता है, वह देशभक्त है। अर्थात् देशभक्त कभी भी अपने प्राणों की चिन्ता नहीं करते, उनके लिए देश और मानवता का हित ही सर्वोपरि होता है। यदि देश और मानवता की रक्षा प्राण देकर हो सकती है तो वे इसमें तनिक भी संकोच नहीं करते और अपने प्राणों को तिनके के समान देश और मानवता पर न्योछावर कर देते हैं।
(5) प्रसंग : – ‘हरविजयम्’ नामक काव्य से संकलित प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों की मधुर वाणी के महत्त्व को समझाया गया है।
हिन्दी- भावानुवादः / व्याख्या – सज्जनों की वाणी किसके मन को नहीं हरती है? अर्थात् सज्जन अत्यन्त विनम्र और संस्कारवान् होते हैं। उनकी वाणीं अत्यन्त मधुर और सबका कल्याण करनेवाली होती है। इसीलिए वह सबको प्रिय होती है।
(6) प्रसंग : – महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘कुमारसम्भवम्’ से संकलित प्रस्तुत सूक्ति में धर्मनिष्ठ लोगों के चरित्र पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी-भावानुवादः/व्याख्या – धर्मवृद्धों में आयु नहीं देखी जाती है। अर्थात् धर्मपालन के प्रति निष्ठा रखनेवाले लोगों की आयु पर ध्यान नहीं दिया जाता; क्योंकि यह व्यक्ति की स्वयं की निष्ठा और दृढ़ इच्छाशक्ति पर निर्भर होता है। धर्मनिष्ठ होने के लिए व्यक्ति का बूढ़ा होना आवश्यक नहीं है अथवा हम यह भी कह सकते हैं कि प्रत्येक बूढ़ा व्यक्ति धर्मनिष्ठ हो, यह आवश्यक नहीं है और प्रत्येक युवा धर्म से विमुख हो यह भी आवश्यक नहीं है। एक युवा और वृद्ध समान रूप से धर्मनिष्ठ अथवा धर्मविमुख/ धर्मच्युत् हो सकते हैं।
(7) प्रसंग : – ‘ गुरुशापम्’ नामक काव्य से संकलित प्रस्तुत में सूक्ति मानव-जीवन में गुणों के महत्त्व को समझाया गया है।
हिन्दी- भावानुवादः / व्याख्या – संसार में मनुष्य गुणों से पूजा जाता है, न कि जन्म से । अर्थात् संसार में गुणों की पूजा होती है; अत: वही व्यक्ति पूजा जाता है अथवा सब जगह सम्मान पाता है, जो गुणवान् होता है। किसी विशिष्ट कुल अथवा जाति में जन्म लेने से कोई व्यक्ति सम्मान पाने का अधिकारी नहीं हो जाता।’
(8) प्रसंग:- ‘देवप्रशस्तिकाव्यम्’ नामक काव्य से संकलित प्रस्तुत सूक्ति में ब्रह्मचर्य के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी- भावानुवादः / व्याख्या – जो ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह अमर है। अर्थात् जो व्यक्ति पच्चीस वर्षों तक नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है, उसमें देवताओं के समान ओज, कान्ति, बल तथा स्फूर्ति उत्पन्न हो जाते हैं। वह उनके द्वारा संसार में ऐसे कार्य कर जाता है कि लोग मरने के बाद भी उसका स्मरण करते हैं। इस प्रकार वह व्यक्ति अपने यशः शरीर से संसार में अमर हो जाता है।
(9) प्रसंग :- भर्तृहरि की प्रसिद्ध रचना ‘नीतिशतकम्’ से संकलित प्रस्तुत सूक्ति में क्रोध को व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है।
हिन्दी- भावानुवादः / व्याख्या – यदि क्रोध है तो प्राणियों को शत्रुओं से क्या? अर्थात् यदि व्यक्ति में क्रोध है तो उसे अन्य शत्रुओं से क्या लेना-देना, उसके विनाश के लिए तो उसके भीतर स्थित एकमात्र शत्रु क्रोध ही पर्याप्त है। क्रोधी व्यक्ति को अपने विनाश के लिए शत्रुओं की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि क्रोध व्यक्ति के लिए संसार का सबसे बड़ा शत्रु है।
(10) प्रसंग : – ‘किरातार्जुनीयम्’ नामक महाकाव्य से संकलित प्रस्तुत सूक्ति में मधुर और हितकारी बातों की दुर्लभता पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी-भावानुवादः/व्याख्या – हितकारी और मधुर वचन दुर्लभ हैं। अर्थात् संसार में ऐसे व्यक्ति बड़ी कठिनाई से मिलते हैं, जो व्यक्ति के कल्याण की बात भी करें और उसकी बातें सम्बन्धित व्यक्ति को अच्छी भी लगें। इसीलिए सच्चाई को कड़वा कहा गया है। केवल मीठी बातें करनेवाला व्यक्ति हितकारी नहीं हो सकता। सच्चा हितैषी वही होता है, इस बात की चिन्ता नहीं करता कि मेरी कडुवी और सच्ची बात से सामनेवाला व्यक्ति नाराज होगा, वह उसकी नाराजगी की चिन्ता किए बिना वही बात कहता है, जिसमें उसका हित होता है। ऐसी मधुर और कल्याणकारी बातें उसी प्रकार दुर्लभ हैं, जैसे मीठी और कल्याणकारी औषधि का मिलना कठिन होता है।
(11) प्रसंग : – महाकवि कालिदास की इस सूक्ति में शरीर की महत्ता को स्पष्ट किया गया है।
हिन्दी- भावानुवादः/व्याख्या – शरीर ही धर्म का प्रथम साधन है। अर्थात् व्यक्ति के लिए इस संसार में उसका शरीर ही सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु है! जीवन का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति माना गया है और मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र साधन धर्मपालन को बताया गया है, किन्तु धर्मपालन के लिए व्यक्ति के शरीर का सब प्रकार से स्वस्थ होना आवश्यक है; क्योंकि अस्वस्थ व्यक्ति कोई भी कार्य ठीक से कर पाने में असमर्थ होता है। यदि व्यक्ति का शरीर ही उसका साथ नहीं दे तो वह धर्म-कर्म का कोई भी कार्य नहीं कर पाता। इसलिए व्यक्ति का शरीर धर्म का प्रथम और महत्त्वपूर्ण साधन है।
(12) प्रसंग : – ‘रामायणम्’ से संकलित प्रस्तुत सूक्ति में सत्य का आचरण करनेवालों के चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि उसकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता ।
हिन्दी- भावानुवादः / व्याख्या – सत्यवादी लोग प्रतिज्ञा से अन्यथा आचरण नहीं करते हैं। अर्थात् वे अपने मुख से जो कुछ भी करने की प्रतिज्ञा कर लेते हैं अथवा दैनन्दिन जीवन में भी जो सामान्य कथन करते हैं, वे किसी भी स्थिति में उसके विपरीत आचरण नहीं करते। आशय यही है कि वे जो कहते हैं, वही करते हैं; जो करते हैं, वही कहते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए तुलसीदास ने यह कथन किया है- “प्राण जाँय पर वचन न जाई । “.
प्रश्नोत्तर
प्रश्ना:- 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) एक एव कः अस्ति ?
(ख) लोके महीय: बलं किम् अस्ति ?
(ग) कस्य वाणी मनोहरति?
(घ) केषु वयः न समीक्षते ?
(ङ) आद्यं धर्मसाधनं किम् अस्ति ?
(च) निर्गुणः किं न विजानाति ?
उत्तरम् –
(क) जगत्स्रष्टा,
(ख) ऐक्यम्,
(ग) सताम्,
(घ) धर्मवृद्धेषु,
(ङ) शरीरम्,
(च) गुणान्।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) देशभक्तः किं मन्यते ?
(ख) मानवः लोके कथं पूज्यते ?
(ग) अमरः कः अस्ति?
(घ) चेद् क्रोधः अस्ति किमरिभिः केषाम् ?
(ङ) कीदृशं वच: दुर्लभः ?
(च) सत्यवादिनः किं न प्रकुर्वन्ति ?
उत्तरत्—
(क) देशभक्तः निजप्राणान् तृणोपमान् मन्यते।
(ख) मानवः लोके गुणतः पूज्यते न तु जन्मतः ।
(ग) य: ब्रह्मचर्यं संसेवते, सः अमरः अस्ति ।
(घ) चेद् क्रोधः अस्ति किमरिभिः देहिनाम् ।
(ङ) हितं मनोहारि च वचः दुर्लभः ।
(च) सत्यवादिनः प्रतिज्ञां वितथां न प्रकुर्वन्ति ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘बलम्’ अस्य विशेषणपदं किम् अस्ति ?
(ख) ‘मनोहरति कस्य सतां न वाणी।’ अत्र कर्तृपदं किम् ?
(ग) ‘हितम्’ अस्य विशेष्यपदम् अत्र किं प्रयुक्तम् ?
(घ) ‘शत्रुभिः’ अस्य पर्यायवाचिपदं किम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(ङ) ‘प्रथमम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् अत्र ?
(च) ‘दुर्लभम्’ अस्य सन्धिच्छेदं कुरुत ।
(छ) ‘संसेवते’ अत्र प्रयुक्तः उपसर्गः कः ?
(ज) ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् अत्र प्रयुक्तः अव्ययः कः ?
उत्तरम् –
(क) महीय:,
(ख) वाणी,
(ग) वच:,
(घ) अरिभि:,
(ङ) आद्यम्,
(च) दुर् + लभम्,
(छ) सम्,
(ज) खलु ।
सम्पूर्णपाठाधारिताः अभ्यासप्रश्नाः
(1) अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत-
(क) एक एव क: ?
उत्तरम् — जगत्स्रष्टा ।
(ख) गुणी किं विजानाति ?
उत्तरम् — गुणान्।
(ग) देशभक्तः निजप्राणान् कथं मन्यते ?
उत्तरम्— तृणोपमान्।
(घ) केषु वयः न समीक्षते ?
उत्तरम् — धर्मवृद्धेषु।
(ङ) कः अमरः भवति?
उत्तरम् — ब्रह्मचारी ।
(च) दुर्लभं किम् अस्ति ?
उत्तरम् – हितं मनोहारि च वचः ।
(छ) निर्गुणः किं न जानाति ?
उत्तरम् — गुणान्।
(2) कोष्ठके प्रदत्तेषु शब्देषु शुद्धं शब्दं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु –
(क) गुणी विजानाति …………… न निर्गुणः । (दुर्गुणान्/गुणान्/दोषान्)
(ख) देशभक्तो निज प्राणान् मन्यते ……………… । (प्रियान्/तृणोपमान्/धनोपमान्)
(ग) ………. क्रोधोऽस्ति चेद् देहिनाम् । (किमरिभिः/मित्रैः/किं हरिभि:)
(घ) शरीरमाद्यं खलु ………….. साधनम्। (कर्म/धर्म/वर्मे)
(ङ) न हि …………….. प्रकुर्वन्ति वितथां सत्यवादिनः । (आज्ञां / प्रतिज्ञाम्/देह)
(च) हितं मनोहारि च …………. वच: । (सुलभं / दुर्लभं/अमूल्यं)
उत्तरम् —
(क) गुणी विजानाति गुणान् न निर्गुणः ।
(ख) देशभक्तो निज प्राणान् मन्यते तृणोपमान् ।
(ग) किमरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद् देहिनाम्।
(घ) शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्।
(ङ) न हि प्रतिज्ञां प्रकुर्वन्ति ।
(च) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।
(3) कोष्ठकेषु पाठाधारेण सत्यम् (√) असत्यं (×) वा चिह्नितं
(क) निर्गुणः गुणान् न विजानाति । (✓)
(ख) सतां वाणी कस्य मनः न हरति? (✓)
(ग) मानव: जन्मतः पूज्यते न तु गुणत: । (×)
(घ) हितं मनोहारि न दुर्लभं वचः । (×)
(ङ) शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् । (✓)
(च) न हि प्रतिज्ञां प्रकुर्वन्ति वितथां मिथ्यावादिनः । (×)
(छ) एक एव जगत्स्रष्टा । (✓)

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