UK Board 10th Class Social Science – (भूगोल) – Chapter 4 कृषि
UK Board 10th Class Social Science – (भूगोल) – Chapter 4 कृषि
UK Board Solutions for Class 10th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (भूगोल) – Chapter 4 कृषि
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न-
(i) निम्नलिखित में से कौन-सा उस कृषि प्रणाली को दर्शाता है जिसमें एक ही फसल लम्बे-चौड़े क्षेत्र में उगाई जाती है-
(क) स्थानान्तरी कृषि
(ख) रोपण कृषि
(ग) बागवानी
(घ) गहन कृषि ।
उत्तर- (ख) रोपण कृषि |
(ii) इनमें से कौन-सी रबी फसल है-
(क) चावल
(ख) मोटे अनाज
(ग) चना
(घ) कपास।
उत्तर- (ग) चना।
(iii) इनमें से कौन-सी एक फलीदार फसल है-
(क) दालें
(ख) मोटे अनाज
(ग) ज्वार
(घ) तिल ।
उत्तर- (क) दालें ।
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए-
(i) एक पेय फसल का नाम बताएँ तथा उसको उगाने के लिए अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों का विवरण दें।
उत्तर – चाय एक प्रमुख एवं लोकप्रिय पेय फसल है। चाय के उत्पादन एवं निर्यात में भारत का विश्व में महत्त्वपूर्ण स्थान है। चाय उत्पादन के लिए उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु, ह्यूमस एवं जीवांशयुक्त गहरी मिट्टी तथा सुगम जल निकास वाले ढलवाँ क्षेत्र अनुकूल माने जाते हैं। चाय की झाड़ियों के लिए वर्ष भर समान रूप से होने वाली वर्षा की बौछारें कोमल पत्तियों के विकास में सहायक होती हैं।
(ii) भारत की एक खाद्य फसल का नाम बताएँ और जहाँ यह पैदा की जाती है उन क्षेत्रों का विवरण दें।
उत्तर — भारत खाद्य फसलों के उत्पादन में विश्व के देशों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ गेहूँ, चावल तथा मोटे अनाज खाद्य फसलों के रूप में पैदा होते हैं। चावल उत्पादन में भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है। चावल उत्पादन में देश का उत्तर और उत्तरर-पूर्वी मैदान, तटीय क्षेत्र और डेल्टाई प्रदेश का मुख्य स्थान है। पश्चिम बंगाल भारत का सबसे अधिक चावल उत्पादन करने वाला राज्य है।
(iii) सरकार द्वारा किसानों के हित में किए गए संस्थागत सुधार कार्यक्रमों की सूची बनाएँ।
उत्तर – स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में किसानों के हित में कई संस्थागत सुधार कार्यक्रमों को शुरू किया है इनमें चकबन्दी एवं भूमि सुधार कार्यक्रम, हरित क्रान्ति एवं श्वेत क्रान्ति, फसल बीमा, कम दर पर ऋण सुविधा, किसान क्रेडिट कार्ड, न्यूनतम सहायता मूल्य तथा व्यापक भूमि विकास कार्यक्रम आदि मुख्य हैं।
(iv) दिन-प्रतिदिन कृषि के अन्तर्गत भूमि कम हो रही है। क्या आप इसके परिणामों की कल्पना कर सकते हैं?
उत्तर – भारत की बढ़ती जनसंख्या के कारण भूमि के गैर-कृषि कार्यों की आवश्यकता पूर्ति से कृषि भूमि विशेषकर बोए गए निवल क्षेत्र में कमी आई है। इससे सुखद परिणामों की आशा नहीं की जा सकती है। घटता कृषि क्षेत्र भारत जैसे, बढ़ती जनसंख्या दर वाले देश में खाद्य संकट उत्पन्न कर सकता है। इतना ही नहीं इससे देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है क्योंकि भारत में आज भी दो-तिहाई जनसंख्या कृषि पर ही आश्रित है।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए-
(i) कृषि उत्पादन में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा किए गए उपाय सुझाइए |
उत्तर – कृषि के महत्त्व को समझते हुए भारत सरकार ने इसके आधुनिकीकरण एवं उत्पादन में वृद्धि करने के भरसक प्रयास किए हैं। | भारतीय कृषि में सुधार के लिए भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् व कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना, बागवानी विकास तथा मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमान मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए निम्नलिखित उपाय किए गए हैं-
(1) अधिक उपज देने वाली किस्मों का कार्यक्रम ।
(2) उन्नत एवं सुधरी किस्म के बीजों के उपयोग को प्रोत्साहन ।
(3) जैविक एवं रासायनिक खादों के प्रयोग पर बल ।
(4) सिंचाई सुविधाओं का विस्तार ।
(5) कृषि विकास हेतु विभिन्न निगमों की स्थापना।
उपर्युक्त उपायों के प्रयोग से देश में बीसवीं शताब्दी के छठे और सातवें दशकों में ‘हरित क्रान्ति’ को प्रोत्साहित किया। भारत में हरित क्रान्ति अनेक घटकों की सामूहिक उपलब्धि है जिसका उपयोग देश में सामान्यतः खाद्यान्नों के उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि रूप में किया गया है जिसे सरकार ने विस्तृत क्षेत्रों में लागू करने के लिए अन्य सहायक कार्यक्रमों को अपनाया है।
(ii) भारतीय कृषि पर वैश्वीकरण के प्रभाव पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर— वैश्वीकरण
राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ समन्वय ही वैश्वीकरण कहलाता है। इसे भूमण्डलीकरण या विश्वव्यापीकरण भी कहा जा सकता है। यह द्विपक्षीय अथवा बहुपक्षीय व्यापार एवं वित्तीय समझौते से भिन्न वह प्रक्रिया है जिसमें राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था द्वारा विश्व स्तर पर | उपलब्ध आर्थिक अवसरों से लाभान्वित होने का विचार अन्तर्निहित है।
भारतीय कृषि पर वैश्वीकरण का प्रभाव
1990 के बाद से वैश्वीकरण के इस दौर में भारतीय किसानों को कई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत चावल, कपास, रबड़, चाय, कॉफी, जूट और मसालों का मुख्य उत्पादक होने पर भी विक्रसित देशों से स्पर्द्धा में पिछड़ रहा है, क्योंकि विकसित देश कृषि को अधिकाधिक सहायता एवं अनुदान प्रदान कर रहे हैं।
इस बदलते परिदृश्य में हमें अपनी प्राकृतिक क्षमता के साथ-साथ मानवीय श्रम की कार्यक्षमता में वृद्धि करने का प्रयास करना चाहिए । कृषि को जब तक नवीन औजारों, उपकरणों, मशीनों और तकनीक से सुसज्जित नहीं किया जाएगा तब तक हमें वैश्वीकरण का लाभ प्राप्त होना कठिन है। अतः विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्द्धा में ठहरने के लिए भारत को अपनी विशाल कृषि क्षमता का सही योजनाबद्ध तरीकों से उपयोग करना चाहिए। इस कदम के लिए कृषि पद्धति में सुधार के साथ-साथ कृषि अवसंरचना सुविधाओं का विस्तार भी आवश्यक है।
(iii) चावल की खेती के लिए उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों का वर्णन करें।
उत्तर- चावल की खेती के लिए उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियाँ
चावल प्रमुख रूप से उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी जलवायु की उपज है। अत: इसकी फसल के लिए उष्णार्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी फसल के लिए 25° सेल्सियस औसत तापमान और सामान्यतः 100 से 200 सेमी तक वर्षा की आवश्यकता होती है। कम वर्षा वाले भागों में सिंचाई द्वारा चावल का उत्पादन किया जाता है; जैसे— पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। इसकी खेती के लिए चिकनी, कछारी तथा दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है। नदियों के डेल्टाई क्षेत्र, बाढ़ के मैदान अथवा समुद्रतटीय मैदान चावल की कृषि के लिए सर्वोत्तम मा जाते हैं। पहाड़ी भागों में ढालों पर सीढ़ीदार खेत बनाकर चावल उगाया जाता है। चावल रोपने, निराई-गुड़ाई करने, काटने तथा धान से चावल व भूसी अलग करने के लिए पर्याप्त संख्या में सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि चावल की कृषि सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में ही की जाती है।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
• विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – रोपण कृषि क्या है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए ।
उत्तर— रोपण या बागाती कृषि
रोपण कृषि जो बागाती कृषि भी कहलाती है, एक विशिष्ट प्रकार की कृषि है जिसे झाड़ी या वृक्षों के रूप में बागानों में उगाया जाता है। इसके अन्तर्गत बड़ी-बड़ी कृषि उपजें बागानों में उत्पन्न की जाती हैं।
रोपण कृषि की विशेषताएँ
रोपण या बागानी कृषि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
- रोपण कृषि फार्मों या बागानों में की जाती है। अधिकांश बागानों पर विदेशी कम्पनियों का आधिपत्य रहा है।
- इसके अन्तर्गत विशिष्ट उपजों—चाय, कॉफी, रबड़, गन्ना, तेल-ताड़, नारियल गिरी, जूट, फलों आदि का ही उत्पादन किया जाता है।
- इन कृषि उत्पादों का उपभोग समशीतोष्ण कटिबन्धीय देशों के निवासियों द्वारा किया जाता है।
- बागानों में ही कार्यालय, माल तैयार करने, सुखाने, प्रसंस्करण इकाइयाँ, पैकिंग एवं श्रमिकों के निवास आदि होते हैं।
- यहाँ अधिकांश तकनीक एवं वैज्ञानिक पद्धतियाँ समशीतोष्ण देशों से आयात की गई हैं।
- प्रारम्भ में यूरोपीयनों द्वारा लगभग सभी महाद्वीपों में इस कृषि का विकास किया गया था। मलयेशिया में रबड़ के बागान अंग्रेजों ने, ब्राजील में कहवा के बागान पुर्तगालियों ने तथा मध्य और दक्षिणी अमेरिकी देशों में केले की खेती स्पेनवासियों ने आरम्भ की थी।
- यहाँ के उत्पादों का उपभोग समशीतोष्ण कटिबन्धीय देशों द्वारा किया जाता है। यही कारण है कि अधिकांश उत्पादों का निर्यात किया जाता है। इसलिए इन उपजों के बागान तटीय क्षेत्रों अथवा पत्तनों के पृष्ठ – प्रदेश में स्थापित किए गए हैं।
- उपनिवेशों की समाप्ति के साथ-साथ अब इन बागानों पर स्थानीय शासन का नियन्त्रण हो गया है और कुछ परिवर्तनों के साथ अपने तरीके से रोपण कृषि के विस्तार में लगे हैं।
भारत में रोपण कृषि पूर्वोत्तर के पर्वतीय क्षेत्रों, पश्चिम बंगाल के उपहिमालयी क्षेत्रों और प्रायद्वीपीय भारत की नीलगिरि, अन्नामलाई व इलायची की पहाड़ियों में की जाती है। चाय, कहवा, नारियल, रबड़, जूट एवं फलों आदि की खेती प्रमुख स्थान रखती है। यहाँ रोपण कृषि पर कुछ कम्पनियों का आधिपत्य है जो अपनी विधियों से रोपण कृषि का विस्तार कर तथा देश की कृषि अर्थव्यवस्था में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान कर रही हैं।.
प्रश्न 2 – आत्मनिर्वाह या जीविका (Subsistence Farming) क्या है? इसके मुख्य प्रकारों का विवरण दीजिए।
उत्तर- आत्मनिर्वाह या जीविका खेती
जो खेती व्यापारिक उद्देश्यों के स्थान पर जीवन निर्वाह के उद्देश्यों के लिए की जाती है आत्मनिर्वाह या जीविका खेती कहलाती है। इस खेती में परम्परागत पद्धति और अल्पतम पूँजी निवेश किया जाता है। अमेजन नदी की घाटी, अफ्रीका में सहारा के दक्षिण, मध्य व पश्चिमी तथा पूर्वी अफ्रीकी देश तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया के भारत, चीन आदि देशों में इस प्रकार की खेती की जाती है। इस खेती निम्नलिखित दो प्रकार प्रचलित
(क) स्थानान्तरण कृषि अथवा झूमिंग कृषि,
(ख) स्थायी कृषि।
(क) स्थानान्तरण कृषि — इस कृषि के अन्तर्गत कृषक अपने आवास और कृषि क्षेत्र परिवर्तित करते रहते हैं। इस खेती में वनों को साफ करके दो-तीन वर्षों तक खेती करने पर खाली छोड़ दिया जाता है। स्थानान्तरण कृषि में मोटे अनाज मक्का, ज्वार, बाजरा आदि का उत्पादन किया जाता है।.
(ख) स्थायी कृषि – इस कृषि में कृषि क्षेत्र बदला नहीं जाता हैं । इस खेती का विकास स्थानान्तरण कृषि से ही हुआ है। इसकी खेती की मुख्य विशेषताएँ भी स्थानान्तरण कृषि के समान हैं। यह कृषि प्रमुख रूप से उष्णार्द्र प्रदेशों की निम्न भूमियों में अर्द्ध-उष्ण और शीतोष्ण कटिबन्धीय पठारों पर उष्ण कटिबन्धीय पहाड़ी भागों में की जाती है।
प्रश्न 3 – जीविका खेती के प्रमुख लक्षण बताइए ।
उत्तर – जीविका खेती के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-
- इस कृषि पद्धति में छोटी-छोटी एवं बिखरी हुई जोतें पायी जाती हैं। इस पद्धति में कृषि के परम्परागत पुरातन कृषि यन्त्रों एवं उपकरणों – गेंती, फावड़ा, हल, बक्खर, खुरपी, तगारी आदि का प्रयोग किया जाता है। परिवार के सदस्य (स्त्री एवं पुरुष) मिल-जुलकर कृषि कार्य करते हैं। यह आत्मनिर्वाह कृषि भी कहलाती है।
- इस कृषि में अधिकांशतः मोटे अनाजों – मक्का, ज्वार – बाजरा, कोदो, जिमीकन्द, रतालू आदि का उत्पादन किया जाता है। कुछ उपयुक्त भूमि पर गेहूँ एवं चावल की खेती भी की जाती है।
- इसमें प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है। वास्तव में यह कृषि एक प्रकार से प्रकृति की ही देन है। व्यक्ति केवल बीज बोने का कार्य ही करता है क्योंकि सिंचाई या उर्वरक एवं खाद्यादि के लिए कृषकों के पास पूँजी का अभाव होता है। उसकी देखभाल प्रकृति ही करती है।
- इस कृषि में उत्पादित फसलों का उपयोग कृषक एवं उसका परिवार स्वयं ही कर लेता है, क्योंकि इसमें प्रति हेक्टेयर उत्पादन मात्र इतना होता है कि कृषक एवं उसके परिजनों का भी पालन-पोषण कठिन होता है।
- जीविकोपार्जन कृषि करने वाले आदिवासी कृषक अधिकांशतः निर्धन होते हैं। उनके पास पूँजी का अभाव होता है। अतः वे अपने खेतों में उत्तम एवं सुधरे हुए बीज, रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशकों आदि का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। जिस कारण प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ नहीं पाता है। परन्तु अब कुछ स्थानों पर गन्ना, तिलहन, कपास एवं जूट जैसी फसलों का उत्पादन किया जाने लगा है जिससे आत्मनिर्वाह कृषि व्यापारिक कृषि की ओर परिणत हो रही है।
- कृषकों (आदिवासी) की निर्धनता के कारण कृषि में आधुनिक तकनीक का उपयोग नहीं किया जाता है। आधुनिक तकनीक से तात्पर्य आधुनिक कृषि यन्त्रों एवं उपकरणों के प्रयोग से है। फलस्वरूप उत्पादन केवल आत्मनिर्भरता तक ही सीमित रहता है।
प्रश्न 4 – गन्ना उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं तथा मुख्य उत्पादक राज्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- गन्ना उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ
गन्ना उगाने के लिए निम्नलिखित जलवायविक दशाओं ( तापमान और वर्षा ) की आवश्यकता होती है—
- तापमान — गन्ना उष्णार्द्र जलवायु की उपज है। इसकी फसल के लिए उच्च तापमान की आवश्यकता होती है। यह प्रायः 21° से 27° सेल्सियस तापमान में उगाया जाता है, परन्तु 35° सेल्सियस से अधिक और 15° सेल्सियस से कम तापमान में नहीं उगाया जा सकता है। गन्ने की फसल 10 से 12 माह में तैयार होती है। पाला एवं कोहरा गन्ने की फसल को बहुत ही हानि पहुँचाते हैं।
- वर्षा — गन्ने की फसल के लिए अधिक नमी की आवश्यकता होती है। अत: 75 से 100 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में गन्ना उगाया जाता है। परन्तु वर्षा वर्ष भर लगातार होती रहनी चाहिए। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की सहायता से गन्ना उगाया जाता है।
इसके अतिरिक्त गन्ने की कृषि के लिए उपजाऊ दोमट और नमीयुक्त गहरी व चिकनी मिट्टी उपयुक्त रहती है। दक्षिणी भारत की लावायुक्त मिट्टी में गन्ना अधिक पैदा होता है। गन्ने की खेती के लिए भारी संख्या में सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि गन्ना सघन जनसंख्या वाले प्रदेशों में ही उगाया जाता है।
गन्ना उत्पादक राज्य
यद्यपि अनेक राज्य भारत में गन्ने का उत्पादन करते हैं, परन्तु उत्तरी भारत गन्ने का प्रमुख क्षेत्र है। भारत का तीन-चौथाई से अधिक गन्ना उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों में उगाया जाता है। भारत के गन्ना उत्पादक दो राज्यों का विवरण निम्नलिखित है-
1. उत्तर प्रदेश – गन्ना उत्पादन में उत्तर प्रदेश राज्य का भारत में प्रथम स्थान है तथा यह राज्य देश का 40% गन्ना उत्पन्न करता है, जबकि. यहाँ देश का 54% गन्ना उत्पादक क्षेत्र है। गन्ना उत्पादन के लिए यहाँ सभी भौगोलिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इस राज्य के तराई क्षेत्र, गंगा-यमुना | दोआब, रुहेलखण्ड का मैदान और मध्य-पूर्वी भाग में पर्याप्त गन्ना उगाया जाता है।

2. महाराष्ट्र – महाराष्ट्र राज्य का गन्ना उत्पादन में देश में दूसरा स्थान है। यहाँ देश का लगभग 16-3% गन्ना उगाया जाता है। महाराष्ट्र में गन्ने का प्रति हेक्टेयर उत्पादन उत्तर प्रदेश की अपेक्षा अधिक (85.5 लाख टन प्रति हेक्टेयर) है। यहाँ पुणे, अहमदनगर, कोल्हापुर, नासिक, शोलापुर, सांगली व सतारा गन्ना उत्पादक प्रमुख जिले हैं।
प्रश्न 5 – खाद्य सुरक्षा क्या है? भारत की खाद्य सुरक्षा से सम्बन्धित किन्हीं पाँच समस्याओं की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर- खाद्य सुरक्षा का अर्थ
पिछले छह दशकों में देश में खाद्यान्न के उत्पादन में आशाजनक वृद्धि हुई है तथा उत्पादन बढ़कर चार गुने से भी अधिक हो गया है अर्थात् खाद्यान्नों का वर्तमान उत्पादन देश में निवास करने वाली जनसंख्या के लिए पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। दूसरे शब्दों में खाद्यान्नों का वर्तमान भण्डार जनसंख्या का पोषण करने में समर्थ है। अतः “खाद्य सुरक्षा से तात्पर्य जनसंख्या का पोषण करने वाले खाद्य पदार्थों के भण्डार अर्थात् उनकी वर्तमान उपलब्धि से है। ” |
खाद्य सुरक्षा से सम्बन्धित पाँच समस्याएँ
भारत में खाद्य सुरक्षा से सम्बन्धित पाँच समस्याएँ निम्नलिखित हैं-
- देश में खाद्यान्नों के अतिरिक्त विशाल भण्डारों के होते हुए भी गरीबी के कारण बड़ी संख्या में लोगों के पास अनाज खरीदने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।
- भारत में खाद्यान्न तथा दलहनों के अन्तर्गत शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल घटता जा रहा है।
- जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ खाद्यान्न उत्पादन के घटने से देश के सामने खाद्य सुरक्षा का बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
- उर्वरकों, कीटनाशकों और पीड़कनाशकों आदि के उपयोग ने कृषि उत्पादन में चमत्कारी वृद्धि की थी, आज इन्हीं के द्वारा मिट्टी की गुणवत्ता कम होने लगी है। वास्तव में, इन रसायनों के उपयोग से मृदा की प्राकृतिक उर्वरता में कमी आती जा रही है।
- कभी-कभी पानी की कमी होने से सिंचित क्षेत्र भी घट जाता है। पानी के कुप्रबन्धन ने जलाक्रान्ति और क्षारीयता को बढ़ाया है। मृदा क्षारीयता के समावेश के कारण उसकी उत्पादकता में कमी आती जा रही है।
इस प्रकार उपर्युक्त सभी समस्याओं का प्रभाव खाद्य सुरक्षा पर पड़ा है। इसके साथ ही खाद्यान्न उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है तथा खाद्यान्नों का उत्पादन घट रहा है।
प्रश्न 6– भारतीय कृषि की कुछ महत्त्वपूर्ण समस्याओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर – भारत कृषिप्रधान देश होते हुए भी कृषि उत्पादन में न केवल पाश्चात्य देशों की तुलना में अब भी भी बहुत पीछे है, बल्कि अधिकांश देशों की प्रति हेक्टेयर उपज विकासशील देश चीन से बहुत ही कम है क्योंकि भारतीय कृषि अनेक समस्याओं से ग्रसित है। भारतीय कृषि की छह समस्याएँ निम्नलिखित हैं-
- अलाभकर जोतों की बड़ी संख्या- देश की कुल 10.5 करोड़ जोतों में से 1.8 करोड़ (17.2%) जोतों का आकार एक हेक्टेयर से भी कम है। इनके पास देश की कुल कृषि भूमि का केवल 14.9% भाग है। इसके साथ ही देश में परिवार विभाजन के कारण जोतों का आकार छोटा होता जा रहा है। छोटी जोतें आर्थिक दृष्टि से अलाभकर होती हैं।
- कृषि निवेशों की कमी – भारत में अधिकांशतः कृषक इतने गरीब हैं कि उनके पास सिंचाई के साधन बढ़ाने तथा सुधरे व परिष्कृत बीजों, नवीन कृषि यन्त्र व उपकरण, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक औषधियों आदि के क्रय करने के लिए पूँजी का अभाव है। अतः ऐसे कृषक भूमि से अधिक उत्पादन लेने में असमर्थ रहते हैं।
- आधुनिक कृषि विधियों की कृषकों को कम जानकारीकृषि वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों ने जो कृषि विधियाँ उत्तम बताई हैं उनका अभी 20% भाग भी कृषकों तक नहीं पहुँच पाया है, क्योंकि अधिकांश कृषक निरक्षर हैं जिस कारण वे नवीन कृषि पद्धतियों से लाभान्वित ही नहीं हो पाते हैं। सरकार का कृषि प्रचार-प्रसार कार्यक्रम अधिकांशतः रेडियो एवं दूरदर्शन कार्यक्रमों तक ही सीमित है जिन्हें देखने व सुनने के लिए कृषकों के पास साधन ही उपलब्ध नहीं है।
- भू-स्वामी कृषकों की घटती संख्या-लघु एवं सीमान्त कृषक अथवा अन्य कार्यों में रुचि लेने वाले कृषक अब अपनी भूमि की स्वयं न जीतकर दूसरे कृषकों से जुतवाते हैं और स्वयं अन्य कार्यों / रोजगारों में लग जाते हैं, क्योंकि उन्हें स्वयं कृषि करने में उतना लाभ दिखाई नहीं पड़ता जितना कि अन्य व्यवसायों में। परन्तु भूमि पर कार्य करने वाले कृषक प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि के लिए कोई प्रयास नहीं करते हैं।
- कृषि उपजों पर आधारित कुटीर उद्योगों का अभाव- देश में कृषि आधारित कुटीर एवं घरेलू उद्योगों का नितान्त अभाव पाया जाता है जिस कारण कृषकों को अपनी उपजों का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पाता है और ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी व गरीबी बढ़ती जा रही है। यदि फलों के रस, चटनी, अचार, मुरब्बे आदि बनाने और सब्जियों के परिरक्षण तथा दुग्ध उत्पादों के घरेलू उद्योग गाँवों में स्थापित किए जाएँ तो कृषकों को अपनी उपजों का पूर्ण लाभ प्राप्त होगा और रोजगार के साधनों में भी वृद्धि होगी।
- कृषि निवेशों की ग्रामीण क्षेत्रों में अनुपलब्धता – कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए ऋण, अधिक उपज देने वाले सुधरे व परिष्कृत बीज, कीटनाशक दवाइयाँ, रासायनिक उर्वरक आदि तथा उत्तम किस्म के बीज उचित मूल्य पर गाँव में ही उपलब्ध होने चाहिए जिससे किसानों का समय, श्रम और धन व्यर्थ न जाए। यदि सम्भव हो सके तो कृषि निवेशों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा किसानों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
वास्तव में, हमारे राष्ट्रीय सामाजिक जीवन में कृषि जीवन की एक पद्धति है। व्यक्ति इसलिए खेती नहीं करता कि उसे कृषि से विशेष अनुराग है, वरन् वह खेती इसलिए करता है कि उसके पास आजीविका का कोई अन्य साधन उपलब्ध नहीं है। कृषि उपजों का अधिकांश भाग वह स्वयं उपयोग में लाता है। वस्तुतः वह कृषि इसी अभिप्राय से करता है कि उसके परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए ।
प्रश्न 7 – भारत में कपास उत्पादन के प्रमुख राज्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारत में कपास उत्पादक राज्य
प्रायद्वीपीय भारत की लावा-निर्मित मिट्टी एवं जलवायु की उपयुक्तता के कारण यहाँ उत्तरी भारत की अपेक्षा कपास का उत्पादन अधिक होता है। यहाँ देश की लगभग आधी कपास का उत्पादन किया जाता है। अनुकूल जलवायु, उत्तम तकनीक और मूल्य प्रलोभन ने कपास के उत्पादन में वृद्धि को प्रोत्साहित किया है। भारत में कपास के उत्पादक दो प्रमुख राज्य निम्नलिखित हैं-
- पंजाब – भारत के कपास उत्पादन में पंजाब राज्य का प्रथम स्थान है। इस राज्य में उपजाऊ भूमि एवं सिंचाई के साधनों की पर्याप्त सुविधाओं के कारण कपास का प्रति हेक्टेयर उत्पादन देश में सर्वाधिक है। इस राज्य में फिरोजपुर, भटिण्डा, संगरूर, लुधियाना, नाभा, जालन्धर, पटियाला आदि जिलों में कपास उगाई जाती है। यहाँ तीन-चौथाई से भी अधिक मध्यम रेशे वाली कपास का उत्पादन किया जाता है।
- महाराष्ट्र – यह भारत का दूसरा महत्त्वपूर्ण कपास उत्पादक राज्य है। इस राज्य की काली उपजाऊ मिट्टी तथा नम सागरीय जलवायु कपास उत्पादन में बहुत सहायक सिद्ध हुई है। इस राज्य में दो-तिहाई लम्बे रेशे वाली कपास उगाई जाती है। यहाँ पुणे, शोलापुर, नागपुर, अमरावतीनासिक, वर्धा, बीजापुर, बुलढाणा, धुले, ओरंगाबाद, सांगली, यवतमालजलगाँव, अकोला आदि जिलों में कपास की खेती की जाती है।
इन दो राज्यों के अतिरिक्त गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेशराजस्थान, असम एवं मेघालय प्रमुख हैं। उत्तर प्रदेश में गंगा-यमुना दोआब में देश की 1% कपास उगाई जाती है।
प्रश्न 8 – भारत के जूट उत्पादक अग्रणी क्षेत्रों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर- भारत में जूट उत्पादक राज्य
भारत में जूट का उत्पादन निरन्तर बढ़ता जा रहा है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन में भी यहाँ निरन्तर प्रगति हुई है। भारत का दक्षिण-पूर्वी तथा पूर्वी क्षेत्र जूट का प्रधान उत्पादक क्षेत्र है। दो प्रमुख जूट उत्पादक राज्यों का विवरण निम्न प्रकार है-

- पश्चिम बंगाल – जूट उत्पादन में इस राज्य का भारत में प्रथम स्थान है, जहाँ भारत की लगभग 65% जूट उगाई जाती है। यहाँ जूट उत्पादन के लिए अनुकूल जलवायु, उपजाऊ भूमि, पर्याप्त-श्रम आदि सभी आवश्यक दशाएँ उपलब्ध हैं। बर्दवान, हुगली, हावड़ा, मुर्शिदाबाद, मिदनापुर, कूच बिहार, चौबीस परगना, मालदा, नादिया, बांकुड़ा, जलपाईगुड़ी आदि जिले प्रचुर मात्रा में जूट उगाते हैं।
- असम – इस राज्य का भारत के जूट उत्पादन में दूसरा स्थान ही गया है। यहाँ की जलवायु — दशाएँ एवं मिट्टियाँ जूट की कृषि के अनुकूल हैं। यहाँ देश का 17% जूट उत्पन्न किया जाता है तथा कृषि योग्य भूमि के 35% भाग पर जूट की खेती की जाती है। यहाँ ब्रह्मपुत्र नदी की निचली घाटी में जूट का क्षेत्रफल सर्वाधिक विस्तृत है। नौगाँव, ग्वालपाड़ा, दनरी , कछार हिल्स, कामरूप आदि जिलों में जूट की कृषि बड़े पैमाने पर की , जाती है।
इसके अतिरिक्त बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, मंथालय, त्रिपुरा, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश तथा मध्य प्रदेश राज्यों में भी अन्य मात्रा में जूट का उत्पादन किया जाता है। भारत अपनी आवश्यकता से कम लूट का उत्पादन करता है; अत: इसे बंगलादेश से कर लूट का आयात करना पड़ता है।
• लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार क्यों कहा गया है?
उत्तर- भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि ही है, जिसके निम्नलिखित कारण हैं-
- भारत में कुल क्षेत्रफल का 51% भू-भाग कृषि योग्य है, जबकि fare का औसत मात्र 11% ही है।
- देश में लगभग 70% जनसंख्या को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका के साधन कृषि से ही प्राप्त होते हैं।
- पशुपालन, मत्स्यन तथा वानिकी की गणना कृषि के अन्तर्गत करते हुए देश के सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का योगदान 25% है जबकि निर्यात व्यापार कृषि का योगदान 14% है।
- अनेक उद्योगों -सूती, ऊनी, रेशमी वस्त्र, चीनी, ऐल्कोहॉल, वनस्पति तेल, जूट, कागज, सुगदी, नारियल आदि की कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है। सूती वस्त्र, चीनी, पटसन एवं चाय के उत्पादन में भारत अग्रणी स्थान बनाए हुए है।
- देश में कृषि द्वारा आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का विकास हुआ है। देश में 14.3 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर कृषि की जाती है। अतः भारत शुद्ध बोए हुए क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान रखता है।
- कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों में देशवासियों को आजीविका के साधन उपलब्ध होते हैं।
प्रश्न 2 – भारतीय कृषि की तीन विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- भारतीय कृषि की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
- प्रकृति पर निर्भरता – भारतीय कृषि मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। यही कारण है कि वर्षा की अनियमितता एवं अनिश्चितता भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था को सर्वाधिक प्रभावित करती है। जिस वर्ष मानसूनी वर्षा नियमित होती है, कृषि उत्पादन भी यथेष्ट मात्रा में प्राप्त होता है।
- कृषि की निम्न उत्पादकता – भारत में कृषि उपजों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन अपेक्षाकृत अन्य देशों से कम है। प्रति श्रमिक की दृष्टि से भारत में कृषि श्रमिक की औसत वार्षिक उत्पादकता केवल 105 डॉलर है।
- खाद्यान्न फसलों की प्रमुखता – भारतीय कृषि में खाद्यान्न फसलों की प्रमुखता रहती है क्योंकि 106 करोड़ से अधिक जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है। तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या की खाद्यान्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कुल कृषि भूमि के लगभग 65.8% भाग पर खाद्यान्न तथा शेष भाग में व्यापारिक व अन्य फसलों का उत्पादन किया जाता है।
प्रश्न 3 – अन्तर स्पष्ट कीजिए – रबी और खरीफ फसलें ।
उत्तर- रबी एवं खरीफ फसलों में अन्तर
| रबी की फसल | खरीफ की फसल |
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प्रश्न 4 – असम चाय की खेती के लिए प्रसिद्ध है, क्यों?
उत्तर- असम राज्य का चाय के उत्पादन में भारत में प्रथम स्थान है, यहाँ देश की 53% चाय का उत्पादन किया जाता है। यह राज्य भारत में चाय उत्पादन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसके निम्नलिखित कारण हैं—
- असम में चाय की कृषि के लिए लाल, कछारी, उपजाऊ एवं ढालू भूमि पायी जाती है।
- इस राज्य की मृदा में पोटाश, लोहांश तथा जीवांशों की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध है, जो चाय उत्पादन के लिए अति आवश्यक है।
- असम में चाय की कृषि के लिए आवश्यक दशाएँ — तापमान 20° से 30° सेल्सियस तथा औसत वार्षिक वर्षा 250 सेमी से अधिक होती है, जो चाय की कृषि के लिए अत्यधिक उत्तम रहती है।
- यहाँ चाय के बागान ढालू भूमि पर लगाए जाते हैं, जिससे पौधों की जड़ों में जल नहीं ठहर पाता है।
- असम में उत्पादित चाय स्वादिष्ट और रंग में श्रेष्ठ होती है; अतः इसकी विदेशों में अधिक माँग बनी हुई है।
- असम में उत्पादित चाय के निर्यात से भारत को पर्याप्त विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है। असम की अर्थव्यवस्था में चाय का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
प्रश्न 5 – भारत की प्रमुख रेशेदार फसलें कौन-सी हैं? इनका क्या महत्त्व है?
उत्तर – भारत की रेशेदार फसलों में कपास एवं जूट ( पटसन) सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। कपास से मानव को वस्त्रों की आपूर्ति होती है तो जूट व उससे निर्मित सामान अनेक उद्योगों के लिए आवश्यक है। प्रकृति के इन उत्पादों के अतिरिक्त मनुष्य इनके परिपूरक के रूप में ऊन, रेशम, नारियल एवं प्लास्टिक आदि का उपयोग भी करता है। वर्तमान में रेशेदार फसलों से प्राप्त होने वाले धागों के स्थान पर स्थानापन्न कृत्रिम धागों का उपयोग भी किया जाने लगा है। फलस्वरूप वस्त्र, बोरा, टाट, पैकिंग आदि का निर्माण अब कृत्रिम धागों से होने लगा है।
परन्तु इसके उपरान्त भी कपास एवं जूट की चाह आज भी बनी हुई है। वास्तव में, कृत्रिम धागों से निर्मित वस्त्र समाज को वह सुख-सुविधा नहीं दे सके हैं जो सूती धागों से प्राप्त होती है। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों के निवासी कृत्रिम धागों से निर्मित वस्त्रों के उपयोग से अनेक चर्म रोगों के शिकार हो गए हैं। अतः कपास की उपयोगिता को किसी भी प्रकार नकारा नहीं जा सकता है। यह गरीब से लेकर अमीर तक और जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के तन ढाँपने का प्रमुख साधन है। इसी प्रकार जूट का स्थानापन्न ढूँढ़ लिए जाने के उपरान्त भी जूट की माँग ज्यों-की-त्यों बनी हुई है।
प्रश्न 6 – भारत की प्रमुख तिलहन उपजें कौन-सी हैं? मुख्य तिलहन उपज का विवरण लिखिए।
उत्तर— देश के कुल तिलहन उत्पादन लगभग 93% भाग खाद्य तिलहन होते हैं। देश के कुल तिलहन उत्पादन में 90% से अधिक मूँगफली, अरण्डी, तिल, सरसों, तोरिया व अलसी का उत्पादन होता है। भारत के कुल तिलहन उत्पादन का लगभग 90% उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र एवं आन्ध्र प्रदेश राज्यों में किया जाता है। तिल के उत्पादन में उत्तरी भारत की ही प्रधानता है जबकि 90% मूँगफली दक्षिणी भारत में उत्पन्न की जाती है। तोरिया एवं सरसों उत्तरी भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण तिलहन फसल है। कभी-कभी इन्हें मिश्रित फसलों के रूप में भी उगाया जाता है। अलसी रबी की फसल है। रूस व कनाडा के बाद भारत का अलसी उत्पादन में तीसरा स्थान है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा आदि राज्य इनके प्रमुख उत्पादक हैं। अरण्डी छोटे वृक्षों वाली फसल है। यह खरीफ एवं रबी दोनों ऋतुओं में उगाई जाती है। भारत में संसार की 20% अरण्डी उत्पन्न की जाती है। विश्व में ब्राजील के बाद इसके उत्पादन में भारत का दूसरा स्थान है। गुजरात, आन्ध्र प्रदेश और राजस्थान इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
प्रश्न 7 – जूट उत्पादन हेतु अनुकूल परिस्थितियों का विवरण दीजिए ।
उत्तर – जूट की उपज के लिए निम्नलिखित दशाएँ आवश्यक होती हैं-
- तापमान – जूट उष्ण कटिबन्धीय उष्णार्द्र जलवायु का पौधा है। अतः जूट की उपज के लिए उच्च तापमान अर्थात् 25° से 35° सेल्सियस आवश्यक होता है।
- वर्षा – जूट की कृषि के लिए अधिक नमी की आवश्यकता होती है अर्थात् 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा आवश्यक होती है। जूट के पौधों की वृद्धि के समय वर्षा समान रूप से निरन्तर होती रहनी चाहिए।
- मिट्टी – जूट के लिए उपजाऊ चिकनी या काँप मिट्टी आवश्यक होती है। जूट का पौधा भूमि से अधिक पोषक तत्त्व ग्रहण करता है; अतः जूट की कृषि नदियों के डेल्टाई भागों में की जाती है, जहाँ नदियों की बाढ़ प्रतिवर्ष नई उपजाऊ काँप मिट्टी का निक्षेप करती रहती है।
- मानवीय श्रम – जूट उत्पन्न करने, गलाने, रेशा पृथक् करने, धोने, सुखाने के लिए पर्याप्त संख्या में सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इसी कारण जूट की कृषि अधिकांशतः सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में की जाती है। डेल्टाई प्रदेश सघन जनसंख्या वाले क्षेत्र होते हैं।
• अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – भारत की कितनी जनसंख्या कृषि कार्यों में संलग्न है?
अथवा भारत की कार्यशील जनसंख्या का कितने प्रतिशत भाग प्रत्यक्ष रूप से कृषि में संलग्न है?
उत्तर – भारत की 64% जनसंख्या प्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका कृषि से प्राप्त करती है।
प्रश्न 2 – भारत की दो प्रमुख रेशेदार फसलें कौन-सी हैं ? प्रत्येक फसल के प्रमुख उत्पादक राज्य का नाम बताइए ।
अथवा भारत में उगाई जाने वाली दो मुख्य रेशेदार फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर – भारत की दो प्रमुख रेशेदार फसलें कपास एवं जूट (पटसन) हैं। इनके प्रमुख उत्पादक राज्य क्रमशः पंजाब तथा पश्चिम बंगाल हैं।
प्रश्न 3 – शुष्क कृषि की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर- (1) शुष्क कृषि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाई जाती है।
(2) शुष्क कृषि के अन्तर्गत वर्ष में एक ही फसल उगाई जाती है।
प्रश्न 4 – भारतीय कृषि की सबसे बड़ी समस्या क्या है?
उत्तर – भारतीय कृषि की सबसे बड़ी समस्या उसकी प्रति हेक्टेयर निम्न उत्पादकता है।
प्रश्न 5 – हरित क्रान्ति से क्या अभिप्राय है?.
उत्तर – ‘हरित क्रान्ति’ से अभिप्राय सिंचित और असिंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाली फसलों को आधुनिक कृषि पद्धति से उगाकर कृषि उपजों का यथासम्भव अधिक उत्पादन प्राप्त करना है।
प्रश्न 6–भारतीय किसानों के लिए पशुपालन बहुत महत्त्वपूर्ण क्यों है? इस सन्दर्भ में दो बिन्दुओं की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर — (1) पशुपालन कृषि का सहायक व्यवसाय है जो किसानों को अतिरिक्त आय सुलभ कराता है।
(2) इससे न केवल बड़े कृषकों को अपितु लघु व सीमान्त कृषकों और भूमिहीन श्रमिकों को आजीविका के साधन सुलभ हुए हैं।
प्रश्न 7 – ‘ऑपरेशन फ्लड’ क्या है? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – दुग्धोत्पादन में वृद्धि के लिए हरित क्रान्ति की भाँति ‘दुग्ध क्रान्ति’ या ‘ऑपरेशन फ्लड’ चलाया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश में दुग्ध व्यवसाय का विकास करना है।
प्रश्न 8 – आर्द्र कृषि की दो मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर- (1) आर्द्र कृषि अधिक वर्षा वाले तथा सिंचित क्षेत्रों में की जाती है।
(2) आर्द्र कृषि में कम-से-कम दो फसलें उगाई जाती हैं।
प्रश्न 9 – भारत की दो प्रमुख पेय फसलें कौन-सी हैं ? प्रत्येक फसल के प्रमुख उत्पादक राज्य का नाम लिखिए।
उत्तर – भारत की दो प्रमुख पेय फसलें चाय और कहवा हैं। इनके प्रमुख उत्पादक राज्य क्रमशः असम तथा कर्नाटक हैं।
प्रश्न 10 – भारतीय कृषि की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर- (1) भारतीय कृषि देश की 64% जनसंख्या को प्रत्यक्ष रूप से आजीविका के साधन उपलब्ध कराती है।
(2) राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पादन कृषि का योगदान 25% है।
प्रश्न 11 – भारत का कौन- -सा राज्य रबड़ का सर्वाधिक उत्पादन करता है?
उत्तर – भारत में केरल राज्य रबड़ का सर्वाधिक उत्पादन करता है।
प्रश्न 12 – गहन कृषि की चार मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर – (1) गहन कृषि में उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अधिक प्रयोग किया जाता है।
(2) कृषि की विभिन्न प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए मशीनों के प्रयोग द्वारा कृषि का यन्त्रीकरण हो गया है।
(3) प्रति हेक्टेयर उत्पादन वृद्धि हुई है।
(4) भारी उत्पादन के कारण कृषि उपजों का विदेशों को निर्यात किया जाता है।
प्रश्न 13 – भारत में कपास के अधिक उत्पादन के क्या कारण हैं?
उत्तर – अनुकूल जलवायु, उर्वर काली मिट्टी, उत्तम विपणन व्यवस्था और उचित समर्थन मूल्य के कारण भारत में कपास उत्पादन में वृद्धि हुई है।
प्रश्न 14 – भारत की दो सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसलें कौन-सी हैं? प्रत्येक फसल के प्रमुख उत्पादक राज्य का नाम बताइए |
उत्तर – भारत की दो सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसलें चावल (धान) एवं गेहूँ हैं। इनके प्रमुख उत्पादक राज्य क्रमशः पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश हैं।
प्रश्न 15 – रबी तथा खरीफ की एक-एक फसल का नाम लिखिए।
उत्तर – रबी : चना, खरीफ : चावल।
प्रश्न 16 – भारत के दो मुख्य चाय उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए ।
उत्तर- (1) असम (2) प० बंगाल |
प्रश्न 17 – खरीफ की दो फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर- खरीफ की दो फसलें हैं- (1) चावल, (2) मक्का।
प्रश्न 18 – भारत में कपास उत्पादक दो प्रमुख राज्यों के नाम लिखिए ।
उत्तर— भारत के कपास उत्पादक राज्य हैं – पंजाब, महाराष्ट्र ।
प्रश्न 19 – भारत के दो मुख्य गेहूँ उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर – भारत के दो मुख्य गेहूँ उत्पादक राज्य हैं-
(1) पंजाब, (2) हरियाणा ।
प्रश्न 20 – मक्का की खेती के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर – (1) 4 से 6 महीने लम्बी गर्मी का मौसम |
(2) 50 से 80 सेमी वर्षा ।
(3) नाइट्रोजनयुक्त गहरी दोमट मिट्टी और ढालू भूमि ।
प्रश्न 21 – भारत में चावल उत्पादक दो प्रमुख राज्यों के नाम लिखिए |
उत्तर – (1) हरियाणा, (2) छत्तीसगढ़ ।
प्रश्न 22 – दूध किस प्रकार का उत्पाद है?
उत्तर – दूध प्राकृतिक उत्पाद है।
• बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 – भारत में सर्वाधिक चाय उत्पादक राज्य कौन-सा है-
(अ) केरल,
(ब) तमिलनाडु,
(स) पश्चिम बंगाल,
(द) असम ।
उत्तर- (द) असम ।
प्रश्न 2 – निम्नलिखित में से कौन-सा जूट उत्पादक राज्य है-
(अ) केरल,
(ब) पश्चिम बंगाल,
(स) असम,
(द) आन्ध्र प्रदेश |
उत्तर – (ब) पश्चिम बंगाल |
प्रश्न 3 – भारत में ‘हरित क्रान्ति’ का सूत्रपात बीसवीं शताब्दी के कौन-से दशक में हुआ था-
(अ) आठवें.
(ब) सातवें,
(स) छठे,
(द) पाँचवें।
उत्तर – ( स ) छठे ।
प्रश्न 4 – भारत की कार्यशील जनसंख्या का कितने प्रतिशत भाग प्रत्यक्ष रूप से कृषि में संलग्न है-
(अ) लगभग 63%,
(ब) लगभग 64%,
(स) लगभग 65%,
(द) लगभग 66%.
उत्तर- (ब) लगभग 64% .
प्रश्न 5 – निम्नलिखित में से किसका सम्बन्ध रबी की फसल से है-
(अ) चना,
(ब) चावल,
(स) कपास,
(द) ज्वार – बाजरा ।
उत्तर- (अ) चना ।
