UK 10th Social Science

UK Board 10th Class Social Science – (भूगोल) – Chapter 5 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

UK Board 10th Class Social Science – (भूगोल) – Chapter 5 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

UK Board Solutions for Class 10th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (भूगोल) – Chapter 5 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न-
(i) निम्नलिखित में से कौन-सा खनिज अपक्षयित पदार्थ के अवशिष्ट भार को त्यागता हुआ चट्टानों के अपघटन से बनता है-
(क) कोयला
(ख) बॉक्साइट
(ग) सोना
(घ) जस्ता ।
उत्तर- (ख) बॉक्साइट।
(ii) झारखण्ड में स्थित कोडरमा निम्नलिखित में से किस खनिज का अग्रणी उत्पादक है-
(क) बॉक्साइट
(ख) अभ्रक
(ग) लौह अयस्क
(घ) ताँबा ।
उत्तर- (ख) अभ्रक ।
(iii) निम्नलिखित चट्टानों में से किस चट्टान के स्तरों में खनिजों का निक्षेपण और संचयन होता है-
(क) तलछटी चट्टानें
(ख) आग्नेय चट्टानें
(ग) कायान्तरित चट्टानें
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर- (क) तलछटी चट्टानें।
(iv) मोनाजाइट रेत में निम्नलिखित में से कौन-सा खनिज पाया जाता है-
(क) खनिज तेल
(ख) यूरेनियम
(ग) थोरियम
(घ) कोयला।
उत्तर— ( ग ) थोरियम |
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए-
(i) निम्नलिखित में अन्तर 30 शब्दों से अधिक न दें-
(क) लौह और अलौह खनिज,
(ख) परम्परागत तथा गैर-परम्परागत ऊर्जा साधन ।
उत्तर- (क) लौह और अलौह खनिज
लौह खनिज – वे खनिज पदार्थ जिनमें लौह धातु अंशों की प्रधानता पाई जाती है उनको लौह खनिज कहते हैं। लौह अयस्क, मैंगनीज, निकिलकोबाल्ट आदि इसी प्रकार के खनिजों के प्रमुख उदाहरण हैं।
अलौह खनिज – जिन खनिज पदार्थों में लौह धातु अंश नहीं पाए जाते हैं; जैसे—ताँबा, सीसा, जस्ता, बॉक्साइट आदि; इसी प्रकार के खनिज हैं।
(ख) परम्परागत तथा गैर-परम्परागत ऊर्जा साधन
परम्परागत ऊर्जा साधन—मानव, पशु, ईंधन, कोयला, पेट्रोलियमप्राकृतिक गैस व जलविद्युत शक्ति परम्परागत ऊर्जा के साधन हैं। इनके अधिकाधिक उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है।
गैर-परम्परागत ऊर्जा साधन — गैर-परम्परागत साधन पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करते हैं। पवन व सौर ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि ऐसे ही गैर-परम्परागत ऊर्जा के साधन हैं।
(ii) खनिज क्या हैं?
उत्तर — खनिज प्राकृतिक रूप से विद्यमान एक समरूप तत्त्व हैंजिसकी एक निश्चित आन्तरिक संरचना है। खनिज प्रकृति में अनेक रूपों में पाए जाते हैं; जिनमें कठोर हीरा व कोमल चूना तक सम्मिलित होता है। किसी विशेष खनिज का निर्माण उस समय की भौतिक व रासायनिक परिस्थितियों के अनुसार होता है। इसी के परिणामस्वरूप खनिजों में विविध रंग, कठोरता, चमक, घनत्व तथा विविध क्रिस्टल पाए जाते हैं।
(iii) आग्नेय तथा कायान्तरित चट्टानों में खनिजों का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर — आग्नेय तथा कायान्तरित चट्टानों में खनिजों का निर्माण दबाव एवं ताप वृद्धि का परिणाम है। ताप, दाब एवं गैसीय प्रभाव से चट्टानों में विद्यमान खनिज तत्त्व जब तरल या गैसीय अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं तो यह दरारों के सहारे भू-पृष्ठ की ओर आ जाते हैं तथा ऊपर आकर ठण्डे होकर जम जाते हैं। अतः आग्नेय एवं कायान्तरित चट्टानों में खनिज दरारों, जोड़ों, भ्रंशों व विदरों में मिलते हैं। जस्ता, ताँबा, जिंक, सीसा आदि खनिज इसी तरह शिराओं व जमावों से प्राप्त होते हैं।
(iv) हमें खनिजों के संरक्षण की क्यों आवश्यकता है?
उत्तर – खनिजों का विवेकपूर्ण उपयोग और उनका प्रबन्धन करना ‘खनिज संसाधन संरक्षण’ कहलाता है। कुछ खनिज ऐसे होते हैं जिन्हें एक बार उपयोग कर लेने पर वे सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं; जैसे—मैंगनीज, अभ्रक, प्लेटिनम, एण्टीमनी, पारा, रेडियम आदि। इसके . विपरीत कुछ खनिज संसाधनों का उपयोग चक्रण द्वारा बार-बार किया जा सकता है। उदाहरण के लिए -लोहे का एक बार उपयोग कर लेने पर उसे । पुनः गलाकर उपयोग में लाया जा सकता है। अतः एक बार उपभोग कर समाप्त होने वाले खनिज संसाधनों के संरक्षण की सर्वाधिक आवश्यकता है जिससे हमारी भावी पीढ़ियों को भी खनिज सुगमता से प्राप्त होते रहें।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए-
(1) भारत में कोयले के वितरण का वर्णन कीजिए। 
उत्तर- भारत में कोयले का वितरण
भारत में कोयले का वितरण बड़ा ही असमान है। देश का लगभग 75% कोयला दामोदर नदी की घाटी से निकाला जाता है। भारत में कोयला उत्पादक प्रमुख राज्य निम्नलिखित हैं-
  1. झारखण्ड – इस राज्य का कोयला उत्पादन में प्रथम स्थान है। यहाँ भारत का लगभग 36% कोयला 31 स्थानों से खनन किया जाता है। झरिया, बोकारो, राजमहल, करनपुरा, डाल्टनगंज एवं गिरिडीह इस राज्य की प्रमुख खाने हैं।
  2. छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश- इन दोनों राज्यों का संयुक्त रूप से ‘भारत में दूसरा स्थान है। यहाँ देश का लगभग 28% कोयला खनन किया जाता है। पंचघाटी, सोहागपुर, उमरिया, सिंगरौली, रायगढ़, रामकोला, तातापानी, कोरबा एवं बिलासपुर प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं।
  3. पश्चिम बंगाल – कोयला उत्पादन में इस राज्य का तीसरा स्थान है। यहाँ भारत का लगभग 13% कोयला खनन किया जाता है। यहाँ कोयले के निक्षेप पाए जाते हैं। यहाँ बर्दवान, पुरुलिया तथा बाकुण्डा जिलों से कोयले का खनन किया जाता है। इस क्षेत्र में रानीगंज कोयला खान भारत की सबसे बड़ी कोयला खान है।
  4. आन्ध्र प्रदेश एवं तेलंगाना-इन दोनों राज्यों का देश में चौथा स्थान है। यहाँ से देश का लगभग 10% कोयला निकाला जाता है। इन राज्यों के कोयला क्षेत्र गोदावरी नदी की घाटी में स्थित है। सिंगरैनी, तन्दूर तथा सस्ती यहाँ कोयले की प्रमुख खान हैं।
उपर्युक्त गोंडवाना युगों की चट्टानी कोयला क्षेत्रों के अतिरिक्त भारत में टरशियरी युगीन कोयला क्षेत्रों का विस्तार पूर्वोत्तर राज्यों – मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश एवं नागालैंड में पाया जाता है।
(ii) भारत में सौर ऊर्जा का भविष्य उज्ज्वल है। क्यों?
उत्तर- भारत में सौर ऊर्जा का भविष्य
सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। इससे ऊर्जा की मात्रा विपुल रूप में अनवरत प्राप्त की जा सकती है। उष्ण कटिबन्धीय देश होने के कारण भारत में सौर ऊर्जा की उत्पादन क्षमता तथा उपयोगिता की अधिक सम्भावना है। यह लगभग 20 मेगावाट प्रतिवर्ग किमी प्रतिवर्ष है। वास्तव में यदि देश में इस ऊर्जा का पर्याप्त रूप से दोहन किया जाए तो यह ऊर्जा का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध हो सकता है। ब्रह्माण्ड में जब तक सूर्य विद्यमान रहेगा, उससे भारी मात्रा में सौर ऊर्जा सतत रूप से प्राप्त की जाती रहेगी।
भारत में सबसे बड़ा सौर ऊर्जा संयन्त्र भुज के समीप माधोपुर (गुजरात) में है। यहाँ दूध के डिब्बों को उबलते पानी में जीवाणुरहित करने के लिए इसकी स्थापना की गई है। देश में थार मरुस्थल सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा केन्द्र बन सकता है। भारत में कई स्थानों पर सौर ऊर्जा – संयन्त्रों की स्थापना की गई है। माउण्ट आबू में ब्रह्मकुमारी आश्रम में सौर ऊर्जा का उपयोग लगभग 500 व्यक्तियों का भोजन बनाने में किया जाता है। आज देश में सौर ऊर्जा धीरे-धीरे काफी लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। इसका उपयोग खाना बनाने, पम्प द्वारा जल खींचने, प्रशीतलन और सड़क मार्गों पर पथ-प्रकाश के लिए किया जा सकता है।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – परम्परागत ऊर्जा के साधन क्या हैं? शक्ति के साधन के रूप में जलशक्ति किस प्रकार कोयला एवं पेट्रोलियम से अधिक महत्त्वपूर्ण है? इस सम्बन्ध में चार बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर- परम्परागत ऊर्जा साधन
कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और परमाणु शक्ति ऊर्जा के प्रमुख खनिज संसाधन हैं। ये सभी संसाधन भू-गर्भ से निकाले जाते हैं तथा इनके भण्डार सीमित हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं। इन्हें .‘परम्परागत ऊर्जा संसाधन’ कहा जाता है। अत: इन संसाधनों का उपयोग बड़ी मितव्ययिता से किया जाना चाहिए। भू-गर्भ से निकाले जाने के कारण ही इन्हें ऊर्जा के ‘खनिज संसाधनों’ के नाम से पुकारा जाता है। कोयला, खनिज तेल और प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैविक पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है, अतः इन्हें जीवाश्मीय ईंधन कहा जाता है।
जलशक्ति की कोयला व पेट्रोलियम से तुलनात्मक महत्ता
जलशक्ति कोयले एवं पेट्रोलियम की तुलना में अधिक उपयोगी एवं सुविधाजनक है, जिसके निम्नलिखित कारण हैं-
  1. जलशक्ति, ऊर्जा का अक्षय एवं अविरल स्रोत है जबकि कोयला व खनिज तेल कभी भी समाप्त हो सकते हैं।
  2. जलशक्ति उत्पादक परियोजनाओं (बहुउद्देशीय परियोजनाओं ) का एक बार विकास हो जाने पर उनसे सदैव एवं सतत रूप में जलशक्ति का उत्पादन किया जाता रहता है। अतः यह सतत उपयोगिता प्रदान करने वाला ऊर्जा स्रोत है।
  3. तारों (Cables) के माध्यम से जलशक्ति को कम खर्च में दुर्गम एवं दूरवर्ती स्थानों तक भेजा जा सकता है। यह खर्च भी एक बार ही करना पड़ता है तथा इसका पारेषण सतत बना रहता है। इसके विपरीत कोयला एवं खनिज तेल को उपभोक्ताओं तक भेजने में परिवहन व्यय बहुत करना पड़ता है तथा यह व्यय बार-बार करना पड़ता है।
  4. कोयला एवं पेट्रोलियम के भण्डारण में पर्याप्त व्यय करना पड़ता है जबकि जलशक्ति में इस प्रकार का कोई व्यय नहीं करना पड़ता है। इसके साथ ही बार-बार निकासी करने से कोयला एवं पेट्रोलियम की मात्रा में कमी आती है जबकि जलशक्ति में इस प्रकार की कोई कमी नहीं होती है।
  5. खनिज तेल की उपलब्धता ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव एवं वैमनस्य उत्पन्न किया है। इसका प्रत्यक्ष एवं प्रमुख उदाहरण इराकअमेरिका युद्ध है। जबकि जलशक्ति से इस प्रकार का कोई दुःखद तथ्य नहीं जुड़ा है।
  6. जलशक्ति प्रदूषण मुक्त है जबकि कोयला एवं पेट्रोलियम प्रदूषणकारी ऊर्जा संसाधन हैं।
प्रश्न 2 – भारत में महत्त्वपूर्ण ऊर्जा संसाधनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- गैर-परम्परागत ऊर्जा के साधन
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, जैव-पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा, कृषि अपशिष्टों एवं मानव मल-मूत्र से प्राप्त ऊर्जा आदि गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधन कहलाते हैं। ये ऊर्जा के अक्षय या नव्यकरणीय साधन हैं। इसी विशेषता के कारण इन्हें विश्वसनीय ऊर्जा . साधन कहा जाता है। इन संसाधनों का विवरण निम्नलिखित है-
  1. पवन ऊर्जा – नौ- परिवहन का उपयोग प्राचीनकाल में पवन के माध्यम से ही किया जाता था। पालदार नौकाएँ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। अतः जो शक्ति पवन के संचालन से प्राप्त होती है, उसे पवन ऊर्जा कहा जाता है। भारत में 20,000 मेगावाट पवन ऊर्जा की उत्पादन क्षमता है। देश में लगभग 85 स्थानों की पहचान की जा चुकी है, जिनकी उत्पादन क्षमता 4,500 मेगावाट है। ये स्थान तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और लक्षद्वीप में स्थित हैं। गुच्छ (तमिलनाडु) में देश का सबसे बड़ा पवन फार्म है जिसकी उत्पादन क्षमता 150 मेगावाट है। गुजरात राज्य में पवन ऊर्जा के विकास की सर्वाधिक सम्भावनाएँ विद्यमान हैं।
  2. ज्वारीय ऊर्जा-भारत की समुद्री सीमा 6,100 किमी लम्बी है। तटीय क्षेत्रों में ज्वार-भाटे की प्रक्रिया द्वारा ज्वारीय ऊर्जा का उत्पादन सुगमता से किया जा सकता है। यदि ज्वार उठने के समय किसी संयन्त्र के माध्यम से ऊर्जा प्राप्त कर ली जाए तो प्राप्त ऊर्जा का उत्पादन बहुत ही सस्ता पड़ता है। यह ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। भारत में कच्छ एवं खम्भात की खाड़ियाँ इसके उत्पादन के आदर्श क्षेत्र हैं।
  3. कृषि अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा – वर्तमान में भारत में अनेक मिलें गन्ने से चीनी का उत्पादन कर रही हैं जिनसे भारी मात्रा में खोई (Begas) की प्राप्ति होती है। अतः गन्ने के पेराई मौसम में इस खोई से 2,000 मेगावाट विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जा सकता है। कुछ आधुनिक चीनी मिलें ऊर्जा का उत्पादन कर रही हैं। कृषि, पशुओं तथा मानव के अपशिष्टों द्वारा उत्पादित ऊर्जा ग्रामीण क्षेत्रों की ऊर्जा आवश्यकता में प्रयुक्त जा सकती है। इस दिशा में बायोगैस संयन्त्र का संचालन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
  4. सौर ऊर्जा – गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा सर्वोपरि है। सौर ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। इसके लिए सूर्य प्रकाश में एक संयन्त्र (Device) स्थापित कर दिया जाता है जो सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को अपने में समाहित कर लेता है तथा उत्पादित सौर ऊर्जा का उपयोग विभिन्न घरेलू कार्यों में किया जाता है। इस सम्बन्ध में सौर चूल्हों का विकास एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु एवं मध्यम आकार के सौर-बिजलीघरों के निर्माण की योजनाएँ क्रियान्वित की जा रही है। अत: ब्रह्माण्ड में जब तक सूर्य विद्यमान रहेगा, इससे सतत रूप में ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा प्राप्त की जाती रहेगी।
प्रश्न 3 – भारत में पेट्रोलियम वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर- पेट्रोलियम
पेट्रोलियम लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—चट्टानों का तेल। भू-गर्भ में चट्टानों से निकाले जाने के कारण इसे पेट्रोलियम कहते हैं। इसकी उत्पत्ति भू-गर्भ में दबी हुई वनस्पति और जल – जीवों के रासायनिक परिवर्तनों के कारण आसवन क्रिया के फलस्वरूप हुई है। मशीनों तथा वाहनों (नभ, जल व थल) में पेट्रोलियम चालक- शक्ति के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। भू-गर्भ से निकले कच्चे तेल में अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं। इन अशुद्धियों को तेल परिष्करणशालाओं में रासायनिक क्रियाओं द्वारा संसाधित किया जाता है।
वितरण – भारत में कुल पेट्रोलियम उत्पादन का 63 प्रतिशत भाग बॉम्बे हाई से, 18 प्रतिशत गुजरात से और 16 प्रतिशत असम से प्राप्त होता है । स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व मात्र असम राज्य में ही खनिज तेल का खनन किया जाता था। असम में डिगबोई, नहरकटिया और मोरन – हुगरीजन महत्त्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। अंकलेश्वर गुजरात का सबसे महत्त्वपूर्ण तेल क्षेत्र है।
भारत में गुजरात के मैदानों और खम्भात की खाड़ी के अपतटीय क्षेत्रों में तेल एवं प्राकृतिक गैस की खोज का कार्य किया गया। मुम्बई तट से 115 किमी दूर अरब सागर में 143 हजार वर्ग किमी में विस्तृत भारत का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र ‘बॉम्बे हाई’ में पेट्रोलियम की उपलब्धि एक बड़ी सफलता थी । यहाँ 1,416 मीटर की गहराई से तेल जापानी स्थिर मंच ‘सागर सम्राट’ की सहायता से निकाला जाता है। यहाँ 1976 ई० से तेल निकाला जा रहा है। पेट्रोलियम उत्पादन के लिए विकसित और उच्च स्तर की प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है। अतः देश में ही उच्च प्रौद्योगिकी का विकास कर अपतटीय क्षेत्रों में तेल की खोज का कार्य आरम्भ किया गया तथा नए भण्डारों का पता चला। ये क्षेत्र गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और महानदी के डेल्टाई क्षेत्रों में सागर के गहरे भागों में विस्तृत हैं। असम में भी तेल के नए भण्डारों का पता चला है।
प्रश्न 4 – ऊर्जा संरक्षण क्यों आवश्यक है? ऊर्जा के कुशल उपयोग के लिए पाँच उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- ऊर्जा संरक्षण
देश के आर्थिक विकास एवं जीवन-स्तर में वृद्धि के लिए ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण किया जाना नितान्त आवश्यक है । शक्ति साधनों से उपयोगिता प्राप्त करना और उनका मितव्ययिता से सही उपयोग संसाधन संरक्षण कहलाता है। देश में ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता, संचित राशि उनका उपयोग और भावी सम्भावनाओं को देखते हुए उनका संरक्षण किया जाना नितान्त आवश्यक है। इस संरक्षण के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी रहे हैं-
  1. भारत में सौर ऊर्जा संसाधनों के भण्डार अत्यन्त सीमित हैं। अतः उनका उपयोग आवश्यक कार्यों में ही किया जाना चाहिए।
  2. कृषि उद्योग एवं परिवहन साधनों और घरेलू कार्यों में ऊर्जा की माँग निरन्तर बढ़ रही है। अतः वैज्ञानिकों को नई प्रौद्योगिकी और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज करनी चाहिए।
  3. यद्यपि ऊर्जा के वैकल्पिक एवं स्थानापन्न संसाधनों के वैज्ञानिक प्रयास किए गए हैं परन्तु अभी कोई कारगर उपाय हाथ नहीं आए हैं।
ऊर्जा के सही उपयोग के लिए पाँच उपाय
ऊर्जा संसाधनों के सही उपयोग एवं संरक्षण के लिए पाँच उपाय निम्नलिखित हैं-
  1. सभी नागरिकों को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का अधिक-से-अधिक और निजी वाहनों का कम-से-कम उपयोग करना चाहिए। इससे पेट्रोल, डीजल आदि की पर्याप्त बचत सम्भव होगी ।
  2. घरेलू ऊर्जा की अधिकाधिक बचत के प्रयास करने चाहिए। जब आवश्यकता न हो तो बिजली के उपकरण बन्द रखने चाहिए। आवश्यकता होने पर ही ऊर्जा का उपयोग किया जाना चाहिए।
  3. ऊर्जा की बचत के उपाय अपनाने चाहिए। वैकल्पिक स्रोत इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बाजार अथवा अल्प दूरी के लिए कार, स्कूटर व बाइक के स्थान पर साइकिल को प्रयोग में लाया जा सकता है।
  4. घरेलू विद्युत उपकरणों की नियमित जाँच कराते रहना चाहिए। यही प्रक्रिया कल-कारखानों तथा अन्य यान्त्रिक उपकरणों के रख-रखाव के सम्बन्ध में अपनाई जानी चाहिए।
  5. ऊर्जा के परम्परागत स्रोत अनव्यकरणीय होते हैं, जबकि गैर-परम्परागत स्रोत नव्यकरणीय होते हैं। अतः ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोतों का ही अधिकाधिक उपयोग किया जाना चाहिए।
प्रश्न 5 – खनिजों का संरक्षण क्यों आवश्यक है? खनिजों के संरक्षण की किन्हीं तीन विधियों की व्याख्या कीजिए।
अथवा अपनी खनिज सम्पदा के संरक्षण के लिए किन्हीं चार विधियों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – प्राकृतिक संसाधनों में खनिज पदार्थों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। किसी भी राष्ट्र का औद्योगिक विकास खनिज संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। विश्व स्तर पर खनिजों की उपलब्धता सीमित है। फलस्वरूप विश्व में खनिजों का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए खनिज संसाधनों का संरक्षण करना अति आवश्यक है। कुछ खनिज संसाधन ऐसे होते हैं जिन्हें एक बार उपयोग कर लेने पर वे सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं; जैसे—मैंगनीज, अभ्रक, प्लेटिनम, एण्टीमनी, पारा, रेडियम आदि । इसके विपरीत कुछ खनिज संसाधनों का उपयोग चक्रण द्वारा बार- बार किया जा सकता है। अतः एक बार उपभोग कर समाप्त होने वाले खनिज संसाधनों के संरक्षण की सर्वाधिक आवश्यकता है जिससे हमारी भावी पीढ़ियों को भी खनिज सतत रूप में प्राप्त होते रहें। खनिजों के संरक्षण की चार विधियाँ निम्नलिखित हैं-
  1. धातु अयस्कों का उपयोग चक्रीय प्रक्रिया द्वारा किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए – लोहे एवं सोने को पुनः गलाकर उपयोग में लाया जा सकता है।
  2. खनिज संसाधनों के संरक्षण के लिए उनके वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग किया जाना चाहिए ।
  3. खनिज संसाधनों का उत्खनन करते समय तथा उनके निर्माण की प्रक्रियाओं में उनकी बरबादी कम-से-कम की जानी चाहिए।
  4. खनिजों के संरक्षण के लिए उनके स्थान पर अन्य वस्तुओं का उपयोग किया जाना चाहिए। जो खनिज संसाधन शीघ्र समाप्त होने वाले हों, उनका उपयोग बड़ी ही मितव्ययिता से किया जाना चाहिए तथा उनका भविष्य के लिए संरक्षण करना अति आवश्यक है।
• लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – अन्तर स्पष्ट कीजिए – धात्विक और अधात्विक खनिज ।
उत्तर- धात्विक और अधात्विक खनिज में अन्तर
धात्विक खनिज अधात्विक खनिज
  1. वे खनिज पदार्थ जिनमें धातु अंशों की प्रधानता पायी जाती है, उन्हें धात्विक खनिज कहते हैं।
  2. लौह-अयस्क, मैंगनीज – अयस्क, क्रोमाइट, पाइराइट, टंगस्टन, निकिल एवं कोबाल्ट सामान्यतः धात्विक खनिज हैं।
  3. खानों से निकाले जाने पर इनमें अनेक अशुद्धियों का मिश्रण रहता है। अतः प्रयोग करने से पूर्व इनका परिष्करण करना आवश्यक होता है।
  4. धात्विक खनिज ताप एवं विद्युत के सुचालक होते हैं।
  1. जिन खनिज पदार्थों में लौह धातु या धात्विक अंश नहीं पाए जाते हैं, उन्हें अधात्विक खनिज कहते हैं।
  2. नाइट्रेट, पोटाश, अभ्रक,  जिप्सम, कोयला व पेट्रोलियम प्रमुख अधात्विक खनिज हैं।
  3. अधात्विक खनिजों में अशुद्धियाँ बहुत कम होती हैं। अतः इनके परिष्करण की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
  4. अधात्विक खनिज ताप एवं विद्युत के कुचालक होते हैं।
प्रश्न 2 – अन्तर स्पष्ट कीजिए-
(i) वाणिज्यिक और अवाणिज्यिक ऊर्जा ।
(ii) प्राकृतिक गैस और बायोगैस ।
उत्तर- (i) वाणिज्यिक और अवाणिज्यिक ऊर्जा में अन्तर
वाणिज्यिक ऊर्जा अवाणिज्यिक ऊर्जा
  1. ऊर्जा के वे स्रोत, जिन्हें व्यापार में प्रयोग किया जाता है, उन्हें वाणिज्यिक ऊर्जा कहते हैं।
  2. कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जल-विद्युत और परमाणु ऊर्जा, वाणिज्यिक ऊर्जा के प्रमुख स्त्रोत हैं।
  3. अधिक उपभोग करने पर इनके भण्डार समाप्त भी हो सकते हैं। अत: इन ऊर्जा स्रोतों के संरक्षण पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
  1. ऊर्जा के वे स्रोत, जिन्हें व्यापार के लिए प्रयुक्त नहीं किया जाता है, अवाणिज्यिक ऊर्जा कहलाते हैं।
  2. जलाऊ लकड़ी, लकड़ी का कोयला, गोबर और कृषि अवशिष्ट अवाणिज्यिक ऊर्जा के स्रोत हैं।
  3. इन ऊर्जा स्रोतों के भण्डार कभी समाप्त नहीं होते हैं, बल्कि उच्च प्रौद्योगिकी द्वारा इनके उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है। अतः ये मानव को सदैव उपयोगिता प्रदान करने वाले ऊर्जा स्रोत हैं।
(ii) प्राकृतिक गैस और बायोगैस में अन्तर
प्राकृतिक गैस बायोगैस
  1. प्राकृतिक गैस के भण्डार भू-गर्भ में पाए जाते हैं।
  2. यह पेट्रोलियम के साथ भी मिलती है और स्वतन्त्र भण्डारों के रूप में भी पायी जाती है।
  3. इसे एल०पी०जी० (लिक्वि-फाइड पेट्रोलियम गैस) कहा जाता है जिसका उपयोग घरेलू कार्यों, शक्ति केन्द्रों और उर्वरक कारखानों में किया जाता है।
  4. भू-गर्भ में मिलने के कारण इसके भण्डार सीमित हैं, जो कभी भी समाप्त हो सकते हैं।
  1. बायोगैस भू-पृष्ठ पर मानव द्वारा निर्मित की जाती है। अतः यह कृत्रिम गैस है।
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में इसका उपयोग घरेलू कार्यों में किया जाता है जो झाड़-झंखाड़, कृषि के अवशिष्टों, जीव-जन्तुओं (गोबर) और मानव मल-मूत्र से तैयार की जाती है।
  3. जैव पदार्थों के अपघटन से बायोगैस का निर्माण होता है। इसका उपयोग घरेलू कार्यों, प्रकाश करने में किया जाता है।
  4. इसके निर्माण में प्रयुक्त कच्चे पदार्थ भारी मात्रा में उपलब्ध हैं जिनका विकास प्रौद्योगिकी द्वारा किया जा सकता है।
प्रश्न 3 – जीवाश्मीय ईंधन से क्या अभिप्राय है? इनमें कौन-से अवगुण पाए जाते हैं?
उत्तर- जिन ईंधनों (ऊर्जा शक्ति) की उत्पत्ति जैविक पदार्थों से हुई है, उन्हें जीवाश्मीय ईंधन कहा जाता है। कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैविक पदार्थों से हुई है, जिनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। जीवाश्मीय ईंधनों में निम्नलिखित अवगुण पाए जाते हैं-
  1. यह सभी ऊर्जा के क्षयी संसाधन हैं अर्थात् इनके भण्डार कभी भी समाप्त हो सकते हैं।
  2. जीवाश्मीय ईंधन के उपयोग से राख, धुआँ, गन्दगी उत्पन्न होती है जिससे पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है।
  3. इनका एक बार उपयोग करने के बाद ये सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं।
  4. इनके आवागमन में भारी व्यय करना पड़ता है, परन्तु इनसे ताप शक्ति अधिक प्राप्त होती है।
  5. जीवाश्मीय ईंधनों के उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती जा रही है जो आधुनिक युग की एक ज्वलन्त समस्या है जिसका सामना विश्व के सभी देश कर रहे हैं।
प्रश्न 4 – बॉम्बे हाई क्यों प्रसिद्ध है? देश के आर्थिक विकास में इसका क्या योगदान है?
उत्तर – स्वाधीनता के पश्चात् अपतटीय क्षेत्रों में तेल तथा प्राकृतिक गैस मिलने की अपार सम्भावनाएँ व्यक्त की गईं। फलस्वरूप मुम्बई तट से 115 किमी दूर और वड़ोदरा से 80 किमी दक्षिण में अरब सागर में पेट्रोल के विशाल भण्डारों का पता चला जिसे तेल क्षेत्र में ‘बॉम्बे हाई’ के नाम से जाना जाता है। यह भारत का सबसे बड़ा अपतटीय तेल क्षेत्र है, जो 143 हजार वर्ग किमी क्षेत्रफल में विस्तृत है। यहाँ तेल 1,416 मीटर की गहराई से निकाला जाता है तथा जापान से आयात किए गए ‘सागर सम्राट’ नामक विशाल जलयान द्वारा सन् 1976 ई० से तेल का उत्पादन किया जा रहा है।
इस प्रकार देश के पेट्रोलियम उत्पादन में बॉम्बे हाई का योगदान सराहनीय रहा है। पहले भारत पर्याप्त मात्रा में तेल का आयात करता था, परन्तु बॉम्बे हाई की खोज के बाद तेल के आयात में कमी आई है। इस क्षेत्र में तेल की उपलब्धता से प्रभावित होकर अन्य नए अपतटीय तेल क्षेत्रों में तेल की खोज के कार्य को प्रोत्साहन दिया जा रहा है तथा परिणाम अनुकूल मिल रहे हैं। इस प्रकार तेल उत्पादन क्षेत्र में बॉम्बे हाई का आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । के देश
प्रश्न 5–खनिज संसाधनों की दृष्टि से भारत की विश्व में क्या स्थिति है?
उत्तर – भारत कुछ खनिज संसाधनों में बहुत सम्पन्न है। देश में अपने ही बल पर एक बड़ी शक्ति बनने की अपार क्षमताएँ विद्यमान हैं। यहाँ कुछ खनिज देश की आवश्यकता से अधिक पाए जाते हैं, जिनका विदेशों को निर्यात भी किया जाता है। दूसरी ओर कुछ खनिज ऐसे भी हैं जिनका आयात करना पड़ता है। खनिज सम्पदा तथा उनके वितरण की विशेषताओं को निम्नलिखित रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है-
  1. भारत आधारभूत खनिज सम्पदा अर्थात् लौह-अयस्क की पर्याप्त मात्रा संजोए हुए है। एक अनुमान के अनुसार देश में विश्व के लौह-अयस्क के एक-चौथाई भण्डार विद्यमान हैं जो उत्तम कोटि के हैं अर्थात् उनमें लोहांश की मात्रा 60 से 70% तक पायी जाती है।
  2. देश में पर्याप्त मात्रा में मैंगनीज, अभ्रक (विश्व का 90%), ताँबा, बॉक्साइट आदि खनिज उपलब्ध हैं जो देश को सुदृढ़ औद्योगिक आधार प्रदान करने में सक्षम हैं।
प्रश्न 6 – मैंगनीज एवं बॉक्साइट के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर : मैंगनीज का महत्त्व – मैंगनीज भूरे रंग की कठोर धातु होती है जिसका उपयोग मिश्र धातुएँ (Alloys) बनाने में किया जाता है। इसका उपयोग लोहे में मिलाकर इस्पात बनाने, सूखी बैटरियाँ, वार्निश, ब्लीचिंग पाउडर, क्लोरीन गैस, ऑक्सीजन, रंग-रोगन बनाने, चीनी मिट्टी के बर्तनों पर पॉलिश करने, पोटैशियम परमैंगनेट बनाने, काँच का सामान बनाने तथा वायुयान निर्माण में भी किया जाता है । मैंगनीज उत्पादन का लगभग 95% भाग धातु निर्माण कार्यों में प्रयोग किया जाता है। यह एक बहु-उपयोगी धातु है, जिसे अन्य धातुओं के साथ मिलाकर उन्हें कठोर एवं टिकाऊ बनाया जाता है।
बॉक्साइट का महत्त्व – बॉक्साइट का उपयोग ऐलुमिनियम बनाने में किया जाता है। यह एक महत्त्वपूर्ण व्यावसायिक खनिज है जिसका उपयोग चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने, मिट्टी का तेल साफ करने तथा रासायनिक पदार्थ बनाने में किया जाता है। यह ताँबे का स्थानापन्न बनता जा रहा है। यह एक लचीली धातु होती है जिसे किसी रूप में ढाला जा सकता है। यहाँ तक कि इससे बारीक तार तक बनाया जा सकता है। वर्तमान में इस धातु का बहुमुखी उपयोग किया जा रहा है। ऐलुमिनियम की 60% खपत बिजली उद्योग में की जाती है। बॉक्साइट के अवशिष्ट से सीमेण्ट भी बनाया जाता है।
प्रश्न 7 – अभ्रक का क्या महत्त्व है? भारत में इसके उत्पादक क्षेत्र बताइए ।
उत्तर : अभ्रक का महत्त्व – अभ्रक एक बहु-उपयोगी खनिज है। यह ताप एवं विद्युत का कुचालक होता है। अतः इसका उपयोग विद्युत उपकरण, रेडियो, वायुयान, औषधि निर्माण, अग्निरोधीं वस्त्रों, टेलीफोन, किया जाता है। यह पारदर्शक एवं चमकीला होता है। अतः इससे वार्निश एवं पंखों, खिलौनों, शीशे की चिमनियों, नेत्ररक्षक चश्मों आदि के बनाने में पेंट भी बनाए जाते हैं। अभ्रक का उपयोग बेतार का तार तथा सैन्य उपकरण बनाने में भी किया जाता है।
उत्पादक क्षेत्र – भारत के अभ्रक उत्पादन में बिहार व झारखण्ड राज्य अग्रणी हैं जहाँ देश का 60% अभ्रक उत्पादित किया जाता है। यहाँ अभ्रंक उत्पादक पेटी 95 से 160 किमी लम्बी तथा 19 से 26 किमी चौड़ी है । अभ्रक का 30% उत्पादन करने वाला आन्ध्र प्रदेश राज्य दूसरे स्थान पर है। यहाँ अभ्रक उत्पादक क्षेत्र अर्द्ध-चन्द्राकार पेटी में नेल्लौर जिले से गुण्टूर जिले तक 1,550 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है।
प्रश्न 8 – ताँबे का क्या उपयोग है? यह भारत में कहाँ-कहाँ पाया जाता है?
उत्तर : ताँबे का उपयोग – भारत में ताँबे का उपयोग प्राचीन काल से किया जा रहा है। लोहे की खोज होने से पूर्व ताँबा ही सभ्यता के विकास का आधार था । यहाँ ताँबे की मूर्तियाँ, सिक्के, बर्तन आदि प्राचीन काल से ही बनाए जाते रहे हैं। विद्युत और ताप का सुचालक होने के कारण वर्तमान में ताँबा बिजली के उपकरणों के निर्माण में अधिक प्रयोग किया जाता है।
उत्पादक क्षेत्र – ताँबा उत्पादन में भारत धनी नहीं है। यहाँ 41.7 करोड़ टन ताँबे के सुरक्षित भण्डार होने का अनुमान लगाया गया है। घरेलू | माँग में वृद्धि को देखते हुए भारत में ताँबे के उत्पादन को बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। ताँबा उत्पादन में झारखण्ड राज्य का भारत में प्रथम स्थान है। यहाँ ताँबा उत्पादक क्षेत्र 130 किमी की लम्बाई में ओडिशा राज्य की सीमा तक विस्तृत हैं। मध्य प्रदेश राज्य देश का 20% ताँबा उत्पन्न करता है। आन्ध्र प्रदेश एवं राजस्थान अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
• अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – उस खनिज का नाम लिखिए जो ऐलुमिनियम प्राप्त करने का प्रमुख स्रोत है?
अथवा ऐलुमिनियम किस अयस्क से प्राप्त किया जाता है?
उत्तर— ऐलुमिनियम प्राप्त करने का प्रमुख स्रोत बॉक्साइट है।
प्रश्न 2 – अभ्रक धात्विक खनिज है अथवा अधात्विक, बताइए |
उत्तर – अभ्रक अधात्विक खनिज है।
प्रश्न 3 – एल०पी०जी० और सी०एन०जी० के पूरे नाम लिखिए।
उत्तर – एल०पी०जी० ( LPG) – लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (Liquefied Petroleum Gas) ।
सी०एन०जी० (CNG) – कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस (Compressed Natural Gas)।
प्रश्न 4 – भारत में पहला जलविद्युत शक्ति केन्द्र कहाँ और कब स्थापित किया गया?
उत्तर – भारत में पहला जल विद्युत शक्ति केन्द्र दार्जिलिंग में सन् 1898 ई० में स्थापित किया गया था ।
प्रश्न 5 – ‘खेतड़ी’ क्यों प्रसिद्ध है? यह कहाँ स्थित है?
उत्तर- ‘खेतड़ी’ ताँबा खदान के लिए प्रसिद्ध है। यह राजस्थान में स्थित है।
प्रश्न 6 – भारत में लौह-अयस्क की दो पेटियों के नाम लिखिए।
उत्तर— (1) केन्दुझर, (2) चित्रदुर्ग ।
प्रश्न 7 – गैर-परम्परागत ऊर्जा के दो साधन बताइए ।
उत्तर- (1) सौर ऊर्जा, (2) पवन ऊर्जा ।
प्रश्न 8 – लौह-अयस्क के चार प्रकारों के नाम लिखिए।
अथवा दो लौह-अयस्कों के नाम बताइए। 1
उत्तर- (1) मैग्नेटाइट, (2) हैमेटाइट, (3) लिमोनाइट तथा (4) सिडेराइट।
प्रश्न 9 – मध्य प्रदेश स्थित ताँबा उत्पादक क्षेत्र का नाम लिखिए।
उत्तर – बालाघाट।
प्रश्न 10 – भारत के दो प्रसिद्ध अभ्रक उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर- झारखण्ड, राजस्थान।
प्रश्न 11 – भारत का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा संयन्त्र कहाँ स्थित है?
उत्तर – भारत का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा संयन्त्र भुज निकट माधापुर में स्थित है।
प्रश्न 12 – रैट होल खनन’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर – ‘रैट होल खनन’ कोयला खनन से सम्बन्धित शब्द है। इसे उपनिवेशकाल में प्रयुक्त किया जाता था। यह खनन मेघालय राज्य में अधिक होता था। चट्टानों में चूहों के बिल के समान छेद किए जाते थे और इनसे कोयला निकालकर, डलियों में भरकर मजदूरों द्वारा कोयला एकत्रित करने वाले स्थान पर ले जाया जाता था।
• बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 – कलपक्कम ( चेन्नई – तमिलनाडु) में निम्नलिखित में से क्या स्थापित है—
(अ) तेल शोधनशाला,
(ब) जलविद्युत शक्तिगृह,
(स) परमाणु ऊर्जा केन्द्र,
(द) तापविद्युत शक्तिगृह ।
उत्तर- (स) परमाणु ऊर्जा केन्द्र |
प्रश्न 2 – अंकलेश्वर में किसका उत्पादन होता है-
(अ) पेट्रोलियम,
(ब) कोयला,
(स) परमाणु ऊर्जा,
(द) जल विद्युत ।
उत्तर- (अ) पेट्रोलियम ।
प्रश्न 3 – भारत ने अपने परमाणु विस्फोट कहाँ किए थे-
(अ) ट्राम्बे में,
(ब) जोधपुर में,
(स) बीकानेर में,
(द) पोखरन में।
उत्तर- (द) पोखरन में।
प्रश्न 4 – कोटा परमाणु शक्ति केन्द्र कहाँ स्थित है-
(अ) गुजरात में,
(ब) राजस्थान में,
(स) हरियाणा में,
(द) उत्तराखण्ड में।
उत्तर – (ब) राजस्थान में।
प्रश्न 5 – कोयले के सबसे बड़े भण्डार कहाँ पाए जाते हैं-
(अ) सोन नदी की घाटी में,
(ब) महानदी की घाटी में,
(स) दामोदर नदी की घाटी में,
(द) छत्तीसगढ़ के मैदानों में।
उत्तर- (स) दामोदर नदी की घाटी में ।
प्रश्न 6 – पेट्रोलियम के बिना प्राकृतिक गैस के भण्डार कहाँ खोजे गए हैं-
(अ) तेलंगाना में,
(ब) तमिलनाडु में,
(स) उत्तर प्रदेश में,
(द) त्रिपुरा और राजस्थान में।
उत्तर – (द) त्रिपुरा और राजस्थान में।

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