UK 10th Social Science

UK Board 10th Class Social Science – (आपदा प्रबन्धन) – Chapter 3 आपदा के दौरान बचाव के उपाय

UK Board 10th Class Social Science – (आपदा प्रबन्धन) – Chapter 3 आपदा के दौरान बचाव के उपाय

UK Board Solutions for Class 10th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (आपदा प्रबन्धन) – Chapter 3 आपदा के दौरान बचाव के उपाय

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
• I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
प्रश्न 1 – पिछली किन्हीं दो आपदाओं से हमें क्या सीख मिली? उन आपदाओं के नाम लिखिए। 
उत्तर— गत आपदाओं के अध्ययन से हमें यह सीख मिलती है कि यद्यपि आपदाओं को रोकना मनुष्य के वश में नहीं है किन्तु विभिन्न प्रबन्धात्मक उपायों द्वारा आपदाओं से होने वाली क्षति को न्यूनतम किया जा सकता है। पिछली दो आपदाओं सुनामी और अग्निकाण्ड से होने वाली क्षति को प्रबन्धात्मक उपाय, राहत व बचाव कार्यों द्वारा न्यूनतम किया जा सकता था।
प्रश्न 2 – खोज तथा बचाव कार्यवाहियों में तैयारी का क्या महत्त्व होता है?
उत्तर- खोज एवं बचाव कार्यवाहियों की तैयारी का विशेष महत्त्व है। बिना तैयारी किए खोज एवं बचाव करने वाला व्यक्ति या दल तैयारी के अभाव में कार्य करने पर स्वयं किसी मुसीबत में फँस सकता है। खोज और बचाव कार्यवाही की तैयारी के अन्तर्गत खोज व बचाव दल का गठन, (जिसमें विभिन्न विषयों; जैसे— इन्जीनियर, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी, सुरक्षाकर्मी आदि सम्मिलित होते हैं) विभिन्न प्रकार के उपकरण तथा आपदा विशेष की पर्याप्त जानकारी और आपदा क्षेत्र का भौगोलिक ज्ञान आदि तथ्यों की पर्याप्त तैयारी आवश्यक होती है, तभी खोज व बचाव कार्य को दक्षता से सम्पन्न किया जा सकता है। की कि ही
प्रश्न 3 – खोज व बचाव कार्यवाहियों के दौरान तनाव नियन्त्रण क्यों आवश्यक है ?
उत्तर— खोज व बचाव कार्य में अत्यन्त धैर्य, सहनशीलता, साहस और सेवा एवं त्याग-भावना का विशेष महत्त्व है। इस कार्य में वही व्यक्ति सफल हो सकते हैं जिनमें उक्त गुणों का समावेश हो । यदि खोज व बचाव कार्यकर्त्ता कार्यवाहियों के दौरान विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाने पर तनाव ग्रस्त हो जाए या साहस व धैर्य खो दे तो इससे खोज व बचाव कार्य तो बाधित होगा ही वह कार्यकर्त्ता भी मुसीबत में फँस जाएगा। क्योंकि ऐसे अवसरों पर विषम परिस्थितियाँ अक्सर उत्पन्न हों जाती हैं जिसे कार्यकर्त्ता अपनी सूझ-बूझ साहस और उचित निर्णय क्षमता से काबू में कर सकते हैं। यह तभी सम्भव है जब कार्यकर्त्ता का तनाव पर नियन्त्रण हो।
प्रश्न 4 – मृतकों की छानबीन के दौरान देखें, सुनें और महसूस करने के मूल सिद्धान्तों का क्या अर्थ है ? 
उत्तर— खोज व बचाव कार्य के दौरान खतरे बहुत होते हैं। इसलिए कुछ आधारभूत सिद्धान्तों का पालन आवश्यक होता है। जैसे मृतकों की खोजबीन के दौरान देखें, सुनें और महसूस करने के सिद्धान्त पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि-
  1. मृतकों की खोज करने पर सावधानीपूर्वक घायल व मृतक व्यक्ति पहचान ही आवश्यक नहीं है बल्कि यह देखना भी आवश्यक नहीं है मृतक को निकालने पर कोई अन्य आपदा जैसे मलवा गिरना, मकान की दीवार गिरना आदि घटनाएँ तो नहीं हो सकती; अतः सावधानीपूर्वक देखकर मृतकों की छानबीन करनी चाहिए।
  2. इस दौरान व्यक्ति अत्यधिक घायल हो सकता है। उसकी आवाज बहुत धीमी हो सकती है; अतः ध्यान से उसकी आवाज ही नहीं अन्य आवाज को भी सुनकर राहत कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा करना चाहिए ।
  3. क्षति की सम्भावना और मृतकों की स्थिति, संख्या एवं अन्य परिस्थितियों को महसूस करना चाहिए और अन्यों को सूचित कर देना चाहिए।
प्रश्न 5–उत्तरजीवी कौशल के मूलभूत प्रस्ताव का वर्णन कीजिए।
उत्तर— उत्तरजीवी कौशल संकट का सामना करने तथा संकटग्रस्त जन-समुदाय को राहत एवं सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव है। इसका मूलभूत उद्देश्य प्रशिक्षित लोगों द्वारा आपदाग्रस्त क्षेत्रों में राहत एवं बचाव कार्य करना और स्थानीय समुदाय की सहायता करना है। यह प्रस्ताव विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों तथा राज्य एवं केन्द्र सरकार द्वारा तैयार किए गए सुरक्षा दलों द्वारा प्रदान किया जाता है।
प्रश्न 6–प्राथमिक सहायता के किसी एक नियम का वर्णन कीजिए।
उत्तर— किसी दुर्घटना के पश्चात् एक पीड़ित को किसी उपयुक्त डॉक्टरी सहायता मिलने से पहले, जो चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं उसे प्राथमिक सहायता कहते हैं। जो व्यक्ति प्राथमिक उपचार का कार्य करता है उसे सहायता करने का पूरा ज्ञान अवश्य होना चाहिए। इसलिए प्राथमिक सहायता का मुख्य नियम है कि देखिए, सुनिए और अनुभव द्वारा यह पता लगाइए कि पीड़ित को किस प्रकार राहत पहुँचाकर जीवन की सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। वास्तव में प्राथमिक सहायता का अर्थ इलाज करना नहीं वरन् इलाज प्राप्त होने तक पीड़ित को बचाए रखना है इसी नियम को ध्यान में रखना सहायता पहुँचाने वाले व्यक्ति के लिए आवश्यक होता है।
प्रश्न 7 – प्राथमिक चिकित्सा में DRABC से क्या तात्पर्य है?
उत्तर – प्राथमिक चिकित्सा योजना के संघटकों को अंग्रेजी में डीआरएबीसी कहते हैं। इसमें ‘डी’ का अर्थ है खतरों को देखना, ‘आर’ का अर्थ है अनुक्रिया ‘ए’ का अर्थ है पीड़ित के वायुमार्ग का निरीक्षण करना, ‘बी’ का अर्थ है साँस लेना अर्थात् साँस प्रक्रिया का निरीक्षण करना तथा ‘सी’ का अर्थ है वायु परिसंचरण किस प्रकार का है। इन डीआरएबीसी की व्याख्या इस प्रकार है-
डी (Danger) खतरे को देखना – अपने लिए, दूसरे के लिए पीड़ित के लिए।
आर (Response) अनुक्रिया – अर्थात् पीड़ित मूच्छित है या चेतना अवस्था में है।
ए (Airway) वायु मार्ग की जाँच – क्या पीड़ित के वायुमार्ग मुँह एवं नाक आदि में रुकावट तो नहीं है?
बी (Breathing) साँस लेना – अर्थात् आप पीड़ित के साँस लेने की आवाज सुन रहे हैं?
सी (Circulation) परिसंचरण – क्या पीड़ित में जीवन के स्पष्ट लक्षण प्रकट हो रहे हैं अर्थात् पीड़ित की नाडी चल रही है या नहीं?
उपर्युक्त संघटकों के आधार पर ही प्राथमिक चिकित्सा कार्य करना पीड़ित के हित में रहता है और इससे चिकित्सक को भी अपना कार्य करने में सहायता मिलती है।
प्रश्न 8― उपलब्ध वस्तुओं से स्ट्रैचर बनाने के तीन तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर— स्ट्रैचर बनाने की विधियाँ
प्राथमिक चिकित्सा के समय स्ट्रैचर अत्यन्त आवश्यक होता है यदि ऐसा स्ट्रैचर हमारे पास उपलब्ध न तो हमें अपनी बुद्धि का प्रयोग करके उपलब्ध माध्यमों से स्ट्रैचर बना लेना चाहिए। ऐसे स्ट्रैचर बनाने की तीन विधियाँ अग्रलिखित हैं-
  1. यदि दो व्यक्ति अपने दोनों हाथों से एक-दूसरे की कलाइयाँ पकड़ लें अर्थात् दाएँ हाथ से दूसरे की बाईं कलाई और बाएँ हाथ से दूसरे की दाईं कलाई, तो घायल व्यक्ति को उठाने का स्ट्रैचर तैयार हो जाता है।
  2. स्थानीय स्रोतों से स्ट्रैचर बनाने का दूसरा आसान तरीका यह है कि पहनने के ऊपरी वस्त्र; जैसे कमीज, कोट, जैकेट इत्यादि लें और उसके बटन, चैन आदि को बन्द करके बाजुओं में दो डंडे लिए जाएँ तो भी स्ट्रैचर तैयार किया जा सकता है।
  3. सीढ़ियों और रस्सी के प्रयोग से भी स्ट्रैचर तैयार हो जाता है। कोई बार अकेले रस्सियों को बुनकर भी स्ट्रैचर तैयार कर लिया जाता है।
प्रश्न 9 – यदि कोई व्यक्ति अचेत हो गया है तो क्या-क्या उपाय करने चाहिए?
उत्तर— अचेत व्यक्ति को सचेत अवस्था में लाने के लिए निम्नलिखित साधारण उपाय कारगर हो सकते हैं—
  1. अचेत व्यक्ति के कपड़ों को ढीला कर देना चाहिए यदि साँस लेने के मार्ग में कोई रुकावट हो तो उसे दूर करना चाहिए।
  2. होश में लाने के लिए व्यक्ति के सिर को ढाल की स्थिति में रखें और बाजुओं को समकोण की स्थिति में।
  3. जितना जल्दी हो सके बेहोश व्यक्ति को निकट के अस्पताल में पहुँचाने की व्यवस्था करनी चाहिए।
  4. बेहोश व्यक्ति को मुँह की तरफ से कुछ खाने-पीने को मत दीजिए तथा बेहोश व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।
  5. यदि सर्दी का मौसम हो तो मूर्च्छित व्यक्ति को गर्म कपड़ों से ढक देना चाहिए और यदि गर्मी का मौसम हो तब उसे खुली हवा देने की कोशिश करनी चाहिए।
  6. यदि बेहोश व्यक्ति के शरीर पर कोई चोट का घाव है तो उसकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।
प्रश्न 10– प्राथमिक सहायता के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर— किसी दुर्घटना के तुरन्त बाद किए गए ऐसे उपाय जिनके द्वारा पीड़ित की हालत और अधिक बिगड़ने से रोका जाए प्राथमिक चिकित्सा या सहायता कहलाती है। इस प्रकार की सहायता प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है—
(1) पीड़ित व्यक्ति की हालत को बिगड़ने से रोकना, (2) मूल्यवान जीवन की रक्षा आरम्भ करना, (3) स्वास्थ्य लाभ की प्रक्रिया आरम्भ करना, (4) प्राणरक्षा के लिए हवा, श्वास और रक्त संचरण की सामान्य स्थिति को प्राथमिकता देना, (5) आपदा उपशमन के उपायों का शीघ्र उपयोग करना।
प्रश्न 11 – जलने के प्रकारों का वर्णन कीजिए तथा यह भी बताइए कि उनका वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है? 
उत्तर- जलने के प्रकार
जलना निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है-
  1. त्वचा की ऊपरी सतह का जलना – इस अवस्था में त्वचा लाल और शुष्क हो जाती है तथा जले अंग में पीड़ा एवं सूजन भी हो सकती है।
  2. त्वचा की आंशिक गहरी परत का जलना – इस जलन में त्वचा की ऊपरी ओर आंशिक नीचे वाली परत प्रभावित होती है। यह जलन अधिक पीड़ादायक होती है क्योंकि इस अवस्था में फफोले बनकर फूट सकते हैं जो घाव में बदलकर लम्बे समय में ठीक होते हैं।
  3. त्वचा के साथ मांस और हड्डियों का जलना – इस अवस्था में दर्द अधिक होता है और मरीज को सँभालना कठिन हो जाता है।
जलने का वर्गीकरण – जलाने वाले कारणों; जैसे- बिजली से जलना, गर्म पानी या तेल से जलना, किसी प्रकार के अग्निकाण्ड से जलना आदि के आधार पर एवं जले हुए शरीर के आधार पर किया जाता है।
प्रश्न 12 – तापघात से पीड़ित व्यक्ति को तुरन्त राहत पहुँचाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
उत्तर – गर्मी के दिनों में, विशेषकर धूप में घूमने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है तथा शरीर का तापमान बढ़ने लगता है। इससे प्रभावित व्यक्ति मूच्छित हो जाता है। ऐसे प्रहार को तापघात या लू लगना कहते हैं।
तापघात का उपचार
  1. ऐसे व्यक्ति को तुरन्त ठण्डा पानी पिलाना चाहिए या कोई अन्य द्रव्य जो शरीर का तापमान कम करे उपयोग में लाना चाहिए।
  2. ऐसे व्यक्ति की गर्दन और कंधों के आस-पास बर्फ का प्रयोग किया जा सकता है।
  3. ऐसे व्यक्ति के कपड़ों को ढीला कर देना चाहिए ताकि उसे ठण्डी हवा लगे।
  4. ऐसे व्यक्ति में पानी की कमी हो जाने पर उसे नमक और चीनी का घोल पिलाना चाहिए।
  5. ऐसे व्यक्तियों को पंखे, एअर कंडीशनर या वृक्षों की छाया में बैठाया जा सकता है।

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