UK Board 10th Class Social Science – (भूगोल) – Chapter 6 निर्माण उद्योग
UK Board 10th Class Social Science – (भूगोल) – Chapter 6 निर्माण उद्योग
UK Board Solutions for Class 10th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (भूगोल) – Chapter 6 निर्माण उद्योग
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
1. बहुवैकल्पिक प्रश्न –
(i) निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग चूना पत्थर को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त करता है-
(क) ऐलुमिनियम
(ख) सीमेण्ट
(ग) प्लास्टिक
(घ) ‘मोटरगाड़ी।
उत्तर- (ख) सीमेण्ट ।
(ii) निम्नलिखित में कौन-सी एजेन्सी सार्वजनिक क्षेत्र में स्टील को बाजार में उपलब्ध कराती है-
(क) हेल (HAIL)
(ख) सेल (SAIL)
(ग) टाटा स्टील
(घ) एम एन सी सी (MNCC)
उत्तर- (ख) सेल (SAIL)।
(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग बॉक्साइट को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करता है-
(क) ऐलुमिनियम प्रगलन
(ख) सीमेण्ट
(ग) कागज़
(घ) स्टील
उत्तर- (क) ऐलुमिनियम प्रगलन ।
(iv) निम्नलिखित में कौन-सा उद्योग दूरभाष, कम्प्यूटर आदि संयन्त्र निर्मित करता है-
(क) स्टील
(ख) ऐलुमिनियम
(ग) इलेक्ट्रॉनिक
(घ) सूचना प्रौद्योगिकी |
उत्तर – (ग) इलेक्ट्रॉनिक ।
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए-
(i) विनिर्माण क्या है?
उत्तर- कच्चे पदार्थ को मूल्यवान उत्पाद में परिवर्तित कर अधिक मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन को विर्निर्माण या वस्तु निर्माण कहा जाता हैलकड़ी से कागज, गन्ने से चीनी, कपास से सूती वस्त्र तथा लौह अयस्क से लोहा इस्पात इसी प्रक्रिया के उदाहरण हैं।
(ii) उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले तीन भौतिक कारक बताएँ ।
उत्तर – उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले तीन भौतिक कारक अग्रलिखित हैं-
(1) कच्चे माल की उपलब्धता, (2) ऊर्जा के संसाधन, (3) जल की सुलभता ।
(iii) औद्योगिक अवस्थिति को प्रभावित करने वाले तीन मानवीय कारक बताएँ ।
उत्तर – (1) मानवीय श्रम की सुलभता औद्योगिक अवस्थिति को सकारात्मक रूप में प्रभावित करती है।
(2) मानव की क्रय शक्ति भी औद्योगिक अवस्थिति को अनुकूलता प्रदान करती है।
(3) कुशल श्रमिकों की उपलब्धता उद्योग की अवस्थिति का प्रभावशाली कारक है।
(iv) आधारभूत उद्योग क्या है? उदाहरण देकर बताएँ ।
उत्तर- ऐसे उद्योग जिन पर अन्य उद्योग निर्भर करते हैं, आधारभूत | उद्योग कहलाते हैं । आधारभूत उद्योग द्वारा उत्पादित माल अन्य उद्योगों के लिए कच्चे माल रूप में उपयोग किया जाता है। ऐसा भी सम्भव है कि दूसरे उद्योगों द्वारा निर्मित औद्योगिक माल किसी अन्य उद्योग के लिए कच्चा माल हो सकता है। उदाहरण के लिए — लोहा – इस्पात उद्योग सबसे बड़ा आधारभूत उद्योग है जिसके द्वारा उत्पादित इस्पात का उपयोग भारी मशीन उद्योग में विभिन्न प्रकार की मशीनों के निर्माण में कच्चे माल के रूप में | प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार पेट्रोरसायन एवं सीमेण्ट उद्योग अन्य आधारभूत उद्योगों के उदाहरण हैं।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए-
(i) समन्वित इस्पात उद्योग मिनी इस्पात उद्योगों से कैसे भिन्न है? इस उद्योग की क्या समस्याएँ हैं ? किन सुधारों के अन्तर्गत इसकी उत्पादन क्षमता बढ़ी है ?
उत्तर — समन्वित इस्पात संयन्त्र विशाल संयन्त्र होता है जिसमें कच्चे माल को एक स्थान पर एकत्रित करने से लेकर इस्पात बनाने, उसे ढालने और आकार देने की समस्त क्रियाएँ की जाती हैं। जबकि मिनी इस्पात उद्योग छोटे संयन्त्र हैं जिनमें विद्युत भट्ठी, रद्दी इस्पात व स्पंज आयरन का प्रयोग किया जाता है। से संयन्त्र हल्के स्टील या निर्धारित अनुपात के मृदु व मिश्रित इस्पात का उत्पादन करते हैं।
इस्पात उद्योग की समस्याएँ एवं सुधार के उपाय – 1950 दशक में भारत व चीन ने एक समान मात्रा में इस्पात उत्पादित किया था। आज चीन इस्पात का सबसे बड़ा उत्पादक है। इस्पातं की सर्वाधिक खपत भी चीन में होती है। भारत यद्यपि संसार का आज भी महत्त्वपूर्ण उत्पादक देश है तथापि हम इसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसके लिए निम्नलिखित समस्याएँ उत्तरदायी हैं—
(1) उच्च लागत तथा कोकिंग कोयले की सीमित उपलब्धता, (2) कम श्रमिक उत्पादकता, (3) ऊर्जा की अनियमित पूर्ति, तथा (4) अविकसित अवसंरचना आदि ।
निजी क्षेत्र में उद्यमियों के प्रयत्न से तथा उदारीकरण व प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने इस उद्योग को प्रोत्साहन दिया है। इस्पात उद्योग को अधिक स्पर्द्धावान बनाने के लिए हमें अनुसन्धान और विकास के संसाधनों को नियत करने की आवश्यकता है, इसके साथ ही हमें ऊर्जा की पूर्ति और अवसंरचना को भी विकसित करने की आवश्यकता है।
(ii) उद्योग पर्यावरण को कैसे प्रदूषित करते हैं?
उत्तर— औद्योगिक प्रदूषण
देश के आर्थिक विकास में निर्माण उद्योगों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। विभिन्न प्रकार के उद्योगों से, जिनकी संख्या समय के साथ-साथ बराबर बढ़ती जा रही है, निकले अवशिष्ट रासायनिक पदार्थ जल तथा वायुमण्डल को प्रदूषित कर रहे हैं। औद्योगिक अवशिष्ट पदार्थों के जल में मिलने से उसमें ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। क्लोराइड, नाइट्रेट, सल्फेट आदि की जल में वृद्धि हो जाती है। कल-कारखानों से निकले अवशिष्ट द्रव्य नदियों में डाले जाने के कारण देश की अधिकांश नदियों का जल प्रदूषित होता जा रहा है। इन पदार्थों का विषैला प्रभाव मछलियों व अन्य जल-जीवों और जलीय पौधों के लिए हानिकारक होता है। सीसा जस्ता, ताँबा एवं लोहे के यौगिक जल में मिलकर उसके प्रदूषण में वृद्धि कर रहे हैं। इस प्रकार उद्योगों ने प्रदूषण में वृद्धि की है और पर्यावरण का क्षरण किया है। उद्योगों ने चार प्रकार का प्रदूषण उत्पन्न किया है— (i) वायु प्रदूषण, (ii) जल प्रदूषण, (iii) भूमि प्रदूषण और (iv) ध्वनि प्रदूषण |
- वायु प्रदूषण – वायु प्रदूषण मुख्यतः गैसीय, ठोस तथा तरल प्रदूषकों द्वारा उत्पन्न होता है। उद्योगों से निकलने वाले धुएँ ने वायु अत्यधिक प्रदूषित किया है। वायु को प्रदूषित करने वाले ठोस एवं तरल दोनों ही प्रकार के पदार्थ होते हैं। धूल; धूम, कुहासा, धुआँ और धुन्ध में कार्बन मोनो ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड दोनों ही प्रकार के पदार्थ मिले होते हैं। मानव निर्मित प्रदूषक प्राय: औद्योगिक और ठोस अपशिष्ट होते हैं। वायु प्रदूषण जीव-जन्तुओं, पौधों, पदार्थों तथा वायुमण्डल को प्रभावित करता है।
- जल प्रदूषण – वह जल जिसमें अनेक प्रकार के खनिज, कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ एवं गैसें एक निश्चित अनुपात से अधिक मात्रा में घुल जाते हैं, प्रदूषित जल कहलाता है। विभिन्न प्रकार के औद्योगिक कल-कारखानों से निकलने वाले कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों के जल में विसर्जित किए जाने से जल की अंशुद्धता बढ़ जाती है। कोयले के धोवन तथा अन्य कच्चे माल की सफाई करने से स्वच्छ जल स्त्रोत भी प्रदूषित हो जाते हैं। सूती – ऊनी वस्त्र तथा जूट की धुलाई, चमड़े की सफाई एवं रँगाई, शराब, कागज व लुगदी निर्माण और तेलपरिष्करणशालाओं में बड़े पैमाने पर जल प्रदूषित हो जाता है। ये अशुद्धियाँ जल को प्रदूषित करने के साथ पर्यावरण को भी प्रदूषित कर देती हैं।
- भूमि प्रदूषण – यह सभी प्रकार के औद्योगिक उत्पाद — ठोस, द्रव या गैस के रूप में होता है । इनमें से बहुत से पदार्थ मिट्टी में मिलकर भूमि प्रदूषण करते हैं जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति का ह्रास होता है। इसके साथ ही उद्योगों से निकला विषाक्त धातुयुक्त कूड़ा-कचरा भूमि और मिट्टी को प्रदूषित करता है। रेडियोधर्मी पदार्थों और परमाणु परीक्षणों से भी भूमि प्रदूषित होती है।
- ध्वनि प्रदूषण – वास्तव में असहनीय ध्वनि को ही शोर कहा जाता है। शोर अनचाहा कोलाहल है। जब मशीन-जनित ध्वनि तीव्र, कर्कश एवं बेसुरी हो जाती है तो वही शोर प्रदूषण का रूप ले लेती है। वास्तव में शोर प्रदूषण आधुनिक मशीनी सभ्यता की देन है। कल कारखानों की मशीनों से होने वाली आवाज तथा परिवहन साधनों से होने वाली कर्कश आवाज ध्वनि प्रदूषण का प्रमुख कारण है।
(iii) उद्योगों द्वारा पर्यावरण निम्नीकरण को कम करने के लिए उठाए गए विभिन्न उपायों की चर्चा करें।
उत्तर- पर्यावरण के निम्नीकरण को नियन्त्रित करने के उपाय
पर्यावरण के निम्नीकरण को नियन्त्रित करने के उपाय निम्नलिखित हैं-
- उचित योजनाओं के क्रियान्वयन द्वारा प्रदूषण को रोका जा सकता है।
- उद्योगों का निर्धारित स्थानों पर स्थापन, उपकरणों की गुणवत्ता को बनाए रखकर तथा उनका सही परिसंचालन करके प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
- ईंधन के उचित चयन और उसका सही उपयोग वायु प्रदूषण को रोकने का प्रमुख साधन है। कोयले के स्थान पर तेल के उपयोग से धुआँ रोका जा सकता है। आधुनिक वैज्ञानिक युग में कई उपकरण पृथक्कारी छन्ना व स्क्रबर यन्त्र आदि के माध्यम से वायु में उत्सर्जित प्रदूषकों को रोका जा सकता है।
- उद्योगों द्वारा प्रदूषित जल को नदियों के जल में छोड़ने से पूर्व उपचारित कर प्रदूषण को नियन्त्रित किया जा सकता है।
- उद्योगों से निष्कासित द्रव को तीन स्तरों पर उपचारित किया जा सकता है—
- प्राथमिक उपचार में छँटाई, पिसाई, निथराई एवं गन्द को तली में बैठाने की क्रिया सम्मिलित है।
- द्वितीयक उपचार में जैविक विधियाँ सम्मिलित हैं।
- तृतीयक उपचार में भौतिक, रासायनिक एवं जैविक प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं अर्थात् प्रदूषित जल को पुनःचक्रीय क्रिया द्वारा प्रदूषण मुक्त किया जाता है।
- मृदा एवं भूमि प्रदूषण के नियन्त्रण में तीन क्रियाएँ सम्मिलित हैं—
- विभिन्न स्थानों से कूड़ा-कचरे की सफाई कर उसे एकत्र किया जाना ।
- भूमि भराव द्वारा कूड़े-कचरे का निपटान करना ।
- कूड़े-कचरे का पुनः चक्रण कर उसे उपयोगी बनाना ।
पर्यावरण निम्नीकरण को कम करने के लिए सुझाए गए उपर्युक्त उपायों को क्रियान्वित करने के लिए भारत सरकार द्वारा विभिन्न पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी कानून बनाए गए हैं और पर्यावरण मन्त्रालय व उच्चतम न्यायालय द्वारा दिशा निर्देश जारी किए गए हैं तथा इनको लागू कराने का प्रयास किया जाता है।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – भारत में कृषि पर आधारित प्रमुख उद्योगों के नाम लिखिए और इनका महत्त्व भी स्पष्ट कीजिए ।
अथवा कृषि का उद्योगों के लिए क्या महत्त्व है ? उदाहरण देकर महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – वस्त्र, चीनी, जूट, ऐल्कोहॉल तथा वनस्पति तेल आदि उद्योगों के लिए कच्चा माल कृषि से प्राप्त होता है। इसी कारण इन्हें कृषि आधारित उद्योग कहा जाता है। मानव की प्राथमिक आवश्यकताओं की आपूर्ति में इन उद्योगों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
कृषि का उद्योगों के लिए महत्त्व – भारत में कृषि का उद्योगों के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान है जिसे निम्नलिखित तथ्यों द्वारा समझा जा सकता है—
- कृषि से उद्योगों को कच्चे माल की प्राप्ति होती है; जैसे कपास (रुई), रेशम, पटसन एवं ऊनी वस्त्र उद्योग के लिए आधारभूत कच्चा माल है। कपास एवं पटसन जैसे कच्चे माल प्रत्यक्ष रूप से मृदा से प्राप्त होते हैं जबकि रेशम एवं ऊन परोक्ष रूप से कीटों एवं पशुओं से प्राप्त होती हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों से नगरों की ओर कार्यशील जनसंख्या का सतत पलायन होता है जिससे कृषि का अतिरिक्त श्रम उद्योगों को मानवीय श्रम की आपूर्ति करता है।
- कृषि हमारे औद्योगिक उत्पादन की एक बड़ी उपभोक्ता है, क्योंकि यह विभिन्न उद्योगों में उत्पादित कृषि यन्त्र व उपकरण तथा रासायनिक उर्वरकों के लिए उपभोक्ता बाजार की सुविधा प्रदान करती है। इस प्रकार इन यन्त्रों एवं उपकरणों के प्रयोग से कृषि उत्पादन यथेष्ट मात्रा में प्राप्त होता है।
- कृषि में आधुनिक एवं नवीन प्रौद्योगिकी अपनाने से कृषि यन्त्रों एवं उपस्करों तथा रासायनिक उर्वरकों की माँग में वृद्धि हो जाती है जिससे उद्योगों का विकास होता है। भारत में हरित क्रान्ति की सफलता में इन औद्योगिक उत्पादों का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।
अतः भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि पर आधारित उद्योगों की महत्ता को किसी भी प्रकार कम नहीं आँका जा सकता है।
प्रश्न 2 – भारत में उद्योगों की मुख्य समस्याएँ क्या हैं? सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के विस्तार का वर्णन कीजिए।
उत्तर— भारत में उद्योगों की प्रमुख समस्याएँ
भारत में उद्योगों की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं-
- प्रौद्योगिकी सुधार के लिए प्रेरणा का अभाव – भारतीय औद्योगिक तकनीक अभी भी पिछड़ी हुई अवस्था में है। भारतीय उद्यमी नवीनतम तकनीक एवं प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित नहीं हो पाते। उनमें इच्छा-शक्ति का अभाव पाया जाता है। नवीन प्रौद्योगिकी को अपनानें के प्रति वे सशंकित रहते हैं। इसका प्रमुख कारण उनमें प्राचीन प्रबन्धन का पाया जाना है।
- स्थापित क्षमता का पूर्ण उपयोग न हो पाना – अधिकांश उद्योग अपनी उत्पादन क्षमता के 50% भाग का भी उपयोग नहीं कर पाते हैं जिससे उनका अपव्यय बढ़ जाता है और उत्पादन लागत अधिक आती है। इस प्रकार उत्पादित माल अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में ठहर नहीं पाता है।
- पूँजीगत व्यय में वृद्धि – भारतीय उद्योगों में पूँजीगत व्यय अधिक ऊँचे हैं जिस कारण इन उद्योगों को लाभ का स्तर प्राप्त नहीं हो पाता है।
- अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रमों का अभाव – उद्योगों का आकार छोटा होने और वित्तीय सुविधाओं की कमी के कारण इन उद्योगों में अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रम लागू नहीं हो पाते हैं, फलस्वरूप उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इन उद्योगों में परम्परागत माल का ही उत्पादन होता है, जबकि अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा और वैश्विक युग में इन्हें गुणवत्तापूर्ण वस्तुओं का ही उत्पादन करना चाहिए।
- अनुत्पादक व्ययों की अधिकता – भारतीय उद्योगों में अनुत्पादक व्यय सामान्य से अधिक रहते हैं, जिसका प्रभाव उत्पादन लागत में वृद्धि और उत्पादकता में कमी के रूप में पड़ा है।
- उपक्रमों के निर्माण में देरी-देश में उद्योग-धन्धों के स्थापन में निर्धारित समय से अधिक समय लगता है। इससे इन उद्योगों की कार्यकुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और देरी के कारण इनकी निर्माण लागत में भी वृद्धि हो जाती है। यह स्थिति सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में अधिक दिखाई पड़ती है।
- वित्तीय सुविधाओं की अपर्याप्तता – भारत में औद्योगिक बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों की पर्याप्त संख्या में स्थापना नहीं हो पायी है जिससे उद्योगों को समय पर वित्तीय सहायता नहीं मिल पाती है। इससे उद्योगों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- श्रम-प्रबन्धन संघर्ष – भारत में औद्योगिक प्रबन्धन एवं श्रमिकों के बीच सम्बन्ध मधुर नहीं रहे हैं। इसका परिणाम हड़ताल, तालाबन्दी के रूप में सामने आता है जिस कारण औद्योगिक उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग
सूचना प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के अन्तर्गत ट्रांजिस्टर से लेकर टेलीविजन सेट तक विभिन्न प्रकार के उत्पाद व्यापक रूप से तैयार किए जाते हैं। टेलीफोन एक्सचेंज, सैल्यूलर फोन, कम्प्यूटर, डाकघरों व तारघरों में प्रयुक्त होने वाले सभी उपकरण इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की देन हैं। रक्षा, रेल, वायुयान, अन्तरिक्ष उड़ान और मौसम विभागों में प्रयुक्त उपकरणों के निर्माण का दायित्व भी इसी उद्योग का है। इस उद्योग ने आम लोगों के जीवन, देश के आर्थिक स्वरूप और लोगों की जीवन गुणवत्ता में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है। इलेक्ट्रॉनिक के क्षेत्र में ट्राम्बे ने विकसित उत्पादों और जानकारी के फलस्वरूप सन् 1967 में हैदराबाद में इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड (ECIL) का गठन किया गया। कम्पनी ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्प्यूटर क्रान्ति की पहल की। सन् 1970 और 1980 के दशकों में ई०सी०आई०एल० ने देश में स्वदेशी श्याम – श्वेत और रंगीन टेलीविजन सेट उतारकर और ग्रामीण पुनः प्रसारण प्रणालियाँ विकसित कर देश में टेलीविजन क्रान्ति ला दी। इस निगम द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर से बैंकिंग क्षेत्र तथा पुलिस के लिए डॉयल-100 के स्वचालन व नियन्त्रण कक्ष में सहायता मिली। रक्षा एवं दूरसंचार क्षेत्रों की सन्देश स्विचिंग प्रणालियों, पत्तनों, नगर निगमों और बाजारों व अन्य क्षेत्रों की सूचना प्रबन्ध प्रणालियों में भी सहायता मिली। कम्पनी ने देश भर में एस०पी०सी० टेलेक्स नेटवर्क, सन्देश स्विचिंग नेटवर्क और टेलीविजन एक्सचेंजों के रख-रखाव की प्रणालियाँ उपलब्ध कराई हैं।
कम्प्यूटर उद्योग, हार्डवेयर के रूप में सन् 1990 के दशक में प्रारम्भ हुआ । हार्डवेयर के अतिरिक्त देश ने सॉफ्टवेयर के विकास में बहुत ही ख्याति अर्जित की है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था का तेजी से विकसित होने वाला क्षेत्र है। हाल ही के वर्षों में श्रव्य तन्त्र के उत्पादन में असाधारण वृद्धि दर्ज की गई है। भारतीय इलेक्ट्रॉनिक उद्योग ने अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी विकास में भी विशेष योगदान दिया है। इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की राजधानी के रूप में बंगलुरु विकसित हो गया है। हैदराबाद, दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ एवं कोयम्बटूर इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के प्रमुख उत्पादक केन्द्र हैं।
प्रश्न 3 – महाराष्ट्र और गुजरात में सूती वस्त्र उद्योग के केन्द्रीकरण के प्रमुख कारणों को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर- महाराष्ट्र और गुजरात में सूती वस्त्र उद्योग का केन्द्रीकरण
भारत में सूती वस्त्र उद्योग का सर्वाधिक विकास महाराष्ट्र एवं गुजरात राज्यों में हुआ है। मुम्बई और अहमदाबाद महानगर सूती वस्त्र उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। महाराष्ट्र के सूती वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा एवं प्रमुख केन्द्र मुम्बई है। इसे ‘सूती वस्त्रों की राजधानी’ कहा जाता है। इसी प्रकार अहमदाबाद गुजरात राज्य में सूती वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा एवं प्रमुख केन्द्र है। इसे ‘भारत का मानचेस्टर’ तथा ‘पूर्व का बोस्टन’ कहा जाता है। इन दोनों राज्यों में सूती वस्त्र उद्योग के केन्द्रीकरण के निम्नलिखित कारण उत्तरदायी रहे हैं-

- पर्याप्त कपास का उत्पादन – महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों की लावायुक्त काली मिट्टी में कपास का पर्याप्त उत्पादन किया जाता है। यहाँ उत्पादित कपास का एकत्रण मुम्बई एवं अहमदाबाद महानगरों में किया जाता है। इसके अतिरिक्त लम्बे रेशे वाली कपास का मिस्र, सूडान एवं ब्राजील आदि देशों से मुम्बई तथा काण्डला पत्तनों द्वारा आयात कर लिया जाता है।
- आर्द्र जलवायु – सागर की निकटता के कारण इन दोनों ही राज्यों की जलवायु आर्द्र है। इस जलवायु की विशेषता है कि इसमें कताई एवं बुनाई के समय धागा नहीं टूटता है।
- पत्तन की सुविधा – मुम्बई तथा काण्डला पत्तनों से सूती वस्त्र उद्योग हेतु मशीनें, कल-पुर्जे, रासायनिक पदार्थ, कपास तथा अन्य आवश्यक पदार्थों का विदेशों से आयात करने की सुविधा रहती है तथा निर्मित वस्त्रों के निर्यात करने की सुविधा भी उपलब्ध है।
- ऊर्जा के पर्याप्त साधन – पश्चिमी घाट क्षेत्र में जलविद्युत शक्ति का पर्याप्त विकास किया गया है। अतः इन केन्द्रों के सूती वस्त्र कारखानों को सस्ती दर पर जलविद्युत शक्ति सरलता से सुलभ हो जाती है।
- पर्याप्त पूँजी – महाराष्ट्र तथा गुजरात राज्यों में मारवाड़ी पूँजीपति निवास करते हैं जो बहुत ही धनाढ्य हैं; अतः यहाँ पूँजीपतियों ने धन कमाने के उद्देश्य से पर्याप्त पूँजी लगाकर सूती वस्त्र मिलों की स्थापना की है।
- बाजार की सुविधा – यहाँ उत्पादित सूती वस्त्रों का उपभोक्ता बाजार बड़ा ही विस्तृत है। वर्तमान में सिले- सिलाए परिधानों (Readymade Garments) के निर्यात का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है।
- सस्ते एवं कुशल श्रमिक – मुम्बई तथा अहमदाबाद महानगरों के पृष्ठप्रदेशों की सघन जनसंख्या सूती वस्त्र मिलों में कार्य करने के लिए परम्परागत सस्ते और कुशल श्रमिक उपलब्ध कराती है।
सूती वस्त्र उद्योग की समस्याएँ
भारत में सूती वस्त्र उद्योग को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। राष्ट्रीय वस्त्र निगम (N. T.C.) की अधिकांश मिलें बन्द हो चुकी हैं और श्रमिक समस्याओं के कारण निजी क्षेत्र की भी अनेक मिलें बन्द हो चुकी हैं। दूसरी ओर कपास के स्थानापन्न रेशों (कृत्रिम धागों) से निर्मित वस्त्रों ने भी इस उद्योग को प्रभावित किया है जिससे सूती वस्त्र मिलों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। संक्षेप में इन समस्याओं का विवरण निम्नलिखित है—
- अधिकांश सूती मिलों की मशीनें पुरानी होने के कारण घिस चुकी हैं। फलस्वरूप उनकी उत्पादकता कम हो गई है।
- अधिकांश मिलें पूँजी के अभाव से ग्रसित हैं जिस कारण मिलों का आधुनिकीकरण नहीं किया जा सका है।
- मानव निर्मित रेशे (कृत्रिम रेशा ) से बने वस्त्रों की माँग बढ़ने से सूती वस्त्रों की माँग लगातार घटती जा रही है।
- श्रमिक आन्दोलनों के कारण मिलों की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है।
- देश में विद्युत उत्पादन में होने वाले उतार-चढ़ाव के कारण मिलों को सतत रूप में शक्ति उपलब्ध नहीं हो पाती है जिस कारण मिलों को बन्द करने तक की स्थिति आ जाती है।
- सूती मिलों को पर्याप्त कपास उपलब्ध नहीं हो पाता है और उन्हें आयातित कपास पर निर्भर रहना पड़ता है जिस कारण मिलों के उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
प्रश्न 4 – चीनी उद्योग का क्या महत्त्व है? भारत में चीनी उद्योग के संचरण की प्रवृत्ति दक्षिणी राज्यों की ओर क्यों दिखाई पड़ती है?
उत्तर- चीनी उद्योग का महत्त्व
कृषि आधारित उद्योगों में चीनी उद्योग का भारत में दूसरा स्थान है। गन्ना चीनी उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। यदि खाण्डसारी एवं चीनी उत्पादन को संयुक्त रूप से लें तो भारत का विश्व के चीनी उत्पादन में प्रथम स्थान है। यद्यपि भारत में गुड़ खाण्डसारी निर्माण का कार्य प्राचीन काल से ही होता चला आ रहा है, परन्तु आधुनिक चीनी उद्योग की स्थापना बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक से आरम्भ हुई।
भारत में सघन जनसंख्या के कारण चीनी की माँग अधिक रहती है। गन्ने से किसानों को नकद लाभकारी मूल्य प्राप्त होता है। इसी कारण गन्ने की कृषि के प्रति उनका लगाव अधिक रहता है। भारत में चीनी उद्योग के स्थापन में निम्नलिखित भौगोलिक कारकों का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है—
(1) कच्चे माल के रूप में पर्याप्त गन्ने का उत्पादन,
(2) अनुकूल जलवायु,
(3) शक्ति संसाधनों की उपलब्धता,
(4) सस्ते एवं कुशल श्रमिक की बहुलता,

(5) सस्ते परिवहन साधनों की सुलभता,
(6) देश में चीनी की भारी माँग,
(7) पर्याप्त पूँजी की उपलब्धता,
(8) लाभप्रद व्यवसाय,
(9) मशीनों की सुलभता, तथा
(10) सरकार की उदार औद्योगिक नीति ।
दक्षिण भारत की ओर चीनी उद्योग के संचरण की प्रवृत्ति
भारत में अनेक राज्य चीनी का उत्पादन करते हैं, परन्तु इस उद्योग का सबसे पहले विकास उत्तरी भारत में हुआ था। उत्तरी भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान राज्यों का चीनी उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उत्तर प्रदेश अग्रणी राज्य है जिसका देश के चीनी उत्पादन में दूसरा स्थान है जबकि 2000 ई० से पूर्व इस राज्य का प्रथम स्थान था। उत्तरी भारत में गन्ना पिराई नवम्बर से मार्च तक चलती है जबकि दक्षिणी भारत में गन्ना पिराई अक्टूबर से जून तक की जाती है। इसलिए दक्षिणी भारत में चीनी उत्पादन व्यय कम होने के कारण चीनी मिलों की संख्या में भी वृद्धि होती जा रही है। आज महाराष्ट्र राज्य का देश के चीनी उत्पादन में प्रथम स्थान हो गया है ( 134 मिलें ) । यह राज्य देश की एक-तिहाई से भी अधिक चीनी का उत्पादन करता है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश एवं केरल अन्य प्रमुख चीनी उत्पादक राज्य हैं।
चीनी उद्योग के दक्षिणी भारत की ओर गमन की प्रवृत्ति के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी रहे हैं-
- दक्षिणी भारत में आर्द्रता-प्रधान जलवायु पायी जाती है जिस कारण वहाँ गन्ने की पेराई, 6 से 8 महीने तक होती है जबकि उत्तरी भारत में गन्ने की पेराई का समय 4 से 6 महीने का ही होता है। यही कारण है कि उत्तरी भारत की अपेक्षा दक्षिणी भारत में चीनी की उत्पादन लागत कम आती है।
- दक्षिणी भारत की चीनी मिलों में गन्ने की पेराई के उपरान्त शेष समय तिलहनों की पेराई की जाती है जबकि उत्तरी भारत की चीनी मिलों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। अतः दक्षिणी भारत की चीनी मिलों में श्रमिकों को बेरोजगारी जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है। वर्ष भर मिलें चलने के कारण चीनी की उत्पादन लागत भी कम आती है।
- उत्तरी भारत में गन्ने से रस की मात्रा 10% प्राप्त होती है और मिठास की मात्रा भी कम होती है। दक्षिणी भारत में गन्ने से रस की मात्रा 12% तक प्राप्त होती है और गन्ने में मिठास की मात्रा भी अधिक होती है। इससे गन्ना उत्पादकों तथा उद्यमियों, दोनों को ही लाभ मिलता है।
- दक्षिणी भारत की काली मिट्टी गन्ना उत्पादन के लिए उत्तरी भारत की जलोढ़ मिट्टी की भाँति ही उपजाऊ है। अतः चीनी मिलों को पर्याप्त मात्रा में कच्चे माल के रूप में गन्ने की प्राप्ति हो जाती है।
प्रश्न 5 – स्पष्ट कीजिए कि कृषि और उद्योग किस प्रकार साथ-साथ बढ़ रहे हैं?
अथवा उद्योगों के विकास में कृषि के योगदान को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – वास्तव में कृषि और उद्योग एक साथ बढ़ रहे हैं जिसे निम्नलिखित तथ्यों द्वारा समझा जा सकता है—
- भारत एक कृषिप्रधान देश है। अर्थव्यवस्था का लगभग 25% भाग कृषि क्षेत्र से प्राप्त होता है, औद्योगिक विकास में गति के कारण ही कृषि का विकास भी तेजी से हुआ है।
- कृषि एवं उद्योग एक-दूसरे के पूरक हैं तथा विभिन्न उद्योगों को कच्चे माल की आपूर्ति कृषि उपजों से ही की जाती है, जबकि औद्योगिक क्षेत्र कृषि को अनेक उपस्कर एवं यन्त्रादि उपलब्ध कराता है।
- कृषि ने उद्योगों को सुदृढ़ आधारशिला रखने योग्य बनाया है तो बदले में उद्योगों ने भी कृषि उपजों के उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि की है और हरित क्रान्ति को सफल बनाया है।
- देश में उत्पादित कृषिकृत कच्चे माल ने उद्योग-धन्धों की सुदृढ़ आधारशिला रखी है तथापि उद्योगों ने भी तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।
- वर्तमान में कृषि में उर्वरकों, विभिन्न रसायनों एवं कीटनाशकों, विद्युत और डीजल का उपयोग निरन्तर वृद्धि की ओर अग्रसर है और कृषि की अनेक शाखाओं को उद्योगों का नाम दिया जाने लगा है। रोपण उद्योग, डेयरी उद्योग व अधिक उपज देने वाले बीजों का उद्योग आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- जैव प्रौद्योगिकी के तीव्र विकास के बाद कृषि तथा उद्योगों के बीच विभाजन रेखा खींचना बड़ा ही दुष्कर कार्य है। वास्तव में, दोनों का विकास साथ- साथ ही हो रहा है।
- उद्योग तथा कल-कारखानों द्वारा कृषिकृत कच्चे माल का उपयोग किया जाता है जिससे कृषि का व्यापारीकरण हो गया है और उसमें व्यापारिक फसलों का उत्पादन अधिक किया जाने लगा है।
प्रश्न 6 – उद्योगों में हमारी प्राथमिकता क्या है- आत्मनिर्भरता या उच्च कोटि की कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्द्धा ?
उत्तर- औद्योगीकरण के आरम्भिक चरण में हमारी प्राथमिकता आत्मनिर्भरता मानी जाती थी, क्योंकि उस समय ऐसा होना स्वाभाविक था। सर्वप्रथम हमें अपनी स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही औद्योगिक विकास करना था, परन्तु अब उद्योगों की विभिन्न शाखाओं में विशिष्टीकरण की प्रवृत्तियाँ निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। अतः उद्योगों की आत्मनिर्भरता को छोड़कर हमें उच्च कोटि की दक्षता या कार्य-कुशलता अथवा कौशल और प्रतिस्पर्द्धा की दिशा में अपने कदम बढ़ाने होंगे।
हमें अपने उद्योगों तथा उनमें निर्मित उत्पादों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का करना होगा, जिससे हम अन्य देशों से प्रतिस्पर्द्धा कर सकें। हमारे उद्योगों द्वारा उत्पादित माल की गुणवत्ता यदि अधिक होगी, तभी हम विदेशी मुद्रा अर्जित कर सकते हैं तथा राष्ट्रीय सम्पदा में भी वृद्धि कर सकते हैं। आज अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इतनी प्रतिस्पर्द्धा है कि बाजार में वही उत्पाद अपनी धाक जमा सकते हैं जो गुणवत्ता की दृष्टि से उत्तम हो तथा अन्य देशों के उत्पादों से मूल्य में भी सस्ते हों। हम जापान का उदाहरण ले सकते हैं। यद्यपि कच्चे माल के रूप में जापान में लौह-अयस्क का उत्पादन नहीं होता है, परन्तु फिर भी जापान के लोहा – इस्पात उद्योग की विश्व बाजार में धाक है। इसी प्रकार के प्रयास भारत में भी किए जाने आवश्यक हैं। आधुनिक समय में उद्योगों की प्राथमिकता दक्षता, कौशल, कार्यकुशलता तथा प्रतिस्पर्द्धा की ही होनी चाहिए ।
प्रश्न 7 – भारत में लोहा-इस्पात उद्योग छोटा – नागपुर पठार के आस-पास क्यों केन्द्रित हो गया है? दो प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर — लोहा-इस्पात उद्योग गणना भारत के प्रमुख भारी उद्योगों में की जाती है। भारत में यह उद्योग मुख्यतः छोटा नागपुर पठार के आस-पास अधिक केन्द्रित है। इसके दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
- छोटा नागपुर का पठार भारत के खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों से सम्पन्न क्षेत्र है। यहाँ भारत की प्रमुख लौह अयस्क एवं कोयला खानें स्थित हैं। इनसे लौह-इस्पात के लिए कच्चा माल और शक्ति संसाधन के रूप में कोयला सन्निकट ही प्राप्त हो जाते हैं। इसके साथ ही लोहा-इस्पात उद्योग में प्रयुक्त अधात्विक खनिज मैंगनीज, डोलोमाइट एवं चूना पत्थर आदि पदार्थ छोटानागपुर पठार के निकटवर्ती भागों में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
- छोटा नागपुर पठार के निकट ही भारत की कई प्रसिद्ध जलविद्युत परियोजनाएँ स्थित हैं जिनसे लोहा – इस्पात उद्योग के लिए सस्ती जलविद्युत और पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ जल की आपूर्ति हो जाती है। दामोदर नदी घाटी परियोजना इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके अतिरिक्त यह क्षेत्र देश के समस्त भागों से रेल, सड़क एवं जल परिवहन से सम्बद्ध है, जो किसी भी उद्योग के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। इसी कारण भारत में लोहा – इस्पात उद्योग का केन्द्रीकरण छोटा नागपुर पठार के समीपवर्ती भागों में हो गया है।
प्रश्न 8 – भारत में ऐलुमिनियम उद्योग के वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर – ऐलुमिनियम भारत का दूसरा महत्त्वपूर्ण धातु उद्योग है। ऐलुमिनियम में लचीलापन होता है तथा यह विद्युत व ऊष्मा की सुचालक होती है। विश्व भर में अनेक उद्योगों के लिए ऐलुमिनियम एक सर्वमान्य धातु है। इसकी लोकप्रियता इसलिए भी बढ़ रही है, क्योंकि यह कई उद्योगों में इस्पात, ताँबा, जस्ता एवं सीसा के विकल्प के रूप में प्रयोग होने लगी है। यह बॉक्साइट धातु से प्राप्त होती है। एक टन ऐलुमिनियम प्राप्त करने के लिए 6 टन बॉक्साइट और 18,600 किलोवाट विद्युत की आवश्यकता होती है। ऐलुमिनियम उत्पादन में 30 से 40% लागत विद्युत शक्ति की होती है। इससे स्पष्ट होता है कि ऐलुमिनियम उद्योग की स्थिति बॉक्साइट और सस्ती जलविद्युत शक्ति की उपलब्धता से पूर्ण रूप से प्रभावित होती है। आज देश में 8 ऐलुमिनियम संयन्त्र हैं, जो ओडिशा, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु में स्थित हैं। सभी संयन्त्र मिलकर 6.2 लाख टन ऐलुमिनियम का वार्षिक उत्पादन करते हैं। भारत में दो कम्पनी प्रमुख रूप से ऐलुमिनियम उत्पादन में लगी हैं-
- नेशनल ऐलुमिनियम कम्पनी लिमिटेड ( नालको ) नालको ओडिशा में स्थित है जो भारत का सबसे बड़ा ऐलुमिनियम संयन्त्र परिसर है। इस कम्पनी की स्थापना 1981 में की गई थी और इसका पंजीकृत कार्यालय भुवनेश्वर में है।
- भारत ऐलुमिनियम कम्पनी लिमिटेड (बालको) – बालको को 1965 में सार्वजनिक क्षेत्र के प्राथमिक ऐलुमिनियम उत्पाद उपक्रम के रूप में सम्मिलित किया गया। कम्पनी छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में कोरबा ऐलुमिनियम कॉम्पलेक्स तथा पश्चिम बंगाल के आसनसोल विधानबाग इकाई का संचालन कर रही है। कोरबा ऐलुमिनियम कॉम्पलेक्स में प्रति वर्ष 2 लाख टन ऐलुमिनियम और 1 लाख टन बिक्री योग्य ऐलुमिनियम धातु के उत्पादन की सुविधाएँ हैं ।
प्रश्न 9 – विनिर्माण उद्योग को आर्थिक विकास की रीढ़ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर – कच्चे माल को अधिक मात्रा में मूल्यवान वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया को वस्तु निर्माण या विनिर्माण कहा जाता है।
विनिर्माण उद्योग को आर्थिक विकास की रीढ़ निम्नलिखित कारणों से कहा जाता है—
- विनिर्माण उद्योग किसी देश की अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
- विनिर्माण उद्योगों के द्वारा लोगों के दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुओं का निर्माण किया जाता है और उद्योग लोगों की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
- विनिर्माण उद्योगों के द्वारा निर्मित वस्तुएँ देश-विदेश में बेचकर विदेशी मुद्रा कमाई जा सकती है, जिससे राष्ट्रीय धन में वृद्धि होती है।
प्रश्न 10 – भारत में इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के विकास पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर- इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के अन्तर्गत ट्रांजिस्टर से लेकर टेलीविजन सेट तक विभिन्न प्रकार के उत्पाद व्यापक रूप तैयार किए जाते हैं। टेलीफोन एक्सचेंज, सैल्यूलर फोन, कम्प्यूटर, डाकघरों व तारघरों में प्रयुक्त होने वाले सभी उपकरण इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की देन हैं। रक्षा, रेल, वायुयान, अन्तरिक्ष उड़ान और मौसम विभागों में प्रयुक्त उपकरणों के निर्माण का दायित्व भी इसी उद्योग का है। इस उद्योग में आम लोगों के जीवन, देश के आर्थिक स्वरूप और लोगों की जीवन गुणवत्ता में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है। इलेक्ट्रॉनिक के क्षेत्र में ट्राम्बे में विकसित उत्पादों और जानकारी के फलस्वरूप 1967 ई० में हैदराबाद में इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड (ECIL) का गठन किया गया। कम्पनी ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्प्यूटर क्रान्ति की पहल की। सन् 1970 और 1980 के दशकों में ई०सी०आई०एल० ने देश में स्वदेशी श्याम श्वेत और रंगीन टेलीविजन सेट उतारकर और ग्रामीण पुनःप्रसारण प्रणालियाँ विकसित कर देश में टेलीविजन क्रान्ति ला दी। इस निगम द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर से बैंकिंग क्षेत्र तथा पुलिस के लिए डॉयल 100 के स्वचालन व नियन्त्रण कक्ष में सहायता मिली। रक्षा एवं दूरसंचार क्षेत्रों की संदेश स्विचिंग प्रणालियों, पत्तनों, नगर निगमों और बाजारों व अन्य क्षेत्रों की सूचना प्रबन्धन प्रणालियों में भी सहायता मिली। कम्पनी ने देश भर में एस०पी०सी० टेलेक्स नेटवर्क, संदेश स्विचिंग नेटवर्क और टेलीविजन एक्सचेंजों के रख-रखाव की प्रणालियाँ उपलब्ध कराई हैं।

कम्प्यूटर उद्योग, हार्डवेयर के रूप में 1990 ई० के दशक में प्रारम्भ हुआ। हार्डवेयर के अतिरिक्त देश ने सॉफ्टवेयर के विकास में बहुत ही ख्याति अर्जित की है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था का तेजी से विकसित होने वाला क्षेत्र है। हाल ही के वर्षों में श्रव्य उपकरण तन्त्र के उत्पादन में असाधारण वृद्धि दर्ज की गई है। भारतीय इलेक्ट्रॉनिक उद्योग ने अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास में भी विशेष योगदान दिया है। इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की राजधानी के रूप में बंगलुरु विकसित हो गया है। हैदराबाद, दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ एवं कोयम्बटूर इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के प्रमुख उत्पादक केन्द्र हैं।
● लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – पेट्रो रसायन और रसायन उद्योग में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर- पेट्रो रसायन और रसायन उद्योग में अन्तर
| पेट्रो रसायन उद्योग | रसायन उद्योग |
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प्रश्न 2 – इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (इस्को) के स्थानीकरण में सहायक कारक बताइए।
उत्तर- इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (इस्को), बर्नपुर, कुल्टी एवं हीरापुर (पश्चिम बंगाल) का स्थानीकरण
- दामोदर घाटी निगम से सस्ती दर पर जलविद्युत शक्ति की प्राप्ति ।
- उड़ीसा की गंगपुर खानों से चूना पत्थर की प्राप्ति ।
- सिंहभूम की खानों से लौह-अयस्क की उपलब्धता।
- दामोदर नदी घाटी परियोजना से स्वच्छ जल की सुविधा।
- दक्षिण-पूर्वी रेलमार्ग से परिवहन की सुविधा ।
- समीप में ही चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स तथा बर्नपुर स्थित इण्डियन स्टैण्डर्ड वैगन उद्योग में इस्पात की भारी माँग ।
प्रश्न 3 – हुगली नदी के किनारे (पश्चिम बंगाल ) कागज कारखाने अधिक स्थापित होने के क्या कारण हैं?
उत्तर – पश्चिम बंगाल राज्य में हुगली नदी के किनारे कागज के अनेक कारखाने स्थापित हुए हैं। यहाँ इस उद्योग की स्थापना के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी रहे हैं—
- पश्चिम बंगाल तथा उसके समीपवर्ती राज्यों-असम, बिहार एवं मध्य प्रदेश में बाँस एवं घास पर्याप्त मात्रा में उगती है, जो कागज उद्योग हेतु प्रमुख कच्चा माल है। यहाँ कागज उद्योग में स्थानीय स्तर पर उत्पादित बाँस का उपयोग भी कच्चे माल के रूप में किया जाता है।
- कागज उद्योग में स्वच्छ जल की अधिकतम आवश्यकता होती है। हुगली नदी के सदावाहिनी होने के कारण यहाँ पर्याप्त जल उपलब्ध हो जाता है।
- कागज उद्योग में चालक शक्ति के रूप में जलविद्युत शक्ति अथवा कोयले से प्राप्त ताप-शक्ति की आवश्यकता होती है। ये दोनों शक्ति-संसाधन पश्चिम बंगाल राज्य में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।
- पश्चिम बंगाल तथा समीपवर्ती राज्यों में जनाधिक्य के कारण पर्याप्त संख्या में कुशल एवं अनुभवी श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।
प्रश्न 4 – भारत में इंजीनियरिंग उद्योगों में महत्त्व एवं विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर— एक समय था, जब हम उद्योगों में निर्मित सभी वस्तुओं के लिए विदेशों पर आश्रित थे, परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् हमने देश में ही अनेक वस्तुओं का निर्माण करना प्रारम्भ कर दिया। आज हम वस्त्र, चीनी, कागज, चाय, सीमेण्ट, खनन तथा पेट्रो रसायन उद्योगों के लिए सभी प्रकार की मशीनों का निर्माण करने लगे हैं। इसके साथ ही विश्व के अनेक देशों में हम अनेक परियोजनाएँ पूरी कर चुके हैं। झारखण्ड में राँची स्थित हैवी इंजीनियरिंग कारखाना लोहे एवं इस्पात के कारखानों के लिए डिजाइन तथा विशालकाय मशीनों का निर्माण कर रहा है। आज देश विविध प्रकार के इंजीनियरिंग के सामान का विदेशों को निर्यात कर रहा है। हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के कारखाने देश के अनेक भागों में विकसित हैं। इन कारखानों में बंगलुरु (कर्नाटक) एवं पिंजौर (हरियाणा) के कारखाने बहुत ही प्रसिद्ध हैं। इनमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न प्रकार की मशीनें तथा सूक्ष्म वैज्ञानिक उपस्करों का निर्माण किया जाता है।
हल्के इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्माण अग्रणी स्थान बनाए हुए है। भारत ने अनेक देशों में औद्योगिक एस्टेट की भारत विकासशील देशों में स्थापना इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए की है।
प्रश्न 5 – प्राथमिक एवं गौण व्यवसाय में क्या अन्तर है?
उत्तर — प्राथमिक व्यवसाय — वे व्यवसाय, जिनसे मानव की प्राथमिक आवश्यकताओं — भोजन, वस्त्र एवं आवास की आपूर्ति होती है, प्राथमिक व्यवसाय कहलाते हैं। कृषि, खाद्यान्न वस्तुओं का संग्रहण, आखेट, पशुपालन, मछली पालन, वानिकी एवं खनन आदि व्यवसाय प्राथमिक श्रेणी में सम्मिलित हैं।
गौण व्यवसाय – जब प्राथमिक उत्पादों को संशोधित कर उनका रूप परिवर्तित किया जाता है तो उन्हें गौण व्यवसाय कहा जाता है। विभिन्न उत्पादों को संशोधित करने में उन्हें किसी निर्माण प्रक्रिया (मशीनों) से गुजरना पड़ता है, जिससे उसके रूप में परिवर्तन आ जाता है और वह मानव को विभिन्न रूपों में उपयोगिता प्रदान करती है।
प्रश्न 6 – भारतीय अर्थव्यवस्था में रसायन उद्योग का महत्त्व बताइए ।
उत्तर- भारतीय अर्थव्यवस्था में रसायन उद्योग का महत्त्व
देश के आर्थिक विकास में रासायनिक उद्योगों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस उद्योग का देश में तेजी से विकास होता जा रहा है। देश में रसायन उद्योग का चौथा स्थान है। रसायन उद्योगों का महत्त्व धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। यह एक प्रौद्योगिकी आधारित उद्योग है और इसके लिए भारी मात्रा में पूँजी तथा उत्पादन के लिए विद्युत शक्ति की आवश्यकता होती है। विनिर्माण क्षेत्र में रसायन उद्योग का योगदान लगभग 14% है, जबकि देश के निर्यात व्यापार में भी इसका योगदान 14% है। पिछले कुछ वर्षों से रसायन उद्योग में सकारात्मक व्यापार सन्तुलन दिखाई पड़ रहा है। रसायनों के उत्पादन में मात्रा के दृष्टिकोण से भारत का विश्व में 12वाँ स्थान है। वर्तमान में यह उद्योग 30 अरब डॉलर का कारोबार करता है। सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क के रूप में यह उद्योग राष्ट्रीय राजस्व में 20% का अंशदान करता है।
प्रश्न 7 – रसायन उद्योग को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर- रसायन उद्योग का वर्गीकरण
विभिन्न पदार्थों के उत्पादन को देखते हुए रसायन उद्योग को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है—
- अकार्बनिक रसायन उद्योग – अकार्बनिक रसायनों के अन्तर्गत गन्धक का तेजाब नाइट्रिक एसिड, क्षारीय सामग्री, सोडा एश तथा कॉस्टिक सोडा आदि इसमें पदार्थ सम्मिलित किए जाते हैं।
- कार्बनिक रसायन उद्योग — भारी कार्बनिक रासायनिक उद्योगों के अन्तर्गत पेट्रो रसायन प्रमुख है। इसका उपयोग कृत्रिम रेशे, कृत्रिम रबड़, प्लास्टिक की वस्तुएँ, रंग-रोगन तथा औषधियों के निर्माण में किया जाता है। आज पेट्रो रसायन उद्योग अपने गुणों के कारण औद्योगिक विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान बनाए हुए है। यह एक ऐसा उद्योग है जिसमें कच्चे माल का पुनः संसाधित कर विभिन्न वस्तुओं का निर्माण किया जाता है।
● अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – भारत में मोटरगाड़ी उद्योग में तीव्र विकास का क्या कारण है?
उत्तर— भारत में उदारीकरण के पश्चात् नए और आधुनिक मॉडल के वाहनों की बाजार में माँग बढ़ रही है, जिससे इस उद्योग में विशेषकर कार, दोपहिया तथा तिपहिया वाहनों में अपार वृद्धि हुई है। इसीलिए पिछले 15 से भी कम वर्षों में इस उद्योग ने अभूतपूर्व उन्नति की है।
प्रश्न 2 – उद्योगों की स्थिति को नियन्त्रित करने वाले किन्हीं तीन मानवीय कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर- (1) श्रमिकों की उपलब्धता,
(2) परिवहन व संचार साधनों की सुविधा, तथा
(3) सरकारी नीति ।
प्रश्न 3 – हल्के उद्योग किन्हें कहते हैं?
उत्तर- जिन उद्योगों में हल्के कच्चे माल का उपयोग होता है तथा उनका तैयार माल भी हल्का होता है, उन्हें हल्के उद्योग कहते हैं; जैसे— बिजली के पंखे एवं सिलाई मशीनों का निर्माण ।
प्रश्न 4 – महाराष्ट्र के चार महत्त्वपूर्ण सूती वस्त्र उद्योग केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर – (1) मुम्बई, (2) ओरंगाबाद, (3) पुणे, तथा (4) वर्धा ।
प्रश्न 5 – भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण दो चीनी उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।
उत्तर- (1) उत्तर प्रदेश, तथा (2) महाराष्ट्र ।
प्रश्न 6 – कर्नाटक और पश्चिम बंगाल के दो-दो लोहा और इस्पात संयन्त्रों के नाम लिखिए।
उत्तर- (क) कर्नाटक के दो लोहा और इस्पात संयन्त्र – (1) भद्रावती, तथा (2) विजयनगर ।
(ख) पश्चिम बंगाल के दो लोहा और इस्पात संयन्त्र – (1) दुर्गापुर तथा (2) बर्नपुर ।
प्रश्न 7 – भारत में इलेक्ट्रॉनिक सामान के पाँच उत्पादक केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर— (1) बंगलुरु, (2) हैदराबाद, (3) कोलकाता, (4) लखनऊ, तथा (5) कानपुर ।
प्रश्न 8 – बड़े पैमाने के उद्योग और छोटे पैमाने के उद्योग में दो अन्तर लिखिए।
उत्तर- बड़े पैमाने के उद्योग और छोटे पैमाने के उद्योग अन्तर
| बड़े पैमाने के उद्योग | छोटे पैमाने के उद्योग |
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प्रश्न 9 – भारत को अपने औद्योगिक विशिष्टीकरण के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर – भारत को अपने औद्योगिक विशिष्टीकरण के लिए उद्योगों द्वारा आत्मनिर्भरता को छोड़कर उच्च कोटि की कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्द्धा की दिशा में प्रयास करना चाहिए।
प्रश्न 10 – कौन – सा नगर ‘भारत का मानचेस्टर’ कहलाता है?
उत्तर – अहमदाबाद नगर (गुजरात) ‘भारत का मानचेस्टर’ कहलाता है।
प्रश्न 11 – भारत का कौन-सा नगर ‘सूती वस्त्रों की राजधानी’ कहलाता है ?
उत्तर- कहलाता है। – मुम्बई महानगर भारत में ‘सूती वस्त्रों की राजधानी’.
प्रश्न 12 – आधारभूत उद्योग का क्या अर्थ है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – वह उद्योग, जो अन्य उद्योगों को आधार प्रदान करता है, आधारभूत उद्योग कहलाता है; जैसे— लोहा – इस्पात उद्योग – जिस पर मशीन निर्माण उद्योग, मोटर कार उद्योग, रेल, जलयान, वायुयान आदि सभी उद्योग आधारित हैं। –
प्रश्न 13 – खनिज पदार्थों पर आधारित किन्हीं तीन उद्योगों के नाम लिखिए।
उत्तर – (1) लोहा-इस्पात उद्योग, (2) सीमेण्ट उद्योग, तथा (3) ऐलुमिनियम उद्योग ।
प्रश्न 14 – सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित लोहा-इस्पात उद्योग के दो केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर – (1) विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील लिमिटेड, भद्रावती (कर्नाटक), तथा
(2) राउरकेला इस्पात लिमिटेड, राउरकेला (ओडिशा) ।
प्रश्न 15 – कृषि आधारित दो उद्योगों के नाम लिखिए।
उत्तर – कृषि आधारित दो उद्योग हैं-
(1) सूती वस्त्रोद्योग, तथा ( 2 ) चीनी उद्योग ।
प्रश्न 16 – भारत के किस शहर को इलेक्ट्रॉनिक राजधानी के रूप में जाना जाता है?
उत्तर — बंगलुरु |
प्रश्न 17 – भारत में प्रथम सूती वस्त्र मिल कब और कहाँ स्थापित की गई थी ?
उत्तर – भारत में प्रथम सूती वस्त्र मिल सन् 1854 ई० में मुम्बई में स्थापित की गई थी ।
प्रश्न 18 – ” बंगलुरु भारत की इलेक्ट्रॉनिक राजधानी के रूप में उभरा है।” यह कथन सत्य है अथवा असत्य ।
उत्तर— सत्य।
प्रश्न 19 – भारत के किस शहर को ‘इस्पात नगरी’ के नाम से जाना जाता है?
उत्तर – जमशेदपुर (झारखण्ड) ।
● बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 – भारतीय अर्थव्यवस्था में किस क्षेत्र के उद्योग की भागीदारी बढ़ रही है-
(अ) प्राथमिक,
(ब) द्वितीयक,
(स) तृतीयक,
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं ।
उत्तर – (ब) द्वितीयक ।
प्रश्न 2 – निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग कृषि पर आधारित नहीं है—
(अ) सीमेण्ट उद्योग,
(ब) सूती वस्त्र उद्योग,
(स) चीनी उद्योग,
(द) जूट उद्योग ।
उत्तर- (अ) सीमेण्ट उद्योग ।
प्रश्न 3 – भारत का औद्योगिक रूप से सर्वाधिक उन्नत राज्य कौन-सा है—
(अ) तमिलनाडु,
(ब) पश्चिम बंगाल,
(स) पंजाब,
(द) महाराष्ट्र ।
उत्तर- (द) महाराष्ट्र ।
प्रश्न 4: ‘भारत का मानचेस्टर’ और ‘पूर्व का बोस्टन ‘ कौन-सा नगर कहलाता है-
(अ) कानपुर
(ब) मुम्बई,
(स) अहमदाबाद,
(द) जमशेदपुर।
उत्तर- (स) अहमदाबाद।
प्रश्न 5 – भारत का चीनी उत्पादक प्रथम राज्य कौन-सा है—
(अ) बिहार,
(ब) महाराष्ट्र,
(स) उत्तर प्रदेश,
(द) पंजाब |
उत्तर- (ब) महाराष्ट्र ।
प्रश्न 6 – निम्नलिखित में से कौन-सा इस्पात संयन्त्र निजी क्षेत्र से सम्बन्धित है-
(अ) दुर्गापुर,
(ब) भद्रावती,
(स) जमशेदपुर,
(द) बर्नपुर।
उत्तर – ( स ) जमशेदपुर ।
