UK 9th Hindi

UK Board 9 Class Hindi – (संस्कृत व्याकरण) – कारक

UK Board 9 Class Hindi – (संस्कृत व्याकरण) – कारक

UK Board Solutions for Class 9th Hindi – (संस्कृत व्याकरण और अनुवाद) – कारक

कारक की परिभाषा
“साक्षात् क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्’ अर्थात् क्रिया से साक्षात् (सीधा ) सम्बन्ध रखनेवाले विभक्तियुक्त पदों को ‘कारक’ कहते हैं। ” जिन शब्दों का क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं होता, वे ‘कारक’ नहीं कहलाते; यथा—‘सोमदत्तः यज्ञदत्तस्य पुस्तकं पठति’ (सोमदत्त यज्ञदत्त की पुस्तक पढ़ता है)। यहाँ सोमदत्त पाठक है और पुस्तक पढ़ी जाती है; अतः दोनों कारक हैं, किन्तु यज्ञदत्त का पठन क्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं है, उसका सम्बन्ध पुस्तक से है; अतः ‘यज्ञदत्त’ कारक नहीं है। इस प्रकार ‘सम्बन्ध’ (षष्ठी विभक्ति के सन्दर्भ में) को कारक नहीं कह सकते।
कारक के प्रकार
हिन्दी में आठ कारक माने गए हैं – ( 1 ) कर्त्ता, (2) कर्म, (3) करण, (4) सम्प्रदान, (5) अपादान, (6) सम्बन्ध, (7) अधिकरण, (8) सम्बोधन। लेकिन संस्कृत के विद्वान् ‘सम्बन्ध’ और ‘सम्बोधन’ को कारक की परिभाषा के अनुसार क्रिया से सम्बन्ध न होने के कारण कारक नहीं मानते, वे छह ही कारक मानते हैं।
विभक्ति प्रयोग
विभक्ति – सभी शब्दों के अन्त में ‘सु’, ‘औ’, ‘जस्’ आदि प्रत्यय लगते हैं। इन्हीं प्रत्ययों के आधार पर उनके सात विभक्तियों में रूप चलते हैं। ये प्रत्यय ‘सुप्’ प्रत्यय कहलाते हैं। इन्हीं को ‘सुप् विभक्ति’ कहते हैं। धातुओं में ‘तिप्’, ‘तस्’, ‘झि’ (अन्ति) आदि प्रत्यय लगते हैं। ये तिङ् प्रत्यय कहलाते हैं। इन्हीं प्रत्ययों को ‘तिङ विभक्ति’ भी कहते हैं।
संस्कृत में सात विभक्तियाँ होती हैं, कुछ लोग सम्बोधन की गणना भी विभक्ति में करते हुए आठ विभक्तियाँ मानते हैं, किन्तु सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति के ही शब्दों का प्रयोग किया जाता है; अतः उसे विभक्ति नहीं माना जा सकता है। कारकों एवं विभक्तियों में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है, जिसे निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है—
विभक्ति कारक कारक-चिह्न
प्रथमा कर्त्ता ने
द्वितीया कर्म को
तृतीया करण से (with), के द्वारा
चतुर्थी सम्प्रदान के लिए, को
पञ्चमी अपादान से (from) अलग होने में
षष्ठी सम्बन्ध का, की, के, रा, री, रे
सप्तमी अधिकरण में, पर, ऊपर
सम्बोधन सम्बोधन हे, भो, अरे, ओ (!)
कारकों एवं विभक्तियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
1. कर्त्ता कारक
‘स्वतन्त्रः कर्त्ता।’ अर्थात् किसी भी क्रिया को स्वतन्त्रतापूर्वक करने वाले को कर्त्ता कहते हैं। इसका चिह्न ‘ने’ है; जैसे— संजय ने चोर को पकड़ा। कहीं-कहीं पर इस चिह्न का लोप भी हो जाता है; जैसे—अंजू खाना खाती है। संस्कृत में कर्त्ता के तीन पुरुष होते हैं— प्रथम पुरुष (सः, तौ, ते, रामः, कृष्णः, अजू, लता आदि), मध्यम पुरुष (त्वम्, युवाम्, यूयम्), उत्तम पुरुष ( अहम्, आवाम्, वयम्)। साथ ही कर्त्ता के तीन लिङ्ग – पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग होते हैं। वाक्य में सामान्य अवस्था में कर्त्ता कारक को प्रथमा विभक्ति द्वारा व्यक्त किया जाता है।
वाक्य में कर्त्ता की स्थिति के अनुसार संस्कृत में वाक्य तीन प्रकार के होते हैं-
1. कर्तृवाच्य — वाक्य में कर्त्ता की प्रधानता होती है और उसमें सदैव प्रथमा विभक्ति ही होती है; जैसे— साक्षी पठति ।
2. कर्मवाच्य — वाक्य में कर्म की प्रधानता होती है और उसमें सदैव प्रथमा विभक्ति तथा कर्त्ता में सदैव तृतीया विभक्ति होती है; जैसे – मोहनेन ग्रन्थः पठ्यते ।
3. भाववाच्य — वाक्य में भाव (क्रियातत्त्व) की ही प्रधानता होती है। कर्त्ता में तृतीया विभक्ति और क्रिया सदैव प्रथम पुरुष एकवचन (आत्मनेपद) की प्रयुक्त होती है; जैसे – सोहनेन गम्यते ।
वाक्य में कर्त्ता के अनुसार ही क्रिया का प्रयोग किया जाता है अर्थात् कर्ता जिस पुरुष और वचन का होता है, वाक्य में क्रिया भी उसी पुरुष और वचन की प्रयोग की जाती है; जैसे—
(1) कंसः कृष्णेन हतः ।
(कंस कृष्ण द्वारा मारा गया । )
(2) रामः पततिः ।
(राम गिरता है।)
(3) तौ कन्दुकेन क्रीडतः।
(वे दोनों गेंद से खेलते हैं। )
(4) अहं पुस्तकं पठामि।
(मैं पुस्तक पढ़ता हूँ।)
(5) किं यूयं पत्राणि लेखिष्यथ ?
(क्या तुम सब पत्र लिखोगे? )
उपर्युक्त वाक्यों में मोटे छपे शब्द कर्त्ता हैं और उन्हीं के अनुसार वाक्य में क्रियाओं का प्रयोग किया गया है।
2. कर्म कारक
महर्षि पाणिनि ने कर्म कारक को परिभाषित करते हुए कहा है— ‘कर्तुरीप्सिततमं कर्म।’ अर्थात् कर्त्ता जिस पदार्थ को सबसे अधिक चाहता है, वह कर्म है। सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि जिसके ऊपर क्रिया के व्यापार का फल पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। कर्म कारक का चिह्न ‘को’ है। वाक्य में सामान्य अवस्था में कर्म कारक को द्वितीया विभक्ति द्वारा व्यक्त किया जाता है।
उदाहरणार्थ— ‘देवदत्तः ओदनं भुङ्क्ते ।’ यहाँ कर्त्ता हैं ‘देवदत्त’, उसकी अपनी क्रिया है ‘खाना’, इस खाना क्रिया से उसे ‘ओदन’ इष्टतम अर्थात् सर्वाधिक पसन्द है; अतः यहाँ ‘ओदन’ की कर्म संज्ञा है।
‘देवदत्तः पयसा ओदनं भुङ्क्ते’ अर्थात् देवदत्त दूध से भात खा रहा है। यहाँ भी ‘भुङ्क्ते’ क्रिया से ‘ओदन’ ही ईप्सिततम है, ‘पय’ नहीं; अतः ‘ओदन’ की कर्म संज्ञा हुई है, ‘पय’ की नहीं।
इसी प्रकार कर्म कारक के प्रयोग के कुछ अन्य उदाहरण हैं— (1) कृष्णः मन्दिरं गच्छति । ( 2 ) पयसा ओदनं भुङ्क्ते । (3) रामः श्यामं पश्यति। (4) बालकः पुस्तकं पठति । (5) सः फलम् आनयति ।
उपर्युक्त वाक्यों में ‘मन्दिरं, ओदनं, श्यामं पुस्तकं, फलम्’ में कर्म कारक है।
संस्कृत में सोलह ऐसी धातुएँ हैं, जिनके साथ दो कर्मों का प्रयोग किया जा सकता है। इन दोनों कर्मों में एक प्रधान अर्थात् मुख्य कर्म कहलाता है और दूसरा गौण । इनमें जिस कर्म का क्रिया से सीधा सम्बन्ध होता है, वह प्रधान कर्म होता है और जिसका क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं होता, वह गौण कर्म होता है; जैसे— पथिकः माणवकं पन्थानं पृच्छति। (राहगीर बच्चे से रास्ता पूछता है।) यहाँ पर ‘माणवकं’ गौण कर्म है और ‘पन्थानं’ मुख्य कर्म है; क्योंकि राहगीर के लिए पन्थ अर्थात् रास्ता ही अभीष्ट है। संस्कृत में इस गौण कर्म को ही अकथित कर्म भी कहते हैं और इसमें भी मुख्य कर्मवाली द्वितीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। संस्कृत की उन सोलह धातुओं और उनका अकथित कर्मों के साथ प्रयोग यहाँ दिखाया जा रहा है-
सारणी अगले पृष्ठ पर देखें ।
विशेष — उपर्युक्त सोलह धातुओं के अतिरिक्त इनके अर्थवाली अन्य धातुओं के भी ‘अकथित कर्म’ हो सकते हैं।
3. करण कारक
साधकतमं करणम्। अर्थात् क्रिया की सिद्धि में अत्यन्त सहायक वस्तुं अथवा साधन को करण कारक कहते हैं। सरल शब्दों में हम इस प्रकार कह सकते हैं कि जिसकी सहायता से या जिसके द्वारा कार्य पूर्ण होता है; उसमें करण कारक होता है। इसका चिह्न ‘से’ (with) तथा ‘के द्वारा’ है; यथा-सा हस्ताभ्यां कार्यं करोति ( वह हाथों से कार्य करती है) । यहाँ पर हाथों के द्वारा कार्य सम्पन्न हो रहा है; अतः ‘हस्ताभ्याम्’ में करण कारक है। वाक्य में करण कारक को तृतीया विभक्ति द्वारा व्यक्त किया जाता है।
कुछ अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं, जिनमें मोटे छपे शब्द करण कारक हैं-
(1) दात्रेण लुनाति ।
(दराँत से काटता है।)
(2) परशुना छिनत्ति |
(फरसे से काटता है।)
(3) जलेन मुखं प्रक्षालयति ।
(जल से मुँह धोता है।)
(4) देवदत्तः पादाभ्यां चलति ।
(देवदत्त पैरों से चलता है ।)
(5) देवदत्तः पादेन खञ्जः ।
(देवदत्त पैर से लँगड़ा है। )
उपर्युक्त वाक्यों में चौथे वाक्य में पैर चलने का साधन हैं; अतः उनमें करण कारक है, किन्तु पाँचवें वाक्य में उसी साधन में विकार उत्पन्न हो गया है, जिस कारण उसके चलने के कार्य में बाधा पड़ ही है। इसीलिए अन्य वाक्यों की भाँति उसमें भी करण कारक की अवश्य रही है, किन्तु वह साधन अभी भी है; अतः उसमें करण कारक विभक्ति ‘तृतीया विभक्ति’ का प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार के अन्य उदाहरण भी हैं, जिनका अध्ययन आप अगले अध्याय ‘विभक्ति प्रकरण’ के अन्तर्गत करेंगे।
4. सम्प्रदान कारक
‘कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्।’ अर्थात् दान के कर्म से कर्त्ता जिसे प्रसन्न करना चाहता है, वह ‘सम्प्रदान’ है। जिसे कोई वस्तु दी जाए, लेकिन वापस न ली जाए, वह सम्प्रदान कहलाता है। इसका चिह्न ‘के लिए’ अथवा ‘को’ है। वाक्य में सम्प्रदान कारक को चतुर्थी विभक्ति द्वारा व्यक्त किया जाता है; जैसे-
(1) वानराय फलानि देहि ।
(बन्दर को फल दो।)
(2) बालकेभ्यः मिष्टान्नानि ददाति ।
(बालकों के लिए मिठाइयाँ देता है। )
(3) विप्राय गां ददाति ।
(ब्राह्मण को गाय देता है। )
यहाँ मोटे छपे शब्दों में सम्प्रदान कारक है; क्योंकि इन्हीं को कर्त्ता ने क्रमश: ‘फल’, ‘मिष्टान्न’ एवं ‘गो’ दान ( प्रदान) करके इन्हें प्रसन्न करना चाहा है। 😉
‘क्रियया यमभिप्रैति सोऽपि सम्प्रदानम्।’ अर्थात् न केवल दान (देने की क्रिया) कर्म के द्वारा जो अभिप्रेत हो, उसे सम्प्रदान कहा जाए, वरन् किसी क्रिया विशेष द्वारा भी जो कर्त्ता को अभिप्रेत हो, उसे भी सम्प्रदान कारक कहा जाए। कहने का आशय यही है कि किसी वस्तु को देकर प्रसन्न करने पर ही सम्बन्धित प्राणी में सम्प्रदान कारक नहीं होता, बल्कि किसी भी क्रिया द्वारा जब वह इच्छित प्राणी को सन्तुष्ट अथवा प्रसन्न करना चाहता है तो उस सन्तुष्ट होनेवाले प्राणी ( अभिप्रेत ) में भी सम्प्रदान कारक होता है; जैसे-
(1) सा वत्सायै नृत्यति ।
(वह बेटी के लिए नाचती है। )
(2) मदन: अश्वाय घासम् आनयति ।
(मदन घोड़े के लिए घास लाता है। )
यहाँ पर कर्त्ता ‘सा’ नृत्य क्रिया द्वारा अपनी ‘वत्सा’ को प्रसन्न करना चाहती है अर्थात् वह अपना नृत्य बेटी को प्राप्त कराना (देना, समर्पित करना) चाहती है; अतः बेटी (वत्सा) में भी सम्प्रदान कारक है।
इसी प्रकार द्वितीय वाक्य में मदन घास लाने की क्रिया घोड़े की सन्तुष्टि (तृप्ति, प्रसन्नता) के लिए कर रहा है; अतः उसमें भी (क्रिया द्वारा अभिप्रेत अश्व में) सम्प्रदान कारक है । सम्प्रदान कारक के कुछ अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं-
(1) राजा विप्राय गां ददाति ।
(राजा ब्राह्मण को गाय देता है ।)
(2) शिष्यः उपाध्याय पुस्तकं ददाति ।
(शिष्य उपाध्याय को पुस्तक देता है। )
(3) ब्राह्मणी माणवकाय भिक्षां ददाति ।
(ब्राह्मणी बालक को भिक्षा दे रही है। )
(4) सः ब्राह्मणाय गां ददाति ।
(वह ब्राह्मण को गाय देता है । )
(5) कः तुभ्यं फलं ददाति ?
(तुम्हें कौन फल देता है ? )
(6) भिक्षुकः आहाराय भ्रमति ।
(भिक्षुक भोजन के लिए घूमता है।)
(7) सैनिका: देशाय प्राणान् त्यजन्ति ।
(सैनिक देश के लिए प्राण त्यागते हैं। )
उपर्युक्त वाक्यों में मोटे छपे शब्द सम्प्रदान कारक के उदाहरण हैं।
5. अपादान कारक
‘ध्रुवमपायेऽपादानम्।’ अर्थात् जिस पुरुष, स्थान या वस्तु से मन- कल्पित अथवा प्रत्यक्ष वियोग (पृथकत्व) होता है, उसे ‘अपादान’ कहते हैं। इसका चिह्न ‘से’ (from, अलग होने में ) है। वाक्य में अपादान कारक को पञ्चमी विभक्ति द्वारा व्यक्त किया जाता है; जैसे—
(1) बालकः गृहात् आगच्छति ।
(बालक घर से आता है। )
(2) अहं नगरात् आगच्छामि ।
(मैं नगर से आता हूँ।)
(3) वृक्षात् पत्राणि पतन्ति ।
(वृक्ष से पत्ते गिरते हैं। )
(4) सैनिक: अश्वात् पतितः ।
(सैनिक घोड़े से गिरा है । )
(5) रमेश: विद्यालयात् स्वगृहं याति ।
(रमेश विद्यालय से अपने घर जाता है।)
उपर्युक्त वाक्यों में क्रमशः बालक घर (गृह) से, मैं नगर से, पत्ते वृक्ष से, सैनिक अश्व से तथा रमेश विद्यालय से अलग हो रहा है; अतः इन सभी में अपादान कारक है।
6. सम्बन्ध
हिन्दी में तो सम्बन्ध को कारक माना गया है, किन्तु संस्कृत में इसे कारक नहीं माना गया है; क्योंकि सम्बन्ध में संज्ञा का क्रिया के साथ सम्बन्ध व्यक्त नहीं होता, वरन् संज्ञा अथवा सर्वनाम से सम्बन्ध प्रकट होता है और संस्कृत कारक उसे ही कहा जाता है, जिसका क्रिया से सीधा सम्बन्ध होता है।
संज्ञा अथवा सर्वनामों का यह सम्बन्ध मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है—
(अ) स्वाभाविक सम्बन्ध – जैसे— वणिकस्य धनम् । (व्यापारी का धन)।
(ब) जन्य-जनक भाव सम्बन्ध – जैसे – मातुः तनया। (माता की पुत्री) ।
(स) अवयवावयविभाव सम्बन्ध – जैसे – शरीरस्य अंगम् । (शरीर का अंग ) ।
(द) स्थान्यादेश भाव सम्बन्ध – जैसे— इष्टकायाः पथः । (ईंटों का मार्ग।)
इन सम्बन्धों को निम्नलिखित वाक्यों में समझा जा सकता है-
(1) संजीवस्य पिता श्री रामपालसिंहः अस्ति ।
(संजीव के पिता श्री रामपाल सिंह हैं। )
(2) लक्ष्मणः रामस्य भ्राता आसीत् ।
(लक्ष्मण राम के भाई थे । )
(3) द्रौपदी द्रुपदस्य पुत्री आसीत् ।
(द्रौपदी द्रुपद की पुत्री थी । )
(4) विद्या सर्वस्य धनम् अस्ति ।
(विद्या सबका धन है । )
(5) पशोः पादः स्वस्थः नः अस्ति ।
(पशु का पैर स्वस्थ नहीं है। )
(6) मृत्तिकायाः मयूरः अस्माकम् अस्ति ।
(मिट्टी का मोर हमारा हैं । )
उपर्युक्त वाक्यों में मोटे छपे शब्द सम्बन्ध को व्यक्त कर रहे हैं। हिन्दी में सम्बन्धवाचक शब्दों के साथ ‘रा, री, रे’ तथा ‘का, की, के’ शब्दांश जुड़े होते हैं। संस्कृत में इस ‘सम्बन्ध’ को वाक्य में षष्ठी विभक्ति द्वारा व्यक्त किया जाता है।
7. अधिकरण कारक
‘आधारोऽधिकरणम्।’ अर्थात् जिस वस्तु अथवा स्थान पर कार्य किया जाता है, उस आधार में अधिकरण कारक होता है। इसके चिह्न ‘में, ऊपर’ हैं। पर,
यह बात ध्यान रखने योग्य है कि अधिकरण क्रिया का साक्षात् आधार नहीं हुआ करता है, वह तो कर्त्ता और कर्म का आधार हुआ करता है। क्रिया कर्त्ता या कर्म में रहती है।
आधार या अधिकरण तीन प्रकार का होता है-
(1) औपश्लेषिक, (2) वैषयिक, (3) अभिव्यापक ।
उपश्लेषमूलक आधार औपश्लेषिक कहलाता है। उपश्लेष का अर्थ है – संयोगादि सम्बन्ध । देवदत्तः कटे आस्ते।’ (देवदत्त चटाई बैठता है।) यहाँ कर्त्ता है देवदत्त, उसमें बैठने की क्रिया है । देवदत्त का आधार है ‘क:’ (चटाई), उसके साथ देवदत्त का संयोग सम्बन्ध है; अतः ‘कः’ औपश्लेषिक आधार है। इसी प्रकार ‘यतिः वने वसति । ‘ में ‘वन’ औपश्लेषिक आधार है।
विषयता सम्बन्ध से सम्पन्न होनेवाला आधार वैषयिक आधार कहलाता है। उदाहरण के लिए – ‘देवदत्तस्य मोक्षे इच्छा अस्ति।’ इस वाक्य में कर्त्ता है देवदत्त, उसकी मोक्ष में इच्छा है; अर्थात् उसकी इच्छा का विषय है मोक्ष; अतः यह वैषयिक आधार है।
जिस आधार पर कोई वस्तु समस्त अवयवों में व्याप्त होकर रहती है, आधार वह अभिव्यापक आधार कहलाता है। उदाहरणार्थ – ‘सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति।’ आत्मा समस्त प्राणियों में रहती है; अतः ‘सर्व’ अभिव्यापक आधार है।
वाक्य में अधिकरण कारक को सप्तमी विभक्ति द्वारा व्यक्त किया जाता है; जैसे-
(1) नगरेषु जनाः निवसन्ति ।
(नगरों में लोग रहते हैं। )
(2) बालकाः विद्यालये पठन्ति ।
(बालक विद्यालय में पढ़ते हैं।
(3) सिंह वने वसति ।
(सिंह वन में रहता है | )
(4) वनेषु सिंहाः गर्जन्ति ।
(वनों में सिंह गरजते हैं । )
(5) गङ्गायां जलं वर्त्तते ।
(गंगा में जल है।)
(6) शिक्षक: पाठशालायां पाठयति ।
(शिक्षक पाठशाला में पढ़ाता है । )
उपर्युक्त वाक्यों में मोटे छपे शब्दों में आधार होने के कारण अधिकरण कारक है।
8. सम्बोधन
जिसे पुकारा जाता है, सम्बोधित किया जाता है अथवा आकृष्ट किया जाता है, वह सम्बोधन है। इसके चिह्न ‘हे’, ‘भो’, ‘अरे’ इत्यादि हैं। वाक्य में सम्बोधन को प्रथमा विभक्ति द्वारा व्यक्त किया जाता है; जैसे-
(1) भो छात्र ! इहागच्छ।
(अरे छात्र! यहाँ जाओ।)
(2) अरे बालका! उत्तिष्ठत पठत च ।
(अरे बालको! उठो और पढ़ो।)
(3) भो अमृतस्य पुत्रा !
(अरे अमृत पुत्रो ! )
(4) रे मोहन! किमपश्य: ?
(रे मोहन ! क्या देखते थे ? )
(5) हे बाले ! भोजनं पच ।
(हे बाला ! भोजन पका । )
उपर्युक्त वाक्यों में मोटे छपे शब्दों में पुकारने के कारण सम्बोधन है।
विशेष 1. सम्बोधन कारक के एकवचन प्रथमा विभक्ति के एकवचन से कुछ परिवर्तन होता है। शेष दोनों वचनों में प्रथमा विभक्ति जैसे ही प्रयोग होते हैं।
विशेष 2. ‘तदादिकानां सम्बोधनं नास्ति’ तदादिक अर्थात् सर्वनाम शब्दों के साथ सम्बोधन का प्रयोग नहीं होता है; क्योंकि तदादिक (सर्वनाम) शब्दों को पुकारा नहीं जाता है।
विशेष 3. कारकों का सीधा सम्बन्ध क्रियाओं से होता है, किन्तु सम्बोधन का सम्बन्ध सीधा शब्द ( कर्त्ता ) से होता है। यही कारण है कि इसकी गणना कारकों में नहीं होती है।
अभ्यास (हल सहित)
1. निम्नांकित वाक्यों में मोटे छापे के पदों में से किन्हीं दो के कारक बताइए व उनके सूत्र भी लिखिए-
क्र० सं० प्रश्न- खण्ड उत्तर- खण्ड
वाक्य कारक सूत्र
1. राजा दरिद्राय भोजनं ददाति । सम्प्रदान चतुर्थी सम्प्रदाने
2. महाजन/सः भिक्षुकेभ्यः भोजनं ददाति । सम्प्रदान चतुर्थी सम्प्रदाने
3. अहं भिक्षुकेभ्यः भोजनं ददामि । सम्प्रदान चतुर्थी सम्प्रदाने
4. शिक्षकः बालकाय पुस्तकं ददाति । सम्प्रदान चतुर्थी सम्प्रदाने
5. नृपः ब्राह्मणाय गां ददाति । सम्प्रदान चतुर्थी सम्प्रदाने
6. माता/सीता भिक्षुकाय अन्नं ददाति । सम्प्रदान चतुर्थी सम्प्रदाने
7. सः ग्रामात् पाठशालां गच्छति । अपादान अपादाने पञ्चमी
8. किरण प्रासादात् आगच्छति। अपादान अपादाने पञ्चमी
9. छात्रः विद्यालयात् आगच्छति । अपादान अपादाने पञ्चमी
10. सीता गृहात् गच्छति। अपादान अपादाने पञ्चमी
11. बालकः क्षेत्रात् निवर्तते। अपादान अपादाने पञ्चमी
12. अहं ग्रामात् गच्छामि। अपादान अपादाने पञ्चमी
13. राजमार्गे अश्वः धावति । अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
14. ते राजमार्गे धावन्ति । अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
15. रामः ग्रामे वसति । अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
16. श्यामा पुस्तकालये अस्ति । अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
17. जनाः भवने निवसन्ति । अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
18. गृहे उत्सव : भवति । अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
19. राजा सिंहासने तिष्ठति । अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
20. ऋषिः आसने तिष्ठति । अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
21. सः पर्यङ्के स्वापिति। अधिकरण सप्तम्यधिकरणे च
2. कोष्ठके प्रदत्तेषु शब्देषु शुद्धं शब्दं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत ( कोष्ठक में दिए गए शब्दों में से शुद्ध शब्द चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए ) –
(क) गङ्गा ……………. निस्सरति । (हिमालयेन / हिमालयात्।)
(ख) पिता ……………. सह आगत:। (पुत्रस्य/पुत्रेण)
उत्तरम् —
(क) गंगा हिमालयात् निस्सरति ।
(ख) पिता पुत्रेण सह आगतः ।

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