UK Board 9 Class Hindi – (संस्कृत व्याकरण) – समासः
UK Board 9 Class Hindi – (संस्कृत व्याकरण) – समासः
UK Board Solutions for Class 9th Hindi – (संस्कृत व्याकरण और अनुवाद) – समासः
सामान्य-परिचय – दो या दो से अधिक सार्थक पदों को किसी नियम – विशेष के आधार पर संक्षिप्त करने को ‘समास’ कहते हैं।
सामासिक पद या समस्त-पद — विभिन्न पदों में समास कर लेने पर पूर्वपदों की विभक्तियों का लोप हो जाता है और अन्तिम पद में, पाठक सन्दर्भ के अनुसार विभक्ति का निर्धारण करता है। इस प्रकार समास के नियम से मिले हुए शब्द- समूह को ‘सामासिक पद’ या ‘समस्त पद’ कहते हैं।
समास-विग्रह — समास किए गए पदों को अलग-अलग करने की विधि को ‘समास विग्रह’ कहते हैं अर्थात् समस्त पद में मिले हुए शब्दों को समास होने से पहलेवाली ( प्रकृति, प्रत्ययसहित मूल) स्थिति में कर देने को ही ‘समास विग्रह’ कहते हैं; जैसे— ‘राजपुरुष : ‘ ं का समास – विग्रह ‘राज्ञः पुरुषः ‘ होगा ।
समास के भेद
समास के निम्नलिखित छह भेद ही माने जाते हैं-
1. तत्पुरुष समास (Determinative Compound),
2. कर्मधारय समास (Appositional Compound),
3. द्विगु समास (Numeral Compound),
4. द्वन्द्व समास (Copulative Compound),
5. बहुव्रीहि समास (Attributive Compound),
6. अव्ययीभाव समास (Indeclinable Compound)।
1. तत्पुरुष समास
सूत्र – उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः ।
यह समास प्रथमा विभक्ति के अतिरिक्त अन्य सभी विभक्तियों में होता है और इसके उत्तरपद में प्रथमा विभक्ति अवश्य रहती है। समास करने पर पूर्वपद की जिस विभक्ति का लोप होता है, वह समस्त-पद उसी विभक्ति का ‘तत्पुरुष समास’ माना जाता है।
तत्पुरुष समास के भेद
प्रथम पद की भिन्न-भिन्न विभक्तियों के लोप के आधार पर तत्पुरुष समास के निम्नलिखित छह भेद हैं-
(क) द्वितीया तत्पुरुष — जहाँ पर समस्त – पद का प्रथम पद द्वितीया विभक्ति का होता है और समास के उपरान्त उसकी उस विभक्ति का लोप हो जाता है तो वहाँ द्वितीया तत्पुरुष होता है। ‘श्रित, अतीत, पतित, गतम् तथा आपन्न’ आदि शब्दों के साथ द्वितीया तत्पुरुष समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| रामाश्रितः | रामं श्रितः | राम के आश्रित |
| दुःखातीतः | दुःखम् अतीतः | बीता हुआ दुःख |
| कूपपतितः | कूपं पतित: | कुएँ में गिरा हुआ |
| शरणागतः | शरणं गतः | शरण को गया हुआ |
| सुखप्राप्तः | सुखं प्राप्तः | सुख को प्राप्त |
| सङ्कटापन्नः | सङ्कटम् आपन्नः | आपन्न संकटवाला |
(ख) तृतीया तत्पुरुष — तृतीया विभक्ति के पूर्वपदों के साथ, कृदन्त शब्दों के साथ तथा पूर्व, सदृश, सम, मिश्र, कलह तथा निपुण आदि पदों के साथ तृतीया तत्पुरुष होता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| हरित्रातः | हरिणा त्रात: | हरि द्वारा रक्षित |
| मासपूर्वः | मासेन पूर्वः | मास से पूर्व |
| मातृसदृश: | मात्रा सदृश: | माता के समान |
| एकोन: | एकेन ऊन: | एक-से-कम |
| शिवसमः | शिवेन समः | शिव के समान |
| सर्पदंष्टः | सर्पेण दंष्ट: | साँप द्वारा दंशित |
| बाणविद्धः | बाणेन विद्धः | बाण से बींधा हुआ |
(ग) चतुर्थी तत्पुरुष – चतुर्थी विभक्ति के पूर्वपदों तथा ‘तदर्थ, बलि, हित, सुख, रक्षित’ आदि शब्दों के साथ चतुर्थी तत्पुरुष होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| पठनपुस्तकम् | पठनाय पुस्तकम् | पढ़ने के लिए पुस्तक |
| भूतबलिः | भूताय बलिः | भूतों (प्राणियों) के लिए बलि |
| पुत्रहितम् | पुत्राय हितम् | पुत्र का हित |
| दानपात्रम् | दानाय पात्रम् | दान के लिए पात्र |
| भ्रातृसुखम् | भ्रात्रे सुखम् | भाई का सुख |
(घ) पंचमी तत्पुरुष — पंचमी विभक्ति के पूर्वपदों तथा भय देनेवाले शब्दों के साथ एवं ‘अपेत, मुक्त, पतित’ आदि शब्दों के साथ पंचमी तत्पुरुष होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| सिंहभयम् | सिंहाद्भयम् | सिंह से भय |
| अश्वपतितः | अश्वात् पतितः | अश्व से गिरा हुआ |
| व्याघ्रभीतः | व्याघ्राद् भीतः | व्याघ्र से डरा हुआ |
| रोगमुक्तः | रोगाद् मुक्तः | रोग से मुक्त |
| स्वर्गपतितः | स्वर्गात् पतितः | स्वर्ग से गिरा हुआ |
(ङ) षष्ठी तत्पुरुष- षष्ठी विभक्ति के पूर्वपद के साथ षष्ठी तत्पुरुष समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| राजपुरुष: | राज्ञ: पुरुष: | राजा का पुरुष |
| देवपतिः | देवानां पतिः | देवताओं का स्वामी |
| नरपति: | नराणां पतिः | नरों का स्वामी |
| देवमन्दिरम् | देवस्य मन्दिरम् | देवता का मन्दिर |
| वेदाध्यापकः | वेदस्य अध्यापकः | वेद का अध्यापक |
(च) सप्तमी तत्पुरुष – सप्तमी विभक्ति के पूर्वपदवाले तथा ‘शौण्ड (कुशल), धूर्त, प्रवीण, निपुण, पण्डित, चन्दन, सिद्ध, शुष्क, पक्व’ आदि शब्दों के साथ सप्तमी तत्पुरुष समास होता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| अक्षशौण्डः | अक्षेषु शौण्ड: | अक्ष (चौसर) में मदमस्त |
| युद्धनिपुणः | युद्धे निपुणः | युद्ध में निपुण |
| कार्यकुशलः | कार्ये कुशल: | कार्य में कुशल |
| वचनधूर्त्तः | वचने धूर्त: | वचनों में धूर्त |
| आतपशुष्कः | आतपे शुष्कः | धूप में सूखा हुआ |
| क्रीडाकुशल: | क्रीडायां कुशलः | क्रीडा में कुशल |
| शास्त्रप्रवीण | शास्त्रे प्रवीणः | शास्त्र में प्रवीण |
तत्पुरुष के अन्य भेद
उपर्युक्त भेदों के अतिरिक्त तत्पुरुष समास के तीन भेद और भी होते हैं-
(अ) उपपद, (आ) नञ्, (इ) अलुक् ।
(अ) उपपद तत्पुरुष — इसके उत्तरपदं में कोई क्रियावाचक शब्द होता है, इसलिए इसे ‘उपपद समास’ कहते हैं; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| मर्मज्ञः | मर्म जानाति | मर्म को जाननेवाला |
| चर्मकारः | चर्मं करोति | चर्म का काम करनेवाला |
| कम्बलदः | कम्बलं ददाति | कम्बल देनेवाला |
| प्रभाकर: | प्रभां करोति | सूर्य |
(आ) नञ् तत्पुरुष – इसके पूर्वपद में निषेधार्थक ‘अ’ या ‘अन्’ शब्द का प्रयोग होता है; अतः इस समास को ‘नञ् समास’ कहते हैं; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| अब्राह्मणः | न ब्राह्मण: | जो ब्राह्मण न हो |
| अनश्वः |
न अश्वः
|
जो घोड़ा न हो |
विशेष नियम – जिस पद के साथ नञ् समास किया जाए, यदि उस पद का आदि अक्षर ‘अ’ हो तो नञ् समास में ‘अ’ के आगे ‘अन्’ जोड़ दिया जाता है; यथा— अनश्वः ।
(इ) अलुक् तत्पुरुष – इस समास में पूर्वपद की विभक्ति का लोप नहीं होता । विभक्ति का लोप न होने के कारण इसका नाम : ‘अलुक् समास’ होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| परस्मैपदम् | परस्मै पदम् | दूसरे के लिए पद |
| आत्मनेपदम् | आत्मने पदम् | अपने लिए पद |
| वाचस्पति: | वाचः पतिः | बृहस्पति |
| युधिष्ठिरः | युधि स्थिर: | युद्ध में स्थिर |
2. कर्मधारय समास
सूत्र – विशेषणं विशेष्येण बहुलम् ।
“विशेषण और विशेष्य का यदि परस्पर समास होता है तो उसे ‘कर्मधारय’ कहते हैं।” इसके दोनों पदों की विभक्तियाँ समान होती हैं। यदि लिङ्ग विषम हों तो उत्तरपद के आधार पर लिङ्ग का निर्णय किया जाता है। यह समास तत्पुरुष समास का ही एक भेद है। यदि दोनों पद विशेषण हों तो भी कर्मधारय समास होता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| नीलोत्पलम् | नीलं च तत् उत्पलम् | नील कमल |
| वीरपुरुष: | वीरः च असौ पुरुषः | वीर पुरुष |
| कृष्णसर्पः | कृष्णः च असौ सर्पः | काला साँप |
| जीर्णतरि: | जीर्णा च असौ तरिः | पुरानी नाव |
| श्वेतपीत: | श्वेतः च असौ पीतः | सफेद-पीला |
| पीतप्रतिबद्धः | पीतः च असौ प्रतिबद्धः | पीने के बाद बाँधा |
उपमान कर्मधारय
सूत्र – उपमानानि सामान्यवचनैः ।
इस समास में पूर्वपद विशेष्य और उत्तरपद विशेषण के रूप में आता है। इसके विग्रह में ‘इव’ या ‘वत्’ का उपयोग होता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| घनश्यामः | घन इव श्यामः | बादल जैसा काला |
| चन्द्र॑सुन्दरम् |
चन्द्र इव सुन्दरम्
|
चन्द्रमा जैसा सुन्दर |
3. द्विगु समास
सूत्र – संख्या पूर्वो द्विगुः ।
इस समास पूर्वपद संख्यावाचक होता है और उत्तरपद उस संख्या का विशेष्य होता है। इसी का एक रूप ‘समाहार द्विगु’ है। ” समाहारे द्विगुर्द्वन्द्वश्च नपुंसकं स्यात्” समाहार अर्थ में द्विगु और द्वन्द्व दोनों समासों से बने पद नपुंसक हो जाते हैं।
“अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियामिष्टः – अकारान्त उत्तरपदवाले समाहार द्विगु में स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग होता है; अतः समस्त पद के अन्त में दीर्घ ईकार हो जाता है; जैसे—
| समस्त पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| पञ्चगवम् | पञ्चानां गवानां समाहारः | पाँच गायों का समूह |
| पञ्चपात्रम् | पञ्चानां पात्राणां समाहारः | पाँच पात्रों का समूह |
| त्रिलोकी | त्रयाणां लोकानां समाहारः | तीनों लोक |
| पञ्चवटी | पञ्चानां वटानां समाहारः | पाँचों बरगद |
| चतुर्युगम् | चतुर्णां युगानां समाहारः | चार युगों का समूह |
| पञ्चमूली | पञ्चानां मूलानां समाहारः | पाँच मूलों का समूह |
| नवरात्रम | नवानां रात्रीणां समाहारः | नौ रात्रियों का समूह |
| सप्तशती | सप्तानां शतानां समाहारः | सात सौ (श्लोकों) का समूह |
| शताब्दी | शतानाम् अब्दानां समाहारः | सौ वर्षों का समूह |
| त्रिभुवनम् | त्रयाणां भुवनानां समाहारः | तीनों भुवनों का समूह |
| अष्टाध्यायी | अष्टानाम् अध्यायानां समाहारः | आठ अध्यायों का समूह |
| त्रिवेणी | तिसृणाम् वेणीनां समाहारः | तीन वेणियों का समूह। |
द्विगु समास के भेद
इस समास के तीन भेद हैं-
(क) समाहार द्विगु, (ख) तद्धितार्थ द्विगु, (ग) उत्तरपद द्विगु ।
(क) समाहार द्विगु – जिस समास में पहला पद संख्यावाची तथा समस्त पद समूहवाचक होकर एकवचन (स्त्रीलिङ्ग अथवा नपुंसकलिङ्ग) में प्रयुक्त रहता है, वह ‘समाहार द्विगु’ कहा जाता है; यथा— पञ्चानां गवानां समाहारः – पञ्चगवम् ।
(ख) तद्धितार्थ द्विगु — जब द्विगु समास के अन्त में तद्धित प्रत्यय लगा रहता है, तब उसे ‘तद्धितार्थ द्विगु’ कहते हैं; यथा— पञ्चभिः गोभिः क्रीतः इति पञ्चगुः । यहाँ पञ्चगुः में तद्धित प्रत्यय है। इसी तरह षाण्मातुरः, पञ्चकपालः आदि होंगे।
(ग) उत्तरपद द्विगु— संख्यावाची विशेषण के विशेष्य के पश्चात् यदि कोई अन्य शब्द आता है और उसके साथ जो समास प्रयुक्त होता है, उसे ‘उत्तरपद द्विगु’ कहते हैं; यथा – पञ्चगाव: धनं यस्य इति पञ्चगवधनः; द्वाभ्यां मासाभ्यां जातः – द्विमास जात: (दो महीने में उत्पन्न हुआ) ।
विशेष: (क) द्विगु समास संख्यावाची विशेषण तथा उसके विशेष्य के अलावा अन्य शब्द का होना आवश्यक है।
(ख) लोक, रथ, वट, पद, रात एवं मूल आदि शब्दों में ‘ईकारान्त’ हो जाता है; यथा – पञ्चवटी, पञ्चमूली, सप्तशती आदि ।
(ग) यदि समाहार द्विगु का उत्तरपद आकारान्त होता है तो समस्त-पद विकल्प से स्त्रीलिङ्ग हो जाता है; यथा–पञ्चानां खट्वानां समाहारः – पञ्चखट्वम्, पञ्चखट्वी। चतुर्णां शालानां समाहारः – चतुश्शालम्, चतुश्शाली।
(घ) समाहारः (समूह) का सूचक द्विगु समास नपुंसकलिङ्ग एकवचन का होता है; यथा — त्रिभुवनम्, पञ्चपात्रम्, चतुर्युगम् आदि।
4. द्वन्द्व समास
सूत्र – चार्थे द्वन्द्वः।
इस समास में आए हुए सभी पद समान विभक्तिवाले होते हैं और इसमें प्रत्येक शब्द के बाद विग्रह की अवस्था में ‘च’ अक्षर आता है और अन्तिम पद की विभक्ति शब्दों की संख्या पर निर्भर करती है, अर्थात् दो शब्दों में द्विवचन, तीन या इससे अधिक शब्दों पर बहुवचन का प्रयोग होता है। ‘“परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः ” द्वन्द्व और तत्पुरुष में उत्तरपद के लिङ्ग के समान ही पूर्वपद का भी लिङ्ग होता है।
द्वन्द्व समास के भेद
इस समास के तीन भेद होते हैं-
(क) इतरेतर द्वन्द्व, (ख) समाहार द्वन्द्व, (ग) एकशेष द्वन्द्व ।
(क) इतरेतर द्वन्द्व – इसमें समान विभक्तिवाले दो या दो से अधिक तथा भिन्न-भिन्न अर्थवाले पदों का समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| अर्थधर्मौ | अर्थः च धर्मः च | अर्थ और धर्म |
| शिवकृष्णौ | शिवः च कृष्णः च | शिव और कृष्ण |
| पितरौ | माता च पिता च | माता-पिता |
| राम-लक्ष्मणौ | रामः च लक्ष्मणः च | राम-लक्ष्मण |
| फलमूलवृक्षाः | फलं च मूलं च वृक्षः च | फल-मूल-वृक्ष |
| मयूरीकुक्कुटौ | मयूरी च कुक्कुट: च | मयूरी-कुक्कुट |
| कुक्कुटमयूरौ | कुक्कुटः च मयूरी च | कुक्कुट – मयूरी |
(ख) समाहार द्वन्द्व – सूत्र ” समाहारे द्विगुर्द्वन्द्वश्च नपुंसकं हैं। “प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्”, “येषां च विरोधः शाश्वतिकः ” के स्यात्” के अनुसार समाहार में द्विगु और द्वन्द्व दोनों नपुंसक हो जाते अनुसार यह समास प्राणि, वाद्य विशेष, सेना के अंगवाची शब्दों के साथ होता है और जिनका आपस में स्वाभाविक विरोध होता है, उनके साथ भी यही समास होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| पाणिपादम् | पाणी च पादौ च | हाथ और पैर |
| रथिकाश्वारोहम् | रथिकः च अश्वारोही च | कोचवान् और घुड़सवार |
| मुखनासिकम् | मुखं च नासिका च | मुख और नासिका |
| भेरीपटहम् | भेरी च पटहः च | भेरी और पटह |
| अहिनकुलम् | अहिः च नकुलः च |
साँप और नेवला
|
(ग) एकशेष द्वन्द्व – जब समास में आए हुए शब्दों में एक शब्द शेष रह जाए, किन्तु वचन के द्वारा वह दूसरे शब्द का भी बोध कराता रहे, तब उसको ‘एकशेष द्वन्द्व’ समास कहते हैं। इसमें उत्तरपद के अनुसार लिङ्ग होता है; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| बालकौ | बालकः च बालकः च | दो बालक |
| मातापितरौ | माता च पिता च | माता-पिता |
| श्वशुरौ | श्वश्रू च श्वशुरः च | सास-ससुर |
| शिवौ | शिवः च शिवः च | दो शिव |
5. बहुव्रीहि समास
सूत्र – अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः ।
अनेक पदों का अन्यपद ( अर्थात् समास में आए हुए पदों से भिन्न) के अर्थ में जो समास होता है, उसे ‘बहुव्रीहि’ कहते हैं। यह किया जा सकता है और कहीं-कहीं समास का निर्णय करने के समस्त पद विशेषण होता है। इसका लिङ्ग निर्णय, सन्दर्भ के द्वारा ही लिए भी वाक्य प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है, नहीं तो प्रायः कर्मधारय समास का भ्रम – सा बना ही रहता है।
बहुव्रीहि समास के भेद
इस समास के मुख्यतया चार भेद होते हैं-
(क) समानाधिकरण, (ख) व्यधिकरण, (ग) तुल्ययोग, (घ) व्यतिहार।
(क) समानाधिकरण बहुव्रीहि- जिस समास में प्रधानपद ‘विशेषण’ तथा दूसरा पद ‘विशेष्य’ होता है एवं समस्त पद में ‘अन्य पदार्थ’ की प्रधानता हो, उसे ‘समानाधिकरण बहुव्रीहि’ कहते हैं; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| कण्ठकालः | कण्ठे कालः यस्य सः | कालकण्ठ |
| प्राप्तोदकः | प्राप्तम् उदकं येन सः | जल जिसे प्राप्त है |
| महाशयः | महान् आशय: यस्य सः | सभ्य (व्यक्ति) |
| पीताम्बरः | पीतम् अम्बरं यस्य सः | पीले वस्त्रवाला |
| वीरपुरुषक: | वीराः पुरुषाः सन्ति यत्र सः | वीर पुरुषवाला |
टिप्पणी – कर्मधारय तथा बहुव्रीहि समास में जब दोनों पद स्त्रीलिङ्ग हो और यदि पूर्वपद का स्त्रीलिङ्ग, पुंल्लिङ्ग शब्द से बना हुआ न हो तो पूर्वपद का स्त्रीलिङ्ग हटकर, पुंल्लिङ्ग के समान हो जाता है; जैसे—
वीरा च असौ स्त्री = वीरस्त्री (कर्मधारय )
चित्रा गौ यस्य सः = चित्रगुः (बहुव्रीहि)
(ख) व्यधिकरण बहुव्रीहि — इस समास में दोनों पद भिन्न-भिन्न विभक्तियों के होते हैं; अतः इसको ‘व्यधिकरण बहुव्रीहि ‘ कहते हैं; जैसे-
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| चक्रपाणिः | चक्रं पाणौ यस्य सः | भगवान् विष्णु |
| लम्बोदर: | लम्बम् उदरं यस्य सः | गणेश |
| नीलकण्ठः | नीलः कण्ठः यस्य सः | शिव का नाम |
| चन्द्रशेखरः | चन्द्रः शेखरे यस्य सः | शिवजी |
| गदापाणिः | गदा पाणौ यस्य सः | भीम |
| लम्बकर्णः | लम्बौ कर्णौ यस्य सः | लम्बे कानोंवाला |
| धनुष्पाणि: | धनुः पाणौ यस्य सः | धनुष है हाथ में जिसके |
| चन्द्रचूड: | चन्द्रः चूडायां यस्य सः | चन्द्रमा है चूड़ा पर जिसके |
(ग) तुल्ययोग बहुव्रीहि – इस समास में किसी अन्य शब्द का “सह, समं, साकं” शब्दों में से किसी एक शब्द के साथ समास हो है। समास करते समय उक्त शब्दों का प्रयोग बाद में होता है, किन्तु समास हो जाने के बाद उक्त शब्द केवल ‘स’ अथवा सह के रूप में समस्त शब्द के आगे आ जाता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| सपरिग्रहः | परिग्रहेण सहितः | परिजनों के साथ |
| सार्जुनः | अर्जुनेन सह | अर्जुन के साथ |
| सकलम् | कलाभिः समम् | कलाओं से युक्त |
| सभार्यः | भार्यया सह | स्त्रीसहित |
| सपुत्र: | पुत्रेण सहित: | पुत्रसहित |
| सपत्नीकः | पत्या सह | पत्नी के साथ |
| सकुटुम्बः | कुटुम्बेन सह | कुटुम्ब के साथ |
| सानुजः | अनुजेन सहितः | छोटे भाईसहित |
(घ) व्यतिहार बहुव्रीहि – तृतीयान्त अथवा सप्तम्यन्त पदों से जहाँ परस्पर युद्ध आदि का वर्णन किया गया हो, वहाँ ‘व्यतिहार बहुव्रीहि समास का प्रयोग होता है; जैसे—
| समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| केशाकेशि | केशेषु केशेषु गृहीत्वा यद् युद्धं प्रवृत्तम् | बालों को पकड़कर आरम्भ होनेवाला युद्ध |
| दण्डादण्डि | दण्डैः दण्डैः प्रहृत्य यद् युद्धं प्रवृत्तम् | डण्डों के प्रहार से आरम्भ होनेवाला युद्ध |
6. अव्ययीभाव समास
सूत्र – पूर्वपदार्थप्रधानः अव्ययीभावः ।
यदि समस्त पद के पूर्वपद में अव्यय हो और उसके साथ किसी अन्यपद का समास किया जाए तो उस समास का नाम ‘अव्ययीभाव’ होता है। यह समस्त पद क्रियाविशेषण होकर अव्यय के रूप में प्रयुक्त होता है; जैसे-
| प्रयुक्त अव्यय | समस्त-पद | समास-विग्रह | अर्थ |
| यथा | यथायोग्ययोग्यम् | अनतिक्रम्य | योग्य के अनुसार |
| यथाशक्ति | शक्तिम् अनतिक्रम्य | शक्ति के अनुसार | |
| यथासमयम् | समयम् अनतिक्रम्य | समय के अनुसार | |
| प्रति | प्रतिदिनम् | दिनं दिनं प्रति | प्रतिदिन |
| प्रत्येकम् | एकम् एकं प्रति | प्रति एक | |
| प्रत्यक्षम् | अक्षम् अक्षं प्रति | आँख के सामने | |
| स | सहरि | हरेः सादृश्यम् | हरि के सदृश |
| स/सह | सचित्रम् | चित्रेण सहितम् | चित्र के साथ |
| उप | उपगङ्गम् | गङ्गायाः समीपम् | गङ्गा के समीप |
| उपराजम् | राज्ञः समीपम् | राजा के समीप | |
| उपगु | गौः समीपम् | गाय के पास | |
| उपकूलम् | कूलस्य समीपम् | किनारे के समीप | |
| उपनदि | नद्याः समीपम् | नदी के पास | |
| उपवधू | वध्वाः समीपम् | वधू के पास | |
| उपशरदम् | शरदः समीपम् | शरद् के पास | |
| उपकृष्णम् | कृष्णस्य समीपम् | कृष्ण के समीप | |
| उपगिरि | गिरे: समीपम् | गिरि के पास | |
| अति | अतिहिमम् | हिमस्य अत्ययः | हिम का नाश |
| अधि | अधिहरि | हरौ इति | हरि में |
| निर् | निर्मक्षिकम् | मक्षिकाणाम् अभावः | मक्खियों का अभाव |
| निर्दोष: | दोषाणाम् अभाव: | दोषों का अभाव | |
| अनु | अनुविष्णुः | विष्णोः पश्चात् | विष्णु के पीछे |
| अनुदिनम् | दिनस्य पश्चात् | दिन के बाद | |
| आ | आहिमालयम् | हिमालयस्य पर्यन्तम् | हिमालय तक |
| आजीवनम् | जीवनस्य पर्यन्तम् | जीवन रहने तक |
अभ्यास (हलसहित)
1. निम्नलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि तदधस्ताद् दत्तानि । एतेषु उत्तरेषु समासम् अथवा विग्रहं कृत्वा उत्तरपुस्तिकायां लिखत-
प्रश्न: 1 – बालकाः कुत्र क्रीडन्ति ?
उत्तरम् – क्रीडाक्षेत्रे |
प्रश्न: 2 – कः आसीत् अर्जुनस्य सारथि : ?
उत्तरम् – चक्रं पाणौ यस्य सः ।
प्रश्न: 3 – तुभ्यं किं वर्णं कमलं रोचते ?
उत्तरम् – नीलं कमलम् ।
प्रश्न: 4 – कथं कृतं कार्यम् उत्तमं फलं ददाति ?
उत्तरम् – यथाशक्तिः ।
प्रश्न: 5-कम् आरूढाः वानराः कूर्दन्ति ?
उत्तरम् – वृक्षारूढाः ।
प्रश्नः 6 – सर्वेभ्यः कीदृशं वचनं रोचते ?
उत्तरम् — मधुरं वचनम् ।
प्रश्न: 7- शतम् अब्दाः एकपदेन किं कथ्यन्ते ?
उत्तरम् – शताब्दी ।
प्रश्न: 8 – शिष्याय उपादेयं किम् ?
उत्तरम् — गुरुवचनम्।
प्रश्न: 9 – युष्माकं विद्यालये किम् अस्ति ?
उत्तरम् – महोत्सवः ।
प्रश्न: 10 – कः अपक्वं फलं भुङ्क्ते ?
उत्तरम् – विमूढा धीः यस्य सः ।
प्रश्न: 11 – त्वं कदा विद्यालयं गच्छसि ?
उत्तरम् – यथासमयम् ।
उत्तरम् – पदानि समासम्/विग्रहम्
(1) क्रीडाक्षेत्रे = क्रीडायाः क्षेत्रे
(2) चक्रं पाणौ यस्य सः = चक्रपाणिः
(3) नीलं कमलम् = नीलकमलम्
(4) यथाशक्ति: = शक्तिम् अनतिक्रम्य
(5) वृक्षारूढा: = वृक्षम् आरूढाः
(6) मधुरं वचनम् = मधुरवचनम्
(7) शताब्दी = शतानाम् अब्दानां समाहारः
(8) गुरुवचनम् = गुरो: वचनम्
(9) महोत्सव: = महान् उत्सवः
(10) विमूढा धीः यस्य सः = विमूढधीः
(11) यथासमयम् = समयम् अनतिक्रम्य
2. अधः दत्तेषु रेखाङ्कितपदेषु विग्रहं/समासं कृत्वा उत्तरपुस्तिकायां लिखत-
(क) अष्टावक्र: जनकस्य सभाम् (………..) अगच्छत् ।
(ख) काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः ( …………. )।
(ग) ‘पञ्चवटी’ (………….) इति स्थाने वने रामः लक्ष्मणेन सीतया च सह अवसत् ।
(घ) सरोवरे नीलानि उत्पलानि (……….. ) शोभन्ते ।
उत्तरम् – पदानि समासम्/विग्रहम्
(क) जनकस्य सभाम् = जनकसंभाम्
(ख) पिककाकयो: = पिकस्य च काकस्य च
(ग) पञ्चवटी = पञ्चानां वटानां समाहारः
(घ) नीलानि उत्पलानि = नीलोत्पलानि
3. समास विग्रहं कृत्वा समासस्य नामोल्लेखं कुरुत (समास विग्रह कर समास का नाम लिखिए ) –
उत्तरम-
| समस्तपदानि | समास-विग्रहम् | समास-नाम |
| नीलकमलम् | नीलं कमलम् | कर्मधारयः |
| रामलक्ष्मणौ | रामश्च लक्ष्मणश्च | द्वन्द्वः |
