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UK Board 9 Class Hindi Chapter 13 – सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड)

UK Board 9 Class Hindi Chapter 13 – सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड)

UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 13 – सुमित्रानन्दन पन्त (क्षितिज : काव्य-खण्ड)

सुमित्रानन्दन पन्त ( ग्राम श्री)
I. कवि-परिचय
प्रश्न – सुमित्रानन्दन पन्त के जीवन परिचय, उपलब्धियों, रचनाओं, काव्यगत विशेषताओं तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- सुमित्रानन्दन पन्त
जीवन – परिचय – पन्तजी का जन्म सन् 1900 ई० में अल्मोड़ा जिले के कौसानी गाँव के सुन्दर प्राकृतिक वातावरण में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा तथा महाविद्यालयी शिक्षा प्रयाग के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में हुई। स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के लिए सरकारी कॉलेज छोड़ दिया तथा स्वाध्याय जुट गए। उन्होंने बचपन से ही, लगभग 4 वर्ष की अवस्था से कविताएँ लिखना आरम्भ कर दिया था, परन्तु व्यवस्थित ढंग का लेखनकार्य महाविद्यालय में आकर ही प्रारम्भ किया। बाद के अनेक वर्षों तक वे आकाशवाणी से जुड़े रहे। जीवन के अन्तिम समय तक वे काव्य-रचना में प्रवृत्त रहे। सन् 1977 ई० में उनका स्वर्गवास हो गया।
उपलब्धियाँ – सुमित्रानन्दन पन्त की महती साहित्य सेवा को देखते हुए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार तथा भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
रचनाएँ – पन्तजी की प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं— वीणा, ग्रन्थि, पल्लव, गुंजन, युगान्त, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण-किरण, स्वर्ण – धूलि, उत्तरा, अतिमा, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन।
काव्यगत विशेषताएँ – पन्तजी प्रकृति-प्रेम और कोमलता के कवि थे। उनकी आरम्भिक कविताएँ छायावादी रोमाण्टिक प्रवृत्ति से ओत-प्रोत हैं। उनमें पन्तजी की निजता झलकती है। प्रकृति का जैसा सुन्दर, कोमल, सूक्ष्म और मनोहारी वर्णन उन्होंने अपनी कविताओं में किया, वैसा अन्यत्र किसी में देखने को नहीं मिलता।
प्राकृतिक सौन्दर्य के पश्चात् उनके साहित्य में नारी – सौन्दर्य का आंकलन करने की प्रवृत्ति दिखती है। छायावादी कविताओं के बाद उन्होंने प्रगतिवादी विचारधारा की रचनाएँ प्रस्तुत कीं, जिनमें शोषितों, दलितों, निर्धनों और वंचितों आदि के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित की गई . है। अरविन्द – दर्शन से प्रभावित होकर वे बाद में अध्यात्म से जुड़ गए। उन्होंने मानवतावादी रचनाएँ भी लिखीं, जिनमें सारी मानवता को सुखी देखने की महान् कल्पना है।
भाषा-शैली – पन्तजी कुशल शब्द-शिल्पी माने जाते हैं। वे शब्दों की आत्मा तक गहरी पहुँच रखते थे। उनकी भाषा में संस्कृत शब्दों की अधिकता है, फिर भी भाषागत कोमलता क्षीण नहीं हो सकी है। वे कोमल, मधुर और सूक्ष्म भावों को प्रकट करनेवाले शब्दों का प्रयोग बड़ी सहजता और कुशलता से करते हैं।
पन्तजी की काव्य-शैली में कोमलकान्त पदावली एवं एक मधुर स्पर्श का भाव है, जो उनकी निजी विशेषता है।
उनके काव्य में उपमा, रूपक, अनुप्रास तथा मानवीकरण अलंकारों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। हिन्दी काव्य-कोष के वे एक ऐसे उज्ज्वल रत्न हैं, जिसकी आभा सदा आनन्दित करती रहेगी।
II. अर्थग्रहण एवं सराहना सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न- अग्रलिखित पद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
1. फैली खेतों …………….. नील फलक !
शब्दार्थ – तलक = तक। तन = शरीर । हरित = हरा। रुधिर = खून। श्यामल = हरा। भू तल = पृथ्वी, धरती । नभ = आकाश। चिर = सदा से। निर्मल = स्वच्छ । नील फलक = नीला विस्तार, आकाश ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(घ) पद्यांश का शिल्प- सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ङ) हरियाली की कौन-सी तीन विशेषताएँ हैं?
(च) सूर्य की किरणें किस पर सुशोभित हो रही हैं?
(छ) ‘हिल हरित रुधिर है रहा झलक’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ज) आकाश और धरती के मिलन का दृश्य अपने शब्दों में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि – सुमित्रानन्दन पन्त । कविता — ग्राम श्री ।
(ख) आशय – कविवर पन्त खेतों के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं – खेतों में दूर-दूर तक मखमल की तरह कोमल हरियाली फैली हुई है। उस पर सूर्य की किरणें ऐसे लिपटी हुई हैं, मानो चाँदी के समान उज्ज्वल जाली-सी सुशोभित हो रही हो। हरे-हरे तिनके धूप में ऐसे तरंगित हो रहे हैं मानो उनके हरे-हरे शरीरों में लहरें मारता हरा रक्त झलक रहा है। हरियाली से भरी-पूरी धरती पर आकाश का स्वच्छ नीला आँचल छाया है।
(ग) भाव – सौन्दर्य – हरी-भरी धरती पर कोमल घास पर दमकती हुई धूप का यह सौन्दर्य – वर्णन अत्यन्त मनोहारी एवं स बन पड़ा है। प्राकृतिक सौन्दर्य पाठक को मोहित किए बिना नहीं रहता । ग्रामीण सौन्दर्य का अंकन ।
(घ) शिल्प – सौन्दर्य-
● भाषा अत्यन्त, सुन्दर, कोमल मधुर एवं प्रवाहपूर्ण है।
● पूरे गद्यांश में ‘ल’ व्यंजन की आवृत्ति से ऐसा प्रतीत होता है। कि कवि को यह व्यंजन अतिप्रिय हैं।
● अनुप्रास की छटा द्रष्टव्य है— मखमल की कोमल हरियाली, उजली जाली, निर्मल नील फलक, हिल हरित रुधिर । उपमा अलंकार – चाँदी की-सी उजली जाली ।
● ‘मखमल की कोमल हरियाली’ में वाचक शब्द ‘की’ होते हुए भी उपमा अलंकार है ।
● ‘हरे-हरे’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
(ङ) ‘हरियाली’ की तीन विशेषताएँ हैं—
1. दूर तक फैली हुई।
2. मखमल की तरह कोमल ।
3. धूप-सी उज्ज्वल।
(च) सूर्य की किरणें हरियाली पर सुशोभित हो रही हैं। इससे एक-एक तिनका उज्ज्वल हो उठा है।
(छ) इस पंक्ति से आशय है कि हरे-हरे तिनकों पर ऐसी ताजगी और स्वच्छ-निर्मल चमक तथा उज्ज्वलता है, मानो उन तिनकों की नसों में हरा खून दौड़ रहा हो ।
(ज) नीचे कोमल मखमली हरियाली से सजी-धजी धरती है। ऊपर नीला आकाश छाया हुआ है। हरियाली से आकाश में चमकते सूरज की किरणें कुछ इस प्रकार से लिपटी हैं, जैसे तारकशी की सजावट हो रही हो। दूरं धरती और आकाश आपस में मिलते हुए दिखाई दे रहे हैं, मानो धरती का सौन्दर्य देखकर आकाश उस पर झुककर उसका आलिंगन करने को तत्पर हो ।
2. रोमांचित-सी …………………. तीसी नीली !
शब्दार्थ – रोमांचित = प्रसन्न। वसुधा = धरती । सनई = सन, एक पौधा जिसकी छाल के रेशे से रस्सी बनाई जाती हैं। किंकिणियाँ = करधनी, कमर में पहना जानेवाला घुँघरूदार आभूषण, इसे ‘ तगड़ी’ भी कहते हैं। भीनी = मीठी-मीठी, सुखद । तैलाक्त = तेल से भरी, तैलीय। गन्ध = महक । हरित धरा = हरी-हरी धरती । तीसी = अलसी । कलि = कली। नीलम = नीली आभायुक्त एक रत्न, नीलमणि ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) पद्यांश का भाव- सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(घ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ङ) वसुधा अपना रोमांच किस प्रकार प्रकट कर रही है?
(च) कवि ने अरहर और सनई की शोभा किस प्रकार वर्णित की है?
(छ) सरसों की फसल आ जाने से क्या प्रभाव उत्पन्न हुआ है?
(ज) ‘नीलम की कलि, तीसी नीली’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर :
(क) कवि – सुमित्रानन्दन पन्त । कविता — ग्राम श्री ।
(ख) आशय- कवि कहता है— धरती की शोभा देखकर ऐसा लगता है, मानो धरती प्रसन्नता से रोमांचित हो उठी हैं। रोमांच के रूप में उसके तन से गेहूँ और जौ की बालियाँ उग आई हैं। अरहर और सनई की सुनहरी पकी फलियाँ रुनझुन की मधुर ध्वनि करती हुई ऐसी सुशोभित हो रही हैं, मानो वे वसुधा की कमर पर बँधी करधनी के सुन्दर घुँघरू हैं। सरसों भी अपनी पीली रंगत लेकर खेतों में खिलखिला रही है। सरसों के फूलों से उठनेवाली मीठी-हल्की तैलीय महक पूरे वातावरण में फैल रही है। और यह देखो, धरती के इस सौन्दर्य को निहारने के लिए नीलम की कलियों के समान तीसी के नीले फूल भी हरी-भरी धरती से झाँक रहे हैं।
(ग) भाव – सौन्दर्य – इस पद्यांश में खेती से लहलहाती वसुन्धरा को पुत्रवती नारी के समान रोमांचित होते हुए दिखाया गया है। गेहूँ और जौ की बालियाँ जैसे उनके शरीर के रोमांचित रोम हैं। सनई और अरहर की फलिये में कवि ने एक सौभाग्यवती, सजी-धजी नारी की कमर की करधनी ओं की कल्पना करके उसे और भी मनोहर बना दिया है। गाले पोले रंगों और फसल की सुगन्ध से धरती की प्रसन्नता का वर्णन बड़ा चित्रात्मक बन पड़ा है।
(घ) शिल्प-सौन्दर्य-
● पद्यांश की भाषा अत्यन्त मधुर, कोमल, आकर्षक एवं प्रवाहपूर्ण है।
● ‘रोमांचित-सी लगती वसुधा’ में उपमा अलंकार है ।
● वसुधा को नारी रूप में प्रस्तुत किया गया है। मानवीकरण अलंकार।
● ‘अरहर सनई की सोने की किंकिणियाँ’ में रूपक अलंकार है।
● ‘पीली-पीली’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
● नीली तीसी के फूलों को हरी-भरी धरती से झाँकते हुए दिखाया गया है। यह एक सुन्दर चाक्षुष बिम्ब है।
● ‘ई’ मात्रा, की आवृत्ति । स्वरमैत्री ने आकर्षण में वृद्धि की है।
● ‘किंकिणियाँ’ की ध्वन्यात्मकता’ घुंघरुओं की ध्वनि का बिम्ब उपस्थित करती है।
(ङ) वसुधा गेहूँ और जौ की बालियाँ उगाकर अपना रोमांच प्रस्तुत कर रही है। उसने अपनी कटि पर अरहर और सनई की फलियोंरूपी घुंघरुओंवाली करधनी पहन रखी है। उसने नीले-पीले रंगवाले सुन्दर वस्त्र धारण कर रखे हैं। उसके मन का आनन्द उसके तन की सुगन्ध रूप में चारों ओर फैल रहा है।
(च) अरहर और सनई के सुनहरे रंग और बजती हुई फलियों को देख कवि कल्पना करता है कि ये वसुधा की कमर पर सुशोभित घुँघुरूदार सुनहरी – रूपहली करधनी
(छ) सरसों की फसल आ जाने से दो प्रभाव उत्पन्न हुए हैं—
1. चारों ओर खिला हुआ पीला रंग दिख रहा है।
2. वातावरण में सरसों की तैलीय महक फैल गई है।
(ज) ‘नीलम की कलि, तीसी नीली में अनुप्रास अलंकार है ।
3. रंग रंग के ……………… वृंतों पर ! 
शब्दार्थ- रिलमिल = मिल-जुलकर, मिली-जुली । पेटियाँ = पिटारे, कमरबन्द, कमरपेटी । छीमियाँ = फलियाँ। बीज लड़ी = बीजों की पंक्ति । वृन्तों = डण्ठल।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(घ) पद्यांश का शिल्प – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ङ) मटर की फसल के सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
(च) रंग-बिरंगी तितलियों की शोभा का वर्णन कीजिए।
(छ) फूल स्वयं क्यों वृन्तों पर उड़ते फिरते प्रतीत होते हैं?
(ज) ‘छीमियाँ’ किन्हें कहा गया है?
उत्तर : (क) कवि – सुमित्रानन्दन पन्त । कविता — ग्राम श्री ।
(ख) आशय – कवि पन्त कहते हैं- खेतों में चारों ओर विविध रंगों के फूल खिले हुए हैं। उनके बीच में उनसे सटी हुई मटर की फसल इस प्रकार खड़ी हँस रही है, मानो कोई सखी अपनी सजी-धजी सखियों को देखकर प्रसन्नता से हँस रही है। कहीं मखमली पिटारों के समान फलियाँ लटक रही हैं जिनमें बीजों की लड़ियाँ छुपी हुई हैं। अनेकानेक रंगों के सुन्दर-सुन्दर फूल खिले हुए हैं और उन पर विविध प्रकार की रंग-बिरंगी तितलियाँ उड़ती फिर रही हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है, मानो फूल ही प्रसन्नतापूर्वक उड़-उड़कर एक डण्ठल से दूसरी डण्ठल पर डोलते फिर रहे हों।
(ग) भाव – सौन्दर्य – इस पद्यांश में रंग-बिरंगे फूलों के मध्य सुशोभितं मटर की खड़ी फसल का तथा उन पर मँडराती तितलियों का अत्यन्त सुन्दर, मनोहर तथा भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत किया गया है। प्राकृतिक सौन्दर्य का सुन्दर चित्रण है।
(घ) शिल्प – सौन्दर्य—
● भाषा अत्यन्त सुन्दर, कोमल, माधुर्यपूर्ण तथा प्रवाहमयी है।
● ‘रंग-रंग’ की आवृत्ति से पद्यांश रंगीन हो उठा है।
● ‘रंग-रंग’ और ‘उड़-उड़’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
● अनुप्रास की छटा दर्शनीय है— फूलों में रिलमिल, छीमियाँ छिपाए, फूले फिरते हों फूल।
● ‘फिरती हैं रंग-रंग ……… वृन्तों पर’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
● ‘मखमली पेटियों-सी लटकी छीमियाँ’ में मनोरम उपमा है।
(ङ) मटर की फसल विविध रंगों के फूलों से रिल – मिलकर सुशोभित है। सजे-धजे वातावरण में उसका सौन्दर्य और भी अद्भुत एवं आकर्षक हो उठा है। उसकी दानों से भरी फलियाँ मखमली पिटारों के समान सुशोभित हैं।
(च) रंग-बिरंगी तितलियाँ एक पौधे से दूसरे पौधे तक उड़ती हुई इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो फूल ही एक वृन्त से उड़कर दूसरे वृन्त तक जा रहे हैं।
(छ) फूल एक वृन्त से दूसरे वृन्त पर उड़ते फिरते प्रतीत होते हैं। इसका कारण यह है कि उड़ती हुई तितलियाँ फूल के जैसी ही रंग-बिरंगी हैं। वे स्वयं ही फूलों जैसी प्रतीत होती हैं। इसलिए जब वे एक वृन्त से दूसरे वृन्त पर उड़ती फिरती हैं तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो स्वयं फूल ही एक वृन्त से दूसरे वृन्त पर उड़ते फिर रहे हों।
(ज) ‘छीमियाँ’ मटर की फलियों को कहा गया है। ‘छीमी’ ग्रामीण भाषा का मटर, सेम आदि सब्जियों की फलियों के लिए प्रचलित शब्द है।
4. अब रजत ………….. बैंगन, मूली !
शब्दार्थ – रजत = चाँदी। स्वर्ण = सुवर्ण, सोना। मंजरी = आम का बौर। आम्र = आम। तरु = वृक्ष। झर रहे = गिर रहे, झड़ रहे। दल = पत्ते। मतवाली = पगली, मदहोश, बौराई । मुकुलित = अधखुला, अधखिला । दाड़िम = अनार ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(घ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ङ) आम के वृक्ष का सौन्दर्य अपने शब्दों में लिखिए।
(च) पद्यांश के आधार पर बताइए कि यह किस ऋतु का वर्णन है।
(छ) इस ऋतु में कौन-कौन से फल और सब्जियाँ उगे हैं?
(ज) इस ऋतु में किन वृक्षों के पत्ते झड़ रहे हैं?
(झ) कोकिला मतवाली क्यों हो उठी है ?
उत्तर :
(क) कवि – सुमित्रानन्दन पन्त । कविता — ग्राम श्री ।
(ख) आशय – कविता के इस पद्यांश में कवि कहता है- ये देखो! आम के पेड़ की डालियाँ सुनहरी रूपहली मंजरियों से लद गई हैं। पतझड़ की ऋतु आ गई है। ढाक और पीपल के वृक्षों के पत्ते झड़ने लगे हैं। कोयल भी मतवाली हो उठी है, इसीलिए वह मदमस्त के होकर गा रही है। कटहल के वृक्ष से सुगन्ध उठने लगी है। जामुन बौर की कलियाँ कुछ अधखिली-सी दिखाई देने लगी हैं। जंगल में झरबेरी बेरों से लद गई है। आडू, नींबू, अनार आदि फलों के साथ-साथ आलू, गोभी, बैंगन, मूली आदि सब्जियाँ भी खेतों में तैयार खड़ी हैं।
(ग) भाव – सौन्दर्य — पद्यांश में लहलहाती फसलों का अत्यन्त मनोरम वर्णन हुआ है। आम की सुगन्धित मंजरियों के साथ-साथ फलों और सब्जियों की सुगन्ध का आकर्षक और स्वाभाविक वर्णन करके कवि ने वास्तव में गाँव के प्राकृतिक सौन्दर्य की सम्पन्नता (प्राकृतिक शोभा) को साकार कर दिया है।
(घ) शिल्प – सौन्दर्य-
● आम की मंजरियों के लिए रजत-स्वर्ण विशेषण बहुत सार्थक एवं मनोरम बन पड़ा है।
● ढाक और पीपल के पत्तों का झड़ना सुन्दर चाक्षुष बिम्ब है।
● कोयल का कूकना सुन्दर चाक्षुष और श्रवण बिम्ब बनाता है।
● कटहल का महकना सुन्दर घ्राण बिम्ब उपस्थित करता है।
● भाषा में सरलता, सहजता और शैली में प्रवाहमयता है।
● अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है— स्वर्ण मंजरियों, आम्र तरु, पीपल के दल, कोकिला मतवाली, कटहल मुकुलित |
● पद्यांश में फलों और सब्जियों के नाम अधिक गिनाए गए हैं, किन्तु क्रिया रूपों का प्रयोग अत्यल्प हुआ है; यथा— लद गई, झर रहे, हो उठी, महके, फूले।
● तुक का निर्वाह किया गया है; यथा – डाली, मतवाली, झूली, मूली ।
(ङ) आम के पेड़ों की डालियाँ सुनहरे – रूपहले बौर से लदकर झुक गई हैं। उसकी मोहक मादक सुगन्ध वातावरण को अत्यन्त मनोहर और मदमस्त बना रही है।
(च) यह वर्णन वसन्त ऋतु का है, जबकि आम के वृक्षों से पत्ते झड़ने लगते हैं और फिर नए-नए बौर उन वृक्षों की डालियों को घेर लेते हैं।
(छ) इस ऋतु में आम, कटहल, जामुन, आडू, अनार, झरबेरी आदि पर अत्यन्त सुन्दर, मोहक फूल खिले हैं। आम आदि के बौर की सुगन्ध वातावरण को मादक बना रही है। सब्जियों में आलू, गोभी, बैंगन, मूली आदि प्रचुरता से खेतों में उगी हैं।
(ज) इस ऋतु में ढाक और पीपल वृक्ष के पत्ते झड़ रहे हैं।
(झ) कोकिला आम्र मंजरियों की भीनी-भीनी सुगन्ध से मतवाली हो उठी है। वह प्रसन्नता में मदमस्त होकर कूक रही है।
5. पीले मीठे …………. हरी थैली !
शब्दार्थ – चित्तियाँ = चकत्ते, दाग, धब्बे, निशान। सुनहले = सोने के रंग के, सुनहरे । अँवली = छोटे-छोटे आँवले, आमलक। जड़ी = लद गई है, जड़ गई है। लहलह = खूब लहलहाता हुआ। महमह = खूब महकता, सुगन्ध देता हुआ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(घ) पद्यांश का भाव- सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ङ) पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(च) अमरूद के रूप, रंग और स्वाद का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए ।
(छ) बेर की कौन-सी तीन विशेषताएँ कवि ने बताई हैं?
(ज) कवि ने किन सब्जियों का वर्णन इस पद्यांश में किया है?
(झ) सब्जियों की कौन-कौन सी विशेषताएँ कवि ने वर्णित की हैं?
(ञ) ‘लहलह’, ‘महमह’ शब्दों का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि – सुमित्रानन्दन पन्त । कविता — ग्राम श्री ।
(ख) आशय – कवि कहता है- पीले और मीठे अमरूद पककर तैयार हो गए हैं; क्योंकि उन पर अब लाल-लाल चकत्ते पड़ गए हैं, जो अमरूद के पकने की पहचान है। बेर भी सुनहरे तथा पककर मीठे हो गए हैं। छोटे-छोटे आँवलों से पेड़ की डालियाँ द गई हैं। पालक के पत्ते खेतों में लहलहा रहे हैं। धनिया भी महमह करके अपनी महक बिखेर रहा है। लौकी और सेम की बेलें फलदार हो गई हैं और खूब फैल गई हैं। मखमल जैसे कोमल टमाटर भी अब पककर लाल हो गए हैं। जगह-जगह मिरचों के गुच्छे बड़ी थैली के समान लटकते दिख रहे हैं।
(ग) शिल्प-सौन्दर्य-
● भाषा कोमल, सरल, सुमधुर तथा शैली प्रवाहपूर्ण है।
● ‘ल’ वर्ण कवि का प्रिय वर्ण जान पड़ता है। उसकी आवृत्ति से एक विशेष ध्वनि प्रभाव उत्पन्न हो रहा है।
● अनुप्रासात्मकता द्रष्टव्य है— मधुर, बेर, लहलह पालक, फलीं फैली, मखमली टमाटर ।
● ‘लाल-लाल’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
● विशेषणों के प्रयोग में कवि की सिद्धहस्तता दर्शनीय है— अमरूदों के लिए ‘पीले-मीठे’, चित्तियों के लिए, ‘लाल-लाल’, बेर के लिए ‘सुनहरे-मधुर’, टमाटर के लिए ‘मखमली’ ।
● ‘मिरचों की बड़ी हरी थैली’ में वाचक शब्द ‘की’ के साथ उपमा अलंकार है।
● अभिव्यक्ति की संक्षिप्तता में अल्पक्रिया रूपों का उपयोग भी महत्त्वपूर्ण रहा है; यथा— पड़ी, जड़ी, फलीं, फैलीं।
(घ) भाव – सौन्दर्य – पद्यांश में फलों और सब्जियों के स्वाभाविक रूप-स्वरूप, गन्ध आदि का अत्यन्त स्वाभाविक और मधुर वर्णन हुआ है। कवि के इस वर्णन में फलों और सब्जियों की ताजगी और स्वाद मानो जीवन्त हो उठे हैं।
(ङ) काव्य-सौन्दर्य : संकेत-उपर्युक्त उत्तर (ग) और (घ) को सम्बद्ध करके लिखिए।
(च) अमरूद का रंग पीला है, वह लाल-लाल चित्तियों से सजा हुआ है तथा स्वाद में मीठा है।
(छ) बेर की तीन विशेषताएँ कवि ने बताई हैं-
बेर रंग में सुनहरे हैं, वे पक गए हैं तथा स्वाद में मीठे हैं।
(ज) कवि ने पालक, धनिया, लौकी, सेम, टमाटर और मिरच नामक सब्जियों का वर्णन इस पद्यांश में किया है।
(झ) सब्जियों की सम्मिलित रूप से एक बड़ी विशेषता तो यह है कि वे भरपूर मात्रा में उगी हैं, खेतों में खूब फली फूली हैं। इसके अतिरिक्त पालक लहलहा रहा है। धनिया महक रहा है। टमाटर मखमली अर्थात् वहुत कोमल हैं और वे स्वाभाविक रूप से पूरी तरह पककर लाल हो गए हैं।
(ञ) ‘लहलह’ से आशय है- लहलहाना, अर्थात् अधिक मात्रा में उगकर हवा के झोंकों से इधर-उधर हिलना । ‘महमह’ से आशय है— महकना अर्थात् सुगन्ध या महक का चारों और फैल जाना।
6. बालू के ……………. रहती सोई ! 
शब्दार्थ – बालू = बालुका, रेत। अंकित = जिस पर चिह्न पड़े हों, चिह्नित । सतरंगी = सात रंगोंवाली, रंग-बिरंगी । सरपत = एक लम्बी घास, जो छप्पर बनाने के काम आती है और नदी किनारे की बालू में खूब उगती है, काँस। कलँगी = कलगी, चिड़ियों (जैसे मोर) के सिर की चोटी, सिर पर पहनी जानेवाली टोपी, मुकुट आदि में लगा पंख। सुरखाब = चक्रवाक पक्षी। पुलिन = तट, किनारा। मगरौठी = एक पक्षी, चिड़िया।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(घ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ङ) बगुलों के सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
(च) ‘सरपत’ से क्या आशय है?
(छ) गंगा तट की रेत कैसी है?
(ज) सरपत और तरबूज की खेती का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए ।
(झ) सुरखाब और मगरौठी गंगा तट पर कैसे आनन्द उठाते हैं?
उत्तर :
(क) कवि – सुमित्रानन्दन पन्त । कविता — ग्राम श्री ।
(ख) आशय – इस पद्यांश में कवि गंगा तट के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहता है— गंगा की रेत विविध रंगों से सुशोभित है। उसके किनारे की रेत इस प्रकार टेढ़ी-मेढ़ी ( लहरदार ) बिछी हुई है, मानो उस पर असंख्य साँप लेटे हुए हों। गंगा के किनारे पर सरपत घास अर्थात् काँस उग आई है। वह फूली हुई काँस अत्यन्त सुन्दर लगती है। गंगा के रेतीले तट पर तरबूजों की भारी फसल उगी है। आस-पास बगुले विहार कर रहे हैं। वे अपने सिर पर पंजों की उँगलियोंरूपी कंघी फेरते हुए ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो कोई अपनी कलगी सँवार रहा हो। चक्रवाक पक्षी नदी के बहते हुए जल में तैर रहे हैं। नदी के तट पर देखो तो मगरौठी आनन्द से सोई पड़ी है।
(ग) भाव – सौन्दर्य – गंगा तट का यह दृश्य अद्भुत सौन्दर्य लिए हुए है। रेत का टेढ़ा-मेढ़ा होना, तरबूजों की खेती, बगुलों का विहार करना, सुरखाब का पानी पर तैरना और मगरौठी चिड़िया का तंट पर निश्चिन्त सोते रहना बड़े स्वाभाविक दृश्य हैं।
(घ) शिल्प-सौन्दर्य-
● यह गद्यांश अनेक चाक्षुष बिम्बों से युक्त है।
● टेढ़ी-मेढ़ी बालू के लिए ‘बालू के साँपों से अंकित’ एक सुन्दर चाक्षुष विम्ब है।
● ‘बालू के साँप’ तथा ‘अँगुली की कंघी’ में रूपक अलंकार है।
● अनुप्रास की छटा दर्शनीय है- साँपों से, गंगा की सतरंगी रेती, तट पर तरबूजों की खेती, की कंघी, पुलिन पर, बगुले कलंगी आदि ।
● तुक का निर्वाह किया गया है—रेती, खेती; कोई, सोई।
(ङ) बगुले गंगा तट पर विहार कर रहे हैं। वे अपने पंजों को अपने सिर के बालों पर इस प्रकार फेरते हैं, मानो कंघी करके वे अपनी कलगी सँवार रहे हों।
(च) ‘सरपत’ से आशय – एक लम्बी घास, जो छप्पर बनाने के काम आती है और नदी की बालू में खूब उगती है, काँस इस पर सफेद फूल आते हैं। जब यह फूलती है, इसकी छटा अत्यन्त मनोरम होती है।
(छ) गंगा तट की रेत पर टेढ़ी-मेढ़ी लहरें बन गई हैं। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो उस पर साँप लेटे हों।
(ज) गंगा-तट पर सरपत घास छाई हुई है, जगह-जगह उसके समूह दिख रहे हैं। उन सरपत समूहों के पास ही तरबूजों की फसल भी तट की शोभा बढ़ा रही है।
(झ) सुरखाव पक्षी गंगा के जल में तैरने का आनन्द उठा रहे हैं। गंगा तट पर मगरौठी चिड़िया निश्चिन्त सोई पड़ी है।
7. हँसमुख हरियाली ……………. जन-मन !
शब्दार्थ – हँसमुख = हँसती- मुस्कराती हुई । हिम-आतप = सर्दी की ऋतु की धूप। अलसाए = आलस्य से भरे हुए। अँधियाली = अँधेरा । निशि = रात। तारक = तारागण, तारे। मरकत = पन्ना नामक हरे रंग का बहुमूल्य पत्थर । नीलम = नीले रंग का बहुमूल्य पत्थर, नीलमणि । आच्छादन = छाया हुआ । निरुपम = जिसकी उपमा न दी जा सके। हिमान्त = सर्दी की ऋतु के उपरान्त । स्निग्ध = कोमल, नरम, स्नेह से भरा हुआ। शोभा = सौन्दर्य । हरता = हरण, ले लेता, छीन लेता।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(घ) पद्यांश का शिल्प – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ङ) ‘हँसमुख हरियाली’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(च) ‘हँसमुख हरियाली’ क्या कर रही है?
(छ) तारों भरी रात का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए ।
(ज) ग्राम की तुलना मरकत डिब्बे से क्यों की गई है?
(झ) गाँव की कौन-सी शोभा जन-मन को हर रही है?
उत्तर :
(क) कवि – सुमित्रानन्दन पन्त । कविता – ग्राम श्री ।
(ख) आशय – कवि कहता है— ग्राम में चारों ओर छाई हरियाली पर सर्दी की सूर्य की धूप पड़ने से चमक आ गई है। ऐसा लग रहा है, मानो हरियाली हँस रही हो। सर्दी की धूप भी खिली-खिली सी लग रही है। दोनों जैसे हिलमिलकर सोए पड़े हैं। रात ओस-कणों के कारण भीग गई है। तारे उनींदे से जान पड़ते हैं, मानो सपनों में खोए हुए हों। इस प्रकार के प्राकृतिक सौन्दर्य से सम्पन्न गाँव की शोभा पन्ने के खुले हुए डिब्बे जैसी लग रही है। उस पर नीला आकाश ऐसा आकर्षक लग रहा है, मानो पन्ने के डिब्बे पर नीला आँचल ढका हुआ हो। सर्दी की समाप्ति पर इस शीतल प्रदेश में एक अतुलनीय अनुपम शान्ति चारों ओर छाई हुई है और वह चुपचाप अपनी शोभा से लोगों का मन हर रही है।
(ग) भाव – सौन्दर्य – इस पद्यांश में गाँव की शान्ति, कोमलता, सुन्दरता और स्निग्धता का अत्यन्त मनोहारी वर्णन हुआ है। इस वर्णन से रात और दिन दोनों ही स्थितियों में गाँव का प्राकृतिक सौन्दर्य साकार हो उठा है।
(घ) शिल्प – सौन्दर्य-
● भाषा कोमल, मधुर, सरस है। शैली प्रवाहपूर्ण है।
● भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दों की बहुलता है, साथ ही देशज एवं तद्भव शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।
● तुक का निर्वाह हुआ है-सोए, खोए; आच्छादन, मन।
● उपमा अलंकार का सौन्दर्य दर्शनीय है – अलसाए – से सोए, तारक स्वप्नों में से खोए मरकत डिब्बे-सा खुला ग्राम ।
● ओस भरी अँधेरी रात के लिए ‘ भीगी अँधियाली’ का प्रयोग सुन्दर बन पड़ा है।
● अनुप्रास अलंकार की छटा देखिए-
— ‘हँसमुख हरियाली हिम – आतप’ — ‘ह’ की आवृत्ति;
— ‘सुख से अलसाए-से सोए’ — ‘स’ की आवृत्ति;
— ‘नीलम नभ आच्छादन-निरूपम’ तथा ‘जन मन’ — ‘न’ की आवृत्ति !
(ङ) हरियाली पर सूर्य की किरणें पड़ रही हैं। सर्दी की सुनहरी धूप के कारण उस पर चमक आ गई है। जिस प्रकार प्रसन्न व्यक्ति के हँसने पर उसके चेहरे पर चमक आ जाती है, उसी प्रकार हरियाली भी चमक रही है।
(च) हँसमुख हरियाली सर्दी की गुनगुनी धूप के साथ अलसाई -सी सोई पड़ी है।
(छ) अँधेरी रात है। वातावरण में ओस और शीतलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अँधेरा मानो भीग गया हो। अँधेरे में आकाश में कहीं-कहीं तारे टिमटिमाते दिख जाते हैं। उनका टिमटिमाना ऐसा लगता है, मानो वे सपनों में खोए हों।
(ज) ग्राम की तुलना मरकत के खुले डिब्बे से उसकी हरित शोभा के कारण की गई है। गाँव के खेतों में मखमली हरियाली छाई हुई है। रंग-बिरंगे फूल – फल और फसलें हैं। कहीं रंगीन फूलों पर र कहीं लहलहाती-महकती फसलें सुगन्ध • हैं। ऐसा लगता है जैसे धरती ने अपने श्रृंगार में कोई कंजूसी नहीं बरती है। धरती के इस सौभाग्यशाली रूप को दर्शाने के लिए मरकत के खुले डिब्बे से गाँव की तुलना अत्यन्त सटीक बन गई है।
(झ) गाँव की हँसमुख हरियाली, ठण्डी – भीगी रातें, सुनहली फसलें, शान्त वातावरण, नीला आकाश, टिमटिमाते तारे सब मिलकर . ऐसी शोभा रच रहे हैं कि वे लोगों के मन को हर रहे हैं।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1— कवि ने गाँव को ‘हरता जन मन’ क्यों कहा है? है ?
उत्तर – कवि ने गाँव को उसकी शोभा श्री के कारण ‘हरता जन मन’ कहा है। गाँव की शोभा अनुपम है। खेतों में दूर-दूर तक हरियाली का मखमल – सा बिछा हुआ है। उस पर सूरज की किरणों की सुनहरी-रूपहली जाली-सी लिपटी है; अर्थात् हरियाली पर धूप चमक रही है। सारी वसुन्धरा पूरी तरह प्रसन्न दिखाई देती है। गेहूँ, जौ, अरहर, सनई, सरसों आदि की फसलें उग आई हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार की रंगीन तितलियाँ रंग-बिरंगे फूलों पर मँडरा रही हैं। आम, बेर, आड़ू, अनार, जामुन, नींबू, आँवला आदि फल भरपूर पैदा हुए हैं। आलू, गोभी, बैंगन, मूली, पालक, धनिया, टमाटर, कटहल, लौकी, सेम, ‘मिरच आदि सब्जियाँ खूब फल-फूल रही हैं। गंगा के तट पर तरबूजों की खेती फैलने लगी है। पक्षी जल में विहार करके आनन्दित हो रहे हैं। ये सभी दृश्य मनमोहक बन पड़े हैं। इसलिए कवि ने गाँव के लिए ‘हरता जन मन’ उचित ही कहा है।
प्रश्न 2 – कविता में किस मौसम के सौंदर्य का वर्णन है?
उत्तर – कविता में शिशिर ऋतु के सौन्दर्य का वर्णन है। इसी मौसम में ढाक और पीपल के पत्ते झड़ते हैं। आम के वृक्षों में बौर आते हैं। चारों ओर फल-फूल खिलते हैं। तितलियाँ फूलों और मंजरियों आदि की सुगन्ध से मँडराई फिरती हैं। आलू, गोभी, धनिया, पालक, मूली आदि सब्जियाँ भी इसी ऋतु की फसलें हैं।
प्रश्न 3 – गाँव को ‘मरकत डिब्बे-सा खुला’ क्यों कहा गया है?
उत्तर — गाँव में चारों ओर मखमली हरियाली और रंगों की लाली छाई हुई है। विविध प्रकार की फसलें खेतों में लहलह – महमह कर रही हैं। वातावरण फूलों, फलों, सब्जियों की सुगन्ध से गमक रहा है। रंग-बिरंगी तितलियाँ विभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे फूलों पर उड़ती फिर रही हैं। चारों ओर रंगीन, कोमल सौन्दर्य जड़ा हुआ-सा दिखाई दे रहा है। सूरज की मीठी-मीठी धूप और किरणों के सुनहरे रूपहले तार की जाली एक मोहक प्रभाव और आकर्षण उत्पन्न कर रही है। सौन्दर्य जैसे जगमग जगमग कर रहा है। इसी कारण कवि ने गाँव को ‘मरकत डिब्बे सा खुला’ कहा है।
प्रश्न 4 – अरहर और सनई के खेत कवि को कैसे दिखाई देते हैं?
उत्तर – अरहर और सनई के सुनहरे खेतों को देखकर कवि को ऐसा लगता है जैसे सारी वसुधा ने अपनी कमर पर सुनहरे रंग की घुंघरुओंवाली करधनी धारण कर रखी हो। आशय यह है कि अरहर और सनई के पौधों पर सुनहरे रंग की फलियाँ उग आई हैं, जिनमें पड़े हुए बीज हवा के झोंकों से बज उठते हैं।
प्रश्न 5 – भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) बालू के साँपों से अंकित
गंगा की सतरंगी रेती
उत्तर : भाव स्पष्टीकरण— गंगा के तट की रेत बलखाते साँपों की तरह लहरदार और विविध रंगोंवाली है।
(ख) हँसमुख हरियाली हिम-आतप
सुख से अलसाए-से सोए
उत्तर : भाव स्पष्टीकरण- सूर्य की गुनगुनी धूप के प्रकाश मै जगमगाती हुई हरियाली हँसमुख- सी लग रही है। सर्दी की धूप भी स्थिर और शान्त है। हरियाली और धूप को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो दोनों आलस्य से भरकर सो रहे हों।
प्रश्न 6 – निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है?
तिनकों के हरे हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक
उत्तर – उपर्युक्त पंक्तियों में आए तीन अलंकार इस प्रकार हैं-
1. अनुप्रास — ‘हिल हरित रुधिर है रहा’ में ‘ह’ और ‘र’ की आवृत्ति ।
2. मानवीकरण — तिनकों को तन और रुधिर से सम्पन्न दिखाया गया है, जो मानवों की शारीरिक प्रकृति है अर्थात् तिनकों को मानव की तरह प्रस्तुत किया गया है।
3. पुनरुक्तिप्रकाश – ‘हरे हरे’ में।
प्रश्न 7 – इस कविता में जिस गाँव का चित्रण हुआ है, वह भारत के किस भू-भाग पर स्थित है?
उत्तर – कविता के वर्ण्य विषय के अनुसार यह गाँव गंगा तट पर स्थित है।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – कवि ने वसुधा को किस प्रकार रोमांचित दिखाया है?
उत्तर – कवि ने वसुधा को रोमांचित नायिका के समान चित्रित किया है। रोमांच का अभिप्राय है- हर्ष की अधिकता । प्रसन्नता के आवेश के कारण गेहूँ और जौ में बालियाँ उग आई हैं। अरहर और सनई की सुनहरी फलियाँ घुंघरुओंवाली करधनी के रूप में पृथ्वीरूपी वधू पर सज गई हैं। पीली-पीली सरसों का विस्तार देखते ही बनता है। वातावरण में उसकी तैलीय महक फैल रही है। अलसी में नीले फूल खिलखिला रहे हैं। रंग-बिरंगे फूलों पर उड़ती-फिरती रंग-बिरंगी तितलियाँ वसुधा का रोमांच प्रकट कर रही हैं।
प्रश्न 2 – कवि ने तितलियों और फूलों में क्या समानता दिखाई है? उनके सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर – कवि ने फूलों और तितलियों में रंगों की विविधता की दृष्टि से समानता दिखाई है। गाँव में चारों ओर रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। उन पर रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडरा रही हैं। वे तितलियाँ जंब एक वृन्त से दूसरे वृन्त पर जाती हैं तो ऐसा लगता है, मानो फूल ही एक वृन्त से दूसरे वृन्त पर उड़कर जा रहे हैं।
प्रश्न 3 – कविता ‘ ग्राम श्री’ के द्वारा कविवर पन्त की कौन- सी काव्य-प्रवृत्ति निखरकर सामने आती है?
उत्तर – कविता ‘ग्राम श्री’ के द्वारा कविवर पन्त का प्रकृति – प्रेम, कोमल कल्पना और स्वच्छन्द प्रवृत्ति निखरकर सामने आती है। ग्रामीण प्रकृति के सूक्ष्म वर्णन में उनका शब्द-शिल्प देखते ही बनता है। भारतीय गाँव की वास्तविक सुषमा उसकी कृषि से ही है, यह बात बखूबी इस कविता में दिखाई पड़ती है। कवि ने गंगा के तट, सर्दी की मौसमी सब्जियों और फलों के नाम ऐसी तन्मयता से गिनाए हैं कि धूप, लहलहाती खेती, फूलों और फलों की भरपूर फसल, अनेकानेक कवि उनके विषय में पूर्ण ज्ञान रखनेवाला प्रतीत होता है। सूरज, चाँद, तारे, धरती, आकाश, नदी आदि के वर्णन में कवि ने सम्पूर्ण प्रकृति-जगत् को शब्दों के द्वारा जीवन्त कर दिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कवि निश्चय ही गम्भीर एवं सूक्ष्म प्रकृति-प्रेमी है।

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