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UK Board 9 Class Hindi Chapter 2 – प्रहेलिकाः (संस्कृत विनोदिनी)

UK Board 9 Class Hindi Chapter 2 – प्रहेलिकाः (संस्कृत विनोदिनी)

UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 2 – प्रहेलिकाः (संस्कृत विनोदिनी)

प्रहेलिकाः (पहेलियाँ)
पाठ का सार
  1. बिना पैर के दूर तक जाता है और साक्षर है, किन्तु पण्डित नहीं है। बिना मुख के बोलता है, जो जानता है, वह पण्डित है।
  2. एक आँखवाला है, किन्तु कौआ नहीं है। बिल को चाहता हुआ भी साँप नहीं है। घटता और बढ़ता रहता है, किन्तु न समुद्र है और न चन्द्रमा।
  3. वृक्ष पर रहता है मगर पक्षी नहीं है; तीन आँखोंवाला है, किन्तु शिवजी नहीं है। छाल के वस्त्र पहनता है, किन्तु साधु नहीं है। जल से भरा है, किन्तु न बादल है और न घड़ा।
  4. कृष्ण ने किसको मारा? कौन शीतल बहनेवाली गंगा है? कौन पत्नी के पोषण में लगे हैं? किस बलवान को शीत पीड़ा नहीं पहुंचाता है?
पाठाधारित अवबोधन-कार्य एवं भावानुवाद
निर्देशः – अधोलिखितं पद्यांशं पठित्वा प्रश्नान् उत्तरत-
(1) अपदो दूरगामी ………. स पण्डितः ॥
शब्दार्थाः – अपदः = (न पदः यस्य सः – बहुव्रीहिः) जिसके पैर नहीं हैं; दूरगामी = दूर तक जानेवाला है; साक्षरः = (अक्षरण सहित: – तत्पुरुषः) अक्षरों से युक्त, जिसे अक्षर ज्ञान हो; पण्डितः = विद्वान्; अमुखः = (न मुखं यस्य सः – बहुव्रीहि: ) जिसका मुख नहीं है; यः = जो; जानाति = जानता है।
अन्वयः – अपदः दूरगामी च साक्षरः च, न पण्डितः, अमुखः स्फुटवक्ता च यः जानाति सः पण्डितः ।
संस्कृत-भावार्थ:—पदेन हीनः अस्ति, किन्तु दूरं गच्छति; साक्षरः अस्ति, किन्तु पण्डितः नास्ति; मुखेन हीनः अस्ति, किन्तु स्पष्टं वदति; अस्य विषये यः जानाति, सः विद्वान् जनः अस्ति ।
अस्याः प्रहेलिकायाः उत्तरं ‘पत्रम्’ अस्ति; यतः पत्रं पदं विना दूरं गच्छति, अक्षरैः युक्तः भवति, किन्तु विद्वान् नास्ति, मुखहीनः भूत्वा अपि स्पष्टं बोधयति ।
सन्दर्भ: – प्रस्तुत प्रहेलिका हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत विनोदिनी ( भाग – प्रथमः ) ‘ के ‘प्रहेलिकाः ‘ नामक पाठ से उद्धृत है।
प्रसंग : – ‘पत्र’ को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत प्रहेलिका की रचना की गई है। इसमें पत्र के गुणों का वर्णन किया गया है।
हिन्दी – भावानुवादः – जिसके पैर नहीं हैं और दूर तक जानेवाला है; अक्षरों से युक्त है और पण्डित नहीं है; मुख नहीं है और स्पष्ट बोलनेवाला है; जो (उसे ) जानता है वह पण्डित है।
अर्थात् पैरों से हीन (रहित) है, किन्तु दूर तक जाता है; अक्षर ज्ञानवाला है, किन्तु विद्वान् नहीं है; मुखरहित है, किन्तु स्पष्ट बोलता है; इसके विषय में जो जानता है, वह विद्वान् व्यक्ति
इस पहेली का उत्तर ‘पत्र’ है; क्योंकि पत्र बिना पैर के दूर तक जाता है, अक्षरों से युक्त होता है, किन्तु विद्वान् नहीं है, मुखरहित होकर भी स्पष्ट बोलता है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नाः- 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) कीदृशः दूरगामी अस्ति?
(ख) साक्षरः अस्ति, किन्तु किं न अस्ति ?
(ग) यः जानाति, सः कः ?
उत्तरम् – (क) अपद:, (ख) पण्डितः, (ग) पण्डितः ।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) पदेनहीनः अस्ति, तथापि किं करोति ?
(ख) अमुखः अस्ति, तथापि कीदृशः अस्ति ?
(ग) पण्डितः कः अस्ति ?
उत्तरम् – (क) पदेनहीनः अस्ति, तथापि दूरं गच्छति ।
(ख) अमुखः अस्ति, तथापि स्फुटवक्ता अस्ति ।
(ग) यः ‘पत्र – विषये’ जानाति, सः पण्डितः अस्ति ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘मूर्ख’ अस्य विलोमपदं किम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(ख) ‘अक्षरेण सहित:’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम् ?
(ग) अत्र क्रियापदं किम् ?
उत्तरम् — (क) पण्डितः, (ख) साक्षर:, (ग) जानाति ।
(2) एकचक्षुर्न ………….. चन्द्रमाः ॥
शब्दार्थाः– चक्षुः = (चक्षुस् + सु) नेत्र ; काकः = कौआ; बिलम् = बिल को; इच्छन् = चाहता हुआ; पन्नगः = सर्प; क्षीयते = घटता है; वर्धते = बढ़ता है।
अन्वयः – अयम् एकचक्षुः, काकः न; बिलम् इच्छन् पन्नगः न; क्षीयते वर्धते च एव न समुद्रः, न चन्द्रमाः ।
संस्कृत – भावार्थ::- अस्य एकं नेत्रम् अस्ति, किन्तु काकः नास्ति; बिलम् इच्छति, किन्तु सर्प: नास्ति; क्षयं प्राप्नोति, पुनः वृद्धि च प्राप्नोति किन्तु समुद्रः अपि नास्ति, चन्द्रमाः अपि नास्ति ।
अस्याः प्रहेलिकायाः उत्तरं ‘सूची’ अस्ति; यतः तस्याम् एकं छिद्रं (नेत्रम्) भवति, सीवनकाले वस्त्रं प्रविशति; अतः अन्त: प्रवेशसमये क्षयं याति पुनः बहिरागमनसमये वृद्धिं प्राप्नोति च ।
प्रसंग :- ‘सुई’ को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत प्रहेलिका की रचना की गई है। इसमें सुई के ‘गुण-धर्म’ पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी – भावानुवादः – यह एक नेत्र का है, कौआ नहीं है; बिल को चाहता हुआ सर्प नहीं है; घटता है और बढ़ता ही है, न समुद्र है, न चन्द्रमा है।
अर्थात् इसके एक नेत्र है, किन्तु कौआ नहीं है; बिल को चाहता है, किन्तु सर्प नहीं है, क्षय ( ह्रास) प्राप्त करता है और फिर वृद्धि प्राप्त करता है, किन्तु समुद्र भी नहीं है, चन्द्रमा भी नहीं है।
इस पहेली का उत्तर सुई है; क्योंकि उसमें एक छेद (नेत्र) होता है, सिलाई करते समय वस्त्र में प्रवेश करती है; अतः (वस्त्र में) अन्दर प्रवेश करते समय क्षय प्राप्त करती है और फिर (वस्त्र से) बाहर आते समय वृद्धि प्राप्त करती है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नाः- 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) एकचक्षुः कः भवति ?
(ख) पन्नगः किम् इच्छति ?
(ग) प्रहेलिकया: उत्तरं किम् ?
उत्तरम्— (क) काक:, (ख) बिलम्, (ग) सूची।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) काकः कीदृशः भवति ?
(ख) क: बिलम् इच्छति ?
(ग) कः कः क्षीयते वर्धते च ?
उत्तरम्- (क) काकः एकचक्षुः भवति ।
(ख) पन्नगः बिलम् इच्छति ।
(ग) समुद्रः चन्द्रमा: च क्षीयते वर्धते च ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘बिलमिच्छन्न’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत |
(ख) ‘सर्प:’ इत्यस्य पर्यायवाचिपदम् अत्र किम् ?
(ग) ‘चन्द्रमा: ‘ अत्र प्रयुक्तं वचनं किम् ?
(घ) ‘वर्धते’ अस्मिन् क्रियापदे धातुनिर्देशं कुरुत ।
उत्तरम् – (क) बिलम् + इच्छन् + न, (ख) पन्नगः, (ग) एकवचनम्, (घ) वृध्।
(3) वृक्षाग्रवासी ……………. न मेघः ॥
शब्दार्था: – वृक्षाग्रवासी = (वृक्ष + अग्रवासी – दीर्घ सन्धि ) वृक्ष के अग्रभाग अथवा ऊपर रहनेवाला; पक्षिराजः = पक्षियों का राजा; त्रिनेत्रधारी = तीन नेत्रों को धारण करनेवाला; शूलपाणिः = (शूलम् अस्ति पाणौ यस्य सः – बहुव्रीहिः ) शिव; त्वग्वस्त्रधारी = (त्वच् + वस्त्रधारी – हल सन्धिः, सूत्र – ‘चोः कुः’ से चवर्ग के स्थान पर कवर्ग हो जाता है) छाल के वस्त्र पहननेवाला; बिभ्रत् = (√ भृ + शतृ प्रत्यय, नपुं०) धारण करता है; घटः = घड़ा; मेघः = बादल ।
अन्वयः – वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः; त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणि: ; त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी, जलं च बिभ्रत् न घटः न मेघः ।
संस्कृत – भावार्थ:- वृक्षस्य अग्रभागे निवसति, किन्तु पक्षिराजः गरुडः नास्ति त्रीणि नेत्राणि सन्ति, किन्तु शिवः नास्ति; त्वचः वस्त्रं धरति, किन्तु सिद्धयोगी नास्ति; अन्तः जलं धारयति, किन्तु घटः नास्ति; नैव मेघः अस्ति।
अस्याः प्रहेलिकायाः उत्तरं नारिकेलफलम् अस्ति; यतः तत् वृक्षस्य उपरि लगति, तस्य त्रीणि नेत्राणि भवन्ति, तत् त्वचः आवरणं धारयति, तस्य अन्तः जलम् अपि भवति ।
प्रसंग :- ‘नारियल’ को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत प्रहेलिका की रचना की गई है। इसमें नारियल की विशेषताओं को संकेत करके बुद्धि परीक्षा का प्रयास किया गया है।
हिन्दी – भावानुवादः – वृक्ष के अग्रभाग पर अर्थात् चोटी पर रहनेवाला है और पक्षियों का राजा नहीं है; तीन नेत्रों को धारण करनेवाला. है और त्रिशूल को हाथ में धारण करनेवाला शिव (शंकर) नहीं है; छाल के वस्त्र धारण करनेवाला है और सिद्ध योगी नहीं है तथा जल को धारण करता हुआ न घड़ा है, न बादल है।
अर्थात् वृक्ष के अग्रभाग (चोटी) में निवास करता है, किन्तु पक्षियों का राजा गरुड़ नहीं है; उसके तीन नेत्र हैं; किन्तु त्रिनेत्रधारी शिव नहीं है; छाल के वस्त्र पहनता है, किन्तु सिद्ध योगी नहीं है; अपने भीतर जल धारण करता है, किन्तु घड़ा नहीं है और न ही वह बादल है ।
इस पहेली का उत्तर नारियल का फल है; क्योंकि वह वृक्ष के ऊपरी भाग में लगता है। उसके तीन नेत्र होते हैं; वह छाल का आवरण धारण किए होता है, उसके भीतर जल भी होता है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नाः- 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) अत्र वृक्षाग्रवासी कः कथितः ?
(ख) त्रिनेत्रधारी कः ?
(ग) घटः किं बिभ्रत् ?
उत्तरम्— (क) पक्षिराज:, (ख) शूलपाणि:, (ग) जलम् ।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) पक्षिराजः कुत्र निवसति ?
(ख) शूलपाणिः कीदृशः कथितः ?
(ग) सिद्धयोगी किं धारयति ?
उत्तरम् – (क) पक्षिराज: वृक्षस्य अग्रभागे निवसति ।
(ख) शूलपाणि: त्रिनेत्रधारी कथितः ।
(ग) सिद्धयोगी त्वचः वस्त्रं धारयति ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत—
(क) ‘शूलपाणिः’ इत्यस्य पर्यायवाचिपदं किम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(ख) ‘पक्षिणां राज:’ इत्यर्थे किं पदम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(ग) ‘बिभ्रन्न’ अस्य सन्धिच्छेदं कुरुत ।
उत्तरम् – (क) त्रिनेत्रधारी, (ख) पक्षिराज:, (ग) बिभ्रत् + न
(4) कं संजघान ………….. बाधते शीतम् ॥
शब्दार्थाः – कं = किसको; संजघान = ( सम् उपसर्ग + हन् धातु, लिट्लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन) मारा; का = कौन; शीतलवाहिनी = शीतल रूप में बहनेवाली; के = कौन (बहुवचन); दारपोषणरताः = पत्नी के पोषण में लगे हुए; केदार = खेत; पोषणरता: = पोषण में लगे हुए; बलवन्तम् = बलवान् का; बाधते = पीड़ा पहुँचाता है; शीतम् = शीत, ठण्ड ।
अन्वयः – कृष्णः कं संजघान का शीतलवाहिनी गंगा, के दारपोषणरताः, कं बलवन्तं न बाधते शीतम् ।
संस्कृत भावार्थ::- अस्याः प्रहेलिकायाः उत्तराणि पृथक्पदानि संयोज्य, संयुक्तपदानि च विभज्य प्राप्तुं शक्यन्ते ।
प्रसंग : – प्रस्तुत प्रहेलिका श्लोक में चार प्रहेलिकाएँ अर्थात् कूट प्रश्न निहित हैं और उनके उत्तर भी इसी में छिपे हैं। प्रश्न और उत्तरों में केवल अन्वय का अन्तर है। प्रहेलिका के रूप में तो श्लोक दिया ही है और इसका अन्वय ऊपर दिया गया है, किन्तु प्रहेलिका का उत्तर जानने के लिए इसका अन्वय इस रूप में किया जाएगा-
“कृष्णः कंसं जघान, काशीतलवाहिनी गंगा, केदारपोषणरताः, कंबलवन्तं न बाधते शीतम् । “
इस श्लोक में ‘कृष्ण:, गंगा, दारपोषणरता:’ और ‘शीतम्’ के संकेत द्वारा पहेलियाँ पूछी गई हैं।
हिन्दी – भावानुवादः – कृष्ण ने किसको मारा? कौन शीतलवाहिनी गंगावाली है ? कौन पत्नी के पोषण में लगे हैं? किस बलवान् को ठण्ड पीड़ा नहीं पहुँचाती ?
इस पहेली में पूछे गए संस्कृत प्रश्न और उनके संस्कृत उत्तर इस प्रकार हैं—
प्रश्न: – कृष्णः कं संजघान ?
उत्तरम् – कृष्णः कंसं जघान ।
प्रश्नः – का शीतलवाहिनी गंगा ?
उत्तरम् – काशीतलवाहिनी गंगा ।
प्रश्न: – केदारपोषणरता: ?
उत्तरम् – केदारपोषणरताः ।
प्रश्न: – कं बलवन्तं न बाधते शीतम् ?
उत्तरम् – कम्बलवन्तं न बाधते शीतम् ।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नाः- 1. एकपदेन उत्तरत-
(क) कृष्णः कं संजघान ?
(ख) गंगा कीदृशी कथिता ?
(ग) कम्बलवन्तं किं न बाधते ?
उत्तरम् — (क) कंसम्, (ख) शीतलवाहिनी, (ग) शीतम् ।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(क) कंसं क: जघान ?
(ख) काशीतलवाहिनी का ?
(ग) अत्र किं पोषणरता: ?
(घ) शीतं कं न बाधते ?
उत्तरम् – (क) कंसं कृष्णः जघान ।
(ख) काशीतलवाहिनी गङ्गा ।
(ग) अत्र केदारं पोषणरताः ।
(घ) शीतं कंबलवन्तं न बाधते ।
3. निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(क) ‘कं संजघान कृष्णः’ अत्र प्रयुक्तं क्रियापदं किम् ?
(ख) ‘पीड्यते’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ग) ‘बलवन्तम्’ अस्य प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत ।
(घ) ‘जघान’ इत्यस्य क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् अत्र ?
उत्तरम् – (क) संजघान,
(ख) बाधते,
(ग) ‘बल’ शब्द, वतुप् प्रत्यय, द्वितीया विभक्ति एकवचन।
(घ) कृष्णः ।
सम्पूर्णपाठाधारिताः अभ्यासप्रश्नाः
(1) श्लोकेषु एव उत्तराणि अन्वेष्टव्यानि—
(क) कं संजघान कृष्णः ? का शीतलवाहिनी गंगा?
उत्तरम् — कंसं जघान कृष्णः । काशीतलवाहिनी गंगा ।
(ख) के दारपोषणरता: ? कं बलवन्तं न बाधते शीतम् ?
उत्तरम् — केदार पोषणरताः । कंबलवन्तं न बाधते शीतम् ।
(2) रिक्तस्थानानि पूरयत-
(क) अमुखः ……… साक्षरो न च ……… ।
(ख) ……… काकोऽयं ……….. न ……… ।
(ग) त्वग्वस्त्रधारी ………… जलं च ………… न ………. न मेघः ।
(घ) कं बलवन्तं …………… शीतम् ।
उत्तरम्—
(क) अमुखः स्फुटवक्ता साक्षरो न च पण्डितः ।
(ख) एकचक्षुर्न काकोऽयं बिलमिच्छन्न पन्नगः ।
(ग) त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी जलं च बिभ्रत् न घटो न मेघः ।
(घ) कं बलवन्तं न बाधते शीतम् ।
(3) अधोलिखितप्रश्नान् संस्कृतेन उत्तरत-
(नीचे लिखे प्रश्नों के संस्कृत में उत्तर लिखो — )
(क) सर्पः किम् इच्छति ?
उत्तरम् – सर्प: बिलम् इच्छति ।
(ख) घटः किं धारयति ?
उत्तरम् — घटः जलं धारयति ।
(ग) कृष्णः कं संजघान ?
उत्तरम् — कृष्णः कंसं जघान ।
(घ) शूलपाणिः कस्य पर्यायः अस्ति?
उत्तरम् — शूलपाणि: शिवस्य पर्यायः अस्ति ।
(4) उचितम् उत्तरं चिनुत-
(अ) कृष्णः कं संजघान ?
(क) मारीचम्
(ख) महिषासुरम्
(ग) घटोत्कचम्
(घ) कंसम्
(ब) कः क्षीणोऽपि पुनः वर्धते ?
(क) सूर्य:
(ख) चन्द्रः
(ग) अग्निः
(घ) वृक्ष:
(स) त्रिनेत्रधारी कः अस्ति?
(क) गरुड:
(ख) शिवः
(ग) वामन:
(घ) उलूकः
(द) कम्बलवन्तं किं न बाधते?
(क) शीतम्
(ख) जलम्
(ग) बलम्
(घ) तापम्
उत्तरम् — (अ) (घ) कंसम्, (ब) (ख) चन्द्रः, (स) (ख) शिव:, (द) (क) शीतम्।
(5) अधोलिखितैः पदैः एकैकं वाक्यं लिखत-
पदानि                         वाक्यानि
(क) चक्षुः                   –  काकः एकचक्षुः भवति ।
(ख) सिद्धयोगी           – सिद्धयोगी वने निवसति ।
(ग) मेघ:                    – मेघः जलं वर्षति ।
(घ) दूरगामी              – मिसाइलाग्नेयास्त्रः दूरगामी भवति ।

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