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UK Board 9 Class Hindi Chapter 4 – साँवले सपनों की याद (गद्य-खण्ड)

UK Board 9 Class Hindi Chapter 4 – साँवले सपनों की याद (गद्य-खण्ड)

UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 4 – साँवले सपनों की याद (क्षितिज : गद्य-खण्ड)

I. लेखक – परिचय
प्रश्न— गद्यकार जाबिर हुसैन का जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए । उनकी किन्हीं दो रचनाओं का नामोल्लेख भी कीजिए ।
उत्तर- जाबिर हुसैन
जीवन-परिचय—कलात्मक भाषा-शैली के धनी जाबिर हुसैन राजनीतिज्ञ होने के साथ – साथ श्रेष्ठ लेखक भी हैं। जाबिर हुसैन का जन्म सन् 1945 ई० में बिहार प्रदेश के नालन्दा जिले के नौनही शिक्षा ग्रहण की। उपाधि प्राप्त करने के बाद वे अंग्रेजी भाषा और राजगिर गाँव में हुआ था। उन्होंने स्नातकोत्तर तक अंग्रेजी साहित्य की साहित्य के प्राध्यापक भी नियुक्त हुए। वे आरम्भ से ही देश की राजनीति में सक्रिय रहे। सन् 1977 ई० में उन्होंने मुंगेर विधानसभा का चुनाव जीता और मन्त्रिपद प्राप्त किया। सन् 1995 ई० में वे बिहार विधान परिषद् के सभापति चुने गए। राजनीतिज्ञ होने के साथ अपने अनुभवों को उन्होंने विविध प्रकार से गद्यबद्ध किया है।
रचनाएँ – डोला बीबी का मजार, जो आगे हैं, अतीत का चेहरा, लोगों, एक नदी रेत भरी आदि।
साहित्यिक विशेषताएँ- जाबिर हुसैन हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी तीनों भाषाओं के अच्छे जानकार हैं। उन्होंने अपने साहित्य में आम आदमी के संघर्षो को वाणी दी है। उनके लेखन में उनके राजनैतिक अनुभवों का भी बड़ा योगदान रहा है।
जाबिर हुसैन की डायरी – कला पर विशेष चर्चा होती रही है। उन्होंने विशिष्ट व्यक्तित्वों पर प्रभावपूर्ण डायरियाँ लिखी हैं। उन्होंने इस विधा की प्रस्तुति, शैली और शिल्प में नए प्रयोग भी किए। जाबिर हुसैन के डायरी लेखन के सम्बन्ध में किसी शायर ने कहा है-“ये मुख्तसर तहरीरें न डायरी के जुमेर में आती हैं, न कहानी के, न कथा- रिपोर्ताज के, इन्हें तो खालिस जाबिरनामा ही कहना चाहिए। “
भाषा-शैली- जाबिर हुसैन की भाषा-शैली कलात्मक है। भाव अनुभवों से जन्मते हैं और फिर लेखन कला में ढलते हैं। ‘साँवले सपनों की याद’ ऐसा गद्य-लेख है, जिसे न तो संस्मण माना जा सकता है, न रेखाचित्र, न ही इससे वास्तविकता का सही-सही आकलन होता है। वास्तव में उनके शब्द व्यक्तित्व का प्रभाव चित्र उपस्थित कर देते हैं। वे व्यक्ति को शब्द से अशब्द की ओर ले जाते हैं।
जाबिर हुसैन की भाषा में संस्कृत के प्रचलित शब्दों की अपेक्षा तद्भव शब्दों तथा उर्दू के शब्दों की अधिकता दिखती है। उनकी भाषा में जहाँ एक ओर अनुरोध, प्रकृति, अनुभव, सम्भावित जैसे प्रचलित संस्कृत शब्द हैं तो वहीं दूसरी ओर उर्दू के हिफाजत, हिदायत, सैलानी, वकालत आदि शब्द भी दृष्टिगत होते हैं। सोता, पंछी, माखन, भाँड मौत जैसे आम बोलचाल के शब्द भी धड़ल्ले से उनकी भाषा में प्रयुक्त होते हैं। अंग्रेजी के शब्द बर्ड वाचर, एयर गन, मिथ भी स्वाभाविकता के साथ आए हैं। –
संक्षेप में जाबिर हुसैन की भाषा-शैली दिल को छूनेवाली, सहज, लेकिन अनोखी है।
II. अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न – निम्नलिखित गद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
1. सुनहरे परिंदों …………….. गा सकेगा !
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) ‘सुनहरे परिन्दों से कहाँ संभव है’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) ‘मौत की खामोश वादी’ किसे कहा गया है?
(घ) सालिम अली का शब्द-चित्र प्रस्तुत कीजिए ।
(ङ) यह सफर अन्य सफरों से भिन्न कैसे है?
(च) सालिम अली की वन-पक्षी से तुलना करना कहाँ तक उचित है?
उत्तर :
(क) पाठ— साँवले सपनों की याद । लेखक – जाबिर हुसैन |
(ख) आशय – प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी सालिम अली की अन्तिम यात्रा को याद करते हुए लेखक जाबिर हुसैन लिखते हैं- उनकी शव यात्रा को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो सुनहरे पक्षियों के पंखों पर साँवले सपनों का एक झुण्ड सवारी कर रहा है। यह झुण्ड मौत की घाटी की ओर उड़ता चला जा रहा है। उसकी इस उड़ान को कोई रोक नहीं सकता।
गद्यांश का संकेत यह है कि सालिम अली अपने जीवन के अन्तिम पल तक पक्षियों के अनेक सुन्दर, अनजाने रहस्यों को जानने- सुलझाने में लगे रहे। अनेक सुन्दर कल्पनाएँ और इच्छाएँ लिए हुए वे जीवनभर यात्राएँ करते रहे और उनकी यह अन्तिम यात्रा भी लगता है, उनके सपनों को साकार करने के लिए ही है।
(ग) ‘मौत की खामोश वादी’ कब्रिस्तान को कहा गया है।
(घ) सालिम अली अथक यात्री हैं। उनके कन्धों पर सदा यात्रा से सम्बन्धित सामान लदा रहता है। आँखों पर दूरबीन चढ़ी होती है। इस दूरबीन से वे प्रकृति के सुन्दर रहस्यों को दूर तक देखते हैं।
(ङ) यह सफर अन्य सफरों से भिन्न इसलिए है कि पिछले सफरों में सालिम अली कुछ-न-कुछ नए रहस्य और परिणाम लेकर लौटते रहे हैं, परन्तु इस सफर में लौटने का कोई अवसर नहीं है। यह तो मृत्यु की अन्तिम यात्रा है। इससे कोई कभी नहीं लौटा है।
(च) सालिम अली की वन पक्षी से तुलना करना लेखक की भावमयता का प्रतीक है। यह अत्यन्त समीचीन तुलना है। सालिम अली की तुलना लेखक ने उस वन-पक्षी से की है, जो जीवन का अन्तिम गीत गाकर मौत की घाटी में प्रवेश कर रहा हो। सालिम अली पक्षियों के जीवन के साथ एकमेव हो गए थे। पक्षियों के सम्बन्ध में नई-नई बातें जानने के लिए उठते-बैठते, जागते-सोते वह उन्हीं में खोए रहते थे। एक प्रकार से वह स्वयं वन- पक्षी ही हो गए थे; अतः वन-पक्षी से उनकी तुलना अतीव सुन्दर है।.
2. वर्षों पूर्व …………….. सकता है?
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) सालिम अली की पक्षियों के सम्बन्ध में लोगों से क्या अपेक्षा थी?
(ग) प्रकृति को आदमी अपनी नजर से देखता है, क्यों?
(घ) पक्षियों के मधुर संगीत से मनुष्य रोमांच क्यों नहीं महसूस करता ?
(ङ) रोमांच का सोता फूटने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
(क) पाठ – साँवले सपनों की याद । लेखक – जाबिर हुसैन।
(ख) सालिम अली की पक्षियों के सम्बन्ध में लोगों से अपेक्षा थी कि वे उन्हें पक्षियों की नजर से ही देखें, अपनी नजर से नहीं। वे उन्हें अपनी कल्पना के रूप-रंग और अपनी पसन्द के क्रीडा – कौतुक करते देखना चाहते हैं जो कि सालिम अली को अनुचित लगता था ।
(ग) प्रकृति को आदमी अपनी नजर से देखता है। वह सोचता है कि ये सब वस्तुएँ निर्जीव हैं और वह उन पर अपना हक दिखा सकता है। वह प्रकृति की प्रत्येक वस्तु को अपने हानि-लाभ, उपयोग – अनुपयोग की दृष्टि से जाँचता – परखता है। सही और स्पष्ट शब्दों में मनुष्य ऐसा स्वार्थवश करता है।
(घ) पक्षियों के मधुर संगीत से मनुष्य रोमांच महसूस नहीं कर पाता; क्योंकि वह उनकी भाषा नहीं समझता। पक्षी अपनी अनुभूति या भावों को जिन स्वरों या क्रियाओं से व्यक्त करते हैं, मनुष्य उन्हें समझ नहीं पाता, इसलिए वह पक्षियों के मधुर स्वरों को सुनकर रोमांच का अनुभव नहीं कर पाता ।
(ङ) रोमांच का सोता फूटना से अभिप्राय है— मन में आनन्द की लहरें उठना।
3. कोई आज ……………. हुआ है क्या!
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) नदी का जल यात्री को क्या याद दिला देता है?
(ग) वृंदावन में सुबह-सवेरे क्या अनुभूति होती हैं और क्यों?
(घ) वृंदावन में सन्ध्या-समय क्या अनुभूति होती है और क्यों?
(ङ) वृंदावन कृष्ण की बाँसुरी के जादू से खाली क्यों नहीं होता?
उत्तर :
(क) पाठ—साँवले सपनों की याद । लेखक – जाबिर हुसैन।
(ख) वृन्दावन में नदी का साँवला जल वहाँ के हर यात्री को कृष्ण की रासलीलाओं की याद दिला देता है। यमुना का साँवला जल कृष्ण की याद दिलाता है; क्योंकि कृष्ण का रंग भी साँवला था और कृष्ण ने इसी जल के अन्दर और यमुना के किनारे लीलाएँ की थीं। कृष्ण ने यहीं चंचल, किशोरी, अल्हड़ गोपियों के साथ रास रचाया था, इसी के छायादार कदम्ब के वृक्षों के नीचे विश्राम किया था, यहीं पर बाँसुरी की तान छेड़ी थी, यहीं पर ग्वालों के साथ माखनचोरी की थी और दही-दूध का भोग लगाया था।
(ग) वृन्दावन में सुबह सूरज निकलने के साथ ऐसा अनुभव होता है, मानो यमुना की ओर आती भीड़ के बीच से निकलकर कन्हैया वंशी की तान छेड़कर सबको मन्त्रमुग्ध कर देगा; क्योंकि सभी भारतीयों को ऐसी अनुभूति इसलिए होती है कि कृष्ण का वंशी-वादन संस्कारगत रूप में सबकी स्मृतियों में समाया हुआ है। इसलिए वृन्दावन की गलियों में जाते ही कृष्ण की लीलाएँ और उनसे सम्बन्धित घटनाएँ याद आने लगती हैं।
(घ) वृन्दावन में सन्ध्या- समय सूरज ढलने के साथ ऐसी अनुभूति होती है, मानो अभी कहीं किसी झुरमुट से कृष्ण मनमोहिनी वंशी बजाते हुए निकल आएँगे; क्योंकि सभी भारतीयों की स्मृति में यह बात ताजा है कि कृष्ण गायों को चराकर लौटते समय गायों को एकत्र करने के लिए प्रायः वशी की तान छेड़ा करते थे।
(ङ) वृन्दावन कृष्ण की बाँसुरी के जादू से कभी खाली नहीं होता। यह कृष्ण के कारण एक तीर्थ स्थल हो गया है। यहाँ वर्षभर कृष्ण-भक्तों की आवाजाही लगी रहती है। कृष्ण से सम्बन्धित सभी वस्तुओं के दर्शन करने भक्तगण यहाँ आते रहते हैं। सुबह-शाम वे हर समय कृष्ण के नाम की माला जपते रहते हैं। उनके मन में कृष्ण की वंशी का मधुर स्वर गूँजता रहता है, इसलिए कहा जाता है कि वृन्दावन कृष्ण की बाँसुरी के जादू से कभी खाली नहीं होता ।
4. उम्र को …………… उतरी थी।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) सालिम अली ने कितना लम्बा जीवन जिया ?
(ग) उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में लेखक का क्या विचार है?
(घ) सालिम अली जीवन के अन्त तक किस साधना में रत रहे?
(ङ) सालिम अली का शरीर कमजोर क्यों हो गया था?
(च) सालिम अली की आँखें किसको समर्पित थीं?
उत्तर :
(क) पाठ— साँवले सपनों की याद । लेखक – जाबिर हुसैन |
(ख) सालिम अली ने सौ वर्ष में कुछ कम दिन का ही सही, पर लम्बा जीवन जिया ।
(ग) उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में लेखक का मानना है कि हो सकता है कि लम्बी यात्राओं ने उन्हें थका दिया हो, परन्तु उनकी मृत्यु कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से हुई।
(घ) सालिम अली जीवन के अन्त तक अपने पक्षी-प्रेम के वश में पक्षियों के सुन्दर और रहस्यमय संसार की खोज और उनकी सुरक्षा की साधना में रत रहे ।
(ङ) पक्षियों के प्रेम में सालिम अली लगातार यात्राएँ करते रहे। इन्हीं लम्बी अनवरत यात्राओं के कारण उनका शरीर कमजोर हो गया था।
(च) सालिम अली की आँखें पक्षियों की सुरक्षा को समर्पित थीं।
5. डी० एच० लॉरेंस ……………. रखती है।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) डी०एच० लॉरेंस के विषय में पाँच वाक्य लिखिए।
(ग) फ्रीडा कौन थी? उसने लॉरेंस के बारे में लिखने से क्यों मना किया?
(घ) लॉरेंस के बारे में फ्रीडा से अधिक कौन जानता था ? इससे लॉरेंस के किस गुण का पता चलता है?
(ङ) रगों और हड्डियों में बसने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
(क) पाठ- साँवले सपनों की याद । लेखक – जाबिर हुसैन ।
(ख) डी० एच० लॉरेंस अंग्रेजी के एक अच्छे उपन्यासकार एवं कवि थे। वे अपने प्रकृति प्रेम एवं तत्सम्बन्धी कविताओं के लिए विख्यात हैं। उनकी पत्नी का नाम फ्रीडा लॉरेंस था। कवि लॉरेंस का पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम भी गहरा था। वह सीधे-सादे व अत्यन्त खुलेदिल के सज्जन व्यक्ति थे ।
(ग) फ्रीडा डी० एच० लॉरेंस की पत्नी थी। उसने अपने पति के बारे में लिखने से इसलिए मना कर दिया; क्योंकि उसका सोचना था कि लॉरेंस के बारे में उसकी छत पर बैठनेवाली गौरैया उससे कहीं अधिक जानती है।
(घ) लॉरेंस के बारे में सबसे अधिक जाननेवाली थी उनकी छत पर बैठनेवाली गौरैया; क्योंकि लॉरेंस उसके साथ काफी समय व्यतीत करते थे। उनके प्रेम, दया, सहानुभूति जैसे मानवीय गुणों की वही सच्ची साक्षी और उपभोक्ता थी । इसीलिए वह गौरैया लॉरेंस की नजदीकी मित्र बन गई थी।
इस बात से लॉरेंस के अगध प्रकृति-प्रेमी एवं पक्षी प्रेमी होने के गुणों का पता चलता है।
(ङ) रगों और हड्डियों में बसने से अभिप्राय है— जीवन अथवा प्रत्येक स्मृति में समा जाना।
6. जटिल प्राणियों ……………. गए थे।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) जटिल प्राणियों के लिए सालिम अली एक पहेली बने रहेंगे। क्यों?
(घ) सालिम अली को नई-नई खोजों के लिए किस घटना ने प्रेरित किया?
(ङ) लॉरेंस और सालिम अली में क्या समानता थी?
(च) नैसर्गिक जिन्दगी का प्रतिरूप बनने से क्या आशय है?
उत्तर :
(क) पाठ—साँवले सपनों की याद । लेखक – जाबिर हुसैन।
(ख) जो लोग स्वभाव से जटिल हैं अर्थात् सरल हृदय नहीं हैं, वे सालिम अली को एक अबूझ पहेली की भाँति कभी नहीं समझ पाएँगे । सालिम अली इतने सीधे-सरल इनसान थे कि जटिल प्रकृति के लोग उनकी इस सरलहृदयता को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएँगे। वे सोच भी नहीं सकते कि एक सरल आदमी इतना महान् कैसे हो सकता है; क्योंकि प्रायः जटिल और रहस्यमय आदमी को ही बड़ा आदमी माना जाता है।
उनकी सरलता और सहृदयता का पता इसी से चलता है कि बाल्यावस्था में एक बार उनकी एयरगन से एक नीले कण्ठवाली गौरैया घायल हो गई थी। तब से ही सालिम अली उस गौरैया की देखभाल करने के साथ-साथ पक्षी – जीवन के रहस्यों की खोज और सुरक्षा में लग गए । पक्षियों के जीवन में उनकी रुचि इतनी बढ़ी कि उनसे सम्बन्धित नई-नई खोजों को उन्होंने अपना जीवन ही समर्पित कर दिया । जीवनभर वे इसी दिशा में कार्यरत रहे। अपने संकल्प-पथ से वे कभी डिगे नहीं। जिस प्रकार डी० एच० लॉरेंस प्रकृति में रच-बस गए थे, उसी प्रकार सालिम अली भी प्रकृतिमय हो गए थे। वे प्रकृति में तन्मय हो गए थे। उनकी जीवन-शैली प्रकृति की ही भाँति सहज हो गई थी।
(ग) जटिल प्राणियों के लिए सालिम अली एक पहेली बने रहेंगे; क्योंकि जटिल व्यक्तित्ववाले लोग यही समझते हैं कि महानता तो जटिलता, कठोरता, विशिष्टता में है, जबकि सालिम अली थे बिल्कुल सीधे – सरल व्यक्तित्ववाले। वह स्वच्छ हृदय के खुले मनवाले भोले व्यक्ति थे। इसलिए सालिम अली का जीवन और व्यक्तित्व उन्हें एक पहेली – सा लगता था। उन्हें सालिम अली रहस्यमय व्यक्ति लगते थे। उनकी सरलता लोगों का आश्चर्यचकित करती थी।
(घ) सालिम अली को नई-नई खोजों के लिए प्रेरित करनेवाली घटना उनके जीवन की बाल्यावस्था से सम्बन्धित है। बचपन में एक बार उनकी एयरगन से एक नीले कण्ठवाली गौरैया घायल होकर गिर पड़ी। तब वे उसकी सेवा में क्या लगे कि वे पक्षियों के बारे में नित नई खोजों और रहस्यों को जानने में ही जुट गए।
(ङ) लॉरेंस और सालिम अली में यह समानता थी कि ये दोनों ही व्यक्ति प्रकृति से अत्यधिक लगाव रखते थे। वे वास्तव में प्रकृतिमय हो गए थे। दोनों के जीवन में गौरैया का विशेष स्थान था। दोनों सरलहृदय के सीधे-सादे व्यक्ति थे।
(च) नैसर्गिक जिन्दगी का प्रतिरूप बनने से आशय है – निसर्ग अर्थात् प्रकृति में इस कदर खो जाना कि प्रकृति को उससे अलग न किया जा सके। अर्थात् ठीक वैसे ही स्वभाव वाला हो जाना जैसा कि प्रकृति का है।
7. सालिम अली …………… लौट आएँगे।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) ‘सालिम अली टापू नहीं, सागर थे’ से क्या अभिप्राय है?
(घ) सालिम अली ने पूरे जीवन कौन-सा महत्त्वपूर्ण कार्य किया?
(ङ) ‘टापू’ से क्या आशय है?
उत्तर :
(क) पाठ—साँवले सपनों की याद । लेखक – जाबिर हुसैन |
(ख) आशय – सालिम अली प्रकृति के संसार में टापू के समान अकेले, ऊँचे, विशिष्ट व्यक्ति तो थे, किन्तु टापू की भाँति किसी सीमा में नहीं बँधे थे। सीमाओं और स्वभाव के विषय में वे समुद्र की भाँति विराट् व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे गहरे समुद्र के समान गम्भीर एवं उदार हृदयवाले ख़ुशहाल व्यक्ति थे। उनका हृदय विशाल था। जो लोग सालिम अली के घुमक्कड़ स्वभाव तथा उनकी भ्रमणशीलता के बारे में जानते हैं, उन्हें आज भी ऐसा लगता है, जैसे वे अभी-अभी पंछियों की खोज में कहीं निकले हैं और कुछ ही देर में गले में दूरबीन लटकाए नई-नई खोजों और निर्णयों के साथ वापस लौट आएँगे। उन्हें यह विश्वास नहीं होता कि सालिम अली कभी न लौट आने के लिए गए हैं; बल्कि उन्हें लगता है कि सालिम अली अपने स्वभाव के अनुरूप पक्षियों की खोज में किसी लम्बी और दीर्घावधि की यात्रा पर गए हैं, जैसे ही उनकी वह यात्रा समाप्त होगी वे पुनः हमारे बीच अपने चिर-परिचित अन्दाज में उपस्थित होंगे।
(ग) ‘सालिम अली टापू नहीं, सागर थे’ से अभिप्राय है कि सालिम अली का ज्ञान टापू के समान सीमित और स्थिर नहीं था, वरन् उनका ज्ञान तो सागर के समान गहरा, असीमित और विस्तृत था ।
(घ) सालिम अली ने अपना पूरा जीवन पक्षियों के जीवन से सम्बन्धित नई-नई खोजों पर लगाया और उनकी सुरक्षा के लिए वे सदा सक्रिय रहे।
(ङ) ‘टापू’ से आशय है— सीमा में बँध जाना ।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर 
प्रश्न 1 – किस घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा को बदल दिया और उन्हें पक्षी प्रेमी बना दिया?
उत्तर – एक बार बचपन में सालिम अली की एयरगन से एक गौरैया घायल होकर गिर पड़ी। वे गौरैया की देखभाल, सुरक्षा और सेवा में इतना रम गए कि धीरे-धीरे उनकी रुचि पक्षी जगत् के सुन्दर – रहस्यमय संसार की ओर मुड़ गई। वे पक्षी प्रेमी बन गए। इस प्रकार बाल्यावस्था की उस छोटी-सी घटना ने सालिम अली के जीवन की दिशा बदल दी।
प्रश्न 2 – सालिम अली ने पूर्व प्रधानमंत्री के सामने पर्यावरण से सम्बन्धित किन संभावित खतरों का चित्र खींचा होगा कि जिससे उनकी आँखें नम हो गई थीं?
उत्तर – सालिम अली पूर्व प्रधानमन्त्री चौधरी चरणसिंह से केरल की ‘साइलेण्ट वैली’ को रेगिस्तानी हवा के झोंकों से बचाने का प्रस्ताव लेकर मिले थे। उन्होंने उनके सामने अकाल का बीभत्स चित्र खींचते हुए कहा होगा कि यदि इस वैली को रेगिस्तान बनने से न रोका गया तो यहाँ पाए जाने वाले सभी प्राणी भूख-प्यास से तड़प-तड़पकर अपने प्राण त्याग देंगे और उन पर कोई आँसू बहानेवाला भी न रहेगा। इस प्रकार से उनकी पर्यावरण सुरक्षा सम्बन्धी बातें सुनकर चौधरी साहब भावुक हो उठे होंगे, जिससे उनकी आँखें नम हो गई थीं।
प्रश्न 3 – लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा ने ऐसा क्यों कहा होगा कि “मेरी छत पर बैठनेवाली गौरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है । “
उत्तर – लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा जानती थी कि लॉरेंस अपनी छत पर बैठनेवाली गौरैया से बहुत प्रेम करते थे। वे अपना काफी समय उस गौरैया के साथ बिताते थे। वह गौरैया भी उनके साथ अन्तरंग साथी जैसा व्यवहार करती थी। वह उनके मन के एक-एक भाव की साक्षी और उपभोक्ता थी; इसीलिए फ्रीडा ने लॉरेंस के इसी पक्षी-प्रेम को उद्घाटित करने के उद्देश्य से यह वाक्य कहा होगा।
प्रश्न 4 – आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) वो लॉरेंस की तरह, नैसर्गिक जिंदगी का प्रतिरूप बन गए थे।
उत्तर : आशय – ‘नैसर्गिक जिन्दगी के प्रतिरूप’ के दो अर्थ हैं – प्रकृतिमय हो जाना और प्रकृति के समान सहज, सरल स्वच्छन्द हो जाना। डी० एच० लॉरेंस अंग्रेजी भाषा के प्रतिष्ठित उपन्यासकार और कवि थे और उनमें नैसर्गिक जिन्दगी का प्रतिरूप दोनों अर्थों में उपस्थित था। उनका प्रकृति प्रेम तो जग जाहिर है। प्रकृति में उनकी जैसी तन्मयता थी वैसी ही एकरसता सालिम अली की जिन्दगी में भी थी। ये दोनों ही व्यक्ति अपने को प्रकृति को समर्पित कर चुके थे। प्रकृति के समान उनके व्यवहार में भी सहजता, सरलता और स्पष्टता थी। बनावट या दिखावा उन्हें नहीं आता था ।
(ख) कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा !
उत्तर : आशय – लेखक ने सालिम अली को उनके पक्षी-प्रेम के कारण उन्हें भी एक पक्षी मान लिया है। वह कहते हैं कि सालिम अली जैसा पक्षी-प्रेमी उनके जाने के बाद शायद ही कोई आए । कोई चाहकर भी उन जैसा पक्षी के गीत गानेवाला नहीं बन सकता। सालिम अलीरूपी पक्षी मौत की गोद में सो चुका है। अब अगर कोई उसमें अपने शरीर की ऊष्मा और दिल की धड़कन भी डाल दे, तब भी वह पक्षी वैसा नहीं हो सकता; क्योंकि उसके सपने अपने शरीर और अपनी धड़कन से उपजे थे। उनकी मौलिकता और अनूठेपन का कोई जोड़ नहीं। सालिम अली को कोई पुनः जीवित नहीं कर सकता । प्रयास करके कोई सालिम अली नहीं बनाया जा सकता।
(ग) सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने की बजाए अथाह सागर बनकर उभरे।
उत्तर : आशय – सालिम अली अपने प्रकृति-प्रेम के चलते खुले संसार में खोज करने निकले थे। वह किसी टापू की तरह एक स्थान पर बँधकर नहीं रहे और न ही पक्षियों के संसार तक सीमित रह गए। उन्होंने अथाह – असीम सागर की लहरों के समान प्रकृति के हर रहस्य और सौन्दर्य को छूने का प्रयास किया। प्रकृति में तन्मय होकर उन्होंने प्रकृति के अनेकानेक रहस्य खोजकर अपने अनुभवों का संसार समृद्ध किया!
प्रश्न 5 – इस पाठ के आधार पर लेखक की भाषा-शैली की चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- ‘साँवले सपनों की याद’ पाठ की भाषा-शैली सम्बन्धी चार विशेषताएँ उदाहरणसहित निम्नलिखित हैं-
1. मिश्रित शब्दावली – इस पाठ में लेखक ने उर्दू, तद्भव और संस्कृत शब्दों का मिश्रित प्रयोग किया है। इस पाठ में उर्दू शब्दों की बहुतायत है; उदाहरणतया – जिन्दगी, परिन्दा, खूबसूरत, हुजूम, खामोश, सैलानी, सफर, तमाम, आखिरी, माहौल, खुद ।
इसी प्रकार संस्कृत के शब्दों का भी लेखक ने खूब प्रयोग किया है; जैसे— सम्भवतः, अन्तहीन, पक्षी, वर्ष, इतिहास, वाटिका, संगीतमय, प्रतिरूप |
जाबिर हुसैन की भाषा में संस्कृत और उर्दू के शब्दों का साथ-साथ प्रयोग भी बड़ी सहजता से हुआ है; यथा – अन्तहीन सफर, जिन्दगी का प्रतिरूप, पक्षियों की तलाश, खोजपूर्ण नतीजों, प्रकृति की नजर ।
2. जटिल वाक्यों का प्रयोग – जाबिर हुसैन की वाक्य-रचना कलात्मकता लिए हुए जटिल एवं बंकिम है। सीधे-सरल वाक्यों का प्रयोग उनकी भाषा में कम हुआ है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्यों की जटिल संरचना देखी जा सकती हैं-
(क) “सुनहरे परिन्दों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का हुजूम मौत की खामोश वादी की तरफ अग्रसर है। “
(ख) “कोई अपने जिस्म की हरारत और दिल की धड़कन देकर भी उसे लौटाना चाहे तो वह पक्षी अपने सपनों के गीत दोबारा कैसे गा सकेगा !”
3. अलंकारों का प्रयोग – जाबिर हुसैन की भाषा आलंकारिक कही जा सकती है। उपमा, रूपक, अनुप्रास उनके प्रिय अलंकार हैं। उदाहरणतया –
(क) “परिन्दों के खूबसूरत पंखों पर सवार साँवले सपनों का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की तरफ अग्रसर है। ” ( अनुप्रास )
(ख) “अब तो वो उस वन पक्षी की तरह प्रकृति में विलीन हो रहे हैं।” (उपमा )
(ग) रोमांच का सोता फूटता महसूस कर सकता है। (रूपक)
4. भावानुरूप भाषा – जाबिर हुसैन भाव के अनुरूप शब्दों और वाक्यों की प्रकृति बदल देते हैं। उदाहरणतया भाव- गाम्भीर्य से युक्त ये वाक्य देखिए-
“आज सालिम अली नहीं हैं। चौधरी साहब भी नहीं हैं। “
और कभी वह उत्तेजना लाने के लिए प्रश्न- शैली और जटिल वाक्यों का प्रयोग करते हैं। उदाहरणतया —
(क) “वृंदावन कभी कृष्ण की बाँसुरी के जादू से खाली हुआ है क्या! “
(ख) “कौन बचा है, जो अब हिमालय और लद्दाख की बरफीली जमीनों पर जीनेवाले पक्षियों की वकालत करेगा?”
प्रश्न 6 – इस पाठ में लेखक ने सालिम अली के व्यक्तित्व का जो चित्र खींचा है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर— सालिम अली अद्भुत प्रकृति-प्रेमी थे। पक्षियों के प्रेम में तो वे इस कदर डूबे रहते थे कि उन्हें वन – पाखी कहा जाए तो गलत न होगा। पक्षियों में उनके प्राण बसते थे। लेखक के शब्दों में तो उन जैसा ‘बर्ड – वाचर’ शायद ही कभी पैदा हो। सालिम हमेशा गले में दूरबीन लटकाए रहते थे। दूर आकाश में उड़ते पक्षियों की खोज करने का तथा उनके रहस्यों का पता लगाने का उन पर जुनून सवार रहता था। पक्षियों की सुरक्षा के लिए भी वे अत्यन्त चिन्तित रहते थे। वे स्वभाव से भ्रमणशील थे। उनकी इसी घुमक्कड़ प्रवृत्ति ने उनके शरीर को थकाकर कमजोर कर दिया था। उनका सरल सहज स्वभाव सांसारिक लोगों को हैरत में डाल देता था कि क्या यही प्रसिद्ध पक्षी – प्रेमी सालिम अली हैं! पर
प्रश्न 7 – साँवले सपनों की याद’ शीर्षक की सार्थकता टिप्पणी कीजिए ।
उत्तर- ‘साँवले सपनों की याद’ एक रहस्यात्मक शीर्षक है। इसे पढ़ते ही पाठक के मन-मस्तिष्क में एक साथ कई जिज्ञासाएँ उभरती हैं कि कैसे सपने? किसके सपने? कौन-से सपने? सपनो का साँवलापन क्या चीज है? इन सपनों की याद किसे आ रही है? वह याद में आतुर क्यों है ? आदि ।
‘सपनों का साँवलापन’ कृष्ण के साँवलेपन, मनमोहक अदा, मनोकामनाओं आदि का प्रतीक है। साँवले के साथ सलोनेपन की अभिव्यक्ति स्वयमेव आ जाती है। पाठ में प्रसिद्ध पक्षी – प्रेमी सालिम अली के सपनों की बात की गई है, जो जीवनभर सुनहरे पक्षियों की दुनिया में खोए रहे। पक्षियों के इस प्रकार के सपनों की दुनिया सालिम अली जैसे पक्षी-प्रेमी ही बसा पाते हैं, जो सोते-जागते, उठते-बैठते उनकी ही चिन्ता करते हैं। लेखक ने यह शीर्षक सालिम अली की मृत्यु के पश्चात् उनके सपनों की याद करके उचित ही दिया है। यद्यपि यह थोड़ा कलात्मक एवं रहस्यात्मक है, परन्तु साहित्य भी तो एक कला है। पाठ का शीर्षक लेखक की उच्च काल्पनिकता का परिचय देता है।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – सालिम अली के अनुसार, मनुष्य को प्रकृति की तरफ किस दृष्टि से देखना चाहिए?
उत्तर – सालिम अली के अनुसार प्रकृति अपने मौलिक रूप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और उसे उसी की दृष्टि से देखना चाहिए अर्थात् प्रकृति के स्वाभाविक रूप को हमें सुरक्षित रखना चाहिए । प्रकृति अपने स्वाभाविक रूप में हमें आनन्द प्रदान करती है; अतः अपने स्वार्थ के लिए उसका उपभोग करने की बात ‘नहीं सोचनी चाहिए।
प्रश्न 2 – वृन्दावन में कृष्ण की मुरली का जादू हमेशा क्यों बना रहता है?
उत्तर – कृष्ण की मुरली का जादू भारतीयों के मन में संस्कारगत रूप में उपस्थित है। जब भी श्रद्धालु भक्त वृन्दावन जाते हैं तो वहाँ उनके मन में कृष्ण और उनकी बाँसुरी की तान की कल्पना लहरें मारने लगती है। मुरली – वादन का स्वर उन्हें वृन्दावन के वातावरण में गूँजता-सा लगता है। वर्षभर श्रद्धालु भक्त वृन्दावन आते रहते हैं, इसलिए कृष्ण की मुरली का जादू वहाँ सदा ही बना रहता है।
प्रश्न 3 – लेखक ने कौन-से पूर्व प्रधानमन्त्री को गाँव की मिट्टी से जुड़ा हुआ माना है और क्यों?
उत्तर – लेखक ने पूर्व प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह कों गाँव की मिट्टी से जुड़ा हुआ माना है। चौधरी चरण सिंह ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे। खेती-किसानी, पर्यावरण, धरती, जमीन, मिट्टी और पशु-पक्षी आदि सबकी समस्याओं को वे सूक्ष्म और विस्तृत दोनों रूपों में जानते-समझते थे।

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