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UK Board 9 Class Hindi Chapter 8 – एक कुत्ता और एक मैना (गद्य-खण्ड)

UK Board 9 Class Hindi Chapter 8 – एक कुत्ता और एक मैना (गद्य-खण्ड)

UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 8 – एक कुत्ता और एक मैना (क्षितिज : गद्य-खण्ड)

I. लेखक – परिचय
प्रश्न – प्रख्यात निबन्धकार हजारीप्रसाद द्विवेदी का परिचय निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत कीजिए-
जीवन-परिचय, रचनाएँ, साहित्यिक विशेषताएँ, भाषा-शैली ।
उत्तर- हजारीप्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को हिन्दी साहित्य के दो प्रमुख क्षेत्रों के उन्नायकों के रूप में जाना जाता है। हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में यदि वे चन्द्रमा कहलाते हैं तो ललित निबन्ध के क्षेत्र में वे सूर्य कहे जाते हैं। ललित निबन्धों की तो उन्होंने एक स्वच्छ और नवीन ऐतिहासिक परम्परा का सूत्रपात किया । –
जीवन-परिचय — द्विवेदीजी का जन्म सन् 1907 ई० में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के ‘आरत दूबे क। छपरा’ नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता श्री अनमोल द्विवेदी बड़े ही अध्ययनशील व्यक्ति थे। यह पिता के संस्कारों और घर के वातावरण का ही प्रभाव था कि उन्होंने किशोरावस्था तक आते-आते उपनिषदों तथा अन्य दर्शन-ग्रन्थों का भी अध्ययन कर डाला। उनकी आरम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। उन्होंने उच्चशिक्षा बनारस के प्रसिद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राप्त की। यहाँ से उन्होंने ज्योतिषाचार्य की उपाधि भी प्राप्त की । यहीं पर उनका प्रथम सम्पर्क रवीन्द्रनाथ टैगोर से हुआ था। .
सन् 1940 ई० में उनकी शान्ति निकेतन में हिन्दी भवन के निदेशक पद पर नियुक्ति हुई। सन् 1949 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उनके कबीर सम्बन्धी ज्ञान की परिपक्वता देखकर उन्हें पी-एच०डी० की मानद उपाधि प्रदान की। सन् 1950 ई० में उनकी नियुक्ति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के रूप में हुई। कालान्तर में वे पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर व अध्यक्ष भी रहे। सन् 1957 ई० में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया। वे जीवनभर भारत सरकार की शैक्षिक एवं साहित्यिक सेवा में संलग्न रहे। सन् 1979 ई० में बहत्तर वर्ष की अवस्था में उनका स्वर्गवास हो गया।
रचनाएँ – आचार्य द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बहुमुखी था। उन्होंने निबन्ध, उपन्यास आदि लिखने के साथ-साथ हिन्दी – साहित्य के इतिहास तथा हिन्दी आलोचना पर भी अपनी विचारोत्तेजक लेखनी का खूब सिक्का जमाया। उनकी प्रमुख रचनाएँ अग्रलिखित हैं-
(1) निबन्ध – अशोक के फूल, विचार – प्रवाह, विचार और वितर्क, कल्पलता, कुटज ।
(2) इतिहास – हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य का आदिकाल |
(3) आलोचना – कबीर, सूर साहित्य, मध्यकालीन धर्म-साधना, नाथ सम्प्रदाय, साहित्य – सहचर, लालित्य-मीमांसा, कालिदास की लालित्य-योजना ।
(4) उपन्यास— बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचन्द्रलेख, अनामदास का पोथा ।
साहित्यिक विशेषताएँ – आचार्य द्विवेदीजी का साहित्य उनके वैचारिक खुलेपन, गहन चिन्तन, खोजी दृष्टि तथा विनोदप्रिय स्वभाव का परिचायक है। भारतीय संस्कृति को उसकी समग्रता में समझकर उसे उसके सही रूप में प्रस्तुत करने में वे अद्वितीय हैं। गुण-दोष विवेंचन की उनकी क्षमता उनकी आलोचनाओं में साफ दिखाई देती है। भेदभाव से रहित उनके चिन्तन की समन्वय तथा मानवतावाद की अन्तर्धारा उनके साहित्य में भी परिलक्षित होती है।
भाषा-शैली- द्विवेदीजी की व्यक्तिगत विनोदप्रियता, उनके साहित्य में परिलक्षित होने के साथ-साथ उनकी भाषा-शैली पर भी प्रभावी है। उनकी भाषा को ‘प्रसन्न भाषा’ कहा जाता है। आश्चर्य की बात है कि उन्होंने तत्सम तद्भव, देशज, उर्दू और अंग्रेजी आदि के शब्दों का बड़ी कुशलता के साथ प्रयोग किया है। शब्दों की नवीन उद्भावना भी उनकी एक कला है। प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति में इनकी भाषा पूर्णतया सक्षम है। सरसता, रोचकता और गतिशीलता उसके अन्य गुण हैं।
द्विवेदीजी मानवीकरण शैली का मनोरम प्रयोग करते हैं। ‘एक कुत्ता और एक मैना’ शीर्षक लेख में वे मैना दम्पती को पति-पत्नी के समान सरस वार्त्ता करते प्रस्तुत करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि द्विवेदीजी की लेखनी का स्पर्श पाकर पशु-पक्षी यहाँ तक कि जड़ पदार्थ भी मानवीय रूप धारण कर लेते हैं। कुल मिलाकर उनकी लेखन शैली रोचक, सुगठित एवं प्रभावपूर्ण है।
II. अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न – निम्नलिखित गद्यावतरणों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—
1. शुरू-शुरू में ……………. से रहते थे।
प्रश्न –
(क) निबन्ध तथा निबन्धकार का नाम लिखिए।
(ख) लेखक किसी दर्शनार्थी को गुरुदेव के पास ले जाकर क्या कहा करते थे? उस वाक्य का अर्थ क्या है?
(ग) गुरुदेव लेखक के वचन सुनकर क्यों मुसकरा देते थे?
(घ) लेखक को अपनी गलती का अहसास कब और कैसे हुआ?
(ङ) गुरुदेव लेखक से क्यों पूछते थे – ‘ दर्शनार्थी लाए हो क्या?
(च) गुरुदेव दर्शनार्थियों से डरे-डरे क्यों रहते थे?
उत्तर :
(क) निबन्ध – एक कुत्ता और एक मैना। निबन्धकार – हजारीप्रसाद द्विवेदी ।
(ख) लेखक जब किसी दर्शनार्थी को लेकर गुरुदेव के पास सूचित करने जाते थे तो कहा करते थे— ‘एक भद्र लोक आपनार दर्शनेर जन्य ऐसे छेन।’ इस वाक्य का अर्थ है – एक सज्जन आपके दर्शन करने के लिए आए हुए हैं।
(ग) गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर लेखक के इस वाक्य को सुनकर मुसकरा दिया करते थे। उन्हें लेखक का ‘दर्शनार्थी’ शब्द बड़ा हास्यास्पद लगता था। वस्तुतः ‘दर्शन करने आना’ जैसे भाषिक प्रयोग बाँग्ला में हैं ही नहीं। यह हिन्दी के वाक्य का बाँग्ला अनुवाद – सा लगता था; बहुत ही पुस्तकीय-सा ।
(घ) लेखक को दर्शनार्थी लाने सम्बन्धी अपनी गलती का बोध तब हुआ, जब उसने महाकवि रवीन्द्र को मुसकराते देखा। यह व्यंग्य की हँसी थी। लेखक को इस व्यंग्य की हँसी के पीछे दो कारण दिखाई देते थे-
(1) असमय उपस्थित हो जाने पर ।
(2) पुस्तकीय भाषा का प्रयोग करने पर।
(ङ) गुरुदेव को ‘दर्शन देने’ जैसी बातें बड़ी अटपटी लगती थीं। प्रायः लेखक समय-असमय का ध्यान किए बिना, किसी दर्शनार्थी के हठ पर, उसे लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर के पास चला आता था। रवीन्द्रनाथ नहीं चाहते थे कि असमय उनके पास केवल ‘दर्शन’ करने के नाम पर किसी को लाया जाए। ‘दर्शन देना’ उन्हें व्यंग्य-सा लगता था। इसलिए जब कभी लेखक उनके पास असमय पहुँच जाता था तो वे व्यंग्य में यही पूछा करते थे— ‘दर्शनार्थी लाए हो क्या ?’
(च) रवीन्द्रनाथ टैगोर केवल दर्शन पाने की इच्छा से आनेवाले लोगों से दो कारणों से डरे-डरे से रहते थे-
(1) वे असमय पहुँच जाते थे, जिससे रवीन्द्रनाथ टैगोर को परेशानी होती थी।
(2) रवीन्द्रनाथ अभिजात्य कुल के अवश्य थे, परन्तु वे स्वयं को दर्शन के योग्य महान् नहीं समझते थे। उन्हें लगता था कि इस प्रकार उन पर व्यंग्य किया जा रहा है। वे लेखक के प्यार और उलाहने को भी खोना नहीं चाहते थे और न ही जनता के इस सेवक को दुःखी करना चाहते थे।
2. ‘प्रतिदिन प्रात:काल …………….. देख पाता।
प्रश्न –
(क) निबन्ध तथा निबन्धकार का नाम लिखिए।
(ख) कुत्ता किस कारण आनन्दित था?
(ग) गुरुदेव कुत्ते की किस विशेषता पर मुग्ध थे?
(घ) गुरुदेव ने कुत्ते में किस शक्ति के दर्शन किए हैं?
(ङ) ‘अहैतुक प्रेम’ किसे कहते हैं?
(च) कवि की दृष्टि में अहैतुक प्रेम कौन कर पाता है?
(छ) ‘मूक हृदय का प्राणपण आत्मनिवेदन’ से क्या तात्पर्य है?
(ज) मनुष्य का सच्चा स्वरूप समझने में गुरुदेव की सहायता किसने की और कैसे की ?
उत्तर :
(क) निबन्ध – एक कुत्ता और एक मैना । निबन्धकार – हजारीप्रसाद द्विवेदी |
(ख) कुत्ता गुरुदेव के हाथों का स्पर्श पाकर स्नेह – रस में डूब गया था। उसे मानो अपना खोया हुआ संसार मिल गया था। उसके आनन्दित होने का यही कारण था।
(ग) गुरुदेव कुत्ते की सर्वस्व समर्पण की भावना पर मुग्ध थे। यद्यपि गुरुदेव शान्तिनिकेतन छोड़कर चुपचाप अपने पुराने मकान पर आ गए थे और यह स्थान वहाँ से दो मील की दूरी पर था, फिर भी शान्तिनिकेतन का वह कुत्ता, गुरुदेव को खोजते खोजते अपने आप उनके इस पुराने मकान पर आ पहुँचा था। कुत्ते के इस निश्छल, मौन प्रेम पर गुरुदेव मुग्ध थे।
(घ) गुरुदेव ने कुत्ते में निःस्वार्थ प्रेम की शक्ति के दर्शन किए। है, जो मनुष्य के भीतर की परमचेतना का अनुभव कर सकता है। यह उनके अनुसार सारे प्राणिजगत् में केवल कुत्ता ही एकमात्र ऐसा प्राणी मनुष्य के लिए भी सम्भव नहीं है।
(ङ) ‘अहैतुक प्रेम’ का अर्थ है – बिना किसी हेतु के किया गया प्रेम अर्थात् निःस्वार्थ प्रेम, निष्काम प्रेम ।
(च) कवि (गुरुदेव) की दृष्टि में इस प्राणिजगत् में केवल कुत्ता ही ऐसा प्राणी है, जो अहैतुक प्रेम कर पाता है।
(छ) ‘मूक हृदय का प्राणपण आत्मनिवेदन’ से तात्पर्य है— अपने प्राणों की बाजी लगाकर चुपचाप स्वयं को समर्पित करना ।
(ज) मनुष्य का सच्चा रूप समझने में गुरुदेव की सहायता कुत्ते ने की। गुरुदेव मानते हैं कि सच्चा मनष्य वही है, जो निःस्वार्थ प्रेम कर सके। कुत्ते में यही गुण था। उसने अपने प्रेम को अपने कर्म से प्रकट भी किया।
3. मैं जब …………… बैठा भी रहा। 
प्रश्न –
(क) निबन्ध तथा निबन्धकार का नाम लिखिए।
(ख) तितल्ले की कौन-सी घटना लेखक के सामने प्रत्यक्ष हो जाती है और किस अवसर पर?
(ग) कौन-सी घटना विश्व की महिमामयी घटनाओं की श्रेणी में आ गई है और क्यों?
(घ) लेखक ने किस घटना को आश्चर्यजनक कहा है और क्यों?
(ङ) ‘उत्तरायण’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(च) आप कैसे कह सकते हैं कि पशुओं में भी मानवीय संवेदना होती है।
उत्तर :
(क) निबन्ध – एक कुत्ता और एक मैना । निबन्धकार – हजारीप्रसाद द्विवेदी ।
(ख) जब लेखक गुरुदेव की लिखी रचना पढ़ता है, जिसमें कुत्ते के आत्मनिवेदन का चित्रण है, तब उसकी आँखों के सामने कुत्ते के श्रीनिकेतन आने और रवीन्द्रनाथ द्वारा उसे अपने स्पर्श से स्नेह-रस से सिक्त करने की घटना प्रत्यक्ष हो उठती है। उसे याद आता है कि जब गुरुदेव शान्ति निकेतन को छोड़कर श्रीनिकेतन के अपने पुराने तितल्ले मकान में रहने आ गए थे, तब शांन्तिनिकेतन से दो मील दूर रह रहे गुरुदेव को ढूँढते ढूँढते यह कुत्ता कैसे वहाँ पहुँच गया था! उस समय गुरुदेव ने जब उसकी पीठ पर स्नेह से हाथ फेरा तो कुत्ते का रोम-रोम जैसे आनन्द से पुलकित हो गया था ।
(ग) गुरुदेव का कुत्ता उन्हें ढूँढते ढूँढते दो मील दूर स्थित उनके तितल्ले मकान पर पहुँच गया था। तब गुरुदेव ने बड़े प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेरा था और कुत्ते ने उसमें असीम आनन्द का अनुभव किया था। कुत्ते के इस प्राणपण आत्मनिवेदन को लेखक ने विश्व की महिमाशाली घटना कहा है; क्योंकि लेखक के अनुसार ऐसा महिमाशाली अनुभव मिलना दुर्लभ है। इस प्रकार का सम्पूर्ण समर्पण विश्व का कोई भी प्राणी शायद ही कर पाए, शायद मनुष्य भी नहीं।
(घ) लेखक ने देखा कि गुरुदेव के चिताभस्म को जब कलकत्ता (कोलकाता) से उनके आश्रम में लाया गया तो गुरुदेव का भक्त कुत्ता उनके चिताभस्म के साथ-साथ चल रहा था। वह भी अन्य लोगों के साथ-साथ ‘उत्तरायण’ तक गया । यहाँ तक कि वह कुछ देर तक चिताभस्म के कलश के पास बैठा रहा। लेखक के लिए यह घटना किसी आश्चर्य से कम नहीं थी; क्योंकि एक पशु के मन में ऐसी गहरी मानवीय संवेदना की लेखक ने कभी आशा नहीं की थी।
(ङ) यहाँ ‘उत्तरायण’ से आशय रवीन्द्रनाथ के निवास स्थान से है, जो शान्तिनिकेतन में उत्तर दिशा की ओर स्थित था ।
(च) पशुओं में भी मानवीय संवेदना होती है। इसका स्पष्ट प्रमाण है— गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का कुत्ता। गुरुदेव का कुत्ता न केवल शान्तिनिकेतन में लगातार उनके पास बना रहा, उनका प्रेम पात्र रहा, वरन् उनके प्रति अपने स्वाभाविक ज्ञान के बल पर वह गुरुदेव के श्रीनिकेतन के उस तितल्ले मकान पर भी पहुँच गया, जो वहाँ से दो मील दूर था। इससे भी बड़ी बात यह रही कि वह गुरुदेव के निधन के पश्चात् उनके चिताभस्म के साथ भी वह चलता रहा। अन्य लोगों के साथ वह भी उत्तरायण तक गया और चिताभस्म के कलश के पास कुछ देर तक बैठा भी रहा, मानो वह गुरुदेव का सान्निध्य अब भी अनुभव कर रहा हो।
4. इस प्रकार …………….. कविता लिखी थी।
प्रश्न –
(क) निबन्ध तथा निबन्धकार का नाम लिखिए।
(ख) मैना के विषय में लेखक के क्या विचार थे?
(ग) लेखक को गुरुदेव की किस बात पर विश्वास नहीं हुआ?
(घ) मैना के सम्बन्ध में लेखक की क्या-क्या कल्पनाएँ थीं?
(ङ) लेखक ने मैना को विधुर पति या आहत पत्नी क्यों माना?
उत्तर :
(क) निबन्ध – एक कुत्ता और एक मैना । निबन्धकार – हजारीप्रसाद द्विवेदी ।
(ख) मैना के सम्बन्ध में लेखक का यह विचार था कि उसमें करुण भाव नहीं हो सकता; क्योंकि उसके लिए जिस भावुक हृदय की आवश्यकता होती है, वह मैना में नहीं है। उसमें तो केवल कृपा भाव होता है।
(ग) लेखक को गुरुदेव की इस बात पर विश्वास नहीं हुआ कि अकेली लँगड़ाती मैना के मुख पर करुण भाव लिखा हुआ प्रतीत होता है। लेखक कभी सोच भी नहीं सकता था कि मैना में कभी करुण भाव भी हो सकता है। मगर जब गुरुदेव की बात पर लेखक ने मैना को ध्यान से देखा तो मालूम हुआ कि सचमुच ही उसके मुख पर एक करुण भाव है।
(घ) मैना के सम्बन्ध में लेखक की दो कल्पनाएँ थीं-
1. पहली कल्पना यह थी कि शायद यह कोई विधुर पति है, जो पिछली स्वयंवर सभा के युद्ध में घायल और पराजित हो गया था ।
2. दूसरी कल्पना यह थी कि शायद यह कोई विधवा पत्नी है, जिसका पति बिलाव से लड़ते-लड़ते शहीद हो चुका है और वह भी थोड़ी-सी घायल होकर अकेले दिन काट रही है।
(ङ) लेखक ने मैना को घायल अवस्था में लँगड़ाते हुए देखा । वह अकेले विहार कर रही थी। उसके मुँह पर करुणा और स्वाभिमान दोनों दिख रहे थे। उसकी आँखों में न धोखा खाने का क्रोध है, न वैराग्यका भाव, किन्तु अपने साथी से बिछुड़ने का दुःख उसे समूह के कोलाहल से दूर एकान्तवास के लिए विवश करता होगा । इसलिए लेखक की यह कल्पना सही लगती है।
5. ” उस मैना ………………. दिखतीं ।” इत्यादि । 
प्रश्न –
(क) निबन्ध तथा निबन्धकार का नाम लिखिए।
(ख) लेखक को लँगड़ी मैना अन्य साथियों से भिन्न कैसे लगी?
(ग) लँगड़ी मैना को अकेली फुदकते देखकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उसके बारे में क्या-क्या कल्पनाएँ की हैं?
(घ) गद्यांश के आधार पर रवीन्द्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर :
(क) निबन्ध – एक कुत्ता और एक मैना । निबन्धकार – हजारीप्रसाद द्विवेदी |
(ख) लेखक को लगा कि लँगड़ी मैना अपने सजातियों से कुछ अर्थों में भिन्न है। अन्य मैनाएँ उछल-कूद रही हैं, बक-झक कर रही हैं, किन्तु यह उन सबसे अलग एकान्त में विहार कर रही है। न यह किसी के संग खेलती है, न शिरीषवृक्ष की शाखाओं पर उड़ती फिर रही है।
(ग) लँगड़ी मैना को अकेली फुदकते देखकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कल्पना की है कि शायद इसने कोई पाप किया है, जिसके कारण इसके समाज ने इसका बहिष्कार किया है, या फिर यह स्वयं अपने समाज की किसी गलत बात पर उससे रूठी हुई है, या फिर इसके हृदय में कोई बात है, जो यह किसी को नहीं कहती और मन-ही-मन उसे दबाए हुए है।
(घ) गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर महान् प्रकृति-प्रेमी थे। वे मैना जैसे आम पक्षी को भी अतिथि का सा सम्मान देते थे। उन्होंने उसे जब एक टाँग पर लँगड़ाते देखा तो उसी के विषय में सोचने लग गए। उन्होंने मैना को मानवी मानकर ऐसी कल्पना की जैसी कि किसी स्त्री के सम्बन्ध में की जाए। मैना की दशा देख उन्होंने उसमें एक उदास नारी की छवि देखी।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – गुरुदेव ने शांतिनिकेतन को छोड़ कहीं और रहने का मन क्यों बनाया?
उत्तर- गुरुदेव अस्वस्थ थे। उन्हें एकान्त में आराम की आवश्यकता थी। शान्तिनिकेतन में दिनभर दर्शनार्थियों और आने-जानेवालों की भीड़ लगी रहती थी। इसलिए उन्होंने तय किया कि श्रीनिकेतन के अपने पुराने तितल्ले मकान में जाकर निवास करेंगे। वे
प्रश्न 2 – मूक प्राणी मनुष्य से कम संवेदनशील नहीं होते। पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- ‘एक कुत्ता और एक मैना’ पाठ के आधार पर यह सत्य सिद्ध होता है मूक प्राणी मनुष्य से कम संवेदनशील नहीं होते। इसका स्पष्ट उदाहरण गुरुदेव का वह कुत्ता है, जो शान्तिनिकेतन से गुरुदेव के चले आने के बाद दो मील का रास्ता पारकर उन्हें खोजता हुआ श्रीनिकेतन पहुँच गया था। गुरुदेव का स्पर्श पाते ही उसकी सारी थकान दूर हो गई एवं वह प्रेम-रस से सराबोर हो गया। इसी प्रकार गुरुदेव के चिताभस्म के कलश के साथ वह भी शोकाकुल लोगों के साथ उत्तरायण तक गया। वहाँ कलश के पास वह कुछ देर तक शान्त बैठा भी रहा । मृत्यु की उदासी के वातावरण में भी वह उनके साथ रहा। निश्चय ही मूक प्राणी भी बहुत संवेदनशील होते हैं।
प्रश्न 3 – गुरुदेव द्वारा मैना को लक्ष्य करके लिखी कविता के मर्म को लेखक कब समझ पाया ?
उत्तर – गुरुदेव द्वारा मैना को लक्ष्य करके लिखी कविता के भाव को लेखक तब समझ पाया, जब उसने मैना के मुख पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। मैना के मुख के भावों में उसे करुणा साकार होती दिखाई दी। लेखक ने पहले कभी मैना को लेकर करुण भाव की कल्पना नहीं की थी, किन्तु गुरुदेव की कविता पढ़ने पर, मैना को ध्यान से देखने पर उसे कविता का अर्थ भी समझ में आ गया।
प्रश्न 4 – प्रस्तुत पाठ एक निबंध है। निबंध गद्य – साहित्य की उत्कृष्ट विधा है, जिसमें लेखक अपने भावों और विचारों को कलात्मक और लालित्यपूर्ण शैली में अभिव्यक्त करता है। इस निबंध में उपर्युक्त विशेषताएँ कहाँ झलकती हैं? किन्हीं चार का उल्लेख कीजिए।
उत्तर— प्रस्तुत पाठ —एक कुत्ता और एक मैना’ एक ललित निबन्ध है। इसमें लेखक हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने भावों, विचारों, रुचियों- अरुचियों को बड़ी कलात्मकता एवं लालित्य के साथ प्रस्तुत किया है। लेखक के व्यक्तिगत विचारों और भावों की कल्पना की ऊँची उड़ान ने इसे रोमांचक बना दिया है। निबन्ध की उपर्युक्त विशेषताएँ प्रस्तुत पाठ में इन मुख्य स्थानों पर झलकती हैं-
(1) भावों और विचारों की कलात्मक अभिव्यक्ति —
(i) “जब कभी मैं असमय में पहुँच जाता था तो वे हँसकर पूछते थे ‘दर्शनार्थी लेकर आए हो क्या?’ यहाँ यह दुःख के साथ कह देना चाहता हूँ कि अपने देश के दर्शनार्थियों में कितने ही इतने प्रगल्भ होते थे कि समय-असमय, स्थान- अस्थान, अवस्था – अनवस्था की एकदम परवा नहीं करते थे और रोकते रहने पर भी आ ही जाते थे।”
(ii) “एक लेखक ने कौओं की आधुनिक साहित्यिकों से उपमा दी है; क्योंकि इनका मोटो है ‘मिसचिफ् फार मिसचिफ् सेक’ (शरारत के लिए ही शरारत )। तो क्या कौओं का प्रवास भी किसी शरारत के उद्देश्य से ही था ?”
(2) लालित्यपूर्ण शैली —
(i) ” उसी समय उनका कुत्ता धीरे-धीरे ऊपर आया और उनके पैरों के पास खड़ा होकर पूँछ हिलाने लगा। गुरुदेव ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा। वह आँखें मूँदकर अपने रोम-रोम से उस स्नेह-र ह-रस का अनुभव करने लगा । “
(ii) “एक दिन वह मैना उड़ गई। सायंकाल कवि ने उसे नहीं देखा। जब वह अकेले जाया करती है उस डाल के कोने में, जब झींगुर अन्धकार में झनकारता रहता है, जब हवा में बाँस के पत्ते झरझराते रहते हैं, पेड़ों की फाँक से पुकारा करता है नींद तोड़नेवाला संध्यातारां! कितना करुण है उसका गायब हो जाना !”
प्रश्न 5 – आशय स्पष्ट कीजिए-
इस प्रकार कवि की मर्मभेदी दृष्टि ने इस भाषाहीन प्राणी की करुण दृष्टि के भीतर उस विशाल मानव-सत्य को देखा है, जो मनुष्य, मनुष्य के अंदर भी नहीं देख पाता ।
उत्तर : आशय – गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर कवि थे। उनकी अन्तरात्मा सजग थी। उन्हें मर्मभेदी दृष्टि प्राप्त थी। इसी मर्मभेदी दृष्टि के बल पर उन्होंने एक भाषाहीन प्राणी – कुत्ते के भीतर के ‘प्राणपण के आत्मनिवेदन’ को समझ लिया था। उन्होंने अनुभव किया कि कुत्ता उन पर भरोसा करता है और प्राणपण से उन्हें स्वीकार करके स्वयं को उन पर न्योछावर कर चुका है। इस प्रकार गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ने कुत्ते के भीतर की उस मानवीय अनुभूति को देख लिया था, जो मनुष्यों में आपस में भी देखने को कम ही मिलती है।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – कुत्ता दो मील की दूरी तय करके गुरुदेव से मिलने क्यों और कैसे पहुँच गया?
उत्तर – कुत्ता दो मील की दूरी तय करके गुरुदेव से मिलने अपनी अपार श्रद्धा एवं सहज बोध के बल पर पहुँच गया था। वह गुरुदेव के प्रति ‘प्राणपण आत्मनिवेदन’ की भावना रखता था। गुरुदेव के प्रति उसकी भक्ति भावना तथा उसका सहज बोध दोनों ने मिलकर उसे दो मील की लम्बी दूरी बिना किसी मार्गदर्शक के आश्चर्यजनक रूप से बिना भटके तय करा दी। वह खोजते खोजते प्राणियों की सहज बोध शक्ति के बल पर गुरुदेव के तितल्ले मकान पर उनसे मिलने पहुँच गया।
प्रश्न 2 – कुत्ते के ‘प्राणपण आत्मनिवेदन’ को गुरुदेव ने किस प्रकार लिया?
उत्तर – गुरुदेव ने कुत्ते के ‘प्राणपण आत्मनिवेदन’ को उसकी स्वामिभक्ति के रूप में नहीं, वरन् एक प्राणी की आध्यात्मिक महिमा के रूप में लिया। उनके अनुसार कुत्ता एक भक्त – हृदय रखता है। वह मनुष्य की अन्तरात्मा में प्रवेश कर सकता है। वह ईश्वर की अलौकिक महिमा को मनुष्य के भीतर चैतन्य शक्ति के रूप में अनुभव कर सकता है। इसीलिए वह चुपचाप अपना अहैतुक प्रेम मनुष्य को समर्पित कर देता है। यह कुत्ते का मनुष्य के प्रति नहीं, आत्मा का आत्मा के प्रति समर्पण है। ऐसा समर्पण तो मनुष्य के जीवन में भी कम दिखता है।
प्रश्न 3 – ‘ एक कुत्ता और एक मैना’ पाठ के आधार पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर- हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ‘एक कुत्ता और एक मैना’ पाठ में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की अत्यधिक संवेदनशीलता एवं मानवेतर प्राणियों से प्रेम की उनकी विशेषताएँ उनके व्यक्तित्व में परिलक्षित होती थीं। उन्हें मानव के अतिरिक्त पशु-पक्षियों; जैसे. कुत्ता, मैना, कौआ आदि में गहरी रुचि थी। उनकी अन्तर्दृष्टि कुत्ते में आध्यात्मिकता तथा मैना में करुणा ढूँढ लेती थी। सामान्य मनुष्य अपने ही समाज के अन्य मानवों में अच्छाई नहीं खोज पाता, आध्यात्मिक प्रेम सम्बन्ध तो दूर की बात है। गुरुदेव के व्यक्तित्व में इतनी उदारता एवं सहृदयता थी कि वे पशुओं के हृदय में प्रवेश करके उनके प्राणपण आत्म-निवेदन और करुणा को पहचान लेते थे ।

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