आर्थिक और सामाजिक जीवन, शिक्षा और धार्मिक विश्वास (800-1200)

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आर्थिक और सामाजिक जीवन, शिक्षा और धार्मिक विश्वास (800-1200)

आर्थिक और सामाजिक जीवन तथा धार्मिक और सांस्कृतिक विकासक्रम के अध्ययन के लिए उत्तर और दक्षिण, पूरे देश पर ध्यान तो दिया जाना चाहिए, क्षेत्रीय विविधताओं को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। आठवीं से बारहवीं सदी के काल में हमें निरंतरता के तत्त्व तो मिलते हैं, लेकिन इस काल की अपनी विशिष्टताएँ हैं जिनके कारण यह काल अपने पूर्ववर्ती कालों से अलग दिखाई देता है।

व्यापार और वाणिज्य

इस काल में देश की आर्थिक स्थिति, विशेषकर व्यापार और वाणिज्य की स्थिति इतिहासकारों के बीच विवाद का विषय है। कुछ इतिहासकार इसे विदेशी व्यापार तथा देश के अंदर लंबी दूरी का व्यापार दोनों के लिए जड़ता, पतन और हास का काल, नगरों के पतन का काल तथा स्थानीयता और क्षेत्रवाद में वृद्धि का काल मानते हैं। मध्यदेश, राजस्थान और गुजरात समेत उत्तर भारत में स्वर्णमुद्राओं का लगभग पूरा अभाव इसका प्रमाण माना जाता है। किंतु कुछ अन्य विद्वान इस बात को स्वीकार नहीं करते कि भारत के कुछ भागों में सोने और चाँदी की मुद्राओं का अभाव अर्थव्यवस्था के विमौद्रीकरण (demonetisation), लंबी दूरी के घरेलू व्यापार का पतन तथा स्थानीयता के बढ़ने का सूचक था।
यहाँ इन सभी बातों की विस्तार से छानबीन संभव नहीं है। इतना ही कहना काफ़ी होगा कि रोमन साम्राज्य के पतन ने पश्चिम के साथ भारत के व्यापार पर गंभीर प्रभाव नहीं डाला क्योंकि बाद के काल में दो नए साम्राज्य उठ खड़े हुए- कुस्तुंतुनिया में आधारित बैजंतीनी साम्राज्य और ईरान का सासानी साम्राज्य। ये दोनों भारत और हिंद महासागर क्षेत्र के साथ व्यापार में गहरी दिलचस्पी रखते थे। सातवीं सदी में अरब साम्राज्य के उदय के बाद, जैसा कि कहा जा चुका है, अरबों ने पश्चिम के व्यापार का प्रसार भारत के साथ, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ किया। यह मानने का कोई कारण नहीं कि इस विस्तारित व्यापार से भारतीय व्यापारी बाहर कर दिए गए। इस तरह व्यापार का रुख भारत के अनुकूल होने के कारण यहाँ सोने और चाँदी का आना जारी रहा। यही कारण था कि भारत को सोने और चाँदी से भरा देश माना जाता रहा और इस कारण यह आक्रमण और व्यापार के लिए विदेशियों के आकर्षण का केंद्र भी बना रहा। सोने-चाँदी का उपयोग मंदिरों और महलों की सजावट के लिए गहने बनवाने के लिए किया जाता रहा और भविष्य में उपयोग के लिए उन्हें गाड़कर रखा जाता रहा। मगर सिक्के ढालने के लिए उनका उपयोग क्यों नहीं किया गया-यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका कोई संतोषजनक उत्तर उपलब्ध नहीं है। भारत में सोने और चांदी के सिक्कों की कमी तो थी पर भूमिदान के पत्रों में सिक्कों का उल्लेख मिलता है। इस अंतर का कारण स्पष्ट नहीं है। छोटे नगरों के साथ-साथ स्थानीयता या ग्रामीण आत्मनिर्भरता में वृद्धि निरसंदेह इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण थी। इससे स्थानीय कार्यों के लिए बड़े मूल्य वाले सिक्कों अर्थात सोने-चांदी के सिक्कों का उपयोग अनावश्यक हो गया। पर हर जगह ऐसा नहीं हुआ। बंगाल में चाँदी के सिक्कों का प्रयोग जारी रहा क्योंकि दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ व्यापार का संतुलन अनुकूल था और चाँदी वहीं से आती थी। चोल साम्राज्य में भी सोने के सिक्के जारी होते रहे। इस काल में देश में अनेक छोटे-छोटे राज्यों का उदय हुआ तथा वैसे लोगों की शक्ति और सत्ता में वृद्धि हुई जिनको भूमि पर श्रेष्ठतर अधिकार प्राप्त थे। उनमें से अनेक राज्यों ने बाँधों, कुँओं आदि का निर्माण करके कृषि का प्रसार किया। बंगाल, सिंध और तमिल प्रदेश जैसे कुछ उदाहरणों में राजाओं ने अपनी स्थिति को मज़बूत बनाने के लिए ब्राह्मणों को राजस्व-मुक्त भूमि दान देकर उन्हें अपने यहाँ बसने के लिए आमंत्रित किया। चूँकि ऐसी भूमि का बहुत बड़ा भाग अन-जुता था, इसलिए आदिवासियों में जो घुमक्कड़, पशुपालक या खाद्य-संग्राहक थे, उनको कृषि का व्यवसाय अपनाकर एक जगह बसने के लिए प्रेरित किया गया। कृषि के ऐसे प्रसार से स्थानीय सरदारों, सामंतों आदि की स्थिति और भी मज़बूत हुई। इस विकासक्रम का आंतरिक व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ा यह हमें ज्ञात नहीं है। ऐसा लगता है कि स्थानीय व्यापार को सहारा देने वाले छोटे नगरों का उदय और आंतरिक आत्मनिर्भरता में वृद्धि साथ-साथ चलने वाली प्रक्रियाएँ थीं। विशेष रूप से उत्तर भारत में देश में लंबी दूरी के व्यापार के ह्रास के कारण संभवत: व्यापार संघों अर्थात श्रेणियों और संघों का पतन हुआ। इन संघों में अकसर विभिन्न जातियों के लोग होते थे। उनके अपने आचरण के नियम थे जिनका पालन करना सदस्यों के लिए कानूनी तौर पर अनिवार्य होता था तथा उन्हें कर्ज लेने-देने या दान पाने का अधिकार था। लंबी दूरी के व्यापार और वाणिज्य के ह्रास के कारण इन संघों का पहले वाला महत्त्व जाता रहा। इस काल में हमें उत्तर भारत में व्यापार संघों के दान पाने के हवाले बहुत कम मिलते हैं। कालांतर में कुछ अधिक पुरानी श्रेणियाँ उपजातियों के रूप में उभरीं। उदाहरण के लिए द्वादश श्रेणी, जो एक व्यापार संघ थी, एक वैश्य उपजाति बन गई। व्यापारी वर्ग से संरक्षण पानेवाले जैन धर्म को भी उत्तर भारत में धक्का लगा। इस काल में लिखे गए कुछ धर्मशास्त्रों में उन क्षेत्रों से बाहर यात्रा करने विचरता, अर्थात भारत से बाहर। खारे समुद्रों के पार जाने को अशुद्धि का कारण प्रतिबंध लगाया गया है जहाँ मूंज घास नहीं उगती या जहाँ काला चिकारा में भी भारतीय सौदागरों, दार्शनिकों, चिकित्सकों और दस्तकारों के बगदाद माना जाने लगा। इन प्रतिबंधों को गंभीरता से नहीं लिया गया क्योंकि हमें इस काल पश्चिम एशिया के दूसरे मुस्लिम नगरों में जाने के वृत्तांत मिलते हैं। शायद यह प्रतिबंध केवल ब्राह्मणों के लिए रहा हो या इसका उद्देश्य पश्चिम में इस्लाम और पूर्व में वौद्ध धर्म के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बहुत सारे भारतीयों को जाने से हतोत्साहित करना रहा हो।  विचार लेकर न लौटें जो ब्राह्मणों और शासक समूहों को उलझन में डालने हों और इसलिए अस्वीकृत हों। समुद्री यात्रा संबंधी प्रतिबंध से दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों और चीन के भारत के समुद्रो व्यापार में कोई बाधा नहीं पड़ी। छठी सदी के बाद से ही दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के बीच जोर-शोर से व्यापार शुरू होगा था। इस क्षेत्र के देशों के संबंध में बढ़ता भौगोलिक ज्ञान इस काल के साहित्य में प्रतिबिंबित हुआ है। इस क्षेत्र की भाषाओं, परिधानों आदि की खास विशेषताओं वर्णन उस काल की पुस्तकों में हुआ है, जैसे हरिषेण कृत बृहत्कथाकोश में। इस क्षेत्र के ‘जादुई समुद्रों’ में भारतीय सौदागरों की दुस्साहसी यात्राओं की अनेक
कहानियाँ मिलती हैं जो सिंदबाद जहाजी की सुप्रसिद्ध कथा का आधार बन गई। भारतीय व्यापारी श्रेणियों में संगठित थे जिनमें सबसे प्रसिद्ध मणिग्रामन और नानादेसी थीं और ये बहुत पहले से सक्रिय थीं। ये श्रेणियाँ उद्यम भावना का परिचय देते हुए अनेक देशों में खुदरा और थोक व्यापार करती रहीं। उन्होंने मंदिरों को भी भारी-भारी दान दिए जो सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के केंद्र बन गए, और ये कभी-कभी व्यापार के लिए अग्रिम धन भी देते थे। अनेक भारतीय व्यापारी इन्हीं देशों में बस गए। कुछ ने तो स्थानीय स्त्रियों से विवाह भी कर लिया। व्यापारियों के पीछे-पीछे पुरोहित भी पहुंचे और इस प्रकार इन क्षेत्रों में बौद्ध और हिंदू दोनों धर्मों के विचारों का प्रचार हुआ। बोरोबुदूर (जावा) का बौद्ध मंदिर और अंकोरवाट (कंपूचिया) का ब्राह्मणीय मंदिर इन क्षेत्रों में इन दोनों धर्मों के प्रसार के सूचक हैं। इस क्षेत्र के कुछ शासक परिवार अर्ध-हिंदू हो गए तथा उन्होंने भारत के साथ व्यापार एवं सांस्कृतिक संबंधों का स्वागत किया। इस तरह भारतीय संस्कृति ने स्थानीय संस्कृति से मिलकर नए साहित्यिक और सांस्कृतिक रूपों का सृजन किया।
कुछ प्रेक्षकों का विचार है कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की भौतिक समृद्धि, सभ्यता के विकास और बड़े राज्यों के विकास के पीछे बहुत हद तक धान की सिचित खेती की भारतीय तकनीक का प्रचार था। जावा, सुमात्रा आदि की यात्रा के लिए प्रमुख भारतीय बंदरगाह बंगाल का ताम्रलिप्ति (तामलुक) बंदरगाह था। इस काल की अधिकांश कहानियों में व्यापारी लोग ताम्रलिप्ति से सुवर्णद्वीप (आधुनिक इंडोनेशिया) या कटहा (मलय में केडा) जाते दिखाई देते हैं। जावा का चौदहवीं सदी का एक लेखक बड़े-बड़े जहाज़ों में बड़ी संख्या में जंबूद्वीप (भारत), कर्नाटक (दक्षिण भारत) और गौड़ (बंगाल) से आने वालों की बात करता है। गुजरात के व्यापारी भी इस व्यापार में भागीदार थे।
अपनी समृद्धि के कारण चीन हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार का मुख्य केंद्र बन चुका था। चीनी लोग भारी मात्रा में मसालों का उपयोग करते थे जिनका आयात दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत से किया जाता था। वे हाथीदांत का भी आयात करते थे। सबसे अच्छा हाथीदाँत अफ्रीका से आता था तथा पश्चिम एशिया से काँच के बर्तन मंगाए जाते थे। इसके अलावा वे जड़ी-बूटियों, लाख,,अगरबत्ती और दुर्लभ प्रकार की तमाम वस्तुओं का आयात करते थे। आम तौर पर अफ्रीका और पश्चिम एशिया की वस्तुएँ मलाबार (दक्षिण भारत) से आगे नहीं बढ़ती थीं, न ही चीनी जहाज़ मलक्का (दक्षिण-पूर्व एशिया) से इधर आते थे। इस तरह भारत और में दक्षिण-पूर्व एशिया दोनों ही चीन तथा पश्चिम एशियाई और अफ्रीकी देशों के बीच व्यापार के लिए महत्त्वपूर्ण मिलनकेंद्र थे। फ़ारसवालों और आगे चलकर अरबों के अलावा भारतीय व्यापारी विशेषकर तमिल और कलिंग व्यापारी इस व्यापार में सक्रिय भूमिका निभाते थे। अरब यात्री भी उस देश का जिक्र करते हैं जिसे वे ‘माबर’ के नाम से जानते थे। अरबी में इसका अर्थ डोंगी या ‘रास्ता’ है। यह दक्षिण तमिलनाडु में क्विलोन से नेल्लोर तक का क्षेत्र था जिसे चोलमंडलम या कोरोमंडल
य कहा जाता था। यह वह क्षेत्र था जहाँ होरमुज़ (फ़ारस की खाड़ी) अदन (लाल सागर) से आने वाले सारे जहाज़ पहुँचते थे। चीन का व्यापार काफ़ी सीमा तक भारतीय जहाज़ों द्वारा होता था। मलाबार, बंगाल और बर्मा की सागौन की लकड़ी ने जहाज़-निर्माण की एक ठोस परंपरा की नींव डाली थी। मौसम की दशाएँ भी ऐसी थीं कि मध्यपूर्व से चीन तक सीधे जाना किसी जहाज़ के लिए संभव नहीं था। जहाज़ों को अनुकूल हवाओं के लिए बंदरगाहों पर लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। ये हवाएँ मानसून से पहले पश्चिम से पूर्व और मानसून के बाद पूर्व से पश्चिम की दिशा में चलती थीं। इस प्रतीक्षा के लिए व्यापारी भारतीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई बंदरगाहों को श्रेष्ठ मानते थे।
इस काल में विदेशी व्यापार के लिए चीन का प्रमुख बंदरगाह कैंटन था। इसे अरब यात्री कानफू कहते थे। बौद्ध विद्वान भी समुद्री मार्ग से भारत से चीन जाते थे। चीनी वृत्तांत-लेखक बतलाते हैं कि दसवीं सदी के अंतिम और ग्यारहवीं सदी के आरंभिक वर्षों में चीनी दरबार में बौद्ध भिक्षुओं की संख्या चीन के इतिहास में सबसे अधिक थी। इससे पहले का एक चीनी वृत्तांत बतलाता है कि कैंटन नदी भारतीय, फ़ारसी और अरबी जहाजों से भरी रहती थी। इसमें कहा गया है कि स्वयं कैंटन में तीन ब्राह्मणीय मंदिर थे जिनमें भारतीय ब्राह्मण रहते थे। दक्षिणी चीन सागर में भारतीयों की मौजूदगी की पुष्टि जापानी दस्तावेज़ों से भी होती है। इनमें जापान में कपास के प्रचलन का श्रेय दो भारतीयों को दिया गया है जो ‘काली धाराओं’ पर होकर उस देश में पहुंचे थे। भारतीय शासकों ने विशेषकर बंगाल के पाल और सेन राजाओं तथा दक्षिण भारत के पल्लव और चोल राजाओं ने चीनी सम्राटों के पास अनेक प्रतिनिधिमंडल भेजकर इस व्यापार को प्रोत्साहन देने की कोशिश की। चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने चीन के साथ होने वाले व्यापार में आनेवाली बाधा को दूर करने के लिए मलाया और पड़ोसी देशों के खिलाफ़ एक नौसैनिक मुहिम भेजी थी। राजेंद्र प्रथम द्वारा चीन भेजे गए प्रतिनिधिमंडल ने एक भारतीय जहाज़ में यात्रा की थी। इसके प्रमाण भो हैं कि मलाबार और गुजरात समेत पश्चिमी तट पर अनेक गोदियाँ थीं। इस तरह इस क्षेत्र में भारत के विदेशी व्यापार के विकास का आधार एक मज़बूत जहाजरानी परंपरा थी जिसमें जहाज़-निर्माण के अलावा भारतीय व्यापारियों का कौशल और उद्यमशीलता भी शामिल थे। चीन के साथ व्यापार बहुत लाभदायक था, कि तेरहवीं सदी में चीन की सरकार ने देश से सोना-चाँदी के निर्यात को रोकने की भी कोशिश की। लेकिन धीरे-धीरे भारतीय जहाज़ों की जगह अरब और चीनी जहाजों ने ले ली जो उनसे बड़े थे और ज्यादा तेज़ रफ्तार से चलते थे। कहा जाता है कि चीनी जहाज़ अनेक मंजिल ऊँचे होते थे तथा 400 सैनिकों के अलावा 600 यात्री भी लेकर चलते थे। चीनी जहाज़ों की वृद्धि का महत्त्वपूर्ण कारण मेरिनर (सामुद्रिक) कंपस का उपयोग था। यह आविष्कार बाद में चीन से पश्चिम में गया। यहाँ तक भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी तब तक पिछड़ने लगे थे।
इस तरह पश्चिमी क्षेत्रों के साथ तथा दक्षिण पूर्व-एशिया और चीन के साथ भारत का व्यापार लगातार बढ़ता, रहा। इस व्यापार में अग्रणी भूमिका दक्षिण भारत, बंगाल और गुजरात की थी। यह इन क्षेत्रों की सुख-समृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण कारण था।

जनता की दशा

इस काल में वस्त्र, सोने-चांदी के कामों, धातुकर्म आदि भारतीय दस्तकारियों के ऊँचे स्तर में कोई गिरावट नहीं आई। भारतीय कृषि भी फलती-फूलती रही। मिट्टी की उर्वरता और भारतीय किसान की कुशलता की पुष्टि अनेक अरब यात्रियों ने की है।
इस काल की सभी साहित्यिक रचनाएँ बतलाती हैं कि मंत्री, अधिकारी और सामंत शानो-शौकत के साथ रहते थे और दिखावापसंद थे। वे सुंदर मकान बनवाने में, जो कभी-कभी पाँच मंसिल ऊँचे होते थे, राजाओं की नकल करते थे। वे
आयातित ऊनी कपड़ों, चीनी रेशम जैसे कीमती विदेशी वस्त्रों तथा शरीर को सजाने के लिए सोने-चांदी के कीमती जेवरों का उपयोग करते थे। उनके घरों में स्त्रियों की बड़ी संख्या होती थी और उनकी देखभाल के लिए सेवकों और सेविकाओं की
भरमार होती थी। कभी वे बाहर जाते तो सेवकों की एक बड़ी संख्या उनके साथ चलती थी। वे महासामंताधिपति जैसी भारी-भरकम उपाधियाँ धारण करते थे तथा उनके अपने विशिष्टतासूचक प्रतीक होते थे, जैसे ध्वज, सुसज्जित छत्र और
मक्खियाँ भगाने के लिए चैवर। बड़े व्यापारी भी राजा के तौर-तरीकों की नकल करते थे और उनका जीवन कभी-कभी राजसी ही होता था। चालुक्य साम्राज्य के एक करोड़पति (कोटीश्वर) के बारे में मालूम होता है कि उसके मकान पर बड़े-बड़े ध्वज लहराते थे जिनसे जुड़ी घटियाँ बजती रहती थीं, और उसके पास बड़ी तादाद में हाथी-घोड़े थे। मुख्य इमारत तक जाने के लिए स्फटिक की सीढ़ियाँ थीं, तथा स्फटिक के फ़र्श और दीवारों वाला एक मंदिर था जिसकी दीवारें धार्मिक चित्रों से सुसज्जित थी तथा अंदर स्फटिक की एक मूर्ति थी। कहते हैं कि गुजरात के मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल इस काल के सबसे धनी व्यापारी थे।
तो भी उपरोक्त बातों से हम यह नहीं मान सकते कि चारों ओर सुख-समृद्धि थी। खाने-पीने की वस्तुएँ तो सस्ती थीं, पर नगरों में फिर भी बहुत-से निर्धन व्यक्ति थे जो भरपेट भोजन नहीं पाते थे। कश्मीर में बारहवीं सदी में लिखी गई राजतरंगिणी का लेखक कहता है कि दरबारी जहाँ तला हुआ मांस खाते थे तथा फूलों से सुगंधित ठंडी शराब पीते थे, वहीं साधारण जनता को चावल और उत्पल-शाक (खट्टे स्वाद वाली एक जंगली वनस्पति) पर संतोष करना पड़ता था। निर्धन स्त्री-पुरुषों के कठोर जीवन की अनेक कहानियाँ मिलती हैं। इनमें से कुछ ने तो विवश होकर डाकू और बटमार का जीवन अपना लिया था। लेकिन ज्यादातर लोग गाँवों में रहते थे जिनके जीवन के बारे में हमें साहित्य-रचनाओं, भूमिदान पत्रों, अभिलेखों आदि से सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। धर्मशास्त्रों के टीकाकार बतलाते हैं कि किसानों से मालगुजारी के रूप में पहले की ही तरह उपज का छठा भाग माँगा जाता था। मगर कुछ भूमिदान पत्रों से इसके अतिरिक्त कई अन्य शुल्कों का भी पता चलता है, जैसे चराई कर, तालाब कर आदि। किसानों को ये कर मालगमारी के अलावा देने पड़ते थे। साथ ही कुछ भूमिदान पत्रों में दान पामवालों को किसानों से निर्धारित या अनिर्धारित, सही या गलत कर लगाने का अधिकार दिया गया है। किसानों को बेगार (विष्टि) भी देनी पड़ती थी। मध्य भारत और उड़ीसा जैसे कुछ क्षेत्रों में हम देखते हैं कि कुछ गाँव दान पानेवाले ब्राह्मणों और अन्य व्यक्तियों को दस्तकारों, चरवाहों और किसानों समेत दे दिए गए थे जो मध्यकालीन यूरोप के सफ़ों की तरह ज़मीन से बँधे होते थे। हमें साहित्यिक कृतियों से पता चलता है कि कुछ सरदार जब भी अवसर पाते, पैसा वसूल किया करते थे। एक राजपूत सरदार कफ़न से भी पैसा बनाया करता था। एक अन्य लेखक एक ऐसे गाँव के बारे में के बारे में कहा गया है कि वह गौरेयों, मुर्दा चिड़ियों, सूअर की लेंड और मुदा के फिर इसमें बार-बार पड़नेवाले अकालों और होते रहने वाले युद्धों को भी जोड दें तो आम लोगों के व्यथित जीवन की तस्वीर पूरी हो जाती है। युद्धों में जलाशयों का विनाश, गाँवों का जलाया जाना, ताकत के बल पर मवेशियों या अन्नभडाराय जमा अन्न का हथियाया जाना और नगरों का विध्वंस आम बातें थी-इतनी आम कि इस काल के लेखकों ने इन कामों को वैध माना है। इस तरह सामंती अथवा फ्यूडल कहे जाने वाले समाज के विकास ने साधारण जनता पर बहुत सारा बोझ लाद दिया था। इस काल में भारतीय समाज में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। इनमें से एक था

समाज की प्रकृति

उस वर्ग के लोगों की शक्ति की वृद्धि जिनको समकालीन लेखकों ने सामत, गणक, राउत (राजपूत) आदि विभिन्न नामों से बुलाया है। उनके मूल बहुत भिन्न-भिन्न थे। कुछ तो सरकारी अधिकारी थे जिनको नकद वेतन नहीं दिया जाता था, बल्कि राजस्वदायी गाँवों के रूप में भुगतान किया जाता था। कुछ पराजित राज और उनके समर्थक थे जो सीमित क्षेत्रों के राजस्व का उपभोग करते थे। इनके अलावा स्थानीय पुस्तैनी सरदार या दुस्साहसी सैनिक थे जिन्होंने सशस्त्र समर्थकों की सहायता से अपने प्रभावक्षेत्र बना लिए थे। कुछ कबीलों या कुलों के मुखिया भी थे जिनकी अच्छी खासी हैसियत थी।। इस तरह इस वर्ग के लोगों में एक सोपान पाया जाता था। लेकिन परिस्थितियों के अनुसार उनकी वास्तविक स्थिति बदलती रहती थी। उनमें से कुछ तो गाँवों के सरदार होते थे, कुछ का अनेक गाँवों पर और कुछ का तो पूरे क्षेत्र पर वर्चस्व होता था। वे बराबर एक-दूसरे के खिलाफ़ लड़ते रहते थे तथा अपने अधिकार-क्षेत्रों और विशेषाधिकारों को बढ़ाने का प्रयास करते रहते थे। एक राजा अपने अधिकारियों और समर्थकों को जो राजस्वदायी भूमि (जिसे भोग कहते थे) देता था, वह सिद्धांततः अस्थायी होती थी और राजा जब चाहे, उसे वापस ले सकता था। पर व्यवहार में कभी-कभार ही ऐसा होता था-सीधे-सीधे बगावत या निष्ठाभंग होने पर। प्रचलित विचारों के अनुसार एक पराजित राजा को भी उसकी भूमि से वंचित करना पाप था। फलस्वरूप इस काल के रजवाड़ों में ऐसे बड़े-बड़े क्षेत्र थे जिन पर पराजित और अधीन राजाओं का वर्चस्व था जो बराबर अपनी स्वतंत्रता को बहाल करने की ताक में रहते थे। इन राजाओं के क्षेत्र में भी विभिन्न अधिकारी अपने गाँवों को पुश्तैनी जागीरें समझते थे। आगे चलकर विभिन्न सरकारी पदों तक को पुश्तैनी माना जाने लगा। पहले एक अध्याय में हम देख चुके हैं कि बंगाल में किस तरह एक ही खानदान के सदस्य चार पीढ़ियों तक महामंत्री के पद पर कायम रहे। इसी तरह अधिकांश पदों को कुछ परिवारों का एकाधिकार माना जाने लगा। धीरे-धीरे पुश्तैनी में सरदार शासन के अनेक कार्यों को अपने हाथों में लेने लगे। वे मालगुजारी का
आकलन और संग्रह ही नहीं करते थे, बल्कि अधिकाधिक प्रशासनिक शक्तियाँ भी हथियाते जा रहे थे, जैसे अपनी ओर से दंड देने या जुर्माना वसूल करने का अधिकार जिनको पहले आम तौर पर राजा का विशेषाधिकार माना जाता था। उन्होंने राजा से अनुमति लिए बिना ही अपने अनुयायियों को अपनी भूमि में से भूमि दान देने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। इस तरह ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी जो स्वयं भूमि को जोते-बोए बिना उससे रोज़ी पाते थे।
इस प्रकार के समाज को कुछ इतिहासकारों ने ‘फ्यूडल’ (सामंती) कहा है, हालाँकि यूरोपीय फ्यूडलिज्म की वेसेलेज़, सर्फ़डम और मेनर जैसी विशेषताएँ भारत में नहीं थीं। ये इतिहासकार इस साझी विशेषता पर जोर देते हैं कि समाज पर ऐने लोगों का एक वर्ग हावी था जिनकी आय किसानों के पैदा किए हुए ज़ायद (सरप्लस) पर आधारित थी और जो स्वयं ज़मीन पर काम नहीं करते थे। फिर प्रमुख उत्पादक अर्थात किसान की स्थिति भी निर्भरता वाली थी। बहुत-से अन्य इतिहासकार इस प्रकार के समाज को ‘मध्यकालीन समाज’ कहना बेहतर मानते हैं।
जैसा कि हमने पहले कहा, वे यह मानते हैं कि फ्यूडलिज्म ‘मध्यकालीन’ यूरोपीय समाज की खास विशेषता थी। इस विवाद में और उलझे बिना हम बस यह कहेंगे कि आठवीं सदी के बाद भारत में एक नए प्रकार का समाज पैदा हुआ जिसमें स्थानीयता और उपक्षेत्रीयता पर ज़ोर था। इस काल और इसके बाद के काल के राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास क्रमों को समझने के लिए यह बात जान लेना महत्त्वपूर्ण है।

जातिप्रथा

क) ब्राह्मण और राजपूत
जातिप्रथा, जो इस काल से बहुत पहले जन्म ले चुकी थी, समाज का आधार थी। मगर जातिप्रथा में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। उदाहरण के लिए, ब्राह्मणों की स्थिति काफ़ी मज़बूत हुई। जैसा कि हमने देखा, सिंध के राजा ने, जो खुद एक ब्राह्मण था, तथा बंगाल और दक्षिण भारत के राजाओं ने ब्राह्मणों को बड़े पैमाने पर राजस्वमुक्त जमीनें देकर बसने के लिए आमंत्रित किया। इन ब्राह्मणों ने न सिर्फ कृषि का प्रसार किया बल्कि स्थानीय राजस्व अधिकारियों, मंत्रियों, खातादारों आदि के काम भी किए। उनमें से कुछ ने तो सैनिक मामलों में भी सक्रिय भूमिक निभाई |
शिक्षा और साहित्य का सृजन उनके कार्यकलापों का एक अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्र इस काल के स्मृति-लेखक ब्राह्मणों की उच्च स्थिति का गुणगान करके उनके बढ़ते महत्त्व को प्रतिबिंबित करते दिखाई देते हैं। उनमें से कुछ ने तो यह तर्क भी दिया है कि प्राचीन क्षत्रिय जाति तो रही नहीं और वैश्य पतित होकर शूद्र की स्थिति को पहुंच गए हैं, इसलिए अब समाज में एकमात्र द्विज वर्ण ब्राह्मणों का है।
लेकिन शास्त्रों का चिंतन आवश्यक नहीं कि सामाजिक यथार्थ को प्रतिबिंबित करे। हम पहले ही हिंदू और जैन धनी सौदागरों के अस्तित्व का तथा भूस्वामी सरदारों के एक शक्तिशाली वर्ग के उदय का हवाला दे चुके हैं। इस संदर्भ में राजपूत नामक एक नई श्रेणी का उदय भी देखते हैं। इस काल में रजवाड़ों की बहुत बड़ी संख्या पर राजपूतों का राज था। ये राजपूत उन वंशों के मुखिया समझे जाते थे जिनका बड़े-बड़े इलाकों पर वर्चस्व था और जो सशस्त्र बलों की रीढ़ थे।
इनमें से अधिकांश का राजा के साथ खून का संबंध होता था और वे अपने को राज्य के शासन में हिस्सेदार मानते थे। राजपूतों के उद्भव को लेकर विद्वानों में भारी विवाद है। कुछ विद्वान इनको मिश्रित मूल का मानते हैं जिनमें से कुछ शक, हूण आदि विदेशियों के, देसी कबीलों के, और कुछ दृष्टांतों में ब्राह्मणों के वंशज थे। दूसरी ओर अनेक राजपूत वंश, परंपरा जिनकी संख्या 36 बतलाती है, अपनी वंशावली उन सूर्यवंशी और चंद्रवंशी क्षत्रियों से जोड़ते थे जिनका महाभारत में उल्लेख है। आधुनिक अनुसंधान उस प्रक्रिया पर बल देता है जिसमें विभिन्न सामाजिक समूहों के व्यक्ति अपने को क्षत्रिय बतलाकर अपनी नई-नई मिली शक्ति और स्थिति को वैधता प्रदान करने का प्रयास करते थे। कभी-कभी एक ब्राह्मण माँ की संतान होने का दावा करके एक मिश्रित ब्राह्मण-क्षत्रिय स्थिति पाने की कोशिश की जाती थी। विद्वान जन इसे सामाजिक वृद्धि की एक जटिल प्रक्रिया का अंग मानते हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में आदिवासी इलाकों में ब्राह्मण, व्यापारी और सैनिक बस गए। अनेक क्षेत्रों में इसी के साथ कुँओं, बाँधों आदि से सिंचाई और बेहतर फ़सलों की खेती पर आधारित एक श्रेष्ठतर अर्थव्यवस्था का आरंभ हुआ। इस प्रक्रिया में कुछ कृषकों ने राजपूत का दर्जा हासिल कर लिया, जबकि कुछ शूद्र ही रहे। इस तरह, जिसे ‘राजपूतीकरण’ कहते हैं उसके साथ खेतिहर अर्थव्यवस्था की बढ़ोत्तरी हुई और विभिन्न वर्गों ने राजनीतिक सत्ता भी अर्जित कर ली। इस प्रक्रिया में ब्राह्मणों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उदाहरण के लिए, अग्निकुल की कथा में, जिसे ग्यारहवीं सदी का बताया जाता है, ऋषि वशिष्ठ ने पवित्र अग्नि से चार . राजपूत वंशों को पैदा किया-प्रतिहार, सोलको या चालुक्य, परमार या पवार, तथा हमान या चौहान। इस काल में ब्राह्मणों ने शासक परिवारों को प्राचीन क्षत्रिय परिवारों से जोड़ते हुए अनेक वंशावलियाँ लिखीं। उदाहरण के लिए. गुर्जर-प्रतिहारों को गुर्जर मूल से उत्पन जाना जाता है पर उनको लक्ष्मण से जोड़ दिया गया जिन्होंने राम के द्वारपाल (प्रतिहार) का काम किया था। इस ब्राह्मण-राजपूत गठजोड़ के अनेक राजनीतिक और सांस्कृतिक परिणाम निकलो विस्तारवादी हो रहे हिंदू धर्म के रक्षकों का काम करते हुए राजपूतों ने शानदार मदिर बनवाकर तथा उन्हें और ब्राह्मण पुरोहितों को बड़े-बड़े भूमिदान, उपहार, धर्मादे आदि देकर अपनी शक्ति का परिचय दिया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जाति उतनी बेलोच नहीं थी जितनी समझी जाती है। वर्ण-व्यवस्था में व्यक्ति और समूह ऊपर उठ सकते थे और नीचे भी गिर सकते थो कभी-कभी नई जातियों का वर्ण-व्यवस्था में स्थान निर्धारण कठिन हो जाता था। इसका एक उदाहरण कायस्थ जाति है जिसका उल्लेख इस काल से विशेष रूप से होने लगता है। लगता है आरंभ में ब्राह्मण और शूद्रों समेत विभिन्न जातियों के उन लोगों को, जो राजकीय प्रतिष्ठानों में काम करते थे कायस्थ कहा जाता था। कालांतर में वे एक अलग जाति के रूप में सामने आए। इस काल में हिंदू धर्म कातेजी से प्रसार हो रहा था। उसने बड़ी संख्या मे बौद्धों और जैनियों समेत अनेक देसी कबीलों को भी हिंदू बना लिया। हूणों जैसे विदेशियों का भी हिंदूकरण हुआ। ये नए समूह नई जातियाँ और उपजातियाँ बन गए। लेकिन कबीलों ने अपनी प्रथाओं, विवाह-संस्कारों, यहाँ तक कि अपने कबीलाई देवी-देवताओं को भी बचाकर रखा। इन देवी-देवताओं को प्रायः हिंदू देवी-देवताओं के अधीन बना दिया जाता था। इस तरह समाज व धर्म अधिकाधिक जटिल होते गए।

ख) शूद्र, दलित एवं दास

विधिशास्त्री याज्ञवल्क्य के अनुसार एक ब्राह्मण अपने किसान, नाई, ग्वाला और परिवारिक मित्रों के साथ भोजन कर सकता है। एक आधुनिक इतिहासकार डी सी सरकार के अनुसार इस काल में ‘शूद्रों की स्थिति में क्रमिक उन्नति’ जातिप्रथा की एक विशेषता थी। हालांकि उनको वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था, पर वे जन्म, मृत्यु, नामकरण आदि स्मार्थ सस्कारों के अधिकारी बन गए। कृषि का प्रसार हुआ तो अनेक जनजातीय लोग इस श्रेणी में शामिल हो गए। जाट, जो सिंध के घुमक्कड़ पशुपालक जनजाति थे, धीरे-धीरे पंजाब में आ गए तथा कृषक-सैनिक बन गए। हालाँकि वर्ण व्यवस्था में उनको शूद्रों की हैसियत से शामिल किया गया, पर उनमें एक उच्चतर श्रेणी का उदय भी हुआ जो अपने आपको राजपूतों के बराबर
मानता था।
उच्च जातियों और शद्रों के विवाह पर लोग नाक-भौं चढ़ाते थे, पर ऐसे विवाह होते थे। इस बात का पता इससे चलता है कि एक निचली जाति की स्त्री सेकची जाति के पुरुष के विवाह को अनुलोम (विधि सम्मत) और एक ऊँची जाति की था। नई जातियों के उदय को, जिनमें अकसर कुम्हार, बुनकर, नाई, आदि पेशेवर स्त्री से निचली जाति के पुरुष के विवाह को प्रतिलोम (विधि विरुद्ध) कहा जाता समूह या फिर जनजातीय लोग शामिल थे, ऐसे ही मिश्रित विवाहों का परिणाम माना गया।
शूद्रों की तुलना में दलितों की स्थिति और बिगड़ी। दलितों में वे लोग आते थे जो मेहतरगीरी, मृत पशुओं की खाल उतारना, जूते बनाना, शिकार आदि पेशे करते थे। इन लोगों को अंत्यज अर्थात अछूत कहा गया और ये चातुर्वर्ण व्यवस्था से बाहर, एक पाँचवी सामाजिक श्रेणी के थे। अकसर उनसे द्विज व्यक्तियों के निवासक्षेत्रों से दूर रहने की अपेक्षा की जाती थी। स्मृतियों में इस बात की चर्चा भी मिलती है कि एक अंत्यज की छाया व्यक्ति को दूषित करती है या नहीं। देश के कुछ भागों में चांडालों के लिए एक डंडी से एक लकड़ी की तख्ती बजाते चलना अनिवार्य था ताकि द्विज व्यक्तियों का उनसे संपर्क न हो। देश के अधिकांश भागों में ये लोग कृषि की जमीनों के स्वामी नहीं बन सकते थे।
इस काल में दास प्रथा भी अस्तित्व में थी। युद्धबंदियों या ऋण चुकाने में असमर्थ व्यक्तियों को दास रूप में बेचा जा सकता था। अकाल के दिनों में अनेक किसान स्वयं को या अपनी पली या बच्चों को अनाज के बदले बेच देते थे। घरेलू कामों के लिए या संगत के लिए स्त्रियाँ भी खरीदी जाती थीं। लेकिन दासों के लिए योजनाबद्ध धावे नहीं बोले जाते थे, जैसा कि तुर्कों के बीच प्रचलन था। आम तौर पर अंत्यज या घृणित जातियों की अपेक्षा दासों के साथ बेहतर व्यवहार किया जाता था। युद्ध के लिए दासों का उपयोग नहीं किया जाता था। तो भी वे लड़ सकते थे क्योंकि कहा गया है कि एक दास अगर अपने स्वामी का जीवन बचाता है तो वह स्वतंत्र हो जाता है तथा अपने स्वामी की संपत्ति का एक भाग पाने का अधिकारी हो जाता है। अपने मालिक की संतान जननेवाली दासी भी स्वतंत्र कर दी जाती थी। आम तौर पर एक दासी को मुक्त करना सुकर्म समझा जाता था तथा इसके लिए नियम निर्धारित किए गए थे।

स्त्रियों की दशा

पहले की ही तरह स्त्रियों को सामान्यतः मानसिक दृष्टि से हीन माना जाता था। पतियों की आज्ञा का अंध-पालन उनका कर्त्तव्य था। एक लेखक पति के प्रति पत्नी के कर्तव्य का वर्णन करते हुए कहता है कि वह उसके पाँव धोएगी और वे दूसरी सेवाएँ करेगी जो एक सेवक को शोभा देती हैं। लेकिन वह यह शर्त भी जोड़ता है कि पति सद्कर्मों के मार्ग पर चले तथा अपनी पत्नी के प्रति घृणा या ईर्ष्या के भाव से मुक्त रहे। स्त्रियों को वेदों के अध्ययन के अधिकार से अभी भी वाचत रखा जा रहा था। इसके अलावा लड़कियों के लिए विवाह की आयु भी कम कर दी गई और इस तरह उनके लिए उच्च शिक्षा के अवसर नष्ट कर दिए गए। इस काल के किसी भी शब्दकोश में शिक्षिका शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। इससे स्त्रियों में उच्च शिक्षा की हीन स्थिति का पता चलता है लेकिन इस काल के कुछ नाटकों में हम देखते हैं कि गणिकाएँ और रानियों की सेविकाएँ भी संस्कृत और प्राकृत में उत्तम काव्य रचना में समर्थ थीं। ललित कलाओं में और विशेषकर चित्रकला और संगीत में राजकुमारियों की कुशलता का अनेक कथाओं में संकेत मिलता है। उच्च अधिकारियों को पुत्रियों, गणिकाओं और रखैलों से भी काव्य समेत विभिन्न कलाओं में पारंगत होने की अपेक्षा की जाती थी। विवाह के बारे में स्मृतियों के लेखक कहते हैं कि माता-पिता को चाहिए कि 6 से 8 वर्ष की आयु के बीच या 8 वर्ष के बाद और रजस्वला होने से पहले कन्या का दान कर दे। कुछ दशाओं में पुनर्विवाह की अनुमति भी थी, जैसे अगर पति कहीं चला जाए (अर्थात उसका कोई पता न चले), मर जाए. संन्यासी का जीवन
अपना ले, नपुंसक हो या फिर जाति से बाहर कर दिया गया हो।
सामान्यत: स्त्रियों पर भरोसा नहीं किया जाता था। उन्हें घर में रखा जाता था और उनके जीवन पर पुरुष संबंधियों का, अर्थात पिता, भाई, पति या पुत्र का, नियंत्रण होता था। पर घर के अंदर उनका सम्मान किया जाता था। पति अगर लांछित पत्नी को भी त्याग दे तो भी उसे गुजारा दिया जाता था। भूमि में संपत्ति संबंधी अधिकारों के विकास के साथ स्त्रियों को भी संपत्ति के अधिक अधिकार मिले। परिवार की संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए स्त्रियों को अपने पुरुष संबंधियों की संपत्ति विरासत में पाने का अधिकार दिया गया था। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो एक विधवा को अपने पति की पूरी संपत्ति पाने का अधिकार था, बशर्ते वह पुत्रहीन मरा हो। बेटियों को भी विधवा माता की संपत्ति पाने का अधिकार था। इस तरह सामंती समाज के विकास ने निजी संपत्ति की धारणा को और मजबूत बनाया। सतीप्रथा को कुछ लेखकों ने अनिवार्य बतलाया है जबकि औरों ने इसकी निंदा
की है। अरब लेखक सुलेमान के अनुसार राजाओं की पलियाँ कभी-कभी मृत पतियों की चिताओं पर स्वयं को जला देती थीं, लेकिन ऐसा करना या न करना उनकी इच्छा पर निर्भर था। लगता है कि अग्रणी सरदारों द्वारा बड़ी संख्या में पलियाँ रखने की प्रथा बढ़ी और फलस्वरूप संपत्ति को लेकर विवाद खड़े होने लगे तो सती प्रथा के प्रसार की प्रवृत्ति सामने आई।
सवर्ण स्त्रियाँ अलग-थलग रहती थीं और सामान्यतः लोगों की दृष्टि से रखी जाती थी। लेकिन शरीर को पर्दे से ढंकने की कोई प्रथा नहीं थी।
दसवीं सदी लगाते थे सभी उपस्थित पुरुषों को उनकी स्त्रियों को बेपर्दा देखने की अनुमति रहती थी विदेशी तक इससे वंचित नहीं रहते थे। उड़ीसा और कश्मीर में अनेक स्त्रियों: गुप्त का उल्लेख किया जा सकता है जिसने युवराज को माता के रूप में कम से महारानी-रूप में अपने बूते पर राज्य किया। इनमें वाकटक राजवंश की प्रभावती कम 13 वर्षों तक राज्य किया तथा रानी दिदा का उल्लेख किया जा सकता है। जिसने 50 वर्षों तक कश्मीर पर राज्य किया और अपने खिलाफ़ सभी षड्यत्री सफलता पूर्वक सामना किया। साधारण स्त्रियों के जीवन के बारे में हमारे पास सूचनाएँ बहुत कम हैं। उनकी कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। पर संभालने और बच्चे पालने के अलावा पुरुषों के साथ खेती, व्यवसायों आदि

वस्त्र, भोजन, मनोरंजन

इस काल में पुरुषों और स्त्रियों के परिधानों की शैली में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं आया। देश के अधिकांश भागों में धोती और साड़ी पुरुषों और स्त्रियों के सामान्य परिधान बने रहे। उत्तर भारत में पुरुष सदरी पहनते थे और स्त्रियाँ चोली पहनती थीं। मूर्तियों से पता चलता है कि उत्तर भारत में उच्च वर्गों के पुरुष लो कोट, पाजामे और जूते पहनते थे। राजतरंगिणी के अनुसार हर्ष ने कश्मीर में राजाओं की शान के योग्य एक परिधान चलाया। इसमें लंबा कोट शामिल था और ऐसा उल्लेख मिलता है कि एक मूतपूर्व आमात्य (महामंत्री) को छोटा कोट पहनने के कारण राजा के क्रोध का पात्र बनना पड़ा। जाड़ों में ऊनी कंबलों का प्रयोग किया जाता था। सबसे अधिक प्रयुक्त सामग्री तो कपास ही था, पर उच्च वर्ग रेशम के कपड़े और बारीक मलमल का प्रयोग भी करते थे।
अरब यात्री स्त्री-पुरुष दोनों के गहने पहनने के शौक की पुष्टि करते हैं। स्त्री-पुरुष, दोनों सोने के कंगन और कुंडल पहनते थे जिनमें कभी-कभी तो कीमती रल जड़े होते थे। चीनी लेखक चाऊ-जू कुआ का कहना है कि गुजरात में स्त्री-पुरुष, दोनों ही दोहरे कुंडल पहनते थे। वे चुस्त कपड़े पहनते थे जिसका एक सिरा उनके माथे को ढंक लेता था। वे लाल रंग के जूते भी पहनते थे। एक और प्रसिद्ध यात्री मार्को पोलो कहता है कि मलाबार में स्त्री-पुरुष बस कमर पर लुंगी बाँधते थे और राजा भी इसका अपवाद नहीं था। उसके अनुसार दर्जी का व्यवसाय तो अज्ञात ही था। क्विलोन में भी स्त्रियों और पुरुषों का परिधान कटि-वस्त्र ही था। लेकिन दक्षिण भारतीय राजा कपड़े भले ही कम पहनते हों, पर वे गहनों के शौकीन होते थे। चाऊ-जू कुआ के अनुसार मलाबार का राजा अपनी प्रजा की तरह कटि-वस्त्र पहनता और नंगे पैर रहता था। लेकिन जब वह जुलूस में हाथी पर सवार
होकर निकलता था तो मोती-माणिक जड़ा सोने का टोपा पहनता था तथा सोने के बाजूबंद और नूपुर भी धारण किए हुए होता था। माको पोलो कहता है, ‘यह राना जितना सोना और हीरे-मोती धारण करता है वह एक नगर की लूट से प्राप्त हो सकने वाली संपत्ति से भी अधिक है।’
रहा सवाल भोजन का तो अनेक क्षेत्रों और आबादी के अनेक भागों में शाकाहार ही प्रचलित था। फिर भी इस काल का एक अग्रणी स्मृति लेखक विस्तार से उन अवसरों का वर्णन करता है जब मांसाहार वैध होता था। इससे लगता है कि मोर, घोड़ा, जंगली गधा, जंगली मुर्गा और जंगली सुअर को वैध खाद्य पदार्थ माना जाता था।
भारतीय लेखक और अरब लेखक भी यहाँ मद्यपान के अभाव की पुष्टि करते हैं। लेकिन लगता है यह एक आदर्श चित्र खींचा गया है। इस काल की साहित्यिक रचनाओं में हमें मद्यपान के अनेक उल्लेख मिलते हैं। विवाहों और भोजों समेत अनुष्ठानों के अवसरों पर शराब पी जाती थी। नागरिकों के कुछ वर्गों में बहुत लोकप्रिय वन-विहार के दौरान भी मौज-मस्ती के लिए शराब पी जाती थी। राजा के लश्कर में शामिल स्त्रियाँ भी जमकर शराब पीती थीं। जहाँ कुछ स्मृति-लेखक तीन द्विज वर्गों के लिए मद्यमान का निषेध करते हैं, वहीं कुछ दूसरे लेखक इसे केवल ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध बतलाते हैं तथा क्षत्रियों और वैश्यों को कुछ अपवादों के साथ इसकी छूट दे देते हैं।
इस काल का साहित्य दिखाता है कि नगरों के लोग मनोरंजन प्रेमी थे। मेलों और त्योहारों के अलावा वन-विहार, तैराकी के आयोजन आदि व्यापक रूप से लोकप्रिय थे। जनता में भेड़ों, मुर्गों आदि विभिन्न प्राणियों की लड़ाइयाँ लोकप्रिय थीं और कुश्ती की प्रतियोगिताएँ भी। उच्च वर्ग पाँसों के खेल, शिकार और चौगान (एक प्रकार का भारतीय पोलो) के शौकीन बने रहे। चौगान को तो शाही मनोरंजन समझा जाता था।

शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान और धर्म

पिछले कालों में शिक्षा की जो व्यवस्था धीरे-धीरे विकसित हुई थी वह किसी खास परिवर्तन के बिना इस काल में भी जारी रही। उस समय जन-शिक्षा की धारणा थी ही नहीं। लोग वही सब सीखते थे जिसे अपनी जीविका के लिए आवश्यक समझते थे। पढ़ाई-लिखाई एक छोटे-से वर्ग तक सीमित थी-अधिकतर ब्राह्मणों तथा उच्च वर्ग के कुछ लोगों विशेषकर कायस्थों तक। कमी-कभी मंदिर उच्च स्तर की शिक्षा की व्यवस्था करते थे। सामान्यतः एक छात्र को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरु के घर जाना पड़ता था या उसके साथ रहना पड़ता था। इस स्थिति में उसे या तो अपने अध्यापक को शुल्क दना पड़ता था या शिक्षा की समाप्ति पर दक्षिणा। छात्रों से, विशेषकर उनसे जो इतने निर्धन होते थे कि शुल्क नहीं दे सकते थे, गुरु की व्यक्तिगत सेवा करने की अपेक्षा की जाती थी। वेद और व्याकरण अध्ययन के मुख्य विषय थे। तर्कशास्त्र और दर्शनशास्त्र का अध्ययन भी किया जाता था। कुलीनों में राजनीति का अध्ययन लोकप्रिय था और इसमें राजनीतिक नैतिकता भी शामिल थी। कमंडक का नीतिसार ज्ञान की इस शाखा में एक उल्लेखनीय योगदान है।
प्रशासन-व्यवस्था और खातादारी (लेखा-जोखा) की शिक्षा के लिए कायस्थों की अपनी व्यवस्था थी। अनेक केंद्रों में विज्ञान की शिक्षा भी दी जाती थी। इसमें गणित, खगोलिकी और आयुर्विज्ञान शामिल थे। उदाहरण के लिए, नवीं सदी में बल्ख के अरव खगोलशास्त्री अबू मआशिर ने बनारस में दस वर्षों तक शिक्षा प्राप्त किसी शिल्प या व्यवसाय की शिक्षा देने का दायित्व सामान्यत: व्यापार संघों पर होता था या अलग-अलग परिवारों पर। उदाहरण के लिए, एक सौदागर ने अपने व्यवसाय के लिए कितनी सावधानी के साथ अपने बेटे को प्रशिक्षित किया, इसका एक विस्तृत विवरण हमें प्राप्त है।
एक अधिक औपचारिक प्रकार की शिक्षा, जिसमें लौकिक विषयों पर अधिक जोर दिया जाता था, कुछ बौद्ध विहारों में दी जाती रही। इनमें बिहार का नालंदा सबसे प्रसिद्ध था। ज्ञान के ऐसे दूसरे केंद्रों में विक्रमशीला और उदंतपुर शामिल थे; ये भी बिहार में ही थे। ये सभी तिब्बत समेत दूर-दूर के स्थानों से छात्रों को आकर्षित करते थे। इन केंद्रों में अधिकांश आवासी छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी। इन शिक्षा-केंद्रों के खर्च के लिए राजागण खुलकर मुद्रा-दान और भूमिदान देते थे। उदाहरण के लिए, नालंदा को दान में 200 गाँव मिले हुए थे।
कश्मीर एक और महत्त्वपूर्ण शिक्षा केंद्र था। इस काल में कश्मीर में अनेक शैव पंध और ज्ञान के केंद्र फल-फूल रहे थे। दक्षिण भारत में अनेक महत्त्वपूर्ण मठ स्थापित हुए, जैसे मदुरै और भूगेरी में। इन विभिन्न शिक्षा-केंद्रों ने वाद-विवाद को, जिनमें प्रमुख विषय धर्म और दर्शन होते थे, बहुत बढ़ावा दिया। भारत के विभिन्न पागों के महत्त्वपूर्ण मठों और अन्य शिक्षा-केंद्रों ने मुक्त रूप से और तीव्र गति से देश के एक भाग से दूसरे भाग में विचारों के प्रवाह को संभव बनाया। शिक्षार्थी जब तक देश के विभिन्न भागों में फैले अनेक शिक्षा-केंद्रों की यात्रा करके वहाँ के विद्वानों से शास्त्रार्थ नहीं कर लेता था, दर्शन की शिक्षा पूरी नहीं समझी जाती थी।
पूरे देश में जिस प्रकार से विचारों का संचार होता था, वह भारत की सांस्कृतिक एकता को कायम रखने और मजबूत बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण था। देश में इस काल में विज्ञान के विकास की गति धीमी हो गई और कालांतर में उसे विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी देश समझा जाना बंद हो गया। उदाहरण के लिए, लाशों की चीरफाड़ को सिर्फ हीन जातियों के लिए उपयुक्त समझा जाने लगा और इस कारण शल्य- -चिकित्सा का पतन हुआ। वस्तुतः शल्य-चिकित्सा नाइयों का पेशा बनकर रह गई। ज्योतिष ने खगोलशास्त्र को धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में धकेल दिया। लेकिन गणित के क्षेत्र में कुछ उन्नति हुई। भास्कर द्वितीय की रचना लीलावती, जो इसी काल में लिखी गई, लंबे समय तक प्रामाणिक पाठ्यपुस्तक बनी रही। खनिजों विशेष रूप से पारे के उपयोग के कारण आयुर्विज्ञान में भी कुछ प्रगति हुई। वनस्पति विज्ञान तथा पशुओं (घोड़े, हाथी आदि) की चिकित्सा पर अनेक ग्रंथ लिखे गए। लेकिन घोड़ों की नस्ल में सुधार करने का कोई रास्ता नहीं निकाला गया जिसके कारण भारत ऐसे घोड़ों के आयात के लिए मध्य एशिया अरब और ईरान पर निर्भर बना रहा। इन क्षेत्रों को जब मुस्लिम शासकों ने जीत लिया तो भारतीय राजाओं को अच्छे घोड़े प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इस काल में भारतीय विज्ञान की जड़ता के अनेक कारण थे। अनुभव बतलाता है कि पूरे समाज के विकास से विज्ञान के विकास का गहरा संबंध होता है। जैसा कि हमने देखा, इस काल में समाज अधिकाधिक कठोर और संकीर्ण होता जा रहा
था। बढ़ते धार्मिक रूढ़िवाद के साथ नगरीय जीवन क्षीण होता जा रहा था और संचार-संवाद में कमी आती जा रही थी।
एक अन्य कारण था भारतीयों को बाहर के वैज्ञानिक चिंतन की प्रमुख धाराओं से स्वयं को अलग कर लेने की प्रवृत्ति। यह बात मध्य एशिया के मशहूर वैज्ञानिक और विद्वान अल-बरूनी की रचनाओं में प्रतिबिंबित होती है जो ग्यारहवीं सदी के आरंभिक चरण में लगभग दस वर्ष तक भारत में रहा। अल-बरूनी भारतीय ज्ञान-विज्ञान का भारी प्रशंसक था। फिर भी वह देश के विद्वत्जन, अर्थात ब्राह्मणों के अलगाववादी रवैये का जिक्र करता है। वह कहता है ‘वे दंभी, मूर्ख, खोखले, आत्मप्रवंचक और निरुत्साही लोग हैं। जो कुछ वे जानते हैं उसे दूसरों को देने में वे प्रकृति से ही क्षुद्र हैं, और इसका हर संभव ध्यान रखते हैं कि उस ज्ञान को अपनी ही जनता में किसी और जाति के व्यक्तियों तक और उससे भी बढ़कर विदेशियों तक जाने से रोक कर रखें। उनका विश्वास है कि उनको छोड़ किसी और प्राणी को विज्ञान का कोई ज्ञान है ही नहीं।’

धार्मिक आंदोलन और विश्वास

हिंदू धर्म का पुनरुत्थान और प्रसार तथा बौद्ध और जैन धर्मों का निरंतर पतन इस काल की विशेषताएँ हैं। न सिर्फ बौद्धिक स्तर पर बौद्ध और जैन धर्मों के आचार विचार को चुनौती दी गई बल्कि कमी मागी तो जैन बौद्ध शिशुओं का दुगनी किया गया परंपरा के अनुसार पी के पदिय राजा ने संबोदर नामक एक शैव प्रचारका के कहने पर बड़ी संख्या में जैन पिशुओं को मरवा डाला। ऐसी कुछ उदाहरण हैं जब बौद्ध विहार और जैन मंदिर हथिया लिए गए। उदाहरण के लिए, पुरी का मंदिर कापी एक बौद्ध मदिर था। कुतब मीनार के पास का पदिा कभी एक जैन मंदिर था पर बाद में उसे एक विष्णु मंदिर बना दिया गया। हमें नही पता कि ऐसी घटनाएँ कितनी व्यापक थीं, लेकिन अगर ये घटनाएँ कभी कभार ही होती थी तो भी उनको उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन ये मूर्ति और पदिर-विनाश के किसी पाकिा दर्शन का अंग नहीं थीं, जैसा कि आरंभिक आप
और बाद के तुर्क हमलावरों के बारे में कहा जा सकता है।
इस काल में बौद्ध धर्म धीरे-धीरे पूर्वी भारत तक सिमट कर रह गया। पाल शासक बौद्ध धर्म के संरक्षक थे। दसवीं सदी के बाद पालों के पतन से इस क्षेत्र में यौद्ध धर्म को भारी आपात लगा। लेकिन बौद्ध धर्म के आंतरिक विकासक्रम अधिक क्षति पहुँचाने वाले थे। बुद्ध ने एक व्यावहारिक दर्शन की शिक्षा दी थी जिसमें पुरोहित वर्ग का या ईश्वर संबंधी कल्पनाओं का स्थान नहीं था। अब बुद्ध की उपासना में काफी तामझाम पैदा हो गया। यह विश्वास मजबूत हुआ कि जादुई शब्दों (मंत्र) का उच्चारण करके और विभिन्न प्रकार के तांत्रिक कर्म करके एक उपासक अपनी इच्छा पूरी कर सकता है। उनका यह विश्वास भी था कि इन
तौर-तरीकों से तथा विभिन्न प्रकार के निग्रह और गुप्त क्रियाओं के द्वारा पराप्राकृतिक शक्तियाँ पा सकते हैं, जैसे हवा में उड़ने, अदृश्य हो जाने, दूर की वस्तुओं को देख लेने आदि की शक्तियाँ। मनुष्य इस ढंग से प्रकृति पर नियंत्रण पाने के लिए हमेशा से तड़पता रहा है। किंतु तड़प भरी ऐसी अनेक इच्छाएँ आधुनिक विज्ञान के विकास के सहारे ही पूरी हुई हैं। अनेक हिंदू योगियों ने भी इन तौर-तरीकों को अपनाया। उनमें सबसे प्रसिद्ध हुए गोरखनाथ। गोरखनाथ के अनुयायी नाथपंथी कहलाते थे और एक समय तो वे पूरे उत्तर भारत में लोकप्रिय थे। इनमें से अनेक योगी निचली जातियों के थे। उन्होंने जातिप्रथा की भर्त्सना की
और उन विशेषाधिकारों की भी जिनका दावा ब्राह्मण किया करते थे। उन्होंने जिस माग पर चलने का उपदेश दिया, वह जाति-भेदों से परे सभी के लिए खुला हुआ था। थे प्रथाएँ तंत्र से एकाकार हो गई जो देवी माँ की उपासना पर आधारित था। तंत्र जो धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गया, बौद्ध धर्म के कुछ पक्षों तथा हिंदू विचारों और विश्वासों का मिलनस्थल था।
जैन धर्म लोकप्रिय बना रहा, खासकर व्यापारी समुदायों में। गुजरात शासक जैन धर्म के संरक्षक थे। इसी काल में कुछ अत्यंत शानदार जैन मंदिरों का निर्माण आबू पर्वत के दिलवाड़ा मंदिर का। मालवा के परमार राजाओं ने जैन संतों की अनेक विशाल मूर्दियां बनवाई और महावीर की भी जिनको प्रणवान रूप में पूजा जाने लगा। अनेक भागों में बनवार गार शानदार जैनालय
यात्रियों के विश्रामस्थल का काम भी करते थे। दक्षिण भारत में जैन धर्म नवीं और दसर्वी सदियों में अपने चरम पर पहुंचा। कर्नाटक के गंग शासक जैन धर्म के महान संरक्षक थे। इस काल में अनेक मार्ग में बहुद-से बैन बासडियों (माद) और
महास्तों का निर्माण हुआ। श्रावण बेलगोला की विशाल मूर्वि इसी काल में स्थापिट हुई। यह मूर्ति कोई 13 मीटर ऊंची है और ग्रेनाइट की च्य्यन दराशकर बनाई गई है। इसमें संत को खड़ी मुद्रा में, कठोर विग्रह का पालन करते दिखाया गया है; के पास उमड़-घुमड़ रहे सांपों का और बदन पर बन गई बॉक्यिों का उन्हें कई ध्यान नहीं है। चार उपहारों (ज्ञान, भोजन, औषधि और आवास) के जैन सिद्धांत ने जैन धर्म को जनता के बीच लोकप्रिय बनाया। कालांदर में बढ़ती उड़ता और राजसी संरक्षण की समाप्ति के कारण जैन धर्म का पतन हुआ।
हिंदू धर्म का पुनरुत्थान और प्रसार अनेक रूपों में हुआ। शिव और विष्णुम्ब प्रमुख देवता हो गए त्या उनको श्रेष्ठता बदलाने के लिए अनेक मंदिर बनार गर। इस प्रक्रिया में अनेक देवी-देवता जिनमें हिंदू धर्म में शामिल की गई उनजातिय के देवी-देवता भी थे, को उनके अधीन स्थान मिला या उनकी पलियाँ बना दी गई। पूर्वी भारत में देवताओं को पलियाँ स्वयं ही उपासना को प्रमुख पात्र बन गई, वैसे बुद्ध की पत्नी तारा, शिव की पत्नी दुर्गा या काली आदि। फिर भी शिव और विष्णु के संप्रदायों का उदय सांस्कृतिक समन्वय की एक प्रक्रिया के आगे बढ़ने का सूचक था। इस तरह समाव के बिखराव के काल में धर्म ने एक सकारात्मक भूमिका निभाई। परंतु धार्मिक पुनरुत्थान ने ब्राह्मणों की शक्ति और दंम को भी बढाया। इसके फलस्वरूप ऐसे लोक-आंदोलनों की एक श्रृंखला ही पैदा हो गई जो ब्राह्मणों को निशाना बनाते थे तथा मानव की समानता और स्वतंत्रता जैसे तत्वों पर जोर देते थे।
हम उत्तर भारत में तंत्रवाद के विकास का वर्णन पहले ही कर चुके हैं जिसमें किसी भी जाति का व्यक्ति शामिल हो सकता था। लेकिन दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलन उससे कहीं बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण और व्यापक था। भक्ति आंदोलन का नंतृत्व अनेक जनप्रिय संतों ने किया जो नयनार और आलवार कहलाते थे। इन संतों ने इंद्रियों के दमन को धर्म का मुख्य रूप मानना अस्वीकार किया। वे धर्म को रूखी, औपचारिक उपासना का विषय न मानकर आराध्य और आराधक के बीच प्रेम पर आधारित एक जीवंत संबंध समझते थे। उनकी आराधना के प्रमुख पात्र शिव और विष्णु थे। वे मुख्यतः तमिल में बोलते-लिखते थे जिनको हर व्यक्ति समझता था। अपना प्रेम और समर्पण का संदेश लेकर ये संत जगह-जगह गए। कुछ का संबंध निचले वर्गों से था हालांकि उनमें से कम से कम एक तो ब्राह्मण था ही।
अंदाल नामक एक स्त्री संत भी हुई है। ये लगभग सभी जातिगत असमानताओं, नहीं की। निचली जातियों को वैदिक अध्ययन और वैदिक उपासना से अलग: गया था। इन संतों ने जिस भक्तिमार्ग का उपदेश दिया वह हर एक के लिए खुल भक्ति आंदोलन न केवल बौद्ध-जैन धर्मों के अनेक समर्थकों को हिंदू धर्म दापो में ले आया बल्कि उसने अनेक जनजातीय लोगों को भी आकर्षित किया नाय मुनि के नेतृत्य में अनेक आचार्यों ने आलयारों की शिक्षाओं को संकलित करते उन्हें व्यवस्थित रूप दिया और उन्हें वेदों के समकक्ष घोषित किया। मंदिरों में आरमिक संतों और उनकी रचनाओं की पूजा होने लगी तथा कर्मकांडों और अनुष्ठानों का एक नया ढांचा खड़ा कर दिया गया। इनमें से अनेक का अनुकरण आज भी हो रहा है।
याहयाँ सदी में पैदा होने वाला एक और लोक-आंदोलन लिंगायत या वीरशैव आंदोलन था। इसके संस्थापक बासव और उसका भतीजा चन्नवासव थे कर्नाटक के कलचूरी राजाओं के दरबार में थे। ये लिंगायत शिव के उपासक उन्होंने जाति प्रथा का जोरदार विरोध किया तथा व्रत, भोज, तीर्थयात्रा और बलि के अधीकार कर दिया। सामाजिक क्षेत्र में उन्होंने बाल-विवाह का विरोध किया तक यिधयाओं को पुनर्विवाह की छूट दी। इस तरह दक्षिण और उत्तर भारत दोनों में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान
दो रूपों में हुमा- एक और तो वेदों और वैदिक उपासना पर नए सिरे से जोर दिया गया और साथ में एक शक्तिशाली साहित्यिक और बौद्धिक आंदोलन का सिलसिला और प्रसार चल निकला। दूसरी और एक लोक-आंदोलन का सूत्रपात हुआ जो इस काल में उता भारत में तंत्र और दक्षिण भारत में भक्ति पर आधारित था। तंत्र और भक्ति दोनों ही जातिगत असमानताओं को टुकराते थे और दोनों के द्वार सबके लिए खुले हुए थे।
बौद्धिक स्तर पर जैन-बौद्ध धर्मों को सबसे गंभीर चुनौती शंकर ने दी जिन्होंने हिंदू दर्शन को नए सिरे से प्रस्तुत किया। शंकर का जन्म केरल में हुआ था, संभवतः नयाँ सदी मा उनसे बहुत-सी कथाएँ जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि जैनियों के दमन का शिकार होने के बाद उन्होंने उत्तर भारत की विजय-यात्रा की, जहाँ उन्होंने अपने विरोधियों को शास्त्रार्थों में हराया। यह विजय-यात्रा इस तरह पूरी हुई कि उनकी मदुरै-यापसी पर राजा ने उत्साह के साथ उनका स्वागत किया और जैनियों को
दरबार से निकाल बाहर किया।
शंकर के दर्शन को अद्वैतवाद कहा जाता है। शंकर की राय में ब्रह्म और जगत एक है, उनका अंतर यथार्थ नहीं बल्कि आमासी है और अज्ञान की उपज है, इसी का एक अंग माया है। ईश्वर के प्रति समर्पण मुक्ति का मार्ग है जो इस ज्ञान से पुष्ट होता है कि ब्रह्म और जगत के प्राणी एक हैं। शंकर ने वेदों को सच्चे ज्ञान का स्रोत ठहराया। शंकर के ज्ञानमार्ग पर कुछ ही लोग चल सकते थे। शंकर ने भक्ति मार्ग को अस्वीकार नहीं किया जिस पर चलकर भक्त प्रभु से एकाकार हो जाता है। पर इसके लिए ज्ञान के सहारे हृदय को शुद्ध करने की आवश्यकता थी। इसलिए यह के जनता को प्रभावित नहीं कर सका। नाथ मुनि और उनके बाद के सभी आचार्य रूढ़िवादी ब्राह्मण थे। उनका तर्क था कि भक्ति का मार्ग केवल तीन द्विज वर्गों के लिए खुला हुआ है और इसके लिए ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित कर्मकांडों का सम्यक व्यवहार और धर्मग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है।
ग्यारहवीं सदी में एक और प्रसिद्ध आचार्य रामानुज ने वेदों की परंपरा से भक्ति को जोड़ने की कोशिश की। उनका तर्क था कि मुक्ति के लिए प्रभु के ज्ञान से अधिक महत्त्व कृपा का है। रामानुज ने इस बात पर जोर दिया कि प्रपत्ति अर्थात प्रभु पर पूर्ण निर्भरता या उनके प्रति समर्पण का मार्ग शूद्रों और दलितों समेत सभी के लिए खुला हुआ है। इस तरह रामानुज ने भक्ति पर आधारित लोक आंदोलन और वेदों पर आधारित उच्चजातीय आंदोलन के बीच एक पुल बाँधने की कोशिश की।
रामानुज द्वारा स्थापित परंपरा को अनेक विचारकों ने अपनाया, जैसे माधवाचार्य (दसवीं सदी) ने और उत्तर भारत में रामानंद, वल्लभाचार्य और अन्य संतों ने। इस प्रकार अपने जनप्रिय रूप में भक्ति आंदोलन सोलहवीं सदी के आरंभ होते-होते तक हिंदू समाज के सभी हिस्सों को स्वीकृत हो गया।

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