जानिये, क्यों मनाई जाती है नागपंचमी

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जानिये, क्यों मनाई जाती है नागपंचमी

भगवान विष्णु  के अवतार श्री कृष्ण जी को जानने के बाद कालिया नाग ने उनसे मांफी मांगी और वचन दिया कि वो अब से किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा। कहते है कि कालिया नाग पर श्री कृष्ण की विजय को भी नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

Nag Panchami Katha जानें क्यों मनाते हैं नागपंचमी का त्योहार, क्या है इसकी कथा

नाग भगवान शंकर के अंग भूषण माने गए हैं। नागपंचमी के दिन शिवजी के साथ ही नागों की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

नाग-पंचमी श्रावण मास में शुक्लपक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। हिंदू धर्मग्रंथों में नाग को प्रत्येक पंचमी तिथि का देवता माना गया है, परंतु नाग-पंचमी पर नाग की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। नाग-पंचमी का पर्व धार्मिक आस्था व विश्वास के सहारे हमारी बेहतरी की कामना का प्रतीक है।

यह जीव-जंतुओं के प्रति समभाव, हिंसक प्राणियों के प्रति भी दयाभाव व अहिंसा के अभयदान की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें पर्यावरण से भी जोड़ता है।

नाग पंचमी महत्व-

नाग पंचमी के दिन अनंत, वासुकि, शेष, पद्म, कंबल, अश्वतर, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक, कालिया और पिंगल इन 12 देव नागों का स्मरण करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से भय तत्काल खत्म होता है। ‘ऊं कुरुकुल्ये हुं फट् स्वाहा’ मंत्र का जाप लाभदायक माना जाता है। कहते हैं कि नाम स्मरण करने से धन लाभ होता है। साल के बारह महीनों, इनमें से एक-एक नाग की पूजा करनी चाहिए। अगर राहु और केतु आपकी कुंडली में अपनी नीच राशियों- वृश्चिक, वृष, धनु और मिथुन में हैं तो आपको अवश्य ही नाग पंचमी की पूजा करनी चाहिए। कहा जाता है कि दत्तात्रेय जी के 24 गुरु थे, जिनमें एक नाग देवता भी थे।

नाग पंचमी में इन 12 नागों की पूजा की जाती है। 

नाग पंचमी पर इन नागों को विशेष रूप से दूध अर्पित किया जाता है। हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार इन बारह नागों की पूजा का विशेष रूप से महत्व माना जाता है। इन नागों के नाम इस प्रकार हैं अनन्त, वासुकि, शेष, पद्म, कम्बल, कर्कोटक, अश्वतर, धृतराष्ट्र, शङ्खपाल, कालिया, तक्षक और पिङ्गल नाग हैं।

नाग पंचमी पूजा विधि-

नागों को अपने जटाजूट तथा गले में धारण करने के कारण ही भगवान शिव को काल का देवता कहा गया है। इस दिन गृह-द्वार के दोनों तरफ गाय के गोबर से सर्पाकृति बनाकर अथवा सर्प का चित्र लगाकर सुबह उन्हें जल चढ़ाया जाता है। इसके साथ ही उन पर घी -गुड़ चढ़ाया जाता है। शाम को सूर्यास्त होते ही नाग देवता के नाम पर मंदिरों और घर के कोनों में मिट्टी के कच्चे दिए में गाय का दूध रखा जाता है। शाम को भी उनकी आरती और पूजा की जाती है। इस दिन शिवजी की आराधना करने से कालसर्प दोष, पितृदोष का आसानी से निवारण होता है। भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना गया है।

समस्तीपुर ( बिहार ) में नागपंचमी पर लगता है सांपों का अनोखा मेला

 बिहार में समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड के सिंघिया घाट में नागपंचमी के अवसर पर आज सांपों का प्रसिद्ध अनोखा एवं अद्वभुत मेला लगा। एकदिवसीय मेले में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों की संख्या मे श्रद्वालुओं ने भाग लिया और नाग देवता का पूजाअर्चना की। स्थानीय लोगों का कहना है कि नागपंचमी के दिन जिले के सिंधिया घाट पर सांपो का यह अनोखा मेला करीब 400 साल से आयोजित हो रहा है जिसमें भगत सिधिंया नदी घाट पर जुटते हैं। इस मेले की खासियत है कि नदी से वहां उपस्थित कई भगत मंत्र विद्या से सैकड़ों की संख्या में नाग समेत जहरीली सांपों को निकालते हैं। इसके बाद हाथों और गर्दन में सांपों को लपेट कर भगत प्रदर्शन करते हैं। 

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