UK Board 9 Class Hindi Chapter 14 – केदारनाथ अग्रवाल (काव्य-खण्ड)
UK Board 9 Class Hindi Chapter 14 – केदारनाथ अग्रवाल (काव्य-खण्ड)
UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 14 – केदारनाथ अग्रवाल (क्षितिज : काव्य-खण्ड)
केदारनाथ अग्रवाल ( चंद्र गहना से लौटती बेर)
I. कवि-परिचय
प्रश्न – केदारनाथ अग्रवाल का जीवन-परिचय देते हुए उनकी उपलब्धियों, रचनाओं, काव्यगत विशेषताओं तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- केदारनाथ अग्रवाल
जीवन-परिचय — केदारनाथ अग्रवाल का जन्म सन् 1911 ई० में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के कमासिन गाँव में हुआ था। उन्होंने ‘उच्चशिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। बाँदा में रहकर उन्होंने जीविका उपार्जन के लिए वकालत की और साथ ही राजनैतिक, सामाजिक तथा साहित्यिक क्षेत्र में भी सक्रियता बनाए रखी।
केदारनाथजी अपनी युवावस्था के आरम्भ से ही कविताएँ रचने लगे थे। उनके अध्यापक शिलीमुखजी उन्हें कविताएँ लिखने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे। उनकी कविताएँ समय- समय पर तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘माधुरी’ में भी छपती थीं। बाद में आगे चलकर वे प्रगतिवादी आन्दोलन से जुड़ गए। वे अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ तथा रसालजी के सम्पर्क से भी प्रभावित हुए। सन् 2000 ई० में उनका देहावसान हो गया।
उपलब्धियाँ – उनकी साहित्यिक सेवा के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
रचनाएँ – केदारनाथजी के प्रमुख काव्य संग्रहों के नाम निम्नलिखित हैं—
‘आग का आईना’, ‘पंख और पतवार’, ‘हे मेरी तुम’, ‘मार प्यार की थापे’, ‘कहे केदार खरी-खरी’, ‘नींद के बादल’, ‘युग की गंगा’, ‘लोक अलोक’, ‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’ आदि।
काव्यगत विशेषताएँ – केदारनाथ अग्रवाल को प्रगतिवादी विचारधारा का कवि माना जाता है। उनकी कविताओं में वास्तविक जीवन की कटुताओं का यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है। उनकी कविताओं में प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण भी यथार्थपरक हुआ है। समाज में चल रहे शोषण और संघर्ष पर भी उनकी सूक्ष्म दृष्टि रही है। ग्रामीण जीवन का यथार्थ भी उनकी कविताओं में अत्यन्त सजीव रूप में प्रस्तुत हुआ है। चना, अलसी, सरसों तथा सारस, बगुला, तोता आदि के स्वर सहज जीवन के स्वाभाविक एवं सजीव रूप को उपस्थित करते हैं। वसन्ती हवा का जैसा सुन्दर स्वरूप आपने अंकित किया है, वह अपने आप में अनूठा है।
भाषा-शैली- अग्रवालजी की काव्य- भाषा आम जनता की भाषा है। वे जनता के बीच प्रचलित शब्दों का मनोरम प्रयोग करने में सिद्धहस्त हैं। उनके काव्य में भाषा – शिल्प और भाव-भूमि दोनों स्तरों पर कोई जटिलता पाठक को नहीं घेरती । वे हृदय की बात बड़ी सहजता से सरल और कलात्मक भाषा में कह डालते हैं। उनकी कविताओं में संगीतात्मकता है, लय है, गति है। सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव को भी वे चित्रात्मकता के साथ सजीव कर देते हैं। अलंकारों का प्रयोग उनके काव्य में अनायास होता गया है। उसके लिए वे कोई जद्दोजहद नहीं करते। छन्दात्मकता और मुक्तछन्दता दोनों पर उनका समान अधिकार है।
II. अर्थग्रहण एवं सराहना सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न – निम्नलिखित पद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—
1. देख आया ……………… खड़ा है।
शब्दार्थ – बीते = बित्ता, हाथ के पंजे को पूरा खोलने पर अँगूठे के सिरे से लेकर कनिष्ठिका (सबसे छोटी उँगली) के सिरे तक की लम्बाई (एक बालिश्त) का नाप । ठिगना = छोटे कद का, कम ऊँचा। मुरैठा = साफा, पगड़ी।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।’
(ग) ‘चन्द्र गहना’ क्या है?
(घ) कवि कहाँ बैठकर प्राकृतिक दृश्य देख रहा है?
(ङ) कवि ने चने के पौधे को किस रूप में देखा है?
(च) खेत की मेड़ क्या होती है?
(छ) ‘ठिगना’ से यहाँ क्या आशय है?
(ज) चने ने किस चीज का मुरैठा बाँध रखा है?
(झ) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ञ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि – केदारनाथ अग्रवाल । कविता – चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – कवि कहता है— मैं चन्द्र गहना नामक गाँव देखकर लौट आया हूँ। अब मैं गाँव के प्राकृतिक दृश्यों को जीभर कर निहारने के लिए खेत की मेड़ पर बैठा हूँ। निपट अकेला बैठा मैं यह दृश्य देख रहा हूँ कि सामने एक बालिश्त के बराबर छोटे-छोटे चने के पौधे खड़े हुए हैं। चना रूप-रंग में हरा है और कद में ठिगना है। इसके ऊपरी भाग पर गुलाबी रंग के फूल खिले हैं। वे फूल सिर पर कुछ इस तरह शोभा दे रहे हैं; मानो विवाह के लिए सजे-धजे खड़े दूल्हे चने ने सिर पर गुलाबी पगड़ी बाँध रखी है।
(ग) चन्द्र गहना एक गाँव का नाम है, जहाँ से कवि अभी-अभी लौटा हैं।
(घ) कवि चन्द्र गहना गाँव को देखकर लौटते समय राह के एक खेत की मेड़ पर बैठकर यह प्राकृतिक दृश्य देख रहा है।
(ङ) कवि ने चने के हरे पौधे को सजे-धजे दूल्हे के रूप में देखा है। उसे लगता है कि ठिगने से चने ने गुलाबी फूलरूपी पगड़ी बाँध रखी है।
(च) दो खेतों की सीमा – रेखा को प्रदर्शित करने के लिए उनके बीच में बनाई जानेवाली मिट्टी की बहुत छोटी-सी दीवार – जैसी रचना मेड़ कहलाती है। खेतों की सिंचाई के लिए उन्हें छोटे-छोटे खण्डों में बाँटने के लिए भी मेड़ बनाई जाती है।
(छ) ‘ठिगना’ से आशय है— ‘छोटा, छोटे कदवाला’ ।
(ज) चने ने गुलाबी फूल का मुरैठा बाँध रखा है।
(झ) भाव – सौन्दर्य – प्रकृति का अत्यन्त सुन्दर, सजीव, रमणीय और काल्पनिक चित्रण हुआ है। कविता में प्रयुक्त गाँव का नाम ही अपने आप में बड़ा शृंगारिक है। चने को वर के रूप में चित्रित करना मनोरम कल्पना है।
(ञ) शिल्प – सौन्दर्य –
● चने का मानवीकरण किया गया है; अतः मानवीकरण अलंकार है।
● ‘एक बीते के बराबर’ में उपमा अलंकार है।
● एक बीते के बराबर, यह हरा ठिगना चना, बाँधे मुरैठा—में अनुप्रास अलंकार है ।
● अभिव्यक्ति में चित्रात्मकता है।
● पद्यांश की भाषा अत्यन्त सरल, सादी और स्थानीय बोली के शब्दों से अलंकृत है।
● ‘मैं’ के प्रयोग ने कवि के कथन में आत्मीयता ला दी है।
2. पास ही ……………… दान उसको
शब्दार्थ — अलसी = तीसी; एक तिलहनी पौधा, जिस पर नीला फूल आता है, अलसी के बीजों से तेल निकाला जाता है। हठीली = जिद्दी । लचीली = लोचदार, लचकवाली।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) अलसी को किस रूप में प्रस्तुत किया गया है?
(घ) ‘हृदय का दान’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ङ) अलसी हठीली, पतली और लचीली क्यों कही गई है?
(च) पद्यांश के आधार पर अलसी के पौधे की विशेषताएँ बताइए।
(छ) पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ज) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि – केदारनाथ अग्रवाल । कविता — चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – चने के खेत में ही उसके साथ अलसी भी उगी हुई है। उसने चने के पौधों के बीच उगकर मानो हठपूर्वक अपना स्थान बना लिया है। कवि ने उसके इसी रूप के कारण उसे हठीली कहा है। वह शरीर से बड़ी दुबली-पतली है। उसकी कमर लचकदार है। आशय यह है कि अलसी का पौधा कमजोर होता है। उसके ऊपरी भाग पर नीले रंग का फूल खिला है। अलसी के ऐसे सजीले सौभाग्यशाली रूप को देखने पर ऐसा लगता है, मानो वह मौन भाषा में यह कह रही है कि यदि कोई मुझे प्यार से छुए तो मैं सचमुच अपना प्यार भरा हृदय उसको समर्पित कर दूँ।
(ग) अलसी को कवि ने प्रेमातुर अल्हड़ नायिका के रूप में प्रस्तुत किया है। वह देह से दुबली-पतली, छरहरी, लचकदार कमरवाली और अल्हड़ है। उसने नीले रंग के फूल धारण किए हुए लगता है, उसने अपने बालों में नीले फूल गूँथकर उनका श्रृंगार किया है। अब वह अपने सौन्दर्य के किसी प्रशंसक को अपना प्यार भरा दिल सौंप देने को आतुर खड़ी है।
(घ) ‘हृदय का दान’ से आशय है- किसी को प्रेम करना ।
(ङ) अलसी का पौधा बहुत पतला और कमजोर होता है, इसलिए कवि ने अलसी (रूपी नायिका) को ‘पतली’ कहा है। पतला होने के कारण अलसी का पौधा हवा के हल्के से झोंके से ही झूमने लहराने लगता है। इसलिए कवि ने अलसी को ‘लचीली’ कहा है। अलसी का पौधा बार-बार झुकने के बाद भी, फिर खड़ा होकर झूमने लगता है मानो उसने झूमने का हठ कर लिया हो। अलसी का पौधा अन्य फसलों की अपेक्षा विषम परिस्थितियों अर्थात् सिंचाई के अभाववाले क्षेत्रों में भी सरलता से उग आता है। इसके लिए सिंचाई आदि की विशेष आवश्यकता नहीं होती है, खर-पतवार भी उसे कम ही प्रभावित करते हैं; अत: जीवन के प्रति उसकी जीवट को ही कवि ने हठ का नाम दिया है। उसके इसी व्यवहार और जीवट को लक्ष्य करके कवि ने अलसी को ‘हठीली’ कहा है।
(च) अलसी का पौधा बहुत पतला होता है। उस पर नीले फूल खिलते हैं। वह हवा के हल्के से झोंके से ही झूमने लहराने लगता है।
(छ) भाव – सौन्दर्य – अलसी को प्रेम में व्याकुल नायिका के रूप में चित्रित करके कवि ने एक सुन्दर, काल्पनिक एवं रमणीय चित्र पाठक के सामने उपस्थित कर दिया है। नायिका की कमनीयता और कोमलता तथा साँवला-सलोना रंग अलसी में साकार हो उठा है। यह भाव पाठक को गुदगुदाता है।
(ज) शिल्प – सौन्दर्य-
● अलसी का मानवीकरण किया गया है। उसे दुबली-पतली कमनीय कायावाली सुन्दर मुग्धा नायिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
● कमर की, नील फूले फूल, कह रही है, दूँ हृदय का दान आदि में अनुप्रास अलंकार है।
● ‘बीच में अलसी हठीली’, ‘देह की पतली कमर की है लचीली’ में स्वरमैत्री द्रष्टव्य है।
● भावाभिव्यक्ति अत्यन्त सरल, प्रवाहपूर्ण एवं बिम्बात्मक है।
3. और सरसों ……………. आज जैसे ।
शब्दार्थ – सयानी = जवान, युवा, विवाहयोग्य। हाथ पीले करना = विवाह करना (मुहावरा ) । फाग = होली के दिनों में गाया जानेवाला गीत।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) सरसों को सयानी कहने का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(घ) कवि ने पद्यांश में विवाह का वातावरण कैसे निर्मित किया है?
(ङ) ‘हाथ पीले करने’ के दो अर्थ हैं। दोनों अर्थ स्पष्ट कीजिए।
(च) पद्यांश का भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(छ) पद्यांश का शिल्प- सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि – केदारनाथ अग्रवाल । कविता — चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – कवि कहता है-सरसों के रूप-सौन्दर्य और हर्ष उल्लास के बारे में मत पूछो। सब ओर उसका पीला, चटकीला रंग छा रहा है। उसका रूप ऐसा प्यारा, मनमोहक और आकर्षक लग रहा है कि उसे देखकर किसी विवाहयोग्य युवा कन्या का ध्यान आ जाना स्वाभाविक है। उसके चारों ओर खिले पीले फूलों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो विवाह के समय हाथों में हल्दी लगाकर उन्हें पीला करने की रस्म पूरी कर दी गई है और वह दुल्हन के रूप में सजधजकर हरी साड़ी धारण किए पूरी सज-धज के साथ विवाह मण्डप में पधार गई हो। विवाह के इस समारोह में फागुन की मस्ती हवाओं में घुल रही है। ऐसा लगता है मानो फागुन का महीना स्वयं फाग के गीतों के रूप में उसके विवाह के मंगलगीत गाने चला आया हो।
(ग) सरसों को सयानी कहने के पीछे दो अर्थ हैं-
1. अलसी और चने के पौधों से सरसों का पौधा बहुत बड़ा होता है; उसके बड़प्पन को प्रदर्शित करने के लिए उसे यहाँ ‘सयानी’ कहा गया है।
2. कवि ने उसको विवाह योग्य कन्या के रूप में प्रस्तुत किया है; इसी की अभिव्यक्ति के लिए भी उसे ‘सयानी’ कहा गया है।
(घ) कवि ने विवाह का वातावरण निर्मित करने के लिए चार क्रियाएँ दिखाई हैं, जो एक भारतीय विवाह में सर्वत्र अपनाई जाती हैं। ये क्रियाएँ इस प्रकार हैं-
1. लड़की का सयानी होना ।
2. विवाह में हाथ पीले करने की एक रस्म को पूरी करना ।
3. विवाह मण्डप रचाना।
4. शादी – विवाह के मंगल गीत गाना।
प्रस्तुत कविता में कवि ने चारों ही क्रियाओं को उपस्थित करके विवाह का वातावरण निर्मित किया है। उसके अनुसार सरसों सयानी हो गई है, उसकी हाथ पीले करने की रस्म पूरी कर दी गई है, अलसी – चने आदि के सजे-सँवरे रूप को विवाह मण्डप तथा ‘फाग’ गीतों को मंगल गीतों के रूप में उपस्थिति किया गया है।
(ङ) हाथ पीले करने के दो अर्थ हैं—
1. सरसों के पीले फूल खिल उठे हैं।
2. विवाह की हाथ पीले करने की रस्म पूर्ण कर ली गई है।
(च) भाव-सौन्दर्य – प्राकृतिक सौन्दर्य की शोभा को नवयौवना कन्या के विवाह मण्डप और वैवाहिक समारोह की उल्लासपूर्ण धूमधाम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कवि की यह कल्पना मनोरम एवं अनूठी है। इसे पढ़कर पाठक अवश्य ही मुग्ध हो जाता है।
(छ) शिल्प – सौन्दर्य –
● ‘और सरसों की न पूछो’ – सरसों के असाधारण सौन्दर्य के लिए अतिसुन्दर अभिव्यक्ति है।
● सरसों और फागुन मास का मानवीकरण किया गया है; अतः मानवीकरण अलंकार है।
● सरसों को विवाहयोग्य कन्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है। फागुन मास को गीतगायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
● ‘हाथ पीले कर लिए हैं’ में श्लेष अलंकार है। इसके दो अर्थ हैं-
1. पीले फूल खिल उठे हैं।
2. विवाह की एक विशेष रस्म पूर्ण कर ली गई है।
● उत्प्रेक्षा अलंकार-
फाग गाता मास फागुन
आ गया है आज जैसे ।
● अनुप्रास की छटा दर्शनीय है – सबसे सयानी, मण्डप में पधारी, फाग गाता मास फागुन आ गया।
● स्वरमैत्री का उदाहरण — फाग गाता मास फागुन ।
● पद्यांश में संगीतात्मकता, लयात्मकता और प्रवाह है।
● भाषा लोकभाषा से सजी और अभिव्यक्ति-क्षम है।
4. देखता हूँ ……………… अधिक है।
शब्दार्थ- स्वयंवर = विवाह की वह रीति, जिसमें कन्या अपनी इच्छानुसार अपने लिए वर का चुनाव करती है। अनुराग = प्रेम। अंचल = आँचल। विजन = सुनसान स्थान ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) कवि किस स्वयंवर की बात कर रहा है?
(घ) ‘प्रकृति का अनुराग अंचल’ से क्या अभिप्राय है?
(ङ) ‘प्रेम की प्रिय भूमि’ किसे कहा गया है और क्यों?
(च) पद्यांश का भाव- सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(छ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि-केदारनाथ अग्रवाल । कविता — चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – कवि कहता है कि आज प्रकृति इतनी प्रसन्न है, मानो वह स्वयंवर के लिए तैयार खड़ी है। यहाँ बैठकर मैं प्रकृति को निहारता हूँ। उसके स्वाभाविक सौन्दर्य को देखकर मैं सोचता हूँ कि नगरों के चहल-पहल, भीड़-भाड़ और शोर भरे जीवन में कितना स्वार्थ है, लोगों में पारस्परिक प्रेम का कितना अभाव है। नगरों में रहनेवाले लोग न केवल स्वार्थ केन्द्रित हैं, बल्कि वे अपने ही हृदय में छिपे प्रेमभाव को नहीं देखते हैं। वे प्रेम रस से कितने वंचित हैं ! ग्रामीण सौन्दर्य की नगरीय वातावरण से तुलना करते हुए कवि कहता है कि यहाँ की एकान्त, शान्त प्रकृति में कितना आकर्षण है, कितना सौन्दर्य है। हवा से हिलते ये पौधे मानो अपना आँचलरूपी हाथ हिला-हिलाकर अपने हृदय का अनुराग प्रकट कर रहे हैं। इस प्रकार वे हमारे मन को बरबस अपनी ओर खींच रहे हैं। इसी मानना है कि व्यापारिक नगरों के वातावरण की अपेक्षा प्राकृतिक वातावरण में मानव हृदय के सुप्तावस्था में पड़े प्रेम-भाव को जाग्रत करने की क्षमता अधिक है।
(ग) कवि ने खेतों में लहलहाती सरसों, अलसी और चने की खेती को देखकर एक प्राकृतिक स्वयंवर की कल्पना की है। हाथ पीले किए पीली सरसों, नीले फूलवाली प्रेमातुर अलसी और गुलाबी फूलों की पगड़ी बाँधे चना खेतों में आस-पास खड़े हैं। ऐसी रंगीन चहल-पहल देखकर ही कवि ने इस स्वयंवर की कल्पना की है। कवि ने चने को वर रूपं में तथा अलसी और सरसों को वराकांक्षिणी कन्याओं के रूप में चित्रित कर शादी-ब्याह का-सा वातावरण निर्मित कर दिया है और उसी के अनुरूप एक स्वयंवर की कल्पना की है।
(घ) ‘प्रकृति का अनुराग अंचल से कवि का अभिप्राय है— लहलहाते खेतों के बीच प्रेम और आनन्द की उल्लासमयता । कवि को लगता है कि चना दूल्हा है, सरसों दुल्हन है और अलसी प्रेमातुर अल्हड़ नायिका है। तीनों में प्रेम और विवाह की कल्पना लहर मार रही है। तीनों आनन्दमग्न हैं। इसी कारण कवि ने प्रकृति के विस्तार को प्रेम का आँचल कहा है।
(ङ) गाँव की भूमि को ‘प्रेम की प्रिय भूमि’ कहा गया है; क्योंकि वहाँ चारों ओर श्रृंगार किए हुए प्रकृति प्रेम करने के लिए खड़ी है।
(च) भाव – सौन्दर्य – कवि ने प्रकृति का अत्यन्त भावनामय, सुन्दर, प्रेमभरा, नेत्राभिराम चित्रण किया है।
(छ) शिल्प-सौन्दर्य-
● ‘अनुराग – अंचल’ में रूपक अलंकार है।
● ‘हो रहा है’, ‘अनुराग अंचल हिल रहा है’, ‘प्रेम की प्रिय भूमि’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘र’, ‘ह’, ‘अ’ और ‘प’ वर्णों की आवृत्ति ।
● गाँव और व्यापारिक नगर की तुलना सार्थक और मनोरम है।
● प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। मानवीकरण अलंकार ।
5. और पैरों ………………. कब बुझेगी !
शब्दार्थ – पोखर = तालाब । तले = नीचे। चकमकांता = चौंधियाता, चमक छोड़ता ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) ‘चाँदी का बड़ा-सा गोल खंभा’ किसे कहा गया है?
(घ) आँख को कौन, कैसे चकमकाता है?
(ङ) सरोवर के पत्थर क्या कर रहे हैं?
(च) सरोवर के पत्थरों का सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(छ) ‘नील तल’ से क्या अभिप्राय है?
(ज) पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(झ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि-केदारनाथ अग्रवाल | कविता – चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – कवि कहता है— मैं जिस स्थान पर बैठा हूँ वहाँ पर मेरे पैरों के ठीक नीचे की ओर एक छोटा-सा कच्चा तालाब है। वायु के झोंकों से उसमें लहरें उठ रही हैं। तालाब की तलहटी में अपनी स्वच्छता के कारण जल नीला दिख रहा है। उस जल की स्वच्छता के कारण तालाब की तलहटी में जो भूरे रंग की घास उगी हुई है, वह भी स्पष्ट दिख रही है। वह घास जल में उठनेवाली लहरों के कारण उनके साथ-साथ लहरा रही है।
पोखर के जल पर सूर्य की चमकती किरणें अद्भुत संसार रच रही हैं। सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में पड़ रहा है । वह प्रतिबिम्ब आकार में लम्बा और रंग में सफेद होने के कारण ऐसा लगता है, मानो चाँदी का एक बड़ा-सा गोल खम्भा तालाब के बीचोबीच खड़ा हो। पानी में वह इतना चमक रहा है कि उसकी ओर देखने से आँखें चुँधियाँ जाती हैं। उस पोखर के किनारे कई पत्थर पड़े हैं। वायु के स्पर्श से पोखर के जल में लहरें उठ रही हैं, जिस कारण किनारे का पानी उन पत्थरों पर पड़ रहा है। पत्थरों को इस प्रकार जल का स्पर्श करता देख ऐसा प्रतीत होता है, मानो ये पत्थर प्यासे हों और पोखर का पानी पीने आए हों। पत्थरों द्वारा पोखर का पानी न जाने कब से पिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि निरन्तरं पानी पीते रहने पर भी इनकी प्यास बुझ नहीं रही है। न जाने कब तक ये पत्थर इसी प्रकार पानी पीते रहेंगे।
(ग) सरोवर के जल में पड़ रहे सूर्य के गोल प्रतिबिम्ब को ‘चाँदी का बड़ा-सा गोल खम्भा’ कहा गया है। जल की स्वच्छता और पारदर्शिता के कारण सूर्य का प्रतिबिम्ब जल की ऊपरी सतह से लेकर नीचे तल तक दिख रहा है इसीलिए कवि ने इस लम्बवत् प्रतिबिम्ब को खम्भा कहा है।
(घ) सूर्य-किरणें जब स्वच्छ जल पर पड़ती हैं तो वे प्रतिबिम्बित होकर सीधे आँखों को प्रभावित करती हैं। उन किरणों की तीव्र चमक आँखों को चौंधिया देती है।
(ङ) सरोवर के पत्थर सरोवर के किनारे चुपचाप पड़े हैं, ऐसा लगता है मानो वे चुपचाप पानी पी रहे हैं।
(च) सरोवर के किनारे अनेक पत्थर पड़े हुए हैं। उन्हें देखकर यह कल्पना उठती है कि शायद वे सरोवर का जल पीने आए होंगे। वे बड़े समय से उसी स्थान पर वैसी ही दशा में पड़े हैं। मानो उनकी प्यास बुझती ही नहीं और वे निरन्तर पानी पिए जा रहे हैं।
(छ) ‘नील तल’ से अभिप्राय है- सरोवर से झाँकता नीले रंग का तल।
(ज) भाव – सौन्दर्य – सरोवर में उठनेवाली जल की लहरों और सूर्य के प्रतिबिम्ब का अत्यन्त सुन्दर, स्वाभाविक एवं आकर्षक चित्रण हुआ है। यह दृश्य कवि की मनोरम कल्पना की जीवन्त अभिव्यक्ति है।
(झ) शिल्प – सौन्दर्य-
● प्रकृति का अत्यन्त रमणीय मानवीकरण किया गया है। ‘पत्थरों का चुपचाप पानी पीना’ में मानवीकरण अलंकार है।
● सरोवर के जल में सूर्य के गहरे प्रतिबिम्ब के लिए ‘एक चाँदी का बड़ा-सा गोल खम्भा’ सुन्दर उपमा है। उपमा अलंकार है।
● तालाब में उठनेवाली लहरें और जल के भीतर हिलनेवाली घास की गतिशीलता दृश्य बिम्ब उपस्थित करती है। चित्रात्मक प्रस्तुति ।
● अनुप्रासात्मकता दर्शनीय है— नील तल, रही वह भी लहरियाँ, को है चकमकाता, पत्थर किनारे पी रहे चुपचाप पानी, प्यास ।
● प्रश्नालंकार – ‘प्यास जाने कब बुझेगी’ में।
6. चुप खड़ा ……………… गगन में!
शब्दार्थ – मीन = मछली। चंचल = नटखट, फुर्तीली। ध्यान-निद्रा = ध्यानरूपी नींद । चट = शीघ्र, तुरन्त । श्वेत = उज्ज्वल, सफेद । माथ = मस्तक । झपाटे = झपट्टे । जल के हृदय पर = पानी की सतह पर । उजली = चमकदार। चटुल = चतुर, चंचल, फुर्तीली । गगन = आकाश ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) बगुला क्या देखकर ध्यान-निद्रा त्याग देता है?
(घ) ‘ध्यान- निद्रा’ में निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए ।
(ङ) बगुले की दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए ।
(च) काले माथेवाली चिड़िया की चतुराई का वर्णन कीजिए ।
(छ) ‘टूट पड़ना’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ज) ‘ गले के नीचे डालने’ से क्या अभिप्राय है?
(झ) ‘चटुल’ विशेषण का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
(ञ) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ट) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि – केदारनाथ अग्रवाल । कविता — चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – कवि कहता है- पोखर के किनारे के जल में एक टाँग से खड़ा बगुला ऐसा लगता है, मानो वह ध्यानरूपी निद्रा में लीन हो । परन्तु ज्यों ही वह जल में किसी मछली को अपने समीप से फुर्ती से तैरकर जाते देखता है, त्यों ही वह अपनी ध्यानरूपी निद्रा छोड़कर, तेजी से उसे अपनी चोंच में दबाकर निकाल लेता है और पलभर में ही उसे अपने गले के नीचे भी उतार लेता है।
तालाब के किनारे बैठा कवि इसी समय यह भी देखता है कि पोखर के जल के ऊपर एक चिड़िया उड़ रही है। उसका माथा का रंग का और पंख सफेद हैं। यह चिड़िया मछलियों का शिकार करने में बड़ी चतुर है। जब इस आकाश में उड़ती चिड़िया को जल के अन्दर तैरती कोई मछली दिख जाती है, तब यह बड़ी फुर्ती से, अपने सफेद पंखों की सहायता से तालाब के जल पर तेज झपट्टे मारकर जल के अन्दर अपनी चोंच घुसाकर उसे तुरन्त पकड़ लेती है। फिर यह अपनी पीली चोंच में उस मछली को दबाकर दूर आकाश में उड़ जाती है।
(ग) बगुला सरोवर में तैरती मछली को देखकर अपनी ध्यान – निद्रा त्याग देता है।
(घ) ‘ध्यान-निद्रा’ निहित व्यंग्य है— आँखें बन्द-सी किए हुए या अपने को ध्यान में मग्न हुआ दर्शाते हुए भी शिकार के लिए सतर्क रहना। सादगी, सज्जन और भोलेपन का कपटपूर्ण प्रदर्शन करनेवाले के लिए व्यंग्यस्वरूप यह व्यंग्य किया जाता है।
(ङ) सरोवर के जल में एक बगुला चुपचाप खड़ा है। उसकी टाँगे जल में डूबी हुई हैं। देखने में वह भगवान् के ध्यान में मग्न किसी ज्ञानी – ध्यानी-सा लगता है, परन्तु जैसे ही उसे अपने समीप से कोई नटखट मछली तैरकर जाती दिखाई देती है, वह तुरन्त अपना ध्यान भंग करके अपनी तीखी लम्बी चोंच से उसे पकड़ लेता है और पलभर में ही उसे निगल जाता है।
(च) काले माथेवाली चिड़िया बड़ी चतुर व फुर्तीली है। वह ऊँचे आकाश में उड़ती हुई भी पोखर में तैरती मछली को देख लेती है। तब वह पोखर के जल पर अचानक झपट्टे मारती है और फिर उस मछली को अपनी पीली चोंच में दबाकर आकाश में उड़ जाती है।
(छ) ‘टूट पड़ना’ से आशय है— तेजी से पूरी ताकत से शिकार पर झपट पड़ना।
(ज) ‘गले के नीचे डालने’ से अभिप्राय है— निगल जाना।
(झ) ‘चटुल’ का अर्थ है – बहुत चुस्त, फुर्तीली, चतुर ।
(ञ) भाव – सौन्दर्य – कवि द्वारा वर्णित प्रकृति के दृश्यों में शिकार के ये गतिशील दृश्य अत्यन्त स्वाभाविक, सहज तथा सजीव हैं। इनको पढ़कर पाठक के सामने दृश्य चित्रलिखित सा स्पष्ट हो जाता है।
(ट) शिल्प-सौन्दर्य-
● भाषा में चित्रात्मकता है।
● अनुप्रास अलंकार — ध्यान-निद्रा, चतुर चिड़िया, मार फौरन, उजली चटुल मछली ।
● छन्दमुक्तता के बावजूद कविता में लय देखते ही बनती है।
● चुप, चट, झपाटे, फौरन, चटुल आदि शब्द कविता को शक्ति प्रदान करते हैं।
● शैली में संक्षिप्तता है, फिर भी प्रवाहयुक्त है। आकर्षक अभिव्यक्ति ।
7. औ’ यहीं से ………………… जाना नहीं है।
शब्दार्थ — औ’ = और। स्वच्छन्द = मुक्त, आजाद, निश्चिन्त, मनमौजी।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) कवि क्यों स्वच्छन्द है?
(घ) रेल की पटरी की आस-पास की भूमि कैसी है?
(ङ) पद्यांश का भाव- सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(च) पद्यांश का शिल्प सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि – केदारनाथ अग्रवाल | कविता – चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – कवि कहता है कि वह जहाँ पर बैठा है वहाँ से सामने के स्थान की भूमि का धरातल कुछ ऊँचा है। उस पर रेल की पटरी बिछी हुई है। कवि को ज्ञात है कि इस समय कोई गाड़ी इधर से नहीं गुजरती, इसलिए उसे वहाँ से जाने की कोई जल्दी भी नहीं है। इस प्रकार वह निश्चिन्त और स्वच्छन्द है। जब प्रकृति के दृश्यों को निहारकर उसका मन भर जाएगा, वह चला जाएगा। उसे किसी कार्य की विवशता नहीं है।
(ग) कवि इसलिए स्वच्छन्द है; क्योंकि उसे किसी कार्य की विवशता नहीं है और न ही इस समय कोई ट्रेन आनी है, जिससे उसे जाना हो। इस प्रकार वह बिल्कुल निश्चिन्त और फुर्सत में है। इसी निश्चिन्तता और फुर्सत को कवि ने स्वच्छन्द कहा है।
(घ) रेल की पटरी के आस-पास की भूमि सामान्य धरती से कुछ ऊँची है।
(ङ) भाव – सौन्दर्य – कवि की अभिव्यक्ति में अत्यधिक सहजता और प्रवाह है, जो पाठक पर प्रभाव छोड़ने में सक्षम है।
(च) शिल्प-सौन्दर्य-
● अभिव्यक्ति में गति एवं प्रवाह द्रष्टव्य है।
● छन्दमुक्त रचना होते हुए भी इसकी गतिशीलता आकर्षित करती है।
● ‘मैं’ के प्रयोग से पाठक कवि के साथ सामीप्य का अनुभव करता है।
● भाषा में मिले-जुले शब्दों का प्रयोग हुआ है— रेल, ट्रेन, टाइम (अंग्रेजी); भूमि, स्वच्छन्द (संस्कृत); तथा देशभाषा के शब्द |
8. चित्रकूट की ………………… खड़े हैं।
शब्दार्थ – अनगढ़ = टेढ़ी-मेढ़ी | बाँझ भूमि = बंजर या अनुपजाऊ भूमि । रींवा = बबूल की तरह का एक काँटेदार वृक्ष, इसे ‘रेवजा’ भी कहते हैं। कुरूप = बदसूरत।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) चित्रकूट की भूमि को बाँझ क्यों कहा गया है?
(घ) चित्रकूट की पहाड़ियों का वर्णन कीजिए।
(ङ) ‘अनगढ़’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(च) रींवा के पेड़ों के लिए कौन-कौन-से विशेषण प्रयुक्त हुए हैं?
(छ) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ज) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि – केदारनाथ अग्रवाल । कविता – चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – चन्द्र गहना से लौटता कवि प्राकृतिक दृश्य निहारता एक खेत की मेड़ पर बैठा है। वह कहता है- मेरी आँखों के सामने चित्रकूट की बेडौल, टेढ़ी-मेढ़ी, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियाँ बहुत दूर-दूर तक फैली हुई हैं। ये कहीं ऊँची तो कहीं नीची हैं। यहाँ की भूमि अनुपजाऊ है, उपज नहीं देती। यहाँ किसी भी प्रकार की घास, हरियाली, छायादार पेड़ नहीं हैं। नाममात्र के लिए कहीं-कहीं रींवा के बदसूरत काँटेदार पेड़ खड़े दिख जाते हैं। ये वृक्ष न तो देखने में मन को आनन्दित करते हैं और न ही इनमें हरियाली है, न ही इनकी डालियाँ ताप मिटाने योग्य छाया ही देती हैं।
(ग) चित्रकूट की भूमि को बाँझ इसलिए कहा गया है; क्योंकि उस पर झाड़-झंखाड़ के अतिरिक्त कोई फसल नहीं उगती है। इसलिए उस पर रीवा के बदसूरत काँटेदार पेड़ ही खड़े हैं।
(घ) चित्रकूट की पहाड़ियाँ ऊँची-नीची हैं; परन्तु वे न तो बहुत ऊँची हैं, न बहुत नीची। हाँ; वे ऊबड़-खाबड़ अर्थात् असमतल अवश्य हैं। दूर-दूर तक फैली उन पहाड़ियों पर काँटेदार कुरूप रींवा-वृक्ष ही खड़े हैं।
(ङ) ‘अनगढ़’ से आशय है— बेडौल, असमतल, ऊबड़-खाबड़ ।
(च) रींवा के पेड़ों के लिए दो विशेषणों का प्रयोग हुआ है— काँटेदार और कुरूप ।
(छ) भाव – सौन्दर्य – प्रकृति के अनगढ़ रूप का भी स्वाभाविक और अत्यन्त सहज वर्णन किया गया है। चित्रकूट की पहाड़ियों का यथार्थ चित्रण हुआ है।
(ज) शिल्प-सौन्दर्य-
● चित्रात्मक वर्णन हुआ है।
● ‘ऊँची-ऊँची’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
● दूर दिशाओं, काँटेदार कुरूप में अनुप्रास अलंकार है ।
● अभिव्यक्ति में सहजता, प्रवाह एवं संगीतमयता है।
9. सुन पड़ता है ………………… चुप्पे-चप्पे ।
शब्दार्थ — सुग्गा = तोता । वनस्थलीँ = जंगल । हृदय चीरता = दूर-दूर तक गूँजता, सुनाई देता ।
प्रश्न :
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) सुग्गे का स्वर कैसा है?
(घ) सारस का स्वर कैसा है?
(ङ) वनस्थली में गूँजती ध्वनियों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
(च) पक्षियों के कर्णप्रिय स्वरों से कवि के मन में क्या विचार आता है?
(छ) ‘वनस्थली का हृदय चीरता’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ज) सारसों के स्वर में कवि को सच्ची प्रेम-कहानी क्यों प्रतीत होती है?
(झ) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ञ) पद्यांश का शिल्प सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि – केदारनाथ अग्रवाल । कविता— चंद्र गहना से लौटती बेर ।
(ख) आशय – कवि खेत की मेड़ पर बैठा प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारते हुए कहता है— जंगल में स्थित पोखर के किनारे से तोते की टें टें टें टें की बार-बार आती हुई स्वरलहरी सुनाई दे रही है। तोते का यह स्वर मेरे मन को बहुत प्यारा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि तोते के इस स्वर से मिठास टपक रही है। इसके मीठे स्वर को सुनकर मेरा मन भी इसके साथ गाने को करता है। दूसरी ओर से, कहीं दूर से सारस के जोड़े की टिरटों-टिरटों की उठती – गिरती अर्थात् कभी तेज और कभी धीमी होती ध्वनि सुनाई दे रही है। सारस के जोड़े की यह ध्वनि सारे जंगल को चीरती हुई दूर-दूर तक फैल रही है। इसकी अनुगूँज को सुनकर कवि का मन सरस और प्रेम-विभोर हो उठता है। उसका मन भी कहने लगता है कि वह उड़कर वहीं चला जाए, जहाँ प्रेम-विभोर सारसों का जोड़ा चुपचाप परस्पर प्रेमालाप कर रहा है। वह. वहीं पर कहीं आस-पास छिपकर बैठ जाना चाहता है, जिससे वह चुपचाप उस सारस- युगल का सच्चा प्रेमालाप सुन ले।
(ग) सुग्गे का स्वर मीठा है। वह टें टें टें टें करता मानो रस बरसाता है।
(घ) सारस का स्वर कभी धीमा और कभी तेज हो जाता है। वह टिरटों-टिरटों करके आकाश गुँजाते हैं।
(ङ) वनस्थली में कहीं तोते का टें टें टें टें का स्वर सुनाई पड़ता है तो कहीं सारस का टिरटों-टिरटों स्वर सुनाई पड़ता है। तोते के स्वर में जहाँ एक लयात्मक मधुरता है, वहीं सारस के स्वर में उतार-चढ़ाव है। सारस का स्वर बड़ा तीखा कानों को बेधता हुआ-सा लगता है।
(च) पक्षियों के कर्णप्रिय स्वरों को सुनकर कवि के मन में विचार आता है कि वह भी इन्हीं के संग आकाश में उड़ जाए और इनका प्रेमभरा संसार देखे। वह इनके प्रेमभरे संसार को देखकर अपने को आनन्दित करना चाहता है।
(छ) ‘वनस्थली का हृदय चीरता से आशय है— पूरे वनप्रान्त को ध्वनि से गुँजाता हुआ।
(ज) सारसों के स्वर में कवि को सच्ची प्रेम-कहानी सुनाई देती है; क्योंकि कवि की दृष्टि में पंछी प्रकृति के निकट सम्पर्क में रहते हैं। उनमें नगरीय व्यापारिक सभ्यता के स्वार्थ आदि दोष नहीं होते; अतः उनका गीत-संगीत हृदय की स्वच्छ, निर्मल प्रीति का परिचय देता है। इसके अतिरिक्त सारस पक्षी सदैव नर-मादा के जोड़े में ही रहता है। जोड़े में से एक की मृत्यु होने पर दूसरा भी बहुत समय जीवित नहीं रहता, वरन् अपने प्राण त्याग देता है। उनकी यह एकनिष्ठता सच्चे प्रेम का श्रेष्ठ उदाहरण है। कवि उनकी इसी एकनिष्ठता और सच्चे प्रेम को निकट से देखना चाहता है।
(झ) भाव- सौन्दर्य – वनस्थली के प्राकृतिक सौन्दर्य का गतिशील, ध्वनिमय, स्वाभाविक, यथार्थपरक एवं मनमोहक चित्रण हुआ है। वर्णन पढ़कर पाठक में भी कवि के समान ही प्रकृति का सान्निध्य पाने की इच्छा जाग्रत होती है। सारस के जोड़े के माध्यम से सच्चे प्रेम का महत्त्व दर्शाया गया है।
(ञ) शिल्प – सौन्दर्य-
● अभिव्यक्ति में चित्रात्मकता है।
● टें टें टें टें और टिरटों-टिरटों में श्रव्य बिम्ब है। ये स्वर पाठक के कानों में मधुरता घोलते हैं और वातावरण को जीवन्त कर देते हैं।
● भाषा में मधुरता है— सुग्गे, चुप्पे-चुप्पे प्रयोग प्रभावशाली हैं।
● वाक्य-रचना सरल, प्रवाहपूर्ण एवं लयात्मक है।
● अनुप्रास अलंकार – उठता-गिरता, सारस के संग, जहाँ जुगुल जोड़ी रहती है आदि में।
● पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार-मीठा-मीठा, चुप्पे-चुप्पे ।
● ‘हृदय चीरना’ मुहावरे का सशक्त प्रयोग हुआ है।
● कवि का प्रकृति प्रेम बड़े स्वाभाविक रूप में अभिव्यक्त हुआ है।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – ‘ इस विजन में ……… अधिक है’ –पंक्तियों में नगरीय संस्कृति के प्रति कवि का क्या आक्रोश है और क्यों ?
उत्तर- उपर्युक्त पंक्तियों में कवि का आक्रोश नगरीय संस्कृति की व्यावसायिक वृत्ति पर है। कवि के अनुसार नगरीय सभ्यता में धन और व्यापारिकता को प्रेम की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया जाता है। नगर के लोग प्रेम और सौन्दर्य की कोमल, निर्मल, स्वच्छ भावनाओं. और प्रकृति से दूर हो चुके हैं। इस प्रकार भावनात्मकता से दूरी को कवि मानवों का दुर्भाग्य ही मानता है।
प्रश्न 2 – सरसों को ‘सयानी’ कहकर कवि क्या कहना चाहता होगा?
उत्तर – सरसों को सयानी कहकर कवि कहना चाहता होगा कि अब सरसों की फसल अपने पूर्ण यौवन पर है। वह अपनी वृद्धि को पूरी तरह प्राप्त कर चुकी और उसका सौन्दर्य किसी युवती की भाँति अपनी चरमसीमा पर है। फिर सरसों की फसल चने और अलसी की तुलना में बहुत बड़ी होती है। उसको सयानी कहकर वह उसके इसी बड़प्पन को भी बताना चाहता है। जिस प्रकार शारीरिक वृद्धि की पूर्णता को प्राप्त करने पर कन्या को विवाह योग्य (सयानी) मान लिया जाता.. है, उसी प्रकार पूर्ण वृद्धि प्राप्त कर चुकी सरसों भी अपने वर- चयन को तैयार है।
प्रश्न 3 – अलसी के मनोभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर – अलसी एक अल्हड़ नायिका है। उसकी कमर पतली, लचीली है। वह स्वभाव से हठीली भी है। उसने अपने शीश पर नीले रंग के फूल का शृंगार किया हुआ है। इस प्रकार सज-धजकर वह मानो सबको प्रेम का खुला निमन्त्रण दे रही है कि जो भी मुझे सबसे पहले छुएगा, मैं उसे अपना हृदय समर्पित कर दूँगी ।
प्रश्न 4 – अलसी के लिए ‘हठीली’ विशेषण का प्रयोग क्यों किया गया है?
उत्तर- अलसी को हठीली. कहने के दो कारण हैं-
1. वह चने के बड़े पौधों के बीच में भी शान से खड़ी है, उस पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है; अतः उसका यह स्वभाव उसे हठीली कहने के लिए पर्याप्त है।
2. उसकी देह पतली और कमजोर सी है, परन्तु हवा के झोंकों के साथ झूमकर – झुककर वह फिर से सीधी खड़ी हो जाती है। इस प्रकार वह हठीली है।
प्रश्न 5 – ‘चाँदी का बड़ा-सा गोल खंभा’ में कवि की किस सूक्ष्म कल्पना का आभास मिलता है?
उत्तर — सरोवर के स्वच्छ निर्मल जल में सूर्य की चमकती किरणें सीधी पड़ती हैं। सूर्य का गोल प्रतिबिम्ब जल के नीचे तक स्पष्ट दिखाई देता है, तब ऐसा लगता है जैसे कि जल में एक चाँदी का बड़ा-सा गोल खम्भा खड़ा है। कवि की यह कल्पना अत्यन्त सूक्ष्म और मनोरम है।
प्रश्न 6 – कविता के आधार पर ‘हरे चने’ का सौंदर्य अपने शब्दों में चित्रित कीजिए ।
उत्तर— हरा चना आकार में ठिगना हैं। आज वह दूल्हे के रूप में सजकर गड़ा है। उसने अपने सिर पर गुलाबी फूल धारण कर रखा है, मानो किसी वर ने गुलाबी पगड़ी (मुरैठा) बाँध रखी हो। वह बड़ा सुन्दर और आकर्षक लग रहा है।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1—’चन्द्र गहना से लौटती बेर’ कविता का प्रतिपाद्य क्या है ?
उत्तर- ‘चन्द्र गहना से लौटती बेर’
कविता का प्रतिपाद्य
इस कविता में कवि ने कहना चाहा है कि आज नगरीय जीवन की सभ्यता और संस्कृति में मनुष्य की सहजता और स्वाभाविकता नष्ट होती जा रही है। नगर के व्यस्त जीवन में वास्तविक आनन्द और सुख सम्भव नहीं है। वह सुख तो प्रकृति की गोद में बैठकर प्राकृतिक उपादानों के बीच प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य प्रकृति के जितना समीप रहता है, उसमें मानवीय भावनाएँ भी उतनी ही प्राकृतिक रहती हैं; अतः मनुष्य को मानसिक विश्राम के साथ – साथ आत्मीयता, प्रेम, अनुराग, प्रणय आदि की रक्षा के लिए गाँवों की ओर लौटना पड़ेगा। प्रकृति के सम्पर्क में रहकर ही मनुष्य में सच्चा प्रेम सुरक्षित रह सकता है।
प्रश्न 2 – ” कंविता ‘चन्द्र गहना से लौटती बेर’ में यथार्थ प्रकृति का चित्रण हुआ है।” सिद्ध कीजिए ।
अथवा “इस कविता में प्रकृति के सुन्दर और कुरूप दोनों पक्षों का चित्रण हुआ है । ” सिद्ध कीजिए ।
उत्तर— केदारनाथ अग्रवाल द्वारा रचित कविता ‘चन्द्र गहना से लौटती बेर’ में प्रकृति के सुन्दर और कुरूप दोनों पक्षों का चित्रण हुआ है। यह कथन पूर्णतया सत्य है।
कवि ने प्रकृति के कोमल, सुन्दर और रंगीन दृश्यों का चित्रण किया है। चने को दूल्हा, अलसी को हठीली नायिका और सरसों को विवाह मण्डप में हाथ पीले किए बैठी कन्या के समान चित्रित किया और सारसों की टिरटों-टिरटों सब मिलकर एक अत्यन्त मोहक, गया है। पोखर के जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब, सुग्गे की टें टें टें टें कोमल, रंगीन और जीवन्त वातावरण की रचना करते हैं।
कवि ने प्रकृति के कुरूप, किन्तु यथार्थ दृश्य भी कविता में पाठकों के लिए प्रस्तुत किए हैं; यथा — चित्रकूट की दूर तक फैली अनगढ़ पहाड़ियाँ, उन पर उगे काँटेदार रींवा के पेड़, बगुले और काले माथेवाली चिड़िया के अपने-अपने शिकार की प्रक्रिया आदि बड़े ही यथार्थपरक प्राकृतिक दृश्य हैं, जो निश्चय ही अपनी प्रकृति में कुरूप और असुन्दर हैं।
