UK Board 9 Class Hindi Chapter 16 – चंद्रकांत देवताले (काव्य-खण्ड)
UK Board 9 Class Hindi Chapter 16 – चंद्रकांत देवताले (काव्य-खण्ड)
UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 16 – चंद्रकांत देवताले (क्षितिज : काव्य-खण्ड)
चंद्रकांत देवताले (यमराज)
I. कवि-परिचय
प्रश्न – कवि चन्द्रकान्त देवताले का जीवन परिचय देते हुए उनकी उपलब्धियों, रचनाओं, काव्यगत विशेषताओं एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर- चन्द्रकान्त देवताले
जीवन-परिचय – चन्द्रकान्त देवताले का जन्म 7 नवम्बर, 1936 ई० को मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के अन्तर्गत गाँव जौलखेड़ा में हुआ। उनकी आरम्भिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा इन्दौर में हुई। उन्होंने स्नातकोत्तर की उपाधि सन् 1960 ई० में प्रथम श्रेणी में प्राप्त की तथा सागर के हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय से पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। जीवनयापन के लिए उन्होंने अध्यापन वृत्ति को अपनाया।
देवतालेजी को घर में साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश प्राप्त हुआ; अतः उनमें बाल्यावस्था से ही लेखन के प्रति रुचि दिखने लगी थी। हिन्दी की साठोत्तरी काव्यधारा के समर्थ कवि के रूप में उन्होंने पर्याप्त ख्याति अर्जित की।
उपलब्धियाँ—उन्हें साहित्यिक जगत् में माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1986-87 में मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान भी उन्हें प्राप्त हुआ है।
रचनाएँ – चन्द्रकान्त देवताले की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-
‘हड्डियों में छिपा ज्वर’, ‘दीवारों पर खून से’, ‘लकड़बग्घा हँस रहा है’, ‘भूखण्ड तप रहा है’, ‘पत्थर की बैंच’, ‘इतनी पत्थर रोशनी’, ‘ उजाड़ में संग्रहालय’ ।
काव्यगत विशेषताएँ – चन्द्रकान्त देवताले की कविता मूलरूप से गाँवों और कस्बों के निम्न मध्यमवर्गीय जीवन की अभिव्यक्ति है। उनकी कविताओं में आस-पास के जीवन की अत्यन्त सरल और निश्छल अनुभूतियाँ प्रकट हुई हैं। मानव-जीवन अपनी विविधता और विडम्बना के साथ यहाँ उपस्थित है। सामाजिक व्यवस्था की कुरूपता उन्हें क्रोधित करती है। समाज में जोंक की तरह खून चूसते शोषकों पर वह जमकर बरसते हैं। उनके हृदय की कटुता इन पंक्तियों में द्रष्टव्य है-
पर आज जिधर भी पैर करके सोओ
वही दक्षिण दिशा हो जाती है
सभी दिशाओं में यमराज के आलीशान महल हैं
और वे सभी में एक साथ
अपनी दहकती आँखों सहित विराजते हैं
चन्द्रकान्त की कविताओं में व्याप्त कटाक्ष और व्यंग्य उनकी शक्ति है। वे सामाजिक कुरूपताओं का चित्रण करते हैं तो मानवीय संवेदना को भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते। मानव-प्रेम के भी वे अमर गायक हैं।
भाषा-शैली- चन्द्रकान्त का भाषा अत्यन्त सरल, सहज और आडम्बरहीन है। उनकी वाक्य रचना गद्यात्मक है। वे सीधी सरल बात को सीधे सरल ढंग में ही कविता में उतारने में कुशल हैं। अपनी बात को कविता का जामा पहनाने के लिए उन्हें वाक्यों को तोड़ने-मरोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती। भाषा की पारदर्शिता उनकी कविता का प्राणतत्त्व है। सीधी-सरल शैली उनकी निजता है। किसी बात को रुक-रुककर कहना, शब्दों पर बल देकर उनके गहन अर्थ व्यंजित करना उनकी काव्य-भाषा की विशेषताएँ हैं; यथा – पैर रखना, दक्षिण दिशा होना, सोना आदि सामान्य शब्द होकर भी गहन अर्थ की प्रतीति कराते हैं। नवीन, मौलिक प्रतीक-व्यवस्था चन्द्रकान्त देवताले की शैली की अन्यतम विशेषता है।
II. अर्थग्रहण एवं सराहना सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न – निम्नलिखित पद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
1. माँ की …………. लेती है
शब्दार्थ – मुलाकात = भेंट, मिलन। जताती = विश्वासपूर्वक कहती, बताती । सलाह = राय, मत, मशविरा । बरदाश्त = सहन ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए ।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) कवि को किसका भरोसा नहीं है और क्यों?
(घ) कवि की माँ क्या जताती है?
(ङ) माँ को ईश्वर की सलाह से क्या लाभ होता था?
(च) जताने से क्या आशय है?
(छ) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ज) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि – चन्द्रकान्त देवताले । कविता – यमराज की दिशा ।
(ख) आशय – कवि कहता है- मैं यह बात निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि मेरी माँ की ईश्वर से भेंट हुई थी या नहीं, परन्तु वह स्वयं यह अवश्य कहा करती थी कि उसकी ईश्वर से बातचीत होती रहती है। वह यह जताती रहती थी कि ईश्वर से केवल उसकी भेंट ही नहीं होती है, बल्कि वह उसे तरह-तरह की सलाह भी देता रहता है। वह ईश्वर के बताए नुस्खे अपनाकर जिन्दगी जीने के नए-नए तरीके और दुःखों को सहने के रास्ते भी खोज लेती थी।
(ग) कवि को अपनी माँ की इस बात का भरोसा नहीं है कि ईश्वर उससे बात करने आता है और उसे तरह-तरह की सलाह देता है । कवि को तो ईश्वर के संकटमोचक होने पर भी शंका है कि वह इस संसार में अपने बन्दों के दुःख दूर करने आता है।
(घ) कवि की माँ उसे जताती रहती थी कि उसकी ईश्वर से बातचीत होती रहती है। वह ईश्वर उसे जिन्दगी जीने और दुःखों को सहने के मार्ग बताता है।
(ङ) माँ को ईश्वर की सलाह मानकर जिन्दगी जीना आसान लगने लगता था । दुःखों को सहन करने के जो उपाय ईश्वर बताता था, वह उन्हें अपनाकर जीना सीखती थी।
(च) जताने से आशय है—अधिकारपूर्वक विश्वास दिलाना अथवा अपने मत या मान्यता का उद्घाटन इस उद्देश्य से करना कि दूसरा व्यक्ति भी उनको माने।
(छ) भाव – सौन्दर्य- पद्यांश में कवि ने ईश्वर के प्रति अपनी माँ के दृढ़ विश्वास एवं अपने अविश्वास को बड़ी सहजता से व्यक्त कर दिया है। माँ और बेटे की आस्था और अनास्था का यह चित्रण अत्यन्त प्रभावशाली बन पड़ा है।
(ज) शिल्प-सौन्दर्य-
● कविता की भाषा गद्यात्मक है, जिसे विभिन्न स्थानों पर यति के द्वारा कविता का रूप दिया गया है।
● पद्यांश में उर्दू और संस्कृत के प्रचलित शब्दों का अद्भुत संगम है। उर्दू शब्द हैं- मुलाकात, मुश्किल, सलाह, जिन्दगी, बरदाश्त, रास्ते । संस्कृत शब्द हैं— ईश्वर, प्राप्त, दुःख । कवि की इस प्रकार की अभिव्यक्ति से पाठक और कवि के बीच संवादहीनता की सारी दीवारें टूट जाती हैं।
● अनुप्रास अलंकार – जताती थी जैसे, बातचीत होती रहती है, जिन्दगी जीने।
● ‘रास्ता खोजना’ मुहावरे का सटीक प्रयोग हुआ है।
2. माँ ने ……………. दक्षिण में
शब्दार्थ – यमराज = मृत्यु के देवता। क्रुद्ध = क्रोधित | बुद्धिमानी = अक्लमन्दी, समझदारी, होशियारी ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) माँ ने पुत्र को क्या चेतावनी दी थी और क्यों?
(घ) यमराज को क्रुद्ध करने से क्या आशय है?
(ङ) यमराज का घर दक्षिण दिशा में होने से क्या आशय है?
(च) कवि की दृष्टि में दक्षिण दिशा और मृत्यु का क्या सम्बन्ध हो सकता है?
(छ) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ज) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि – चन्द्रकान्त देवताले । कविता — यमराज की दिशा ।
(ख) आशय – कवि कहता है कि उसकी माँ ने एक बार उसे चेतावनी देते हुए कहा था- बेटा ! कुछ भी हो, कभी दक्षिण दिशा की ओर पैर करके मत सोना। यह दिशा मृत्यु की दिशा है। यमराज अपनी ओर पैर करके सोनेवाले को छोड़ते नहीं। इस अनादर से उन्हें क्रोध आ जाता है; अतः दक्षिण की ओर पैर करके मत सोना । यमराज को क्रोधित करने में कोई समझदारी नहीं है।
उन दिनों कवि छोटा था, नासमझ था। उसने माँ से यमराज के घर का पता पूछा। माँ ने बताया- तुम जहाँ भी रहोगे, वहाँ से जो दक्षिण दिशा होगी, वही यमराज का घर होगा।
इस पद्यांश का गूढ़ार्थ यह है कि दक्षिण-दिशा के कुप्रभाव सम्बन्धी भय की विचारधारा मृत्युं की ओर ले जाती है। इसके प्रवर्त्तक यमराज के समान क्रूर हैं; अतः जो भी व्यक्ति इस विचारधारा की ओर अपने पैर फैलाएगा और निश्चिन्त हो जाएगा, उसकी मृत्यु निश्चित है। न
(ग) माँ ने अपने पुत्र को दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोने की चेतावनी दी। उसका मानना था कि ऐसा करने से यमराज क्रोधित हो सकते हैं और तब मनुष्य की मृत्यु निश्चित है।
(घ) यमराज को क्रुद्ध करने से आशय है— अपनी मृत्यु का कारण स्वयं बनना, विनाश को निमन्त्रण देना।
(ङ) यमराज का घर दक्षिण दिशा में होने से आशय है— दक्षिण दिशा के कुप्रभाव सम्बन्धी भय की विचारधारा अपनाने से मनुष्यता का हनन होता है। मानव सर्वनाश की ओर बढ़ता जाता है। उसकी मौत के दरवाजे खुलते हैं।
(च) कवि की दृष्टि में दक्षिण दिशा और मृत्यु का सम्बन्ध अप्रत्यक्ष अवश्य है। मनुष्य अपनी विचारधारा का परिणाम जीवन में भोगता है। दक्षिण में निवास करनेवाला यमराज मृत्यु का देवता है; अतः दक्षिण दिशा के कुप्रभाव सम्बन्धी भय की विचारधारा कवि की दृष्टि में मनुष्य की शत्रु है। वह उसको विनाश की ओर ले जाती है।
(छ) भाव – सौन्दर्य – गूढ़ व्यंजना से युक्त प्रतीकार्थ को अत्यन्त सरलता से व्यक्त किया गया है। ‘दक्षिण’ शब्द का कवि ने एक नया मौलिक अर्थ ढूँढा है। दक्षिण दिशा के कुप्रभाव सम्बन्धी विचारधारा के दुष्परिणामों की ओर संकेत करते हुए कवि ने इनसे सचेत रहने की चेतावनी दी है।
(ज) शिल्प – सौन्दर्य-
● संवाद – शैली के प्रयोग से पाठक और कवि के मध्य आत्मीयता स्थापित हो गई है।
● माँ और पुत्र के बीच संवाद दिखाकर कवि ने अपने कथन में विश्वसनीयता लाने में सफलता पाई है।
● गद्यात्मक भाषा में कविता की सरलता और सहजता है।
● अनुप्रासात्मकता—‘को क्रुद्ध करना, बुद्धिमानी की बात नहीं तब के घर का पता पूछा’ में।
3. माँ की ……………. घर देख लेता
शब्दार्थ – समझाइश = समझाने की कोशिश। सामना करना = टकराहट होना, मुकाबला करना । छोर = किनारा, अन्तिम सिरा ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) कवि दक्षिण में पैर करके क्यों नहीं सोया?
(घ) माँ की बात मानने से कवि को क्या लाभ मिला?
(ङ) दक्षिण को लाँघना क्यों सम्भव नहीं है?
(च) कवि यमराज का घर क्यों नहीं देख पाया?
(छ) दक्षिण दिशा का छोर न होने का प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए ।
(ज) कवि को माँ की याद कब आई और क्यों?
(झ) पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ञ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि—चन्द्रकान्त देवताले । कविता – यमराज की दिशा ।
(ख) आशय—कवि कहता है— माँ के बार-बार समझाने के बाद उसकी बात मानकर मैं दक्षिण दिशा पैर करके कंभी नहीं सोया। इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि मुझे दक्षिण दिशा को पहचानने में कभी भ्रम नहीं हुआ। मैं दक्षिण दिशा में दूर-दूर तक घूमने गया। वहाँ मुझे जो कुछ दिखाई दिया, उससे मुझे माँ की बात और माँ बराबर याद आती रही। मैं दक्षिण दिशा को कभी लाँघ नहीं सका; क्योंकि मुझे उसका कभी कोई किनारा ही नहीं दिखा, कोई छोर ही नहीं मिला। उसका वास्तव में कोई अन्त था ही नहीं। यदि दक्षिण दिशा के छोर तक पहुँच पाना सम्भव होता तो मैं यमराज का घर अवश्य देखकर आता ।
कवि कहना चाहता है कि माँ के समझाने का उस पर यह प्रभाव हुआ कि वह कभी दक्षिण दिशा के कुप्रभाव सम्बन्धी भय की विचारधारा की ओर नहीं बढ़ा। अर्थात् उसे कभी मृत्यु भय ने नहीं घेरा। इससे उसे यह लाभ हुआ कि उसे इस विचारधारा की अच्छी पहचान भी हो गई । इसीलिए वह जीवन में कभी कठिनाई में नहीं फँसा । जब कभी ऐसा अवसर आया कि उसे दक्षिण दिशा के कुप्रभाव सम्बन्धी भय की विचारधारा ने घेरा, तब-तब माँ के उपदेशों ने उसकी रक्षा की; क्योंकि माँ ने दक्षिण दिशा के माध्यम से उसे भय और खतरों की पहचान करना सिखा दिया था, इस कारण वह भय अथवा खतरे को पहले से ही पहचानकर उससे सावधान हो जाता था, जिससे उसे जीवन में कभी कोई कष्ट न हुआ। इसीलिए खतरों अथवा भय का सामना करते समय उसे माँ की सीख याद आई कि वह क्यों दक्षिण में पैर करके सोने को मना करती थी । कवि आज तक इस दक्षिण दिशा ( भय – खतरों) के असली रूप को नहीं जान पाया है। इसके रूप अनन्त हैं और इसका कोई छोर नहीं है।
(ग) कवि दक्षिण दिशा में पैर करके इसलिए नहीं सोया; क्योंकि उसकी माँ ने उसे बताया था कि ऐसा करने से यमराज क्रुद्ध होते हैं। यमराज के क्रोधित होने से मृत्यु का संकट छा जाता है।
(घ) माँ की बात मानने से कवि को यह लाभ हुआ कि उसे दक्षिण दिशा की अच्छी पहचान हो गई अर्थात् दक्षिण दिशा के खतरों के विषय में अच्छी जानकारी प्राप्त हो गई।
(ङ) कवि के अनुसार दक्षिण को लाँघना सम्भव इसलिए नहीं है; क्योंकि जीवन में भय अथवा खतरों का कोई छोर, कोई अन्त, कोई किनारा नहीं है।
(च) कवि यमराज का घर इसलिए नहीं देख पाया; क्योंकि यमराज का घर दक्षिण दिशा के अन्त में कहीं था और कवि के लिए वहाँ तक जाना सम्भव नहीं था।
(छ) दक्षिण दिशा का छोर न होने का प्रतीकार्थ है- भय अथवा आतंक के खतरों और दुष्परिणामों का कोई अन्त नहीं अर्थात् वे किसी भी सीमा तक विनाशकारी सिद्ध हो सकते हैं।
(ज) जब कवि दक्षिण दिशा ( भय अथवा आतंक) को पहचानने के लिए, उसके खतरों का परिचय पाने के लिए दूर-दूर तक गया तो उसने देखा कि वहाँ सचमुच विनाश के सारे कारण मौजूद थे। षड्यन्त्रों का कोई अन्त ही नहीं था। तब उसे माँ की बहुत याद आई।. उसे माँ की वह सीख याद आई, जिसमें वह कहा करती थी कि दक्षिण दिशा में पैर करके कभी मत सोओ। उसे लगा कि माँ वास्तव में कितनी दूरदर्शी थी, समझदार थी कि उसने उसे बाल्यावस्था में ही इन खतरों के प्रति सावधान कर दिया था कि दक्षिण दिशा अर्थात् भय अथवा आतंक से बचकर ही रहना। वहाँ भूल से भी अपना कदम मत रखना।
(झ) भाव – सौन्दर्य – कवि ने अत्यन्त सरलता और सुबोधता के साथ दक्षिण दिशा माध्यम से खतरों की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित किया है। सामान्य पाठक दक्षिण दिशा का अभिधात्मक अर्थ ही लेता है, जबकि सहृदय संवेदनशील पाठक दक्षिण दिशा का संकेतार्थ ग्रहण करता है। कवि भावाभिव्यक्ति में सफल रहा है।
(ञ) शिल्प – सौन्दर्य-
● भाषा अत्यन्त सीधी, सरल, सपाट फिर अभिव्यक्ति समर्थ है। संकेतार्थ और प्रतीकार्थ कथ्य में. गुरुता ला रहे हैं।
● समासोक्ति शैली का कवि ने प्रयोग किया है। एक से अधिक कार्य साथ-साथ चल रहे हैं। प्रतीकार्थ गूढ़ होते हुए भी सामान्य और मुख्य अर्थ को बाधित नहीं करता ।
● गद्यं जैसी सरल अभिव्यक्ति है। यह वास्तव में ‘विचार – कविता’ का रूप है, जिसमें अभिव्यक्ति के स्वरूप की अपेक्षा विचार की तारतम्यता और उसका अन्त तक निर्वाह अधिक महत्त्वपूर्ण रहता है।
● शब्दों की तुक के स्थान पर अर्थ की लय का निर्वाह हुआ है। यह तत्कालीन कविता की एक मूलप्रवृत्ति रही है।
● ‘फरमाइश’ की तर्ज पर ‘समझाइश’ शब्द गढ़ा गया है। इसका सौन्दर्य भी देखते ही बनता है। ‘माँ की प्यार भरी समझाने की कोशिश’ के अर्थ में इसका अद्भुत प्रयोग हुआ है।
● ‘यमराज का घर देखना एक रहस्यमयी कल्पना है।
● ‘दूर-दूर’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
● ‘दक्षिण दिशा’ में श्लेष अलंकार है। इसके दो अर्थ हैं— दक्षिण दिशा तथा भय अथवा आतंक |
● अनुप्रासात्मकता द्रष्टव्य है— दक्षिण दिशा, इससे इतना, कभी मुश्किल का, मुझे हमेशा माँ, लाँघ लेना, पहुँच पाना ।
4. पर आज ………………. जानती थी।
शब्दार्थ – आलीशान = भव्य, शानदार। महल = कोठी, ऊँची इमारत। दहकती = जलती, सुलगती, क्रोध में भरी हुई । विराजते = उपस्थित रहते।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) सब जगह दक्षिण दिशा होने का क्या अर्थ है?
(घ) सभी दिशाओं में यमराज के आलीशान महल होने से क्या आशय है?
(ङ) माँ के समय और वर्तमान में क्या अन्तर आ गया है?
(च) ‘दहकती आँखों’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(छ) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ज) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि – चन्द्रकान्त देवताले । कविता — यमराज की दिशा ।
(ख) आशय – कवि चन्द्रकान्त कहते हैं— मेरी माँ के समय और मेरे समय में बहुत अन्तर आ गया है। आज ‘दक्षिण दिशा’ का विस्तार बहुत अधिक हो गया है। पहले केवल एक ओर ही दक्षिण दिशा होती थी, किन्तु आज सभी दिशाएँ दक्षिण दिशा हो गई हैं। आशय यही है कि पहले भय, आतंक और जीवन का संकट सामान्य जीवन में बहुत कम था, किन्तु आज तो जिधर भी और जहाँ भी चले जाओ, सब ओर प्राणों का संकट विद्यमान है। भय और आतंक ने सबकी साँसों को थाम रखा है। व्यक्ति जहाँ भी यह सोचकर जाता है कि वहाँ भय और आतंक छुटकारा मिल जाएगा तथा वह कुछ देर के लिए चैन से आराम कर सकेगा, वहीं आतंक और भयरूपी यमराज उपस्थिति हो जाता है। आतंकवादियों और शोषकों को यमराज का प्रतीक बताकर कवि आज के वातावरण का चित्र खींचता हुआ कहता है कि मनुष्य जिधर भी पैर करके सोता है उधर सभी दिशाओं में यमराज ने अपने शानदार भव्य महल बना रखे हैं। उन शानदार महलों में दहकती आँखोंवाले, क्रूर, सबको खा जानेवाले अनेक यमराज बैठे हैं। अब मेरी माँ रही नहीं और न ही उसके समयवाली दक्षिण दिशा ही शेष रही। माँ जिस दक्षिण दिशा को जानती थी उसका तो अब अस्तित्व रहा नहीं, बल्कि सब ओर यमराज के घर अर्थात् शोषण और विनाश की शक्तियाँ हावी हो गई हैं, उन्हीं के घर और अस्तित्व हैं। चारों ओर पूँजीवादी, साम्राज्यवादी, आतंकवादी शक्तियाँ अपना दबदबा बढ़ाती जा रही हैं और आम आदमी इनके चंगुल से फँसकर मर रहा है।
उपर्युक्त पद्यांश का गूढ़ार्थ यह है कि पहले तो शोषण, साम्राज्यवाद और आतंक का दुष्परिणाम कुछ लोगों तक ही सीमित था, परन्तु आज उसका प्रभाव सब ओर फैल गया है। मनुष्य किसी भी दिशा में आगे बढ़ना चाहे, उसे पूँजीवादी शोषणपरक व्यवस्था निगलने को तैयार खड़ी मिलती है। शोषणवादी शक्तियाँ आज अपना दबाव बनाने में सफल रही हैं। पूँजीपति शोषक अपनी अंगारे उगलती आँखों से आम मनुष्य को जैसे खा ही जाना चाहते हैं। संक्षेप में शोषणपरक समाज-व्यवस्था का विस्तार माँ के समय की अपेक्षा आज अत्यधिक हो गया है।
(ग) सब जगह दक्षिण दिशा होने का अर्थ है— जीवन के सभी ‘ क्षेत्रों में शोषणपरक भय और आतंक की व्यवस्था का विस्तार होता जा रहा है।
(घ) सभी दिशाओं में यमराज के आलीशान महल होने का अर्थ है – शोषक समुदाय और भय तथा आतंक फैलानेवाले लोगों द्वारा समाज के कमजोर वर्ग को अपने शिकंजे में रखने के लिए कायम शोषणपरक व्यवस्था । कवि कहना चाहता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में शोषकों, पूँजीपतियों, साम्राज्यवादियों का प्रभुत्व छा गया है, अब लोग इनसे किसी भी प्रकार बच नहीं सकते। आम आदमी यमराज के हाथों मृत्यु पाने को विवश है।
(ङ) माँ के समय और अब के समय में बड़ा अन्तर है। माँ के समय में सभी दिशाएँ थीं। दक्षिण दिशा ही एकमात्र ऐसी थी, जिसमें मनुष्य का अनिष्ट हो सकता था और शेष दिशाएँ अनिष्टकारी नहीं थी । तब खतरा बहुत कम था। आज चारों दिशाओं में दक्षिण दिशा हो गई है। सब ओर विघटनकारी एवं विनाशकारी शक्तियाँ सक्रिय हैं।
(च) ‘दहकती आँखें’ भीषण क्रोध, घृणा, हिंसा और शोषण आदि का प्रतीक हैं।
(छ) भाव – सौन्दर्य – शोषणपरक और आतंक पर आधारित समाज-व्यवस्था के दूर-दूर तक फैले संजाल को कविता के माध्यम से बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया है। शोषण की भयंकरता जैसे जीवन्त हो उठी है।
(ज) शिल्प-सौन्दर्य-
● प्रतीकात्मक पद्यांश । ‘पैर करके सोना’ – निश्चिन्त होकर सोने का प्रतीक है। ‘दक्षिण दिशा’ पूँजीवादी, शोषण और आतंक पर आधृत व्यवस्था का प्रतीक है। ‘यमराज के आलीशान महल’ सुव्यवस्थित शोषणपरक समाज व्यवस्था का प्रतीक हैं, शोषकों ने जिसका चारों ओर दबदबा बना रखा है। ‘दहकती आँखोंवाले यमराज’ स्वार्थ में अन्धे, भयानक इरादेवाले शोषकों का प्रतीक हैं।
● वाक्य-रचना सीधी, सरल एवं गद्यात्मक है, किन्तु विचार – प्रवाह सशक्त है।
● कवि की कल्पना का चमत्कार कविता को आकर्षक बना रहा है।
● ‘यमराज’ को मृत्यु का देवता मानने की प्राचीन कल्पना को आज के जनता के रक्तशोषक समुदाय से जोड़कर कवि ने सर्वथा मौलिक एवं सार्थक कल्पना की है।
● अन्योक्ति अलंकार है।
● ‘दहकती आँखोंवाले यमराज’ सफल चाक्षुष बिम्ब है।
● वर्तमान और पुराने समय की तुलना प्रभावशाली बन पड़ी है।
● अनुप्रासात्मकता द्रष्टव्य है- आज जिधर, दक्षिण दिशा, वह नहीं रही।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – कवि को दक्षिण दिशा पहचानने में कभी मुश्किल क्यों नहीं हुई?
उत्तर – कवि की माँ ने बचपन से ही उसे बार-बार दक्षिण दिशा की पहचान संस्कारगत रूप से करा दी थी, इसलिए उसे कभी भी दक्षिण दिशा पहचानने में कठिनाई नहीं हुई।
प्रश्न 2 – कवि ने ऐसा क्यों कहा है कि दक्षिण को लाँघ लेना संभव नहीं था?
उत्तर – कवि के अनुसार दक्षिण दिशा का कोई ओर-छोर नहीं है। वह अनन्त है। इसलिए उसे लाँघना सम्भव नहीं था । तात्पर्य और प्रतीकार्थ यह है कि आतंक और शोषण व्यवस्था की कोई सीमा या निश्चित परिधि या मानदण्ड है ही नहीं। यह नित नए रूप, शोषक की इच्छा के अनुरूप धारण करती रहती है। इसीलिए कोई चाहकर भी इससे सदा-सर्वदा के लिए मुक्त नहीं रह पाता ।
प्रश्न 3 – कवि के अनुसार आज हर दिशा दक्षिण दिशा क्यों हो गई है?
उत्तर – कवि के अनुसार दक्षिण दिशा भय, आतंक, संकट, शोषण की प्रतीक है। कवि जब आज की अपने चारों ओर की परिस्थितियों का आकलन करता है तब उसे लगता है कि आज सब ओर पूँजीवादी शोषकों, शक्तिसम्पन्न आतंकियों का दबदबा कायम है। ये लोग अपनी धन की क्रय शक्ति और अपने बल पर मानव का क्रूरतम तरीके से शोषण करते रहते हैं।
प्रश्न 4 – भाव स्पष्ट कीजिए-
सभी दिशाओं में यमराज के आलीशान महल हैं
और वे सभी में एक साथ
अपनी दहकती आँखों सहित विराजते हैं।
उत्तर— कवि कहता है कि शोषण करनेवाले और भय फैलानेवाले लोग यमराज की भाँति क्रूर हैं। वे दूसरों का शोषण करते हैं और स्वयं शान से, ठाठ-बाट से जीवन जीते हैं। संसार के जिस भी कोने में देखें ऐसे यमराज बैठे हुए दिख जाते हैं। ये क्रोध, घृणा और क्रूरता से भरे होते हैं। ये अपने स्वार्थ में अन्धे होते हैं। ये सभी के साथ कठोरता का व्यवहार करते हैं।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – ‘कवि की माँ अपनी बात को ईश्वर का निर्देश कहती थी। वह अपने पुत्र को कहती थी कि वह ईश्वर से बातचीत करके निर्णय लेती है।’ क्या आपको लगता है कि ऐसा सचमुच होता होगा? या फिर वह अपने अनुभव या बात को मनवाने के लिए ईश्वर के नाम का सहारा लेती थी?
उत्तर – मुझे लगता है कि कवि की माँ का यह कहना सही था कि वह ईश्वर से बातचीत करती है और उसके द्वारा प्राप्त निर्देश को ही बेटे को सीख के रूप में बताती है। कवि की माँ निर्मल हृदय की पवित्र स्त्री रही होगी। ईश्वर सच्चे हृदय में विराजमान् होते हैं, इसीलिए जब कवि की माँ को कोई कठिनाई आती होगी तो वह ईश्वर से बात करके उसकी प्रेरणा से निर्णय लेती होगी । सन्त लोग मनुष्य की आत्मा को परमात्मा का अंश मानते हैं, इसलिए सच्चे हृदयवाले प्रभु से बात कर लेते हैं, ऐसा विश्वास समाज में प्रचलित है।
एक बात यह भी हो सकती है कि निर्मल हृदयवाले सज्जन अपने अन्तःकरण की आवाज अथवा प्रेरणा को ईश्वर की आवाज मानते हैं। कवि की माँ क्योंकि पवित्र हृदयवाली सज्जन स्त्री रही होगी ; . अतः वे अपने मन की बातों को ईश्वर का आदेश मानकर कवि को उनका पालन करने को कहती होगी।
यह भी हो सकता है कि कवि तब बालक था। वह माँ की बात नहीं मानता होगा। तब माँ अपनी बात मनवाने के लिए ईश्वर के आदेश और उसकी नाराजगी का सहारा लेती होगी।
प्रश्न 2 – क्या माँ द्वारा दिए गए ‘दक्षिण दिशा में पैर न करके सोने के उपदेश का आशय भी शोषक वर्ग से बचना रहा होगा? सतर्क उत्तर दीजिए ।
उत्तर – माँ द्वारा दिए गए ‘दक्षिण दिशा में पैर करके न सोने’ के उपदेश का आशय निश्चय ही शोषक वर्ग से बचना नहीं रहा होगा। उसने दक्षिण दिशा में यमराज के प्रभाव के कारण ही अपने बेटे को उनके कोप से बचाने के लिए यह उपदेश दिया होगा। बचपन में लेखक को भगवान् के आदेश – उपदेश या फिर यमराज के कोप का भय दिखाकर माँ ने उससे अपनी बात मनवा ली थी। कवि अब पढ़-लिखकर समझदार हो गया है। उसने अपने स्तर से दक्षिण दिशा का सम्बन्ध शोषण या पूँजीवाद से जोड़ दिया है। माँ ने अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए ईश्वर के नाम का सहारा लिया तो कवि ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए माँ के उपदेश का। सामान्य-सी बात को प्रभावशाली बनाने की यह युक्ति कवि की अभिव्यक्तिकुशलता को दर्शाती है।
