UK Board 9th Class English – (Supplementary Reader) – Chapter 10 The Beggar
UK Board 9th Class English – (Supplementary Reader) – Chapter 10 The Beggar
UK Board Solutions for Class 9th English – (Supplementary Reader) – Chapter 10 The Beggar
THE BEGGAR (Anton Chekhov)
[ भिखारी लशकोफ को अपना व्यवहार बदलने की प्रेरणा कहाँ से मिली? आओ पढ़ें और जानें ।]
SUMMARY OF THE STORY
A beggar stood before the advocate Sergei. He asked for something to eat. He had been a school teacher for eight years. But he lost his job through intrigues.
Sergei’s eyes fell on the man’s overshoes, one of the shoes was high and the other low: The advocate remembered that the beggar met him the day before yesterday in Sadovya Street. Then he had told him that he was a student who had been expelled from the school.
Sergei warned him that he would send for the police. The beggar said that he was lying. He sang in a Russian choir and was expelled for drunkenness. If he told the truth, nobody would give him anything. What could he do?
Sergei asked the beggar to chop wood for him. The beggar agreed to do the work, though unwillingly. The beggar was taken by Sergei’s cook Olga to the shed to chop wood. Olga gave him an axe. The beggar put a stick of wood between his feet. Then he struck the axe freely. The wood fell down. Meanwhile Sergei saw him and felt sorry that he had set a drunken at work in the cold.
The beggar would come on the first of every month. He would do some or the other work. When Sergei moved into another house, he called the beggar to help him in packing etc.
Sergei called the beggar Lushkoff and sent him to his friend for some copying work.
They met after two years at the theatre counter. Sergei recognised Lushkoff who told him that he was working as a notary and got 35 roubles per month.
Sergei was glad that he changed a beggar into a notary. Lushkoff thanked him for his guidance. But he told him frankly that it was Olga and not Sergei who changed his life. Lushkoff told Sergei that Olga would rebuked him, sit opposite him and weep. She would grow sad. Then she would chop wood for him. He amazed Sergei when he told him that he didn’t chop a single stick of wood for him. Then the bell rang and he departed to the gallery.
सम्पूर्ण कहानी का हिन्दी रूपान्तरण
“हे दयालु, दया करो। अपना ध्यान एक गरीब, भूखे आदमी की ओर लगाओ। मैंने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। मेरे पास कहीं ठहरने के लिए पाँच कोपेक भी नहीं हैं, मैं ईश्वर की कसम खाकर कहता हूँ। मैं आठ वर्ष ग्रामीण स्कूल मास्टर रहा और तब षड्यन्त्र करके मुझे निकाल दिया गया। मैं झूठे आरोप का शिकार हो गया। एक वर्ष से मैंने कुछ नहीं किया।”
वकील सरजी ने भिखारी की ओर देखा जो फटा हुआ मृग शावक के रंग जैसा ओवरकोट पहने था। उसकी आँखों से स्पष्ट था कि वह पियक्कड़ है और उसके दोनों गालों पर लाल धब्बे थे तथा वकील साहब को ऐसा लगा कि इस व्यक्ति को उन्होंने पहले कहीं देखा है।
भिखारी कहता गया, “अब मुझे कालुगा प्रान्त में एक जगह के लिए प्रस्ताव प्राप्त हुआ है, पर मेरे पास वहाँ जाने के लिए पैसा नहीं है। कृपया मेरी सहायता कीजिए। मुझे माँगते हुए शर्म लगती है, पर मेरी परिस्थितियाँ मुझे विवश करती हैं।”
सरजी की आँखें उस आदमी के ओवरशू पर पड़ीं, जिनमें से एक ऊँचा था और दूसरा नीचा। और उन्हें अचानक कोई बात याद आई।
वकील साहब ने कहा, “देखो, मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने परसों तुमको सैदोवया स्ट्रीट पर देखा था। पर तुमने उस समय मुझे बताया था कि तुम विद्यार्थी थे जिसको स्कूल से निकाल दिया गया था, और तुम ग्रामीण स्कूल मास्टर नहीं हो। क्या तुम्हें याद है?”
चकित होकर भिखारी ने अस्पष्ट रूप से और धीरे-धीरे कहा, “न, ना, ऐसा नहीं हो सकता, मैं ग्रामीण स्कूल मास्टर हूँ, यदि आप चाहे मैं आपको अपने कागजात दिखा सकता हूँ।”
“तुमने झूठ बोला है ना! तुम अपने को विद्यार्थी कहते थे और तुमने मुझे यह भी बतलाया था कि तुम किस कारण से स्कूल से निकाले गए थे। क्या तुम्हें याद नहीं?”
सरजी गुस्से में लाल हो गए और उन्होंने तीव्र घृणा से उस भिखारी की ओर से मुँह मोड़ लिया।
वे क्रुद्ध होकर चिल्लाए, यह बेईमानी है। यह पैसा ठगना है। मैं तुम्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को बुलाता हूँ; तुम्हें लानत है !”
अपना हाथ अपने हृदय के ऊपर रखते हुए भिखारी ने कहा, “श्रीमान जी, तथ्य तो यह है कि मैं झूठ बोल रहा था। मैं न तो विद्यार्थी हूँ और न ही स्कूल मास्टर। यह झूठा बयान था । मैं पहले एक रूसी गायक- मंडली में गाया करता था और शराब पीने के कारण मुझे निकाल दिया गया। पर मैं और क्या कर सकता हूँ?”
भिखारी के निकट आते हुए सरजी चिल्लाए, “तुम क्या कर सकते हो ? काम! तुम काम कर सकते हो ! तुम्हें काम करना चाहिए। “
“काम — हाँ। यह मैं भी जानता हूँ, पर मुझे काम कहाँ मिलेगा?”
“तुम मेरे लिए लकड़ी फाड़ना कैसा पसंद करोगे?”
“मैं उस काम को करने से मना नहीं करूँगा, पर आजकल कुशल लकड़ी फाड़ने वाले भी खाली बैठे हैं उन्हें रोटी नसीब नहीं होती।”
“क्या तुम आओगे और मेरे लिए लकड़ी फाड़ोगे ?”
“हाँ श्रीमान, मैं करूंगा।”
“बहुत अच्छा; हमें शीघ्र ही पता लग जाएगा।”
सरजी अपने हाथ मलते हुए तेजी से लपके। उन्होंने रसोईघर से अपनी रसोई बनाने वाली को पुकारा ।
उसने कहा, “ओल्गा, यहाँ आओ। इस सज्जन को लकड़ियों की शेड में ले जाओ और उसे लकड़ी फाड़ने को दो।”
फटेहाल भिखारी ने अपने कंधे उचकाए, जैसे कि वह उलझन में हो, और अनिच्छापूर्वक रसोइए के पीछे-पीछे गया। उसकी चाल से स्पष्ट कि उसने जाने और लकड़ी फाड़ने के लिए अपनी रजामन्दी नहीं दी; क्योंकि वह भूखा था और काम चाहता था, पर केवल अभिमान और शर्मिन्दगी से और क्योंकि वह अपने ही शब्दों के जाल में फँस गया था इसलिए जा रहा था। यह भी स्पष्ट था कि वोदका पीने के कारण उसकी शक्ति क्षीण हो गई थी और यह कि वह अस्वस्थ था और वह तनिक भी काम करने के लिए तैयार नहीं था ।
सरजी तेजी से डाइनिंग रूम में गए। उसकी खिड़कियों से लकड़ियों की शेड और आँगन में क्या हो रहा है प्रत्येक चीज को देखा जा सकता था। खिड़की के पास खड़े होकर सरजी ने रसोइए और भिखारी को पिछले दरवाजे से आँगन में आते देखा और उनको शेड तक आने में गंदे हिम को पार करते देखा। ओल्गा क्रोधपूर्वक अपने साथी की ओर घूरी, अपनी कोहनी मारकर उसको एक ओर हटाया, शेड का ताला खोला और गुस्से से दरवाजा जोर की आवाज करते हुए खींचा।
इसके बाद सरजी ने देखा कि बनावटी मास्टर एक लट्ठे पर बैठ गया और अपने हाथों की उँगलियाँ बन्द करके अपने लाल गालों को उन पर रखकर चिन्तन में खो गया। उस स्त्री ने उस भिखारी के पैरों के बीच एक कुल्हाड़ा फेंका, और क्रोध से थूका। ओल्गा के होंठों के हाव-भाव से यह निर्णय लिया जा सकता है कि उसने भिखारी को कोसना शुरू कर दिया। भिखारी ने अनिच्छा से लकड़ी का एक लट्ठा अपनी ओर खींचा, उसको अपने पैरों के बीच में रखा और कुल्हाड़े से बहुत कमजोरी से उस पर वार किया। लट्ठा घूमा और नीचे गिर गया। भिखारी ने फिर उसको अपनी ओर खींचा, बर्फ से ठंडे हाथों पर फूँक मारी और सतर्कतापूर्वक लठ्ठे पर कुल्हाड़ा मारा जैसे कि वह अपने ओवरशू पर चोट लगने या अपनी उँगलियों के कटने से भयभीत हो । लकड़ी का लट्ठा फिर जमीन पर गिर गया।
सरजी का क्रोध गायब हो गया और उसने थोड़ा खेद महसूस किया तथा शर्मिन्दा हुआ कि उसने एक अयोग्य, शराबी, शायद वह बीमार भी हो, को ठंड में छोटे काम पर मेहनत करने के लिए लगाया।
एक घण्टे बाद ओल्गा अन्दर आई और बताया कि सब लकड़ियाँ फाड़ दी गई हैं।
सरजी ने कहा, “बहुत अच्छी बात है, उसे आधा रूबल दे दो। यदि वह चाहे तो वह प्रत्येक महीने की पहली तारीख को वापस आ सकता है और लकड़ी फाड़ सकता है। हम उसके लिए सदा काम निकालते रहेंगे।”
महीने की पहली तारीख पर बेघर और परित्यक्त प्रकट हुआ और पुनः आधा रूबल कमाया, यद्यपि वह मुश्किल से ही अपनी टाँगों पर खड़ा हो सकता था।
उस दिन के पश्चात् भिखारी आँगन में आता रहा और हर बार उसको काम मिलता रहा। वह कभी बेलचे से बर्फ उठाकर फेंकता था, कभी लकड़ियों की शेड को ठीक ढंग से लगाता था और कभी चटाइयों और गद्दों की धूल झाड़ता था। हर बार उसको 20 से 40 कोपेक मिल जाते थे, और एक बार उसको पाजामों का पुराना जोड़ा भी दिया गया।
जब सरजी दूसरे मकान में जाने लगे तो उन्होंने भिखारी को फर्नीचर पैक करने और उसको गाड़ी पर चढ़ाने के लिए मजदूरी पर बुलाया। इस समय वह बेघर और परित्यक्त गंभीर रूप से उदास था और शान्त था। उसने मुश्किल से ही फर्नीचर को स्पर्श किया होगा और अपना सिर लटकाए और व्यस्त होने का बहाना बनाए बिना घोड़ागाड़ियों के पीछे-पीछे चल दिया। वह सर्दी के मारे काँप रहा था और जब गाड़ीवानों ने उसकी काहिली, उसकी कमजोरी और उसके फटे हुए फैन्सी ओवरकोट की खिल्ली उड़ाई तो वह शर्मिन्दा हुआ। जब घर बदलने का काम पूरा हो गया सरजी ने भिखारी को बुलाया।
उसके हाथ में एक रूबल रखते हुई सरजी ने कहा, “अच्छा, मैं प्रसन्न हूँ कि मेरे शब्दों का प्रभाव पड़ा। यह तुम्हारी मजदूरी है। मैं देखता हूँ कि तुम गंभीर हो और कार्य करने में आपत्ति नहीं करते हो। तुम्हारा क्या नाम है?”
“लशकोफ!”
“अच्छा, लशकोफ, मैं अब तुम्हें कोई अन्य साफ-सुथरा रोजगार दिलाता हूँ। क्या तुम लिखना जानते हो?”
“मैं लिख सकता हूँ।”
“तब तुम कल यह पत्र मेरे मित्र के पास ले जाओ और तुम्हें कुछ नकल करने का काम दिया जाएगा। परिश्रम करो, शराब मत पिओ। और मैंने जो तुमसे कहा है उसे याद रखना, अलविदा !”
इस बात से प्रसन्न होकर कि एक आदमी को सही रास्ते पर लगाया है, सरजी ने दयापूर्ण ढंग से लशकोफ का कंधा थपथपाया और विदाई के समय उससे हाथ भी मिलाया । लशकोफ ने पत्र ले लिया और उस दिन के पश्चात् वह कभी आँगन में काम करने नहीं आया।
दो वर्ष बीत गए। तब एक दिन शाम को, जैसे ही सरजी थियेटर के टिकट काउन्टर पर खड़े हुए अपना टिकट खरीद रहे थे, उन्होंने अपने पास एक छोटे आदमी को देखा। उसके कोट के कॉलर घुँघराले रोओं से बने थे और वह सील की खाल से बनी टोपी पहने था। उस छोटे व्यक्ति ने डरते हुए टिकट देने वाले से गैलरी में एक सीट के लिए टिकट माँगा और ताँबे के सिक्कों में भुगतान किया।
उस छोटे आदमी में लकड़ी फाड़ने वाले का रूप पहचानते हुए सरजी चिल्लाए, “लशकोफ, क्या तुम हो? तुम कैसे हो? तुम क्या कर रहे हो ? तुम्हारा क्या हालचाल है?’ “
“सब ठीक है, मैं अब नोटरी हूँ और मुझे मासिक पैंतीस रूबल मिलते हैं। “
“ईश्वर को धन्यवाद ! बहुत सुन्दर ! मैं तुम्हें देखकर प्रसन्न हूँ। लशकोफ, मुझे अपार प्रसन्नता हुई। देखो एक अर्थ में तुम मेरे धर्मपुत्र हो । मैंने तुम्हें सही रास्ते पर चलने के लिए धक्का दिया, क्या तुम जानते हो । एह ! क्या तुमको याद है मैंने तुम्हें क्या फटकार दी थी? मैंने उस दिन लगभग तुम्हें अपने पैरों में गिरते हुए देखा। प्रिय वृद्ध व्यक्ति, धन्यवाद कि तुमने मेरे शब्दों को नहीं भुलाया।”
लशकोफ ने कहा, “आपको भी धन्यवाद ! यदि मैं आपके पास न आता तो मैं अब भी अपने को एक स्कूल मास्टर या विद्यार्थी ही कहता रहता । हाँ, आपकी शरण में आकर मैंने अपने आपको गड्ढे से बाहर खींच लिया।”
” वास्तव में, मैं बहुत प्रसन्न हूँ।”
“आपके दयालु शब्दों और कार्यों के लिए धन्यवाद। मैं आपका और आपकी रसोई बनाने वाली स्त्री का बहुत आभारी हूँ। ईश्वर उस अच्छी और कुलीन महिला को आशीर्वाद दे। आपने उस समय बहुत अच्छी तरह से बातें कीं और मैं अपने मरने के दिन तक आपका ऋणी रहूँगा । पर वास्तविकता यह है कि आपकी रसोइया ओल्गा ने मुझे बचाया है।”
“वह कैसे ?”
“जब मैं आपके मकान पर लकड़ी फाड़ने आया करता था, वह कहा करती थी : ओह, तुम पियक्कड़! ओह, तुम शोचनीय प्राणी! तुम्हारे लिए. कुछ भी नहीं है सिवाय बरबादी के।” और तब वह मेरे सामने नीचे बैठ ती थी और दुःखी हो जाती थी, मेरे चेहरे की ओर देखती थी और रोती. थी। “ओह, तुम दुर्भाग्यशाली व्यक्ति ! तुम्हारे लिए न तो इस दुनिया में और ना ही आने वाली दुनिया में कोई आनन्द है । तुम पियक्कड़ ! तुम नरक की आग में जलोगे। ओह, तुम दुःखी व्यक्ति।” और वह ऐसे कहती रहती थी, आप जानते हैं, वह इसी स्वर में कहती रहती थी। मैं आपको नहीं बता सकता कि उसने कितनी मुसीबत सही। उसने मेरे लिए कितने आँसू बहाए ।
पर मुख्य बात यह थी — वह मेरे स्थान पर लकड़ी फाड़ा करती थी । श्रीमान जी, क्या आप जानते हैं, कि मैंने आपके लिए लकड़ी का एक भी डंडा नहीं फाड़ा। उसने वह सब किया। उससे मैं क्यों बचा ? मैं क्यों बदला? मैंने उसको देखकर क्यों शराब पीना छोड़ दिया? मैं इसको समझ नहीं सकता। मैं केवल इतना जानता हूँ कि उसके शब्दों और उसके श्रेष्ठ कार्यों के कारण मेरे हृदय में परिवर्तन आया; उसने मुझे सही रास्ते पर लगाया और मैं इस बात को कभी नहीं भूलूँगा। किसी भी तरह, अब चलने का समय हो गया है, घंटी बज गई है।” लशकोफ नतमस्तक हुआ और गैलेरी के लिए चल दिया।
LONG ANSWER TYPE QUESTIONS
(To be answered in about 100 words )
Q.1. What reasons does the beggar give to Sergei for his telling lies?
(अपने झूठ बोलने के लिए भिखारी ने सरजी को क्या कारण बतलाता है?)
Ans. The beggar gives the following reasons to Sergei for his telling lies:
(1) For eight years the beggar was a village school teacher. Then he lost his place through intrigues. He fet a victim to columny. It is a year now since he has had anything to do.
(2) The beggar now had an offer of a position in the province of Kaluga. But he hasn’t the money to get there. The beggar asked Sergei to help him kindly. He was ashamed to ask. But he is obliged to by circumstances.
(3) When Sergei remembered that the beggar told him the day before yesterday in Sadovya Street, that he was a student who had been expelled. The beggar mumbled, “No, that can’t be so. I am a village school teacher, and if you like I can show you my papers.”
[अपने झूठ बोलने के लिए भिखारी सरजी को निम्नलिखित कारण बतलाता है-
(1) भिखारी आठ साल तक ग्रामीण स्कूल शिक्षक था। तब षड्यन्त्र के द्वारा उसकी नौकरी छूट गई। वह झूठे आरोप का शिकार बन गया। एक वर्ष से उसने कोई काम नहीं किया।
(2) भिखारी को अब कैलुगा प्रान्त में एक नौकरी मिली है। पर वहाँ जाने के लिए उसके पास धन नहीं है। भिखारी ने सरजी से सहायता करने के लिए कृपा करने को कहा। उसे माँगने में शर्मिन्दगी आती है। पर वह परिस्थितियों से लाचार होकर माँगने के लिए विवश है।
(3) जब सरजी को याद आया कि भिखारी ने सडोवया स्ट्रीट में 2 दिन पहले उससे कहा था कि वह विद्यार्थी है जिसको स्कूल से निकाल दिया गया है। भिखारी ने अस्पष्ट रूप से और धीरे से कहा, “नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं ग्रामीण स्कूल शिक्षक हूँ, और यदि आप चाहें तो मैं आपको अपने प्रमाण-पत्र दिखा सकता हूँ।]
Q.2. During their conversation Lushkoff reveals that Sergei’s cook, Olga, is responsible for the positive change in him. How has Olga saved Lushkoff ?
(बातचीत के दौरान लशकोफ ने प्रकट किया कि सरजी की रसोई बनाने वाली ओल्गा, उसमें सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए जिम्मेदार है। ओल्गा ने लशकोफ को कैसे बचाया?)
Ans. Olga saved Lushkoff and brought about a positive change in him in the following way:
He told Sergei that when he used to come to his house to chop wood, Olga used to call him ‘miserable’ she would look into his face, she became sad and wept. She would call him ‘unfortunate’. She shed many tears for his sake. After this, she used to chop wood for him. Lushkoff revealed the truth that he never chopped even a single stick for him. It was she who did it all.
Owing to her caustic words and noble deeds, a change came in his heart. He would never be able to repay her debt.
[ओल्गा ने लशकोफ का जीवन बचाया और उसमें सकारात्मक परिवर्तन लाई । यह सब निम्नलिखित प्रकार हुआ-
उसने सरजी को बतलाया कि जब वह लकड़ी फाड़ने के लिए उनके मकान पर आया करता था, तो ओल्गा उसे ‘दयनीय’ कहा करती थी। वह उसके चेहरे को ध्यान से देखती थी, वह दु:खी हो जाती थी और रोती थी। वह लशकोफ को ‘दुर्भाग्यशाली’ कहा करती थी। वह लशकोफ के लिए बहुत से आँसू बहाती थी। तत्पश्चात्, वह लशकोफ के स्थान पर लकड़ी फाड़ा करती थी । लशकोफ ने सच्चाई को प्रकट किया कि उसने कभी भी एक भी लकड़ी उनके लिए नहीं फाड़ी। ओल्गा ही सब कुछ करती थी ।
उसके मर्मभेदी शब्दों और श्रेष्ठ कार्यों ने उसके हृदय में परिवर्तन ला दिया। वह उसका अहसान कभी भी नहीं चुका सकेगा ।]
SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS
of interpretative and evaluative nature
(To be answered in 30-40 words )
Q. 1. Has Lushkoff become a beggar by circumstance or by choice?
(क्या लशकोफ परिस्थितिवश या जान-बूझकर भिखारी बना ? )
Ans. Lushkoff has become a beggar by choice. He was drunkard and a work shirker. He could get wine by begging. A work shirker always shirks work.
(लशकोफ जान-बूझकर भिखारी बना । वह शराबी और कामचोर था। वह भिक्षा माँगकर शराब प्राप्त कर सकता था। कामचोर सदैव काम से जी चुराता है।)
Q. 2. Sergei says, “I am happy that my words have taken effect.” Why does he say so? Is he right in saying this?
(सरजी कहता है, “मुझे प्रसन्नता है कि मेरे शब्दों का प्रभाव पड़ा।” वह ऐसा क्यों कहता है? क्या वह यह कहने में सही है? )
Ans. After the moving was over Sergei sent for Lushkoff. He said, “Well, I am happy that my words have taken effect.” He says so because he finds him sober and have no objection to work. Sergei is partially right in saying this. The real change in Lushkoff came due to Sergei’s cook, Olga.
(जब निवास बदलने का काम पूरा हो गया, सरजी ने लशकोफ को बुलाया। सरजी ने कहा, “अच्छा, मुझे प्रसन्नता है कि मेरे शब्दों का प्रभाव पड़ा।” वह ऐसा कहता है क्योंकि लशकोफ उसे गम्भीर लगा और उसे कार्य करने में कोई आपत्ति नहीं है। ऐसा कहने में सरजी आंशिक रूप से ठीक है। लशकोफ में वास्तविक परिवर्तन सरजी की रसोई बनाने वाली ओल्गा के फलस्वरूप आया था। )
Q. 3. During their conversation Lushkoff reveals that Sergei’s cook, Olga, is responsible for the positive change in him. How has Olga, saved Lushkoff ?
(बातचीत के दौरान लशकोफ ने प्रकट किया कि सरजी की रसोई बनाने वाली ओल्गा उसमें सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए जिम्मेदार है। ओल्गा ने लशकोफ को कैसे बचाया?)
Ans. Olga shed tears for the miserable condition of Lushkoff who was a drunkard. She chapped wood for Sergei in place of Lushkoff and entitled him for his wages. Olga brought about positive change is Lushkoff who gave up drinking for the sake of Olga.
(ओल्गा ने लंशकोफ की दयनीय दशा के लिए आँसू बहाए । लशकोफ पियक्कड़ था। ओल्गा ने सरजी के लिए लशकोफ के स्थान पर लकड़ी फाड़ी और उसको मजदूरी लेने लायक बनाया। ओल्गा लशकोफ में सकारात्मक परिवर्तन लायी और लशकोफ ने शराब पीना छोड़ दिया । )
VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS
based on factual aspects of the lesson
(To be answered in 20-30 words)
Q.1. What reasons does Lushkoff give to Sergei for his telling lies?
(लशकोफ अपने झूठ बोलने के लिए सरजी को क्या कारण बतलाता है ? )
Ans. Lushkoff says that he was a village school teacher. He lost his place through intrigues. Now he has had an offer of a position in the province of Kaluga. But he has no money to get there.
(लशकोफ कहता है कि वह एक ग्रामीण स्कूल शिक्षक था। षड्यन्त्र के कारण उसकी नौकरी छूट गई। अब उसे कलुगा प्रान्त में एक जगह मिली है। पर वहाँ पहुँचने के लिए उसके पास धन नहीं है।)
Q.2. Is Lushkoff a willing worker ? Why, then, does he agree to chop wood for Sergei ?
(क्या लशकोफ स्वेच्छा से काम करने वाला कार्यकर्त्ता है? क्यों, तब क्या वह सरजी के लिए लकड़ी फाड़ने के लिए रजामन्द हो जाता है? )
Ans. Lushkoff is not a willing worker. He agrees to chop wood for Sergei because he admitted that he would work if got any. Then Sergei proposed him to chop wood for him.
(लशकोफ अपनी इच्छा से काम करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह सरजी के लिए लकड़ी फाड़ने के लिए तैयार हो जाता है क्योंकि उसने यह स्वीकार किया था कि वह काम करेगा यदि उसे कोई काम मिल जाता है। तब सरजी ने उसके सामने अपने लिए लकड़ी फाड़ने का प्रस्ताव रखा । )
Q.3. Lushkoff is earning thirty five roubles a month. How is he obliged to Sergei for this?
(लशकोफ प्रतिमाह पैंतीस रूबल कमा रहा है। वह इसके लिए सरजी का कैसे आभारी है ? )
Ans. Sergei was happy that Lushkoff was sober and had no objection to work. He sent him to his friend who gave him the work of copying. Sergei advised him to work hard and not to drink. Thus Lushkoff is obliged to Sergei for earning thirty five roubles a month.
(सरजी लशकोफ से प्रसन्न था कि वह गम्भीर है और उसे काम करने में कोई आपत्ति नहीं है। सरजी ने लशकोफ को अपने मित्र के पास भेजा। उसने लशकोफ को नकल करने का काम दिया। सरजी ने लशकोफ को परिश्रम करने और शराब न पीने की सलाह दी। इस प्रकार लशकोफ प्रतिमाह पैंतीस रूबल कमाने के लिए सरजी का आभारी है।)
