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UK Board 9th Class English – (Supplementary Reader) – Chapter 4 In the Kingdom of Fools

UK Board 9th Class English – (Supplementary Reader) – Chapter 4 In the Kingdom of Fools

UK Board Solutions for Class 9th English – (Supplementary Reader) – Chapter 4 In the Kingdom of Fools

IN THE KINGDOM OF FOOLS (A.K. Ramanujan)

[ यह विश्वास किया जाता है कि मूर्ख इतने खतरनाक होते हैं कि केवल थोड़े-से, बुद्धिमान लोग ही उनको नियन्त्रित कर सकते हैं। इस कहानी में कौन लोग मूर्ख हैं? उनके साथ क्या होता है ?]
SUMMARY OF THE STORY
There was a kingdom of fools. Both the king and the minister were idiots. People worked at night and sleep in the day there. Everything cost the same a single duddu.
Once a guru and his disciple came to this kingdom of fools. The guru thought it was dangerous to live there. But the disciple did not want to leave that place. So he stayed and the guru left the kingdom.
One bright day, a thief broke into a rich merchant’s house. He made a hole in the wall and sneaked in. While he was carrying out his loot, the wall collapsed and killed the thief on the spot. His brother ran to the kingdom and complained. The king summoned the owner of the house at once. The owner said that the mason was responsible for the collapse of the wall. The mason was called in. The mason said that a dancing girl distracted his attention while he was building the wall. She was responsible for the collapse of the wall. The dancing girl pleaded that the goldsmith was responsible. He made her come daily because he did not make her jewellery. So the goldsmith was called in. He said I could not make her jewellery because the rich merchant forced me to make jewellery first for the wedding. The rich merchant was summoned and he was held responsible for the murder of the innocent thief.
The king ordered a new stake to be made ready for the execution. But the stake was too big for the thin merchant to be executed. Then there was a search for a man who could fit the stake. They found the disciple proper man who could fit the stake.
While he was waiting for death, he prayed to his guru to help him. The guru came. He went to the king and said, “O wisest of kings, who is greater- the guru or the disciple?” The king said that the guru is greater. Then the guru asked the king to put him to the stake first and his disciple next. There was a quarrel between the guru and the disciple to be put first to stake.
The king was in a fix what to do. He asked the guru what the mystery was. The guru asked, “Will you promise to put me to death if I tell you the mystery? The king gave him his solemn word. The guru took the king aside and whispered to him, “That stake belongs to the god of justice. It is new, whoever dies in it first will be reborn as the king of this country. And whoever goes next will be the future minister of this country.
The king talked in secrets with his minister and revealed to him the mystery. They decided to be executed themselves. Thus the guru and the disciple got free. The city was in confusion. People were worried for the future of the kingdom. They begged the guru and the disciple to be their king and their minister. First they did not agree. After a lot of prayer, they agreed on the condition that they could change all the old laws.
From then on, night would again be night and day would again be day, and people could get nothing for a duddu. It became like any other place.
सम्पूर्ण कहानी का हिन्दी रूपान्तर
मूर्खों के साम्राज्य में, राजा और मंत्री दोनों ही मूर्ख थे। वे अन्य राजाओं की तरह शासन चलाना नहीं चाहते थे । अतः उन्होंने रात को दिन में और दिन को रात में बदलने का निर्णय लिया। उन्होंने आदेश किया कि प्रत्येक व्यक्ति रात में जागेगा, किसान रात में अपने खेत जोतेंगे और व्यापारी अँधेरा होने के बाद ही व्यापार का संचालन करेंगे। और जैसे ही सूर्य निकलेगा, वे सो जाएँगे। जो आज्ञा का पालन नहीं करेगा उसको मृत्युदण्ड दिया जाएगा। मृत्यु के डर से लोगों ने वैसा ही किया जैसा उनसे कहा गया। राजा और मंत्री अपनी योजना की सफलता पर प्रसन्न थे।
एक दिन एक गुरु और उसका शिष्य नगर में आए। वह सुन्दर नगर था, दिन में सूर्य चमक रहा था, पर वहाँ आस-पास कोई नहीं था । सब सोए हुए थे। कोई चूहा तक भी क्रियाशील नहीं था । यहाँ तक कि पशु को भी दिन में सोना सिखा दिया गया था। दोनों अजनबियों ने अपने चारों ओर जो देखा उससे वे आश्चर्यचकित थे । वे शाम तक नगर में चारों ओर घूमते रहे। तब अचानक सारा नगर जाग गया और रात्रि में अपने कार्यों को करने लगा।
दोनों आदमी भूखे थे। अब दुकानें खुल चुकी थीं, वे कुछ खाद्य पदार्थ खरीदने गए। उन्हें आश्चर्य हुआ कि प्रत्येक चीज़ का एक ही मूल्य था— एक टका—वे चाहे चावल खरीदें या केलों का गुच्छा; कीमत एक का ही थी। गुरु और शिष्य को प्रसन्नता हुई। उन्होंने कभी ऐसी चीज नहीं सुनी थी। वे एक रुपये में जितना चाहें भोजन खरीद लें।
जब उन्होंने खाना पका लिया और खा लिया, गुरु ने महसूस किया कि वह मूर्खों का साम्राज्य है और उनका वहाँ रुकना अच्छा विचार नहीं होगा। गुरु ने अपने शिष्य से कहा, “यह हमारे रहने का स्थान नहीं है। आओ चलें। ” पर शिष्य वहाँ से जाना नहीं चाहता था।
यहाँ सब कुछ सस्ता है। वह केवल अच्छा और सस्ता भोजन चाहता गुरु ने कहा, ” वे सब मूर्ख हैं। यह बात अधिक दिनों तक नहीं चलेगी, और तुम नहीं कह सकते कि वे तुम्हारे लिए कल क्या करेंगे।”
पर शिष्य ने गुरु के ज्ञान और अनुभव को नहीं सुना। वह ठहरना चाहता था। गुरु ने अन्ततोगत्वा उससे कहना छोड़ दिया और कहा, “जो तुम चाहो, करो। मैं जा रहा हूँ।” और वह चला गया। शिष्य ठहर गया, रोज़ाना पेट भरकर केले, घी, चावल और गेहूँ खाता था और मोटा हो गया जैसे गलियों में फिरने वाला छोड़ा गया साँड़ ।
एक सुहावने दिन एक चोर एक धनी व्यापारी के घर में चोरी करने के लिए घुस गया। उसने दीवार में सेंधमारी की और चुपके से अन्दर चला गया। और जैसे ही वह लूट का माल ले जा रहा था, उसके सिर पर पुराने घर की दीवार धड़ाम से गिर गई और वह उसी जगह मर गया। उसका भाई भागकर राजा के पास गया और शिकायत की, “महाराज! जब मेरा भाई अपना पुराना धंधा कर रहा था, उसके ऊपर एक दीवार गिर गई और उसको मार दिया। इसका दोषी व्यापारी है। उसे अच्छी मज़बूत दीवार बनवानी चाहिए थी। आप अपराधी को अवश्य सजा दें और इस अन्याय के लिए परिवार की क्षतिपूर्ति करें।”
राजा ने कहा, “न्याय किया जाएगा। चिंता मत करो।” और राजा ने उस मकान मालिक को बुलाया।
जब व्यापारी आया, राजा ने उससे प्रश्न किया, “तुम्हारा नाम क्या है?”
“महाराज! मेरा अमक नाम है। “
“जब मृत चोर ने तुम्हारे घर में चोरी की तो क्या तुम घर पर थे?”
“हाँ, मेरे मालिक, उसने दीवार में कूमल लगाया और दीवार कमजोर थी। वह उसके ऊपर गिर गई।”
“दोषी अपना अपराध स्वीकार करता है। तुम्हारी दीवार ने इस आदमी के भाई को मारा। तुमने एक आदमी की हत्या की है। हमें तुमको सजा देनी पड़ेगी।”
निस्सहाय व्यापारी ने कहा, “स्वामी, मैंने दीवार नहीं खड़ी की। वास्तव में दोष उस आदमी का है जिसने दीवार बनाई। उसने इसको ठीक नहीं बनाया। आपको उसे सजा देनी चाहिए। “
“वह कौन है?”
” मेरे मालिक, यह दीवार मेरे पिता के समय में बनवाई गई थी। मैं उस आदमी को जानता हूँ। वह अब वृद्ध हो गया है। वह पास ही में रहता है।”
राजा ने संदेशवाहक उस राज को लाने के लिए भेजा जिसने वह दीवार बनाई थी। वे उसको हाथ-पैर बाँधकर ले आए।
“अच्छा, तुम हो। क्या तुमने इस आदमी की दीवार इसके पिता के समय में बनाई थी ?”
“हाँ, मेरे स्वामी, मैंने बनाई थी । “
“वह दीवार किस प्रकार की थी जो तुमने बनाई थी? वह एक गरीब आदमी के ऊपर गिर गई और उसको मार दिया। तुमने उसकी हत्या की है। हमें तुमको मृत्यु दण्ड देना पड़ेगा।”
इससे पहले कि राजा मृत्युदण्ड का आदेश करता, गरीब राज ने विनती की, “अपना आदेश देने से पहले मेरी बात सुनने की कृपा करें। यह सही है कि मैंने यह दीवार बनाई और वह अच्छी नहीं थी। पर उसका कारण यह था कि मेरा मन उसमें नहीं था। मुझे एक नर्तकी की अच्छी तरह से याद है जो उस गली से होकर सारे दिन अपने पैरों में घुँघरू बजाती हुई आती-जाती थी और मैं जो दीवार बना रहा था उस पर मैं अपनी आँखें या मन नहीं लगा सकता था। आपको उस नर्तकी को बुलाना चाहिए। मैं जानता हूँ वह जहाँ रहती है।”
“तुम ठीक कह रहे हो। मामला गंभीर होता जा रहा है। हमें इसकी जाँच पड़ताल करनी चाहिए। ऐसे जटिल मामलों का निर्णय देना आसान नहीं है। आओ उस नर्तकी को बुलाएँ वह चाहे कहीं भी रहती हो। “
नर्तकी जो अब वृद्ध स्त्री हो गई ‘काँपती हुई दरबार में आई।
“क्या जब यह गरीब आदमी दीवार बना रहा था तुम बहुत वर्षों पहले उस गली से आया-जाया करती थीं क्या तुमने उसको देखा था?”
“हाँ, मेरे मालिक, मुझे अच्छी तरह से स्मरण है।”
“तो तुम अपने घुँघरू बजाते हुए आया-जाया करती थी। तुम युवा थीं और तुमने उसका ध्यान हटाया। अतः उसने खराब दीवार बनाई।
वह एक गरीब चोर पर गिर गई और उसको मार दिया। तुमने एक निर्दोष व्यक्ति को मारा है। तुमको सजा देनी पड़ेगी।”
उसने एक क्षण के लिए सोचा और कहा, “मेरे स्वामी! प्रतीक्षा करें। मुझे अब याद आता है कि मैं उस गली से क्यों आया-जाया करती थी। मैंने सुनार को कुछ आभूषण बनाने के लिए सोना दिया था। वह एक सुस्त बदमाश था। उसने बहुत बहाने बनाए। वह कहता था कि वह आभूषण अब देगा, थोड़ी देर बाद देगा और सारे दिन ऐसे कहता रहता था। उसने मुझे अपने घर के एक दर्जन चक्कर कटवाए। उस समय इस राज ने मुझे देखा था। इसमें मेरा दोष नहीं है, मेरे प्रभु, यह तो उस दुष्ट सुनार का दोष है।”
“गरीब औरत, यह पूर्णतया ठीक कहती है।” राजा ने सोचा, ‘उसने साक्षी का आकलन किया, “हमें अन्ततोगत्वा वास्तविक अपराधी मिल गया है । उस सुनार को बुलाओ वह जहाँ भी छिप रहा हो। एकदम बुलाओ।”
राजा के बेलिफों ने सुनार की खोजबीन की जो अपनी दुकान के एक कोने में छिपा हुआ था। जब उसने अपने विरुद्ध इल्जाम सुना, उसको अपनी ही कहानी सुनानी पड़ी।
उसने कहा, “मेरे स्वामी, मैं गरीब सुनार हूँ। यह तो सत्य है कि मैंने इस नर्तकी को बहुत बार अपने दरवाजे पर बुलाया। मैंने उसके लिए बहाने बनाए क्योंकि मैं उसका आभूषण पहले नहीं बना सकता था, मुझे धनी व्यापारी का आभूषण का आर्डर पहले समाप्त करना था। उनके यहाँ शादी होने वाली थी, और वे प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। आप जानते ही हैं कि धनी लोग कितने बेसब्र होते हैं। “
“यह धनी व्यापारी कौन है जिसने तुमको इस गरीब स्त्री के आभूषण पूरा करने से रोका, उसको आने-जाने के लिए विवश किया। जिसने राज का ध्यान दीवार बनाने से हटाया और इससे उस दीवार का बेड़ा गर्क हो गया जो अब एक निर्दोष व्यक्ति के ऊपर गिर गई है और उसको मार दिया है। क्या तुम उसका नाम बता सकते हो?”
सुनार ने व्यापारी का नाम बताया और वह और कोई नहीं बल्कि उस मकान का मालिक था जिसके मकान की दीवार गिर गई थी। अब न्याय का पूरा चक्र हो गया है, राजा ने सोचा, न्याय वापस व्यापारी के पास चला गया है। जब व्यापारी को दरबार में अभद्रता से बुलवाया गया, वह चिल्लाता हुआ आया, “मैंने आभूषण बनाने का आर्डर नहीं दिया था, बल्कि मेरे पिता आभूषण बनवाने का आर्डर दिया था। वह मर चुका है। मैं निरपराध हूँ।”
पर राजा ने अपने मंत्री से परामर्श किया और सोच-समझकर निर्णय दिया : “यह बात सत्य है कि तुम्हारा पिता वास्तविक हत्यारा है। वह मर चुका है। पर उसके स्थान पर किसी को तो दण्ड मिलना ही है। तुमने अपने अपराधी पिता से पैतृक संपत्ति के रूप में सबकुछ प्राप्त किया है, उसकी धन-दौलत और उसके पाप भी। मैं एकदम समझ गया था, जब मैंने पहली बार तुम पर दृष्टि डाली थी कि तुम इस भयंकर अपराध की जड़ हो। तुम्हें मरना पड़ेगा । “
राजा ने मृत्युदण्ड देने के लिए नई शूली तैयार करने का आदेश दिया। जैसे ही नौकरों ने शूली की धार लगाई और उसको अपराधी मृत्युदण्ड के लिए अंतिम रूप से तैयार किया। मंत्री के मस्तिष्क में बात आई कि धनी व्यापारी इतना पतला है कि उसको ठीक प्रकार से शूली पर नहीं चढ़ाया जा सकेगा। मंत्री ने राजा से विवेकपूर्वक यह अपील की। राजा भी इसके लिए चिंतित हुआ ।
राजा ने कहा, “हम क्या करें” तब अचानक ही राजा के मस्तिष्क में बात आई कि उन्हें अब यह करने की आवश्यकता है कि ऐसे आदमी की खोज की जाए जो पर्याप्त मोटा हो और शूली में ठीक प्रकार से आ जाए। नौकरों को एकदम नगर में सब जगह ऐसे आदमी की खोज करने के लिए भेजा गया जो शूली पर फिट आ जाए। उन लोगों की दृष्टि उस शिष्य पर पड़ी जो महीनों से केले, चावल, गेहूँ और घी खाकर अपने को मोटा बना सका।
वह चिल्लाया, “मैंने क्या कसूर किया है? मैं निर्दोष हूँ। मैं एक संन्यासी हूँ।” उन नौकरों ने कहा, “यह सब सत्य हो सकता है, पर यह राजाज्ञा है कि हम ऐसे मोटे आदमी को ज्ञात करें जो शूली पर फिट आता हो।” वे उसको उस स्थान पर ले गए जहाँ मृत्युदण्ड मिलना था। उसे अपने बुद्धिमान गुरु के शब्द स्मरण आए, “यह मूर्खों का नगर है। तुम नहीं जानते कि कल तुम्हारे साथ वे लोग क्या करेंगे।”
जब शिष्य मृत्यु के लिए प्रतीक्षा कर रहा था, उसने अपने हृदय अपने गुरु से प्रार्थना कि वे कहीं भी हों उसकी विनती सुनें। गुरु ने सूक्ष्म दृष्टि से प्रत्येक चीज़ देखी, उसके पास जादुई शक्ति थी, वह दूर तक देख सकता था और वह जैसे भूत, वर्तमान देख सकता था वैसे ही भविष्य भी देख सकता था। वह अपने शिष्य को बचाने के लिए एकदम आया, जिसने अपने आपको भोजन के प्रेम के कारण ऐसी मुसीबत में फँसा लिया था।
ज्यों ही गुरु आया, उसने अपने शिष्य को लताड़ा और उसको कोई बात धीरे से कही। तब वह राजा के पास गया और उसको इस प्रकार संबोधित किया, “हे राजाओं में सबसे बुद्धिमान, कौन बड़ा है— गुरु या शिष्य ?”
” वास्तव में गुरु बड़ा है। इसमें संदेह की कोई बात ही नहीं है। आप क्यों पूछते हैं?”
“तब पहले मुझे शूली पर चढ़ाओ। मेरे बाद मेरे शिष्य को मृत्युदण्ड दो।”
जब शिष्य ने यह बात सुनी वह समझ गया और शोर करने लगा, “पहले मुझे! आप मुझे यहाँ पहले लाए हैं। मुझे पहले मृत्युदण्ड दो, उनको नहीं।””
अब गुरु और शिष्य लड़ने लगे कि किसको पहले शूली पर चढ़ाया जाए। इस व्यवहार से राजा असमंजस में पड़ गया। उसने गुरु से पूछा, “आप क्यों मरना चाहते हैं? हमने उसको इसलिए चुना कि वह शूली पर फिट आता है। “
गुरु ने उत्तर दिया, “आपको मुझसे ऐसे प्रश्न नहीं पूछने चाहिए। आप मुझे पहले मृत्युदण्ड दें। “
“क्यों? क्या इसमें कोई रहस्य है ? बुद्धिमान व्यक्ति होने के नाते आप मुझे समझाइए | “
गुरु ने पूछा कि यदि मैं आपको बताऊँ तो क्या आप मुझे शूली पर चढ़ाने का वचन देते हैं? राजा ने उसको अपना गंभीर वचन दिया। गुरु उसको एक ओर ले गया कि बात नौकरों के कानों में न पड़े, और राजा से धीरे से कहा, “क्या आप जानते हैं कि एकदम क्यों मरना चाहते हैं हम दोनों? हम सारे संसार में घूम आए हैं पर हमें ऐसा नगर या तुम्हारे जैसा राजा कहीं देखने को नहीं मिला। वह शूली न्याय के देवता की शूली है। वह नई है। अब तक उस पर कोई अपराधी नहीं चढ़ा है। जो कोई इस पर पहले मरता है वह इस देश के राजा के रूप में पुनः जन्म लेगा। और जो कोई भी इसके बाद में मरता है वह इस देश का भावी मंत्री होगा। हम अपने संन्यासी जीवन से तंग आ गए हैं। यह अच्छी बात होगी कि हम कुछ दिन के लिए राजा और मंत्री बनकर आनंद ले सकें। अब मेरे स्वामी आप अपने वचन को पूरा कीजिए और हमें मृत्युदण्ड दीजिए। याद रहे, मुझे पहले।”
अब राजा गहरे विचार में डूब गया। वह नहीं चाहता कि साम्राज्य दूसरे जीवन के चक्र में किसी और को मिले। उसे समय चाहिए। अतः उसने मृत्यु देने की प्रक्रिया को आने वाले कल तक स्थगित कर दिया और गुप्त स्थान पर अपने मंत्री से बातचीत की। “हमारे लिए यह ठीक नहीं होगा कि हम अगले जीवन में साम्राज्य को किसी और को सौंपे। आओ हम ही शूली पर चढ़ें और हम पुनः राजा और मंत्री के रूप में पैदा होंगे। संन्यासी झूठ नहीं बोलते। उसने यह बात कही और मंत्री सहमत हो गया।”
अतः राजा ने जल्लादों से कहा, “हम अपराधियों को आज रात को भेजेंगे। जब पहला आदमी तुम्हारे पास आए उसको पहले शूली पर चढ़ा दो। तब दूसरे आदमी के साथ भी वैसा ही करो। ये मेरे आदेश हैं। कोई भूल मत करना। “
उस रात, राजा और मंत्री गुप्त रूप से जेल में गए, गुरु और शिष्य को मुक्त किया, और उसने अपने आपको उनके वेश में बदल लिया और स्वामिभक्त नौकरों के साथ जैसी पहले व्यवस्था कर दी थी, उनको शूली पर ले जाया गया और तुरन्त शूली पर लटका दिया गया।
जब उनके शरीर कौओं और गिद्धों को फेंकने के लिए नीचे उतारे गए, लोगों में आतंक छा गया। उन्होंने अपने सामने राजा और मंत्री की लाशें देखीं। नगर में घबराहट फैल गई।
पूरी रात उन्होंने मातम मनाया और साम्राज्य के भविष्य के बारे में बातचीत की। कुछ लोगों ने अकस्मात् ही गुरु और शिष्य की ओर ध्यान दिया और वे जैसे ही अनदेखे चुपचाप नगर को छोड़कर जा रहे थे उनको पकड़ लिया। किसी ने कहा, “हम लोगों को राजा और मंत्री चाहिए।” अन्य लोग इस बात से सहमत हो गए। उन लोगों ने गुरु और शिष्य से प्रार्थना की कि वे उनके राजा और मंत्री बन जाएँ । शिष्य को राजी करने के लिए ज्यादा दलील नहीं देनी पड़ी। पर गुरु को रजामन्द करने में बहुत समय लगा। अन्ततोगत्वा इस शर्त पर कि वे सभी पुराने कानूनों को बदलेंगे, वे मूर्ख राजा और पागल मंत्री के साम्राज्य पर राज्य करने के लिए राजी हो गए।
तब से आगे भविष्य में, पुनः रात, रात होगी और दिन, दिन होगा और तुम एक टके में कुछ प्राप्त नहीं कर सकोगे। वह राज्य अन्य राज्यों के समान ही बन गया।
LONG ANSWER TYPE QUESTIONS
(To be answered in about 100 words)
Q. 1. What are the Guru’s words of wisdom ? When does the disciple remember them?
( गुरु के बुद्धिमत्ता के शब्द क्या हैं? शिष्य को वे शब्द कब याद आए ?)
Ans. When the guru and disciple had cooked and eaten, the guru realised that this was a kingdom of fools and it wouldn’t be a good idea for them to stay there. The guru said to his disciple, “This is no place for us. Let’s go.” But the disciple didn’t want to leave the place. The guru said, “They are all fools. This won’t last very long and you can’t tell what they’ll do to you next.”
The king’s bailiffs searched for a man fat enough to fit the stake. They found the disciple to be the befilling person. They carried him to the place of execution. Then the disciple remembered his wise guru’s words : “This is a city of fools. You don’t know what they will do next.”
So the disciple remembered his guru’s words of wisdom at the time of execution.
[ जब गुरु और शिष्य ने भोजन बना लिया और खा लिया, गुरु ने अनुभव किया कि यह मूर्खों का राज्य है और यहाँ ठहरने का विचार उन लोगों के लिए अच्छा नहीं होगा। गुरु ने अपने शिष्य से कहा, “यह हमारे लायक स्थान नहीं है। आओ चलें।” पर शिष्य उस स्थान से जाना नहीं चाहता था। गुरु ने कहा, “वे सब मूर्ख हैं। यह बात अधिक दिनों तक नहीं चलेगी और तुम नहीं कह सकते कि वे तुम्हारे साथ पुनः क्या करेंगे। “
राजा के बैलिफों ने ऐसे आदमी की खोज की जो स्टेक में आने के लिए पर्याप्त मोटा हो। उन्होंने शिष्य को उपयुक्त आदमी पाया। वे • उसको मृत्युदण्ड के स्थान पर ले गए। तब शिष्य को अपने बुद्धिमान गुरु के शब्द याद आए : ” यह मूर्खों का नगर है। तुम नहीं कह सकते कि वे लोग तुम्हारे साथ पुनः क्या करेंगे।” अतः शिष्य ने अपने गुरु के बुद्धिमत्ता के शब्द मृत्युदण्ड के समय याद किए ।]
Q.2. How does the guru manage to save his disciple’s life?
( गुरु ने अपने शिष्य का जीवन बचाने के लिए किस प्रकार व्यवस्था की ? )
Ans. Introduction : The disciple was carried to the place of execution. He remembered his wise guru’s words. While he was waiting for death, he prayed to his guru in his heart to save him.
How the guru saved the disciple’s life: As soon as the guru arrived, he rebuked the disciple and told him something in a whisper. He addressed the king, ‘O wisest of kings, who is greater the guru or the disciple?’ The king said the guru is always greater than the disciple. Then the guru said, “Put me to the stake first, and my disciple next.” The disciple said, “Put me to the stake first as I was brought here first.” The king saw that there was some mystery. He asked the guru what the mystery was. The guru took the king aside and said, “The stake belongs to the god of justice. It is new. It has never had a criminal on it. Whoever dies on it first will be reborn as the king of this country. And whoever goes next will be the future minister of this country.”
Conclusion : The king was in deep thinking. He postponed the execution. Thus the guru saved his disciple’s life.
[ भूमिका – शिष्य को मृत्युदण्ड के स्थान पर ले जाया गया। उसे अपने गुरु के शब्द याद आए। जब वह मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था, उसने अपने मन में अपने गुरु से प्रार्थना की कि उसे बचाए ।
गुरु शिष्य का जीवन कैसे बचाया – ज्यों ही गुरु आया, उसने अपने शिष्य को बुरा-भला कहा और उसके कान में धीरे से कुछ कहा। गुरु ने राजा को सम्वोधन किया, “हे बुद्धिमान राजा ! कौन बड़ा है – गुरु या शिष्य ?” राजा ने कहा कि गुरु सदा ही शिष्य से बड़ा होता है। तब गुरु ने कहा, “मुझे पहले शूली पर चढ़ाओ और मेरे शिष्य को बाद में। ” शिष्य ने कहा, “मुझे पहले शूली पर चढ़ाओ, क्योंकि मैं यहाँ पहले लाया गया हूँ।” राजा ने देखा कि कोई रहस्य है। राजा ने गुरु से वह रहस्य पूछा। गुरु राजा को एक ओर ले गया और कहा, “यह शूली न्याय के देवता की है। यह नया है। अब तक इस पर कोई अपराधी नहीं चढ़ा है। जो पहले इस पर चढ़ेगा वह अगले जन्म में इस देश का राजा बनेगा और जो इसके बाद शूली पर चढ़ाया जाएगा, वह इस देश का मंत्री होगा । ” निष्कर्ष- – राजा गहरे विचार में डूब गया। उसने मृत्युदण्ड स्थगित कर दिया। इस प्रकार गुरु ने अपने शिष्य का जीवन बचाया।]
SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS
of interpretative and evaluative nature
(To be answered in 30-40 words)
Q.1. Why does the disciple decide to stay in the kingdom of fools ? Is it a good idea ?
(शिष्य ने मूर्खो के राज्य में ठहरने का निर्णय क्यों लिया? क्या यह अच्छा विचार है?)
Ans. The disciple decided to stay in the Kingdom of Fools because everything was cheap there. All he wanted was good, cheap food.
It was not a good idea because he could not say what they would do him next.
(शिष्य ने मूर्खो के राज्य ठहरने का निर्णय लिया क्योंकि वहाँ प्रत्येक चीज सस्ती थी। उसे अच्छा और सस्ता भोजन चाहिए था। यह अच्छा विचार नहीं था क्योंकि वे लोग उसके लिए कल क्या कर बैठें, वह नहीं कह सकता था । )
Q.2. Who is the real culprit according to the king ? Why does he escape punishment ?
(राजा के अनुसार वास्तविक अपराधी कौन है? वह दण्ड से क्यों बच जाता है ? )
Ans. According to the king, the merchant is the real culprit because he is the successor of his father who got the wall built. The merchant escapes punishment because he is too thin to be properly executed on the stake.
(राजा के अनुसार, व्यापारी वास्तविक अपराधी है क्योंकि वह अपने पिता का उत्तराधिकारी है जिसने दीवार बनाई थी। व्यापारी दण्ड से बच जाता है क्योंकि वह इतना पतला है कि उसको स्टेक पर उपयुक्त प्रकार से फाँसी नहीं दी जा सकती। )
Q.3. How does the guru manage to save his disciple’s life ?
( गुरु अपने शिष्य के जीवन को बचाने के लिए क्या व्यवस्था करता है? )
Ans. The guru told his disciple his plan in a whisper. Guru and disciple began to claim to be the first on the stake. When the guru told the king the mystrey, he released the disciple. Thus the disciple’s life was saved by the great wisdom of his guru.
(गुरु ने अपनी योजना अपने शिष्य के कान में बतलाई । गुरु और शिष्य स्टेक पर पहले चढ़ने का दावा करने लगे। जब गुरु ने राजा को रहस्य बतलाया, उसने शिष्य को मुक्त कर दिया। इस प्रकार गुरु की गहरी सूझबूझ से शिष्य का जीवन बच गया । )
VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS
based on factual aspects of the lesson
(To be answered in 20-30 words)
Q.1. What are the two strange things the guru and his disciple find in the kingdom of fools?
(गुरु और शिष्य ने मूर्खों के राज्य में क्या दो विचित्र चीजें पाईं ? )
Ans. Following are the two strange things the guru and his disciple found in the kingdom of fools:
(1) All the people did their business at night instead of day.
(2) Everything cost the same, a single duddu-Whether they bought a measure of rice or a bunch of bananas.
[ निम्नलिखित दो विचित्र चीजें हैं जो गुरु और उसके शिष्य ने मूर्खों के राज्य में देखीं-
(1) सभी लोग दिन के बजाय रात में अपने कार्य करते थे । (2) प्रत्येक चीज का मूल्य केवल एक डुड्डू था— चाहे वे चावल की कोई मात्रा खरीदें या केलों का गुच्छा खरीदें ।]
2. What are the guru’s words of wisdom ? When does the disciple remember them?
( गुरु की बुद्धिमत्ता के शब्द क्या हैं? शिष्य ने उन शब्दों को कब याद किया ? )
Ans. The guru’s words of wisdom are, “This is a city of fools, you don’t know what they will do next”. The disciple remembers them at the time of his execution.
( गुरु की बुद्धिमत्ता के शब्द ये हैं, “यह मूर्खो का नगर है। तुम नहीं जानते वे आगे क्या करेंगे ।” शिष्य को मृत्यु दण्ड के समय शब्द याद आए। )

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