UK Board 9th Class English – (Supplementary Reader) – Chapter 3 Iswaran the Storyteller
UK Board 9th Class English – (Supplementary Reader) – Chapter 3 Iswaran the Storyteller
UK Board Solutions for Class 9th English – (Supplementary Reader) – Chapter 3 Iswaran the Storyteller
ISWARAN THE STORYTELLER (R.K. Laxman)
(एक रात महेन्द्र अपनी नींद से जागा गया और काले बादल जैसी आकृति देखी। उसको ठंडा पसीना आ गया। क्या वह भूत था?]
SUMMARY OF THE STORY
Mahendra was a Junior Engineer. He worked for a construction company. He was a bachelor. He led a simple life. Iswaran, a cook, was attached to him. He cooked for him, washed his clothes and told him stories at night. Mahendra listened and enjoyed.
One night, Iswaran told his master a story of a mad elephant. It broke loose. It trampled bushes and tare up creepers. The elephant reached the town, broke the fence and crushed many shops. People fled in fear from the town. The elephant entered the school where Iswaran read in junior class. The teachers and the students watched the drama from the rooftop. Iswaran suddenly grabbed a cane from the hands of teacher. He ran down the stairs and into the open. The elephant granted. It swing a branch of a tree which it held in his trunk. Iswaran moved slowly towards it, stick in hand. People were watching the scene from nearby housetops. The elephant looked on him red eyed. It was ready to rush towards him. It lifted its trunk and trumpeted loudly. At that moment Iswaran moved forward. He mustard all his force and quickly whacked the third toenail of the elephant. The beast looked stunned for a moment, then it shivered from head to foot-and collapsed.
One night, there was a full moon in the sky. That day was an auspicious day. Iswaran prepared very delicious dinner. That night Mahendra enjoyed it very much and complimented Iswaran.
Then Iswaran narrated a supernatural story. He told how he sometimes saw ghosts at night. He would see one horrible ghost of a woman at midnight during the full moon. It was an ugly creature with matted hair and a shrivelled face holding a foetus in its arms.
Mahendra shivered at the description and said, “You are crazy Iswaran. There are no ghosts or spirits.”
One night, Mahendra was woken up from his sleep, by a low moan close to his window. The wailing became louder. He looked out of the window. He saw a dark cloudy form holding a bundle. Mahendra broke into a cold sweat and fell back, panting. When Mahendra recovered the thought it was some trick of his subconscious mind. Next morning, Mahendra hurried away to his office and resigned his post.
सम्पूर्ण कहानी का हिन्दी रूपान्तर
महेन्द्र नामक युवक ने यह कहानी गणेश को सुनाई थी। वह एक फर्म में कनिष्ठ पर्यवेक्षक था। वह फर्म विविध प्रकार के निर्माण स्थलों पर किराये पर पर्यवेक्षक भेजा करती थी, जैसे कारखाने, पुल, बाँध आदि। महेन्द्र निर्माण स्थल पर क्रिया-कलाप का पर्यवेक्षण करता था। अपने प्रधान कार्यालय के आदेशानुसार उसे प्रायः एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना पड़ता था— कोयले की खान के क्षेत्र से रेल सेतु निर्माण स्थल तक, कुछ माह पश्चात वहाँ से ऐसे स्थान पर जाता था जहाँ कोई रासायनिक प्लांट बन रहा हो।
वह अविवाहित था। उसकी आवश्यकताएँ साधारण थीं और वह सभी प्रकार की विपरीत स्थितियों में अपने को ढाल लेता था, चाहे वह सुविधारहित सर्किट हाउस हो या पत्थर की खानों के बीच कपड़े का अस्थायी तंबू। पर उसका रसोइया ईश्वरन उसकी एक पूँजी थी। वह रसोइया महेन्द्र से बहुत जुड़ा हुआ था और महेन्द्र की नियुक्ति जहाँ भी होती थी वह बिना किसी आपत्ति के वहाँ चला जाता था। वह महेन्द्र का भोजन बनाता था, उसके कपड़े धोता था और अपने स्वामी से रात को बातचीत करता था। वह विविध विषयों पर असंख्य कहानियाँ और किस्से गढ़ सकता था।
ईश्वरन में एक आश्चर्यजनक क्षमता थी, सुनसान बीहड़ भूक्षेत्र के बीच जहाँ चारों ओर मीलों तक कोई दुकान दिखाई नहीं देती थी, पता नहीं कहाँ से वह सब्जियाँ और भोजन बनाने की चीजें उत्पन्न कर लेता था। नव निर्माण स्थल पर टीन की चादरों से बने आश्रय में पहुँचने पर एक ही घंटे ताजी सब्जियों से बने बहुत ही सुस्वादु व्यंजन चामत्कारिक ढंग से तैयार कर देता था।
महेन्द्र प्रातः शीघ्र उठ जाता था और नाश्ता करने के बाद काम पर चला जाता था, वह अपने साथ लंच ले जाता था।
इस बीच में ईश्वरन टिन शेड की सफाई करता, सामान को व्यवस्थित करता, कपड़े धोता और फुर्सत से स्नान करता, अपने सिर पर पानी की कई बाल्टियाँ उड़ेलता था, नहाते समय मंद स्वर से प्रार्थना भी करता था। तब लंच टाइम हो जाता था। खाना खाने के बाद वह कुछ देर पढ़ता था और फिर सो जाता था। वह पुस्तक सामान्यतः कोई लोकप्रिय तमिल रोमांचकारी पुस्तक होती थी जिसमें सैकड़ों पृष्ठ होते थे। कल्पनाशील वर्णन और व्याख्यानात्मक किस्से ईश्वरन को मन्त्रमुग्ध कर देते थे।
उसके अपने वर्णन उन तमिल लेखकों द्वारा अत्यन्त प्रभावित होते थे जिनको वह पढ़ता था। जब वह छोटी घटना का वर्णन करता हुआ होता था, तो वह असमंजस और आश्चर्य से विवरण का अंत करने का प्रयत्न करता था। उदाहरणार्थ, यह कहने के बजाय कि उसने जाते हुए सड़क पर एक उखड़ा हुआ पेड़ देखा, वह अपनी भृकुटी को उपयुक्त रूप से गोल करता और हाथों को नाटकीय हावभाव के साथ उठाता और तब कहता, “सड़क सुनसान पड़ी थी और मैं अकेला था। अचानक मैंने कोई चीज़ देखी जो दैत्याकार बालों से ढका जंगली जानवर लगता था। वह पशु सड़क पर पैर फैलाये पड़ा था। मैं मुड़कर और लौटकर वापस आने के लिए आधा तैयार था। पर जैसे मैं उसके और समीप आया, मैंने देखा कि वह गिरा हुआ पेड़ है और उसकी सूखी शाखाएँ फैली हुई हैं।” महेन्द्र अपनी कैनवास की कुर्सी पर अंगड़ाई लेता था और बिना आलोचना किए ईश्वरन की कहानियाँ करता था।
“मैं जिस स्थान का रहने वाला हूँ वह इमारती लकड़ी के लिए प्रसिद्ध है। ” ईश्वरन इस प्रकार अपनी कहानी आरंभ करता था। “वहाँ चारों ओर मूल्यवान लकड़ी वन हैं। हाथी लकड़ी के लट्ठों को ट्रकों पर चढ़ाते हैं। वे विशाल हृष्ट-पुष्ट पशु हैं। जब वे मदमस्त हो जाते हैं तो बड़े से बड़ा अनुभवी महावत भी उन पर नियंत्रण नहीं कर सकता। इस भूमिका के बाद ईश्वरन हाथी के बारे में विस्तृत किस्से आरंभ करता था । “
एक दिन एक हाथी टिम्बर यार्ड से बचकर भाग गया और इधर-उधर घूमने लगा, झाड़ियों को पैर से रौंदता हुआ, जंगली बेलों को उखाड़ता हुआ और मनचाहे ढंग से पेड़ों की शाखाएँ तोड़ने लगा। श्रीमान, आप जानते हैं कि हाथी जब मदमस्त हो जाता है तो किस प्रकार व्यवहार करता है। ईश्वरन अपनी ही कहानी में उत्तेजना का ऐसा शिकार हो जाता था कि वह फर्श से खड़ा हो जाता था और काँपने लगता था और मदमस्त हाथी की नकल करते हुए अपने पैरों को फर्श पर मारता था।
वह कहता था, “हाथी हमारे कस्बे के बाहरी भाग में आ पहुँचा, माचिस की तिल्लियों की तरह से वह बाड़ों को तोड़ता रहा। वह मुख्य सड़क पर आया और उसने फलों, मिट्टी के बर्तनों और कपड़ों की सभी दुकानों को नष्ट कर दिया। आतंक के मारे लोग इधर-उधर घबराकर भागे । अब हाथी ने ईंटों की दीवार तोड़कर एक स्कूल के मैदान में प्रवेश किया जहाँ बच्चे खेल रहे थे। सभी बच्चे भागकर अपनी कक्षाओं में आ गए और दरवाजों को कसकर बन्द कर लिया। हाथी चिंघाड़ा और इधर-उधर घूमने • लगा, फुटबाल का गोल पोस्ट उखाड़ दिया, बालीबाल का नेट फाड़ दिया, पानी के लिए रखे ड्रम पर लातें मारी और उसको चपटा कर दिया। झाड़ियों को उखाड़ फेंका। “
इसी बीच सभी अध्यापक स्कूल भवन के छज्जे पर चढ़ आए, वहाँ से वे लोग हाथी के विनाशकारी आक्रमण देखते रहे। नीचे मैदान में एक भी व्यक्ति नहीं था। गलियाँ खाली पड़ी थीं जैसे कि पूरे कस्बे के लोग अचानक ही गायब हो गए हों ।
“मैं उस समय जूनियर कक्षा में पढ़ रहा था और छत से सारा नाटक देख रहा था। मैं नहीं जानता कि अचानक ही मुझे क्या हुआ । मैंने एक अध्यापक के हाथ से बेंत छीना और जीने से नीचे दौड़ा और खुले मैदान में आ गया।” हाथी चिंघाड़ा और अपनी सूँड़ में उसने जो वृक्ष की शाखा पकड़े हुई थी मुझे डराते हुए उसको घुमाया। उसने अपना पैर भूमि पर मारा और बहुत सारी कीचड़ और धूल लात मार के उठाई। वह खतरनाक लग रहा था।
पर मैं उसकी ओर धीरे-धीरे सरका। मेरे हाथ में छड़ी थी। आसपास के मकानों की छतों से लोग सम्मोहित हुए दृश्य देख रहे थे। हाथी ने लाल आँखों से मेरी ओर देखा, वह मेरी ओर दौड़ने के लिए तैयार था। उसने अपनी सूँड़ उठाई और जोर से चिंघाड़ा। उस क्षण अपनी पूरी शक्ति बटोरकर मैं आगे बढ़ा और तेजी से उसके पैर के तीसरे नाखून पर बेंत से जोर से प्रहार किया। एक क्षण के लिए तो हाथी भौचक्का रह गया, तब वह पैर से सिर तक काँपा — और बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा।
इस बिन्दु पर आकर ईश्वरन ने कहानी को अधूरा छोड़ दिया। वह धीरे से बुदबुदाता हुआ उठा, “मैं गैस जलाने और भोजन को गर्म करके वापस आता हूँ।” महेन्द्र जो ध्यानमग्न होकर कहानी सुन रहा था बीच में लटका रहा। जब ईश्वरन वापस आया तो उसने कहानी को जहाँ छोड़ा था वहाँ से शुरू नहीं कर पाता था । महेन्द्र उसको स्मरण कराता कि कहानी का उपसंहार बीच में ही रह गया। ईश्वरन आकस्मिक रूप से कंधे मटकाता और कहता, “अच्छा, पशु को होश में लाने के लिए पशु-चिकित्सक को बुलाया गया। दो दिन बाद उस हाथी का महावत उसको जंगल में ले गया।”
“अच्छा, ईश्वरन तुमने यह कैसे किया ? तुमने हाथी को किस प्रकार नीचे गिराया ?”
“इस बात का सम्बन्ध जापानी आर्ट से है। श्रीमान, मेरे विचार से उसे कराटे या जू-जिस्सू कहते हैं। मैंने इस विषय में कहीं पढ़ा था, आप देखते हैं यह तंत्रिका तंत्र को अस्थायी रूप से निष्क्रिय कर देता है । “
ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब ईश्वरन साहसिक कार्य, आतंक और असमंजस से परिपूर्ण कोई कहानी न सुनाता हो। कहानी चाहे विश्वसनीय हो या नहीं महेन्द्र को उसको सुनने में आनंद आता था क्योंकि वह ऐसे ढंग से कही जाती थी जो अकल्पनीय होती थी। ऐसा प्रतीत होता था कि महेन्द्र के रहने के क्वार्टर में टीवी की अनुपस्थिति की कमी ईश्वरन पूरा कर देता था।
एक दिन प्रातः जब महेन्द्र नाश्ता कर रहा था, ईश्वरन ने पूछा, ” श्रीमान, क्या मैं शाम को भोजन में कोई विशेष चीज बना सकता हूँ? इसके अतिरिक्त, आज एक शुभ दिन है। परम्परानुसार हम अपने पूर्वजों की आत्माओं को खिलाने के लिए विविध स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करते हैं। “
उस रात महेन्द्र ने बहुत ही स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया और उसकी पाक – कला के लिए ईश्वरन को बधाई दी । ईश्वरन बहुत प्रसन्न प्रतीत होता था, पर, अनायास ही, उसने भूत-प्रेतों की एक भड़कीली कहानी सुनाई।
उसने शुरू किया श्रीमान, “आप जानते हैं यह सम्पूर्ण कारखाने का क्षेत्र जिसमें हम रह रहे हैं, एक बार एक कब्रिस्तान था । ” महेन्द्र को एक सुहावना सपना आ रहा था वह एकदम झटका, वह संतोषकारी भोजन करने के बाद सो गया था।
ईश्वरन ने आरंभ किया, “मैं इस बात को पहले दिन ही जान गया था जब मैंने रास्ते में आदमी की खोपड़ी पड़ी देखी। अब भी मेरे सामने बहुत-सी खोपड़ियाँ और हड्डियाँ आती हैं।”
वह कहता गया कि उसने रात में कभी-कभी भूत कैसे देखें । ” मैं इन चीजों से आसानी से डरने वाला नहीं हूँ। पर एक औरत का डरावना भूत जो पूर्णमासी की रात को यदा-कदा प्रकट होता है। वह एक कुरूप प्राणी है जिसके बालों की लटें बनी हुई हैं और उसका चेहरा झुर्रीदार और सिकुड़ा हुआ है, जैसे कि वह ढाँचा हो उसके हाथों में भ्रूण हो । “
वर्णन सुनकर महेन्द्र को कँपकँपी आ गई और बीच ही में तेजी से उसने उसकी बात रोक दी। “ईश्वरन, तुम पागल हो। भूत-प्रेत जैसी कोई चीज नहीं होती। वह तुम्हारी सोच की कल्पित वस्तु है। अपना पाचन-तंत्र परीक्षण कराओ और संभवतः अपने मस्तिष्क को भी। तुम बकवास कर रहे हो।”
यह आशा करते हुए कि ईश्वरन दो दिन चुप रहेगा, महेन्द्र कमरे से चला गया और रात में आराम करने के लिए गया । पर अगले दिन प्रात: उसे आश्चर्य हुआ कि उसका रसोइया सदा की तरह से प्रसन्नचित्त और बातूनी है।
उस दिन से महेन्द्र, अपनी वीरता की बातों के बावजूद, कुछ परेशानी लिए बिस्तर पर सोने जाता था। उसके बिस्तर के आगे जो खिड़की थी वह प्रत्येक रात उससे बाहर अंधकार में गौर से देखा करता था ।
वह इस बात को सुनिश्चित करना चाहता था कि आसपास काली आकृतियों की कोई गतिविधि नहीं है। पर वह केवल अंधकार का समुद्र ही देखता था जिसमें मीलों दूर कारखाने की टिमटिमाती बत्तियाँ नज़र आती थीं।
वह सदा पूर्णमासी की रात में दुग्ध-धवल भूदृश्य की प्रशंसा करना चाहता था। पर ईश्वरन से स्त्री भूत की कहानी सुनने के बाद, पूर्णमासी को, खिड़की से बाहर देखना पूरी तरह बन्द कर दिया था।
एक रात, महेन्द्र अपनी खिड़की के निकट धीमे रुदन से अपनी नींद जाग गया। पहले तो उसने इस बात को ऐसे लिया कि कोई बिल्ली चूहों की घात में बैठी हुई है। पर आवाज मले से निकल रही थी जो बिल्ली की आवाज नहीं हो सकती थी । उसने बाहर देखने की जिज्ञासा को रोका कि कहीं ऐसा न हो कि वह दृश्य देखे और उससे उसके हृदय की गति रुक जाए। पर रुदन जोर से सुनाई पड़ने लगा और वह बिल्ली की आवाज कम लगने लगी। अब वह प्रलोभन को रोक नहीं सका। खिड़की की दहलीज की अधिक दूर नहीं, काले बादल की आकृति देखी जो एक गट्ठर पकड़े हुए सतह तक झुककर उसने बाहर चाँदनी की सफेद चादर देखी । वहाँ से थी। महेन्द्र को पसीना छूट गया और हाँफते हुए अपने तकिये पर पीछे गिर गया। जैसे ही वह भूत प्रेतात्मा के अनुभव से धीरे-धीरे होश में आया वह अपने मन तर्क करने लगा, और अन्ततोगत्वा यह निष्कर्ष निकाला कि वह किसी प्रकार की मनःप्रसूत कल्पना होगी, वह उसके अवचेतन मस्तिष्क द्वारा उस पर खेली चाल होगी।
प्रात:काल वह उठ गया, स्नान किया और नाश्ता करने के लिए बाहर आया। गत रात्रि का भय उसकी स्मृति से समाप्त हो गया था। ईश्वरन ने महेन्द्र को दरवाजे पर लंच पैकेट और उसका बैग दिया और नमस्कार किया। जैसे ही महेन्द्र बाहर निकलने वाला था ईश्वरन मुस्कराया और कहा, “श्रीमान, याद कीजिए कि मैं एक दिन आपको स्त्री भूत, जिसके हाथों में भ्रूण था, के बारे में सुना रहा था” आप कल्पित चीजों के लिए मुझ पर क्रुद्ध हो गए थे। अच्छा, अब तो आपने स्वयं गत रात्रि उस स्त्री को भूत देख लिया । आपके कमरे से रोने की आवाज जो बाहर आ रही थी, उसको सुनने के लिए मैं दौड़ा….”
महेन्द्र की रीढ़ की हड्डी में ठंडी लहर दौड़ गई। उसने ईश्वरन के वाक्य समाप्त करने की प्रतीक्षा नहीं की। वह तेजी से अपने कार्यालय में पहुँचा और अपना त्याग पत्र दे दिया। उसने संकल्प किया कि वह अगले दिन ही भूतों के डेरे को छोड़ देगा।
LONG ANSWER TYPE QUESTIONS
(To be answered in about 100 words )
Q1. How does Iswaran narrate the story of the tusker ? Does it appear to be possible ?
(ईश्वरन हाथी की कहानी को किस प्रकार सुनाता है? क्या ऐसा होना सम्भव प्रतीत होता है ? )
Ans. One day a tusker entered a school ground where children were playing. The tusker broke through the brick wall. All the boys ran into the classrooms and closed the door tight. The teachers had climbed up to the terrace of the school building. They were helplessly watching the tusker’s attacks which were destroying things.
Iswaran was studying in the junior class at that time. He was watching the whole drama from the rooftop. Suddenly he was possessed by some power. He grabbed a cane from the hands of his teacher. He ran down the stairs and then into the ground. The tusker grunted and menacingly swung a branch of a tree which it held in its trunk. It stamped its feet. It picked up a lot of mud and dust. It looked frightening.
Iswaran slowly moved towards the tusker, stick in hand. The tusker looked at him red-eyed. It was ready to rush towards him. It lifted its trunk and trumpeted loudly. At that moment he moved forward and whacked its third toenail heavily with cane.
The tusker looked stunned for a moment. Then it shivered from head to foot and collapsed. This story does not appear to be plausible.
[एक दिन एक हाथी ने स्कूल के मैदान में प्रवेश किया जहाँ बच्चे खेल रहे थे। वह हाथी ईंटों की दीवार तोड़कर अंदर आया । सब बच्चे कक्षाओं में भाग गए और दरवाजों को कसकर बंद कर लिया। अध्यापक गण विद्यालय भवन के छज्जे पर चढ़ गए। वे निस्सहाय होकर हाथी के विनाशकारी आक्रमण को देख रहे थे।
ईश्वरन उस समय जूनियर कक्षा में पढ़ता था। वह छत से सब नाटक देख रहा था। अचानक ही उस पर कोई शक्ति हावी हो गई। उसने अपने अध्यापक के हाथ से छड़ी छीनी। वह जीने से दौड़कर नीचे गया फिर मैदान में आ गया। हाथी चिंघाड़ा और डराने की दृष्टि से पेड़ की एक शाखा को जो उसने अपनी सूँड़ में पकड़े हुई थी, घुमाने लगा। उसने अपना पैर जमीन पर मारा। उसने लात मारकर बहुत-सी कीचड़ और धूल उड़ाई। वह डरावना लग रहा था।
ईश्वरन धीरे से हाथी की ओर सरका, उसके हाथ में छड़ी थी। हाथी ने लाल आँखें निकालकर उसकी ओर देखा। वह उसकी ओर दौड़ने को तैयार था। उसने अपनी सूँड़ ऊपर उठाई और जोर से चिंघाड़ा। उस समय ईश्वरन आगे बढ़ा और हाथी के तीसरे नाखून पर छड़ी से जोर से प्रहार किया।
हाथी कुछ क्षण स्तब्ध रह गया। तब वह सिर से पैर तक काँपा और धड़ाम से नीचे गिर गया। यह कहानी सत्याभासी प्रतीत नहीं होती है ।]
Q.2. Mahendra calls ghosts or spirits a figment of the imagination. What happens to him on a full-moon night ?
( महेन्द्र भूत या प्रेत को काल्पनिक गढ़ी हुई बात कहता है । पूर्णमासी की रात्रि को उसके साथ क्या घटना होती है ? )
Ans. Iswaran tells the story of a horrible ghost of a woman which appears off and on at midnight during the full moon.
Mahendra shivered at the description. He says there are no such things as ghosts or spirits. It is all a figment of Iswaran’s imagination.
It was a full-moon night. Mahendra heard a low moan close to his window. He woke up. At first he thought it was a cat searching for mice. He resited the curiosity to look out lest he should see a sight which would stop his heart. At last he looked out. There, not too far away, was a dark cloudy form clutching a bundle. Mahendra broke into a cold sweat and fell back on the pillow, panting..
When he recovered from the ghastly experience, he concluded that it must have been some trick that his subconscious had played on him.
[ईश्वरन एक भयानक पिशाचिनी की कहानी सुनाता है जो पूर्णमासी की अर्द्धरात्रि को प्रायः प्रकट होती है।
महेन्द्र वर्णन सुनकर काँप गया। वह कहता है कि भूतं या प्रेत जैसी कोई चीज नहीं होती। यह सब ईश्वरन की कल्पना की गढ़ी हुई बात है।
यह पूर्णमासी की रात्रि थी। महेन्द्र ने अपनी खिड़की के पास एक धीमा रुदन सुना। वह जाग गया। पहले तो उसने सोचा कि वह बिल्ली है जो चूहों की खोज कर रही है। उसने बाहर देखने की जिज्ञासा को रोका कि कहीं ऐसा न हो कि वह ऐसा दृश्य देखे जिससे उसके हृदय की गति रुक जाए। अन्त में उसने बाहर की ओर देखा। कोई अधिक दूर नहीं, एक काले बादल जैसी आकृति थी जिसके हाथ में एक बंडल था । महेन्द्र को ठण्डा पसीना आ गया, और हाँफते हुए तकिए पर पीछे की ओर गिर पड़ा।
जब वह भूत के अनुभव से होश में आया, उसने निष्कर्ष निकाला कि उसके अवचेतन मस्तिष्क ने उस पर चाल चली है।]
SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS
of interpretative and evaluative nature
(To be answered in 30-40 words)
Q.1. How does Iswaran describe the uprooted tree on the highway? What effect does he want to create in his listeners?
(ईश्वरन राजमार्ग पर उखड़े हुए पेड़ का वर्णन किस प्रकार करता है ? वह अपने श्रोताओं में क्या प्रभाव उत्पन्न करना चाहता है ? )
Ans. Iswaran describes the uprooted tree on the highway as, “The road was deserted and I was alone. Suddenly I spotted something that looked like an enormous busy beast lying sprawled across the road.”
He wanted to create suspense and surprise in his listeners.
( ईश्वरन राजमार्ग पर उखड़े हुए पेड़ का वर्णन इस प्रकार करता है, “सड़क निर्जन थी और मैं अकेला था। अचानक ही मैंने कोई चीज देखी जो विशाल झाड़ीदार पशु जो सड़क पर फैले हुए पड़ा था के समान दिखाई देती थी।”
वह अपने श्रोताओं में असमंजस और आश्चर्य उत्पन्न करना चाहता था । )
Q.2. Why does the author say that Iswaran seemed to more than make up for the absence of a TV in Mahendra’s living quarters ?
(लेखक क्यों कहता है कि ईश्वरन महेन्द्र के रहने के क्वार्टर्स में टीवी की कमी से भी अधिक पूर्ति करने वाला प्रतीत होता था । )
Ans. Iswaran told stories for Mahendra’s entertainment, information, suspense and surprise, which a TV could not do. He served as a pastime device for Mahendra amicably.
( ईश्वरन महेन्द्र के मनोरंजन, सूचना, असमंजस और आश्चर्य के लिए कहानी सुनाता था, जो एक टीवी नहीं कर सकता था। वह महेन्द्र के लिए मैत्रीपूर्ण ढंग से मनोरंजन यन्त्र के समान कार्य करता था। )
Q.3. Can you think of some other ending for the story?
(क्या आप कहानी का कोई दूसरा अन्त सोच सकते हैं ? )
Ans. Yes, there can be another ending for the story. When Iswaran said that he came running hearing the sound of moaning that was coming from his room, Mahendra asked him to stop that nonsense. It was Iswaran who appeared before him as a dark cloudy form clutching a bundle.
(हाँ, कहानी का दूसरा अन्त भी हो सकता है।
जब ईश्वरन ने कहा कि वह रोने की आवाज सुनकर दौड़ा आया जो उसके कमरे से आ रही थी, महेन्द्र ने उसे बकवास बन्द करने के लिए कहा। वह ईश्वरन ही था जो काले बादल की आकृति के रूप में प्रकट हुआ, उसके हाथ में एक बंडल था । )
VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS
based on factual aspects of the lesson
(To be answered in 20-30 words)
Q. 1. In what way is Iswaran an asset to Mahendra ?
(ईश्वरन किस प्रकार महेन्द्र के लिए एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है ? )
Ans. Iswaran was the cook of Mahendra. Iswaran was quite attached to Mahendra and followed him without any complaint wherever he was posted. He cooked for Mahendra, washed his clothes and chatted away with his master at night. Thus Iswaran was an asset to Mahendra.
(ईश्वरन महेन्द्र का रसोइया था। वह महेन्द्र से बिल्कुल जुड़ा हुआ था और महेन्द्र की जहाँ भी नियुक्ति होती है, बिना किसी शिकायत के उसके साथ-साथ जाता था। वह महेन्द्र का भोजन बनाता था, उसके कपड़े धोता था, रात में अपने स्वामी के साथ बातचीत करता था। इस प्रकार, ईश्वरन महेन्द्र के लिए एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति था । )
Q. 2. How does Iswaran narrate the story of the tusker? Does it appear to be plausible?
(ईश्वरन हाथी की कहानी किस प्रकार सुनाता है? क्या यह कहानीं सत्याभासी प्रतीत होती है ? )
Ans. One day a tusker entered Iswaran’s school. Students closed the doors of their rooms. Teachers climbed atop the rooms. Iswaran moved forward and whacked its third toenail heavily with a cane. The tusker shivered and collapsed.
The story does not appear to be plausible.
(एक दिन एक हाथी ईश्वरन के स्कूल में घुस आया। विद्यार्थियों ने कमरों के दरवाजे बन्द कर लिए। अध्यापक कमरों की छत पर चढ़ गए। ईश्वरन आगे बढ़ा और हाथी के पैर के तीसरे नाखून पर बेंत का जोर से प्रहार किया। हाथी काँपा और बेहोश होकर गिर पड़ा।
कहानी सत्याभासी प्रतीत नहीं होती । )
