UK Board 9th Class English – (Supplementary Reader) – Chapter 6 Weathering the Storm in Ersama
UK Board 9th Class English – (Supplementary Reader) – Chapter 6 Weathering the Storm in Ersama
UK Board Solutions for Class 9th English – (Supplementary Reader) – Chapter 6 Weathering the Storm in Ersama
WEATHERING THE STORM IN ERSAMA (Harsh Mander)
[उड़ीसा में आए अक्टूबर 1999 के चक्रवात ने हजारों लोगों की जान ले ली और सैकड़ों घर उजाड़ दिए। एक युवक प्रशान्त दो भयानक रातों तक एक मकान की छत पर असहाय पड़ा रहा। तीसरे दिन उसने अपने गाँव जाने का निश्चय किया। क्या उसको अपना परिवार मिला?]
SUMMARY OF THE STORY
Seven years after his mother’s death, Prashant, a youngman, went to see his friend at Ersama. It was a small town in coastal Orissa. It was some eighteen kilometres from his village Kalikuda.
In the evening, a cyclone hit the village. Heavy and continuous rain brought about havoc. The water moved into his friend’s house, neck deep. The velocity of the wind was 350 km per hour. Houses had fallen. Trees were uprooted. People and animals flowed with the current. The cyclone continued for the next 36 hours.
To escape the waters rising in the house, Prashant and his friend’s family took refuge on the roof. Two coconut trees fell on the roof of their house. The tender coconuts from the trees supplied food to the family for several days. Prashant had to stay there for the next two days.
Then Prashant left for his village to seek out his family. He took a long sturdy stick to guide him through the waters. After some distance, he found two friends of his uncle who were also returning to their village. In every village that they passed, there was barely a house standing. Prashant was sure that his family could not have survived this catastrophe.
Prashant reached his village. Where his home once stood. There were only remnants of its roof. He went to the Red Cross shelter to look for his family. He saw his maternal grandmother. They had long given him up for dead. As the news spread, his family members reached there.
He came to know that 86 lives were lost in the village and all the 96 houses had been washed away. There were 2500 people in the shelter. It was their fourth day as the shelter. They had survived on green coconuts so far.
Prashant became their leader. He organised a group of people. He sent a delegation to the merchant who gave them rice. People cooked the rice. For the first time in four days, the survivors were able to fill their bellies.
On the fifth day, a military helicopter flew over the shelter and dropped some food parcels. It then did not return. Prashant deputed the children to lie in the sand with empty utensils on their stomaches. After that the helicopters made regular rounds of the shelter, air dropping food and other basic needs.
Prashant persuaded the women to work for food in an NGO programme. He organised sports events for the children. Prashant and other volunteers of his group resettled widows and children in their own community itself, possibly in new foster families made up of childless widows and children without adult care. It is six months after the devastation of the super cyclone that the widows and orphaned children of his village seek help of Prashant in their hour of grief.
सम्पूर्ण कहानी का हिन्दी रूपान्तर
अपनी माता की मृत्यु के सात वर्ष पश्चात्, 27 अक्टूबर, 1999 को प्रशान्त अपने मित्र के पास एक दिन के लिए एरसामा गया। वह ब्लाक मुख्यालय था। उड़ीसा के तट पर छोटा-सा कस्बा था। उसके गाँव से यह लगभग अठारह किलोमीटर की दूरी पर था। शाम को एक काला, खतरनाक और हानिकारक तूफान एकदम आ गया। हवाएँ ऐसी गति और क्रोध से मकानों पर प्रहार कर रही थीं कि प्रशान्त ने उनको पहले कभी नहीं देखा था। घनघोर और लगातार वर्षा से अंधकार छा गया। पुराने पेड़ उखड़ गए और भूमि पर गिर पड़े।
चीखें हवा में गूँज रही थीं क्योंकि लोग और मकान तेजी से बहे जा रहे थे।
क्रुद्ध पानी उसके मित्र के घर में भँवर के रूप में बह आया और वह गर्दन की ऊँचाई तक पहुँच गया। इमारत ईंट और सीमेंट से बनी थी और इतनी मजबूत थी कि 350 किमी प्रति घण्टे की गति से चलने वाली हवा के विनाशकारी प्रहार को सहन कर खड़ी रही। पर परिवार का आतंक उस समय गहरा था जब उखड़े हुए पेड़ उनके मकान पर जा पड़े। यह आधी रात के आसपास हुआ और उन पेड़ों ने मकान की छत और दीवारों को क्षति पहुँचाई।
चक्रवात के कारण भारी विनाश हुआ और समुद्र की लहरों का प्रवाह अगले 36 घण्टों तक जारी रहा, यद्यपि हवा की गति अगले दिन सुबह को कुछ कम हो गई थी। मकान में बढ़ते हुए पानी से बचने के लिए प्रशान्त और उसके मित्र का परिवार छत पर शरण लेने आ गए थे। प्रशान्त उस आघात को कभी नहीं भूलेगा जो उसे उषाकाल में अनुभव हुआ जब उसने विशेष चक्रवात द्वारा किए गए विनाश की प्रथम झलक देखी । जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी, प्रत्येक चीज को ढके हुए विनाशकारी, घातक, भूरे रंग की पानी की चादर दिखाई देती थी, केवल कुछ स्थानों में सीमेंट से बने कुछ टूटे-फूटे मकान दिखाई देते थे। पशुओं और आदमियों के शव जो पानी भरने से फूल गए थे, सब दिशाओं में पानी पर उतरा रहे थे। चारों ओर विशाल पुराने पेड़ भी गिर चुके थे। उनके मकान की छत पर नारियल के दो पेड़ गिर गए थे। यह एक तरह से वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि उन पेड़ों पर लगे कोमल नारियलों ने आगे कई दिन तक फँसे हुए परिवार को भुखमरी से बचाए रखा।
अगले दो दिन प्रशांत अपने मित्र के परिवार के साथ छत पर खुले आसमान के नीचे सिमटा रहा। वे ठंडी और लगातार वर्षा के कारण बर्फ की तरह जम गए। वर्षा के पानी ने प्रशान्त के आँसुओं को धो डाला। केवल एक ही विचार उसके मस्तिष्क में कौंधता रहा कि क्या उसका परिवार इस भयंकर चक्रवात के क्रोध से बचकर जीवित है। क्या उसे पुन: एक बार शोक संतप्त होना पड़ेगा ?
दो दिन पश्चात् जो उसे दो वर्ष के समान लगे, वर्षा रुक गई और वर्षा का जल धीरे-धीरे उतरने लगा। अब और विलम्ब किए बिना, प्रशान्त ने अपने परिवार को खोजने का निश्चय किया । पर स्थिति अब भी खतरनाक थी और उसके मित्र के परिवार ने प्रशान्त से थोड़े दिन और ठहरने का निवेदन किया। पर प्रशान्त जानता था कि उसे जाना है।
वह एक लम्बी, मजबूत लाठी से लैस होकर अठारह किलोमीटर दूर अपने गाँव के लिए बाढ़ के कारण बढ़े हुए पानी में से होता हुआ रवाना हो गया। वह ऐसी यात्रा थी जिसको वह कभी नहीं भूला। वह सड़क ज्ञात करने के लिए अपनी लाठी का प्रयोग लगातार करता रहा। यह जानने के लिए पानी सबसे ज्यादा उथला कहाँ है।
कई स्थानों पर पानी कमर तक आ गया और प्रगति में सुस्ती आ गई। बहुत से बिन्दुओं पर उससे सड़क छूट गई और उसे तैरना पड़ा। कुछ दूरी के बाद, उसके चाचा के दो मित्र उसे मिले, वह चिंता से मुक्त हुआ। वे भी अपने गाँव वापस जा रहे थे। उन्होंने मिलकर आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
जैसे ही वे पानी को चीरते हुए आगे बढ़े उन्होंने देखा कि दृश्य अधिकाधिक बीभत्स हो रहा है। उनको बहुत से आदमियों के शवों को हटाना पड़ा। वे शव आदमियों, औरतों और बच्चों के थे और कुत्तों, बकरियों तथा पशुओं की लाशें – जैसे वे आगे बढ़े जलधारा उनको बहा लाई थी। प्रत्येक गाँव में जिनके पास से वे गुजरे, मुश्किल से ही कोई मकान खड़ा दिखाई दिया। अब प्रशान्त बड़े जोर से और बहुत देर तक रोया। वह पूर्णत: शंकित हो गया कि उसका परिवार इस महाविपत्ति से नहीं बच सका होगा।
अन्ततोगत्वा, प्रशांत अपने गाँव कालीकुड़ा आ पहुँचा। वह निराश हुआ। जिस स्थान पर उनके मकान बने हुए थे वहाँ छत का केवल कुछ भाग शेष था। गहरे पानी से ऊपर पेड़ों की शाखाओं में उनका कुछ सामान उलझा हुआ था, जो दबा हुआ और मुड़ा हुआ दिखाई देता था। युवक प्रशान्त ने अपने परिवार की खोज करने के लिए रेडक्रॉस के आश्रम पर जाने का निश्चय किया ।
भीड़ में उसने जो पहले लोग देखे उनमें उसे अपनी नानी दिखाई दी। भूख से क्षीण, हाथ फैलाए, अपनी आँखों में आँसू भरे वह प्रशान्त की ओर दौड़ी। वह चमत्कार था। वे लोग बहुत पहले से प्रशान्त को मरा हुआ समझ बैठे थे।
तेजी से खबर फैल गई और उसका इधर-उधर बिखरा हुआ बड़ा परिवार उसके चारों ओर एकत्र हो गया और राहत महसूस करते हुए उसका कसकर आलिंगन किया। प्रशान्त ने बेचैनी से उन लोगों के समूह को तेजी से देखा जो भानुमती का पिटारा था, उनके हुलिए बिगड़े हुए थे। उसका भाई और बहन, उसके चाचा और चाचियाँ सब वहाँ दिखाई दिए।
अगले दिन सुबह तक, देखी, उसने अपने ऊपर नियन्त्रण करने का निर्णय लिया। उसने भाँप लिया जैसे प्रशान्त ने आश्रम में घृणाजनक स्थिति कि आश्रम में 2500 लोगों की जो भारी भीड़ है उस पर घातक दुःख छाया हुआ है। गाँव में 86 लोगों की जानें गईं। गाँव के सभी 96 मकान बह गए। आश्रम में यह उनका चौथा दिन था। अब तक वे कच्चे नारियल खाकर जीते रहे। पर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो उस अव्यवस्थित भीड़ का शोर सुने।
प्रशान्त ने, जो उन्नीस वर्ष का था, निश्चय किया कि यदि कोई व्यक्ति तैयार नहीं होता तो वह गाँव के नेता के स्थान पर काम करेगा। उसने युवकों और वयोवृद्ध का एक समूह संगठित किया। वे लोग मिलकर व्यापारी पर एक बार पुनः दबाव डालें कि वह चावल दे दे। इस बार शिष्टमंडल सफल रहा। वे उतरते हुए पानी को चीरते हुए सम्पूर्ण आश्रम के लिए भोजन लेकर सफलतापूर्वक लौटे। किसी ने परवाह नहीं की कि चावल पहले से ही सड़ा हुआ है। गिरे हुए पेड़ों की शाखाएँ तोड़ी गईं, उनसे आग अनिच्छापूर्वक और धीरे-धीरे जली और उस पर चावल पकाए गए। चार दिन में पहली बार चक्रवात आश्रम पर जीवित बचे लोगों ने पेट भरकर खाना खाया। उसका अगला कार्य युवक स्वयंसेवकों की टीम संगठित करना था जो आश्रम से गंदगी, पेशाब, उल्टी और पानी पर उतराती हुई लाशों को साफ करेंगे और बहुत-से लोग जो घायल हो गए हैं उनकी चोट और टूटी हुई हड्डियों की देखभाल करेंगे।
पाँचवें दिन, एक सैनिक हेलीकॉप्टर आश्रम के ऊपर उड़ा और भोजन के कुछ पार्सल नीचे डाले। उसके बाद वह नहीं लौटा।
युवक सेना ने आश्रम से खाली बर्तन एकत्र किए। तब उन्होंने बच्चों को रेत पर लेटने के लिए नियुक्त किया। वह रेत आश्रम के चारों ओर पानी के जाने के बाद वहाँ पड़ा हुआ था। बच्चों ने उन बर्तनों को अपने पेटों के ऊपर रख लिया।
यह वहाँ से गुजरने वाले हेलीकॉप्टरों को संदेश देने के लिए किया गया कि वे भूखे हैं। उनको संदेश मिल गया और तत्पश्चात हेलीकॉप्टर आश्रम पर नियमित रूप चक्कर लगाने लगे और भोजन तथा अन्य मौलिक आवश्यकताओं के पार्सल नीचे गिराने लगे।
प्रशांत ने देखा कि बहुत बड़ी संख्या में बच्चे अनाथ हो गए हैं। उसने उनको इकट्ठा किया और पोलीथीन का तंबू उनके ऊपर लगा दिया। औरतों को उनकी देखभाल करने के लिए तैयार किया गया और आदमियों को आश्रम के लिए भोजन और सामग्री प्राप्त करने के लिए तैयार किया गया।
जैसे-जैसे हफ्ते बीतते गए, प्रशान्त ने तेजी से पहचाना कि औरतें और बच्चे अपने दुःख की गहराई में अधिकाधिक डूब रहे हैं। प्रशान्त ने औरतों को NGO द्वारा चलाए गए कार्यक्रम – कार्य के बदले भोजन – में काम करने के लिए राजी किया। और बच्चों के लिए उसने विविध खेलकूद संगठित किए। वह स्वयं क्रिकेट खेलना पसन्द करता था। अत: उसने बच्चों के लिए क्रिकेट मैचों का आयोजन किया। प्रशान्त अपने अन्य स्वयंसेवकों के साथ व्यस्त था कि विधवाओं और बच्चों के जीवन में टूटे पहलुओं को जोड़ने में उनकी सहायता की जाए। सरकार की प्रारम्भिक योजना यह थी कि अनाथों और विधवाओं के लिए संस्थान स्थापित किए जाएँ। फिर भी सरकार के इस कदम को सफलतापूर्वक रोक दिया गया क्योंकि यह अनुभव किया गया कि बच्चे पल तो जाएँगे पर उन्हें प्रेम नहीं मिलेगा और विधवाएँ अपमान के चिह्न और सूनेपन की शिकार हो जाएँगी ।
प्रशान्त के समूह का विश्वास है कि अनाथों को इनकी ही बिरादरी में पुनः स्थापित किया जाए। यदि संभव हो सके तो अनाथों का ऐसे परिवारों में पालन-पोषण किया जाए जहाँ विधवाएँ संतानहीन हों और बच्चों की देखभाल करने वाला कोई वयस्क न हो।
विशेष चक्रवात के विनाश के छह महीने बीत गए। इस समय प्रशान्त की आत्मा के घाव केवल इसलिए भर गए कि उसके पास अपने निजी कष्टों की चिन्ता करने के लिए समय नहीं था। उसके गाँव की विधवाएँ और अनाथ बच्चे अपनी सबसे तीव्र दुःख की घड़ी में प्रशान्त के सुन्दर युवा चेहरे को खोजते हैं।
LONG ANSWER TYPE QUESTIONS
(To be answered in about 100 words)
Q.1. How has Prashant, a teenager, been able to help the people of his village?
(प्रशान्त जो किशोरावस्था में था, अपने गाँव के लोगों की सहायता किस प्रकार कर सका ? )
Ans. When Prashant studied the hopeless situation of the shelter, he came to know that 2500 persons were in the shelter, eighty-six lives were lost in the village and all the ninety-six houses had been washed away. It was their fourth day at the shelter. So far they had survived on green coconuts, but nobody got ready to lead the people. Prashant, all of nineteen years, decided to step in as leader of his village. He organised a group of youths and elders. They were sent to the merchant to part with his rice. The group succeeded in having the rice, though it was already rotting. They cooked it. For the first time in four days, the people were able to fill their bellies.
Prashant’s next task was to organise a team of youth volunteers to clean the shelter of filth, urine, vomit and floating human dead bodies, and to tend to the wounds and fractures of the injured.
Thus Prashant has been able to help the people of his village.
[ जब प्रशान्त ने आश्रम की निराशाजनक स्थिति का अध्ययन किया, तो उसे ज्ञात हुआ कि आश्रम में 2500 व्यक्ति थे, गाँव में 86 लोग मर चुके थे और गाँव के सभी 96 मकान पानी में बह गए थे। उनका आश्रम में चौथा दिन था। अब तक वे लोग कच्चे नारियल खाकर जीवित रहे थे, पर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो उन लोगों का मार्गदर्शन करता ।
प्रशान्त, जो केवल 19 वर्ष का ही था, ने गाँव को नेतृत्व प्रदान करने का निश्चय किया। उसने युवकों तथा वयस्कों का एक समूह संगठित किया। उनको व्यापारी के पास भेजा गया कि वह चावल दे। समूह चावल प्राप्त करने में सफल रहा, यद्यपि वह पहले से ही सड़ रहा था। उन्होंने चावल पकाया। चार दिनों में पहली बार लोग अपना पेट भर सके।
प्रशान्त का दूसरा कार्य युवक स्वयंसेवकों की एक टीम संगठित करना था जो आश्रम की गन्दगी, पेशाब, उल्टी और बहती हुई मानव लाशें साफ करें और घायलों के घाव और अस्थिभंगों की देख-रेख करें।
इस प्रकार प्रशान्त अपने गाँव के लोगों की सहायता कर सका ।]
Q. 2. How have the people of the community helped one another? What role do the women of Kalikuda play during these days?
(समुदाय के लोगों ने एक-दूसरे की सहायता किस प्रकार की ? कालीकुडा की स्त्रियों ने इन दिनों किस भूमिका का निर्वाह किया ? )
Ans. Introduction : On the fifth day, a military helicopter flew over the shelter and dropped some food parcels. It then did not return.
Work of the people of the community: The youth task force gathered empty utensils from the shelter. Then they deputed the children of lie in the sand around the shelter with these uttensils on their stomachs, to communicate to the passing helicopters that they were hungry. The message got through. The helicopters made regular rounds of the shelter, dropping food and other basic needs.
Role of the women of Kalikuda: The orphan children were brought together. The women looked after them, while the men secured food and materials for the shelter. The women were persuaded to start working in the food for work programme started by an N.G.O.
Conclusion: Thus the people of the community helped one another and the women of Kalikuda played an important role in those days..
[भूमिका – पाँचवें दिन, एक मिलिटरी हेलीकॉप्टर आश्रम के ऊपर उड़ा और भोजन के पार्सल नीचे डाले। इसके बाद वह नहीं आया।
समुदाय के लोगों का कार्य — युवा कार्यबल ने आश्रम से खाली बर्तन एकत्र किए। तब उन्होंने बच्चों को आश्रम के चारों ओर इन बर्तनों को अपने पेट पर रखकर लेटने के लिए नियुक्त किया जिससे वे वहाँ से गुज़रने वाले हेलीकॉप्टरों को सम्प्रेषण कर सकें कि वे भूखे हैं। हेलीकॉप्टरों ने आश्रम के नियमित रूप से चक्कर लगाए और भोजन तथा अन्य मौलिक आवश्यकताएँ नीचे डालते रहे।
कालीकुडा की स्त्रियों की भूमिका – अनाथ बच्चे एक जगह लाए गए। स्त्रियों ने उनकी देखभाल की, जबकि आदमियों ने आश्रम के लिए भोजन और सामग्री प्राप्त की। एन०जी०ओ० द्वारा चलाए गए ‘काम के बदले भोजन’ कार्यक्रम में भाग लेने के लिए स्त्रियों को रजामन्द किया गया।
निष्कर्ष – इस प्रकार समुदाय के लोगों ने एक-दूसरे की सहायता की और इन दिनों कालीकुडा की स्त्रियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।]
SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS
of interpretative and evaluative nature
(To be answered in 30-40 words)
Q.1. How have the people of the community helped one another?
(समुदाय के लोगों ने एक-दूसरे की सहायता किस प्रकार की ? )
Ans. The people of the community communicated to the passing helicopters that they were hungry. They message got through. The helicopters made regular rounds of the shelter, air droppining food and other basic needs.
(समुदाय के लोगों ने गुजरने वाले हेलीकॉप्टरों को सम्प्रेषण भेजा कि वे लोग भूखे हैं। संदेश ने काम किया। हेलीकॉप्टरों ने आश्रम के नियमित रूप से चक्कर लगाए और भोजन तथा अन्य मौलिक आवश्यकताएँ ऊपर से डालीं। )
Q. 2. What role do the women of Kalikuda play during these days?
(इस कालखण्ड में कालीकुडा की स्त्रियों ने क्या भूमिका अदा की? )
Ans. The woman of Kalikuda looked after the orphan children who were brought together. They started working in the food-for-work programme started by an NGO.
(कालीकुडा की औरतों ने एक जगह इकट्ठे किए गए अनाथ बच्चों की देखभाल की। उन्होंने एन०जी०ओ० द्वारा संचालित काम के बदले भोजन कार्यक्रम में कार्य किया । )
Q.3. Why do Prashant and other volunteers resist the plan to set up institutions for orphans and widows?
(प्रशान्त और अन्य स्वयंसेवकों ने अनाथों और विधवाओं के लिए संस्थाएँ स्थापित करने की योजना का क्यों अवरोध किया?)
Ans. The initial government plan was to set up institutions for orphans and widows. But it was felt that in such institutions, children would grow up without love, and widows would suffer from disgrace and loneliness. So it was resisted by Prashant and other volunteers.
(सरकार की प्रारम्भिक योजना अनाथों और विधवाओं के लिए संस्थाएँ स्थापित करने की थी। पर यह महसूस किया गया कि ऐसी संस्थाओं में बच्चे बिना प्रेम पाले जाएँगे और विधवाएँ अपमान और सूनेपन से पीड़ित होंगी। अतः इस योजना का विरोध प्रशान्त और अन्य स्वयंसेवकों द्वारा किया गया।)
VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS
based on factual aspects of the lesson
(To be answered in 20-30 words)
Q.1. What havoc has the super cyclone wreaked in the life of the people of Orissa?
(उड़ीसा के लोगों के जीवन में भयंकर चक्रवात ने क्या विनाश कर दिया है? )
Ans. The super cyclone that hit Orissa in December. 1999 killed thousands of people and devastated hundreds of villages. For two dreadful nights people were marooned on the roof of their houses. (भयंकर चक्रवात ने जिसने उड़ीसा पर दिसम्बर 1999 में आक्रमण किया हजारों लोगों को मार दिया और सैकड़ों गाँव को बर्बाद कर दिया। लोग अपने मकानों की छतों पर दो भयानक रात्रियों में असहाय होकर बैठे रहे । )
Q.2. How has Prashant, a teenager, been able to help the people of his village ?
(प्रशान्त, जो किशोर था, अपने गाँव के लोगों की सहायता किस प्रकार कर सका ? )
Ans. Prashant, a teenager, became a leader to help the people of his village. He organised groups to bring rice from the merchant. He appointed some volunteers to clean the shelter and tend the injured.
(प्रशान्त, जो किशोर था, अपने गाँव के लोगों की सहायता करने के लिए उनका नेता बन गया। उसने व्यापारी से चावल लाने के लिए समूह संगठित किए। उसने कुछ स्वयंसेवक नियुक्त किए ताकि वे आश्रम की सफाई और घायलों की देखभाल करें।)
Q.3. Do you think Prashant is a good leader ? Do you think young people can get together to help people during natural calamities?
( क्या यह कहना उचित है कि प्रशान्त में नेतृत्व क्षमता है? क्या आप सहमत हैं कि युवा वर्ग के लोगों को प्राकृतिक आपदा के समय एकजुट होकर सहायता कार्य में जुट जाना चाहिए ? )
Ans. Certainly it is right to say that Prashant is a good leader. It is a moral and social duty of young people to get together to help people during natural calamities.
(निश्चित रूप से यह कहना सही होगा कि प्रशान्त में नेतृत्व क्षमता विद्यमान है। युवा वर्ग के लोगों का यह नैतिक व सामाजिक दायित्व हो जाता है कि वे एकजुट होकर प्राकृतिक आपदा से जूझ रहे लोगों की सहायता करें। )
