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UP Board Class 10 Hindi Chapter 7 – निबन्ध रचना (व्याकरण)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 7 – निबन्ध रचना (व्याकरण)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7 निबन्ध रचना (व्याकरण)

निबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा
फ्रांसीसी शब्द एसाई से निर्मित, अंग्रेज़ी के शब्द ‘एस्से’ (Essay) को हिन्दी में ‘निबन्ध’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है-‘ प्रयत्न’ या किसी विषय पर गद्य में लिखी गई छोटी साहित्यिक रचना ।
हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक ‘डॉ. श्यामसुन्दर दास’ की निबन्ध विषयक परिभाषा है”निबन्ध वह लेख होता है, जिसमें किसी गहन विषय पर विस्तृत और पाण्डित्यपूर्ण विचार किया जाता है। “
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने निबन्ध को ‘गद्य की कसौटी’ बताया है।
निबन्ध के अंग
निबन्ध लेखन एक कौशल है। एक श्रेष्ठ निबन्ध के निम्नलिखित अंग होते हैं
  • भूमिका भूमिका निबन्ध का महत्त्वपूर्ण अंग है। इसे ‘विषय प्रवेश’ अथवा ‘प्रस्तावना’ भी कहा जाता है। भूमिका या प्रस्तावना के अन्तर्गत विषय का परिचय दिया जाता है।
  • विषय का विस्तार यह अंश निबन्ध का ‘मध्य भाग’ कहलाता है। इसमें विषय से सम्बन्धित जो भी सामग्री होती है, उसे क्रमबद्ध रूप से अलग-अलग अनुच्छेदों में विभाजित करके प्रस्तुत किया जाता है।
  • उपसंहार निबन्ध का अन्तिम भाग ‘उपसंहार’, ‘निष्कर्ष’ अथवा ‘समापन’ कहलाता है। इस भाग के अन्तर्गत निबन्ध में कही गई बातों को सारांश के रूप में प्रकट किया जाता है। निबन्ध का अन्त ऐसा होना चाहिए कि उसका स्थायी प्रभाव पाठक पर पड़ सके।
निबन्ध को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव
उत्तम निबन्ध लेखन के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए
  1. पहले निबन्ध के शीर्षक को भली-भाँति समझना चाहिए, फिर उससे सम्बन्धित जितने भी विचार मन-मस्तिष्क में उठें, उन्हें रूपरेखा के रूप में लिख लेना चाहिए।
  2. निबन्ध में मुख्य विषय से हटकर इधर-उधर की बातें लिखकर अनावश्यक विस्तार नहीं करना चाहिए।
  3. निबन्ध की भाषा सरल, सरस, रोचक व प्रभावशाली होनी चाहिए।
  4. विभिन्न सूक्तियों, लोकोक्तियों व मुहावरों के यथास्थान प्रयोग से निबन्ध को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
  5. विषयानुसार निबन्धों में भी भिन्न-भिन्न शैलियों का प्रयोग किया जाना चाहिए; जैसे- साहित्यिक निबन्धों में तत्सम शब्दों से युक्त परिष्कृत शैली तथा सूक्तिपरक निबन्धों में दृष्टान्तों, घटनाओं व उदाहरणों से उसे पुष्ट करना चाहिए ।
खण्ड I: वैज्ञानिक
1. मोबाइल के दुष्परिणाम
अन्य शीर्षक मोबाइल फ़ोन से लाभ और हानि,
मोबाइल फोन, मोबाइल फोन के अति प्रयोग से सम्भावित हानियाँ
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, सुविधाओं का खजाना, जीवन-शैली का अभिन्न हिस्सा, उपसंहार ।
प्रस्तावना ‘मोबाइल’ अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- गतिशील। इस प्रकार मोबाइल फ़ोन का अर्थ है – एक ऐसा दूरभाष यन्त्र, जिसे मनुष्य जहाँ चाहे ले जा सके और हमेशा अपने साथ रख सके। मोबाइल फ़ोन की इसी खूबी ने इसे घर-घर तक पहुँचा दिया है। मोबाइल फ़ोन के माध्यम से व्यक्ति कहीं भी रहकर विश्व के किसी भी क्षेत्र में रह रहे लोगों से सम्पर्क स्थापित कर सकता है।
सुविधाओं का खज़ाना आजकल इसके नित नए-नए मॉडल विभिन्न मूल्यों पर उपलब्ध हैं। मोबाइल फ़ोन की कम्पनियाँ ग्राहकों की आवश्यकता को देखते हुए अनेक विशेषताओं वाले मोबाइल फ़ोन बना रही हैं। आज मोबाइल फ़ोन में बातचीत करने के साथ-साथ संगीत सुनने, फोटोग्राफ़ी करने तथा गणना करने की भी सुविधाएँ उपलब्ध रहती हैं। इतना ही नहीं आज इसका उपयोग कम्प्यूटर की तरह किया जा रहा है। मोबाइल फ़ोन पर ही इण्टरनेट की सुविधाओं का लाभ उठाया जा रहा है।
जीवन-शैली का अभिन्न हिस्सा मोबाइल फ़ोन आज प्रत्येक मनुष्य की जीवन-शैली का महत्त्वपूर्ण अंग बन चुका है। मोबाइल फ़ोन त्वरित सम्प्रेषण का मुख्य साधन है। बिजली का बिल जमा कराने से लेकर बैंकिंग क्रियाकलाप तक आदि सभी कार्य घर बैठे मोबाइल द्वारा सम्भव हो जाते हैं। मोबाइल द्वारा हम एक-दूसरे से दूर होते हुए भी जुड़े रहते हैं, जो काम चिट्ठी-पत्र आदि से हफ्तों-महीनों में होता था, वह मोबाइल द्वारा मिनटों में सम्भव है। आज यह सिर्फ़ सुविधा की वस्तु न होकर हमारी आवश्यकता बन गया है। आज साधारण-से-साधारण व्यक्ति के हाथों में भी मोबाइल फ़ोन को देखा जाना इसकी उपयोगिता को प्रमाणित करता है।
उपसंहार निःसन्देह मोबाइल फ़ोन हमारे लिए बेहद उपयोगी साधन है, किन्तु इसके असीमित प्रयोग अथवा दुरुपयोग से सदा बचने की आवश्यकता है। इसका अत्यधिक प्रयोग हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अहितकर है। आजकल आतंक अथवा अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों में भी इसकी सहायता ली जा रही है, जिससे हमें सावधान रहने की आवश्यकता है। यह फ़ोन हमारे लिए तभी सार्थक सिद्ध होगा, जब इसका प्रयोग मानव कल्याणार्थ हो । उस समय यह हमारे लिए सचमुच वरदान सिद्ध होगा ।
2. इण्टरनेट
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, विश्व में इण्टरनेट का उद्भव, मानव समाज के लिए इण्टरनेट का लाभ / महत्त्व, इण्टरनेट के दोष / कमियाँ, उपसंहार
प्रस्तावना “इण्टरनेट सार्थक समाज में शिक्षा, संगठन और भागीदारी की दिशा में एक बहुत ही सकारात्मक कदम हो सकता है।” नोम चोम्स्की का यह कथन वर्तमान सन्दर्भ में बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है। पहले लोगों के शौक खेलना, पढ़ना, संगीत सुनना, चित्र बनाना, फ़ोटोग्राफ़ी इत्यादि हुआ करते थे। वर्तमान में उनसे शौक के बारे में पूछिए तो हर दस में से सात लोगों का जवाब होगा इण्टरनेट सर्फिंग और कमाल तो यह है कि इण्टरनेट के माध्यम से खेलने, पढ़ने, संगीत सुनने और चित्र बनाने जैसे शौक भी पूरे किए जा सकते हैं।
सूचना एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों को साझा करने के लिए विभिन्न संचार माध्यमों से आपस में जुड़े कम्प्यूटरों एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का समूह, कम्प्यूटर नेटवर्क कहलाता है और इन्हीं कम्प्यूटर नेटवर्कों का विश्वस्तरीय नेटवर्क इण्टरनेट है।
विश्व में इण्टरनेट का उद्भव शीत युद्ध के दौरान वर्ष 1969 में अमेरिका के प्रतिरक्षा विभाग ने युद्ध की स्थिति में अमेरिकी सूचना संसाधनों के संरक्षण एवं आपस में ‘सूचना को साझा करने के उद्देश्य से पहली बार कुछ कम्प्यूटरों के एक नेटवर्क ‘अरपानेट’ (ARPANET) की स्थापना की। इसी संकल्पना के आधार पर अन्य कम्प्यूटर नेटवर्कों का निर्माण हुआ, जो आगे चलकर विश्वस्तरीय नेटवर्क इण्टरनेट के रूप में रूपान्तरित हो गया।
भारत में इण्टरनेट सेवा की शुरुआत भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने वर्ष 1995 में की थी। अब एयरटेल, रिलायंस जियो, टाटा इण्डिकॉम, वोडाफोन जैसी दूरसंचार कम्पनियाँ भी इण्टरनेट सेवा उपलब्ध कराती हैं। पहले ई-मेल (E-mail) के माध्यम से दस्तावेज़ों एवं छवियों का आदान-प्रदान ही किया जाता था, अब ऑनलाइन बातचीत का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है और चैटिंग के माध्यमों से हम किसी भी मुद्दे पर बहस कर सकते हैं।
मानव समाज के लिए इण्टरनेट का लाभ/महत्त्व अब सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में दस्तावेज़ों एवं ध्वनि के साथ-साथ वीडियो का आदान-प्रदान करना सम्भव हो गया है। इण्टरनेट वह जिन्न है, जो आपके सभी आदेशों का पालन करने को हमेशा तैयार रहता है।
विदेश जाने के लिए हवाई जहाज़ का टिकट बुक कराना हो, किसी पर्यटन स्थल पर स्थित होटल का कोई कमरा बुक कराना हो, किसी किताब का ऑर्डर देना हो, अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए विज्ञापन देना हो, अपने मित्रों से ऑनलाइन चैटिंग करनी हो, डॉक्टरों से स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह लेनी हो या वकीलों से कानूनी सलाह लेनी हो; इण्टरनेट हर मर्ज की दवा है।
इण्टरनेट के दोष/कमियाँ इण्टरनेट के कई लाभ हैं, तो इसकी कई कमियाँ भी हैं। इसके माध्यम से नग्न दृश्यों तक बच्चों की पहुँच आसान हो गईं है। कई लोग इण्टरनेट का दुरुपयोग अश्लील साइटों को देखने और सूचनाओं को चुराने में करते हैं। इससे साइबर अपराधों में वृद्धि हुई है।
इण्टरनेट से जुड़ते समय वायरसों द्वारा सुरक्षित फ़ाइलों के नष्ट या संक्रमित होने का खतरा भी बना रहता है। इन वायरसों से बचने के लिए एण्टीवायरस सॉफ़्टवेयर का प्रयोग आवश्यक होता है । इन सबके अतिरिक्त, बहुत-से लोग इस पर अनावश्यक और गलत आँकड़े एवं तथ्य भी प्रकाशित करते रहते हैं।
अतः इस पर उपलब्ध सभी आँकड़ों एवं तथ्यों को हमेशा प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। इनके प्रयोग के समय हमें काफ़ी सावधानी बरतने की ज़रूरत पड़ती है।
उपसंहार इण्टरनेट पर उपलब्ध ज्ञान के सागर एवं इस माध्यम का सही ढंग से समुचित उपयोग मनुष्य की उन्नति में अहम भूमिका निभाएगा। अतः आने वाली पीढ़ी को इसका सही उपयोग सिखाना अत्यावश्यक है अन्यथा यह बच्चों के हाथ में धारदार तलवार सिद्ध होगा।
3. विज्ञान : वरदान या अभिशाप
अन्य शीर्षक जीवन में विज्ञान का महत्त्व, विज्ञान की उपयोगिता, विज्ञान के चमत्कार
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, विज्ञान का विकास, यातायात के क्षेत्र में, शक्ति के साधनों के क्षेत्र में, चिकित्सा के क्षेत्र में, अन्य क्षेत्र में, विज्ञान का अभिशाप, उपसंहार
प्रस्तावना अनादिकाल से मानव को जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता हुई, उनको पाने के लिए वह उनकी खोज करता रहा। इसलिए कहा है, ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है। मनुष्य की आवश्यकताएँ अनन्त हैं। उसकी पूर्ति के लिए वह सदैव नए-नए आविष्कार करता रहा। नए आविष्कारों की इसी श्रृंखला में वह आज यहाँ तक पहुँचा है। आज के युग में हर मानव विज्ञान के साधनों से प्रभावित है। आज विज्ञान हमारे जीवन का अंग बन चुका है। विज्ञान शब्द वि + ज्ञान से बना है। वि का अर्थ है ‘विशेष’ अर्थात् दुनिया का विशेष ज्ञान । विशेष ज्ञान वह है, जो प्रकृति के ज्ञान के अतिरिक्त विशेष है और मानवकृत है। विश्वसनीय वही है, जिसका प्रयोगात्मक अध्ययन सम्भव हो ।
विज्ञान का विकास वैज्ञानिक प्रगति को ही मानव विकास कहते हैं। यह विकास अकस्मात् नहीं हुआ । इसको आज के परिवेश में पहुँचने के लिए कई युगों को पार करना पड़ा। इस शताब्दी में विज्ञान ने हर क्षेत्र में चमत्कार पैदा कर दिया है। आज जीवन के हर क्षेत्र में विज्ञान ने अपना प्रभाव स्थापित कर दिया है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु व स्थान विज्ञान से अछूता नहीं है।
यातायात के क्षेत्र में यातायात के क्षेत्र में विज्ञान ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। आज इतने द्रुतगामी साधनों का आविष्कार हो चुका है कि हम घण्टों में पूरी दुनिया की सैर कर सकते हैं। आज द्रुतगामी विमानों से हम समस्त विश्व का भ्रमण सरलता से कर सकते हैं।
शक्ति के साधनों के क्षेत्र में प्रारम्भ में मनुष्य व पशु ही शक्ति के प्रमुख साधन थे। आज खनिज तेल, कोयला व बिजली शक्ति के साधन हैं, जिनसे विशाल कारखानें व रेलगाड़ियाँ चलती हैं। शक्ति के साधनों में बिजली ने चमत्कार पैदा किया है। यह जहाँ हमें प्रकाश देती है, वहीं बहुत बड़े-बड़े कारखानों और उद्योगों की बड़ी-बड़ी मशीनें चलाने में काम आती है।
चिकित्सा के क्षेत्र में पहले जड़ी-बूटियों या अन्य प्राकृतिक साधनों पर मनुष्य का जीवन निर्भर था। चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने इतना चमत्कार पैदा किया है कि एक व्यक्ति के हृदय को चीर-फाड़कर उसको स्वस्थ कर दिया जाता है। इन्जेक्शन व ऑपरेशन ने मनुष्य को जीवनदान दिया है।
अन्य क्षेत्र में आज ऐसे अस्त्र-शस्त्रों का आविष्कार हो चुका है, जिनकी मनुष्य कल्पना नहीं कर सकता है। संचार के क्षेत्र में विज्ञान ने काफी प्रगति की है। रेडियो, दूरदर्शन, टेलीफोन आदि संचार के प्रमुख साधन हैं।
विज्ञान का अभिशाप मनुष्य एक गलती का पुतला है। विज्ञान के साधनों में जहाँ उसने थोड़ी-सी असावधानी की, वहीं पर विनाश सामने है। आज शीघ्र पहुँचने के कारण बड़ी-बड़ी दुर्घटनाओं में सैंकड़ों आदमी मरते हैं। गलत दवाई व इन्जेक्शन से मृत्यु निश्चित है।
उपसंहार हमें सावधानी से वैज्ञानिक साधनों का उपयोग करना चाहिए । विज्ञान मानव के हित के लिए है, इसलिए हित को ग्रहण करना चाहिए और अहित को त्याग देना चाहिए।
4. जीवन में कम्प्यूटर का महत्त्व
अथवा
कम्प्यूटर का बढ़ता प्रभाव
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, कम्प्यूटर के विकास का इतिहास, कम्प्यूटर की उपयोगिता, सूचना प्रौद्योगिकी में क्रान्ति, उपसंहार
प्रस्तावना विज्ञान ने मनुष्य को सुख-सुविधा के अनेक साधन प्रदान किए हैं, जिनमें कम्प्यूटर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। विज्ञान द्वारा विकसित यह यन्त्र मनुष्य के दिमाग की तरह काम करता है। इसने हमारे जीवन को अनेक सुख-सुविधाओं से भर • दिया है। कम्प्यूटर के कारण ही सूचनाओं की प्राप्ति और इनके संवहन में क्रान्तिकारी वृद्धि हुई है।
कम्प्यूटर के विकास का इतिहास कम्प्यूटर के विकास का इतिहास कैलकुलेटर से जुड़ा हुआ है। प्रारम्भ गणना के लिए कैलकुलेटर का आविष्कार हुआ। समय और आवश्यकताओं के अनुसार कैलकुलेटर का स्वरूप बदलता गया और इस प्रकार वर्ष 1944 में पहला विद्युतचालित कम्प्यूटर अस्तित्व में आया। इसके बाद वर्ष 1946 में विश्व का पहला इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल कम्प्यूटर बना। तब से अब तक लगातार इनका स्वरूप बदलता रहा है। आज के युग में कम्प्यूटर का उपयोग केवल गणना के लिए नहीं होता, वरन् आज के कम्प्यूटर तो कृत्रिम बुद्धि वाले बन गए हैं।
कम्प्यूटर की उपयोगिता कम्प्यूटर ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है। जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, जहाँ इसके महत्त्व को रेखांकित न किया जा सके। भारत में शुरुआती दौर में कम्प्यूटरों का इस्तेमाल बहुत सीमित था, लेकिन वर्तमान में अस्पताल, बैंक, अनुसन्धान केन्द्र, प्रयोगशाला, विद्यालय, दफ्तर आदि सहित ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहाँ कम्प्यूटर का उपयोग न किया जाता हो ।
सूचना प्रौद्योगिकी में क्रान्ति कम्प्यूटर के कारण सूचना प्रौद्योगिकी में अद्भुत क्रान्ति आ गई है। कम्प्यूटर द्वारा जनित इण्टरनेट से जनसंचार का स्वरूप ही बदल गया है। इसके द्वारा हम एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर पर उपस्थित व्यक्ति को सन्देश भेज सकते हैं, उससे बात कर सकते हैं, उसे बात करते हुए देख सकते हैं। कम्प्यूटर के कारण हमारा संवाद करने का तरीका ही बदल गया है। अब पुराने माध्यम अनुपयोगी हो गए हैं। इसी कारण भारत सरकार को वर्ष 2013 में अपनी टेलीग्राफ सर्विस बन्द करनी पड़ी। इसके अतिरिक्त कम्प्यूटर, रेडियो, टेलीविजन के कार्यक्रमों के प्रसारण तथा अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी में भी अपना अभूतपूर्व योगदान दे रहा है।
उपसंहार कम्प्यूटर की उपलब्धियाँ अनगिनत हैं। यह हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। अतः विज्ञान के इस चमत्कार का उचित ढंग से प्रयोग किया जाना चाहिए, जिससे मानव-जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़े।
खण्ड II : आर्थिक समस्याएँ
5. बेरोज़गारी की समस्या और उसका समाधान
अन्य शीर्षक बेरोजगारी और उसे दूर करने के उपाय, बेरोज़गारी की समस्या, बढ़ती बेरोज़गारी : कारण और निवारण
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, बेरोज़गारी का अर्थ, बेरोज़गारी के कारण, बेरोज़गारी कम करने के उपाय, बेरोज़गारी के दुष्प्रभाव, उपसंहार।
प्रस्तावना आज अनेक समस्याएँ भारत के विकास में बाधा उत्पन्न कर रही हैं। बेरोज़गारी की समस्या इनमें से एक है। हर वर्ग का युवक इस समस्या से जूझ रहा है।
बेरोज़गारी का अर्थ बेकारी का अर्थ है— जब कोई योग्य तथा काम करने का इच्छुक व्यक्ति काम माँगे और उसे काम न मिल सके अथवा जो अनपढ़ और अप्रशिक्षित हैं, वे भी काम के अभाव में बेकार हैं।
बेरोज़गारी के कारण जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होना, शिक्षा प्रणाली में व्यावहारिक शिक्षा के स्थान पर सैद्धान्तिक शिक्षा को अधिक महत्त्व दिया जाना, कुटीर उद्योगों की उपेक्षा करना, देश के प्राकृतिक संसाधनों का पूरी तरह से उपयोग नहीं करना, भारतीय कृषि की दशा अत्यन्त पिछड़ी होने के कारण कृषि क्षेत्र में भी बेरोज़गारी का बढ़ना, कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी के कारण उद्योगों को संचालित करने के लिए विदेशी कर्मचारियों को बाहर से लाना आदि बेरोज़गारी के प्रमुख कारण हैं।
बेरोज़गारी कम करने के उपाय जनता को शिक्षित कर जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाना, शिक्षा प्रणाली में व्यापक परिवर्तन तथा सुधार करना, कुटीर उद्योगों की दशा सुधारने पर ज़ोर देना, देश में विशाल उद्योगों की अपेक्षा लघु उद्योगों पर अधिक ध्यान देना। मुख्य उद्योगों के साथ-साथ सहायक उद्योगों का भी विकास करना, सड़कों का निर्माण, रेल परिवहन का विकास, पुलों व बाँधों का निर्माण तथा वृक्षारोपण आदि करना, जिससे अधिक-से-अधिक संख्या में बेरोज़गारों को रोज़गार मिल सके, : सरकार द्वारा कृषि को विशेष प्रोत्साहन एवं सुविधाएँ देना, जिससे युवा गाँवों को छोड़कर शहरों की ओर न जाएँ आदि बेरोज़गारी कम करने के लिए उपाय अपनाए जाने चाहिए।
बेरोज़गारी के दुष्प्रभाव बेरोज़गारी अपने आप में एक समस्या होने के साथ-साथ अनेक सामाजिक समस्याओं को भी जन्म देती है। उन्हें यदि हम बेरोज़गारी के दुष्परिणाम अथवा दुष्प्रभाव कहें, तो अनुचित नहीं होगा। बेरोज़गारी के कारण निर्धनता में वृद्धि होती है तथा भुखमरी की समस्या उत्पन्न होती है। बेरोज़गारी के कारण मानसिक अशान्ति की स्थिति में लोगों के चोरी, डकैती, हिंसा, अपराध, हत्या आदि की ओर प्रवृत्त होने की पूरी सम्भावना बनी रहती है। अपराध एवं हिंसा में हो रही वृद्धि का सबसे बड़ा कारण बेरोज़गारी ही है। कई बार तो बेरोज़गारी की भयावह स्थिति से तंग आकर लोग आत्महत्या भी कर बैठते हैं।
उपसंहार बेरोज़गारी किसी भी देश के लिए एक अभिशाप से कम नहीं है। इसके कारण नागरिकों का जीवन स्तर बुरी तरह से प्रभावित होता है तथा देश की आर्थिक वृद्धि भी बाधित होती है, इसलिए सरकार तथा सक्षम निजी संस्थाओं द्वारा इस समस्या को हल करने लिए ठोस कदम उठाए जाने की तत्काल आवश्यकता है।
खण्ड III : शिक्षा एवं स्वास्थ्य
6. जीवन में खेलकूद की उपयोगिता
अन्य शीर्षक शिक्षा और खेलकूद, जीवन में खेलकूद का महत्त्वं, विद्यार्थी जीवन में खेल का महत्त्व
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, खेलकूद के लाभ, खेलों की विविधता, जीवन हेतु आवश्यक गुणों का विकास, उपसंहार ।
प्रस्तावना मस्तिष्क के विकास के लिए जहाँ शिक्षा की आवश्यकता है, वहीं शारीरिक विकास के लिए खेलकूद भी अनिवार्य है। छात्र जीवन में तो खेलों का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। महान दार्शनिक प्लेटो ने कहा था – “बालक को दण्ड की अपेक्षा खेल द्वारा नियन्त्रण करना कहीं अधिक अच्छा होता है।” आज शैक्षणिक संस्थानों में अवकाश के समय छात्रों को खेलकूद में व्यस्त रखा जाता है, जिससे अध्ययन या खेलकूद के अतिरिक्त उनका ध्यान कहीं और न भटके ।
खेलकूद के लाभ खेल का एक लाभ तो यह होता है कि इससे संस्थान में अनुशासन स्थापित करने में सहायता मिलती है। दूसरी ओर विद्यार्थियों में संयम, दृढ़ता, गम्भीरता, एकाग्रता, सहयोग एवं अनुशासन की भावना का विकास होता है। खेलकूद में होने वाली हार-जीत भी विद्यार्थियों को जीवन में सफलता-असफलता के समय सन्तुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है। खेल खेलने से शरीर पुष्ट होता है, मांसपेशियाँ स्वस्थ होती हैं, भूख बढ़ती है और आलस्य दूर भागता है। शरीर तथा मन से दुर्बल व्यक्ति जीवन में सच्चे सुख और आनन्द को प्राप्त नहीं कर सकता ।
खेलों की विविधता रुचि की भिन्नता के कारण प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी रुचि के अनुसार खेल चुनता है। किसी को हॉकी खेलना पसन्द होता है, तो किसी को फुटबॉल | एक की क्रिकेट में रुचि होती है तो दूसरे की बैडमिण्टन में। कोई भी खेल हो, स्वास्थ्य व मनोरंजन दोनों की दृष्टि से ये सभी उपयोगी एवं लाभकारी होते हैं।
खेलों से अनेक लाभ हैं, इनका जीवन और जगत में अति विशिष्ट स्थान है। शारीरिक और मानसिक स्थिति को सन्तुलित रखने में खेलों का विशेष महत्त्व है, इसलिए प्राचीनकाल से ही खेलों को बहुत महत्त्व दिया जाता रहा है।
खेलों से केवल शरीर ही नहीं, अपितु इनसे मस्तिष्क और मनोबल का भी पर्याप्त विकास होता है, क्योंकि पुष्ट और स्वस्थ शरीर में ही सुन्दर मस्तिष्क का वास होता है। बिना शारीरिक शक्ति के शिक्षा पंगु है। मान लीजिए कि एक विद्यार्थी अध्ययन में बहुत अच्छा है, पर शरीर कमज़ोर है, तो उसके लिए किसी भी बाधा का सामना करना सम्भव नहीं है। अपने मार्ग में पड़े, एक भारी पत्थर को हटाकर अपना मार्ग निष्कण्टक कर लेने का सामर्थ्य उसमें नहीं होता ।
जीवन हेतु आवश्यक गुणों का विकास शरीर की बलिष्ठता के साथ-साथ खेलों से विद्यार्थियों में क्षमाशीलता, दया, स्वाभिमान, आज्ञापालन, अनुशासन आदि गुणों का विकास होता है। बहुत से विद्यार्थी तो खेलों के बल पर ही ऊँचे-ऊँचे पदों को प्राप्त कर लेते हैं, खेलों के अभाव तथा निर्बल काया होने के कारण अधिकांश विद्यार्थी कई बार महत्त्वपूर्ण स्थान वंचित रह जाते हैं।
उपसंहार निःसन्देह खेल विद्यार्थी जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं, पर आवश्यकता से अधिक कुछ भी हानिकारक होता है। बहुत-से विद्यार्थी खेलकूद में इतनी रुचि लेने लगते हैं कि वे अपने मूल लक्ष्य – विद्या अध्ययन से ही मुँह मोड़ लेते हैं। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि खेलों का महत्त्व भी शिक्षा से सम्बद्ध होने पर ही है।
7. अनुशासन का महत्त्व
अन्य शीर्षक जीवन में अनुशासन का महत्त्व, छात्र जीवन में अनुशासन, छात्र और अनुशासन
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, अनुशासन का महत्त्व, अनुशासन की आवश्यकता, अनुशासन की प्रवृत्ति का विकास करना, उपसंहार ।
प्रस्तावना अनुशासन शब्द ‘शासन’ में ‘अनु’ उपसर्ग के जुड़ने से बना है, इस तरह अनुशासन का शाब्दिक अर्थ है – शासन के पीछे चलना । प्रायः माता-पिता एवं गुरुजनों के आदेशानुसार चलना ही अनुशासन कहलाता है, किन्तु यह अनुशासन के अर्थ को सीमित करने जैसा है। व्यापक रूप से देखा जाए तो स्वशासन अर्थात् आवश्यकतानुरूप स्वयं को नियन्त्रण में रखना भी अनुशासन ही है।
अनुशासन का महत्त्व मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके लिए यह आवश्यक है कि वह समाज के सभी प्राणियों के साथ सामंजस्य स्थापित करे। इसके लिए अनुशासन का होना अत्यन्त अनिवार्य है। अनुशासन के बिना किसी भी समाज में अराजकता का माहौल व्याप्त होना स्वाभाविक है। अनुशासनरहित समाज के सभी मनुष्यों को अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। अनुशासन के बिना आनन्ददायक तथा सुखी जीवन की कल्पना करना कठिन है। अनुशासन प्रत्येक संस्था की आवश्यकता है, फिर वह चाहे परिवार ही क्यों न हो। इसी तरह परिवार के सदस्य यदि अनुशासित न हों, तो उस परिवार का अव्यवस्थित होना स्वाभाविक है।
अनुशासन की आवश्यकता अनुशासन न होने की स्थिति में चारों ओर अनुशासनहीनता व्याप्त हो जाती है और इसके दुष्प्रभाव स्पष्ट ही नज़र आने लगते हैं। अतः अनुशासन का होना अनिवार्य है। जैसा कि प्रारम्भ में बताया गया है, अनुशासन का अर्थ होता है— शासन के पीछे चलना, इस अर्थ से देखा जाए तो जैसा शासन होगा, वैसा ही अनुशासन होगा ।
अनुशासन की प्रवृत्ति का विकास करना अनुशासन मनुष्य की आन्तरिक चेतना का परिणाम होता है। अतः इस प्रवृत्ति का विकास करना उसके ही अधिकार क्षेत्र में है। यह स्मरण रहे कि स्वयं के साथ-साथ अपने बच्चों में भी अनुशासन की प्रवृत्ति का विकास करना मनुष्य का नैतिक कर्तव्य है।
बच्चे का जीवन उसके परिवार से प्रारम्भ होता है। यदि परिवार के सदस्य गलत आचरण करते हैं, तो बच्चा भी उसी का अनुसरण करेगा। परिवार के बाद बच्चा अपने समाज एवं स्कूल से सीखता है। यदि उसके साथियों का आचरण खराब होगा, तो इससे उसके भी प्रभावित होने की पूरी सम्भावना बनी रहेगी ।
अनुशासन के अभाव में कई प्रकार की बुराइयाँ समाज में अपनी जड़ें विकसित कर लेती हैं। नित्य-प्रति होने वाले छात्रों के विरोध-प्रदर्शन, परीक्षा में नकल, शिक्षकों से बदसलूकी अनुशासनहीनता के ही उदाहरण हैं। इसका परिणाम उन्हें बाद में जीवन की असफलताओं के रूप में भुगतना पड़ता है, किन्तु जब तक वे समझते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
उपसंहार अतः यदि हम चाहते हैं कि हमारा समाज एवं राष्ट्र प्रगति के पथ पर निरन्तर अग्रसर रहे, तो हमें अनुशासित रहना ही पड़ेगा, क्योंकि जब हम स्वयं अनुशासित रहेंगे, तब ही किसी दूसरे को अनुशासित रख सकेंगे। अनुशासन ही देश को महान बनाता है, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि वास्तविकता है।
8. नई शिक्षा नीति
अथवा
वर्तमान शिक्षा प्रणाली
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, प्राचीन शिक्षा पद्धति, नई शिक्षा पद्धति, व्यावहारिक शिक्षा की आवश्यकता, उपसंहार
प्रस्तावना शिक्षा मानव समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है, क्योंकि किसी भी देश की विकास प्रक्रिया का यह एक अभिन्न अंग है। शिक्षा से तात्पर्य है – शक्ति को ग्रहण कर मनुष्य द्वारा सही अर्थ में अपनी क्षमताओं का उपयोग करना सीखना, ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर बढ़ना । वर्तमान समय में शिक्षा अपनी आधारभूत भूमिका का निर्वहन ठीक से नहीं कर पा रही है, इसलिए इसके औचित्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो रहा है।
प्राचीन शिक्षा पद्धति प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी नीतियों से परिपूर्णता थी । नीति मनुष्य के जीवन को सही दिशा-निर्देश देती है, जो उसके आगे बढ़ने या विकास करने का माध्यम बनती है।
नई शिक्षा पद्धति किसी भी देश का स्वरूप और उसके मानव संसाधन का स्तर शिक्षा प्रणाली के स्तर पर निर्भर करता है। वर्तमान समय में शिक्षा मुख्यतः तीन श्रेणियों में सम्पन्न होती है— (i) प्राथमिक (ii) माध्यमिक एवं (iii) उच्च या विश्वविद्यालीय-शिक्षा। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण श्रेणी माध्यमिक शिक्षा की होती है, क्योंकि इस सीमा को पार करने के उपरान्त ही कोई विश्वविद्यालीय – शिक्षा की ओर बढ़ता है और आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाने वाले विद्यार्थी जीवन-यापन की दिशा में आगे बढ़ जाते हैं। अतः माध्यमिक शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है, जिसके कमजोर होने पर राष्ट्र को घुटने टेकने पड़ सकते हैं।
माध्यमिक शिक्षा के महत्त्व को देखते हुए ही हमारे देश में माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा को निःशुल्क शिक्षा के अन्तर्गत लाभकारी बनाने का प्रयत्न किया गया है। शिक्षा पद्धति में राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सुधार के लिए अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है। समाज में शोषित वर्गों; जैसे- महिलाओं, पिछड़े पर्वतीय क्षेत्रों आदि में रहने वाले लोगों के लिए हमारी सरकार ने उच्च शिक्षा के विशेष कार्यक्रम, जानकारी और कुशलता बढ़ाने के लिए सतत् शिक्षा के कार्यक्रम आदि ‘इन्दिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय’ के अन्तर्गत प्रारम्भ किए हैं।
व्यावहारिक शिक्षा की आवश्यकता वास्तव में, अब आवश्यकता है इस पर सच्ची लगन एवं ईमानदारी से अमल करने की। ‘शिक्षा का अधिकार कानून, 2009’ लागू हो जाने के बाद भी समाज का 6 से 14 वर्ष तक की आयु का कोई भी बच्चा यदि शिक्षा से वंचित रह जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी हमारी कार्य प्रणाली की ही होगी। शिक्षा के क्षेत्र में अयोग्य व्यक्तियों को गलत प्रश्रय देना, देश के विकास के साथ खिलवाड़ करना है। शिक्षा के मन्दिर को गन्दी राजनीति का क्रीड़ा-स्थल नहीं बनाया जाना चाहिए।
उपसंहार भारत के सुन्दर भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षा का समुचित स्वस्थ वातावरण तैयार किया जाए, जहाँ शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक रूप से स्वस्थ युवा वर्ग अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं का विकास कर, अपनी सक्षमता का उपयोग देश के विकास में कर सकें। आज भारत देश को ऐसे शिक्षित एवं समर्पित युवा वर्ग की आवश्यकता है, जो स्वयं को देश की खुशहाली एवं प्रगति के लिए पूरी तरह समर्पित कर दें। यह नया वर्ग तभी निर्मित हो पाएगा, जब देश अपनी शिक्षा प्रणाली को नैतिक शिक्षा एवं व्यावहारिक शिक्षा से जोड़े, ताकि शिक्षा प्राप्ति के बाद युवा वर्ग को अपने जीवन-यापन एवं व्यक्तित्व को बचाए रखने के लिए किसी अयोग्य व्यक्ति के आगे हाथ न फैलाना पड़े।
खण्ड IV : सामाजिक
9. जनसंख्या वृद्धि की समस्या और उसके निराकरण के उपाय
अन्य शीर्षक जनसंख्या वृद्धि एक अभिशाप, जनसंख्या वृद्धि एक राष्ट्रीय समस्या है
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, प्राचीन स्थिति, वर्तमान स्थिति, देश के लिए बोझ, परिवार के लिए बोझ, उपसंहार ।
प्रस्तावना देश की बढ़ती हुई जनसंख्या एक भयावह समस्या है। भारत ही नहीं, बल्कि इस भयावह समस्या से तो समूचा विश्व ही मानो विनाश की कगार पर जा पहुँचा है। स्वाधीन भारत में देश की समृद्धि के लिए किए गए सरकार के सभी निर्णय और किए गए श्रेष्ठ कार्यों में गतिरोध उत्पन्न होने का एक प्रमुख कारण जनसंख्या का निरन्तर बढ़ते जाना है। अत: सरकार ने इसके समाधान के लिए परिवार नियोजन का आह्वान किया है।
प्राचीन स्थिति सृष्टि के प्रारम्भ में जनसंख्या बहुत कम थी और प्रकृति का वरदान रूपी हाथ मानव के शीश पर मुक्त रूप से अपनी कृपाएँ बिखराया करता था। समाज की समृद्धि, सुरक्षा और सभ्यता के विकास के लिए जनसंख्या वृद्धि अि आवश्यक थी। वंश वृद्धि पवित्र कार्य माना जाता था । वेदों में दस पुत्रों की कामना की गई है। कौरव सौ भाई थे। ये बातें उस समय के लिए कदाचित् आवश्यक और उपयोगी भी थीं, पर आज के लिए नहीं ।
वर्तमान स्थिति आज स्थिति बदल चुकी है। वर्ष 2022 में भारत की जनसंख्या लगभग एक अरब इकतालीस करोड़ थी। वर्ष 2023 में यह एक अरब बयालीस करोड़ से ऊपर थी। नए आँकड़ों के अनुसार, अब यह एक अरब तैंतालीस करोड़ से ऊपर पहुँच चुकी है।
देश के लिए बोझ वस्तुतः देश की जनसंख्या ही उसकी शक्ति का आधार होती है, परन्तु अनियन्त्रित गति से इसका बढ़ते जाना निश्चय ही देश के लिए बोझ सिद्ध होगा। सीमा से अधिक आबादी किसी देश के लिए गौरव की बात कदापि नहीं की जा सकती। ऐसी दशा में तो जनसंख्या एक अभिशाप ही कही जाएगी। भारत इस समय आबादी की दृष्टि से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है।
परिवार के लिए बोझ स्वाधीनता के उपरान्त भारत में सम्पत्ति के उत्पादन व वितरण की गलत नीतियों के कारण रोज़गार इतना नहीं बढ़ा कि सबको किसी एक स्तर तक समान रूप से रहने, खाने, पहनने और स्वस्थ रहकर अपना योगदान देने का अवसर मिले। यह भी अनुचित है कि शिक्षा तथा आर्थिक विकास के परिणामों की प्रतीक्षा करते-करते परिवार नियोजन का प्रश्न अनदेखा कर दें।
वास्तविक तथ्य यह कि जब तक आर्थिक विकास होगा, तब तक जनसंख्या इतनी बढ़ चुकी होगी कि वह समग्र विकास को निगल जाएगी। प्रगति की सभी योजनाएँ धरी की धरी रह जाएँगी । जनसंख्या का अनियन्त्रित ढंग से बढ़ना समग्र विकास को नष्ट कर डालेगा। देश के नेताओं और कर्णधारों का मत उचित है कि अधिक सन्तानों का होना आर्थिक असुरक्षा का बड़ा कारण है। जनसंख्या के बढ़ने से परिवार का जीवन स्तर गिरता है। जीवन का विकास रुक जाता है और नैतिक तथा चारित्रिक पतन बढ़ता जाता है।
उपसंहार आपातकालीन स्थिति में सरकार ने इस राष्ट्रीय समस्या का युद्ध स्तर पर समाधान निकालने का जो निश्चय किया था, उसको क्रियान्वित करने में. कहीं-कहीं ज्यादती भी हुई। तथापि सरकार द्वारा चलाए गए कार्यक्रमों, सन्देशों तथा शिक्षा के प्रसार ने अच्छे परिणाम भी प्रदान किए हैं। जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने में ही देश की भलाई है।
10. भारत में आतंकवाद : समस्या और समाधान
अथवा
आतंकवाद : कारण एवं निवारण 
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, भारत में आतंकवाद, आतंकवाद के कारण, आतंकवाद का निदान, उपसंहार
प्रस्तावना हिंसा के द्वारा जनमानस में भय या आतंक पैदा कर अपने संकीर्ण उद्देश्यों को पूरा करना ही आतंकवाद है। यह उद्देश्य राजनीतिक, धार्मिक या आर्थिक ही नहीं, सामाजिक या अन्य किसी प्रकार का भी हो सकता है। वैसे तो . आतंकवाद के कई प्रकार हैं, किन्तु इनमें से तीन ऐसे हैं, जिनसे पूरी दुनिया त्रस्त है— राजनीतिक आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता एवं गैर-राजनीतिक या सामाजिक आतंकवाद | श्रीलंका में लिट्टे समर्थकों एवं अफगानिस्तान में तालिबानी संगठनों की गतिविधियाँ राजनीतिक आतंकवाद के उदाहरण हैं।
जम्मू-कश्मीर एवं असम में अलगाववादी गुटों द्वारा किए गए आपराधिक कृत्य भी राजनीतिक आतंकवाद के ही उदाहरण हैं। अल-कायदा, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन धार्मिक कट्टरता की भावना से आपराधिक कृत्यों को . अन्जाम देते हैं। अत: ऐसे आतंकवाद को धार्मिक कट्टरता की श्रेणी में रखा जाता है। अपनी सामाजिक स्थिति या अन्य कारणों से उत्पन्न सामाजिक क्रान्तिकारी विद्रोह को गैर-राजनीतिक आतंकवाद की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में नक्सलवाद गैर-राजनीतिक आतंकवाद का उदाहरण माना जा सकता है।
भारत में आतंकवाद वैसे तो आज लगभग पूरा विश्व आतंकवाद की चपेट में है, किन्तु भारत दुनियाभर में आतंकवाद से सर्वाधिक त्रस्त देशों में से एक है। पिछले कुछ दशकों से भारत में आतंकी घटनाओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है। भारत में आतंकवाद से सर्वाधिक त्रस्त राज्य जम्मू-कश्मीर है। इस आतंकवाद के केन्द्र में न केवल अलगाववादी संगठन, बल्कि मुस्लिम कट्टरपन्थी एवं पाकिस्तान समर्थित संगठन भी हैं। आतंकवादी हमेशा आतंक फैलाने के नए-नए तरीके आज़माते रहते हैं। भीड़ भरे स्थानों, रेलों, बसों इत्यादि में बम विस्फोट करना, रेलवे दुर्घटना करवाने के लिए रेलवे लाइनों की पटरियाँ उखाड़ देना, वायुयानों का अपहरण कर लेना, निर्दोष लोगों या राजनीतिज्ञों को बन्दी बना लेना, बैंक डकैतियाँ करना इत्यादि कुछ ऐसी आतंकवादी गतिविधियाँ हैं, जिनसे भारत ही नहीं, पूरा विश्व पिछले कुछ दशकों से त्रस्त रहा है।
आतंकवाद के कारण वैसे तो आतंकवाद के प्रमुख कारण राजनीतिक स्वार्थ, सत्ता लोलुपता एवं धार्मिक कट्टरता हैं, किन्तु नक्सलवाद जैसी विद्रोही गतिविधियों के सामाजिक कारण भी हैं, जिनमें बेरोज़गारी एवं गरीबी प्रमुख हैं। विश्व के अधिकतर आतंकवादी संगठन युवाओं की गरीबी एवं बेरोज़गारी का लाभ उठाकर ही उन्हें आतंकवाद के अन्धे कुएँ में कूदने के लिए उकसाने में सफल रहते हैं । आतंकवाद के परिणामस्वरूप अब तक दुनिया के कई राजनयिकों सहित लाखों मासूमों एवं निर्दोष लोगों की जानें जा चुकी हैं तथा लाखों लोग विकलांग एवं अनाथ बन चुके हैं। आतंकवाद के सन्दर्भ में सर्वाधिक बुरी बात यह है कि कोई नहीं जानता कि आतंकवादियों का अगला निशाना कौन होगा? इसलिए आतंकवाद ने आज लोगों के जीवन को असुरक्षित बना दिया है। यह मानव जाति के लिए कलंक बन चुका है।
आतंकवाद का निदान आतंकवाद की समस्या का सही समाधान यही हो सकता है कि जिन कारणों से इसमें निरन्तर वृद्धि हो रही है, उन्हें दूर करने के प्रयास किए जाएँ। इसमें पिछड़े इलाके के युवक-युवतियों को रोज़गार मुहैया कराने जैसे कदम अत्यधिक कारगर साबित होंगे। भारत के कुछ इलाकों में लोग अपने हक के लिए भी नक्सलवाद का सहारा ले रहे हैं, ऐसे इलाकों की पहचान कर उन्हें उनका अधिकार प्रदान कराना अधिक उचित होगा।
उपसंहार आतंकवाद आज वैश्विक समस्या का रूप ले चुका है, इसलिए इसका सम्पूर्ण समाधान अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं प्रयासों से ही सम्भव है। इसमें संयुक्त राष्ट्रसंघ, इण्टरपोल एवं अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय को भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमि निभानी होगी।
11. साम्प्रदायिकता : एक अभिशाप
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, साम्प्रदायिकता का मूल आधार – धर्म, साम्प्रदायिकता के प्रेरक तत्त्व, साम्प्रदायिकता के कारण, सरकारी प्रयास, उपसंहार ।
प्रस्तावना साम्प्रदायिकता एक विचारधारा है, जो बताती है कि समाज धार्मिक समुदायों में विभाजित है, जिनके हित एक-दूसरे से भिन्न हैं और कभी-कभी उनमें पारस्परिक उग्र विरोध भी होता है। साम्प्रदायिकता का अंग्रेजी पर्याय कम्यूनलिज्म है, जो अपने मूल शब्द लैटिन कम्यूनिया (कम्यून) से उत्पन्न हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ — मिल-जुलकर भाईचारे के साथ रहना होता है, लेकिन इतिहास की कुछ उन विशिष्ट अवधारणाओं में साम्प्रदायिकता भी शामिल है, जो अपना वास्तविक अर्थ अपने मूल अर्थ से भिन्न रखती है।
साम्प्रदायिकता का मूल आधार-धर्म साम्प्रदायिकता की विचारधारा मूलत: धार्मिकता से जुड़ी होती है। धर्म के साथ मेल करके ही साम्प्रदायिकता की विचारधारा पल्लवित होती है। साम्प्रदायिक व्यक्ति वे होते हैं, जो राजनीति को धर्म के माध्यम से चलाते हैं। साम्प्रदायिक व्यक्ति धार्मिक नहीं होता है, बल्कि वह ऐसा व्यक्ति होता है, राजनीति को धर्म से जोड़कर राजनीति रूपी शतरंज की चाल खेलता है।
साम्प्रदायिकता के प्रेरक तत्त्व 1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुस्लिम साथ-साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े अतः 1857 के विद्रोह और वहाबी आन्दोलन के पश्चात् अंग्रेजों ने मुसलमानों के प्रति दमन और भेदभाव की नीति अपनाई, परन्तु 1870 ई. के पश्चात् भारतीय राष्ट्रवाद के उभरने तथा नव शिक्षित मध्यम वर्ग की राजनीतिक प्रक्रियाओं और सिद्धान्तों से परिचित होने के कारण अंग्रेजों ने मुसलमानों के दमन की नीति त्याग दी तथा उनमें चेतना का प्रसार कर तथा उन्हें आरक्षण एवं समर्थन देकर मजबूत करने का प्रयास किया, जिससे मुसलमानों को राष्ट्रवादी ताकतों के विरुद्ध खड़ा किया जा सके। इस क्रम में अंग्रेजों ने सर सैय्यद अहमद को अपना सबसे बड़ा मोहरा बनाया। वर्ष 1909 का मार्ले मिण्टो सुधार तथा वर्ष 1932 का कम्युनल अवार्ड साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने हेतु लाया गया था।
भारत के सन्दर्भ में माना जाता है कि हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता के राजनीतिक एवं सामाजिक दोनों स्रोत थे और उनमें संघर्ष का उत्तरदायी केवल धर्म ही नहीं था, आर्थिक स्वार्थ और सांस्कृतिक एवं सामाजिक रीति-रिवाज भी प्रमुख कारक थे, जिन्होंने दोनों समुदायों के बीच की दूरी को बढ़ा दिया और यह दूरी धीरे-धीरे उग्र होकर घृणा, द्वेष, प्रतिशोध पर आधारित साम्प्रदायिक हिंसा में तब्दील हो गई।
साम्प्रदायिकता के कारण साम्प्रदायिकता धर्म की अपेक्षा राजनीति से अधि प्रेरित होती है। साम्प्रदायिक तनाव के कर्ताधर्ता राजनीतिज्ञों का एक वर्ग होता है, जो पाखण्डी धार्मिक व्यक्तियों के एक वर्ग को साथ लेकर अपनी राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ करने एवं स्वयं को समृद्ध बनाने के लिए प्रत्येक अवसर का लाभ उठाना चाहता है और जनसामान्य के आगे स्वयं को अपने समुदाय के सबसे बड़े हिमायती के रूप में प्रस्तुत करता है।
भारत में साम्प्रदायिकता के उदय एवं विकास में औपनिवेशिक शासन की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। उनकी ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति, जिसने 1857 के बाद साम्प्रदायिक रूप धारण किया, इसका सबसे बड़ा आधार है — तत्कालीन परिस्थितियों में हिन्दू संगठनों व मुस्लिम लीग की रणनीति तथा कांग्रेस के तुष्टीकरण ने भी इसके विकास में विशेष भूमिका निभाई है।
किसी देश का आर्थिक विकास और वहाँ के साम्प्रदायिक विचार तथा उपस्थिति में व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध देखा गया है। यदि आर्थिक विकास की गति तीव्र है, तो उत्पादक गतिविधियों में संलग्न होने के कारण ऐसी विचारधारा अधिक विकसित नहीं हो पाती है, जबकि अल्प विकास की स्थिति में गरीबी और बेरोजगारी जैसी स्थितियाँ बनने लगती हैं। जिससे व्यक्ति में बेचैनी, कुण्ठा और आक्रामक रवैया आने लगता है और जब यह बेचैनी साम्प्रदायिक विचारों के साथ मिल जाती हैं, तो फिर यह साम्प्रदायिक बन जाती है।
आधुनिक तार्किक शिक्षा का अभाव साम्प्रदायिकता के विकास में उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है, क्योंकि शिक्षा का महत्त्व इस बात में है कि कोई व्यक्ति भावनात्मक आधार पर निर्णय न लेकर वैज्ञानिकता के आधार पर निर्णय ले । आधुनिक तार्किक शिक्षा नए विचारों को जन्म देती है, जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे के समूह के सांस्कृतिक अस्तित्व की मान्यता स्वीकार करने लगता है। इसे सांस्कृतिक सापेक्षतावाद की स्थिति कहते हैं। ऐसी स्थिति में यदि सभी व्यक्ति इस मानसिक स्तर को प्राप्त कर लें, तो साम्प्रदायवाद, अलगाववाद आदि भावनाएँ समाप्त हो सकती हैं।
सरकारी प्रयास
  • देश में साम्प्रदायिकता के निवारण हेतु कानूनी, संवैधानिक व प्रशासनिक माध्यम से कई प्रयास किए गए हैं।
  • वर्ष 1962 में पहली बार साम्प्रदायिक विशेष की भावना पर नियन्त्रण के लिए राष्ट्रीय एकता परिषद् का गठन किया गया।
  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के गठन का प्रावधान किया गया, जिससे अल्पसंख्यकों की समस्याओं को अधिक बेहतर तरीके से समझा जा सके।
  • साम्प्रदायिक सद्भावना के निर्माण हेतु विशेष पुरस्कारों की घोषणा की गई है; जैसे— कबीर सम्मान, राजीव गाँधी एकता सम्मान, साम्प्रदायिक सौहार्द अवार्ड आदि ।
  • राष्ट्रीय साम्प्रदायिक प्रतिष्ठान की स्थापना की गई है, जिसका उद्देश्य साम्प्रदायिक सद्भाव, भाईचारा तथा राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना है।
  • धार्मिक संस्थान (दुरुपयोग की रोकथाम) कानून, 1988 बनाया गया है, जिसका उद्देश्य किसी भी धार्मिक स्थल की पवित्रता को बनाए रखना तथा राजनीतिक एवं साम्प्रदायिक कार्यों के लिए दुरुपयोग किए जाने से रोकना है।
  • पूजा स्थल (विशेष स्थल) कानून, 1991 बनाया गया है, जिसमें पूजा के किसी भी स्थल की स्थिति, जो 15 अगस्त, 1947 को विद्यमान थी, को बदलने पर रोक लगाई गई है।
उपसंहार आज हम सबको स्वामी विवेकानन्द की कही गई इस बात को आचरण में लाने की आवश्यकता है- “हम भारतीय सभी धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन् सभी धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार भी करते हैं। ” तभी धर्म-निरपेक्षता व राष्ट्रीय एकता स्थापित कर धार्मिक सद्भाव की समृद्ध परम्परा को बनाए रखा जा सकेगा।
खण्ड V : पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
12. प्रदूषण का प्रभाव
अन्य शीर्षक प्रदूषण और मानव समाज, प्रदूषण की समस्या एवं समाधान, पर्यावरण प्रदूषण, पर्यावरण संरक्षण के उपाय, पर्यावरण प्रदूषण : समस्या एवं रोकथाम : पर्यावरण की सुरक्षा, प्रदूषण की समस्या
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, प्रदूषण के प्रकार और कारण, प्रदूषण से होने वाली हानियाँ, प्रदूषण को रोकने के उपाय, उपसंहार ।
प्रस्तावना प्रदूषण का अर्थ है – वायुमण्डल या वातावरण का दूषित होना । पृथ्वी पर उपस्थित जीवों के लिए सन्तुलित वातावरण की आवश्यकता है, जिसमें हर तत्त्व एक निश्चित मात्रा में उपस्थित रहता है। यदि इनमें से किसी में ज़रा-सा भी असन्तुलन हो जाए, तो वातावरण विषैला हो जाता है। इसे ही प्रदूषण कहते हैं।
प्रदूषण के प्रकार और कारण जनसंख्या और उद्योगों के बढ़ने के साथ-साथ प्रदूषण में भी निरन्तर वृद्धि हो रही है। प्रदूषण तीन प्रकार का होता है – जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण। जल प्रदूषण मुख्यतः नदियों, समुद्रों तथा अन्य जलाशयों में उद्योगों और शहरों की अन्य गन्दी नालियों के दूषित जल के मिलने से होता है। उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल में रसायनों की अधिकता कई गम्भीर बीमारियों को जन्म देती है।
वायु प्रदूषण उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाले ज़हरीले धुएँ तथा सड़कों पर चलने वाले वाहनों से निकलने वाले दूषित धुएँ के कारण होता है। विकास की अन्धी दौड़ के कारण वनों की बेरहमी से कटाई भी वायु प्रदूषण को बढ़ाने में सहायता कर रही है। ध्वनि प्रदूषण वाहनों से निकलने वाले शोर, घरों तथा सार्वजनिक स्थलों में बजने वाले टेपरिकॉर्डर आदि की आवाज़ों से होता है। इसके कारण बहरेपन की समस्या उत्पन्न हो रही है।
प्रदूषण से होने वाली हानियाँ प्रदूषण की समस्या के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार जनसंख्या वृद्धि है। इस जनवृद्धि के कारण ही ग्रामों, नगरों तथा महानगरों को विस्तार देने की आवश्यकता अनुभव हो रही है। परिणामस्वरूप जंगल काटकर वहाँ बस्तियाँ बसाई जा रही हैं। यही पर्यावरण की सबसे बड़ी समस्या है। कारखानों की अधिकता के कारण वातावरण प्रदूषित हो रहा है साथ ही वाहनों तथा मशीनों से उत्पन्न होने वाला शोर ध्वनि प्रदूषण को जन्म देता है, जिससे मानसिक तनाव व श्रवण दोष तथा कान के अन्य कई रोग उत्पन्न होते हैं।
प्रदूषण को रोकने के उपाय यदि आने वाली पीढ़ी को प्रदूषण के खतरों से बचाना है, तो हमें समय रहते ही प्रदूषण से बचने के उपाय करने होंगे। इसके लिए जनसंख्या को नियन्त्रित करना होगा। कारखानों के कचरे को नदियों में बहने से रोकना होगा। पेट्रोल में मिलाए जाने वाले रसायन ‘सीसा’ की मात्रा कम करनी होगी। वृक्षारोपण पर जोर देना होगा।
ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोतों की खोज करनी पड़ेगी। अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों, वाहनों आदि पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ेगा। यद्यपि प्रकृति पर मनुष्य की निर्भरता तो समाप्त नहीं की जा सकती, किन्तु प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि इसका प्रतिकूल प्रभाव पर्यावरण पर न पड़े, इसके लिए हमें उद्योगों की संख्या के अनुपात में बड़ी संख्या में पेड़ों को लगाना होगा।
उपसंहार यद्यपि सरकारी स्तर पर पर्यावरण को सही रखने तथा प्रदूषण को रोकने के कई उपाय किए गए हैं, लेकिन प्रदूषण तब तक नहीं रुक सकेगा, जब तक यह जन-जन का आन्दोलन न बन जाए । वस्तुतः पर्यावरण प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है, जिससे निपटना वैश्विक स्तर पर ही सम्भव है, किन्तु इसके लिए प्रयास स्थानीय स्तर पर भी किए जाने चाहिए।
13. वृक्ष धरा के आभूषण हैं
अन्य शीर्षक वृक्ष हमारे मित्र, वृक्ष : मानव के सच्चे हितैषी, वृक्षारोपण का महत्त्व, वृक्षारोपण, वृक्षारोपण का महत्त्व, वृक्षों की रक्षा : पर्यावरण सुरक्षा, वृक्षों का महत्त्व, हमारी वन्य सम्पदा
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, वृक्षों का ह्रास, वृक्षों के संरक्षण की आवश्यकता, वृक्षों का संरक्षण, उपसंहार ।
प्रस्तावना वृक्ष हमारे लिए अनेक प्रकार से लाभदायक होते हैं। जीवों द्वारा छोड़ी गई कार्बन डाइ ऑक्साइड को ये जीवनदायिनी ऑक्सीजन में बदल देते हैं। इनकी पत्तियों, छालों एवं जड़ों से हम विभिन्न प्रकार की औषधियाँ बनाते हैं। इनसे हमें रसदार एवं स्वादिष्ट फल प्राप्त होते हैं। वृक्ष हमें छाया प्रदान करते हैं। इनकी छाया में पशु-पक्षी ही नहीं, मानव भी राहत की साँस लेते हैं। जहाँ वृक्ष पर्याप्त मात्रा में होते हैं, वहाँ वर्षा की मात्रा भी अधिक होती है। वृक्षों की कमी सूखे का कारण बनती है। वृक्षों से पर्यावरण की खूबसूरती में निखार आता है। वृक्षों से प्राप्त लकड़ियाँ भवन-निर्माण एवं फ़र्नीचर बनाने के काम आती हैं। इस प्रकार, मनुष्य जन्म लेने के बाद से मृत्यु तक वृक्षों एवं उनसे प्राप्त होने वाली विभिन्न प्रकार की वस्तुओं पर निर्भर रहता है।
कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पेड़-पौधों की महत्ता को समझते हुए कहा है
” पृथ्वी द्वारा स्वर्ग से बोलने का अथक प्रयास हैं ये पेड़ “
वृक्षों का ह्रास वृक्षों से होने वाले इन्हीं लाभों के कारण मनुष्य ने इनकी तेज़ी से कटाई की है। औद्योगिक प्रगति एवं वनोन्मूलन दोनों के कारण पर्यावरण अत्यन्त प्रदूषित हो गया है। वृक्षं पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त रखने में सहायक होते हैं। मनुष्य अपने लाभ के लिए कारखानों की संख्या में तो वृद्धि करता रहा, किन्तु उस वृद्धि के में उसने पेड़ों को लगाने की ओर ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत उसने अनुपात उनकी जमकर कटाई की।
पर्यावरणविद् एवं वैज्ञानिक आजकल वृक्षारोपण पर अत्यधिक बल दे रहे हैं। उनका कहना है कि पर्यावरण सन्तुलन एवं मानव की वास्तविक प्रगति के लिए वृक्षारोपण आवश्यक है। वृक्षारोपण क्यों आवश्यक है? इसका उत्तर हमें तब ही मिलेगा, जब हम वृक्षों से होने वाले लाभों से अवगत होंगे। इसलिए सबसे पहले हम वृक्षों से होने वाले लाभों की चर्चा करते हैं।
वृक्षों के संरक्षण की आवश्यकता वृक्षारोपण पर्यावरण को सन्तुलित कर मानव अस्तित्व की रक्षा करने के लिए आवश्यक है। “एक मेज़, एक कुर्सी, एक कटोरा फल और एक वायलिन, भला खुश रहने के लिए और क्या चाहिए !” विश्व के महान् वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने अपने इस विचार को जिन महत्त्वपूर्ण चीज़ों से जोड़ा है, उनमें से प्रत्येक चीज़ का सम्बन्ध पेड़-पौधों से होना इनकी उपयोगिता को दर्शाता है। अतः हमें अपने और पर्यावरण के हितैषी पेड़-पौधों के साथ मित्रवत् व्यवहार करना चाहिए।
वृक्षों का संरक्षण मनुष्य अपने विकास के लिए पेड़ों की कटाई एवं पर्यावरण का दोहन करता है। विकास एवं पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। सन्तुलित एवं शुद्ध पर्यावरण के बिना मानव का जीवन कष्टमय हो जाएगा। हमारा अस्तित्व एवं जीवन की गुणवत्ता एक स्वस्थ प्राकृतिक पर्यावरण पर निर्भर है। विकास हमारे लिए आवश्यक है और इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग भी आवश्यक है, किन्तु ऐसा करते समय हमें सतत विकास की अवधारणा को अपनाने पर बल देना चाहिए।
उपसंहार अतः स्पष्ट है कि हमें निरन्तर बढ़ते जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, भूमि प्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण पर नियन्त्रण करने की आवश्यकता है। यदि इन पर नियन्त्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में इसके परिणाम इतने भयानक हो सकते हैं, जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
14. स्वच्छ भारत : एक कदम स्वच्छता की ओर
अन्य शीर्षक स्वच्छ भारत अभियान, भारत : स्वस्थ भारत
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, स्वच्छ भारत अभियान का आरम्भ एवं लक्ष्य, वर्तमान समय में स्वच्छता को लेकर भारत की स्थिति, स्वच्छता का महत्त्व, उपसंहार ।
प्रस्तावना यह सर्वविदित है कि 2 अक्टूबर को हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जन्म हुआ था। इस युग-पुरुष भारत सहित पूरे विश्व को मानवता की नई राह दिखाई। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष गाँधीजी का जन्मदिवस एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2014 में 2 अक्टूबर को ससम्मान गाँधीजी को याद किया गया, लेकिन ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत के कारण यह दिन और भी विशिष्ट बन गया।
स्वच्छ भारत अभियान का आरम्भ एवं लक्ष्य ‘स्वच्छ भारत अभियान’ एक राष्ट्रस्तरीय अभियान है। गाँधीजी की 145वीं जयन्ती के अवसर पर माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस अभियान के आरम्भ की घोषणा की। तय कार्यक्रम के अनुसार, प्रधानमन्त्री जी ने 2 अक्टूबर के दिन सर्वप्रथम गाँधीजी को राजघाट पर श्रद्धांजलि अर्पित की और फिर नई दिल्ली में स्थित वाल्मीकि बस्ती में जाकर झाड़ लगाई। इसके बाद, मोदीजी ने जनपथ जाकर इस अभियान की शुरुआत की और सभी राष्ट्रवासियों से स्वच्छ भारत अभियान में भाग लेने और इसे सफल बनाने की अपील की। इस अवसर पर उन्होंने लगभग 40 मिनट का भाषण दिया और स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा, गाँधीजी ने आज़ादी से पहले नारा दिया था – ‘क्विट इण्डिया, क्लीन इण्डिया’ ।
आज़ादी की लड़ाई में उनका साथ देकर देशवासियों ने ‘क्विट इण्डिया’ के सपने को तो साकार कर दिया, लेकिन अभी उनका ‘क्लीन इण्डिया’ का सपना अधूरा ही है। अब समय आ गया है कि हम सवा सौ करोड़ भारतीय अपनी मातृभूमि को स्वच्छ बनाने का प्रण करें।
वर्तमान समय में स्वच्छता को लेकर भारत की स्थिति केन्द्र सरकार और प्रधानमन्त्री की ‘गन्दगी मुक्त भारत’ की संकल्पना अच्छी है तथा इस दिशा में उनकी ओर से किए गए आरम्भिक प्रयास भी सराहनीय हैं, आज पूरी दुनिया में भारत की छवि एक गन्दे देश की है। जब- जब भारत की अर्थव्यवस्था, तरक्की, ताकत और प्रतिभा की बात होती है, तब-तब इस बात की भी चर्चा होती हैं कि भारत एक गन्दा देश है। पिछले ही वर्ष हमारे पड़ोसी देश चीन के कई ब्लॉगों पर गंगा में तैरती लाशों और भारतीय सड़कों पर पड़े कूड़े के ढेर वाली तस्वीरें छाई रहीं।
स्वच्छता का महत्त्व ये सभी बातें और तथ्य हमें यह सोचने पर मज़बूर करते हैं कि हम भारतीय साफ़-सफ़ाई मामले में भी पिछड़े हुए क्यों हैं? जबकि हम उस समृद्ध एवं गौरवशाली भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य सदा ‘पवित्रता’ और ‘शुद्धि’ रहा है। इसलिए हमारे यहाँ कहा गया है – ” मन चंगा तो कठौती में गंगा ।”
यह सही है कि चरित्र की शुद्धि और पवित्रता बहुत आवश्यक है, लेकिन बाहर की सफ़ाई भी उतनी ही आवश्यक है। अस्वच्छ परिवेश का प्रतिकूल प्रभाव हमारे मन पर भी पड़ता है, जिस प्रकार एक स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है, उसी प्रकार एक स्वस्थ और शुद्ध व्यक्तित्व का विकास भी स्वच्छ और पवित्र परिवेश में ही सम्भव है। अत: अंत:करण की शुद्धि का मार्ग बाहरी जगत की शुद्धि और स्वच्छता से होकर ही गुज़रता है।
उपसंहार स्वच्छता समान रूप से हम सभी की नैतिक ज़िम्मेदारी है और वर्तमान समय में यह हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता भी है। हमें अपने दैनिक जीवन में तो सफ़ाई को एक मुहिम की तरह शामिल करने की जरूरत है ही, साथ ही हमें इसे एक बड़े स्तर पर भी देखने की जरूरत है, ताकि हमारा पर्यावरण भी स्वच्छ रहे। हमें हर हाल में इस लक्ष्य को आने वाले कुछ वर्षों में प्राप्त करना ही होगा, तभी हमारी ओर से राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को उनकी 151वीं जयन्ती पर सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकेगी।
खण्ड VI: धार्मिक एवं सांस्कृतिक
15. किसी यात्रा का वर्णन
अन्य शीर्षक की गई किसी यात्रा का रोचक वर्णन, एक अविस्मरणीय यात्रा का वर्णन, मेरी प्रिय यात्रा: भुवनेश्वर
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, यात्रा – वर्णन, उपसंहार
प्रस्तावना मैं स्वभाव से ही घुमक्कड़ प्रवृत्ति का हूँ। पिछले पाँच वर्षों में मैंने भारत के लगभग बीस शहरों तथा राज्यों की यात्रा की है, इनमें दिल्ली, मुम्बई राजस्थान, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, गोवा आदि शामिल हैं। इन शहरों में भुवनेश्वर ने मुझे सर्वाधिकं प्रभावित किया है। पिछले वर्ष ही गर्मी की सप्ताह भर की छुट्टियों में मैं इस शहर की यात्रा पर था। यह यात्रा मेरे लिए अविस्मरणीय है।
यात्रा-वर्णन मैंने एवं मेरे कुछ साथियों ने भुवनेश्वर जाने का निश्चय किया । हम दिल्ली से रेलगाड़ी में भुवनेश्वर के लिए रवाना हुए और सुबह लगभग दस बजे भुवनेश्वर पहुँच गए। हमने पहले दिन होटल में आराम कर सफर की थकान दूर की, फिर अगले दिन हम भुवनेश्वर घूमने निकल गए। भुवनेश्वर के बारे में जैसा हमने सुना था, उससे कहीं अधिक दर्शनीय पाया।
भुवनेश्वर, भारत के खूबसूरत एवं हरे-भरे प्रदेश उड़ीसा की राजधानी है। यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता देखते ही बनती है। ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टिकोण से भी यह शहर भारत के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है। इसे ‘मन्दिरों का शहर’ भी कहा जाता है। यहाँ प्राचीन काल के लगभग 600 से अधिक मन्दिर हैं। इसलिए इसे ‘पूर्व का काशी’ भी कहा जाता है। तीसरी शताब्दी ई. पू. में सम्राट अशोक ने यहीं पर कलिंग युद्ध के बाद धम्म की दीक्षा ली थी। धम्म की दीक्षा लेने के बाद बौद्ध स्तूप का निर्माण कराया था, इसलिए यह बौद्ध धर्मावलम्बियों भी एक बड़ा तीर्थ स्थल है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में भुवनेश्वर में 7000 से अधिक मन्दिर थे, इनमें से अब केवल 600 मन्दिर ही शेष बचे हैं।
हम जिस होटल में ठहरे थे, उसके निकट ही राजा-रानी मन्दिर था।’ इस मन्दिर में शिव एवं पार्वती की भव्य मूर्तियाँ हैं । इस मन्दिर की दीवारों पर सुन्दर कलाकृतियाँ बनी हुई हैं। इस मन्दिर से लगभग एक किलोमीटर दूर मुक्तेश्वर मन्दिर स्थित है। इसे मन्दिर समूह भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ पर एक साथ कई मन्दिर हैं। इन मन्दिरों में से दो मन्दिर अति महत्त्वपूर्ण हैं- एक है परमेश्वर मन्दिर दूसरा मुक्तेश्वर मन्दिर । राजा-रानी मन्दिर एवं मुक्तेश्वर मन्दिर की सैर करते-करते हम थक गए थे। इसलिए हम लोग आराम करने के लिए वापस अपने होटल लौट आए। अगली सुबह हम लोग जल्दी तैयार होकर लिंगराज मन्दिर समूह देखने गए। इस मन्दिर के आस-पास सैकड़ों छोटे-छोटे मन्दिर बने हुए हैं, इसलिए इन्हें लिंगराज मन्दिर समूह कहा जाता है। मन्दिरों की दीवारों पर निर्मित मूर्तियाँ शिल्पकारों की कुशलता की परिचायक हैं।
भुवनेश्वर की यात्रा इतिहास की यात्रा के समान है। इस शहर की यात्रा करते हुए ऐसा लगता है मानो हम उस काल में चले गए हों, जब इस शहर का निर्माण किया जा रहा था। इस आभास को और भी अधिक बल प्रदान करता है- शहर के लगभग बीचों-बीच स्थित भुवनेश्वर – संग्रहालय । यहाँ प्राचीन मूर्तियों एवं हस्तलिखित ताड़पत्रों का अनूठा संग्रह है।
भुवनेश्वर के पास ऐसा एक स्थान है— धौली । यहाँ दूसरी शताब्दी ई. पू. निर्मित एक बौद्ध स्तूप है। इस स्तूप के पास ही सम्राट अशोक निर्मित एक स्तम्भ भी है, जिसमें बुद्ध की मूर्ति तथा उनके जीवन से सम्बन्धित विभिन्न घटनाओं की मूर्तियाँ भी दर्शनीय हैं।
धौली के बौद्ध स्तूप के दर्शन के बाद हम लोग भुवनेश्वर शहर से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित उदयगिरि एवं खण्डगिरि की गुफाओं को देखने गए। इन गुफाओं को पहाड़ियों को काटकर बनाया गया है। सैर के बाद हम लोगों ने उड़ीसा के स्थानीय भोजन का आनन्द उठाया। पखाल भात, छतु तरकारी, महूराली – चडचडी एवं चिंगुडि उड़ीसा के कुछ लोकप्रिय व्यंजन हैं। इस यात्रा को अविस्मरणीय बनाने के लिए हमने फोटोग्राफी और वहाँ की लोकप्रिय वस्तुओं की खरीदारी भी की।
उपसंहार भुवनेश्वर की यात्रा मेरे लिए ही नहीं, बल्कि मेरे सभी साथियों के लिए भी एक अविस्मरणीय यात्रा बन गई। वस्तुतः किसी भी व्यक्ति की यात्रा का उद्देश्य केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि मानसिक शान्ति प्राप्त करना भी होता है। भुवनेश्वर के वातावरण में अद्भुत-सी पवित्रता घुली हुई है, जिससे हम सभी को जिस मानसिक शान्ति का अनुभव हुआ, उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता।
खण्ड VII : विविध
16. सड़क व राजमार्गों के लाभ
अथवा वर्तमान समय में सड़क व राजमार्ग
अथवा महानगरों में बढ़ते सड़क तथा राजमार्ग : समस्या या समाधान
अथवा सड़क और राजमार्ग का महत्त्व 
संकेत बिन्दु भूमिका, ट्रैफिक नियम, शहरों की सड़कें, आवागमन में लाभकारी, उपसंहार
भूमिका मनुष्य सड़कों का उपयोग लम्बे समय से करता रहा है। पुरानी सड़कें अच्छी नहीं होती थीं। वे प्रायः कच्ची सड़कें होती थीं, जिन पर बरसात के दिनों में आवागमन सम्भव नहीं हो पाता था। आधुनिक काल की सड़कें अच्छी होती हैं, ये पत्थरों, रोड़ियों तथा अलकतरे की बनी होती हैं अथवा कंक्रीट की बनी सीमेटिण्ड होती हैं। पक्की सड़कें टिकाऊ होती हैं तथा इन पर जल का जमाव नहीं होता है। इन सड़कों पर यातायात सरल हो जाता है। सड़कों पर होने वाले यातायात का जनता के लिए बहुत महत्त्व है।
ट्रैफिक नियम सड़क यातायात सुचारू रूप से हो सके इसके लिए कानून बनाए गए हैं। भारत में सड़क की बाईं ओर चलने का नियम है। सड़कों पर भारी वाहनों को एक निर्धारित गति सीमा तक ही चलाया जा सकता है। चौराहों पर संकेतक बत्तियाँ लगाई जाती हैं ताकि जाम तथा दुर्घटना जैसी स्थितियों का कम-से-कम सामना करना पड़े। जहाँ ट्रैफिक लाइटें नहीं होती हैं, वहाँ यातायात पुलिस हाथ के इशारे से यात्रियों को रुकने या जाने का संकेत देती हैं।
पैदल यात्रियों की सुविधा के लिए भूमिगत पार पथ तथा फुटपाथ बनाए जाते हैं। जेब्रा क्रॉसिंग बनाई जाती हैं ताकि पैदल यात्री आरामदायक ढंग से सड़क पार कर सकें। शहरों में जहाँ यातयात अधिक होता है, आने और जाने के लिए अलग लेन वाली सड़कों का निर्माण किया गया है। सड़कों पर अधिक रोशनी देने वाली लाइटें लगाई गई हैं ताकि रात के समय यातयात में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो।
शहरों की सड़कें शहरों का परिदृश्य अलग होता है। यहाँ की सड़कें हमेशा व्यस्त रहती हैं। इन पर साइकिल, रिक्शा, कार, स्कूटर, मोटरसाइकिल, तिपहिया वाहन, बस, ट्रक आदि रात – दिन चलते रहते हैं। अनेक स्थानों पर ट्रैफिक जाम की स्थिति होती हैं स्थानीय बसें अधिक संख्या में चलती हैं ताकि लोग अपने कार्यस्थल तक पहुँच सकें और वापस घर लौट सकें। लोग अपने निजी काम में भी वाहनों द्वारा यात्रा करते हैं। सड़क यातायात का व्यापार की दृष्टि से भी बहुत महत्त्व होता है। लोग तरह-तरह के वाहनों पर व्यापारिक वस्तुएँ लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाते हैं। इस कार्य में ट्रकों, ट्रॉलियों तथा अन्य प्रकार के छोटे वाहनों का प्रयोग होता है। कोई सब्जी लादकर ले जा रहा है तो कोई अनाज । किसी को शीतल पेय की बोतलें पहुँचाने की जल्दी है, किसी को रेलवे स्टेशन तक कार्टून पहुँचाने हैं तो किसी को फल मण्डी तक ले जाना है।
आवागमन में लाभकारी सड़क यातायात में राजमार्गों (हाईवे) का भी अति महत्त्वपूर्ण योगदान है। ये राजमार्ग देश के प्रमुख शहरों को जोड़ने का कार्य करते हैं। सबसे लम्बा राजमार्ग किसी समय शेरशाह सूरी ने बनवाया था, जो कोलकाता और पेशावर को आपस में जोड़ता था। आज इसे ग्रैण्ड ट्रंक रोड के नाम से जाना जाता है। भारत में इसी तरह के कई लम्बे-चौड़े राजमार्ग बने हैं, जिन्हें बहुतायत यातायात के लिए प्रयोग किया जाता है।
इन राजमार्गो का प्रयोग आवागमन और भारवहन दोनों के लिए होता है। यहाँ वाहन तीव्र गति से दौड़ाए जा सकते हैं। इन मार्गों से होकर ट्रकों द्वारा विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाई जाती हैं। यदि किसी वस्तु का एक जगह अभाव हो तो वह वस्तु दूरस्थ स्थानों से मँगवाई जाती है। यदि किसी स्थान पर किसी वस्तु की अधिकता हो तो उसे अन्य स्थानों पर भेजा जा सकता है। यदि सड़क यातायात की उचित व्यवस्था न होती तो लोगों को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता ।
व्यापार और उद्योगों के विकास में सड़क यातायात का उल्लेखनीय योगदान है। स्थानीय व्यापारी दूरस्थ स्थानों से माल मँगवाकर अपने यहाँ बेचते हैं। उनका माल या तो सड़क मार्ग से आता है या रेल मार्ग से । रेलमार्ग सभी स्थानों पर नहीं हैं, परन्तु सड़कों का फैलाव सभी स्थानों पर है।
अतः सुविधानुसार रेल मार्ग और सड़क मार्ग दोनों का प्रयोग किया जाता है। आँकड़े बताते हैं कि कुल माल ढुलाई के दो-तिहाई से अधिक का बोझ सड़कें ही उठाती हैं। अतः जरूरी है कि सड़कों को सही हालत में रखा जाए। सड़के अच्छी बनाई जाएँ तथा उनका उचित रखरखाव हो। कम चौड़ी सड़कों को चौड़ा किया जाए। इस दिशा में आजकल अच्छे प्रयास हो रहे हैं। इस प्रयास में तीव्र गति लाने की आवश्यकता है।
उपसंहार सड़क यातायात के अवरोधों को दूर कर लिया जाए तो देश की आर्थिक प्रगति में और गति आएगी। सड़कों पर यातायात सामान्य रूप से हो सके इसके लिए ट्रैफिक जाम की समस्या पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। अति व्यस्त सड़कों पर फ्लाईओवर बनाकर तथा यातायात की वैकल्पिक व्यवस्था कर इस समस्या को दूर किया जा सकता है।
17. देशप्रेम
अन्य शीर्षक राष्ट्रप्रेम, स्वदेश-प्रेम, देश प्रेम : सर्वोच्च प्रेम, स्वदेशप्रेम : एक उच्च भावना, देश-प्रेम की भावना : उन्नति का परिचायक, राष्ट्र के लिए जिएँ
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, स्वदेश-प्रेम (राष्ट्रप्रेम) – एक उच्च स्वदेश-प्रेम (राष्ट्रप्रेम) की अभिव्यक्ति के प्रकार, उपसंहार। भावना
प्रस्तावना “जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं ।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं । “
मैथिलीशरण ‘गुप्त’ की इन काव्य पंक्तियों का अर्थ यह है कि देश-प्रेम के अभाव में मनुष्य ‘जीवित प्राणी नहीं, बल्कि पत्थर के ही समान कहा जाएगा। हम जिस देश या समाज में जन्म लेते हैं, उसकी उन्नति में समुचित सहयोग देना हमारा परम कर्त्तव्य बनता है। स्वदेश के प्रति यही कर्तव्य – भावना, इसके प्रति प्रेम अर्थात् स्वदेश-प्रेम ही देशभक्ति का मूल स्रोत है।
स्वदेश-प्रेम (राष्ट्रप्रेम) एक उच्च भावना वास्तव में, देश-प्रेम की भावना मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ भावना है। इसके सामने किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक ऐसा पवित्र व सात्विक भाव है, जो मनुष्य को निरन्तर त्याग की प्रेरणा देता है, इसलिए कहा गया है- “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं । कवि रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी कविता में कहा है-
“विषुवत् रेखा का वासी जो जीता है नित हाँफ – हाँफ कर,
रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर ।
हिमवासी जो हिम में, तम में जी लेता है काँप – काँपकर,
वह भी अपनी मातृभूमि पर कर देता है प्राण निछावर ।”
स्वदेश-प्रेम (राष्ट्रप्रेम) की अभिव्यक्ति के प्रकार स्वदेश-प्रेम यद्यपि मन की एक भावना है तथापि इसकी अभिव्यक्ति हमारे क्रियाकलापों से हो जाती है। देश-प्रेम से ओत-प्रोत व्यक्ति सदा अपने देश के प्रति कर्त्तव्यों के पालन हेतु न केवल तत्पर रहता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसके लिए अपने प्राण न्योछावर करने से भी पीछे नहीं हटता। सच्चा देशभक्त आवश्यकता पड़ने पर अपना तन, मन, धन सब कुछ समर्पित कर देता है।
स्वदेश-प्रेम को किसी विशेष क्षेत्र एवं सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। हमारे जिस कार्य से देश की उन्नति हो, वही स्वदेश-प्रेम की सीमा में आता है। अपने प्रजातन्त्रात्मक देश में, हम अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए ईमानदार एवं देशभक्त जनप्रतिनिधि का चयन कर देश को जाति, सम्प्रदाय तथा प्रान्तीयता की राजनीति से मुक्त कर इसके विकास में सहयोग कर सकते हैं। जाति प्रथा, दहेज प्रथा, अन्धविश्वास, छुआछूत इत्यादि कुरीतियाँ देश के विकास में बाधक हैं। हम इन्हें दूर करने में अपना योगदान कर देश सेवा का फल प्राप्त कर सकते हैं।
उपसंहार नागरिकों में स्वदेश – प्रेम (राष्ट्र – प्रेम) का अभाव राष्ट्रीय एकता में सबसे बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है, जबकि राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था और बाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए, तो हमारी पारस्परिक फूट को देखकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है और राष्ट्रीय एकता बनाए रखना तब ही सम्भव है, जब हम देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करेंगे।
18. मेरी प्रिय पुस्तक
अन्य शीर्षक मेरी प्रिय पुस्तक : रामचरितमानस
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, पुस्तक की विशेषताएँ, उपसंहार ।
प्रस्तावना किसी भी देश की सभ्यता-संस्कृति के संरक्षण एवं उसके प्रचार-प्रसार में पुस्तकें अहम भूमिका निभाती हैं। पुस्तकें ज्ञान का संरक्षण भी करती हैं। यदि हम प्राचीन इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं, तो इसका अच्छा स्रोत भी पुस्तकें ही हैं।
पुस्तकें शिक्षा का प्रमुख साधन तो हैं ही इसके साथ ही इनसे अच्छा मनोरंजन भी होता है। पुस्तकों के माध्यम से लोगों में सद्वृत्तियों के साथ-साथ सृजनात्मकता का विकास भी किया जा सकता है। पुस्तकों के इन्हीं महत्त्वों के कारण पुस्तकों से मेरा विशेष लगाव रहा है। पुस्तकों ने हमेशा एक अच्छे मित्र के रूप में मेरा साथ दिया है। मैंने अब तक कई पुस्तकों का अध्ययन किया है, इनमें से कई पुस्तकें मुझे प्रिय भी हैं; किन्तु सभी पुस्तकों में ‘रामचरितमानस’ मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। इसे हिन्दू परिवारों में धर्म-ग्रन्थ का दर्जा प्राप्त है।
पुस्तक की विशेषताएँ ‘रामचरितमानस’ अवधी भाषा में रचित महाकाव्य है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने सोलहवीं सदी में की थी। इसमें भगवान राम के जीवन का वर्णन है। यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य ‘रामायण’ पर आधारित है। तुलसीदास ने इस महाकाव्य को सात काण्डों में विभाजित किया है। इन सात काण्डों के नाम हैं- ‘बालकाण्ड’, ‘अयोध्याकाण्ड’, ‘अरण्यकाण्ड’, ‘किष्किन्धाकाण्ड’, ‘सुन्दरकाण्ड’, ‘लंकाकाण्ड’ एवं ‘उत्तरकाण्ड’ ।
‘रामचरितमानस’ में सामाजिक आदर्शों को बड़े ही अनूठे ढंग से व्यक्त किया गया है। इसमें गुरु-शिष्य, माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन इत्यादि के आदर्शों को इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि ये आज भी भारतीय समाज के प्रेरणा-स्रोत बने हुए हैं। वैसे तो इस ग्रन्थ को ईश्वर ( भगवान राम ) की भक्ति प्रदर्शित करने के लिए.. लिखा गया काव्य माना जाता है, किन्तु जिस समय इस ग्रन्थ की रचना की गई थी, उस समय की सामाजिक दृष्टि से देखें, तो इसमें तत्कालीन समाज को विभिन्न बुराइयों से मुक्त करने एवं उसमें श्रेष्ठ गुण विकसित करने की पुकार सुनाई देती है।
काव्य-शिल्प एवं भाषा के दृष्टिकोण से भी ‘रामचरितमानस’ बहुत समृद्ध है। यह आज की हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य बना हुआ है। इसके छन्द और चौपाइयाँ आज भी जन-जन में लोकप्रिय हैं। अधिकतर हिन्दू घरों में इसका पाठ किया जाता है। तुलसीदास ने भारतीय जनमानस को जितना प्रभावित किया उतना न इससे पहले किसी काल में किसी ने किया था और अब तक भी आम आदमी को इस तरह प्रभावित करने वाले काव्य की रचना नहीं की जा सकी है।
उपसंहार ‘रामचरितमानस’ को भारत में सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ माना जाता है। विदेशी विद्वानों ने भी इसकी खूब प्रशंसा की है। इसका अनुवाद विश्व की कई भाषाओं में किया गया है, किन्तु अन्य भाषा में अनूदित ‘रामचरितमानस’ में वह काव्य-सौन्दर्य एवं लालित्य नहीं मिलता, जो मूल ‘रामचरितमानस’ में है । इसको पढ़ने का अपना एक अलग आनन्द है। इसको पढ़ते समय व्यक्ति को संगीत एवं भजन से प्राप्त होने वाली शान्ति का आभास होता है। इसलिए भारत के कई मन्दिरों में इसका नित्य पाठ किया जाता है। हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में ‘रामचरितमानस’ की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रही है।
19. जल संरक्षण की आवश्यकता
अन्य शीर्षक जल-संरक्षण की आवश्यकता और उपाय, जल है तो कल है
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, हमें जल को क्यों बचाना चाहिए, जल बचाव के तरीके, उपसंहार
प्रस्तावना जल हमें और दूसरे जीव-जन्तुओं को धरती पर जीवन प्रदान करता है। धरती पर जीवन को जारी रखना बहुत जरूरी है। बिना पानी के, किसी भी ग्रह पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पृथ्वी पूरे ब्रह्माण्ड का एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ पानी और जीवन मौजूद है। इसीलिए, हमें अपने जीवन में जल के महत्त्व को भूलना नहीं चाहिए और सभी माध्यमों के प्रयोग से जल को बचाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। पृथ्वी लगभग 71% जल से घिरी हुई है हालाँकि, पीने के लिए बहुत कम पानी है। पानी को सन्तुलित करने का प्राकृतिक चक्र स्वतः ही चलता रहता है। जैसे वर्षा और वाष्पीकरण। हालाँकि, धरती पर समस्या पानी की सुरक्षा और उसे पीने योग्य बनाने की है जोकि बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध है। जल संरक्षण लोगों की अच्छी आदत से सम्भव है।
हमें जल को क्यों बचाना चाहिए इसका उत्तर जानने के लिए, पहले पानी के महत्त्व को जानना चाहिए अर्थात् हमारे जीवन में जल कितना कीमती है। बिना ऑक्सीजन, पानी और भोजन के जीवन सम्भव नहीं है, लेकिन इन तीनों में सबसे जरूरी जल है । अब प्रश्न उठता है कि कितना प्रतिशत शुद्ध जल धरती पर मौजूद है।
आँकड़ों के अनुसार, ऐसा आकलन किया गया है कि 1% से भी कम पानी पृथ्वी पर पीने योग्य है। अगर हम पीने के पानी और विश्व की जनसंख्या का पूरा अनुपात निकालें, तो हर दिन पानी के 1 गैलन पर एक बिलियन से भी अधिक लोग पूरी दुनिया में जी रहे हैं। ऐसा भी आकलन किया गया है कि लगभग या 3 बिलियन से भी ज्यादा लोग 2025 तक पानी की कमी से जूझेंगे। लोग अब स्वच्छ जल का महत्त्व समझना शुरू कर चुके हैं, जबकि पूरी तरह से जल को बचाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। पानी को बचाना एक अच्छी आदत है और जीवन को धरती पर जारी रखने के लिए प्रत्येक को अपना सबसे बेहतरीन प्रयास करना चाहिए। कुछ साल पहले, कोई भी दुकान पर पानी नहीं बेचता था हालाँकि अब समय बहुत बदल चुका है और अब हम देख सकते हैं कि सभी जगह शुद्ध पानी की बॉटल बिक रही है। पूर्व में, पहले लोग पानी को दुकानों में बिकता देख आश्चर्यचकित हो गए थे हालाँकि अब, अपने अच्छे स्वास्थ्य के लिए ₹20 प्रति बॉटल या उससे अधिक देने के लिए तैयार हैं। हम साफतौर पर महसूस कर सकते हैं कि आने वाले भविष्य में पूरी दुनिया में स्वच्छ जल की अधिक कमी होगी। नीचे, हमने कुछ तथ्य दिए हैं जो आपको बताएँगे कि आज हमारे लिए साफ पानी कितना मूल्यवान बन चुका है.
  • बहुत सारे लोग जो पानी से होने वाली बीमारियों के कारण मर रहे हैं, 4 मिलियन से अधिक हैं।
  • एक दिन के समाचार पत्रों को तैयार करने में लगभग 300 लीटर पानी खर्च हो जाता है, इसलिए खबरों के दूसरे माध्यमों के वितरण को बढ़ावा देना चाहिए।
  • पानी से होने वाली बीमारियों के कारण हर 15 सेकण्ड में एक बच्चा मर जाता है ।
  • भारत, अफ्रीका और एशिया के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को साफ पानी के लिए लम्बी दूरी (लगभग 4 किसी से 5 किमी) तय करनी पड़ती है।
जल बचाव के तरीके
  • सभी को अपनी स्वयं की जिम्मेदारी को समझना चाहिए और पानी और भोजन पकाने के अतिरिक्त पानी के अधिक उपयोग से बचना चाहिए।
  • अगर धीरे-धीरे हम सभी लोग गार्डन को पानी देने से, शौच में पानी डालने से, साफ-सफाई आदि के लिए पानी की बचत करने लगेंगे, तो अधिक पानी की बचत संभव होगी। हमें बरसात के पानी को शौच, लाँड्री, पौधों को पानी आदि के उद्देश्य से बचाना चाहिए।
  • हमें बरसात के में पानी को पीने और भोजन पकाने के लिए एकत्रित करना चाहिए।
  • गर्मी के मौसम में कूलर में अधिक पानी बर्बाद न होने दें, केवल जरूरत भर पानी काही प्रयोग करें। हमें पाइप के द्वारा लॉन, घर या सड़कों पर पानी डालकर नष्ट नहीं करना चाहिए।
  • पौधारोपण को वर्षा ऋतु में लगाने के लिए प्रेरित करें जिससे पौधों को प्राकृतिक रूप से पानी मिलें। हमें अपने हाथ, फल, सब्जी आदि को खुले हुए नल के अतिरिक्त पानी के बर्तन से धोने की आदत बनानी चाहिए।
  • सुबह या शाम के समय पानी देने से पौधे पानी को अच्छे से सोखते हैं।
  • हमें पौधारोपण को बढ़ावा देना चाहिए।
उपसंहार स्पष्ट है कि जल के बिना जीवन बिल्कुल असम्भव है। अतः हमें जल संरक्षण के विषय में अनिवार्य रूप से विचार करना होगा और इसके समाधानों को खोजते हुए उन उपायों को भी अपनाना होगा, जिससे जल का संरक्षण हो । जल के बिना पूरी पृथ्वी ही जीवन शून्य हो जाएगी। अपनी आने वाली पीढ़ी को शुद्ध जल पर्याप्त मात्रा में मिले, इसके लिए हमें आज से ही संकल्प करना होगा, क्योंकि जल है, तो कल है।
20. मेरा प्रिय कवि
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, आरम्भिक जीवन-परिचय, काव्यगत विशेषताएँ, उपसंहार
प्रस्तावना संसार में अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार हुए हैं, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। यदि मुझसे पूछा जाए कि मेरा प्रिय साहित्यकार कौन है? तो मेरा उत्तर होगा—महाकवि तुलसीदास । यद्यपि तुलसी के काव्य में भक्ति भावना प्रधान है, परन्तु उनका काव्य कई सौ वर्षों के बाद भी भारतीय जनमानस में रचा-बसा हुआ है और मार्ग-दर्शन कर रहा है, इसलिए तुलसीदास मेरे प्रिय साहित्यकार हैं।
आरम्भिक जीवन-परिचय प्राय: प्राचीन कवियों और लेखकों के जन्म के बारे में सही-सही जानकारी नहीं मिलती । तुलसीदास के विषय में भी ऐसा ही है,. किन्तु माना जाता है कि 1599 ई. में बाँदा जिले में इनका जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनके ब्राह्मण माता-पिता ने इन्हें अशुभ मानकर जन्म लेने के बाद ही इनका त्याग कर दिया था। अतः इनका बचपन बहुत ही कठिनाइयों में बीता। गुरु नरहरिदास ने इनको शिक्षा दी।
इनका विवाह रत्नावली नाम की कन्या से हुआ था। विवाह उपरान्त उसकी एक कटु उक्ति सुनकर इन्होंने राम-भक्ति को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया, इन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग सैंतीस ग्रन्थों की रचना की, परन्तु इनके बारह ग्रन्थी प्रामाणिक माने जाते हैं। इस महान भक्त कवि का देहावसान 1680 ई. में हुआ ।
काव्यगत-विशेषताएँ तुलसीदास का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब हिन्दू समाज मुसलमान शासकों के अत्याचारों से आतंकित था। लोगों का नैतिक चरित्र गिर रहा था और लोग संस्कारहीन हो रहे थे।
ऐसे में समाज के सामने एक आदर्श स्थापित करने की आवश्यकता थी ताकि लोग उचित-अनुचित का भेद समझकर सही आचरण कर सकें। यह भार तुलसीदास जी ने सँभाला और ‘रामचरितमानस’ नामक महान काव्य की रचना की। इसके माध्यम से इन्होंने अपने प्रभु श्रीराम का चरित्र चित्रण किया, हालाँकि यह एक भक्ति – भावना प्रधान काव्य है। रामचरितमानस के अतिरिक्त इन्होंने कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका, जानकीमंगल, रामलला नहछू, बरवै रामायण वैराग्य सन्दीपनी, पार्वतीमंगल आदि ग्रन्थों की रचना भी की है, परन्तु इनकी प्रसिद्धि का मुख्य आधार ‘रामचरितमानस’ ही है।
साहित्य की दृष्टि से भी तुलसी का काव्य अद्वितीय है। इनके काव्य में सभी रसों को स्थान मिला है। इन्हें संस्कृत के साथ – साथ राजस्थानी, भोजपुरी, बुन्देलखण्डी, प्राकृत, अवधी, ब्रज, अरबी आदि भाषाओं का ज्ञान भी था, जिनका प्रभाव इनके काव्य में दिखाई देता है। इन्होंने विभिन्न छन्दों में रचना करके अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन किया है। तुलसी ने प्रबन्ध तथा मुक्त दोनों प्रकार के काव्यों में रचनाएँ कीं ।
इनकी प्रशंसा में कवि जयशंकर प्रसाद ने लिखा
“प्रभु का निर्भय सेवक था, स्वामी था अपना,
जाग चुका था, जग था जिसके आगे सपना ।
प्रबल प्रचारक था जो उस प्रभु की प्रभुता का,
अनुभव था सम्पूर्ण जिसे उसकी विभुता का ।
राम छोड़कर और की, जिसने कभी न आस की,
रामचरितमानस – कमल, जय हो तुलसीदास की । “
उपसंहार तुलसीदासजी अपनी इन्हीं सब विशेषताओं के कारण हिन्दी साहित्य के अमर कवि हैं। निःसन्देह इनका काव्य महान है। तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व, व्यक्ति और समाज सभी के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री दी है। अतः ये मेरे प्रिय कवि हैं।
21. निर्भर-भारत आत्म
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना, आत्मनिर्भर भारत अभियान के पाँच स्तम्भ, योजना महत्त्वपूर्ण बिन्दु, आत्मनिर्भर भारत अभियान की चुनौतियाँ, आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए जाने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण कदम, उपसंहार
प्रस्तावना प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कोविड- 19 वैश्विक महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था में सम्भावित गिरावट को रोकने व आपदा को अवसर में बदलने हेतु मई, 2020 में आत्म-निर्भर भारत अभियान की घोषणा की गई। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत मुख्य रूप से भूमि, श्रम तरलता और कानूनों पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा।
यह आर्थिक पैकेज छोटे व्यवसायों, कपड़ा उद्योग, घरेलू उद्योगों, मजदूरों, एमएसएमई सहित विभिन्न वर्गों की जरूरतों को पूरा करेगा। इसके साथ ही प्रधानमन्त्री ने कहा कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने का समय आ गया है। इसके लिए उन्होंने लोकल उत्पादों को प्रयोग करने, प्रचार करने तथा वैश्विक बनाने का आह्वान किया। इसके लिए उन्होंने ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा दिया ।
आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना आत्म-निर्भर भारत की संकल्पना का आशय भारत को आत्म-निर्भर बनाना है। वर्तमान भूमण्डलीकरण के युग में आत्मनिर्भरता की परिभाषा में बदलाव आया है। अतः प्रधानमन्त्री ने कहा है कि भारत की आत्म-निर्भरता (Self Reliance), आत्मकेन्द्रित (Self-Centered ) से अलग है।
इस अभियान का लक्ष्य देश में एक मजबूत आर्थिक परिवेश को निर्मित करना है, जिसमें सभी लोग प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो सकेंगे। यह मिशन दो चरणों में पूरा किया जाएगा।
पहले चरण में चिकित्सा, वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे स्थानीय विनिर्माण तथा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। वहीं दूसरे चरण में रत्न, आभूषण, फार्मा, स्टील जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे पूर्ति के साथ निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।
आत्मनिर्भर भारत अभियान के पाँच स्तम्भ
आत्मनिर्भर भारत पाँच स्तम्भों पर खड़ा होगा, जो इस प्रकार हैं।
  • अर्थव्यवस्था (Economy) जो वृद्धिशील परिवर्तन के स्थान पर बड़ी छलांग सुनिश्चित करती हो।
  • अवसंरचना (Infrastructure) ऐसी अवसंरचना को बढ़ावा देना, जो आधुनिक युग की पहचान बने।
  • प्रौद्योगिकी (Technology) जो 21वीं सदी की प्रौद्योगिकी संचालित व्यवस्था पर आधारित हो ।
  • गतिशील जनसांख्यिकी (Vibrant Demography) जो आत्मनिर्भर भारत के लिए हमारी ऊर्जा का स्रोत है।
  • माँग (Demand) भारत की माँग व आपूर्ति श्रृंखला की पूरी क्षमता का उपयोग किया जाएगा।
योजना महत्त्वपूर्ण बिन्दु
  • इस योजना में सभी प्रवासी मजदूर, छोटे और बड़े बिजनेसमैन तथा सभी प्रकार के व्यापारी शामिल हैं, जिन्हें आर्थिक सहायता दी जाएगी।
  • इस अभियान के अन्तर्गत महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं – मेक इन इण्डिया, निवेश को प्रेरित _करना, उत्तम आधारिक संरचना, बेहतर वित्तीय सेवा तथा कृषि प्रणाली का विकास आदि ।
  • सरकार ने आत्म-निर्भर भारत के निर्माण की दिशा में उन 10 क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा।
  • इसके साथ ही सरकार ने इन 10 क्षेत्रों में आयात में कटौती का निर्णय लिया है। इन क्षेत्रों में शामिल हैंडरत्न एवं आभूषण, टेक्सटाइल्स, फर्नीचर, फार्मास्युटिकल्स, पूँजीगत सामान तथा मशीनरी, मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स, फुट वियर, एयरकंडीशनर आदि।
आत्मनिर्भर भारत अभियान की चुनौतियाँ आत्म-निर्भर भारत अभियान के तहत् घोषित पैकेज की अपार सम्भावनाएँ हैं, इसके बावजूद इसके समक्ष कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जिसे कुछ विशेषज्ञों ने उजागर किया है, जो इस प्रकार हैं.
  • सरकार द्वारा की जाने वाली अप्रत्यक्ष सहायता; जैसे- भारतीय रिज़र्व बैंक के ऋण सुगमता उपायों का लाभ सीधे लाभार्थी तक नहीं पहुँच पाता है।
  • भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता का स्तर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा के अनुकूल नहीं है, साथ ही अधिक वित्तीय तथा तकनीकी संसाधनों की आवश्यकता है, जो एक प्रमुख चुनौती है।
  • भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता का स्तर भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा के अनुकूल नहीं है।
आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए जाने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण कदम
  • भारत को अपनी आधारिक संरचना (Basic Infrastructure ) पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है।
  • भारत को इच्छाशक्ति ( Infect ), समावेशन ( Inclusion ), निवेश (Investment), नवाचार(Innovation) पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है।
  • अपने उत्पादों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने हेतु उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है।
  • 21वीं सदी में चुनौतियाँ और भी बढ़ रही हैं। अतः नए भारत के निर्माण की दिशा में भारत को भविष्य में और अधिक संरचनात्मक सुधारों की जरूरत हो सकती है।
उपसंहार इस प्रकार, आत्मनिर्भर भारत अभियान के समक्ष चुनौतियाँ अवश्य हैं, किन्तु इसकी लक्षित कार्यप्रणाली एक समावेशी विकास को बढ़ावा देती है, जिसमें विकास के सभी पहलु शामिल हैं, जो समानता व समता जैसे मानदण्ड को पूरा करते हैं, आने वाली समस्याओं के निदान के लिए तत्पर रहने के अनुकूल हैं, साथ ही इसमें नागरिकों के सशक्तीकरण जैसे पहलू भी शामिल हैं, जो बेहतर भारत के निर्माण की पूँजी हैं।
अतः भारत को दृढ़ इच्छाशक्ति, समावेशन, नवाचार, निवेश पर कुशलतापूर्ण ध्यान देकर उन उद्यमों में निवेश पर अधिक ध्यान देना, जिससे भारत को वैश्विक ताकत के रूप में उभरने की अधिक सम्भावना है और वैश्विक पटल पर आत्मनिर्भर भारत विश्व के अन्य देशों का मार्गदर्शक बन सकेगा ।
22. आजादी का अमृत महोत्सव
संकेत बिन्दु प्रस्तावना, भारत के स्वतन्त्रता संग्राम की स्मृतियाँ, नींव और उद्देश्य, आजादी के अमृत महोत्सव से सम्बन्धित मुख्य तथ्य, उपसंहार
प्रस्तावना किसी भी देश का भविष्य तभी उज्ज्वल होता है, जब वह अपने पुराने अनुभवों और प्राचीन विरासत के गौरव के साथ हर पल जुड़ा रहता है। भारत के पास एक समृद्ध ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत का अथाह भण्डार है। जिस पर हमें गर्व करना चाहिए। इसी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक चेतना को भारत के हर घर में पहुँचाने के लिए भारत प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अहमदाबाद, गुजरात में साबरमती आश्रम एक पद यात्रा को हरी झण्डी दिखाकर स्वतन्त्रता की 75वीं वर्षगाँठ के लिए समर्पित ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ कार्यक्रम का उद्घाटन किया। आजादी यह अमृत महोत्सव 15 अगस्त, 2022 से 75 सप्ताह पहले शुरू हुआ था और 15 अगस्त, 2023 तक चला।
भारत के स्वतन्त्रता संग्राम की स्मृतियाँ 1857 ई. का स्वतन्त्रता संग्राम, महात्मा गाँधी की विदेश से वापसी, सत्याग्रह आन्दोलन, लोकमान्य तिलक का ‘पूर्ण स्वराज’ का आह्वान, नेताजी के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज आदि इतिहास के अनेक गौरव को याद रखने के लिए हर राज्य में इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। अण्डमान में नेताजी सुभाष चन्द्रबोस ने देश की पहली स्वतन्त्र सरकार बनाकर तिरंगा फहराया था। अतः अण्डमान और निकोबार के द्वीपों का नाम स्वतन्त्रता संग्राम के नाम पर रखा गया। ‘जलियाँवाला बाग’ या ‘पाइका आन्दोलन’ की स्मृति में इनसे सम्बन्धित स्मारकों का कार्य पूर्ण हो चुका है।
अत: आजादी का अमृत महोत्सव आजादी की लड़ाई की यादों को ताजा करने के साथ-साथ आजाद भारत के सपनों और कर्त्तव्यों को देश के सामने रखकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
नींव और उद्देश्य भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतन्त्र और प्रगतिशील भारत, इसकी विविध जनसंख्या और इसके समृद्ध इतिहास के 75 गौरवशाली वर्षों का जश्न मनाने के लिए ‘भारत की आजादी के अमृत महोत्सव’ की पहल की।
इस अमृत महोत्सव के 5 मुख्य स्तम्भ रहे
(i) स्वतन्त्रता संग्राम
(ii) 75 वर्षों की उपलब्धियाँ
(iii) योजनाएँ
(iv) संकल्प तथा
(v) कार्य।
इस पहल को शुरू करने के पीछे का उद्देश्य युवा पीढ़ी को स्वतन्त्रता सेनानियों के बलिदान के प्रति जागरूक करना और उन्हें श्रद्धांजलि देना है।
यह महोत्सव भारत में उन सभी स्वतन्त्रता सेनानियों को समर्पित है, जिन्होंने भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अभियान का एक मुख्य उद्देश्य भारत को आत्मनिर्भर बनाना है।
इस सम्बन्ध में भारत सरकार ने 259 सदस्यों की एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है और समिति के प्रमुख प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी हैं। ऐसे बहुत-से गुमनाम स्वतन्त्रता सेनानी हैं, जिन्होंने आजादी के लिए स्वयं को और अपनी पहचान को भी बलिदान कर दिया। अतः इस महोत्सव का एक उद्देश्य यह भी है कि भारत सरकार ऐसे नायकों को उजागर कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहती है।
इस अभियान का उद्देश्य देश के विकास और प्रगति में युवाओं की जागरूकता और रुचि को बढ़ाना भी है। इस महोत्सव के अन्य उद्देश्य देश की विभिन्न संस्कृतियों के बारे में जानना और विविधता में एकता आदि है।
आजादी के अमृत महोत्सव से सम्बन्धित मुख्य तथ्य आजादी के अमृत महोत्सव से सम्बन्धित मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं
  • इस महोत्सव की शुरुआत प्रधानमन्त्री द्वारा 12 मार्च, 2021 में की गई।
  • आजादी के अमृत महोत्सव का अर्थ है – स्वतन्त्रता के 75 वर्ष पूरे करना।
  • यह अभियान आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर भी बल देता है।
  • यह महोत्सव भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी छिपी प्रतिभा और क्षमताओं को खोजने के लिए प्रोत्साहित करता है।
  • आजादी के अमृत महोत्सव के मुख्य विषय हैं – स्वतन्त्रता विश्व गुरु भारत, आत्म-निर्भर भारत, विचार उपलब्धियाँ व संकल्प, भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत आदि ।
उपसंहार यह हम सभी देशवासियों का परम सौभाग्य है कि हम स्वतन्त्र भारत के इस ऐतिहासिक काल को देख रहे हैं, जिस समय भारत नई-नई प्रगतियाँ कर रहा है। दुनिया के प्रगतिशील राष्ट्रों में से एक हमारा राष्ट्र भी है।
अतः हमें देश के इन सभी स्वतन्त्रता सेनानियों और महान व्यक्तियों को स्मरण तथा नमन करना चाहिए, जिन्होंने देश को इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया।

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