निजीकरण क्या है | What is personalization

निजीकरण क्या है | What is personalization

निजीकरण व्यवसाय, उद्यम, एजेंसी या सार्वजनिक सेवा के स्वामित्व के सार्वजनिक क्षेत्र (राज्य या सरकार) से निजी क्षेत्र (निजी लाभ के लिए संचालित व्यवसाय) या निजी गैर-लाभ संगठनों के पास स्थानांतरित होने की घटना या प्रक्रिया है। एक व्यापक अर्थ में, निजीकरण राजस्व संग्रहण तथा कानून प्रवर्तन जैसे सरकारी प्रकार्यों सहित, सरकारी प्रकार्यों के निजी क्षेत्र में स्थानांतरण को संदर्भित करता है।

शब्द “निजीकरण” का दो असंबंधित लेनदेनों के वर्णन के लिए भी उपयोग किया गया है। पहला खरीद है, जैसे किसी सार्वजनिक निगम या स्वामित्व वाली कंपनी के स्टॉक के सभी शेयर बहुमत वाली कंपनी द्वारा खरीदा जाना, सार्वजनिक रूप से कारोबार वाले स्टॉक का निजीकरण है, जिसे प्रायः निजी इक्विटी भी कहते हैं। दूसरा है एक पारस्परिक संगठन या सहकारी संघ का पारस्परिक समझौता रद्द कर के एक संयुक्त स्टॉक कंपनी बनाना.

एडवर्ड्स कहते हैं कि द इकोनोमिस्ट ने 1930 के दशक में नाजी जर्मन आर्थिक नीति को कवर करने के लिए इस शब्द को गढ़ा था। ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोश के उल्लेख के अनुसार इसका उपयोग 1942 में इकोनोमिक जर्नल 52, 398 में हुआ था।

“निजीकरण” का इतिहास

प्राचीन ग्रीस से निजीकरण का एक लंबा इतिहास मिलता है जब सरकारों ने लगभग सब कुछ निजी क्षेत्र को अनुबंधित कर दिया था। रोमन गणराज्य में कर संग्रह (कर-पालन), सैन्य आपूर्ति (सैन्य ठेकेदार), धार्मिक बलिदान और निर्माण सहित अधिकतर सेवाएं निजी व्यक्तियों और कंपनियों द्वारा दी जाती थीं। हालांकि, रोमन साम्राज्य ने राज्य के स्वामित्व वाले उद्यम भी बनाए थे- उदाहरण के लिए, अधिकांश अनाज का उत्पादन अंततः सम्राट के स्वामित्व वाली भूसंपत्ति पर होता था। कुछ विद्वानों का मत है कि नौकरशाही की लागत रोमन साम्राज्य के पतन के कारणों में से एक था।

ब्रिटेन में आम भूमि के निजीकरण को बाड़े के रूप में संदर्भित किया जाता है (स्कॉटलैंड में तराई स्वीकृतियों और पर्वतीय-भूमि स्वीकृतियों के रूप में). इस प्रकार का महत्वपूर्ण निजीकरण उस देश में औद्योगिक क्रांति के समकालीन 1760 से 1820 में हुआ था।

अभी हाल के समय में, विंस्टन चर्चिल की सरकार ने 1950 में ब्रिटिश इस्पात उद्योग का निजीकरण किया था और पश्चिम जर्मनी की सरकार ने 1961 में वोक्सवैगन में अपनी बहुमत हिस्सेदारी के सार्वजनिक शेयरों को छोटे निवेशकों को बेचने सहित, बड़े पैमाने पर निजीकरण प्रारंभ किया था। 1970 के दशक में जनरल पिनोशे ने चिली में महत्वपूर्ण निजीकरण कार्यक्रम लागू किया था। हालांकि, 1980 के दशक में ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर और संयुक्त राज्य अमेरिका में रोनाल्ड रीगन के नेतृत्व में निजीकरण ने वैश्विक गति हासिल की। ब्रिटेन में इस की पराकाष्ठा 1993 में थैचर के उत्तराधिकारी जॉन मेजर द्वारा ब्रिटिश रेल के निजीकरण के रूप में हुई, ब्रिटिश रेल को पूर्व में निजी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करके गठित किया गया था।

विश्वबैंक, अंतर्राष्ट्रीय विकास के लिए अमेरिकन एजेंसी, जर्मन ट्रूहैंड तथा अन्य सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से, 1990 के दशक में पूर्वी और मध्य यूरोप में तथा पूर्व सोवियत यूनियन में सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों का निजीकरण किया गया।

एक प्रमुख रूप से चल रहे निजीकरण में, जो कि जापान डाक सेवा से संबंधित है, में जापानी डाक सेवा तथा दुनिया का सबसे बड़ा बैंक शामिल हैं। कई पीढ़ियों की बहस के बाद, जूनीचिरो कोइज़ुमी के नेतृत्व में यह निजीकरण 2007 में शुरू हुआ था। निजीकरण की इस प्रक्रिया के 2017 तक ख़त्म होने की आशा है।

निजीकरण देश के लिए हितकारी या हानिकारक?

1990 के दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था में नया दौर आया क्योंकि उस समय की भारत सरकार ने निजीकरण शुरू किया। उस वक्त कुछ सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रमों में छोटे-छोटे स्टेक्स की बिक्री से देश में निजीकरण की शुरुवात हुई। तब से निजीकरण का फार्मूला लोगों के सामने आया। फिर अलग अलग अर्थशास्त्री इस विषय पर अध्ययन करने लगे और अपनी अपनी राय देने लगे। दरअसल निजीकरण का अर्थ है कि किसी सरकारी संस्था का नियंत्रण प्राइवेट यानि निजी संगठन के हाथों में जाना। फिर उस संस्था पर सरकार का अधिकार – क्षेत्र खत्म हो जाता है। वह सरकारी से निजी संस्था में तब्दील हो जाती है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो सरकार के स्वामित्व वाले व्यवसायों को निजी संस्था को बेचना निजीकरण है। प्राचीन काल में भी निजीकरण का अस्तित्व पाया गया है। 20वी सदी से पूर्व यूनान में वहाँ की सरकार ने लगभग सभी सरकारी संस्थाओ को निजी क्षेत्र को सौंप दिया था। रोमन साम्राज्य ने भी अधिकतर सरकारी विषयों को निजी संस्थाओ को सौंपा हुआ था। 20वी सदी के बाद नाजी हुकूमत ने जर्मनी में कई सरकारी फर्मो को निजी संस्थाओ को बेच दिया।

1950 के दशक में इंग्लैंड ने भी इस्पात उद्योगों का निजीकरण कर दिया था। अब भारत में भी निजीकरण की मांग उठ रही है। सबसे पहले यह सवाल है कि निजीकरण से भारत को क्या लाभ होगा। सबसे पहले तो निजी संस्था होनें से काम की गुणवत्ता में सुधार होता है क्योंकि सरकारी संस्था में नौकरशाही का बोलबाला होता है जिससे काम की गुणवत्ता बहुत खराब रहती है। निजी संस्था के काम में निपुणता अधिक होतीं है। निजी संस्था के काम में अधिक विकल्प मिलते है क्योंकि निजी व्यवसाय मानव और वित्तीय संसाधनों पर केंद्रित रहते है जोकि सरकारी संस्था में कतई संभव नहीं है।

सबसे खास तो यह है कि निजी संस्था में भ्रष्टाचार की बहुत कम गुंजाईश है क्योंकि सरकारी संस्थाओ में रिश्वतखोरी की बड़ी समस्या है और निजी संस्था में सरकारी संस्थाओ के भांति राजनैतिक हस्तक्षेप नहीं रहता। निजी संस्था में जवाबदेही सीधे उपभोक्ता को संस्था और उसके मालिक की होगी परन्तु सरकारी संस्था में संस्था की जवाबदेही राजनीतिक हितधारियों को होगी। निजीकरण के कुछ नुकसान भी है। निजीकरण से निजी संस्थाएँ मुनाफाखोरी में लग जाती है। निजी संस्थाएँ आपस में प्रतिस्पर्धा में लग जाती है जिससे आम लोग दुविधा में पड़ जाते है। निजी संस्थाएँ मुलाजिमों को ठीक से तनख्वाह भी नहीं देती। निजीकरण से बेरोजगारी भी बढ़ सकती है क्योंकि आर्थिक मंदी में छँटनी होनें की पूरी संभावना रहती है और इससे बहुत मुलाजिमों की नौकरी जाने का खतरा बना रहता है। सरकारी संस्थाओ पर सरकार दबाव बनाकर सामाजिक भलाई के लिए भी प्रेरित कर सकती है। निजी संस्थाओ से सरकार की आंख हट जाती है। सरकार की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है जिसका कुछ निजी संस्थाएँ फायदा उठाने की कोशिश करती है।

निजीकरण उदारवाद का प्रतीक है। हमारा देश मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला है। भारत में पूर्ण निजीकरण लाभदायक नहीं है ज्यादा से ज्यादा 80 प्रतिशत तक जरूरी है। कुछ संस्थाएँ सरकार के नियंत्रण में भी जरूरी है जिससे अर्थव्यवस्था का ठीक संतुलन बना रहे। निजीकरण से देश काफी तरक्की करेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था को सरकार और निजी निवेश दोनो की जरूरत है। सरकार को निजी क्षेत्र में बाहरी मदद जारी रखनी होगी ताकि निजी संस्थाएँ नाजायज फायदा ना उठा पाए और सच में जनता का भला हो ना कि उन्हें तकलीफ पहुंचे। इसलिए निजीकरण एक सीमा तक हितकारी है परन्तु पूर्ण निजीकरण हानिकारक है।

निजीकरण आखिर कैसे अच्छा?

 

भारत में जब विनिवेश की प्रक्रिया शुरू हुई थी तब यह ब्रह्म वाक्य तय हुआ था कि सरकार मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को नहीं बेचेगी। सिर्फ उन्हीं कंपनियों को बेचा जाएगा, जो घाटे में हैं और सरकार के लिए बोझ बन गई हैं। इसमें भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इकाइयों और लोक सेवा से जुड़ी कंपनियों को विनिवेश के दायरे से अलग रखा गया था। वे भले घाटे में हों पर उनको करदाताओं के पैसे से चलाए रखने पर राष्ट्रीय सहमति थी। जैसे एयर इंडिया को चलाए रखने में करदाताओं का 50-60 हजार करोड़ रुपया खर्च हुआ। अब इस सिद्धांत को पूरी तरह से उलट दिया गया है। अब घाटे में चलने वाली कंपनियों को नहीं बेचा जा रहा है क्योंकि आज के जो गिने-चुने खरीददार हैं वे उसे नहीं खरीदेंगे। उनको मुनाफा कमाने वाली कंपनी चाहिए। इसलिए सरकार मुनाफा कमा कर देने वाली कंपनियों को बेच रही है।

मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को बेच कर पैसे कमाने की सरकार की मानसिकता बहुत खतरनाक है। यह अंततः देश को वैसी स्थिति में पहुंचा देगी, जहां करोड़ों करोड़ लोगों के हितों को देखने वाला कोई नहीं होगा। देश के गरीब, दलित, आदिवासी, वंचित, महिलाएं, बच्चे सब अरक्षित होंगे और बाजार की ताकतों के हवाले होंगे। देश की विशाल आबादी उन पूंजीपतियों के लिए असहनीय बोझ होगी या बाजार। और तब किसी किस्म की संकट की घड़ी में खुद सरकार भी असहाय होगी। देश के नागरिकों की मदद करने के लिए उसे निजी कंपनियों का मुंह देखना होगा।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि कोरोना वायरस के संकट ने जो सबक दिया है उससे भी सरकार कुछ नहीं सीख रही है। इस समय दुनिया के दूसरे देशों में फंसे भारतीयों को वापस लाना है तो सरकार का वंदे भारत मिशन एयर इंडिया के सहारे ही चल रहा है। एकमात्र सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया के जरिए ही लाखों लोगों को विदेश से भारत लाया जा सका है। इतना ही नहीं देश और दुनिया में भारत ने जो राहत सामग्री पहुंचाई है वह भी एयर इंडिया के जरिए ही हुआ है। प्रधानमंत्री गर्व से कह रहे हैं कि भारत ने 130 देशों की मदद की है तो यह मदद एयर इंडिया के जरिए ही पहुंचाई गई है। लेबनान में भीषण विस्फोट के तुरंत बाद भारत अगर मदद पहुंचा सका तो वह एयर इंडिया के कारण हुआ। पर सरकार को हर हाल में एयर इंडिया को बेच डालना है।

कोरोना के संकट में सरकारी कंपनियों और सेवाओं ने कितनी मदद की है, उसे समझना कोई मुश्किल बात नहीं है, बशर्ते कोई समझना चाहे। कोरोना के लाखों मरीजों की जांच और उनका इलाज सरकारी अस्पतालों में ही हुआ, निजी अस्पतालों ने तो इस वायरस की आपदा को अवसर में बना कर लोगों को सिर्फ लूटा। कोरोना की वैक्सीन कहां बन रही है? उसके लिए भी सरकारी कंपनी बीबीआईएल ही काम आई है। लाखों-लाख लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने में रेलवे की सेवा ही काम आई, निजी परिवहन सेवाओं से यह काम संभव नहीं होता।

सरकार के सामने जब भी आर्थिक संकट आया तब भी सरकारी कंपनियां ही काम आईं। ओएनजीसी के पैसे से भारत सरकार ने कितनी कंपनियों के नुकसान की भरपाई की और उन्हें बचाया! यह अलग बात है कि अब खुद ओएनजीसी ही संकट में है। बैंकिंग के संकट के समय में आईडीबीआई और यस बैंक को सरकार एलआईसी की मदद से ही बचा सकी। अब उसी एलआईसी की 25 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की तैयारी हो रही है।

सवाल है कि क्यों एलआईसी को बेचना है? क्या एलआईसी अपने मकसद को पूरा नहीं कर पा रही है? ध्यान रहे 1956 में इस कंपनी का राष्ट्रीयकरण हुआ था और तब से आज तक इस कंपनी ने लाखों करोड़ रुपए सरकार को कमा कर दिए हैं। यह देश के करोडों लोगों की कमाई औऱ उनके भरोसे की कस्टोडियन कंपनी है। भाजपा की सरकार ने ही 1999 में देशी-विदेशी निजी कंपनियों को बीमा के कारोबार में आने की इजाजत दी थी। पिछले 20 बरस में 22 के करीब निजी कंपनियों के बीमा कारोबार में आने के बावजूद बीमा का 72 फीसदी कारोबार एलआईसी के पास है। देश के तीन-चौथाई लोग अपने निवेश और अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए एलआईसी पर भरोसा करते हैं। सोचें, दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय बीमा कंपनियों के भारत में काम शुरू करने के बावजूद प्रतिस्पर्धा में एलआईसी उनसे मीलों आगे रही। यह कंपनी अपनी कमाई का 95 फीसदी हिस्सा बीमाधारकों में बांटती है और पांच फीसदी लाभांश के तौर पर केंद्र सरकार को देती है। जब यह व्यवस्था बिल्कुल परफेक्शन के साथ काम कर रही है फिर क्यों इस कंपनी को बेचना है?

चाहे एलआईसी हो या भारत पेट्रोलियम निगम लिमिटेड हो या शिपिंग कॉरपोरेशन हो या कंटेनर कॉरपोरेशन हो ये सब सोने का अंडा देने वाली मुर्गियां हैं। पर भारत की शेखचिल्ली सरकार इनका पेट फाड़ कर एक बार में ही सारे अंडे निकाल लेने की सोच में काम कर रही है। उसे इस बात से मतलब नहीं है कि इन कंपनियों के सरकारी हाथ में बने रहने से देश के 138 करोड़ लोगों को कितना फायदा होगा। इन्हें बेच कर सरकार को जो पैसे मिलेंगे उससे थोड़े समय के लिए तो खजाना भरा दिखाई देगा पर उसके बाद क्या? वह खजाना खाली होने में कितना समय लगेगा? उसके बाद क्या होगा? उसके बाद सरकार क्या बेचेगी? इस सरकार ने तो कुछ ऐसा बनाया भी नहीं, जिसे आगे जरूरत पड़ने पर कोई बेच सके!  पहले से बनी बनाई देश की संपत्ति को बेच डालना कौन सी समझदारी का काम है?

हैरानी की बात है यह काम आम लोगों की सहमति से किया जा रहा है। भक्ति में डूबे करोडों लोग इसका समर्थन कर रहे हैं। वे इस बात से सहमत हैं कि सरकार का काम बिजनेस चलाना नहीं होता है। उनके दिमाग में यह बात बैठा दी गई है कि निजीकरण बहुत अच्छा है। सवाल है कि जब निजीकरण अच्छा है तो सबको सरकारी नौकरी क्यों चाहिए? सरकारी अस्पतालों के सामने फिर इतनी भीड़ क्यों है? केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों में दाखिले के लिए इतनी मारामारी क्यों मची है? क्यों देश भर के छात्रों को दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू या बीएचयू में दाखिला चाहिए? क्यों नहीं वे अशोका, जिंदल या जियो यूनिवर्सिटी के सामने लाइन लगा कर खड़े हैं? क्यों लाखों छात्र जी-जान से मेहनत करके आईआईटी, एनआईटी में दाखिले के लिए जेईई मेन्स और एडवांस की परीक्षाओं में शामिल होते हैं? वे सीधे किसी निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में जाकर दाखिला क्यों नहीं लेते हैं? क्यों नीट की परीक्षा के जरिए सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए अच्छा रैंक लाने की होड़ मची है? दर्जनों निजी बैंक खुल गए हैं फिर क्यों भीड़ सरकारी बैंकों में है? क्योंकि इन सारी सरकारी संस्थाओं की गुणवत्ता, सेवा निजी संस्थानों से बेहतर है और फीस बहुत मामूली है। कह सकते हैं कि देश में गरीब, निम्न मध्य वर्ग और मध्य वर्ग की आबादी बड़ी है इसलिए सरकारी संस्थाओं के सामने भीड़ है। फिर तो इसी लॉजिक से इन संस्थाओं का बने रहना करोड़ों लोगों के हित में है। अगर ये संस्थाएं बंद हुईं तो ये करोड़ों लोग कहां जाएंगे?

चाहे सरकारी अस्पताल हों, सरकारी कॉलेज, इंस्टीच्यूट हों, सरकारी कंपनियां हों, सब बरसों, दशकों की मेहनत से बनी हैं। लाखों लोगों ने इन्हें अपने खून-पसीने से सींचा-संवारा है। इन्हें बेच कर बदले में जो हासिल होगा वह इनकी सेवाओं के मुकाबले कुछ नहीं है। इनकी सेवाएं ज्यादा मूल्यवान हैं और देश के करोड़ों लोगों के ज्यादा कम आने वाली हैं। इन्हें बेचने की बजाय बचाने की कोशिश होनी चाहिए। आंख मूंद कर सरकार के हर कदम का समर्थन करने वालों को आंखें खोलनी चाहिए। यह हिंदू-मुस्लिम का मामला नहीं है। यह हर भारतीय के जीवन से जुड़ा मुद्दा है। हिंदू-मुस्लिम के झगड़े तो कभी भी सुलझा लिए जाएंगे पर अगर सरकार ने सब कुछ बेच दिया तो आप हिंदू हों या मुसलमान, पूंजीपतियों के लिए भेड़-बकरी ही होंगे। आप जिनकी भक्ति में डूबे हैं वे तो झोला उठा कर चल देंगे, फिर आपका क्या होगा!

मोदी सरकार सरकारी कंपनियां क्यों बेच रही है?

भारत का राजकोषीय घाटा 6.45 लाख करोड़ रुपए का है. इसका मतलब ख़र्चा बहुत ज़्यादा और कमाई कम. ख़र्च और कमाई में 6.45 लाख करोड़ का अंतर.

तो इससे निपटने के लिए सरकार अपनी कंपनियों का निजीकरण और विनिवेश करके पैसे जुटाती है.मोदी सरकार की कैबिनेट ने 5 कंपनियों के विनिवेश को मंज़ूरी दे दी है. इससे पहले नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने अगस्त में बीबीसी को बताया था कि विनिवेश या बिक्री के लिए केंद्र सरकार को 46 कंपनियों की एक लिस्ट दी गई है और कैबिनेट ने इनमें 24 के विनिवेश को मंज़ूरी दे दी है.

क्या है विनिवेश और निजीकरण

निजीकरण और विनिवेश को अक्सर एक साथ इस्तेमाल किया जाता है लेकिन निजीकरण इससे अलग है. इसमें सरकार अपनी कंपनी में 51 फीसदी या उससे ज़्यादा हिस्सा किसी कंपनी को बेचती है जिसके कारण कंपनी का मैनेजमेंट सरकार से हटकर ख़रीदार के पास चला जाता है.

विनिवेश में सरकार अपनी कंपनियों के कुछ हिस्से को निजी क्षेत्र या किसी और सरकारी कंपनी को बेचती है.

सरकार तीन तरह से पैसा जुटाने की कोशिश कर रही है – विनिवेश, निजीकरण और सरकारी संपत्तियों की बिक्री.

निजीकरण और विनिवेश एक ऐसे माहौल में हो रहा है जब देश में बेरोज़गारी एक बड़े संकट के रूप में मौजूद है. देश में पूँजी की सख़्त कमी है. घरेलू कंपनियों के पास पूँजी नहीं है. इनमें से अधिकतर क़र्ज़दार भी हैं. बैंकों की हालत भी ढीली है.

विनिवेश के पक्ष में तर्क ये है कि सरकारी कंपनियों में कामकाज का तरीक़ा प्रोफेशनल नहीं रह गया है और उस वजह से बहुत सारी सरकारी कंपनियां घाटे में चल रही हैं.

इसलिए उनका निजीकरण किया जाना चाहिए जिससे काम-काज के तरीक़े में बदलाव होगा और कंपनी को प्राइवेट हाथों में बेचने से जो पैसा आएगा उसे जनता के लिए बेहतर सेवाएं मुहैया करवाने में लगाया जा सकेगा.

लेकिन क्या ये सही में विनिवेश है?

5 जुलाई को बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) में अपना निवेश 51 फ़ीसदी से कम करने की घोषणा की थी.

इसका आसान शब्दों में मतलब ये हुआ कि अगर 51 फीसदी से कम शेयरहोल्डिंग होगी तो सरकार की मिल्कियत ख़त्म.

लेकिन उसी घोषणा में ये बात भी थी कि सरकार सिर्फ़ मौजूदा नीति बदलना चाहती है जो फ़िलहाल सरकार की 51% डारेक्ट होल्डिंग की है. इसे बदलकर डारेक्ट या इनडारेक्ट सरकारी होल्डिंग करना चाहते हैं.

एक उदाहरण इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) का लेते हैं. इसमें सरकार की 51.5% डारेक्ट होल्डिंग है. इसके अलावा लाइफ़ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (LIC) के 6.5% शेयर भी उसमें हैं जो पूरी तरह सरकारी कंपनी है. इसका मतलब IOCL में सरकार की इनडारेक्ट होल्डिंग भी है.

तो अगर सरकार IOCL से अपनी डारेक्ट सरकारी होल्डिंग कम करती है तो इनडारेक्ट सरकारी होल्डिंग की वजह से फ़ैसले लेने की ताकत सरकार के हाथ में होगी. लेकिन फिर इसका उद्देश्य क्या है? उद्देश्य तो ये था कि कोई नया निवेशक आए और इन संस्थानों को बदल कर विकास की राह पर लाए. लेकिन कहीं ना कहीं सरकारी हस्तक्षेप की आशंका रहती है.

आर्थिक और व्यवसाय जगत के एक बड़े वर्ग का मानना है कि पिछले तीसेक सालों में जिस तरह से सरकारी कंपनियों को बेचा गया है वो विनिवेश था ही नहीं, बल्कि एक सरकारी कंपनी के शेयर्स दूसरी सरकारी कंपनी ने ख़रीदे हैं.

इससे सरकार का बजट घाटा तो कम हो जाता है लेकिन न तो इससे कंपनी के शेयर होल्डिंग में बहुत फ़र्क़ पड़ता है, न ही कंपनी के काम-काज के तरीक़े बदलकर बेहतर होते हैं.

क्यों हैं विनिवेश से डर?

लेकिन विनिवेश की ये प्रक्रिया भी अर्थव्यवस्था की तरह धीमी चल रही है. मोदी सरकार का विनिवेश का इस साल का टारगेट सिर्फ़ 16% पूरा हो पाया है. टारगेट के 1.05 लाख करोड़ में से क़रीब 17,365 करोड़ रुपए जुटाए जा चुके हैं.

एयर इंडिया को बेचने के लिए भी निवेशक की तलाश है. इसमें देरी हो रही है क्योंकि पहले सरकार इसमें 24% होल्डिंग रखना चाहती थी लेकिन अब सरकार इसे पूरी तरह बेचने को तैयार है.

विनिवेश की धीमी रफ़्तार की वजह इसका विरोध भी है क्योंकि इससे नौकरियां जाने का ख़तरा है.

आरएसएस से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ ने भी सरकारी कंपनियों को प्राइवेट कंपनियों को बेचने का विरोध किया है.

क्योंकि प्राइवेट कंपनी किसी को भी नौकरी से निकाल सकती है. हालांकि अर्थशास्त्री विवेक कौल कहते हैं कि नौकरी से निकालने का मतलब ये नहीं है कि कर्मचारी सड़क पर आ जाएंगे. स्टाफ़ को वीआरएस (voluntary retirement scheme) देना पड़ेगा, प्रोविडेंट फण्ड देना पड़ता है और उन्हें ग्रेच्युटी देनी पड़ेगी.

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